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तृतीय स्कन्ध · अध्याय 14

युधाजित-वीरसेन युद्धार्थ सज्जीभवन

अध्याय 13अध्याय-सूचीअध्याय 15

श्लोक 1 (devibhagavatam.3.14.1)

जनमेजय उवाच । श्रुतो वै हरिणा क्लृप्तो यज्ञो विस्तरतो द्विज । महिमानं तथाम्बाया वद विस्तरतो मम

janamejaya uvāca śruto vai hariṇā klṛpto yajño vistarato dvija mahimānaṁ tathāmbāyā vada vistarato mama

जनमेजय ने कहा — हे द्विज! हरि द्वारा किया गया यज्ञ मैंने विस्तार से सुन लिया; अब अम्बा की महिमा भी मुझे विस्तार से बताइए।

श्लोक 2 (devibhagavatam.3.14.2)

श्रुत्वा देव्याश्चरित्रं वै कुर्वे मखमनुत्तमम् । प्रसादात्तव विप्रेन्द्र भविष्यामि च पावनः

śrutvā devyāścaritraṁ vai kurve makhamanuttamam prasādāttava viprendra bhaviṣyāmi ca pāvanaḥ

देवी के चरित्र को सुनकर मैं वह सर्वश्रेष्ठ यज्ञ करूँगा; हे विप्रेन्द्र! आपकी कृपा से मैं पवित्र हो जाऊँगा।'

श्लोक 3 (devibhagavatam.3.14.3)

व्यास उवाच । शृणु राजन्प्रवक्ष्यामि देव्याश्चरितमुत्तमम् । इतिहासं पुराणञ्च कथयामि सुविस्तरम्

vyāsa uvāca śṛṇu rājanpravakṣyāmi devyāścaritamuttamam itihāsaṁ purāṇañca kathayāmi suvistaram

व्यास जी ने कहा — हे राजन्! सुनो, मैं देवी का यह उत्तम चरित्र बताता हूँ; यह इतिहास और पुराण-कथा मैं तुम्हें विस्तार से सुनाता हूँ।

श्लोक 4 (devibhagavatam.3.14.4)

कोसलेषु नृपश्रेष्ठः सूर्यवंशसमुद्भवः । पुष्यपुत्रो महातेजा ध्रुवसन्धिरिति स्मृतः

kosaleṣu nṛpaśreṣṭhaḥ sūryavaṁśasamudbhavaḥ puṣyaputro mahātejā dhruvasandhiriti smṛtaḥ

कोसल देश में सूर्यवंश में उत्पन्न, पुष्य के पुत्र, महातेजस्वी ध्रुवसन्धि नामक श्रेष्ठ राजा थे।

श्लोक 5 (devibhagavatam.3.14.5)

धर्मात्मा सत्यसन्धश्च वर्णाश्रमहिते रतः । अयोध्यायां समृद्धायां राज्यं चक्रे शुचिव्रतः

dharmātmā satyasandhaśca varṇāśramahite rataḥ ayodhyāyāṁ samṛddhāyāṁ rājyaṁ cakre śucivrataḥ

वे धर्मात्मा, सत्यप्रतिज्ञ तथा वर्णाश्रम-हित में रत, पवित्र व्रत वाले, समृद्ध अयोध्या में राज्य करते थे।

श्लोक 6 (devibhagavatam.3.14.6)

ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चान्ये तथा द्विजाः । स्वां स्वां वृत्तिं समास्थाय तद्राज्ये धर्मतोऽभवन्

brāhmaṇāḥ kṣatriyā vaiśyāḥ śūdrāścānye tathā dvijāḥ svāṁ svāṁ vṛttiṁ samāsthāya tadrājye dharmato'bhavan

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा अन्य द्विजजन भी अपने-अपने कर्तव्य में स्थित होकर उस राज्य में धर्मपूर्वक रहते थे।

श्लोक 7 (devibhagavatam.3.14.7)

न चौराः पिशुना धूर्तास्तस्य राज्ये च कुत्रचित् । दम्भाः कृतघ्ना मूर्खाश्च वसन्ति किल मानवाः

na caurāḥ piśunā dhūrtāstasya rājye ca kutracit dambhāḥ kṛtaghnā mūrkhāśca vasanti kila mānavāḥ

उनके राज्य में कहीं भी चोर, चुगलखोर, धूर्त, पाखण्डी, कृतघ्न अथवा मूर्ख मनुष्य निवास नहीं करते थे।

श्लोक 8 (devibhagavatam.3.14.8)

एवं वै वर्तमानस्य नृपस्य कुरुसत्तम । द्वे पत्न्यौ रूपसम्पन्ने ह्यासतुः कामभोगदे

evaṁ vai vartamānasya nṛpasya kurusattama dve patnyau rūpasampanne hyāsatuḥ kāmabhogade

हे कुरुसत्तम! इस प्रकार राज्य करते हुए उस राजा की दो रूपवती, कामभोग देने वाली पत्नियाँ थीं।

श्लोक 9 (devibhagavatam.3.14.9)

मनोरमा धर्मपत्नी सुरूपाऽतिविचक्षणा । लीलावती द्वितीया च साऽपि रूपगुणान्विता

manoramā dharmapatnī surūpā'tivicakṣaṇā līlāvatī dvitīyā ca sā'pi rūpaguṇānvitā

मनोरमा उनकी धर्मपत्नी थीं, अत्यन्त सुन्दर और विदुषी; लीलावती दूसरी पत्नी थीं, वे भी रूप और गुणों से युक्त थीं।

श्लोक 10 (devibhagavatam.3.14.10)

विजहार सपत्नीभ्यां गृहेषूपवनेषु च । क्रीडागिरौ दीर्घिकासु सौधेषु विविधेषु च

vijahāra sapatnībhyāṁ gṛheṣūpavaneṣu ca krīḍāgirau dīrghikāsu saudheṣu vividheṣu ca

वे दोनों पत्नियों के साथ महलों, उपवनों, क्रीड़ा-पर्वतों, दीर्घिकाओं तथा विभिन्न भवनों में विहार करते थे।

श्लोक 11 (devibhagavatam.3.14.11)

मनोरमा शुभे काले सुषुवे पुत्रमुत्तमम् । सुदर्शनाभिधं पुत्रं राजलक्षणसंयुतम्

manoramā śubhe kāle suṣuve putramuttamam sudarśanābhidhaṁ putraṁ rājalakṣaṇasaṁyutam

मनोरमा ने शुभ समय में एक उत्तम पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम सुदर्शन था, जो राजसी लक्षणों से युक्त था।

श्लोक 12 (devibhagavatam.3.14.12)

लीलावत्यपि तत्पत्नी मासेनैकेन भामिनी । सुषुवे सुन्दरं पुत्रं शुभे पक्षे दिने तथा

līlāvatyapi tatpatnī māsenaikena bhāminī suṣuve sundaraṁ putraṁ śubhe pakṣe dine tathā

उनकी पत्नी लीलावती ने भी एक महीने बाद, शुभ पक्ष में एक शुभ दिन एक सुन्दर पुत्र को जन्म दिया।

श्लोक 13 (devibhagavatam.3.14.13)

चकार नृपतिस्तत्र जातकर्मादिकं द्वयोः । ददौ दानानि विप्रेभ्यः पुत्रजन्मप्रमोदितः

cakāra nṛpatistatra jātakarmādikaṁ dvayoḥ dadau dānāni viprebhyaḥ putrajanmapramoditaḥ

राजा ने दोनों के जातकर्म आदि संस्कार किए; पुत्रों के जन्म से प्रसन्न होकर उन्होंने ब्राह्मणों को दान दिए।

श्लोक 14 (devibhagavatam.3.14.14)

प्रीतिं तयोः समां राजा चकार सुतयोर्नृप । नृपश्चकार सौहार्देष्वन्तरं न कदाचन

prītiṁ tayoḥ samāṁ rājā cakāra sutayornṛpa nṛpaścakāra sauhārdeṣvantaraṁ na kadācana

हे राजन्! राजा ने दोनों पुत्रों के प्रति समान प्रेम रखा; उन्होंने स्नेह में कभी कोई अन्तर नहीं किया।

श्लोक 15 (devibhagavatam.3.14.15)

चूडाकर्म तयोश्चक्रे विधिना नृपसत्तमः । यथाविभवमेवासौ प्रीतियुक्तः परन्तपः

cūḍākarma tayoścakre vidhinā nṛpasattamaḥ yathāvibhavamevāsau prītiyuktaḥ parantapaḥ

उस श्रेष्ठ, परन्तप राजा ने विधिपूर्वक और अपनी सम्पत्ति के अनुसार दोनों का चूड़ाकरण-संस्कार प्रेमपूर्वक किया।

श्लोक 16 (devibhagavatam.3.14.16)

कृतचूडौ सुतौ कामं जह्रतुर्नृपतेर्मनः । क्रीडमानावुभौ कान्तौ लोकानामनुरञ्जकौ

kṛtacūḍau sutau kāmaṁ jahraturnṛpatermanaḥ krīḍamānāvubhau kāntau lokānāmanurañjakau

चूड़ाकरण किए गए दोनों पुत्र राजा के मन को अत्यन्त हर लेते थे; दोनों सुन्दर, क्रीड़ा करते हुए लोगों को प्रसन्न करते थे।

श्लोक 17 (devibhagavatam.3.14.17)

तयोः सुदर्शनो ज्येष्ठो लीलावत्याः सुतः शुभः । शत्रुजित्संज्ञकः कामं चाटुवाक्यो बभूव ह

tayoḥ sudarśano jyeṣṭho līlāvatyāḥ sutaḥ śubhaḥ śatrujitsaṁjñakaḥ kāmaṁ cāṭuvākyo babhūva ha

उनमें सुदर्शन ज्येष्ठ थे, तथा लीलावती के शुभ पुत्र का नाम शत्रुजित् था, जो अत्यन्त चाटुकार वचन बोलने वाला बन गया।

श्लोक 18 (devibhagavatam.3.14.18)

नृपतेः प्रीतिजनको मञ्जुवाक्चारुदर्शनः । प्रजानां वल्लभः सोऽभूत्तथा मन्त्रिजनस्य वै

nṛpateḥ prītijanako mañjuvākcārudarśanaḥ prajānāṁ vallabhaḥ so'bhūttathā mantrijanasya vai

राजा को प्रसन्न करने वाला, मधुरभाषी, सुन्दर वह प्रजा का तथा मन्त्रियों का भी प्रिय बन गया।

श्लोक 19 (devibhagavatam.3.14.19)

तथा तस्मिन्नृपः प्रीतिञ्चकार गुणयोगतः । मन्दभाग्यान्मन्दभावो न तथा वै सुदर्शने

tathā tasminnṛpaḥ prītiñcakāra guṇayogataḥ mandabhāgyānmandabhāvo na tathā vai sudarśane

इस प्रकार उसके गुणों के कारण राजा उससे प्रेम करने लगे; और अपने दुर्भाग्य के कारण उन्हें सुदर्शन के प्रति उतना स्नेह नहीं रहा।

श्लोक 20 (devibhagavatam.3.14.20)

एवं गच्छति काले तु ध्रुवसन्धिर्नृपोत्तमः । जगाम वनमध्येऽसौ मृगयाभिरतः सदा

evaṁ gacchati kāle tu dhruvasandhirnṛpottamaḥ jagāma vanamadhye'sau mṛgayābhirataḥ sadā

इस प्रकार समय बीतने पर, शिकार में सदा अनुरक्त रहने वाले श्रेष्ठ राजा ध्रुवसन्धि एक बार वन के भीतर चले गए।

श्लोक 21 (devibhagavatam.3.14.21)

निघ्नन्मृगान् रुरून्कम्बून्सूकरान्गवयाञ्छशान् । महिषाञ्छरभान्खड्गांश्चिक्रीड नृपतिर्वने

nighnanmṛgān rurūnkambūnsūkarāngavayāñchaśān mahiṣāñcharabhānkhaḍgāṁścikrīḍa nṛpatirvane

मृग, रुरु, कम्बु, सूअर, गवय, खरगोश, भैंसे, शरभ तथा गैंडों को मारते हुए राजा वन में क्रीड़ा करने लगे।

श्लोक 22 (devibhagavatam.3.14.22)

क्रीडमाने नृपे तत्र वने घोरेऽतिदारुणे । उदतिष्ठन्निकुञ्जात्तु सिंहः परमकोपनः

krīḍamāne nṛpe tatra vane ghore'tidāruṇe udatiṣṭhannikuñjāttu siṁhaḥ paramakopanaḥ

उस घोर, अत्यन्त भयंकर वन में राजा के क्रीड़ा करते समय एक झाड़ी से अत्यन्त क्रोधित सिंह उठ खड़ा हुआ।

श्लोक 23 (devibhagavatam.3.14.23)

राज्ञा शिलीमुखेनादौ विद्धः क्रोधवशं गतः । दृष्ट्वाग्रे नृपतिं सिंहो ननाद मेघनिःस्वनः

rājñā śilīmukhenādau viddhaḥ krodhavaśaṁ gataḥ dṛṣṭvāgre nṛpatiṁ siṁho nanāda meghaniḥsvanaḥ

पहले राजा के बाण से बिंधकर वह क्रोध के वश में आ गया; राजा को सामने देखकर सिंह मेघ के समान गरज उठा।

श्लोक 24 (devibhagavatam.3.14.24)

कृत्वा चोर्ध्वं स लाङ्गूलं प्रसारितबृहत्सटः । हन्तुं नृपतिमाकाशादुत्पपातातिकोपनः

kṛtvā cordhvaṁ sa lāṅgūlaṁ prasāritabṛhatsaṭaḥ hantuṁ nṛpatimākāśādutpapātātikopanaḥ

पूँछ ऊपर उठाकर, विशाल अयाल फैलाकर, अत्यन्त क्रुद्ध होकर वह राजा को मारने के लिए आकाश की ओर उछल पड़ा।

श्लोक 25 (devibhagavatam.3.14.25)

नृपतिस्तरसा वीक्ष्य दधारासिं करे तदा । वामे चर्म समादाय स्थितः सिंह इवापरः

nṛpatistarasā vīkṣya dadhārāsiṁ kare tadā vāme carma samādāya sthitaḥ siṁha ivāparaḥ

राजा ने शीघ्रता से यह देखकर हाथ में तलवार धारण की, और बाएँ हाथ में ढाल लेकर एक दूसरे सिंह के समान खड़े हो गए।

श्लोक 26 (devibhagavatam.3.14.26)

सेवकास्तस्य ये सर्वे तेऽपि बाणान्पृथक्पृथक् । अमुञ्चन्कुपिताः कामं सिंहोपरि रुषान्विताः

sevakāstasya ye sarve te'pi bāṇānpṛthakpṛthak amuñcankupitāḥ kāmaṁ siṁhopari ruṣānvitāḥ

उनके सभी सेवकों ने भी अत्यन्त क्रुद्ध होकर सिंह पर अलग-अलग बाण छोड़े।

श्लोक 27 (devibhagavatam.3.14.27)

हाहाकारो महानासीत्सम्प्रहारश्च दारुणः । उत्पपात ततः सिंहो नृपस्योपरि दारुणः

hāhākāro mahānāsītsamprahāraśca dāruṇaḥ utpapāta tataḥ siṁho nṛpasyopari dāruṇaḥ

बड़ा हाहाकार मच गया और भयंकर संघर्ष हुआ; तब वह भयंकर सिंह राजा के ऊपर टूट पड़ा।

श्लोक 28 (devibhagavatam.3.14.28)

तं पतन्तं समालोक्य खड्गेनाभ्यहनन्नृपः । सोऽपि क्रूरैर्नखाग्रैश्च तत्रागत्य विदारितः

taṁ patantaṁ samālokya khaḍgenābhyahanannṛpaḥ so'pi krūrairnakhāgraiśca tatrāgatya vidāritaḥ

उसे गिरते हुए देखकर राजा ने तलवार से उस पर वार किया; परन्तु सिंह ने भी वहाँ आकर अपने क्रूर नखाग्रों से उन्हें विदीर्ण कर दिया।

श्लोक 29 (devibhagavatam.3.14.29)

स नखैराहतो राजा पपात च ममार वै । चुक्रुशुः सैनिकास्ते तु निर्जघ्नुर्विशिखैस्तदा

sa nakhairāhato rājā papāta ca mamāra vai cukruśuḥ sainikāste tu nirjaghnurviśikhaistadā

नखों से आहत होकर राजा गिर पड़े और मर गए; सैनिकों ने चिल्लाकर तब बाणों से सिंह को मार डाला।

श्लोक 30 (devibhagavatam.3.14.30)

मृतः सिंहोऽपि तत्रैव भूपतिश्च तथा मृतः । सैनिकैर्मन्त्रिमुख्याश्च तत्रागत्य निवेदिताः

mṛtaḥ siṁho'pi tatraiva bhūpatiśca tathā mṛtaḥ sainikairmantrimukhyāśca tatrāgatya niveditāḥ

वहीं सिंह भी मर गया और राजा भी मर गए; सैनिकों ने वहाँ जाकर यह समाचार प्रमुख मन्त्रियों को सुनाया।

श्लोक 31 (devibhagavatam.3.14.31)

परलोकगतं भूपं श्रुत्वा ते मन्त्रिसत्तमाः । संस्कारं कारयामासुर्गत्वा तत्र वनान्तिके

paralokagataṁ bhūpaṁ śrutvā te mantrisattamāḥ saṁskāraṁ kārayāmāsurgatvā tatra vanāntike

राजा को स्वर्गवासी हुआ सुनकर उन श्रेष्ठ मन्त्रियों ने वहाँ जाकर वन के समीप ही उनका अन्त्येष्टि-संस्कार करवाया।

श्लोक 32 (devibhagavatam.3.14.32)

परलोकक्रियां सर्वां वसिष्ठो विधिपूर्वकम् । कारयामास तत्रैव परलोकसुखावहम्

paralokakriyāṁ sarvāṁ vasiṣṭho vidhipūrvakam kārayāmāsa tatraiva paralokasukhāvaham

वसिष्ठ ने वहीं विधिपूर्वक परलोक-सुखदायक समस्त अन्त्येष्टि-क्रियाएँ करवाईं।

श्लोक 33 (devibhagavatam.3.14.33)

प्रजाः प्रकृतयश्चैव वसिष्ठश्च महामुनिः । सुदर्शनं नृपं कर्तुं मन्त्रं चक्रुः परस्परम्

prajāḥ prakṛtayaścaiva vasiṣṭhaśca mahāmuniḥ sudarśanaṁ nṛpaṁ kartuṁ mantraṁ cakruḥ parasparam

प्रजाजन, मन्त्रीगण तथा महामुनि वसिष्ठ ने सुदर्शन को राजा बनाने के विषय में आपस में विचार-विमर्श किया।

श्लोक 34 (devibhagavatam.3.14.34)

धर्मपत्नीसुतः शान्तः पुरुषश्च सुलक्षणः । अयं नृपासनार्हश्च ह्यब्रुवन्मन्त्रिसत्तमाः

dharmapatnīsutaḥ śāntaḥ puruṣaśca sulakṣaṇaḥ ayaṁ nṛpāsanārhaśca hyabruvanmantrisattamāḥ

'यह धर्मपत्नी का पुत्र है, शान्त तथा शुभ लक्षणों वाला पुरुष है — यह राजसिंहासन के योग्य है' — ऐसा श्रेष्ठ मन्त्रियों ने कहा।

श्लोक 35 (devibhagavatam.3.14.35)

वसिष्ठोऽपि तथैवाह योग्योऽयं नृपतेः सुतः । बालोऽपि धर्मवान् राजा नृपासनमिहार्हति

vasiṣṭho'pi tathaivāha yogyo'yaṁ nṛpateḥ sutaḥ bālo'pi dharmavān rājā nṛpāsanamihārhati

वसिष्ठ ने भी वैसा ही कहा — 'राजा का यह पुत्र योग्य है; बालक होते हुए भी यह धर्मवान् है, यह राजसिंहासन के योग्य है।'

श्लोक 36 (devibhagavatam.3.14.36)

कृते मन्त्रे मन्त्रिवृद्धैर्युधाजिन्नाम पार्थिवः । तत्राजगाम तरसा श्रुत्वा तूज्जयिनीपतिः

kṛte mantre mantrivṛddhairyudhājinnāma pārthivaḥ tatrājagāma tarasā śrutvā tūjjayinīpatiḥ

जब वरिष्ठ मन्त्रियों द्वारा यह विचार किया जा रहा था, तभी उज्जयिनी के स्वामी युधाजित् नामक राजा यह सुनकर शीघ्र वहाँ आ पहुँचे —

श्लोक 37 (devibhagavatam.3.14.37)

मृतं जामातरं श्रुत्वा लीलावत्याः पिता तदा । तत्राजगाम त्वरितो दौहित्रप्रियकाम्यया

mṛtaṁ jāmātaraṁ śrutvā līlāvatyāḥ pitā tadā tatrājagāma tvarito dauhitrapriyakāmyayā

वे लीलावती के पिता थे, और अपने दामाद की मृत्यु सुनकर, अपने दौहित्र (नाती) के हित की कामना से शीघ्रता से वहाँ आए।

श्लोक 38 (devibhagavatam.3.14.38)

वीरसेनस्तथाऽऽयातः सुदर्शनहितेच्छया । कलिङ्गाधिपतिश्चैव मनोरमापिता नृपः

vīrasenastathā''yātaḥ sudarśanahitecchayā kaliṅgādhipatiścaiva manoramāpitā nṛpaḥ

वैसे ही सुदर्शन के हित की इच्छा से वीरसेन भी वहाँ आए — वे कलिंग के राजा और मनोरमा के पिता थे।

श्लोक 39 (devibhagavatam.3.14.39)

उभौ तौ सैन्यसंयुक्तौ नृपौ साध्वससंस्थितौ । चक्रतुर्मन्त्रिमुख्यैस्तैर्मन्त्रं राज्यस्य कारणात्

ubhau tau sainyasaṁyuktau nṛpau sādhvasasaṁsthitau cakraturmantrimukhyaistairmantraṁ rājyasya kāraṇāt

सेना सहित वे दोनों राजा चिन्तित होकर वहाँ एकत्र हुए और उन श्रेष्ठ मन्त्रियों के साथ राज्य के विषय में विचार-विमर्श करने लगे।

श्लोक 40 (devibhagavatam.3.14.40)

युधाजित्तु तदाऽपृच्छज्ज्येष्ठः कः सुततोर्द्वयोः । राज्यं प्राप्नोति ज्येष्ठो वै न कनीयान्कदाचन

yudhājittu tadā'pṛcchajjyeṣṭhaḥ kaḥ sutatordvayoḥ rājyaṁ prāpnoti jyeṣṭho vai na kanīyānkadācana

युधाजित् ने तब पूछा — 'दोनों पुत्रों में ज्येष्ठ कौन है? राज्य तो ज्येष्ठ को ही मिलता है, कनिष्ठ को कभी नहीं।'

श्लोक 41 (devibhagavatam.3.14.41)

वीरसेनोऽपि तत्राह धर्मपत्नीसुतः किल । राज्यार्हः स यथा राजन् शास्त्रज्ञेभ्यो मया श्रुतम्

vīraseno'pi tatrāha dharmapatnīsutaḥ kila rājyārhaḥ sa yathā rājan śāstrajñebhyo mayā śrutam

वीरसेन ने भी वहाँ कहा — 'धर्मपत्नी का पुत्र ही राज्य के योग्य है, हे राजन्! मैंने शास्त्रज्ञों से यही सुना है।'

श्लोक 42 (devibhagavatam.3.14.42)

युधाजित्पुनराहेदं ज्येष्ठोऽयं च यथा गुणैः । राजलक्षणसंयुक्तो न तथायं सुदर्शनः

yudhājitpunarāhedaṁ jyeṣṭho'yaṁ ca yathā guṇaiḥ rājalakṣaṇasaṁyukto na tathāyaṁ sudarśanaḥ

युधाजित् ने पुनः कहा — 'यह गुणों में ज्येष्ठ है और राजसी लक्षणों से युक्त है; यह सुदर्शन वैसा नहीं है।'

श्लोक 43 (devibhagavatam.3.14.43)

विवादोऽत्र सुसम्पन्नो नृपयोस्तत्र लुब्धयोः । कः सन्देहमपाकर्तुं क्षमः स्यादतिसङ्कटे

vivādo'tra susampanno nṛpayostatra lubdhayoḥ kaḥ sandehamapākartuṁ kṣamaḥ syādatisaṅkaṭe

वहाँ राज्य-लोभी उन दोनों राजाओं के बीच बड़ा विवाद हो गया; ऐसे अत्यन्त संकट में इस संशय को कौन दूर कर सकता था?

श्लोक 44 (devibhagavatam.3.14.44)

युधाजिन्मन्त्रिणः प्राह यूयं स्वार्थपराः किल । सुदर्शनं नृपं कृत्वा धनं भोक्तुं किलेच्छथ

yudhājinmantriṇaḥ prāha yūyaṁ svārthaparāḥ kila sudarśanaṁ nṛpaṁ kṛtvā dhanaṁ bhoktuṁ kilecchatha

युधाजित् ने मन्त्रियों से कहा — 'तुम सब निश्चय ही स्वार्थपरायण हो; सुदर्शन को राजा बनाकर तुम धन भोगना चाहते हो।

श्लोक 45 (devibhagavatam.3.14.45)

युष्माकं तु विचारोऽयं मया ज्ञातस्तथेङ्गितैः । शत्रुजित्सबलस्तस्मात्सम्मतो वो नृपासने

yuṣmākaṁ tu vicāro'yaṁ mayā jñātastatheṅgitaiḥ śatrujitsabalastasmātsammato vo nṛpāsane

तुम्हारा यह विचार मैंने तुम्हारे हाव-भाव से ही जान लिया है; इसलिए शत्रुजित् बलशाली है, वही राजसिंहासन के लिए तुम्हें मान्य होना चाहिए।

श्लोक 46 (devibhagavatam.3.14.46)

मयि जीवति कः कुर्यात्कनीयांसं नृपं किल । त्यक्त्वा ज्येष्ठं गुणार्हञ्च सेनया च समन्वितम्

mayi jīvati kaḥ kuryātkanīyāṁsaṁ nṛpaṁ kila tyaktvā jyeṣṭhaṁ guṇārhañca senayā ca samanvitam

मेरे जीवित रहते कौन सेना सहित योग्य ज्येष्ठ को त्यागकर कनिष्ठ को राजा बना सकता है?

श्लोक 47 (devibhagavatam.3.14.47)

नूनं युद्धं करिष्यामि तस्मिन्खड्गस्य मेदिनी । धारया च द्विधा भूयाद्युष्माकं तत्र का कथा

nūnaṁ yuddhaṁ kariṣyāmi tasminkhaḍgasya medinī dhārayā ca dvidhā bhūyādyuṣmākaṁ tatra kā kathā

मैं निश्चय ही युद्ध करूँगा; इस विषय में मेरी तलवार की धार से पृथ्वी भी दो भागों में विभक्त हो सकती है — फिर तुम्हारी क्या बात है!'

श्लोक 48 (devibhagavatam.3.14.48)

वीरसेनस्तु तच्छ्रुत्वा युधाजितमभाषत । बालौ द्वौ सदृशप्रज्ञौ को भेदोऽत्र विचक्षण

vīrasenastu tacchrutvā yudhājitamabhāṣata bālau dvau sadṛśaprajñau ko bhedo'tra vicakṣaṇa

यह सुनकर वीरसेन ने युधाजित् से कहा — 'दोनों बालक समान बुद्धि वाले हैं; हे विवेकी! इसमें क्या भेद है?'

श्लोक 49 (devibhagavatam.3.14.49)

एवं विवदमानौ तौ संस्थितौ नृपती तदा । प्रजाश्च ऋषयश्चैव बभूवुर्व्यग्रमानसाः

evaṁ vivadamānau tau saṁsthitau nṛpatī tadā prajāśca ṛṣayaścaiva babhūvurvyagramānasāḥ

इस प्रकार विवाद करते हुए वे दोनों राजा वहाँ स्थित रहे; प्रजाजन और ऋषिगण भी अत्यन्त व्याकुल-चित्त हो गए।

श्लोक 50 (devibhagavatam.3.14.50)

समाजग्मुश्च सामन्ताः ससैन्याः क्लेशतत्पराः । विग्रहञ्चाभिकाङ्क्षन्तः परस्परमतन्द्रिताः

samājagmuśca sāmantāḥ sasainyāḥ kleśatatparāḥ vigrahañcābhikāṅkṣantaḥ parasparamatandritāḥ

क्लेश में तत्पर सामन्तगण भी सेनाओं सहित वहाँ एकत्र हो गए, परस्पर संघर्ष की कामना करते हुए, अथक भाव से।

श्लोक 51 (devibhagavatam.3.14.51)

निषादा ह्याययुस्तत्र शृङ्गवेरपुराश्रयाः । राजद्रव्यमपाहर्तुं मृतं श्रुत्वा महीपतिम्

niṣādā hyāyayustatra śṛṅgaverapurāśrayāḥ rājadravyamapāhartuṁ mṛtaṁ śrutvā mahīpatim

राजा के मृत्यु का समाचार सुनकर, राजकोष लूटने के लिए शृंगवेरपुर के आश्रित निषाद भी वहाँ आ पहुँचे।

श्लोक 52 (devibhagavatam.3.14.52)

पुत्रौ च बालकौ श्रुत्वा विग्रहं च परस्परम् । चौरास्तत्र समाजग्मुर्देशदेशान्तरादपि

putrau ca bālakau śrutvā vigrahaṁ ca parasparam caurāstatra samājagmurdeśadeśāntarādapi

दोनों पुत्रों को बालक तथा दोनों राजाओं में परस्पर विरोध सुनकर, दूर-दूर के देशों से भी चोर वहाँ एकत्र हो गए।

श्लोक 53 (devibhagavatam.3.14.53)

सम्मर्दस्तत्र सञ्जातः कलहे समुपस्थिते । युधाजिद्वीरसेनश्च युद्धकामौ बभूवतुः

sammardastatra sañjātaḥ kalahe samupasthite yudhājidvīrasenaśca yuddhakāmau babhūvatuḥ

उस उपस्थित कलह में वहाँ भारी भीड़-भाड़ मच गई; युधाजित् और वीरसेन दोनों युद्ध के इच्छुक हो गए।

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