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तृतीय स्कन्ध · अध्याय 24

देवी-महिमा वर्णन

अध्याय 23अध्याय-सूचीअध्याय 25

श्लोक 1 (devibhagavatam.3.24.1)

व्यास उवाच । तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा भवान्याः स नृपोत्तमः । प्रोवाच वचनं तत्र सुबाहुर्भक्तिसंयुतः

vyāsa uvāca tasyāstadvacanaṁ śrutvā bhavānyāḥ sa nṛpottamaḥ provāca vacanaṁ tatra subāhurbhaktisaṁyutaḥ

व्यास जी ने कहा — भवानी के उस वचन को सुनकर, वह नृपश्रेष्ठ सुबाहु, भक्तिभावयुक्त होकर, वहाँ यह वचन बोला।

श्लोक 2 (devibhagavatam.3.24.2)

सुबाहुरुवाच । एकतो देवलोकस्य राज्यं भूमण्डलस्य च । एकतो दर्शनं ते वै न च तुल्यं कदाचन

subāhuruvāca ekato devalokasya rājyaṁ bhūmaṇḍalasya ca ekato darśanaṁ te vai na ca tulyaṁ kadācana

सुबाहु ने कहा — 'एक ओर देवलोक तथा सम्पूर्ण भूमण्डल का राज्य हो, और दूसरी ओर आपका दर्शन मात्र — ये दोनों कभी भी समान नहीं हो सकते।'

श्लोक 3 (devibhagavatam.3.24.3)

दर्शनात्सदृशं किञ्चित्त्रिषु लोकेषु नास्ति मे । कं वरं देवि याचेऽहं कृतार्थोऽस्मि धरातले

darśanātsadṛśaṁ kiñcittriṣu lokeṣu nāsti me kaṁ varaṁ devi yāce'haṁ kṛtārtho'smi dharātale

'मेरे लिए त्रिलोक में आपके दर्शन के समान कुछ भी नहीं है; तो हे देवी, मैं कौन-सा वर माँगूँ? मैं तो इस धरातल पर पहले ही कृतार्थ हो चुका हूँ।'

श्लोक 4 (devibhagavatam.3.24.4)

एतदिच्छाम्यहं मातर्याचितुं वाञ्छितं वरम् । तव भक्तिः सदा मेऽस्तु निश्चला ह्यनपायिनी

etadicchāmyahaṁ mātaryācituṁ vāñchitaṁ varam tava bhaktiḥ sadā me'stu niścalā hyanapāyinī

'हे माता, मैं तो केवल यही वांछित वर माँगना चाहता हूँ — आपकी भक्ति मुझमें सदैव अचल और अक्षय बनी रहे।'

श्लोक 5 (devibhagavatam.3.24.5)

नगरेऽत्र त्वया मातः स्थातव्यं मम सर्वदा । दुर्गादेवीति नाम्ना वै त्वं शक्तिरिह संस्थिता

nagare'tra tvayā mātaḥ sthātavyaṁ mama sarvadā durgādevīti nāmnā vai tvaṁ śaktiriha saṁsthitā

'हे माता, आपको मेरे इस नगर में सदैव निवास करना चाहिए; यहाँ दुर्गादेवी नाम से आप, वह शक्ति, स्थापित रहें।'

श्लोक 6 (devibhagavatam.3.24.6)

रक्षा त्वया च कर्तव्या सर्वदा नगरस्य ह । यथा सुदर्शनस्त्रातो रिपुसङ्घादनामयः

rakṣā tvayā ca kartavyā sarvadā nagarasya ha yathā sudarśanastrāto ripusaṅghādanāmayaḥ

'और नगर की रक्षा सदैव आपके द्वारा की जाए — जैसे सुदर्शन को शत्रुसमूह से निरापद बचाया गया।'

श्लोक 7 (devibhagavatam.3.24.7)

तथाऽत्र रक्षा कर्तव्या वाराणस्यास्त्वयाम्बिके । यावत्पुरी भवेद्भूमौ सुप्रतिष्ठा सुसंस्थिता

tathā'tra rakṣā kartavyā vārāṇasyāstvayāmbike yāvatpurī bhavedbhūmau supratiṣṭhā susaṁsthitā

'उसी प्रकार, हे अम्बिके, जब तक यह नगरी पृथ्वी पर सुप्रतिष्ठित और सुस्थित रहे, तब तक यहाँ वाराणसी की रक्षा आपके द्वारा की जाए।'

श्लोक 8 (devibhagavatam.3.24.8)

तावत्त्वयाऽत्र स्थातव्यं दुर्गे देवि कृपानिधे । वरोऽयं मम ते देयः किमन्यत्प्रार्थयाम्यहम्

tāvattvayā'tra sthātavyaṁ durge devi kṛpānidhe varo'yaṁ mama te deyaḥ kimanyatprārthayāmyaham

'हे देवी दुर्गे, हे कृपानिधे, तब तक आपको यहाँ निवास करना चाहिए; यही मेरे लिए आपके द्वारा दिया जाने वाला वर हो — अन्य मैं क्या माँगूँ?'

श्लोक 9 (devibhagavatam.3.24.9)

विविधान्सकलान्कामान्देहि मे विद्विषो जहि । अभद्राणां विनाशञ्च कुरु लोकस्य सर्वदा

vividhānsakalānkāmāndehi me vidviṣo jahi abhadrāṇāṁ vināśañca kuru lokasya sarvadā

'मेरी विविध समस्त कामनाओं को पूर्ण कीजिए, मेरे शत्रुओं का नाश कीजिए; और सदैव संसार के अमंगल का नाश करती रहिए।'

श्लोक 10 (devibhagavatam.3.24.10)

व्यास उवाच । इति सम्प्रार्थिता देवी दुर्गा दुर्गार्तिनाशिनी । तमुवाच नृपं तत्र स्तुत्वा वै संस्थितं पुरः

vyāsa uvāca iti samprārthitā devī durgā durgārtināśinī tamuvāca nṛpaṁ tatra stutvā vai saṁsthitaṁ puraḥ

व्यास जी ने कहा — इस प्रकार प्रार्थना किए जाने पर, दुर्गार्तिनाशिनी देवी दुर्गा ने, इस प्रकार स्तुति करके सामने खड़े उस राजा से कहा।

श्लोक 11 (devibhagavatam.3.24.11)

दुर्गोवाच । राजन्सदा निवासो मे मुक्तिपुर्यां भविष्यति । रक्षार्थं सर्वलोकानां यावत्तिष्ठति मेदिनी

durgovāca rājansadā nivāso me muktipuryāṁ bhaviṣyati rakṣārthaṁ sarvalokānāṁ yāvattiṣṭhati medinī

दुर्गा ने कहा — 'हे राजन्, इस मुक्तिपुरी में मेरा निवास सदैव रहेगा, समस्त लोकों की रक्षा हेतु, जब तक यह पृथ्वी विद्यमान रहेगी।'

श्लोक 12 (devibhagavatam.3.24.12)

अथो सुदर्शनस्तत्र समागत्य मुदान्वितः । प्रणम्य परया भक्त्या तुष्टाव जगदम्बिकाम्

atho sudarśanastatra samāgatya mudānvitaḥ praṇamya parayā bhaktyā tuṣṭāva jagadambikām

तत्पश्चात् सुदर्शन भी वहाँ आकर, हर्षित होकर, परम भक्ति से प्रणाम कर, जगदम्बिका की स्तुति करने लगे।

श्लोक 13 (devibhagavatam.3.24.13)

अहो कृपा ये कथयाम्यहं किं त्रातस्त्वया यत्किल भक्तिहीनः । भक्तानुकम्पी सकलो जनोऽस्ति विमुक्तभक्तेरवनं व्रतं ते

aho kṛpā ye kathayāmyahaṁ kiṁ trātastvayā yatkila bhaktihīnaḥ bhaktānukampī sakalo jano'sti vimuktabhakteravanaṁ vrataṁ te

'अहो, यह कैसी कृपा है, मैं क्या कहूँ — कि भक्तिहीन होते हुए भी मुझे आपने बचा लिया। सभी लोग कहते हैं कि आप भक्तों पर दयालु हैं, परन्तु आपका रक्षा-व्रत तो भक्तिविहीन के प्रति भी है।'

श्लोक 14 (devibhagavatam.3.24.14)

त्वं देवि सर्वं सृजसि प्रपञ्चं श्रुतं मया पालयसि स्वसृष्टम् । त्वमत्सि संहारपरे च काले न तेऽत्र चित्रं मम रक्षणं वै

tvaṁ devi sarvaṁ sṛjasi prapañcaṁ śrutaṁ mayā pālayasi svasṛṣṭam tvamatsi saṁhārapare ca kāle na te'tra citraṁ mama rakṣaṇaṁ vai

'हे देवी, आप ही इस सम्पूर्ण प्रपंच की सृष्टि करती हैं — मैंने ऐसा सुना है — आप अपनी ही सृष्टि का पालन करती हैं, और संहारकाल में उसे निगल लेती हैं; तो मेरी रक्षा करना आपके लिए भला कोई आश्चर्य नहीं है।'

श्लोक 15 (devibhagavatam.3.24.15)

करोमि किं ते वद देवि कार्यं क्व वा व्रजामीत्यनुमोदयाशु । कार्ये विमूढोऽस्मि तवाज्ञयाऽहं गच्छामि तिष्ठे विहरामि मातः

karomi kiṁ te vada devi kāryaṁ kva vā vrajāmītyanumodayāśu kārye vimūḍho'smi tavājñayā'haṁ gacchāmi tiṣṭhe viharāmi mātaḥ

'मैं आपका क्या कार्य करूँ, हे देवी, बताइए — अथवा मैं कहाँ जाऊँ? शीघ्र अनुमति दीजिए। मैं इस विषय में सर्वथा मूढ़ हूँ; हे माता, आपकी ही आज्ञा से मैं जाऊँगा, ठहरूँगा, अथवा विचरण करूँगा।'

श्लोक 16 (devibhagavatam.3.24.16)

व्यास उवाच । तं तथा भाषमाणं तु देवी प्राह दयान्विता । गच्छायोध्यां महाभाग कुरु राज्यं कुलोचितम्

vyāsa uvāca taṁ tathā bhāṣamāṇaṁ tu devī prāha dayānvitā gacchāyodhyāṁ mahābhāga kuru rājyaṁ kulocitam

व्यास जी ने कहा — इस प्रकार कहते हुए उससे, दयायुक्त देवी ने कहा — 'हे महाभाग, अयोध्या जाओ, और अपने कुल के अनुरूप राज्य करो।'

श्लोक 17 (devibhagavatam.3.24.17)

स्मरणीया सदाऽहं ते पूजनीया प्रयत्नतः । शं विधास्याम्यहं नित्यं राज्यं ते नृपसत्तम

smaraṇīyā sadā'haṁ te pūjanīyā prayatnataḥ śaṁ vidhāsyāmyahaṁ nityaṁ rājyaṁ te nṛpasattama

'तुम्हें मुझे सदैव स्मरण रखना चाहिए, और यत्नपूर्वक पूजन करना चाहिए; हे नृपसत्तम, मैं नित्य ही तुम्हारे राज्य का कल्याण करती रहूँगी।'

श्लोक 18 (devibhagavatam.3.24.18)

अष्टम्याञ्च चतुर्दश्यां नवम्याञ्च विशेषतः । मम पूजा प्रकर्तव्या बलिदानविधानतः

aṣṭamyāñca caturdaśyāṁ navamyāñca viśeṣataḥ mama pūjā prakartavyā balidānavidhānataḥ

'अष्टमी, चतुर्दशी और विशेष रूप से नवमी को मेरी पूजा बलिदान-विधि से सम्पन्न की जानी चाहिए।'

श्लोक 19 (devibhagavatam.3.24.19)

अर्चा मदीया नगरे स्थापनीया त्वयाऽनघ । पूजनीया प्रयत्नेन त्रिकालं भक्तिपूर्वकम्

arcā madīyā nagare sthāpanīyā tvayā'nagha pūjanīyā prayatnena trikālaṁ bhaktipūrvakam

'हे निष्पाप, नगर में मेरी प्रतिमा तुम्हारे द्वारा स्थापित की जानी चाहिए, और यत्नपूर्वक, त्रिकाल भक्तिपूर्वक पूजी जानी चाहिए।'

श्लोक 20 (devibhagavatam.3.24.20)

शरत्काले महापूजा कर्तव्या मम सर्वदा । नवरात्रविधानेन भक्तिभावयुतेन च

śaratkāle mahāpūjā kartavyā mama sarvadā navarātravidhānena bhaktibhāvayutena ca

'शरद ऋतु में मेरी महापूजा सदैव सम्पन्न की जानी चाहिए, नवरात्र-विधि से, भक्तिभावयुक्त होकर।'

श्लोक 21 (devibhagavatam.3.24.21)

चैत्रेऽश्विने तथाऽऽषाढे माघे कार्यो महोत्सवः । नवरात्रे महाराज पूजा कार्या विशेषतः

caitre'śvine tathā''ṣāḍhe māghe kāryo mahotsavaḥ navarātre mahārāja pūjā kāryā viśeṣataḥ

'चैत्र, आश्विन, तथा आषाढ़ और माघ में महोत्सव मनाया जाना चाहिए; हे महाराज, नवरात्र में विशेष रूप से पूजा की जानी चाहिए।'

श्लोक 22 (devibhagavatam.3.24.22)

कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां मम भक्तिसमन्वितैः । कर्तव्या नृपशार्दूल तथाऽष्टम्यां सदा बुधैः

kṛṣṇapakṣe caturdaśyāṁ mama bhaktisamanvitaiḥ kartavyā nṛpaśārdūla tathā'ṣṭamyāṁ sadā budhaiḥ

'हे नृपशार्दूल, कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को मेरे भक्तों द्वारा, तथा अष्टमी को भी सदैव विद्वानों द्वारा पूजा सम्पन्न की जानी चाहिए।'

श्लोक 23 (devibhagavatam.3.24.23)

व्यास उवाच । इत्युक्त्वान्तर्हिता देवी दुर्गा दुर्गार्तिनाशिनी । नता सुदर्शनेनाथ स्तुता च बहुविस्तरम्

vyāsa uvāca ityuktvāntarhitā devī durgā durgārtināśinī natā sudarśanenātha stutā ca bahuvistaram

व्यास जी ने कहा — यह कहकर, दुर्गार्तिनाशिनी देवी दुर्गा अन्तर्धान हो गईं — जो सुदर्शन द्वारा प्रणाम की गई थीं और विस्तारपूर्वक स्तुति की गई थीं।

श्लोक 24 (devibhagavatam.3.24.24)

अन्तर्हितां तु तां दृष्ट्वा राजानः सर्व एव ते । प्रणेमुस्तं समागम्य यथा शक्रं सुरास्तथा

antarhitāṁ tu tāṁ dṛṣṭvā rājānaḥ sarva eva te praṇemustaṁ samāgamya yathā śakraṁ surāstathā

उन्हें अन्तर्धान होते देखकर, वे सभी राजा एकत्र होकर उसे उसी प्रकार प्रणाम करने लगे जैसे देवगण इन्द्र को प्रणाम करते हैं।

श्लोक 25 (devibhagavatam.3.24.25)

सुबाहुरपि तं नत्वा स्थितश्चाग्रे मुदान्वितः । ऊचुः सर्वे महीपाला अयोध्याधिपतिं तदा

subāhurapi taṁ natvā sthitaścāgre mudānvitaḥ ūcuḥ sarve mahīpālā ayodhyādhipatiṁ tadā

सुबाहु ने भी उसे प्रणाम कर, हर्षित होकर आगे खड़े होकर, सभी राजाओं ने तब उस अयोध्याधिपति से कहा।

श्लोक 26 (devibhagavatam.3.24.26)

त्वमस्माकं प्रभुः शास्ता सेवकास्ते वयं सदा । कुरु राज्यमयोध्यायां पालयास्मान्नृपोत्तम

tvamasmākaṁ prabhuḥ śāstā sevakāste vayaṁ sadā kuru rājyamayodhyāyāṁ pālayāsmānnṛpottama

'आप हमारे स्वामी और शासक हैं; हम सदैव आपके सेवक हैं। अयोध्या में राज्य कीजिए, और हमारी रक्षा कीजिए, हे नृपोत्तम।'

श्लोक 27 (devibhagavatam.3.24.27)

त्वत्प्रसादान्महाराज दृष्टा विश्वेश्वरी शिवा । आदिशक्तिर्भवानी सा चतुर्वर्गफलप्रदा

tvatprasādānmahārāja dṛṣṭā viśveśvarī śivā ādiśaktirbhavānī sā caturvargaphalapradā

'हे महाराज, आपकी कृपा से हमने विश्वेश्वरी कल्याणी भवानी का दर्शन किया — वह आदिशक्ति, जो चारों पुरुषार्थों का फल प्रदान करती हैं।'

श्लोक 28 (devibhagavatam.3.24.28)

धन्यस्त्वं कृतकृत्योऽसि बहुपुण्यो धरातले । यस्माच्च त्वत्कृते देवी प्रादुर्भूता सनातनी

dhanyastvaṁ kṛtakṛtyo'si bahupuṇyo dharātale yasmācca tvatkṛte devī prādurbhūtā sanātanī

'आप धन्य हैं, कृतकृत्य हैं, इस धरातल पर अत्यंत पुण्यशाली हैं, क्योंकि आपके ही निमित्त सनातनी देवी प्रकट हुई।'

श्लोक 29 (devibhagavatam.3.24.29)

न जानीमो वयं सर्वे प्रभावं नृपसत्तम । चण्डिकायास्तमोयुक्ता मायया मोहिताः सदा

na jānīmo vayaṁ sarve prabhāvaṁ nṛpasattama caṇḍikāyāstamoyuktā māyayā mohitāḥ sadā

'हे नृपसत्तम, हम सभी तमोयुक्त, माया से सदैव मोहित, चण्डिका के प्रभाव को नहीं जानते।'

श्लोक 30 (devibhagavatam.3.24.30)

धनदारसुतानां च चिन्तनेऽभिरताः सदा । मग्ना महार्वणे घोरे कामक्रोधझषाकुले

dhanadārasutānāṁ ca cintane'bhiratāḥ sadā magnā mahārvaṇe ghore kāmakrodhajhaṣākule

'सदैव धन, पत्नी और पुत्रों की चिन्ता में रत रहते हुए, हम काम-क्रोध रूपी मत्स्यों से व्याप्त उस घोर महासागर में डूबे रहते हैं।'

श्लोक 31 (devibhagavatam.3.24.31)

पृच्छामस्त्वां महाभाग सर्वज्ञोऽसि महामते । केयं शक्तिः कुतो जाता किं प्रभावा वदस्व तत्

pṛcchāmastvāṁ mahābhāga sarvajño'si mahāmate keyaṁ śaktiḥ kuto jātā kiṁ prabhāvā vadasva tat

'हे महाभाग, हम आपसे पूछते हैं — आप सर्वज्ञ हैं, हे महामते; यह शक्ति कौन है, कहाँ से उत्पन्न हुई, तथा इसका क्या प्रभाव है — यह हमें बताइए।'

श्लोक 32 (devibhagavatam.3.24.32)

भव त्वं नौश्च संसारे साधवोऽति दयापराः । तस्मान्नो वद काकुत्स्थ देवीमाहात्म्यमुत्तमम्

bhava tvaṁ nauśca saṁsāre sādhavo'ti dayāparāḥ tasmānno vada kākutstha devīmāhātmyamuttamam

'इस संसार-सागर में आप ही हमारी नौका बनें — सज्जन अत्यंत दयालु होते हैं; अतः हे काकुत्स्थ, हमें देवी की उस सर्वोत्तम महिमा को बताइए।'

श्लोक 33 (devibhagavatam.3.24.33)

यत्प्रभावा च सा देवी यत्स्वरुपा यदुद्भवा । सत्सर्वं श्रोतुमिच्छामस्त्वं ब्रूहि नृवरोत्तम

yatprabhāvā ca sā devī yatsvarupā yadudbhavā satsarvaṁ śrotumicchāmastvaṁ brūhi nṛvarottama

'वह देवी कैसा प्रभाव रखती हैं, उनका स्वरूप कैसा है, उनकी उत्पत्ति कैसे हुई — यह सब सत्य हम सुनना चाहते हैं; हे नृवरोत्तम, आप हमें बताइए।'

श्लोक 34 (devibhagavatam.3.24.34)

व्यास उवाच । इति पृष्टस्तदा तैस्तु ध्रुवसन्धिसुतो नृपः । विचिन्त्य मनसा देवीं तानुवाच मुदान्वितः

vyāsa uvāca iti pṛṣṭastadā taistu dhruvasandhisuto nṛpaḥ vicintya manasā devīṁ tānuvāca mudānvitaḥ

व्यास जी ने कहा — उनके द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर, ध्रुवसन्धिपुत्र राजा सुदर्शन, मन में देवी का चिन्तन कर, हर्षित होकर उनसे बोले।

श्लोक 35 (devibhagavatam.3.24.35)

सुदर्शन उवाच । किं ब्रवीमि महीपालास्तस्याश्चरितमुत्तमम् । ब्रह्मादयो न जानन्ति सेशाः सुरगणास्तथा

sudarśana uvāca kiṁ bravīmi mahīpālāstasyāścaritamuttamam brahmādayo na jānanti seśāḥ suragaṇāstathā

सुदर्शन ने कहा — 'हे राजाओ, मैं उनके उस सर्वोत्तम चरित्र का क्या वर्णन करूँ? ब्रह्मा आदि तथा शेष समस्त देवगण भी उसे पूर्णतः नहीं जानते।'

श्लोक 36 (devibhagavatam.3.24.36)

सर्वस्याद्या महालक्ष्मीर्वरेण्या शक्तिरुत्तमा । सात्त्विकीयं महीपाला जगत्पालनतत्परा

sarvasyādyā mahālakṣmīrvareṇyā śaktiruttamā sāttvikīyaṁ mahīpālā jagatpālanatatparā

'वे सबकी आदिशक्ति, महालक्ष्मी, परम वरणीय सर्वोत्तम शक्ति हैं; हे राजाओ, अपने सात्त्विक रूप में वे जगत् के पालन में तत्पर रहती हैं।'

श्लोक 37 (devibhagavatam.3.24.37)

सृजते या रजोरूपा सत्त्वरूपा च पालने । संहारे च तमोरूपा त्रिगुणा सा सदा मता

sṛjate yā rajorūpā sattvarūpā ca pālane saṁhāre ca tamorūpā triguṇā sā sadā matā

'जो रजोरूप में सृष्टि करती हैं, सत्त्वरूप में पालन करती हैं, और तमोरूप में संहार करती हैं — वे सदैव त्रिगुणात्मिका मानी जाती हैं।'

श्लोक 38 (devibhagavatam.3.24.38)

निर्गुणा परमा शक्तिः सर्वकामफलप्रदा । सर्वेषां कारणं सा हि ब्रह्मादीनां नृपोत्तमाः

nirguṇā paramā śaktiḥ sarvakāmaphalapradā sarveṣāṁ kāraṇaṁ sā hi brahmādīnāṁ nṛpottamāḥ

'निर्गुण रूप में वे परमशक्ति हैं, सभी कामनाओं के फल की दात्री हैं; हे नृपोत्तमो, वे ही ब्रह्मा आदि समस्त देवताओं का कारण हैं।'

श्लोक 39 (devibhagavatam.3.24.39)

निर्गुणा सर्वथा ज्ञातुमशक्या योगिभिर्नृपाः । सगुणा सुखसेव्या सा चिन्तनीया सदा बुधैः

nirguṇā sarvathā jñātumaśakyā yogibhirnṛpāḥ saguṇā sukhasevyā sā cintanīyā sadā budhaiḥ

'हे राजाओ, निर्गुण रूप में वे योगियों द्वारा भी सर्वथा जानने में असमर्थ हैं; सगुण रूप में वे सुखपूर्वक सेवनीय हैं, और विद्वानों द्वारा सदैव चिन्तनीय हैं।'

श्लोक 40 (devibhagavatam.3.24.40)

राजान ऊचुः । बाल एव वनं प्राप्तस्त्वं तु नूनं भयातुरः । कथं ज्ञाता त्वया देवी परमा शक्तिरुत्तमा

rājāna ūcuḥ bāla eva vanaṁ prāptastvaṁ tu nūnaṁ bhayāturaḥ kathaṁ jñātā tvayā devī paramā śaktiruttamā

राजाओं ने कहा — 'आप तो बालक होते हुए ही वन में आए, निश्चय ही भयभीत होकर — तो आपने उस परम, सर्वोत्तम शक्ति देवी को कैसे जाना?'

श्लोक 41 (devibhagavatam.3.24.41)

उपासिता कथं चैव पूजिता च कथं नृप । या प्रसन्ना तु साहाय्यं चकार त्वरयान्विता

upāsitā kathaṁ caiva pūjitā ca kathaṁ nṛpa yā prasannā tu sāhāyyaṁ cakāra tvarayānvitā

'और हे राजन्, उनकी उपासना किस प्रकार की गई, तथा पूजा कैसे की गई — जो प्रसन्न होकर शीघ्रतापूर्वक आपकी सहायता करने आईं?'

श्लोक 42 (devibhagavatam.3.24.42)

सुदर्शन उवाच । बालभावान्मया प्राप्तं बीजं तस्याः सुसम्मतम् । स्मरामि प्रजपन्नित्यं कामबीजाभिधं नृपाः

sudarśana uvāca bālabhāvānmayā prāptaṁ bījaṁ tasyāḥ susammatam smarāmi prajapannityaṁ kāmabījābhidhaṁ nṛpāḥ

सुदर्शन ने कहा — 'हे राजाओ, बाल्यावस्था में ही मुझे उनका वह अत्यंत सम्मत बीजमंत्र प्राप्त हो गया था; मैं नित्य उसका जप करते हुए उसे स्मरण करता रहता हूँ — जो कामबीज नाम से जाना जाता है।'

श्लोक 43 (devibhagavatam.3.24.43)

ऋषिभिः कथ्यमाना सा मया ज्ञाताम्बिका शिवा । स्मरामि तां दिवारात्रं भक्त्या परमया पराम्

ṛṣibhiḥ kathyamānā sā mayā jñātāmbikā śivā smarāmi tāṁ divārātraṁ bhaktyā paramayā parām

'ऋषियों द्वारा कहे जाने पर, वह कल्याणी अम्बिका, वह परा शक्ति, मुझे ज्ञात हुई; मैं उन्हें दिन-रात परम भक्ति से स्मरण करता हूँ।'

श्लोक 44 (devibhagavatam.3.24.44)

व्यास उवाच । तन्निशम्य वचस्तस्य राजानो भक्तितत्पराः । तां मत्वा परमां शक्तिं निर्ययुः स्वगृहान्प्रति

vyāsa uvāca tanniśamya vacastasya rājāno bhaktitatparāḥ tāṁ matvā paramāṁ śaktiṁ niryayuḥ svagṛhānprati

व्यास जी ने कहा — उनके ये वचन सुनकर, वे राजा भक्तिपरायण होकर, उन्हें परमशक्ति मानते हुए, अपने-अपने घरों की ओर चल पड़े।

श्लोक 45 (devibhagavatam.3.24.45)

सुबाहुरगमत्काश्यां तमापृच्छ्य सुदर्शनम् । सुदर्शनोऽपि धर्मात्मा निर्ज्जगाम सुकोसलान्

subāhuragamatkāśyāṁ tamāpṛcchya sudarśanam sudarśano'pi dharmātmā nirjjagāma sukosalān

सुबाहु सुदर्शन से आज्ञा लेकर काशी को लौट गए; और धर्मात्मा सुदर्शन भी सुकोसल की ओर प्रस्थान कर गए।

श्लोक 46 (devibhagavatam.3.24.46)

मन्त्रिणस्तु नृपं श्रुत्वा हतं शत्रुजितं मृधे । जितं सुदर्शनञ्चैव बभूवुः प्रेमसंयुताः

mantriṇastu nṛpaṁ śrutvā hataṁ śatrujitaṁ mṛdhe jitaṁ sudarśanañcaiva babhūvuḥ premasaṁyutāḥ

मंत्री लोग, यह सुनकर कि शत्रुजित् युद्ध में मारा गया और सुदर्शन विजयी हुए, प्रेम से भर उठे।

श्लोक 47 (devibhagavatam.3.24.47)

आगच्छन्तं नृपं श्रुत्वा तं साकेतनिवासिनः । उपायनान्युपादाय प्रययुः सम्मुखे जनाः

āgacchantaṁ nṛpaṁ śrutvā taṁ sāketanivāsinaḥ upāyanānyupādāya prayayuḥ sammukhe janāḥ

राजा के आगमन का समाचार सुनकर, साकेतनिवासी लोग उपहार लेकर उनके स्वागत हेतु आगे बढ़े।

श्लोक 48 (devibhagavatam.3.24.48)

तथा प्रकृतयः सर्वे नानोपायनपाणयः । ध्रुवसन्धिसुतं दत्त्वा मुदिताः प्रययुः प्रजाः

tathā prakṛtayaḥ sarve nānopāyanapāṇayaḥ dhruvasandhisutaṁ dattvā muditāḥ prayayuḥ prajāḥ

उसी प्रकार सभी प्रजाजन, हाथों में विविध उपहार लिए हुए, हर्षित होकर ध्रुवसन्धिपुत्र को अर्पित करते हुए आगे बढ़े।

श्लोक 49 (devibhagavatam.3.24.49)

स्त्रियोपसंयुतः सोऽथ प्राप्यायोध्यां सुदर्शनः । सम्मान्य सर्वलोकांश्च ययौ राजा निवेशनम्

striyopasaṁyutaḥ so'tha prāpyāyodhyāṁ sudarśanaḥ sammānya sarvalokāṁśca yayau rājā niveśanam

तत्पश्चात् अपनी पत्नी सहित सुदर्शन, अयोध्या पहुँचकर, सभी प्रजाजनों का सम्मान कर, राजा के रूप में अपने भवन में गए।

श्लोक 50 (devibhagavatam.3.24.50)

वन्दिभिः स्तूयमानस्तु वन्द्यमानश्च मन्त्रिभिः । कन्याभिः कीर्यमाणश्च लाजैः सुमनसैस्तथा

vandibhiḥ stūyamānastu vandyamānaśca mantribhiḥ kanyābhiḥ kīryamāṇaśca lājaiḥ sumanasaistathā

भाटों द्वारा स्तुति किए जाते हुए, मंत्रियों द्वारा वन्दित होते हुए, कन्याओं द्वारा लाजा और पुष्पों से बरसाए जाते हुए —

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