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द्वादश स्कन्ध · अध्याय 6

गायत्रीसहस्रनामस्तोत्रवर्णनम्

अध्याय 5अध्याय-सूचीअध्याय 7

श्लोक 1 (devibhagavatam.12.6.1)

नारद उवाच । भगवन्सर्वधर्मज्ञ सर्वशास्त्रविशारद । श्रुतिस्मृतिपुराणानां रहस्यं त्वन्मुखाच्छ्रुतम्

nārada uvāca bhagavansarvadharmajña sarvaśāstraviśārada śrutismṛtipurāṇānāṁ rahasyaṁ tvanmukhācchrutam

नारद जी ने कहा — हे भगवन्! हे सर्वधर्मज्ञ! हे सर्वशास्त्रविशारद! श्रुति, स्मृति और पुराणों का रहस्य मैंने आपके ही मुख से सुना है।

श्लोक 2 (devibhagavatam.12.6.2)

सर्वपापहरं देव येन विद्या प्रवर्तते । केन वा ब्रह्मविज्ञानं किं नु वा मोक्षसाधनम्

sarvapāpaharaṁ deva yena vidyā pravartate kena vā brahmavijñānaṁ kiṁ nu vā mokṣasādhanam

हे देव! वह क्या है जो समस्त पापों को हरता है, जिससे विद्या की प्रवृत्ति होती है, किससे ब्रह्मविज्ञान होता है, और मोक्ष का साधन क्या है?

श्लोक 3 (devibhagavatam.12.6.3)

ब्राह्मणानां गतिः केन केन वा मृत्युनाशनम् । ऐहिकामुष्मिकफलं केन वा पद्मलोचन

brāhmaṇānāṁ gatiḥ kena kena vā mṛtyunāśanam aihikāmuṣmikaphalaṁ kena vā padmalocana

ब्राह्मणों की गति किससे है, और मृत्यु का नाश किससे होता है? हे कमलनयन! इस लोक और परलोक का फल किससे प्राप्त होता है?

श्लोक 4 (devibhagavatam.12.6.4)

वक्तुमर्हस्यशेषेण सर्वं निखिलमादितः । श्रीनारायण उवाच । साधु साधु महाप्राज्ञ सम्यक् पृष्टं त्वयानघ

vaktumarhasyaśeṣeṇa sarvaṁ nikhilamāditaḥ śrīnārāyaṇa uvāca sādhu sādhu mahāprājña samyak pṛṣṭaṁ tvayānagha

आप यह सब आदि से अशेष रूप से कहने योग्य हैं। श्री नारायण ने कहा — साधु, साधु, हे महाप्राज्ञ! हे निष्पाप! तुमने ठीक ही पूछा है।

श्लोक 5 (devibhagavatam.12.6.5)

शृणु वक्ष्यामि यत्नेन गायत्र्यष्टसहस्रकम् । नाम्नां शुभानां दिव्यानां सर्वपापविनाशनम्

śṛṇu vakṣyāmi yatnena gāyatryaṣṭasahasrakam nāmnāṁ śubhānāṁ divyānāṁ sarvapāpavināśanam

सुनो, मैं यत्नपूर्वक गायत्री के आठ सौ अधिक हज़ार (अष्टोत्तरसहस्र) शुभ, दिव्य नामों को कहूँगा, जो समस्त पापों का नाश करने वाले हैं।

श्लोक 6 (devibhagavatam.12.6.6)

सृष्ट्यादौ यद्भगवता पूर्वं प्रोक्तं ब्रवीमि ते । अष्टोत्तरसहस्रस्य ऋषिर्ब्रह्मा प्रकीर्तितः

sṛṣṭyādau yadbhagavatā pūrvaṁ proktaṁ bravīmi te aṣṭottarasahasrasya ṛṣirbrahmā prakīrtitaḥ

सृष्टि के आरम्भ में भगवान् ने जो पहले कहा था, वही मैं तुमसे कहता हूँ। इस अष्टोत्तरसहस्र नाम-स्तोत्र के ब्रह्मा ऋषि कहे गए हैं,

श्लोक 7 (devibhagavatam.12.6.7)

छन्दोऽनुष्टुप् तथा देवी गायत्री देवता स्मृता । हलो बीजानि तस्यैव स्वराः शक्तय ईरिताः

chando'nuṣṭup tathā devī gāyatrī devatā smṛtā halo bījāni tasyaiva svarāḥ śaktaya īritāḥ

छन्द अनुष्टुप् है, तथा देवी गायत्री ही इसकी देवता स्मरण की गई हैं। व्यंजन इसके बीज हैं, और स्वर इसकी शक्तियाँ कही गई हैं।

श्लोक 8 (devibhagavatam.12.6.8)

अङ्गन्यासकरन्यासावुच्येते मातृकाक्षरैः । अथ ध्यानं प्रवक्ष्यामि साधकानां हिताय वै

aṅganyāsakaranyāsāvucyete mātṛkākṣaraiḥ atha dhyānaṁ pravakṣyāmi sādhakānāṁ hitāya vai

अंगन्यास और करन्यास मातृका-अक्षरों से किए जाते हैं। अब मैं साधकों के हित के लिए ध्यान कहता हूँ।

श्लोक 9 (devibhagavatam.12.6.9)

रक्तश्वेतहिरण्यनीलधवलैर्युक्तां त्रिनेत्रोज्ज्वलां रक्तां रक्तनवस्रजं मणिगणैर्युक्तां कुमारीमिमाम् । गायत्रीं कमलासनां करतलव्यानद्धकुण्डाम्बुजां पद्माक्षीं च वरस्रजं च दधतीं हंसाधिरूढां भजे

raktaśvetahiraṇyanīladhavalairyuktāṁ trinetrojjvalāṁ raktāṁ raktanavasrajaṁ maṇigaṇairyuktāṁ kumārīmimām gāyatrīṁ kamalāsanāṁ karatalavyānaddhakuṇḍāmbujāṁ padmākṣīṁ ca varasrajaṁ ca dadhatīṁ haṁsādhirūḍhāṁ bhaje

लाल, श्वेत, स्वर्ण, नील और धवल रंगों से युक्त, तीन नेत्रों से उज्ज्वल, लाल वर्ण वाली, मणियों से गुँथी नवीन लाल माला धारण करने वाली, कमल पर आसीन, हथेलियों में कमल पर टिका कलश, कमलनयनी, वरमाला धारण करने वाली, हंस पर आरूढ़ इस कुमारी गायत्री को मैं भजता हूँ।

श्लोक 10 (devibhagavatam.12.6.10)

अचिन्त्यलक्षणाव्यक्ताप्यर्थमातृमहेश्वरी । अमृतार्णवमध्यस्थाप्यजिता चापराजिता

acintyalakṣaṇāvyaktāpyarthamātṛmaheśvarī amṛtārṇavamadhyasthāpyajitā cāparājitā

अचिन्त्यलक्षणा, अव्यक्ता, अर्थमातृ, महेश्वरी, अमृत के सागर के मध्य में स्थित (अमृतार्णवमध्यस्था), अजिता और अपराजिता — ये उनके नाम हैं।

श्लोक 11 (devibhagavatam.12.6.11)

अणिमादिगुणाधाराप्यर्कमण्डलसंस्थिता । अजराजापराधर्मा अक्षसूत्रधराधरा

aṇimādiguṇādhārāpyarkamaṇḍalasaṁsthitā ajarājāparādharmā akṣasūtradharādharā

अणिमा आदि सिद्धियों का आधार (अणिमादिगुणाधारा), सूर्यमण्डल में स्थित (अर्कमण्डलसंस्थिता), अजरा, अजा, अपरा, धर्मा, अक्षमाला धारण करने वाली और पृथ्वी को धारण करने वाली (धराधरा)।

श्लोक 12 (devibhagavatam.12.6.12)

अकारादिक्षकारान्ताप्यरिषड्वर्गभेदिनी । अञ्जनाद्रिप्रतीकाशाप्यञ्जनाद्रिनिवासिनी

akārādikṣakārāntāpyariṣaḍvargabhedinī añjanādripratīkāśāpyañjanādrinivāsinī

'अ' से 'क्ष' तक के अक्षरों वाली, छह आन्तरिक शत्रुओं को भेदने वाली (अरिषड्वर्गभेदिनी), अंजन-पर्वत के समान (अञ्जनाद्रिप्रतीकाशा), और अंजन-पर्वत पर निवास करने वाली।

श्लोक 13 (devibhagavatam.12.6.13)

अदितिश्चाजपाविद्याप्यरविन्दनिभेक्षणा । अन्तर्बहिःस्थिताविद्याध्वंसिनी चान्तरात्मिका

aditiścājapāvidyāpyaravindanibhekṣaṇā antarbahiḥsthitāvidyādhvaṁsinī cāntarātmikā

अदिति, अजपा-विद्या, कमल के समान नेत्रों वाली (अरविन्दनिभेक्षणा), भीतर और बाहर स्थित (अन्तर्बहिःस्थिता), अविद्या का नाश करने वाली, और अन्तरात्मा-स्वरूपा।

श्लोक 14 (devibhagavatam.12.6.14)

अजा चाजमुखावासाप्यरविन्दनिभानना । अर्धमात्रार्थदानज्ञाप्यरिमण्डलमर्दिनी

ajā cājamukhāvāsāpyaravindanibhānanā ardhamātrārthadānajñāpyarimaṇḍalamardinī

अजा, ब्रह्मा के मुख में निवास करने वाली, कमल के समान मुख वाली, अर्ध-मात्रा के अर्थ की ज्ञाता, और शत्रुओं के समूह का मर्दन करने वाली।

श्लोक 15 (devibhagavatam.12.6.15)

असुरघ्नीह्यमावास्याप्यलक्ष्मीघ्न्यन्त्यजार्चिता । आदिलक्ष्मीश्चादिशक्तिराकृतिश्चायतानना

asuraghnīhyamāvāsyāpyalakṣmīghnyantyajārcitā ādilakṣmīścādiśaktirākṛtiścāyatānanā

असुरों का नाश करने वाली, अमावास्या, अलक्ष्मी का नाश करने वाली, अन्त्यजों द्वारा भी पूजित, आदिलक्ष्मी, आदिशक्ति, आकृति, और चौड़े मुख वाली।

श्लोक 16 (devibhagavatam.12.6.16)

आदित्यपदवीचाराप्यादित्यपरिसेविता । आचार्यावर्तनाचाराप्यादिमूर्तिनिवासिनी

ādityapadavīcārāpyādityaparisevitā ācāryāvartanācārāpyādimūrtinivāsinī

सूर्य के मार्ग पर चलने वाली, सूर्य द्वारा सेवित, आचार्यों के आचरण योग्य, और आदिमूर्ति में निवास करने वाली।

श्लोक 17 (devibhagavatam.12.6.17)

आग्नेयी चामरी चाद्या चाराध्या चासनस्थिता । आधारनिलयाधारा चाकाशान्तनिवासिनी

āgneyī cāmarī cādyā cārādhyā cāsanasthitā ādhāranilayādhārā cākāśāntanivāsinī

अग्नि-स्वरूपा, अमरा, आद्या, आराध्या, आसन पर स्थित, आधार में निवास करने वाली, आधार-स्वरूपा, और आकाश के अन्त तक निवास करने वाली।

श्लोक 18 (devibhagavatam.12.6.18)

आद्याक्षरसमायुक्ता चान्तराकाशरूपिणी । आदित्यमण्डलगता चान्तरध्वान्तनाशिनी

ādyākṣarasamāyuktā cāntarākāśarūpiṇī ādityamaṇḍalagatā cāntaradhvāntanāśinī

प्रथम अक्षर से युक्त, आन्तरिक आकाश-स्वरूपा, सूर्यमण्डल में स्थित, और अन्तर के अन्धकार का नाश करने वाली।

श्लोक 19 (devibhagavatam.12.6.19)

इन्दिरा चेष्टदा चेष्टा चेन्दीवरनिभेक्षणा । इरावती चेन्द्रपदा चेन्द्राणी चेन्दुरूपिणी

indirā ceṣṭadā ceṣṭā cendīvaranibhekṣaṇā irāvatī cendrapadā cendrāṇī cendurūpiṇī

इन्दिरा, इष्टदा, इष्टा, नीलकमल के समान नेत्रों वाली, इरावती, इन्द्रपद वाली, इन्द्राणी, और चन्द्रस्वरूपा।

श्लोक 20 (devibhagavatam.12.6.20)

इक्षुकोदण्डसंयुक्ता चेषुसन्धानकारिणी । इन्द्रनीलसमाकारा चेडापिङ्गलरूपिणी

ikṣukodaṇḍasaṁyuktā ceṣusandhānakāriṇī indranīlasamākārā ceḍāpiṅgalarūpiṇī

ईख के धनुष से युक्त, बाण को सन्धान करने वाली, इन्द्रनील मणि के समान आकार वाली, और इडा-पिंगला स्वरूपा।

श्लोक 21 (devibhagavatam.12.6.21)

इन्द्राक्षी चेश्वरी देवी चेहात्रयविवर्जिता । उमा चोषा ह्युडुनिभा उर्वारुकफलानना

indrākṣī ceśvarī devī cehātrayavivarjitā umā coṣā hyuḍunibhā urvārukaphalānanā

इन्द्राक्षी, ईश्वरी देवी, संसार के तीनों क्लेशों से रहित, उमा, उषा, तारे के समान, और ककड़ी के फल के समान मुख वाली।

श्लोक 22 (devibhagavatam.12.6.22)

उडुप्रभा चोडुमती ह्युडुपा ह्युडुमध्यगा । ऊर्ध्वं चाप्यूर्ध्वकेशी चाप्यूर्ध्वाधोगतिभेदिनी

uḍuprabhā coḍumatī hyuḍupā hyuḍumadhyagā ūrdhvaṁ cāpyūrdhvakeśī cāpyūrdhvādhogatibhedinī

तारों की आभा वाली, तारों से युक्त, चन्द्रमा, तारों के मध्य विचरण करने वाली, ऊर्ध्व, ऊँचे केशों वाली, और ऊर्ध्व-अधोगति को भेदने वाली।

श्लोक 23 (devibhagavatam.12.6.23)

ऊर्ध्वबाहुप्रिया चोर्मिमालावाग्ग्रन्थदायिनी । ऋतं चर्षिरृतुमती ऋषिदेवनमस्कृता

ūrdhvabāhupriyā cormimālāvāggranthadāyinī ṛtaṁ carṣirṛtumatī ṛṣidevanamaskṛtā

ऊँची भुजाओं वालों की प्रिय, लहरों की माला वाली, वाणी की रचना देने वाली, ऋत (सत्य)-स्वरूपा, ऋषि, ऋतुमती, और ऋषियों-देवों द्वारा नमस्कृत।

श्लोक 24 (devibhagavatam.12.6.24)

ऋग्वेदा ऋणहर्त्री च ऋषिमण्डलचारिणी । ऋद्धिदा ऋजुमार्गस्था ऋजुधर्मा ऋतुप्रदा

ṛgvedā ṛṇahartrī ca ṛṣimaṇḍalacāriṇī ṛddhidā ṛjumārgasthā ṛjudharmā ṛtupradā

ऋग्वेद-स्वरूपा, ऋण को हरने वाली, ऋषियों के मण्डल में विचरण करने वाली, ऋद्धि देने वाली, सीधे मार्ग पर स्थित, सरल धर्म वाली, और ऋतुएँ देने वाली।

श्लोक 25 (devibhagavatam.12.6.25)

ऋग्वेदनिलया ऋज्वी लुप्तधर्मप्रवर्तिनी । लूतारिवरसम्भूता लूतादिविषहारिणी

ṛgvedanilayā ṛjvī luptadharmapravartinī lūtārivarasambhūtā lūtādiviṣahāriṇī

ऋग्वेद में निवास करने वाली, सरल, लुप्त धर्म का पुनः प्रवर्तन करने वाली, मकड़ी के शत्रु के वर से उत्पन्न, और मकड़ी आदि के विष को हरने वाली।

श्लोक 26 (devibhagavatam.12.6.26)

एकाक्षरा चैकमात्रा चैका चैकैकनिष्ठिता । ऐन्द्री ह्यैरावतारूढा चैहिकामुष्मिकप्रदा

ekākṣarā caikamātrā caikā caikaikaniṣṭhitā aindrī hyairāvatārūḍhā caihikāmuṣmikapradā

एक अक्षर, एक मात्रा, एक, एक-एक में स्थित, ऐन्द्री, ऐरावत पर आरूढ़, और इस लोक तथा परलोक का फल देने वाली।

श्लोक 27 (devibhagavatam.12.6.27)

ओङ्कारा ह्योषधी चोता चोतप्रोतनिवासिनी । और्वा ह्यौषधसम्पन्ना औपासनफलप्रदा

oṅkārā hyoṣadhī cotā cotaprotanivāsinī aurvā hyauṣadhasampannā aupāsanaphalapradā

ओंकार-स्वरूपा, औषधि, ओत (बुनी हुई), ओत-प्रोत रूप में निवास करने वाली, और्वा, औषधियों से सम्पन्न, और औपासन (गृह्याग्नि उपासना) का फल देने वाली।

श्लोक 28 (devibhagavatam.12.6.28)

अण्डमध्यस्थिता देवी चाःकारमनुरूपिणी । कात्यायनी कालरात्रिः कामाक्षी कामसुन्दरी

aṇḍamadhyasthitā devī cāḥkāramanurūpiṇī kātyāyanī kālarātriḥ kāmākṣī kāmasundarī

ब्रह्माण्ड के मध्य में स्थित देवी, 'अः' ध्वनि के अनुरूप, कात्यायनी, कालरात्रि, कामाक्षी, और कामसुन्दरी।

श्लोक 29 (devibhagavatam.12.6.29)

कमला कामिनी कान्ता कामदा कालकण्ठिनी । करिकुम्भस्तनभरा करवीरसुवासिनी

kamalā kāminī kāntā kāmadā kālakaṇṭhinī karikumbhastanabharā karavīrasuvāsinī

कमला, कामिनी, कान्ता, कामदा, कालकण्ठिनी, गजकुम्भ के समान स्तनों वाली, और कनेर के फूल की सुगन्ध वाली।

श्लोक 30 (devibhagavatam.12.6.30)

कल्याणी कुण्डलवती कुरुक्षेत्रनिवासिनी । कुरुविन्ददलाकारा कुण्डली कुमुदालया

kalyāṇī kuṇḍalavatī kurukṣetranivāsinī kuruvindadalākārā kuṇḍalī kumudālayā

कल्याणी, कुण्डलों से युक्त, कुरुक्षेत्र में निवास करने वाली, इन्द्रगोप-मणि की पंखुड़ी के समान आकार वाली, कुण्डली, और कुमुदों में निवास करने वाली।

श्लोक 31 (devibhagavatam.12.6.31)

कालजिह्वा करालास्या कालिका कालरूपिणी । कमनीयगुणा कान्तिः कलाधारा कुमुद्वती

kālajihvā karālāsyā kālikā kālarūpiṇī kamanīyaguṇā kāntiḥ kalādhārā kumudvatī

काल के समान जिह्वा वाली, विकराल मुख वाली, कालिका, काल-स्वरूपा, मनोहर गुणों वाली, कान्ति, कलाओं का आधार, और कुमुदों से समृद्ध।

श्लोक 32 (devibhagavatam.12.6.32)

कौशिकी कमलाकारा कामचारप्रभञ्जिनी । कौमारी करुणापाङ्गी ककुबन्ता करिप्रिया

kauśikī kamalākārā kāmacāraprabhañjinī kaumārī karuṇāpāṅgī kakubantā karipriyā

कौशिकी, कमल के आकार वाली, कामाचार का नाश करने वाली, कौमारी, करुणापूर्ण कटाक्ष वाली, क्षितिज तक फैली हुई, और हाथी की प्रिय।

श्लोक 33 (devibhagavatam.12.6.33)

केसरी केशवनुता कदम्बकुसुमप्रिया । कालिन्दी कालिका काञ्ची कलशोद्भवसंस्तुता

kesarī keśavanutā kadambakusumapriyā kālindī kālikā kāñcī kalaśodbhavasaṁstutā

सिंहिनी, केशव द्वारा स्तुत, कदम्ब-पुष्प की प्रिय, कालिन्दी (यमुना), कालिका, काञ्ची, और कुम्भ से उत्पन्न अगस्त्य द्वारा स्तुत।

श्लोक 34 (devibhagavatam.12.6.34)

काममाता क्रतुमती कामरूपा कृपावती । कुमारी कुण्डनिलया किराती कीरवाहना

kāmamātā kratumatī kāmarūpā kṛpāvatī kumārī kuṇḍanilayā kirātī kīravāhanā

काम की माता, यज्ञों से समृद्ध, काम-स्वरूपा, कृपावती, कुमारी, यज्ञकुण्ड में निवास करने वाली, किराती (भीलनी), और तोते पर सवार।

श्लोक 35 (devibhagavatam.12.6.35)

कैकेयी कोकिलालापा केतकी कुसुमप्रिया । कमण्डलुधरा काली कर्मनिर्मूलकारिणी

kaikeyī kokilālāpā ketakī kusumapriyā kamaṇḍaludharā kālī karmanirmūlakāriṇī

कैकेयी, कोयल के समान बोलने वाली, केतकी, फूलों की प्रिय, कमण्डलु धारण करने वाली, काली, और कर्म को जड़ से उखाड़ने वाली।

श्लोक 36 (devibhagavatam.12.6.36)

कलहंसगतिः कक्षा कृतकौतुकमङ्गला । कस्तूरीतिलका कम्रा करीन्द्रगमना कुहूः

kalahaṁsagatiḥ kakṣā kṛtakautukamaṅgalā kastūrītilakā kamrā karīndragamanā kuhūḥ

राजहंस के समान गति वाली, वन, मंगलमय कौतुक करने वाली, कस्तूरी का तिलक धारण करने वाली, मनोहर, राजगज के समान चाल वाली, और कुहू (अमावस्या की देवी)।

श्लोक 37 (devibhagavatam.12.6.37)

कर्पूरलेपना कृष्णा कपिला कुहराश्रया । कूटस्था कुधरा कम्रा कुक्षिस्थाखिलविष्टपा

karpūralepanā kṛṣṇā kapilā kuharāśrayā kūṭasthā kudharā kamrā kukṣisthākhilaviṣṭapā

कर्पूर से लिप्त, कृष्णा, कपिला, गुफा में आश्रय लेने वाली, अपरिवर्तनीय (कूटस्था), पर्वतों को धारण करने वाली, मनोहर, और जिनकी कुक्षि में समस्त लोक स्थित हैं।

श्लोक 38 (devibhagavatam.12.6.38)

खड्गखेटकरा खर्वा खेचरी खगवाहना । खट्वाङ्गधारिणी ख्याता खगराजोपरिस्थिता

khaḍgakheṭakarā kharvā khecarī khagavāhanā khaṭvāṅgadhāriṇī khyātā khagarājoparisthitā

खड्ग और ढाल हाथ में धारण करने वाली, बौनी, आकाश में विचरण करने वाली, पक्षी पर सवार, खट्वांग धारण करने वाली, प्रसिद्ध, और पक्षिराज के ऊपर स्थित।

श्लोक 39 (devibhagavatam.12.6.39)

खलघ्नी खण्डितजरा खण्डाख्यानप्रदायिनी । खण्डेन्दुतिलका गङ्गा गणेशगुहपूजिता

khalaghnī khaṇḍitajarā khaṇḍākhyānapradāyinī khaṇḍendutilakā gaṅgā gaṇeśaguhapūjitā

दुष्टों का नाश करने वाली, जिसका बुढ़ापा खण्डित हो गया, कथा के अंश देने वाली, अर्धचन्द्र का तिलक धारण करने वाली, गंगा, और गणेश तथा कार्तिकेय द्वारा पूजित।

श्लोक 40 (devibhagavatam.12.6.40)

गायत्री गोमती गीता गान्धारी गानलोलुपा । गौतमी गामिनी गाथा गन्धर्वाप्सरसेविता

gāyatrī gomatī gītā gāndhārī gānalolupā gautamī gāminī gāthā gandharvāpsarasevitā

गायत्री, गोमती, गीता, गान्धारी, गान की लोलुप, गौतमी, गामिनी, गाथा, और गन्धर्वों-अप्सराओं द्वारा सेवित।

श्लोक 41 (devibhagavatam.12.6.41)

गोविन्दचरणाक्रान्ता गुणत्रयविभाविता । गन्धर्वी गह्वरी गोत्रा गिरीशा गहना गमी

govindacaraṇākrāntā guṇatrayavibhāvitā gandharvī gahvarī gotrā girīśā gahanā gamī

गोविन्द के चरणों से आक्रान्त, तीनों गुणों में प्रकट, गन्धर्वी, गुफा-स्वरूपा, कुल-स्वरूपा, गिरीश की प्रिया, गहन, और गमनशील।

श्लोक 42 (devibhagavatam.12.6.42)

गुहावासा गुणवती गुरुपापप्रणाशिनी । गुर्वी गुणवती गुह्या गोप्तव्या गुणदायिनी

guhāvāsā guṇavatī gurupāpapraṇāśinī gurvī guṇavatī guhyā goptavyā guṇadāyinī

गुफा में निवास करने वाली, गुणवती, गुरुतर पापों का नाश करने वाली, गुरुत्तर, गुणवती, गुह्य, रक्षणीय, और गुण देने वाली।

श्लोक 43 (devibhagavatam.12.6.43)

गिरिजा गुह्यमातङ्गी गरुडध्वजवल्लभा । गर्वापहारिणी गोदा गोकुलस्था गदाधरा

girijā guhyamātaṅgī garuḍadhvajavallabhā garvāpahāriṇī godā gokulasthā gadādharā

गिरिजा, गुह्य मातंगी, गरुड़ध्वज (विष्णु) की प्रिया, गर्व को हरने वाली, गौओं की दात्री, गोकुल में स्थित, और गदाधारिणी।

श्लोक 44 (devibhagavatam.12.6.44)

गोकर्णनिलयासक्ता गुह्यमण्डलवर्तिनी । घर्मदा घनदा घण्टा घोरदानवमर्दिनी

gokarṇanilayāsaktā guhyamaṇḍalavartinī gharmadā ghanadā ghaṇṭā ghoradānavamardinī

गोकर्ण में निवास करने में आसक्त, गुह्य मण्डल में विचरण करने वाली, उष्णता देने वाली, मेघ देने वाली, घण्टा, और भीषण दानवों का मर्दन करने वाली।

श्लोक 45 (devibhagavatam.12.6.45)

घृणिमन्त्रमयी घोषा घनसम्पातदायिनी । घण्टारवप्रिया घ्राणा घृणिसन्तुष्टकारिणी

ghṛṇimantramayī ghoṣā ghanasampātadāyinī ghaṇṭāravapriyā ghrāṇā ghṛṇisantuṣṭakāriṇī

तेजोमय मन्त्र-स्वरूपा, घोषा, घोर वर्षा देने वाली, घण्टे की ध्वनि की प्रिय, घ्राणेन्द्रिय-स्वरूपा, और तेजस्वियों को सन्तुष्ट करने वाली।

श्लोक 46 (devibhagavatam.12.6.46)

घनारिमण्डला घूर्णा घृताची घनवेगिनी । ज्ञानधातुमयी चर्चा चर्चिता चारुहासिनी

ghanārimaṇḍalā ghūrṇā ghṛtācī ghanaveginī jñānadhātumayī carcā carcitā cāruhāsinī

मेघों के समान मण्डल वाली, घूर्णनशील, घृताची (अप्सरा), मेघों के समान वेगवाली, ज्ञान-धातु-स्वरूपा, चर्चा, प्रसिद्ध, और मनोहर हास वाली।

श्लोक 47 (devibhagavatam.12.6.47)

चटुला चण्डिका चित्रा चित्रमाल्यविभूषिता । चतुर्भुजा चारुदन्ता चातुरी चरितप्रदा

caṭulā caṇḍikā citrā citramālyavibhūṣitā caturbhujā cārudantā cāturī caritapradā

चंचल, चण्डिका, चित्रा, चित्र-माला से विभूषित, चतुर्भुजा, सुन्दर दाँतों वाली, चतुराई, और सद्आचरण देने वाली।

श्लोक 48 (devibhagavatam.12.6.48)

चूलिका चित्रवस्त्रान्ता चन्द्रमःकर्णकुण्डला । चन्द्रहासा चारुदात्री चकोरी चन्द्रहासिनी

cūlikā citravastrāntā candramaḥkarṇakuṇḍalā candrahāsā cārudātrī cakorī candrahāsinī

शिखा (चूलिका), विचित्र वस्त्र के छोर वाली, चन्द्रमा के कर्णकुण्डल वाली, चन्द्रहासा (सुन्दर हास), मनोहरता देने वाली, चकोरी, और चन्द्रमा के समान मुस्कुराने वाली।

श्लोक 49 (devibhagavatam.12.6.49)

चन्द्रिका चन्द्रधात्री च चौरी चौरा च चण्डिका । चञ्चद्वाग्वादिनी चन्द्रचूडा चोरविनाशिनी

candrikā candradhātrī ca caurī caurā ca caṇḍikā cañcadvāgvādinī candracūḍā coravināśinī

चाँदनी, चन्द्रमा की धात्री, चोरी करने वाली (हृदय की), चण्डिका, मधुर वाणी बोलने वाली, चन्द्रचूड़ा (शिव-प्रिया), और चोरों का नाश करने वाली।

श्लोक 50 (devibhagavatam.12.6.50)

चारुचन्दनलिप्ताङ्गी चञ्चच्चामरवीजिता । चारुमध्या चारुगतिश्चन्दिला चन्द्ररूपिणी

cārucandanaliptāṅgī cañcaccāmaravījitā cārumadhyā cārugatiścandilā candrarūpiṇī

मनोहर चन्दन से लिप्त अंगों वाली, चंचल चामर से बीजित, सुन्दर कटि वाली, सुन्दर गति वाली, चन्दिला, और चन्द्र-स्वरूपा।

श्लोक 51 (devibhagavatam.12.6.51)

चारुहोमप्रिया चार्वाचरिता चक्रबाहुका । चन्द्रमण्डलमध्यस्था चन्द्रमण्डलदर्पणा

cāruhomapriyā cārvācaritā cakrabāhukā candramaṇḍalamadhyasthā candramaṇḍaladarpaṇā

सुन्दर हवन की प्रिय, सुन्दर आचरण वाली, चक्र-भुजा, चन्द्रमण्डल के मध्य में स्थित, और चन्द्रमण्डल का दर्पण।

श्लोक 52 (devibhagavatam.12.6.52)

चक्रवाकस्तनी चेष्टा चित्रा चारुविलासिनी । चित्स्वरूपा चन्द्रवती चन्द्रमाश्चन्दनप्रिया

cakravākastanī ceṣṭā citrā cāruvilāsinī citsvarūpā candravatī candramāścandanapriyā

चकवा पक्षी के समान स्तन वाली, चेष्टा, चित्रा, सुन्दर विलास वाली, चित्-स्वरूपा, चन्द्रयुक्त, और चन्द्रमा तथा चन्दन की प्रिय।

श्लोक 53 (devibhagavatam.12.6.53)

चोदयित्री चिरप्रज्ञा चातका चारुहेतुकी । छत्रयाता छत्रधरा छाया छन्दःपरिच्छदा

codayitrī ciraprajñā cātakā cāruhetukī chatrayātā chatradharā chāyā chandaḥparicchadā

प्रेरणा देने वाली, चिरकाल से प्रज्ञावान, चातक पक्षी, सुन्दर हेतु वाली, छत्र लेकर चलने वाली, छत्रधारिणी, छाया, और वेदछन्दों की परिचारिका।

श्लोक 54 (devibhagavatam.12.6.54)

छायादेवीच्छिद्रनखा छन्नेन्द्रियविसर्पिणी । छन्दोऽनुष्टुप्प्रतिष्ठान्ता छिद्रोपद्रवभेदिनी

chāyādevīcchidranakhā channendriyavisarpiṇī chando'nuṣṭuppratiṣṭhāntā chidropadravabhedinī

छाया-देवी, छिद्रयुक्त नखों वाली, गुप्त इन्द्रियों में विचरण करने वाली, अनुष्टुप् छन्द में प्रतिष्ठित, और छिद्र-रूप उपद्रवों को भेदने वाली।

श्लोक 55 (devibhagavatam.12.6.55)

छेदा छत्रेश्वरी छिन्ना छुरिका छेदनप्रिया । जननी जन्मरहिता जातवेदा जगन्मयी

chedā chatreśvarī chinnā churikā chedanapriyā jananī janmarahitā jātavedā jaganmayī

छेदा, छत्र की स्वामिनी, छिन्ना, छुरिका, छेदन की प्रिय, जननी, जन्म से रहित, जातवेदा (अग्नि), और जगत्-स्वरूपा।

श्लोक 56 (devibhagavatam.12.6.56)

जाह्नवी जटिला जेत्री जरामरणवर्जिता । जम्बूद्वीपवती ज्वाला जयन्ती जलशालिनी

jāhnavī jaṭilā jetrī jarāmaraṇavarjitā jambūdvīpavatī jvālā jayantī jalaśālinī

जाह्नवी (गंगा), जटाधारिणी, विजयी, जरा-मृत्यु से रहित, जम्बूद्वीप की स्वामिनी, ज्वाला, जयन्ती, और जल में शोभायमान।

श्लोक 57 (devibhagavatam.12.6.57)

जितेन्द्रिया जितक्रोधा जितामित्रा जगत्प्रिया । जातरूपमयी जिह्वा जानकी जगती जरा

jitendriyā jitakrodhā jitāmitrā jagatpriyā jātarūpamayī jihvā jānakī jagatī jarā

जितेन्द्रिया, जितक्रोधा, जितशत्रु, जगत्-प्रिया, स्वर्ण-स्वरूपा, जिह्वा, जानकी, जगती (पृथ्वी), और जरा (बुढ़ापा)।

श्लोक 58 (devibhagavatam.12.6.58)

जनित्री जह्नुतनया जगत्त्रयहितैषिणी । ज्वालामुखी जपवती ज्वरघ्नी जितविष्टपा

janitrī jahnutanayā jagattrayahitaiṣiṇī jvālāmukhī japavatī jvaraghnī jitaviṣṭapā

जननी, जह्नु की कन्या (गंगा), तीनों लोकों का हित चाहने वाली, ज्वालामुखी, जपवती, ज्वर का नाश करने वाली, और लोकों को जीतने वाली।

श्लोक 59 (devibhagavatam.12.6.59)

जिताक्रान्तमयी ज्वाला जाग्रती ज्वरदेवता । ज्वलन्ती जलदा ज्येष्ठा ज्याघोषास्फोटदिङ्मुखी

jitākrāntamayī jvālā jāgratī jvaradevatā jvalantī jaladā jyeṣṭhā jyāghoṣāsphoṭadiṅmukhī

विजय से युक्त, ज्वाला, जागृत, ज्वर की देवता, जलती हुई, जल देने वाली, ज्येष्ठा, और जिसकी धनुष-प्रत्यंचा की ध्वनि सब दिशाओं में गूँजती है।

श्लोक 60 (devibhagavatam.12.6.60)

जम्भिनी जृम्भणा जृम्भा ज्वलन्माणिक्यकुण्डला । झिञ्झिका झणनिर्घोषा झञ्झामारुतवेगिनी

jambhinī jṛmbhaṇā jṛmbhā jvalanmāṇikyakuṇḍalā jhiñjhikā jhaṇanirghoṣā jhañjhāmārutaveginī

जम्भासुर की नाशक, जृम्भण-स्वरूपा, जृम्भा (जँभाई), जलते हुए माणिक्यों के कुण्डल वाली, झिंझिका, झनझनाहट की ध्वनि वाली, और आँधी के समान वेग वाली।

श्लोक 61 (devibhagavatam.12.6.61)

झल्लरीवाद्यकुशला ञरूपा ञभुजा स्मृता । टङ्कबाणसमायुक्ता टङ्किनी टङ्कभेदिनी

jhallarīvādyakuśalā ñarūpā ñabhujā smṛtā ṭaṅkabāṇasamāyuktā ṭaṅkinī ṭaṅkabhedinī

झल्लरी वाद्य में कुशल, 'ञ' अक्षर-स्वरूपा, 'ञ' भुजा में धारण करने वाली, टाँकी और बाण से युक्त, टंकिनी, और टाँकी से भेदन करने वाली।

श्लोक 62 (devibhagavatam.12.6.62)

टङ्कीगणकृताघोषा टङ्कनीयमहोरसा । टङ्कारकारिणी देवी ठठशब्दनिनादिनी

ṭaṅkīgaṇakṛtāghoṣā ṭaṅkanīyamahorasā ṭaṅkārakāriṇī devī ṭhaṭhaśabdaninādinī

शिल्पियों के समूह द्वारा जिनकी ध्वनि की जाती है, टंकनीय स्वर्ण के समान वक्षस्थल वाली, धनुष-टंकार करने वाली देवी, और 'ठ ठ' शब्द से गूँजने वाली।

श्लोक 63 (devibhagavatam.12.6.63)

डामरी डाकिनी डिम्भा डुण्डुमारैकनिर्जिता । डामरीतन्त्रमार्गस्था डमड्डमरुनादिनी

ḍāmarī ḍākinī ḍimbhā ḍuṇḍumāraikanirjitā ḍāmarītantramārgasthā ḍamaḍḍamarunādinī

डामरी, डाकिनी, बालिका (डिम्भा), डुण्डुमार असुर से अपराजित, डामरी-तन्त्र के मार्ग में स्थित, और डमरू की ध्वनि करने वाली।

श्लोक 64 (devibhagavatam.12.6.64)

डिण्डीरवसहा डिम्भलसत्क्रीडापरायणा । ढुण्ढिविघ्नेशजननी ढक्काहस्ता ढिलिव्रजा

ḍiṇḍīravasahā ḍimbhalasatkrīḍāparāyaṇā ḍhuṇḍhivighneśajananī ḍhakkāhastā ḍhilivrajā

समुद्र के फेन में रहने वाली, बालकों के क्रीड़ा में तत्पर, ढुण्ढि-विघ्नेश (गणेश) की जननी, ढक्का हाथ में धारण करने वाली, और सहज गति से चलने वाली।

श्लोक 65 (devibhagavatam.12.6.65)

नित्यज्ञाना निरुपमा निर्गुणा नर्मदा नदी । त्रिगुणा त्रिपदा तन्त्री तुलसीतरुणातरुः

nityajñānā nirupamā nirguṇā narmadā nadī triguṇā tripadā tantrī tulasītaruṇātaruḥ

नित्य ज्ञान-स्वरूपा, निरुपमा, निर्गुणा, नर्मदा नदी, त्रिगुणात्मिका, त्रिपदा, वीणा (तन्त्री), और तुलसी का कोमल पौधा।

श्लोक 66 (devibhagavatam.12.6.66)

त्रिविक्रमपदाक्रान्ता तुरीयपदगामिनी । तरुणादित्यसङ्काशा तामसी तुहिना तुरा

trivikramapadākrāntā turīyapadagāminī taruṇādityasaṅkāśā tāmasī tuhinā turā

त्रिविक्रम के चरणों से आक्रान्त, तुरीय पद में गमन करने वाली, उगते सूर्य के समान, तामसी, हिम-स्वरूपा, और शीघ्रगामिनी।

श्लोक 67 (devibhagavatam.12.6.67)

त्रिकालज्ञानसम्पन्ना त्रिवेणी च त्रिलोचना । त्रिशक्तिस्त्रिपुरा तुङ्गा तुरङ्गवदना तथा

trikālajñānasampannā triveṇī ca trilocanā triśaktistripurā tuṅgā turaṅgavadanā tathā

त्रिकाल के ज्ञान से सम्पन्न, त्रिवेणी, त्रिनेत्रा, त्रिशक्ति-स्वरूपा, त्रिपुरा, ऊँची (तुंगा), और अश्व-मुखी।

श्लोक 68 (devibhagavatam.12.6.68)

तिमिङ्गिलगिला तीव्रा त्रिस्रोता तामसादिनी । तन्त्रमन्त्रविशेषज्ञा तनुमध्या त्रिविष्टपा

timiṅgilagilā tīvrā trisrotā tāmasādinī tantramantraviśeṣajñā tanumadhyā triviṣṭapā

तिमिंगिल मत्स्य को निगलने वाली, तीव्रा, त्रिस्रोता (तीन धाराओं वाली), तामसी सेना की अग्रणी, तन्त्र-मन्त्र की विशेषज्ञ, पतली कमर वाली, और स्वर्गलोक-स्वरूपा।

श्लोक 69 (devibhagavatam.12.6.69)

त्रिसन्ध्या त्रिस्तनी तोषासंस्था तालप्रतापिनी । ताटङ्किनी तुषाराभा तुहिनाचलवासिनी

trisandhyā tristanī toṣāsaṁsthā tālapratāpinī tāṭaṅkinī tuṣārābhā tuhinācalavāsinī

त्रिसन्ध्या, तीन स्तनों वाली, सन्तोष में स्थित, मृदंग के समान प्रतापी, कर्णाभूषण वाली, हिम के समान आभा वाली, और हिमालय-पर्वत की निवासिनी।

श्लोक 70 (devibhagavatam.12.6.70)

तन्तुजालसमायुक्ता तारहारावलिप्रिया । तिलहोमप्रिया तीर्था तमालकुसुमाकृतिः

tantujālasamāyuktā tārahārāvalipriyā tilahomapriyā tīrthā tamālakusumākṛtiḥ

तन्तुओं के जाल से युक्त (सृष्टि के तन्तुओं में बद्ध), उज्ज्वल मोतियों की माला की प्रिय, तिल के हवन की प्रिय, तीर्थ-स्वरूपा, और तमाल के फूल के समान आकार वाली।

श्लोक 71 (devibhagavatam.12.6.71)

तारका त्रियुता तन्वी त्रिशङ्कुपरिवारिता । तलोदरी तिलाभूषा ताटङ्कप्रियवाहिनी

tārakā triyutā tanvī triśaṅkuparivāritā talodarī tilābhūṣā tāṭaṅkapriyavāhinī

तारा (नक्षत्र), त्रयों से युक्त, तन्वी, त्रिशंकु से घिरी, पतली कमर वाली, तिल के फूलों से विभूषित, और कर्णाभूषण को धारण करने में प्रिय।

श्लोक 72 (devibhagavatam.12.6.72)

त्रिजटा तित्तिरी तृष्णा त्रिविधा तरुणाकृतिः । तप्तकाञ्चनसङ्काशा तप्तकाञ्चनभूषणा

trijaṭā tittirī tṛṣṇā trividhā taruṇākṛtiḥ taptakāñcanasaṅkāśā taptakāñcanabhūṣaṇā

त्रिजटा, तीतर पक्षी, तृष्णा, त्रिविधा, युवा आकृति वाली, तपे हुए स्वर्ण के समान, और तपे हुए स्वर्ण के आभूषणों वाली।

श्लोक 73 (devibhagavatam.12.6.73)

त्रैयम्बका त्रिवर्गा च त्रिकालज्ञानदायिनी । तर्पणा तृप्तिदा तृप्ता तामसी तुम्बुरुस्तुता

traiyambakā trivargā ca trikālajñānadāyinī tarpaṇā tṛptidā tṛptā tāmasī tumburustutā

त्र्यम्बक (शिव) की अर्धांगिनी, त्रिवर्ग (धर्म-अर्थ-काम), त्रिकाल-ज्ञान देने वाली, तर्पण, तृप्ति देने वाली, तृप्त, तामसी, और तुम्बुरु द्वारा स्तुत।

श्लोक 74 (devibhagavatam.12.6.74)

तार्क्ष्यस्था त्रिगुणाकारा त्रिभङ्गी तनुवल्लरिः । थात्कारी थारवा थान्ता दोहिनी दीनवत्सला

tārkṣyasthā triguṇākārā tribhaṅgī tanuvallariḥ thātkārī thāravā thāntā dohinī dīnavatsalā

गरुड़ पर स्थित, त्रिगुणात्मिका, त्रिभंगी, लता के समान कोमल शरीर वाली, 'थ' ध्वनि करने वाली, था की गूँज, 'थ' पर अन्त होने वाली, दोहन करने वाली, और दीनों पर वत्सल।

श्लोक 75 (devibhagavatam.12.6.75)

दानवान्तकरी दुर्गा दुर्गासुरनिबर्हिणी । देवरीतिर्दिवारात्रिर्द्रौपदी दुन्दुभिस्वना

dānavāntakarī durgā durgāsuranibarhiṇī devarītirdivārātrirdraupadī dundubhisvanā

दानवों का अन्त करने वाली, दुर्गा, दुर्गासुर का नाश करने वाली, देवों की रीति, दिन-रात्रि-स्वरूपा, द्रौपदी, और दुन्दुभि के समान स्वर वाली।

श्लोक 76 (devibhagavatam.12.6.76)

देवयानी दुरावासा दारिद्र्योद्भेदिनी दिवा । दामोदरप्रिया दीप्ता दिग्वासा दिग्विमोहिनी

devayānī durāvāsā dāridryodbhedinī divā dāmodarapriyā dīptā digvāsā digvimohinī

देवयानी, दुर्गम स्थान में निवास करने वाली, दरिद्रता को नष्ट करने वाली, दिन (दिवा), दामोदर की प्रिय, दीप्त, दिशाओं का वस्त्र धारण करने वाली, और दिशाओं को मोहित करने वाली।

श्लोक 77 (devibhagavatam.12.6.77)

दण्डकारण्यनिलया दण्डिनी देवपूजिता । देववन्द्या दिविषदा द्वेषिणी दानवाकृतिः

daṇḍakāraṇyanilayā daṇḍinī devapūjitā devavandyā diviṣadā dveṣiṇī dānavākṛtiḥ

दण्डकारण्य में निवास करने वाली, दण्डिनी, देवों द्वारा पूजित, देवों द्वारा वन्दित, देवलोक में निवास करने वाली, शत्रुभाव रखने वाली (दुष्टों के प्रति), और दानवों का रूप धारण करने वाली।

श्लोक 78 (devibhagavatam.12.6.78)

दीनानाथस्तुता दीक्षा दैवतादिस्वरूपिणी । धात्री धनुर्धरा धेनुर्धारिणी धर्मचारिणी

dīnānāthastutā dīkṣā daivatādisvarūpiṇī dhātrī dhanurdharā dhenurdhāriṇī dharmacāriṇī

दीन-अनाथों द्वारा स्तुत, दीक्षा, समस्त देवताओं की मूल-स्वरूपा, धात्री, धनुर्धारिणी, धेनु, धारिणी, और धर्माचरण करने वाली।

श्लोक 79 (devibhagavatam.12.6.79)

धरन्धरा धराधारा धनदा धान्यदोहिनी । धर्मशीला धनाध्यक्षा धनुर्वेदविशारदा

dharandharā dharādhārā dhanadā dhānyadohinī dharmaśīlā dhanādhyakṣā dhanurvedaviśāradā

पृथ्वी को धारण करने वाली, पृथ्वी का आधार, धन देने वाली, धान्य का दोहन करने वाली, धर्मशील, धन की अध्यक्षा, और धनुर्वेद में निपुण।

श्लोक 80 (devibhagavatam.12.6.80)

धृतिर्धन्या धृतपदा धर्मराजप्रिया ध्रुवा । धूमावती धूमकेशी धर्मशास्त्रप्रकाशिनी

dhṛtirdhanyā dhṛtapadā dharmarājapriyā dhruvā dhūmāvatī dhūmakeśī dharmaśāstraprakāśinī

धृति, धन्या, दृढ़ चरणों वाली, धर्मराज (यम) की प्रिया, ध्रुवा, धूमावती, धूमकेशी, और धर्मशास्त्रों को प्रकाशित करने वाली।

श्लोक 81 (devibhagavatam.12.6.81)

नन्दा नन्दप्रिया निद्रा नृनुता नन्दनात्मिका । नर्मदा नलिनी नीला नीलकण्ठसमाश्रया

nandā nandapriyā nidrā nṛnutā nandanātmikā narmadā nalinī nīlā nīlakaṇṭhasamāśrayā

नन्दा, नन्द की प्रिया, निद्रा, मनुष्यों द्वारा स्तुत, नन्दन-स्वरूपा, नर्मदा, नलिनी, नीला, और नीलकण्ठ (शिव) की शरण लेने वाली।

श्लोक 82 (devibhagavatam.12.6.82)

नारायणप्रिया नित्या निर्मला निर्गुणा निधिः । निराधारा निरुपमा नित्यशुद्धा निरञ्जना

nārāyaṇapriyā nityā nirmalā nirguṇā nidhiḥ nirādhārā nirupamā nityaśuddhā nirañjanā

नारायण की प्रिया, नित्या, निर्मला, निर्गुणा, निधि, निराधारा, निरुपमा, नित्यशुद्धा, और निरंजना।

श्लोक 83 (devibhagavatam.12.6.83)

नादबिन्दुकलातीता नादबिन्दुकलात्मिका । नृसिंहिनी नगधरा नृपनागविभूषिता

nādabindukalātītā nādabindukalātmikā nṛsiṁhinī nagadharā nṛpanāgavibhūṣitā

नाद-बिन्दु-कला से परे, नाद-बिन्दु-कला-स्वरूपा, नृसिंहिनी, पर्वतों को धारण करने वाली, और राजाओं तथा नागों द्वारा विभूषित।

श्लोक 84 (devibhagavatam.12.6.84)

नरकक्लेशशमनी नारायणपदोद्भवा । निरवद्या निराकारा नारदप्रियकारिणी

narakakleśaśamanī nārāyaṇapadodbhavā niravadyā nirākārā nāradapriyakāriṇī

नरक के क्लेश को शान्त करने वाली, नारायण के चरण से उत्पन्न (गंगा), निर्दोष, निराकार, और नारद को प्रिय करने वाली।

श्लोक 85 (devibhagavatam.12.6.85)

नानाज्योतिःसमाख्याता निधिदा निर्मलात्मिका । नवसूत्रधरा नीतिर्निरुपद्रवकारिणी

nānājyotiḥsamākhyātā nidhidā nirmalātmikā navasūtradharā nītirnirupadravakāriṇī

अनेक ज्योतियों के नाम से प्रसिद्ध, निधि देने वाली, निर्मल-स्वरूपा, नवीन यज्ञोपवीत धारण करने वाली, नीति, और उपद्रवों से रहित करने वाली।

श्लोक 86 (devibhagavatam.12.6.86)

नन्दजा नवरत्नाढ्या नैमिषारण्यवासिनी । नवनीतप्रिया नारी नीलजीमूतनिःस्वना

nandajā navaratnāḍhyā naimiṣāraṇyavāsinī navanītapriyā nārī nīlajīmūtaniḥsvanā

नन्द से उत्पन्न, नौ रत्नों से समृद्ध, नैमिषारण्य में निवास करने वाली, मक्खन की प्रिय, नारी, और नील मेघ के समान गम्भीर स्वर वाली।

श्लोक 87 (devibhagavatam.12.6.87)

निमेषिणी नदीरूपा नीलग्रीवा निशीश्वरी । नामावलिर्निशुम्भघ्नी नागलोकनिवासिनी

nimeṣiṇī nadīrūpā nīlagrīvā niśīśvarī nāmāvalirniśumbhaghnī nāgalokanivāsinī

निमेष (पलक-झपकना) स्वरूपा, नदी का रूप, नीलग्रीवा, रात्रि की स्वामिनी, नामावली, निशुम्भ की नाशिका, और नागलोक में निवास करने वाली।

श्लोक 88 (devibhagavatam.12.6.88)

नवजाम्बूनदप्रख्या नागलोकाधिदेवता । नूपुराक्रान्तचरणा नरचित्तप्रमोदिनी

navajāmbūnadaprakhyā nāgalokādhidevatā nūpurākrāntacaraṇā naracittapramodinī

नवीन स्वर्ण के समान आभा वाली, नागलोक की अधिष्ठात्री देवी, नूपुरों से सुशोभित चरणों वाली, और मनुष्यों के चित्त को प्रमुदित करने वाली।

श्लोक 89 (devibhagavatam.12.6.89)

निमग्नारक्तनयना निर्घातसमनिःस्वना । नन्दनोद्याननिलया निर्व्यूहोपरिचारिणी

nimagnāraktanayanā nirghātasamaniḥsvanā nandanodyānanilayā nirvyūhoparicāriṇī

गहरे लाल नेत्रों वाली, वज्रपात के समान गम्भीर स्वर वाली, नन्दन-वन में निवास करने वाली, और सबसे ऊपर विचरण करने वाली।

श्लोक 90 (devibhagavatam.12.6.90)

पार्वती परमोदारा परब्रह्मात्मिका परा । पञ्चकोशविनिर्मुक्ता पञ्चपातकनाशिनी

pārvatī paramodārā parabrahmātmikā parā pañcakośavinirmuktā pañcapātakanāśinī

पार्वती, परम उदार, परब्रह्म-स्वरूपा, परा, पाँच कोशों से मुक्त, और पाँच महापातकों का नाश करने वाली।

श्लोक 91 (devibhagavatam.12.6.91)

परचित्तविधानज्ञा पञ्चिका पञ्चरूपिणी । पूर्णिमा परमा प्रीतिः परतेजः प्रकाशिनी

paracittavidhānajñā pañcikā pañcarūpiṇī pūrṇimā paramā prītiḥ paratejaḥ prakāśinī

दूसरों के मन को जानने वाली, पंचिका, पंचरूपा, पूर्णिमा, परम प्रीति, और परम तेज को प्रकाशित करने वाली।

श्लोक 92 (devibhagavatam.12.6.92)

पुराणी पौरुषी पुण्या पुण्डरीकनिभेक्षणा । पातालतलनिर्मग्ना प्रीता प्रीतिविवर्धिनी

purāṇī pauruṣī puṇyā puṇḍarīkanibhekṣaṇā pātālatalanirmagnā prītā prītivivardhinī

पुराणी, पौरुषी, पुण्या, श्वेत कमल के समान नेत्रों वाली, पाताल के गहरे में डूबी हुई, प्रीता, और प्रेम को बढ़ाने वाली।

श्लोक 93 (devibhagavatam.12.6.93)

पावनी पादसहिता पेशला पवनाशिनी । प्रजापतिः परिश्रान्ता पर्वतस्तनमण्डला

pāvanī pādasahitā peśalā pavanāśinī prajāpatiḥ pariśrāntā parvatastanamaṇḍalā

पावनी, चरणों से युक्त, पेशल (कोमल), वायु को ग्रहण करने वाली, प्रजापति, थकी हुई, और पर्वत के समान स्तनों वाली।

श्लोक 94 (devibhagavatam.12.6.94)

पद्मप्रिया पद्मसंस्था पद्माक्षी पद्मसम्भवा । पद्मपत्रा पद्मपदा पद्मिनी प्रियभाषिणी

padmapriyā padmasaṁsthā padmākṣī padmasambhavā padmapatrā padmapadā padminī priyabhāṣiṇī

कमल की प्रिय, कमल पर स्थित, कमल-नयनी, कमल से उत्पन्न, कमल-पत्र-स्वरूपा, कमल-चरणा, कमलिनी, और प्रिय बोलने वाली।

श्लोक 95 (devibhagavatam.12.6.95)

पशुपाशविनिर्मुक्ता पुरन्ध्री पुरवासिनी । पुष्कला पुरुषा पर्वा पारिजातसुमप्रिया

paśupāśavinirmuktā purandhrī puravāsinī puṣkalā puruṣā parvā pārijātasumapriyā

पशु-पाश (बन्धन) से मुक्त, पूर्णगर्भा (उर्वर नारी), नगर में निवास करने वाली, समृद्ध, पुरुष-स्वरूपा, पर्व, और पारिजात के फूलों की प्रिय।

श्लोक 96 (devibhagavatam.12.6.96)

पतिव्रता पवित्राङ्गी पुष्पहासपरायणा । प्रज्ञावतीसुता पौत्री पुत्रपूज्या पयस्विनी

pativratā pavitrāṅgī puṣpahāsaparāyaṇā prajñāvatīsutā pautrī putrapūjyā payasvinī

पतिव्रता, पवित्र अंगों वाली, फूल के समान हास्य में तत्पर, प्रज्ञावती की पुत्री, पौत्री, पुत्रों द्वारा पूजनीय, और दूध से समृद्ध।

श्लोक 97 (devibhagavatam.12.6.97)

पट्टिपाशधरा पङ्क्तिः पितृलोकप्रदायिनी । पुराणी पुण्यशीला च प्रणतार्तिविनाशिनी

paṭṭipāśadharā paṅktiḥ pitṛlokapradāyinī purāṇī puṇyaśīlā ca praṇatārtivināśinī

पट्टिश और पाश धारण करने वाली, पंक्ति, पितृलोक देने वाली, पुराणी, पुण्यशीला, और अपने चरणों में गिरे हुए के दुःख का नाश करने वाली।

श्लोक 98 (devibhagavatam.12.6.98)

प्रद्युम्नजननी पुष्टा पितामहपरिग्रहा । पुण्डरीकपुरावासा पुण्डरीकसमानना

pradyumnajananī puṣṭā pitāmahaparigrahā puṇḍarīkapurāvāsā puṇḍarīkasamānanā

प्रद्युम्न की जननी, पुष्ट, ब्रह्मा द्वारा स्वीकृत, कमल-नगर में निवास करने वाली, और कमल के समान मुख वाली।

श्लोक 99 (devibhagavatam.12.6.99)

पृथुजङ्घा पृथुभुजा पृथुपादा पृथूदरी । प्रवालशोभा पिङ्गाक्षी पीतवासाः प्रचापला

pṛthujaṅghā pṛthubhujā pṛthupādā pṛthūdarī pravālaśobhā piṅgākṣī pītavāsāḥ pracāpalā

चौड़ी जाँघों वाली, चौड़ी भुजाओं वाली, चौड़े चरणों वाली, चौड़ी कमर वाली, मूँगे के समान शोभा वाली, पिंगल नेत्रों वाली, पीत वस्त्र धारण करने वाली, और अत्यन्त चंचल।

श्लोक 100 (devibhagavatam.12.6.100)

प्रसवा पुष्टिदा पुण्या प्रतिष्ठा प्रणवागतिः । पञ्चवर्णा पञ्चवाणी पञ्चिका पञ्जरस्थिता

prasavā puṣṭidā puṇyā pratiṣṭhā praṇavāgatiḥ pañcavarṇā pañcavāṇī pañcikā pañjarasthitā

जन्म-स्वरूपा, पुष्टि देने वाली, पुण्या, प्रतिष्ठा, प्रणव (ॐ) की गति, पाँच वर्णों वाली, पाँच बाणों वाली, पंचिका, और पिंजर (शरीर) में स्थित।

श्लोक 101 (devibhagavatam.12.6.101)

परमाया परज्योतिः परप्रीतिः परागतिः । पराकाष्ठा परेशानी पावनी पावकद्युतिः

paramāyā parajyotiḥ paraprītiḥ parāgatiḥ parākāṣṭhā pareśānī pāvanī pāvakadyutiḥ

परम माया, परम ज्योति, परम प्रीति, परम गति, परम सीमा, परमेश्वरी, पावनी, और अग्नि के समान द्युति वाली।

श्लोक 102 (devibhagavatam.12.6.102)

पुण्यभद्रा परिच्छेद्या पुष्पहासा पृथूदरी । पीताङ्गी पीतवसना पीतशय्या पिशाचिनी

puṇyabhadrā paricchedyā puṣpahāsā pṛthūdarī pītāṅgī pītavasanā pītaśayyā piśācinī

पुण्य और भद्र, परिच्छेद्य (सीमित करने योग्य), पुष्प के समान हास्य वाली, चौड़ी कमर वाली, पीत अंगों वाली, पीत वस्त्रधारिणी, पीत शय्या वाली, और पिशाचिनी।

श्लोक 103 (devibhagavatam.12.6.103)

पीतक्रिया पिशाचघ्नी पाटलाक्षी पटुक्रिया । पञ्चभक्षप्रियाचारा पूतनाप्राणघातिनी

pītakriyā piśācaghnī pāṭalākṣī paṭukriyā pañcabhakṣapriyācārā pūtanāprāṇaghātinī

पीत कर्म वाली, पिशाचों का नाश करने वाली, पाटल के फूल के समान नेत्रों वाली, कुशल कर्म वाली, पंच-भक्ष्य के आचार में प्रिय, और पूतना के प्राणों का नाश करने वाली।

श्लोक 104 (devibhagavatam.12.6.104)

पुन्नागवनमध्यस्था पुण्यतीर्थनिषेविता । पञ्चाङ्गी च पराशक्तिः परमाह्लादकारिणी

punnāgavanamadhyasthā puṇyatīrthaniṣevitā pañcāṅgī ca parāśaktiḥ paramāhlādakāriṇī

पुन्नाग वन के मध्य में स्थित, पुण्य तीर्थों में सेवित, पंचांगी, परा शक्ति, और परम आह्लाद देने वाली।

श्लोक 105 (devibhagavatam.12.6.105)

पुष्पकाण्डस्थिता पूषा पोषिताखिलविष्टपा । पानप्रिया पञ्चशिखा पन्नगोपरिशायिनी

puṣpakāṇḍasthitā pūṣā poṣitākhilaviṣṭapā pānapriyā pañcaśikhā pannagopariśāyinī

पुष्पों के समूह में स्थित, पूषा (सूर्य), समस्त लोकों का पोषण करने वाली, पान की प्रिय, पाँच शिखाओं वाली, और सर्प पर शयन करने वाली।

श्लोक 106 (devibhagavatam.12.6.106)

पञ्चमात्रात्मिका पृध्वी पथिका पृथुदोहिनी । पुराणन्यायमीमांसा पाटली पुष्पगन्धिनी

pañcamātrātmikā pṛdhvī pathikā pṛthudohinī purāṇanyāyamīmāṁsā pāṭalī puṣpagandhinī

पाँच मात्राओं की स्वरूपा, पृथ्वी, पथिका, प्रचुर दोहन करने वाली, पुराण-न्याय-मीमांसा की स्वरूपा, पाटल, और फूलों की सुगन्ध वाली।

श्लोक 107 (devibhagavatam.12.6.107)

पुण्यप्रजा पारदात्री परमार्गैकगोचरा । प्रवालशोभा पूर्णाशा प्रणवा पल्लवोदरी

puṇyaprajā pāradātrī paramārgaikagocarā pravālaśobhā pūrṇāśā praṇavā pallavodarī

पुण्य सन्तान वाली, पारद (रसायन) देने वाली, केवल परम मार्ग में ही ज्ञेय, मूँगे के समान शोभा वाली, पूर्ण आशा वाली, प्रणव-स्वरूपा, और कोमल कोंपल के समान कमर वाली।

श्लोक 108 (devibhagavatam.12.6.108)

फलिनी फलदा फल्गुः फूत्कारी फलकाकृतिः । फणीन्द्रभोगशयना फणिमण्डलमण्डिता

phalinī phaladā phalguḥ phūtkārī phalakākṛtiḥ phaṇīndrabhogaśayanā phaṇimaṇḍalamaṇḍitā

फलवती, फल देने वाली, फल्गु नदी, फूत्कार करने वाली, ढाल के समान आकार वाली, सर्पराज के फणों पर शयन करने वाली, और सर्पों के मण्डल से सुशोभित।

श्लोक 109 (devibhagavatam.12.6.109)

बालबाला बहुमता बालातपनिभांशुका । बलभद्रप्रिया वन्द्या वडवा बुद्धिसंस्तुता

bālabālā bahumatā bālātapanibhāṁśukā balabhadrapriyā vandyā vaḍavā buddhisaṁstutā

बाल-कन्याओं में सबसे छोटी, अत्यन्त सम्मानित, उदयकालीन सूर्य के समान वस्त्र वाली, बलभद्र की प्रिया, वन्दनीय, अश्व-स्वरूपा (वडवा), और बुद्धि द्वारा स्तुत।

श्लोक 110 (devibhagavatam.12.6.110)

बन्दीदेवी बिलवती बडिशघ्नी बलिप्रिया । बान्धवी बोधिता बुद्धिर्बन्धूककुसुमप्रिया

bandīdevī bilavatī baḍiśaghnī balipriyā bāndhavī bodhitā buddhirbandhūkakusumapriyā

बन्दी की देवी, गुफाओं से समृद्ध, बड़शी (बंसी के काँटे) का नाश करने वाली, बलि की प्रिय, बान्धवी, प्रबुद्ध, बुद्धि, और बन्धूक पुष्प की प्रिय।

श्लोक 111 (devibhagavatam.12.6.111)

बालभानुप्रभाकारा ब्राह्मी ब्राह्मणदेवता । बृहस्पतिस्तुता वृन्दा वृन्दावनविहारिणी

bālabhānuprabhākārā brāhmī brāhmaṇadevatā bṛhaspatistutā vṛndā vṛndāvanavihāriṇī

उदीयमान सूर्य की आभा वाली, ब्राह्मी, ब्राह्मणों की देवता, बृहस्पति द्वारा स्तुत, वृन्दा (तुलसी), और वृन्दावन में विहार करने वाली।

श्लोक 112 (devibhagavatam.12.6.112)

बालाकिनी बिलाहारा बिलवासा बहूदका । बहुनेत्रा बहुपदा बहुकर्णावतंसिका

bālākinī bilāhārā bilavāsā bahūdakā bahunetrā bahupadā bahukarṇāvataṁsikā

बालाकिनी, गुफाओं में आहार लेने वाली, गुफाओं में निवास करने वाली, जल से समृद्ध, अनेक नेत्रों वाली, अनेक चरणों वाली, और अनेक कर्णाभूषणों से सुशोभित।

श्लोक 113 (devibhagavatam.12.6.113)

बहुबाहुयुता बीजरूपिणी बहुरूपिणी । बिन्दुनादकलातीता बिन्दुनादस्वरूपिणी

bahubāhuyutā bījarūpiṇī bahurūpiṇī bindunādakalātītā bindunādasvarūpiṇī

अनेक भुजाओं से युक्त, बीज-स्वरूपा, अनेक रूपों वाली, नाद-बिन्दु-कला से परे, और नाद-बिन्दु-स्वरूपा।

श्लोक 114 (devibhagavatam.12.6.114)

बद्धगोधाङ्गुलित्राणा बदर्याश्रमवासिनी । बृन्दारका बृहत्स्कन्धा बृहती बाणपातिनी

baddhagodhāṅgulitrāṇā badaryāśramavāsinī bṛndārakā bṛhatskandhā bṛhatī bāṇapātinī

धनुर्धारी की अंगुलित्राण बाँधने वाली, बदरी-आश्रम में निवास करने वाली, श्रेष्ठ, चौड़े कन्धों वाली, वृहती (विशाल), और बाण छोड़ने वाली।

श्लोक 115 (devibhagavatam.12.6.115)

वृन्दाध्यक्षा बहुनुता वनिता बहुविक्रमा । बद्धपद्मासनासीना बिल्वपत्रतलस्थिता

vṛndādhyakṣā bahunutā vanitā bahuvikramā baddhapadmāsanāsīnā bilvapatratalasthitā

वृन्दा की अधिष्ठात्री, अनेकों द्वारा स्तुत, नारी, महान् पराक्रम वाली, पद्मासन में बैठी हुई, और बिल्वपत्र के नीचे स्थित।

श्लोक 116 (devibhagavatam.12.6.116)

बोधिद्रुमनिजावासा बडिस्था बिन्दुदर्पणा । बाला बाणासनवती वडवानलवेगिनी

bodhidrumanijāvāsā baḍisthā bindudarpaṇā bālā bāṇāsanavatī vaḍavānalaveginī

बोधिवृक्ष जिसका निज निवास है, पाश में स्थित, बिन्दु का दर्पण, बाला, धनुष धारण करने वाली, और बड़वाग्नि के समान वेगवाली।

श्लोक 117 (devibhagavatam.12.6.117)

ब्रह्माण्डबहिरन्तःस्था ब्रह्मकङ्कणसूत्रिणी । भवानी भीषणवती भाविनी भयहारिणी

brahmāṇḍabahirantaḥsthā brahmakaṅkaṇasūtriṇī bhavānī bhīṣaṇavatī bhāvinī bhayahāriṇī

ब्रह्माण्ड के भीतर और बाहर स्थित, ब्रह्म के कंकण-सूत्र से बँधी हुई, भवानी, भीषण, भाविनी, और भय को हरने वाली।

श्लोक 118 (devibhagavatam.12.6.118)

भद्रकाली भुजङ्गाक्षी भारती भारताशया । भैरवी भीषणाकारा भूतिदा भूतिमालिनी

bhadrakālī bhujaṅgākṣī bhāratī bhāratāśayā bhairavī bhīṣaṇākārā bhūtidā bhūtimālinī

भद्रकाली, सर्प के समान नेत्रों वाली, भारती, भारत की आशा-स्वरूपा, भैरवी, भीषण आकार वाली, ऐश्वर्य देने वाली, और ऐश्वर्य की माला वाली।

श्लोक 119 (devibhagavatam.12.6.119)

भामिनी भोगनिरता भद्रदा भूरिविक्रमा । भूतवासा भृगुलता भार्गवी भूसुरार्चिता

bhāminī bhoganiratā bhadradā bhūrivikramā bhūtavāsā bhṛgulatā bhārgavī bhūsurārcitā

तेजस्विनी, भोग में रत, भद्र देने वाली, महान् पराक्रम वाली, सभी प्राणियों का निवास-स्थान, भृगु की लता, भार्गवी, और ब्राह्मणों द्वारा पूजित।

श्लोक 120 (devibhagavatam.12.6.120)

भागीरथी भोगवती भवनस्था भिषग्वरा । भामिनी भोगिनी भाषा भवानी भूरिदक्षिणा

bhāgīrathī bhogavatī bhavanasthā bhiṣagvarā bhāminī bhoginī bhāṣā bhavānī bhūridakṣiṇā

भागीरथी, भोगवती, दिव्य भवन में स्थित, श्रेष्ठ वैद्य, तेजस्विनी, भोगिनी, वाणी (भाषा), भवानी, और प्रचुर दक्षिणा देने वाली।

श्लोक 121 (devibhagavatam.12.6.121)

भर्गात्मिका भीमवती भवबन्धविमोचिनी । भजनीया भूतधात्रीरञ्जिता भुवनेश्वरी

bhargātmikā bhīmavatī bhavabandhavimocinī bhajanīyā bhūtadhātrīrañjitā bhuvaneśvarī

तेजोमय-स्वरूपा, भीषण, संसार-बन्धन से मुक्त करने वाली, भजनीय, प्राणियों की धात्री, प्रसन्न, और भुवनों की स्वामिनी।

श्लोक 122 (devibhagavatam.12.6.122)

भुजङ्गवलया भीमा भेरुण्डा भागधेयिनी । माता माया मधुमती मधुजिह्वा मधुप्रिया

bhujaṅgavalayā bhīmā bheruṇḍā bhāgadheyinī mātā māyā madhumatī madhujihvā madhupriyā

सर्पों के कंगन वाली, भीमा, भेरुण्डा, सौभाग्य देने वाली, माता, माया, मधु के समान मीठी, मधुर जिह्वा वाली, और मधु की प्रिय।

श्लोक 123 (devibhagavatam.12.6.123)

महादेवी महाभागा मालिनी मीनलोचना । मायातीता मधुमती मधुमांसा मधुद्रवा

mahādevī mahābhāgā mālinī mīnalocanā māyātītā madhumatī madhumāṁsā madhudravā

महादेवी, महाभागा, मालिनी, मीन-नेत्रा, माया से परे, मधु के समान मीठी, मधुर मांस वाली, और मधु के समान प्रवाहित होने वाली।

श्लोक 124 (devibhagavatam.12.6.124)

मानवी मधुसम्भूता मिथिलापुरवासिनी । मधुकैटभसंहर्त्री मेदिनी मेघमालिनी

mānavī madhusambhūtā mithilāpuravāsinī madhukaiṭabhasaṁhartrī medinī meghamālinī

मानवी, मधु से उत्पन्न, मिथिलापुरी में निवास करने वाली, मधु-कैटभ का संहार करने वाली, मेदिनी (पृथ्वी), और मेघों की माला वाली।

श्लोक 125 (devibhagavatam.12.6.125)

मन्दोदरी महामाया मैथिली मसृणप्रिया । महालक्ष्मीर्महाकाली महाकन्या महेश्वरी

mandodarī mahāmāyā maithilī masṛṇapriyā mahālakṣmīrmahākālī mahākanyā maheśvarī

मन्दोदरी, महामाया, मैथिली (सीता), कोमलता की प्रिय, महालक्ष्मी, महाकाली, महाकन्या, और महेश्वरी।

श्लोक 126 (devibhagavatam.12.6.126)

माहेन्द्री मेरुतनया मन्दारकुसुमार्चिता । मञ्जुमञ्जीरचरणा मोक्षदा मञ्जुभाषिणी

māhendrī merutanayā mandārakusumārcitā mañjumañjīracaraṇā mokṣadā mañjubhāṣiṇī

महेन्द्र की शक्ति, मेरु की पुत्री, मन्दार-पुष्पों से पूजित, मधुर नूपुरों वाले चरण, मोक्ष देने वाली, और मधुर भाषण करने वाली।

श्लोक 127 (devibhagavatam.12.6.127)

मधुरद्राविणी मुद्रा मलया मलयान्विता । मेधा मरकतश्यामा मागधी मेनकात्मजा

madhuradrāviṇī mudrā malayā malayānvitā medhā marakataśyāmā māgadhī menakātmajā

मधुर स्वर से बहने वाली, मुद्रा, मलय पर्वत, मलय-वायु से युक्त, मेधा (बुद्धि), मरकत के समान श्यामवर्णा, मागधी भाषा, और मेनका की पुत्री (पार्वती)।

श्लोक 128 (devibhagavatam.12.6.128)

महामारी महावीरा महाश्यामा मनुस्तुता । मातृका मिहिराभासा मुकुन्दपदविक्रमा

mahāmārī mahāvīrā mahāśyāmā manustutā mātṛkā mihirābhāsā mukundapadavikramā

महामारी, महावीरा, महाश्यामा, मनु द्वारा स्तुत, मातृका (वर्णमाला की माता), सूर्य के समान आभा वाली, और मुकुन्द (विष्णु) के चरणों के समान चलने वाली।

श्लोक 129 (devibhagavatam.12.6.129)

मूलाधारस्थिता मुग्धा मणिपूरकवासिनी । मृगाक्षी महिषारूढा महिषासुरमर्दिनी

mūlādhārasthitā mugdhā maṇipūrakavāsinī mṛgākṣī mahiṣārūḍhā mahiṣāsuramardinī

मूलाधार में स्थित, मुग्धा (मनोहर), मणिपूरक चक्र में निवास करने वाली, मृगनयनी, भैंसे पर आरूढ़, और महिषासुर का मर्दन करने वाली।

श्लोक 130 (devibhagavatam.12.6.130)

योगासना योगगम्या योगा यौवनकाश्रया । यौवनी युद्धमध्यस्था यमुना युगधारिणी

yogāsanā yogagamyā yogā yauvanakāśrayā yauvanī yuddhamadhyasthā yamunā yugadhāriṇī

योगासन में स्थित, योग से प्राप्त होने योग्य, योग-स्वरूपा, यौवन का आश्रय, यौवनवती, युद्ध के मध्य में स्थित, यमुना, और युगों को धारण करने वाली।

श्लोक 131 (devibhagavatam.12.6.131)

यक्षिणी योगयुक्ता च यक्षराजप्रसूतिनी । यात्रा यानविधानज्ञा यदुवंशसमुद्भवा

yakṣiṇī yogayuktā ca yakṣarājaprasūtinī yātrā yānavidhānajñā yaduvaṁśasamudbhavā

यक्षिणी, योग से युक्त, यक्षराज (कुबेर) की जननी, यात्रा, यानों की विधि की ज्ञाता, और यदुवंश में उत्पन्न।

श्लोक 132 (devibhagavatam.12.6.132)

यकारादिहकारान्ता याजुषी यज्ञरूपिणी । यामिनी योगनिरता यातुधानभयङ्करी

yakārādihakārāntā yājuṣī yajñarūpiṇī yāminī yoganiratā yātudhānabhayaṅkarī

'य' से 'ह' अक्षर तक फैली हुई, याजुषी (यजुर्वेद-स्वरूपा), यज्ञ-स्वरूपा, रात्रि (यामिनी), योग में रत, और यातुधानों (राक्षसों) को भय देने वाली।

श्लोक 133 (devibhagavatam.12.6.133)

रुक्मिणी रमणी रामा रेवती रेणुका रतिः । रौद्री रौद्रप्रियाकारा राममाता रतिप्रिया

rukmiṇī ramaṇī rāmā revatī reṇukā ratiḥ raudrī raudrapriyākārā rāmamātā ratipriyā

रुक्मिणी, रमणी, रामा, रेवती, रेणुका, रति, रौद्री, रुद्र को प्रिय रूप वाली, राम की माता, और रति की प्रिय।

श्लोक 134 (devibhagavatam.12.6.134)

रोहिणी राज्यदा रेवा रमा राजीवलोचना । राकेशी रूपसम्पन्ना रत्नसिंहासनस्थिता

rohiṇī rājyadā revā ramā rājīvalocanā rākeśī rūpasampannā ratnasiṁhāsanasthitā

रोहिणी, राज्य देने वाली, रेवा नदी, रमा, कमल-नेत्रा, पूर्णचन्द्र की स्वामिनी, रूपसम्पन्ना, और रत्न-सिंहासन पर स्थित।

श्लोक 135 (devibhagavatam.12.6.135)

रक्तमाल्याम्बरधरा रक्तगन्धानुलेपना । राजहंससमारूढा रम्भा रक्तबलिप्रिया

raktamālyāmbaradharā raktagandhānulepanā rājahaṁsasamārūḍhā rambhā raktabalipriyā

लाल माला और वस्त्र धारण करने वाली, लाल चन्दन से लिप्त, राजहंस पर आरूढ़, रम्भा, और लाल बलि की प्रिय।

श्लोक 136 (devibhagavatam.12.6.136)

रमणीययुगाधारा राजिताखिलभूतला । रुरुचर्मपरीधाना रथिनी रत्नमालिका

ramaṇīyayugādhārā rājitākhilabhūtalā rurucarmaparīdhānā rathinī ratnamālikā

मनोहर युग का आधार, समस्त पृथ्वी को प्रकाशित करने वाली, रुरु मृग का चर्म धारण करने वाली, रथिनी, और रत्नों की माला।

श्लोक 137 (devibhagavatam.12.6.137)

रोगेशी रोगशमनी राविणी रोमहर्षिणी । रामचन्द्रपदाक्रान्ता रावणच्छेदकारिणी

rogeśī rogaśamanī rāviṇī romaharṣiṇī rāmacandrapadākrāntā rāvaṇacchedakāriṇī

रोगों की स्वामिनी, रोगों को शान्त करने वाली, गर्जन करने वाली, रोमांच उत्पन्न करने वाली, रामचन्द्र के चरणों से आक्रान्त, और रावण का छेदन करने वाली।

श्लोक 138 (devibhagavatam.12.6.138)

रत्नवस्त्रपरिच्छन्ना रथस्था रुक्मभूषणा । लज्जाधिदेवता लोला ललिता लिङ्गधारिणी

ratnavastraparicchannā rathasthā rukmabhūṣaṇā lajjādhidevatā lolā lalitā liṅgadhāriṇī

रत्नजड़ित वस्त्र पहने हुए, रथ पर स्थित, स्वर्णाभूषणों से सुशोभित, लज्जा की अधिष्ठात्री देवी, चंचल, ललिता, और लिंग धारण करने वाली।

श्लोक 139 (devibhagavatam.12.6.139)

लक्ष्मीर्लोला लुप्तविषा लोकिनी लोकविश्रुता । लज्जा लम्बोदरी देवी ललना लोकधारिणी

lakṣmīrlolā luptaviṣā lokinī lokaviśrutā lajjā lambodarī devī lalanā lokadhāriṇī

लक्ष्मी, चंचल, विष से रहित, लोक-स्वरूपा, लोक में प्रसिद्ध, लज्जा, लम्बोदरी देवी, ललना, और लोकों को धारण करने वाली।

श्लोक 140 (devibhagavatam.12.6.140)

वरदा वन्दिता विद्या वैष्णवी विमलाकृतिः । वाराही विरजा वर्षा वरलक्ष्मीर्विलासिनी

varadā vanditā vidyā vaiṣṇavī vimalākṛtiḥ vārāhī virajā varṣā varalakṣmīrvilāsinī

वरदा, वन्दिता, विद्या, वैष्णवी, निर्मल आकृति वाली, वाराही, विरजा, वर्षा, वरलक्ष्मी, और विलासिनी।

श्लोक 141 (devibhagavatam.12.6.141)

विनता व्योममध्यस्था वारिजासनसंस्थिता । वारुणी वेणुसम्भूता वीतिहोत्रा विरूपिणी

vinatā vyomamadhyasthā vārijāsanasaṁsthitā vāruṇī veṇusambhūtā vītihotrā virūpiṇī

विनता, आकाश के मध्य में स्थित, कमलासन पर स्थित, वारुणी, वंशी (नरकुल) से उत्पन्न, यज्ञाग्नि (वीतिहोत्रा), और विविध रूपों वाली।

श्लोक 142 (devibhagavatam.12.6.142)

वायुमण्डलमध्यस्था विष्णुरूपा विधिप्रिया । विष्णुपत्नी विष्णुमती विशालाक्षी वसुन्धरा

vāyumaṇḍalamadhyasthā viṣṇurūpā vidhipriyā viṣṇupatnī viṣṇumatī viśālākṣī vasundharā

वायुमण्डल के मध्य में स्थित, विष्णु-स्वरूपा, ब्रह्मा की प्रिया, विष्णु की पत्नी, विष्णु की कृपा से समृद्ध, विशाल नेत्रों वाली, और पृथ्वी (वसुन्धरा)।

श्लोक 143 (devibhagavatam.12.6.143)

वामदेवप्रिया वेला वज्रिणी वसुदोहिनी । वेदाक्षरपरीताङ्गी वाजपेयफलप्रदा

vāmadevapriyā velā vajriṇī vasudohinī vedākṣaraparītāṅgī vājapeyaphalapradā

वामदेव (शिव) की प्रिया, तट (वेला), वज्रधारिणी, धन का दोहन करने वाली, वेद के अक्षरों से आच्छादित शरीर वाली, और वाजपेय यज्ञ का फल देने वाली।

श्लोक 144 (devibhagavatam.12.6.144)

वासवी वामजननी वैकुण्ठनिलया वरा । व्यासप्रिया वर्मधरा वाल्मीकिपरिसेविता

vāsavī vāmajananī vaikuṇṭhanilayā varā vyāsapriyā varmadharā vālmīkiparisevitā

वासव (इन्द्र) की शक्ति, उमा की जननी, वैकुण्ठ में निवास करने वाली, श्रेष्ठ, व्यास की प्रिया, कवच धारण करने वाली, और वाल्मीकि द्वारा सेवित।

श्लोक 145 (devibhagavatam.12.6.145)

शाकम्भरी शिवा शान्ता शारदा शरणागतिः । शातोदरी शुभाचारा शुम्भासुरविमर्दिनी

śākambharī śivā śāntā śāradā śaraṇāgatiḥ śātodarī śubhācārā śumbhāsuravimardinī

शाकम्भरी, शिवा, शान्ता, शारदा, शरणागति (शरण देने वाली), पतली कमर वाली, शुभ आचरण वाली, और शुम्भासुर का मर्दन करने वाली।

श्लोक 146 (devibhagavatam.12.6.146)

शोभावती शिवाकारा शङ्करार्धशरीरिणी । शोणा शुभाशया शुभ्रा शिरःसन्धानकारिणी

śobhāvatī śivākārā śaṅkarārdhaśarīriṇī śoṇā śubhāśayā śubhrā śiraḥsandhānakāriṇī

शोभावती, शिव के समान आकार वाली, शंकर के अर्ध-शरीर में स्थित, लाल वर्णा, शुभ इच्छा वाली, श्वेत (शुभ्रा), और छिन्न सिर को जोड़ने वाली।

श्लोक 147 (devibhagavatam.12.6.147)

शरावती शरानन्दा शरज्ज्योत्स्ना शुभानना । शरभा शूलिनी शुद्धा शबरी शुकवाहना

śarāvatī śarānandā śarajjyotsnā śubhānanā śarabhā śūlinī śuddhā śabarī śukavāhanā

बाणों से समृद्ध, बाणों में आनन्दित, शरद् की चाँदनी, शुभ मुख वाली, शरभ (मृगेन्द्र), त्रिशूलधारिणी, शुद्ध, शबरी, और तोते पर सवार।

श्लोक 148 (devibhagavatam.12.6.148)

श्रीमती श्रीधरानन्दा श्रवणानन्ददायिनी । शर्वाणी शर्वरीवन्द्या षड्भाषा षडृतुप्रिया

śrīmatī śrīdharānandā śravaṇānandadāyinī śarvāṇī śarvarīvandyā ṣaḍbhāṣā ṣaḍṛtupriyā

श्रीमती, श्रीधर (विष्णु) को आनन्दित करने वाली, श्रवण से आनन्द देने वाली, शर्वाणी, रात्रि द्वारा वन्दित, छह भाषाओं वाली, और छहों ऋतुओं की प्रिय।

श्लोक 149 (devibhagavatam.12.6.149)

षडाधारस्थिता देवी षण्मुखप्रियकारिणी । षडङ्गरूपसुमतिसुरासुरनमस्कृता

ṣaḍādhārasthitā devī ṣaṇmukhapriyakāriṇī ṣaḍaṅgarūpasumatisurāsuranamaskṛtā

छह आधारों (चक्रों) में स्थित देवी, षण्मुख (कार्तिकेय) को प्रिय करने वाली, छह अंगों की सुबुद्धि-स्वरूपा, और देव-दानवों द्वारा नमस्कृत।

श्लोक 150 (devibhagavatam.12.6.150)

सरस्वती सदाधारा सर्वमङ्गलकारिणी । सामगानप्रिया सूक्ष्मा सावित्री सामसम्भवा

sarasvatī sadādhārā sarvamaṅgalakāriṇī sāmagānapriyā sūkṣmā sāvitrī sāmasambhavā

सरस्वती, सदा आधार-स्वरूपा, समस्त मंगल करने वाली, सामगान की प्रिय, सूक्ष्मा, सावित्री, और साम से उत्पन्न।

श्लोक 151 (devibhagavatam.12.6.151)

सर्वावासा सदानन्दा सुस्तनी सागराम्बरा । सर्वैश्वर्यप्रिया सिद्धिः साधुबन्धुपराक्रमा

sarvāvāsā sadānandā sustanī sāgarāmbarā sarvaiśvaryapriyā siddhiḥ sādhubandhuparākramā

सबका निवास-स्थान, सदा आनन्दमयी, सुन्दर स्तनों वाली, समुद्र को वस्त्र रूप में धारण करने वाली, समस्त ऐश्वर्य की प्रिय, सिद्धि, और सज्जनों की पराक्रमी बन्धु।

श्लोक 152 (devibhagavatam.12.6.152)

सप्तर्षिमण्डलगता सोममण्डलवासिनी । सर्वज्ञा सान्द्रकरुणा समानाधिकवर्जिता

saptarṣimaṇḍalagatā somamaṇḍalavāsinī sarvajñā sāndrakaruṇā samānādhikavarjitā

सप्तर्षियों के मण्डल में विचरण करने वाली, चन्द्रमण्डल में निवास करने वाली, सर्वज्ञा, सघन करुणा वाली, और जिसके समान या अधिक कोई नहीं है।

श्लोक 153 (devibhagavatam.12.6.153)

सर्वोत्तुङ्गा सङ्गहीना सद्गुणा सकलेष्टदा । सरघा सूर्यतनया सुकेशी सोमसंहतिः

sarvottuṅgā saṅgahīnā sadguṇā sakaleṣṭadā saraghā sūryatanayā sukeśī somasaṁhatiḥ

सबसे ऊँची, आसक्ति से रहित, सद्गुणी, सबकी कामनाएँ पूर्ण करने वाली, मधुमक्खी (सरघा), सूर्य की पुत्री, सुन्दर केशों वाली, और चन्द्रमा की किरणों का समूह।

श्लोक 154 (devibhagavatam.12.6.154)

हिरण्यवर्णा हरिणी ह्रीङ्कारी हंसवाहिनी । क्षौमवस्त्रपरीताङ्गी क्षीराब्धितनया क्षमा

hiraṇyavarṇā hariṇī hrīṅkārī haṁsavāhinī kṣaumavastraparītāṅgī kṣīrābdhitanayā kṣamā

स्वर्ण-वर्णा, हरिणी, ह्रींकार-स्वरूपा, हंस पर आरूढ़, रेशमी वस्त्र में लिपटे अंगों वाली, क्षीरसागर की पुत्री, और क्षमा (पृथ्वी)।

श्लोक 155 (devibhagavatam.12.6.155)

गायत्री चैव सावित्री पार्वती च सरस्वती । वेदगर्भा वरारोहा श्रीगायत्री पराम्बिका

gāyatrī caiva sāvitrī pārvatī ca sarasvatī vedagarbhā varārohā śrīgāyatrī parāmbikā

गायत्री, और उसी प्रकार सावित्री, पार्वती, तथा सरस्वती; वेदों का गर्भ (वेदगर्भा), श्रेष्ठतम (वरारोहा), श्रीगायत्री, और परम माता (पराम्बिका)।

श्लोक 156 (devibhagavatam.12.6.156)

इति साहस्रकं नाम्नां गायत्र्याश्चैव नारद । पुण्यदं सर्वपापघ्नं महासम्पत्तिदायकम्

iti sāhasrakaṁ nāmnāṁ gāyatryāścaiva nārada puṇyadaṁ sarvapāpaghnaṁ mahāsampattidāyakam

हे नारद! इस प्रकार यह गायत्री का सहस्रनाम-स्तोत्र है, जो पुण्य देने वाला, समस्त पापों का नाशक, और महान् सम्पत्ति प्रदान करने वाला है।

श्लोक 157 (devibhagavatam.12.6.157)

एवं नामानि गायत्र्यास्तोषोत्पत्तिकराणि हि । अष्टम्यां च विशेषेण पठितव्यं द्विजैः सह

evaṁ nāmāni gāyatryāstoṣotpattikarāṇi hi aṣṭamyāṁ ca viśeṣeṇa paṭhitavyaṁ dvijaiḥ saha

इस प्रकार गायत्री के ये नाम सन्तोष उत्पन्न करने वाले हैं। इन्हें विशेष रूप से अष्टमी तिथि पर द्विजों के साथ पढ़ना चाहिए।

श्लोक 158 (devibhagavatam.12.6.158)

जपं कृत्वा होमपूजाध्यानं कृत्वा विशेषतः । यस्मै कस्मै न दातव्यं गायत्र्यास्तु विशेषतः

japaṁ kṛtvā homapūjādhyānaṁ kṛtvā viśeṣataḥ yasmai kasmai na dātavyaṁ gāyatryāstu viśeṣataḥ

जप करके, विशेष रूप से होम, पूजा और ध्यान करके — गायत्री का यह (स्तोत्र) जिस-किसी को नहीं देना चाहिए।

श्लोक 159 (devibhagavatam.12.6.159)

सुभक्ताय सुशिष्याय वक्तव्यं भूसुराय वै । भ्रष्टेभ्यः साधकेभ्यश्च बान्धवेभ्यो न दर्शयेत्

subhaktāya suśiṣyāya vaktavyaṁ bhūsurāya vai bhraṣṭebhyaḥ sādhakebhyaśca bāndhavebhyo na darśayet

यह सच्चे भक्त को, योग्य शिष्य को, और ब्राह्मण को ही कहना चाहिए। भ्रष्ट साधकों को तथा बान्धवों को भी नहीं दिखाना चाहिए।

श्लोक 160 (devibhagavatam.12.6.160)

यद्गृहे लिखितं शास्त्रं भयं तस्य न कस्यचित् । चञ्चलापि स्थिरा भूत्वा कमला तत्र तिष्ठति

yadgṛhe likhitaṁ śāstraṁ bhayaṁ tasya na kasyacit cañcalāpi sthirā bhūtvā kamalā tatra tiṣṭhati

जिसके घर में यह शास्त्र लिखित रूप में रहता है, उसे किसी से भय नहीं होता; चंचल स्वभाव वाली कमला (लक्ष्मी) भी वहाँ स्थिर होकर निवास करती हैं।

श्लोक 161 (devibhagavatam.12.6.161)

इदं रहस्यं परमं गुह्याद्गुह्यतरं महत् । पुण्यप्रदं मनुष्याणां दरिद्राणां निधिप्रदम्

idaṁ rahasyaṁ paramaṁ guhyādguhyataraṁ mahat puṇyapradaṁ manuṣyāṇāṁ daridrāṇāṁ nidhipradam

यह परम रहस्य गुह्य से भी अधिक गुह्य और महान् है। यह मनुष्यों को पुण्य देने वाला तथा दरिद्रों को निधि देने वाला है।

श्लोक 162 (devibhagavatam.12.6.162)

मोक्षप्रदं मुमुक्षूणां कामिनां सर्वकामदम् । रोगाद्वै मुच्यते रोगी बद्धो मुच्येत बन्धनात्

mokṣapradaṁ mumukṣūṇāṁ kāmināṁ sarvakāmadam rogādvai mucyate rogī baddho mucyeta bandhanāt

यह मुमुक्षुओं को मोक्ष देने वाला और कामनाशीलों की समस्त कामनाएँ पूर्ण करने वाला है। इससे रोगी रोग से मुक्त हो जाता है, और बन्धन में पड़ा व्यक्ति बन्धन से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 163 (devibhagavatam.12.6.163)

बह्महत्यासुरापानसुवर्णस्तेयिनो नराः । गुरुतल्पगतो वापि पातकान्मुच्यते सकृत्

bahmahatyāsurāpānasuvarṇasteyino narāḥ gurutalpagato vāpi pātakānmucyate sakṛt

ब्रह्महत्या, मदिरापान, सुवर्ण-चोरी करने वाले मनुष्य, अथवा गुरु की शय्या को दूषित करने वाला भी, इस (स्तोत्र) से तत्काल उन पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 164 (devibhagavatam.12.6.164)

असत्प्रतिग्रहाच्चैवाभक्ष्यभक्षाद्विशेषतः । पाखण्डानृतमुख्येभ्यः पठनादेव मुच्यते

asatpratigrahāccaivābhakṣyabhakṣādviśeṣataḥ pākhaṇḍānṛtamukhyebhyaḥ paṭhanādeva mucyate

असत् प्रतिग्रह (अनुचित दान लेना), विशेष रूप से अभक्ष्य भक्षण, तथा पाखण्ड और मिथ्याचार आदि से भी — इसके पठन मात्र से ही मुक्ति मिल जाती है।

श्लोक 165 (devibhagavatam.12.6.165)

इदं रहस्यममलं मयोक्तं पद्मजोद्भव । ब्रह्मसायुज्यदं नॄणां सत्यं सत्यं न संशयः

idaṁ rahasyamamalaṁ mayoktaṁ padmajodbhava brahmasāyujyadaṁ nṝṇāṁ satyaṁ satyaṁ na saṁśayaḥ

हे पद्मजोद्भव (नारद)! यह निर्मल रहस्य मैंने कहा है, जो मनुष्यों को ब्रह्म का सायुज्य देने वाला है — यह सत्य है, सत्य है, इसमें कोई सन्देह नहीं।

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