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द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 5

देवव्रत की प्रतिज्ञा

अध्याय 4अध्याय-सूचीअध्याय 6

श्लोक 1 (devibhagavatam.2.5.1)

ऋषय ऊचुः । वसूनां सम्भवः सूत कथितः शापकारणात् । गाङ्गेयस्य तथोत्पत्तिः कथिता लोमहर्षणे

ṛṣaya ūcuḥ vasūnāṁ sambhavaḥ sūta kathitaḥ śāpakāraṇāt gāṅgeyasya tathotpattiḥ kathitā lomaharṣaṇe

ऋषियों ने कहा — हे सूत! शाप के कारण वसुओं की उत्पत्ति और उसी प्रकार गांगेय की उत्पत्ति हे लोमहर्षण-पुत्र! हमें बता दी गई।

श्लोक 2 (devibhagavatam.2.5.2)

माता व्यासस्य धर्मज्ञ नाम्ना सत्यवती सती । कथं शन्तनुना प्राप्ता भार्या गन्धवती शुभा

mātā vyāsasya dharmajña nāmnā satyavatī satī kathaṁ śantanunā prāptā bhāryā gandhavatī śubhā

हे धर्मज्ञ! व्यास की माता, वह सती सत्यवती, जिसका नाम गन्धवती (शुभ) भी था, वह शन्तनु द्वारा पत्नी रूप में कैसे प्राप्त की गई?

श्लोक 3 (devibhagavatam.2.5.3)

तन्ममाचक्ष्व विस्तारं दाशपुत्री कथं धृता । राज्ञा धर्मवरिष्ठेन संशयं छिन्धि सुव्रत

tanmamācakṣva vistāraṁ dāśaputrī kathaṁ dhṛtā rājñā dharmavariṣṭhena saṁśayaṁ chindhi suvrata

वह मुझे विस्तार से बताइए कि मछुए की वह पुत्री धर्म में सर्वश्रेष्ठ उस राजा द्वारा किस प्रकार वरण की गई? हे सुव्रत! मेरा संशय दूर कीजिए।

श्लोक 4 (devibhagavatam.2.5.4)

सूत उवाच । शन्तनुर्नाम राजर्षिर्मृगयानिरतः सदा । वनं जगाम निघ्नन्वै मृगांश्च महिषान् रुरून्

sūta uvāca śantanurnāma rājarṣirmṛgayānirataḥ sadā vanaṁ jagāma nighnanvai mṛgāṁśca mahiṣān rurūn

सूत जी ने कहा — शन्तनु नामक राजर्षि सदा मृगया में रत रहते थे; वे मृगों, भैंसों और रुरु-मृगों का वध करते हुए वन में जाते थे।

श्लोक 5 (devibhagavatam.2.5.5)

चत्वार्येव तु वर्षाणि पुत्रेण सह भूपतिः । रममाणः सुखं प्राप कुमारेण यथा हरः

catvāryeva tu varṣāṇi putreṇa saha bhūpatiḥ ramamāṇaḥ sukhaṁ prāpa kumāreṇa yathā haraḥ

पूरे चार वर्षों तक वह राजा अपने पुत्र (देवव्रत) के साथ रमण करते हुए ऐसा सुख पाता रहा जैसे शिव अपने कुमार के साथ।

श्लोक 6 (devibhagavatam.2.5.6)

एकदा विक्षिपन्बाणान्विनिघ्नन्खड्गसूकरान् । स कदाचिद्वनं प्राप्तः कालिन्दीं सरितां वराम्

ekadā vikṣipanbāṇānvinighnankhaḍgasūkarān sa kadācidvanaṁ prāptaḥ kālindīṁ saritāṁ varām

एक बार बाण चलाते हुए और खड्ग-सूकरों का वध करते हुए, वह श्रेष्ठ नदी कालिन्दी (यमुना) से युक्त वन में जा पहुँचा।

श्लोक 7 (devibhagavatam.2.5.7)

महीपतिरनिर्देश्यमाजिघ्रद्गन्धमुत्तमम् । तस्य प्रभवमन्विच्छन्सजञ्चचार वनं तदा

mahīpatiranirdeśyamājighradgandhamuttamam tasya prabhavamanvicchansajañcacāra vanaṁ tadā

राजा को वहाँ एक अवर्णनीय, उत्तम सुगंध की गंध आई; उसके उद्गम को ढूँढते हुए वह उस समय उसी वन में विचरण करने लगा।

श्लोक 8 (devibhagavatam.2.5.8)

न मन्दारस्य गन्धोऽयं मृगनाभिमदस्य न । चम्पकस्य न मालत्या न केतक्या मनोहरः

na mandārasya gandho'yaṁ mṛganābhimadasya na campakasya na mālatyā na ketakyā manoharaḥ

'यह न तो मंदार की गंध है, न ही कस्तूरी की; न चम्पक की है, न मालती की, न ही केतकी जैसी मनोहर है।

श्लोक 9 (devibhagavatam.2.5.9)

न चानुभूतपूर्वोऽयं वाति गन्धवहः शुभः । कुतोऽयमेति वायुर्वै मम घ्राणविमोहनः

na cānubhūtapūrvo'yaṁ vāti gandhavahaḥ śubhaḥ kuto'yameti vāyurvai mama ghrāṇavimohanaḥ

यह ऐसी शुभ सुगंध है जो मैंने पहले कभी अनुभव नहीं की; न जाने यह हवा मेरी नासिका को इस प्रकार मोहित करते हुए कहाँ से आ रही है।'

श्लोक 10 (devibhagavatam.2.5.10)

इति सञ्चिन्त्यमानोऽसौ बभ्राम वनमण्डलम् । मोहितो गन्धलोभेन शन्तनुः पवनानुगः

iti sañcintyamāno'sau babhrāma vanamaṇḍalam mohito gandhalobhena śantanuḥ pavanānugaḥ

इस प्रकार विचार करते हुए, गंध के लोभ से मोहित और उसी वायु का अनुसरण करते हुए शन्तनु वन-मंडल में घूमने लगे।

श्लोक 11 (devibhagavatam.2.5.11)

स ददर्श नदीतीरे संस्थितां चारुदर्शनाम् । शृङ्गाररहितां कान्तां सुस्थितां मलिनाम्बराम्

sa dadarśa nadītīre saṁsthitāṁ cārudarśanām śṛṅgārarahitāṁ kāntāṁ susthitāṁ malināmbarām

उसने नदी के तट पर एक सुंदर दिखने वाली स्त्री को खड़ी देखा — शृंगार-रहित, प्रिय, संयत मुद्रा में, और मलिन वस्त्र पहने हुए।

श्लोक 12 (devibhagavatam.2.5.12)

दृष्ट्वा तामसितापाङ्गीं विस्मितः स महीपतिः । अस्या देहस्य गन्धोऽयमिति सञ्जातनिश्चयः

dṛṣṭvā tāmasitāpāṅgīṁ vismitaḥ sa mahīpatiḥ asyā dehasya gandho'yamiti sañjātaniścayaḥ

उस काले नेत्रों वाली को देखकर वह राजा विस्मित हो गया, और उसे निश्चय हो गया कि यह सुगंध इसी स्त्री के शरीर से आ रही है।

श्लोक 13 (devibhagavatam.2.5.13)

तदद्भुतं रूपमतीव सुन्दरं । तथैव गन्धोऽखिललोकसम्मतः । वयश्च तादृङ् नवयौवनं शुभं । दृष्ट्वैव राजा किल विस्मितोऽभवत्

tadadbhutaṁ rūpamatīva sundaraṁ tathaiva gandho'khilalokasammataḥ vayaśca tādṛṅ navayauvanaṁ śubhaṁ dṛṣṭvaiva rājā kila vismito'bhavat

वह अद्भुत, अत्यंत सुंदर रूप, और सर्वलोक-सम्मत वह सुगंध, तथा नित्य-नूतन यौवन जैसी उसकी अवस्था — यह सब देखकर ही राजा विस्मित हो गया।

श्लोक 14 (devibhagavatam.2.5.14)

केयं कुतो वा समुपागताधुना । देवाङ्गना वा किमु मानुषी वा । गन्धर्वपुत्री किल नागकन्या । जाने कथं गन्धवतीं नु कामिनीम्

keyaṁ kuto vā samupāgatādhunā devāṅganā vā kimu mānuṣī vā gandharvaputrī kila nāgakanyā jāne kathaṁ gandhavatīṁ nu kāminīm

'यह कौन है, और अभी कहाँ से आई है? क्या यह देवांगना है, या मनुष्य-स्त्री? या गंधर्व की पुत्री, या नागकन्या — मैं कैसे जानूँ इस सुगंधवती कामिनी को?'

श्लोक 15 (devibhagavatam.2.5.15)

सञ्चिन्त्य चैवं मनसा नृपोऽसौ । न निश्चयं प्राप यदा ततः स्वयम् । गङ्गां स्मरन्कामवशं गतोऽथ । पप्रच्छ कान्तां तटसंस्थितां च

sañcintya caivaṁ manasā nṛpo'sau na niścayaṁ prāpa yadā tataḥ svayam gaṅgāṁ smarankāmavaśaṁ gato'tha papraccha kāntāṁ taṭasaṁsthitāṁ ca

इस प्रकार मन में विचार करते हुए भी जब राजा को कोई निश्चय नहीं हुआ, तब गंगा का स्मरण करते हुए और काम के वश में होकर उसने उस तट पर खड़ी उस सुंदरी से पूछा।

श्लोक 16 (devibhagavatam.2.5.16)

कासि प्रिये कस्य सुतासि कस्मा- । दिह स्थिता त्वं विजने वरोरु । एकाकिनी किं वद चारुनेत्रे । विवाहिता वा न विवाहितासि

kāsi priye kasya sutāsi kasmā- diha sthitā tvaṁ vijane varoru ekākinī kiṁ vada cārunetre vivāhitā vā na vivāhitāsi

'हे प्रिये! तुम कौन हो, किसकी पुत्री हो, हे वरोरु! और यहाँ इस सुनसान स्थान में अकेली क्यों खड़ी हो, हे सुंदर नेत्रों वाली? बताओ, क्या तुम विवाहित हो या अविवाहित?

श्लोक 17 (devibhagavatam.2.5.17)

सञ्जातकामोऽहमरालनेत्रे । त्वां वीक्ष्य कान्तां च मनोरमां च । ब्रूहि प्रिये यासि चिकीर्षसि त्वं । किं चेति सर्वं मम विस्तरेण

sañjātakāmo'hamarālanetre tvāṁ vīkṣya kāntāṁ ca manoramāṁ ca brūhi priye yāsi cikīrṣasi tvaṁ kiṁ ceti sarvaṁ mama vistareṇa

हे कमल-नेत्री! तुम्हें, ऐसी मनोहर और प्रिय स्त्री को देखकर मुझमें कामना जाग उठी है। हे प्रिये! बताओ, तुम कहाँ जाती हो, क्या करना चाहती हो — मुझे सब कुछ विस्तार से कहो।'

श्लोक 18 (devibhagavatam.2.5.18)

इत्येवमुक्ता सुदती नृपेण । प्रोवाच तं सस्मितमम्बुजेक्षणा । दाशस्य पुत्रीं त्वमवेहि राजन् । कन्यां पितुः शासनसंस्थितां च

ityevamuktā sudatī nṛpeṇa provāca taṁ sasmitamambujekṣaṇā dāśasya putrīṁ tvamavehi rājan kanyāṁ pituḥ śāsanasaṁsthitāṁ ca

राजा द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर, सुंदर दाँतों वाली, कमल-नेत्री उस स्त्री ने मुस्कुराते हुए उससे कहा — 'हे राजन्! मुझे मछुए की पुत्री जानिए, अपने पिता की आज्ञा में रहने वाली कन्या।

श्लोक 19 (devibhagavatam.2.5.19)

तरीमिमां धर्मनिमित्तमेव । संवाहयामीह जले नृपेन्द्र । पिता गृहे मेऽद्य गतोऽस्ति कामं । सत्यं ब्रवीम्यर्थपते तवाग्रे

tarīmimāṁ dharmanimittameva saṁvāhayāmīha jale nṛpendra pitā gṛhe me'dya gato'sti kāmaṁ satyaṁ bravīmyarthapate tavāgre

हे नृपेन्द्र! मैं धर्म-कार्य के लिए ही इस जल में इस नौका को खेती हूँ। मेरे पिता आज इच्छानुसार घर गए हुए हैं — हे स्वामी! मैं आपके सामने सत्य ही कहती हूँ।'

श्लोक 20 (devibhagavatam.2.5.20)

इत्येवमुक्त्वा विरराम बाला । कामातुरस्तां नृपतिर्बभाषे । कुरुप्रवीरं कुरु मां पतिं त्वं । वृथा न गच्छेन्ननु यौवनं ते

ityevamuktvā virarāma bālā kāmāturastāṁ nṛpatirbabhāṣe kurupravīraṁ kuru māṁ patiṁ tvaṁ vṛthā na gacchennanu yauvanaṁ te

ऐसा कहकर वह बाला चुप हो गई। काम से पीड़ित राजा ने उससे कहा — 'तुम कुरु के इस श्रेष्ठ वीर को अपना पति बना लो; तुम्हारा यह यौवन व्यर्थ नहीं जाना चाहिए।

श्लोक 21 (devibhagavatam.2.5.21)

न चास्ति पत्नी मम वै द्वितीया । त्वं धर्मपत्नी भव मे मृगाक्षि । दासोऽस्मि तेऽहं वशगः सदैव । मनोभवस्तापयति प्रिये माम्

na cāsti patnī mama vai dvitīyā tvaṁ dharmapatnī bhava me mṛgākṣi dāso'smi te'haṁ vaśagaḥ sadaiva manobhavastāpayati priye mām

मेरी कोई दूसरी पत्नी नहीं है। हे मृगनयनी! तुम मेरी धर्मपत्नी बन जाओ। मैं तुम्हारा दास हूँ, सदा तुम्हारे वश में रहूँगा; हे प्रिये! कामदेव मुझे संतप्त कर रहा है।

श्लोक 22 (devibhagavatam.2.5.22)

गता प्रिया मां परिहृत्य कान्ता । नान्या वृताहं विधुरोऽस्मि कान्ते । त्वां वीक्ष्य सर्वावयवातिरम्यां । मनो हि जातं विवशं मदीयम्

gatā priyā māṁ parihṛtya kāntā nānyā vṛtāhaṁ vidhuro'smi kānte tvāṁ vīkṣya sarvāvayavātiramyāṁ mano hi jātaṁ vivaśaṁ madīyam

मेरी प्रिया मुझे त्यागकर चली गई है, मैंने दूसरी किसी को वरण नहीं किया, मैं विधुर हूँ, हे प्रिये! तुम्हें, सर्वांग-सुंदर, देखकर ही मेरा यह मन विवश हो गया है।'

श्लोक 23 (devibhagavatam.2.5.23)

श्रुत्वामृतास्वादरसं नृपस्य । वचोऽतिरम्यं खलु दाशकन्या । उवाच तं सात्त्विकभावयुक्ता । कृत्वातिधैर्यं नृपतिं सुगन्धा

śrutvāmṛtāsvādarasaṁ nṛpasya vaco'tiramyaṁ khalu dāśakanyā uvāca taṁ sāttvikabhāvayuktā kṛtvātidhairyaṁ nṛpatiṁ sugandhā

राजा की उस अमृत-सी मधुर, अत्यंत रम्य वाणी को सुनकर, वह सुगंधित मछुए की कन्या, सात्त्विक भाव से युक्त होकर, अत्यंत धैर्य धारण करती हुई राजा से बोली।

श्लोक 24 (devibhagavatam.2.5.24)

यदात्थ राजन् मयि तत्तथैव । मन्येऽहमेतत्तु यथा वचस्ते । नास्मि स्वतन्त्रा त्वमवेहि कामं । दाता पिता मेऽर्थय तं त्वमाशु

yadāttha rājan mayi tattathaiva manye'hametattu yathā vacaste nāsmi svatantrā tvamavehi kāmaṁ dātā pitā me'rthaya taṁ tvamāśu

'हे राजन्! आपने मुझसे जो कहा है, मैं उसे वैसा ही मानती हूँ। परन्तु मैं स्वतंत्र नहीं हूँ, इसे आप समझ लें, हे स्वामी! मेरे पिता ही मुझे देने वाले हैं — आप शीघ्र उनसे ही याचना कीजिए।

श्लोक 25 (devibhagavatam.2.5.25)

न स्वैरिणीहास्म्यपि दाशपुत्री । पितुर्वशेऽहं सततं चरामि । स चेद्ददाति प्रथितः पिता मे । गृहाण पाणिं वशगास्मि तेऽहम्

na svairiṇīhāsmyapi dāśaputrī piturvaśe'haṁ satataṁ carāmi sa ceddadāti prathitaḥ pitā me gṛhāṇa pāṇiṁ vaśagāsmi te'ham

मैं यहाँ स्वच्छन्द नहीं हूँ, यद्यपि मैं मछुए की पुत्री हूँ; मैं सदा अपने पिता की ही आज्ञा में रहती हूँ। यदि विख्यात मेरे पिता मुझे दें, तो मेरा पाणिग्रहण कीजिए — मैं आपके वश में ही हूँ।

श्लोक 26 (devibhagavatam.2.5.26)

मनोभवस्त्वां नृप किं दुनोति । यथा पुनर्मां नवयौवनां च । दुनोति तत्रापि हि रक्षणीया । धृतिः कुलाचारपरम्परासु

manobhavastvāṁ nṛpa kiṁ dunoti yathā punarmāṁ navayauvanāṁ ca dunoti tatrāpi hi rakṣaṇīyā dhṛtiḥ kulācāraparamparāsu

हे राजन्! कामदेव आपको जैसे संतप्त करता है, वैसे ही यह मुझ नवयौवना को भी सताता है; फिर भी वहाँ कुल के आचार-परम्परा में स्थित धैर्य की ही रक्षा करनी चाहिए।'

श्लोक 27 (devibhagavatam.2.5.27)

सूत उवाच । इत्याकर्ण्य वचस्तस्या नृपति काममोहितः । गतो दाशपतेर्गेहं तस्या याचनहेतवे

sūta uvāca ityākarṇya vacastasyā nṛpati kāmamohitaḥ gato dāśapatergehaṁ tasyā yācanahetave

सूत जी ने कहा — उसका यह वचन सुनकर काम से मोहित राजा उस मछुए-मुखिया के घर, उससे उसकी पुत्री की याचना करने के लिए गया।

श्लोक 28 (devibhagavatam.2.5.28)

दृष्ट्वा नृपतिमायान्तं दाशोऽतिविस्मयं गतः । प्रणामं नृपतेः कृत्वा कृताञ्जलिरभाषत

dṛṣṭvā nṛpatimāyāntaṁ dāśo'tivismayaṁ gataḥ praṇāmaṁ nṛpateḥ kṛtvā kṛtāñjalirabhāṣata

राजा को आते देखकर वह मछुआ अत्यंत विस्मित हो गया; राजा को प्रणाम करके, हाथ जोड़कर वह बोला।

श्लोक 29 (devibhagavatam.2.5.29)

दाश उवाच । दासोऽस्मि तव भूपाल कृतार्थोऽहं तवागमे । आज्ञां देहि महाराज यदर्थमिह चागमः

dāśa uvāca dāso'smi tava bhūpāla kṛtārtho'haṁ tavāgame ājñāṁ dehi mahārāja yadarthamiha cāgamaḥ

मछुए ने कहा — 'हे भूपाल! मैं आपका दास हूँ, आपके आगमन से मैं कृतार्थ हुआ। हे महाराज! जिस प्रयोजन से आप यहाँ आए हैं, वह आज्ञा मुझे दीजिए।'

श्लोक 30 (devibhagavatam.2.5.30)

राजोवाच । धर्मपत्नीं करिष्यामि सुतामेतां तवानघ । त्वया चेद्दीयते मह्यं सत्यमेतद्ब्रवीमि ते

rājovāca dharmapatnīṁ kariṣyāmi sutāmetāṁ tavānagha tvayā ceddīyate mahyaṁ satyametadbravīmi te

राजा ने कहा — 'हे निष्पाप! मैं तुम्हारी इस पुत्री को अपनी धर्मपत्नी बनाना चाहता हूँ, यदि तुम मुझे इसे दो; मैं यह सत्य ही तुमसे कहता हूँ।'

श्लोक 31 (devibhagavatam.2.5.31)

दाश उवाच । कन्यारत्नं मदीयं चेद्यत्त्वं प्रार्थयसे नृप । दातव्यं तु प्रदास्यामि न त्वदेयं कदाचन

dāśa uvāca kanyāratnaṁ madīyaṁ cedyattvaṁ prārthayase nṛpa dātavyaṁ tu pradāsyāmi na tvadeyaṁ kadācana

मछुए ने कहा — 'हे राजन्! यदि आप मेरे इस रत्न-समान कन्या की याचना करते हैं, तो मैं इसे अवश्य दे सकता हूँ, परन्तु एक शर्त बिना यह किसी भी दशा में नहीं दी जा सकती।

श्लोक 32 (devibhagavatam.2.5.32)

तस्याः पुत्रो महाराज त्वदन्ते पृथिवीपतिः । सर्वथा चाभिषेक्तव्यो नान्यः पुत्रस्तवेति वै

tasyāḥ putro mahārāja tvadante pṛthivīpatiḥ sarvathā cābhiṣektavyo nānyaḥ putrastaveti vai

हे महाराज! आपके बाद इसका ही पुत्र पृथ्वी का स्वामी अवश्य बनना चाहिए, और उसका राज्याभिषेक ही होना चाहिए — कोई अन्य पुत्र आपका (उत्तराधिकारी) नहीं होना चाहिए।'

श्लोक 33 (devibhagavatam.2.5.33)

सूत उवाच । श्रुत्वावाक्यं तु दाशस्य राजा चिन्तातुरोऽभवत् । गाङ्गेयं मनसा कृत्वा नोवाच नृपतिस्तदा

sūta uvāca śrutvāvākyaṁ tu dāśasya rājā cintāturo'bhavat gāṅgeyaṁ manasā kṛtvā novāca nṛpatistadā

सूत जी ने कहा — मछुए का यह वचन सुनकर राजा चिंतातुर हो उठा; गांगेय (भीष्म) का स्मरण करते हुए राजा उस समय कुछ भी नहीं बोल सका।

श्लोक 34 (devibhagavatam.2.5.34)

कामातुरो गृहं प्राप्तश्चिन्ताविष्टो महीपतिः । न सस्नौ बुभुजे नाथ न सुष्वाप गृहं गतः

kāmāturo gṛhaṁ prāptaścintāviṣṭo mahīpatiḥ na sasnau bubhuje nātha na suṣvāpa gṛhaṁ gataḥ

काम-पीड़ित और चिंता से भरा हुआ राजा घर लौट आया; उसने न स्नान किया, न भोजन किया, न ही घर पहुँचकर नींद ही आई।

श्लोक 35 (devibhagavatam.2.5.35)

चिन्तातुरं तु तं दृष्ट्वा पुत्रो देवव्रतस्तदा । गत्वापृच्छन्महीपालं तदसन्तोषकारणम्

cintāturaṁ tu taṁ dṛṣṭvā putro devavratastadā gatvāpṛcchanmahīpālaṁ tadasantoṣakāraṇam

अपने पिता को चिंताग्रस्त देखकर पुत्र देवव्रत ने जाकर राजा से उस असंतोष का कारण पूछा।

श्लोक 36 (devibhagavatam.2.5.36)

दुर्जयः कोऽस्ति शत्रुस्ते करोमि वशगं तव । का चिन्ता नृपशार्दूल सत्यं वद नृपोत्तम

durjayaḥ ko'sti śatruste karomi vaśagaṁ tava kā cintā nṛpaśārdūla satyaṁ vada nṛpottama

'हे नृपश्रेष्ठ! आपका कौन-सा दुर्जय शत्रु है, जिसे मैं आपके अधीन कर दूँ? हे नृपशार्दूल! आपकी क्या चिंता है, हे नृपोत्तम! सत्य बताइए।

श्लोक 37 (devibhagavatam.2.5.37)

किं तेन जातेन सुतेन राजन् । दुःखं न जानाति न नाशयेद्यः । ऋणं ग्रहीतुं समुपागतोऽसौ । प्राग्जन्मजं नात्र विचारणास्ति

kiṁ tena jātena sutena rājan duḥkhaṁ na jānāti na nāśayedyaḥ ṛṇaṁ grahītuṁ samupāgato'sau prāgjanmajaṁ nātra vicāraṇāsti

हे राजन्! उस जन्मे हुए पुत्र से क्या लाभ जो अपने पिता के दुःख को न जाने और उसे दूर न कर सके? यह पुत्र तो (पिता के) पूर्वजन्म के ऋण को चुकाने ही आया है, इसमें कोई विचार नहीं।

श्लोक 38 (devibhagavatam.2.5.38)

विमुच्य राज्यं रघुनन्दनोऽपि । ताताज्ञया दाशरथिस्तु रामः । वनं गतो लक्ष्मणजानकीभ्यां । सहैव शैलं किल चित्रकूटम्

vimucya rājyaṁ raghunandano'pi tātājñayā dāśarathistu rāmaḥ vanaṁ gato lakṣmaṇajānakībhyāṁ sahaiva śailaṁ kila citrakūṭam

रघुकुल के आनंददाता राम, दशरथ के पुत्र, अपने पिता की आज्ञा से राज्य का त्याग करके लक्ष्मण और जानकी के साथ चित्रकूट पर्वत के वन को चले गए थे।

श्लोक 39 (devibhagavatam.2.5.39)

सुतो हरिश्चन्द्रनृपस्य राजन् । यो रोहितश्चेति प्रसिद्धनामा । क्रीतोऽथ पित्रा विपणोद्यतश्च । दासार्पितो विप्रगृहे तु नूनम्

suto hariścandranṛpasya rājan yo rohitaśceti prasiddhanāmā krīto'tha pitrā vipaṇodyataśca dāsārpito vipragṛhe tu nūnam

हे राजन्! राजा हरिश्चन्द्र का पुत्र, जिसका प्रसिद्ध नाम रोहित था, अपने ही पिता द्वारा बेचने के लिए तत्पर होकर बेचा गया और एक ब्राह्मण के घर दास रूप में सौंप दिया गया।

श्लोक 40 (devibhagavatam.2.5.40)

तथाजिगर्तस्य सुतो वरिष्ठो । नाम्ना शुनःशेप इति प्रसिद्धः । क्रीतस्तु पित्राप्यथ यूपबद्धः । सम्मोचितो गाधिसुतेन पश्चात्

tathājigartasya suto variṣṭho nāmnā śunaḥśepa iti prasiddhaḥ krītastu pitrāpyatha yūpabaddhaḥ sammocito gādhisutena paścāt

उसी प्रकार अजीगर्त के श्रेष्ठ पुत्र, जो शुनःशेप नाम से प्रसिद्ध था, उसे भी उसके पिता ने बेच दिया और यज्ञ-स्तंभ से बाँध दिया गया; बाद में गाधि-पुत्र (विश्वामित्र) द्वारा वह मुक्त किया गया।

श्लोक 41 (devibhagavatam.2.5.41)

पित्राज्ञया जामदग्न्येन पूर्वं । छिन्नं शिरो मातुरिति प्रसिद्धम् । अकार्यमप्याचरितं च तेन । गुरोरनुज्ञा च गरीयसी कृता

pitrājñayā jāmadagnyena pūrvaṁ chinnaṁ śiro māturiti prasiddham akāryamapyācaritaṁ ca tena guroranujñā ca garīyasī kṛtā

पूर्वकाल में जामदग्न्य (परशुराम) ने अपने पिता की आज्ञा से अपनी माता का सिर काट डाला — यह प्रसिद्ध ही है। एक असम्भव कार्य होते हुए भी उसने उसे किया, क्योंकि गुरु (पिता) की आज्ञा ही सबसे भारी मानी गई है।

श्लोक 42 (devibhagavatam.2.5.42)

इदं शरीरं तव भूपते न । क्षमोऽस्मि नूनं वद किं करोम्यहम् । न शोचनीयं मयि वर्तमाने- । ऽप्यसाध्यमर्थं प्रतिपादयाम्यदः

idaṁ śarīraṁ tava bhūpate na kṣamo'smi nūnaṁ vada kiṁ karomyaham na śocanīyaṁ mayi vartamāne- 'pyasādhyamarthaṁ pratipādayāmyadaḥ

हे भूपते! यह शरीर आपका है ही; मैं इसमें असमर्थ नहीं हूँ — कहिए, मैं क्या करूँ? मेरे रहते हुए आपको शोक करने की आवश्यकता नहीं है — असाध्य कार्य को भी मैं सिद्ध कर दूँगा।

श्लोक 43 (devibhagavatam.2.5.43)

प्रब्रूहि राजंस्तव कास्ति चिन्ता । निवारयाम्यद्य धनुर्गृहीत्वा । देहेन मे चेच्चरितार्थता वा । भवत्वमोघा भवतश्चिकीर्षा

prabrūhi rājaṁstava kāsti cintā nivārayāmyadya dhanurgṛhītvā dehena me ceccaritārthatā vā bhavatvamoghā bhavataścikīrṣā

हे राजन्! बताइए, आपकी क्या चिंता है — मैं आज ही धनुष उठाकर उसे दूर कर दूँगा। यदि मेरे इस शरीर से आपका प्रयोजन सिद्ध हो सके, तो आपकी इच्छा अवश्य पूर्ण हो, यह अमोघ हो।

श्लोक 44 (devibhagavatam.2.5.44)

धिक् तं सुतं यः पितुरीप्सितार्थं । क्षमोऽपि सन्न प्रतिपादयेद्यः । जातेन किं तेन सुतेन कामं । पितुर्न चिन्तां हि समुद्धरेद्यः

dhik taṁ sutaṁ yaḥ piturīpsitārthaṁ kṣamo'pi sanna pratipādayedyaḥ jātena kiṁ tena sutena kāmaṁ piturna cintāṁ hi samuddharedyaḥ

धिक्कार है उस पुत्र को, जो समर्थ होते हुए भी अपने पिता के इच्छित कार्य को पूर्ण न करे। ऐसे जन्मे हुए पुत्र से क्या लाभ, जो अपने पिता की चिंता को दूर न कर सके?'

श्लोक 45 (devibhagavatam.2.5.45)

सूत उवाच । निशम्येति वचस्तस्य पुत्रस्य शन्तनुर्नृपः । लज्जमानस्तु मनसा तमाह त्वरितं सुतम्

sūta uvāca niśamyeti vacastasya putrasya śantanurnṛpaḥ lajjamānastu manasā tamāha tvaritaṁ sutam

सूत जी ने कहा — अपने पुत्र के इस वचन को सुनकर राजा शन्तनु मन में लज्जित होकर, अपने पुत्र से शीघ्रता से यह बोले।

श्लोक 46 (devibhagavatam.2.5.46)

राजोवाच । चिन्ता मे महती पुत्र यस्त्वमेकोऽसि मे सुतः । शूरोऽतिबलवान्मानी संग्रामेष्वपराङ्मुखः

rājovāca cintā me mahatī putra yastvameko'si me sutaḥ śūro'tibalavānmānī saṁgrāmeṣvaparāṅmukhaḥ

राजा ने कहा — 'हे पुत्र! मेरी बड़ी चिंता यही है कि तू ही मेरा एकमात्र पुत्र है — शूरवीर, अत्यंत बलवान्, स्वाभिमानी और युद्धों में कभी पीठ न दिखाने वाला।

श्लोक 47 (devibhagavatam.2.5.47)

एकापत्यस्य मे तात वृथेदं जीवितं किल । मृते त्वयि मृधे क्वापि किं करोमि निराश्रयः

ekāpatyasya me tāta vṛthedaṁ jīvitaṁ kila mṛte tvayi mṛdhe kvāpi kiṁ karomi nirāśrayaḥ

हे तात! एक ही संतान होने पर मेरा यह जीवन व्यर्थ ही जान पड़ता है। यदि युद्ध में कहीं तेरी मृत्यु हो जाए, तो मैं आश्रयहीन होकर क्या करूँगा?

श्लोक 48 (devibhagavatam.2.5.48)

एषा मे महती चिन्ता तेनाद्य दुःखितोऽत्म्यहम् । नान्या चिन्तास्ति मे पुत्र यां तवाग्रे वदाम्यहम्

eṣā me mahatī cintā tenādya duḥkhito'tmyaham nānyā cintāsti me putra yāṁ tavāgre vadāmyaham

यही मेरी बड़ी चिंता है, हे पुत्र! इसी से आज मैं दुःखी हूँ। मेरी और कोई चिंता नहीं है जो मैं तेरे सामने कहूँ।'

श्लोक 49 (devibhagavatam.2.5.49)

सूत उवाच । तदाकर्ण्याथ गाङ्गेयो मन्त्रिवृद्धानपृच्छत । न मां वदति भूपालो लज्जयाद्य परिप्लुतः

sūta uvāca tadākarṇyātha gāṅgeyo mantrivṛddhānapṛcchata na māṁ vadati bhūpālo lajjayādya pariplutaḥ

सूत जी ने कहा — यह सुनकर गांगेय ने वृद्ध मंत्रियों से पूछा — 'राजा आज लज्जा में डूबकर मुझसे कुछ नहीं कहते।

श्लोक 50 (devibhagavatam.2.5.50)

वित्त वार्तां नृपस्याद्य पृष्ट्वा यूयं विनिश्चयात् । सत्यं ब्रुवन्तु मां सर्वं तत्करोमि निराकुलः

vitta vārtāṁ nṛpasyādya pṛṣṭvā yūyaṁ viniścayāt satyaṁ bruvantu māṁ sarvaṁ tatkaromi nirākulaḥ

आप सब जाकर राजा की सच्ची बात जानिए और निश्चय करके मुझे सब कुछ सत्य ही बताइए; मैं उसे बिना किसी व्याकुलता के पूर्ण करूँगा।'

श्लोक 51 (devibhagavatam.2.5.51)

तच्छ्रुत्वा ते नृपं गत्वा संविज्ञाय च कारणम् । शशंसुर्विदितार्थस्तु गाङ्गेयस्तदचिन्तयत्

tacchrutvā te nṛpaṁ gatvā saṁvijñāya ca kāraṇam śaśaṁsurviditārthastu gāṅgeyastadacintayat

यह सुनकर वे मंत्री राजा के पास जाकर उस कारण को भली-भाँति जानकर, वृत्तांत को समझकर, गांगेय को उसकी सूचना दे आए; तब गांगेय ने उस पर विचार किया।

श्लोक 52 (devibhagavatam.2.5.52)

सहितस्तैर्जगामाशु दाशस्य सदनं तदा । प्रेमपूर्वमुवाचेदं विनम्रो जाह्नवीसुतः

sahitastairjagāmāśu dāśasya sadanaṁ tadā premapūrvamuvācedaṁ vinamro jāhnavīsutaḥ

उनके साथ वह शीघ्र ही मछुए के घर गया; वहाँ जाह्नवी-पुत्र ने विनम्र होकर प्रेमपूर्वक यह वचन कहा।

श्लोक 53 (devibhagavatam.2.5.53)

गाङ्गेय उवाच । पित्रे देहि सुतां तेऽद्य प्रार्थयामि सुमध्यमाम् । माता मेऽस्तु सुतेयं ते दासोऽत्म्यस्याः परन्तप

gāṅgeya uvāca pitre dehi sutāṁ te'dya prārthayāmi sumadhyamām mātā me'stu suteyaṁ te dāso'tmyasyāḥ parantapa

गांगेय ने कहा — 'हे पिता! अपनी उस सुमध्यमा पुत्री को आज (मेरे पिता को) दे दीजिए, मैं यही याचना करता हूँ। वह मेरी माता बने; हे परन्तप! मैं इसका दास हूँ।'

श्लोक 54 (devibhagavatam.2.5.54)

दाश उवाच । त्वं गृहाण महाभाग पत्नीं कुरु नृपात्मज । पुत्रोऽस्या न भवेद्राजा वर्तमाने त्वयीति वै

dāśa uvāca tvaṁ gṛhāṇa mahābhāga patnīṁ kuru nṛpātmaja putro'syā na bhavedrājā vartamāne tvayīti vai

मछुए ने कहा — 'हे महाभाग! हे राजकुमार! आप ही इसे ग्रहण कीजिए और इसे अपनी पत्नी बना लीजिए। आपके रहते हुए इसका पुत्र राजा नहीं बन सकेगा।'

श्लोक 55 (devibhagavatam.2.5.55)

गाङ्गेय उवाच । मातेयं मम दाशेयी राज्यं नैव करोम्यहम् । पुत्रोऽस्याः सर्वथा राज्यं करिष्यति न संशयः

gāṅgeya uvāca māteyaṁ mama dāśeyī rājyaṁ naiva karomyaham putro'syāḥ sarvathā rājyaṁ kariṣyati na saṁśayaḥ

गांगेय ने कहा — 'यह मेरी माता होगी, मैं राज्य कभी ग्रहण नहीं करूँगा। इसका पुत्र ही अवश्य राज्य करेगा, इसमें कोई संशय नहीं।'

श्लोक 56 (devibhagavatam.2.5.56)

दाश उवाच । सत्यं वाक्यं मया ज्ञातं पुत्रस्ते बलवान्भवेत् । सोऽपि राज्यं बलान्नूनं गृह्णीयादिति निश्चयः

dāśa uvāca satyaṁ vākyaṁ mayā jñātaṁ putraste balavānbhavet so'pi rājyaṁ balānnūnaṁ gṛhṇīyāditi niścayaḥ

मछुए ने कहा — 'मैं समझ गया कि आपकी बात सत्य है, कि आपका पुत्र भी अवश्य बलवान् होगा; वह भी अपने बल से निश्चय ही यह राज्य छीन ले सकता है — यह भी निश्चित है।'

श्लोक 57 (devibhagavatam.2.5.57)

गाङ्गेय उवाच । न दारसंग्रहं नूनं करिष्यामि हि सर्वथा । सत्यं मे वचनं तात मया भीष्मं व्रतं कृतम्

gāṅgeya uvāca na dārasaṁgrahaṁ nūnaṁ kariṣyāmi hi sarvathā satyaṁ me vacanaṁ tāta mayā bhīṣmaṁ vrataṁ kṛtam

गांगेय ने कहा — 'हे तात! मैं सर्वथा और सदा के लिए विवाह कभी नहीं करूँगा — यह मेरा सत्य वचन है। मैंने यह भीषण व्रत धारण किया है।'

श्लोक 58 (devibhagavatam.2.5.58)

सूत उवाच । एवं कृतां प्रतिज्ञां तु निशम्य झषजीवकः । ददौ सत्यवतीं तस्मै राज्ञे सर्वाङ्गशोभनाम्

sūta uvāca evaṁ kṛtāṁ pratijñāṁ tu niśamya jhaṣajīvakaḥ dadau satyavatīṁ tasmai rājñe sarvāṅgaśobhanām

सूत जी ने कहा — इस प्रकार ली गई इस भीषण प्रतिज्ञा को सुनकर उस मछुए ने सर्वांग-सुंदरी सत्यवती को उस राजा को सौंप दिया।

श्लोक 59 (devibhagavatam.2.5.59)

अनेन विधिना तेन वृता सत्यवती प्रिया । न जानाति परं जन्म व्यासस्य नृपसत्तमः

anena vidhinā tena vṛtā satyavatī priyā na jānāti paraṁ janma vyāsasya nṛpasattamaḥ

इस विधि से ही, हे नृपसत्तमो! वह प्रिय सत्यवती वरण की गई; परन्तु उसका व्यास से हुआ पहला जन्म (पूर्वजन्म का पुत्र व्यास) उसे ज्ञात नहीं था (अर्थात् राजा को उस पूर्व-संतान का ज्ञान नहीं था)।

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