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चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 13

गुरु द्वारा शुक्ररूप धारण करके दैत्यों को छलने का वर्णन

अध्याय 12अध्याय-सूचीअध्याय 14

श्लोक 1 (devibhagavatam.4.13.1)

राजोवाच । किं कृतं गुरुणा पश्चाद्भृगुरूपेण वर्तता । छलेनैव हि दैत्यानां पौरोहित्येन धीमता

rājovāca kiṁ kṛtaṁ guruṇā paścādbhṛgurūpeṇa vartatā chalenaiva hi daityānāṁ paurohityena dhīmatā

राजा ने कहा — भृगुरूप धारण करके, छलपूर्वक दैत्यों के पुरोहित के रूप में विद्यमान उन बुद्धिमान् गुरु ने आगे क्या किया?

श्लोक 2 (devibhagavatam.4.13.2)

गुरुः सुराणामनिशं सर्वविद्यानिधिस्तथा । सुतोऽङ्गिरस एवासौ स कथं छलकृन्मुनिः

guruḥ surāṇāmaniśaṁ sarvavidyānidhistathā suto'ṅgirasa evāsau sa kathaṁ chalakṛnmuniḥ

देवताओं के सनातन गुरु, समस्त विद्याओं के भण्डार, अंगिरा के ही पुत्र — वे मुनि छलकर्ता कैसे बने?

श्लोक 3 (devibhagavatam.4.13.3)

धर्मशास्त्रेषु सर्वेषु सत्यं धर्मस्य कारणम् । कथितं मुनिभिर्येन परमात्मापि लभ्यते

dharmaśāstreṣu sarveṣu satyaṁ dharmasya kāraṇam kathitaṁ munibhiryena paramātmāpi labhyate

समस्त धर्मशास्त्रों में मुनियों ने सत्य को ही धर्म का कारण कहा है — जिससे परमात्मा भी प्राप्त होता है।

श्लोक 4 (devibhagavatam.4.13.4)

वाचस्पतिस्तथा मिथ्यावक्ता चेद्दानवान्प्रति । कः सत्यवक्ता संसारे भविष्यति गृहाश्रमी

vācaspatistathā mithyāvaktā ceddānavānprati kaḥ satyavaktā saṁsāre bhaviṣyati gṛhāśramī

यदि वाचस्पति स्वयं दानवों के प्रति मिथ्यावादी बन जाएँ, तो फिर संसार में कौन-सा गृहस्थ सत्यवादी रह पाएगा?

श्लोक 5 (devibhagavatam.4.13.5)

आहारादधिकं भोज्यं ज्रह्माण्डविभवेऽपि न । तदर्थं मुनयो मिथ्या प्रवर्तन्ते कथं मुने

āhārādadhikaṁ bhojyaṁ jrahmāṇḍavibhave'pi na tadarthaṁ munayo mithyā pravartante kathaṁ mune

भोजन के अतिरिक्त, ब्रह्माण्ड के समस्त वैभव में भी कोई अतिरिक्त उपभोग्य वस्तु नहीं है — तो फिर हे मुने! मुनि उसके लिए मिथ्याचरण क्यों करते हैं?

श्लोक 6 (devibhagavatam.4.13.6)

शब्दप्रमाणमुच्छेदं शिष्टाभावे गतं न किम् । छलकर्मप्रवृत्ते वाविगीतत्वं गुरौ कथम्

śabdapramāṇamucchedaṁ śiṣṭābhāve gataṁ na kim chalakarmapravṛtte vāvigītatvaṁ gurau katham

क्या शिष्ट पुरुषों के अभाव में शब्द-प्रमाण की सत्ता नष्ट नहीं हो गई? छलकर्म में प्रवृत्त गुरु के प्रति निन्दा-रहितता भला कैसे हो सकती है?

श्लोक 7 (devibhagavatam.4.13.7)

देवाः सत्त्वसमुद्भूता राजसा मानवाः स्मृताः । तिर्यञ्चस्तामसाः प्रोक्ता उत्पत्तौ मुनिभिः किल

devāḥ sattvasamudbhūtā rājasā mānavāḥ smṛtāḥ tiryañcastāmasāḥ proktā utpattau munibhiḥ kila

देवता सत्त्व से उत्पन्न हैं, मनुष्य राजसिक कहे गए हैं, और पशु-पक्षी उत्पत्ति में तामसिक कहे गए हैं — ऐसा मुनियों ने कहा है।

श्लोक 8 (devibhagavatam.4.13.8)

अमराणां गुरुः साक्षान्मिथ्यावादी स्वयं यदि । तदा कः सत्यवक्ता स्याद्राजसस्तामसः पुनः

amarāṇāṁ guruḥ sākṣānmithyāvādī svayaṁ yadi tadā kaḥ satyavaktā syādrājasastāmasaḥ punaḥ

यदि अमरों का साक्षात् गुरु ही स्वयं मिथ्यावादी बन जाए, तो फिर राजसिक अथवा तामसिक व्यक्ति सत्यवादी कैसे हो सकता है?

श्लोक 9 (devibhagavatam.4.13.9)

क्व स्थितिस्तस्य धर्मस्य सन्देहोऽयं ममात्मनः । का गतिः सर्वजन्तूनां मिथ्याभूते जगत्त्रये

kva sthitistasya dharmasya sandeho'yaṁ mamātmanaḥ kā gatiḥ sarvajantūnāṁ mithyābhūte jagattraye

तो फिर धर्म की स्थिति कहाँ है? यह मेरे मन का संशय है। इन तीनों लोकों के मिथ्या हो जाने पर समस्त प्राणियों की गति क्या होगी?

श्लोक 10 (devibhagavatam.4.13.10)

हरिर्ब्रह्मा शचीकान्तस्तथान्ये सुरसत्तमाः । सर्वे छलविधौ दक्षा मनुष्याणाञ्च का कथा

harirbrahmā śacīkāntastathānye surasattamāḥ sarve chalavidhau dakṣā manuṣyāṇāñca kā kathā

हरि, ब्रह्मा, इन्द्र तथा अन्य सुरश्रेष्ठ — सभी छलकर्म में निपुण हैं; तब मनुष्यों की तो बात ही क्या?

श्लोक 11 (devibhagavatam.4.13.11)

कामक्रोधाभिसन्तप्ता लोभोपहतचेतसः । छले दक्षाः सुराः सर्वे मुनयश्च तपोधनाः

kāmakrodhābhisantaptā lobhopahatacetasaḥ chale dakṣāḥ surāḥ sarve munayaśca tapodhanāḥ

काम-क्रोध से संतप्त और लोभ से आहत चित्त वाले, सभी देवता तथा तपोधन मुनि भी छल में निपुण हैं —

श्लोक 12 (devibhagavatam.4.13.12)

वसिष्ठो वामदेवश्च विश्वामित्रो गुरुस्तथा । एते पापरताः कात्र गतिर्धर्मस्य मानद

vasiṣṭho vāmadevaśca viśvāmitro gurustathā ete pāparatāḥ kātra gatirdharmasya mānada

वसिष्ठ, वामदेव, विश्वामित्र तथा गुरु भी — यदि ये सब पापरत हों, तो हे मानद! फिर धर्म की गति यहाँ क्या रह जाती है?

श्लोक 13 (devibhagavatam.4.13.13)

इन्द्रोऽग्निश्चन्द्रमा वेधाः परदाराभिलम्पटाः । आर्यत्वं भुवनेष्वेषु स्थितं कुत्र मुने वद

indro'gniścandramā vedhāḥ paradārābhilampaṭāḥ āryatvaṁ bhuvaneṣveṣu sthitaṁ kutra mune vada

इन्द्र, अग्नि, चन्द्रमा तथा ब्रह्मा भी परस्त्री के लालायित हैं — हे मुने! बताइए, इन लोकों में आर्यत्व कहाँ स्थित है?

श्लोक 14 (devibhagavatam.4.13.14)

वचनं कस्य मन्तव्यमुपदेशधियानघ । सर्वे लोभाभिभूतास्ते देवाश्च मुनयस्तदा

vacanaṁ kasya mantavyamupadeśadhiyānagha sarve lobhābhibhūtāste devāśca munayastadā

हे निष्पाप! तब किसका वचन उपदेश के रूप में स्वीकार करने योग्य है? वे सभी देवता तथा मुनि तो लोभ से अभिभूत हैं।

श्लोक 15 (devibhagavatam.4.13.15)

व्यास उवाच । किं विष्णुः किं शिवो ब्रह्मा मघवा किं बृहस्पतिः । देहवान् प्रभवत्येव विकारैः संयुतस्तदा

vyāsa uvāca kiṁ viṣṇuḥ kiṁ śivo brahmā maghavā kiṁ bṛhaspatiḥ dehavān prabhavatyeva vikāraiḥ saṁyutastadā

व्यास जी ने कहा — चाहे विष्णु हों, चाहे शिव, ब्रह्मा, इन्द्र अथवा बृहस्पति ही क्यों न हों — देहधारी होते ही वह विकारों से युक्त हो ही जाता है।

श्लोक 16 (devibhagavatam.4.13.16)

रागी विष्णुः शिवो रागी ब्रह्मापि रागसंयुतः । (रागवान्किमकृत्यं वै न करोति नराधिप)॥ रागवानपि चातुर्याद्विदेह इव लक्ष्यते

rāgī viṣṇuḥ śivo rāgī brahmāpi rāgasaṁyutaḥ (rāgavānkimakṛtyaṁ vai na karoti narādhipa) rāgavānapi cāturyādvideha iva lakṣyate

विष्णु राग-युक्त हैं, शिव राग-युक्त हैं, ब्रह्मा भी राग से युक्त हैं — "हे नराधिप! रागयुक्त प्राणी कौन-सा अकृत्य नहीं करता?" — फिर भी चातुर्य से रागयुक्त होते हुए भी वह मानो विदेह जैसा प्रतीत होता है।

श्लोक 17 (devibhagavatam.4.13.17)

सम्प्राप्ते सङ्कटे सोऽपि गुणैः सम्बाध्यते किल । कारणाद्रहितं कार्यं कथं भवितुमर्हति

samprāpte saṅkaṭe so'pi guṇaiḥ sambādhyate kila kāraṇādrahitaṁ kāryaṁ kathaṁ bhavitumarhati

संकट आने पर वह भी निश्चय ही गुणों से बाधित होता है। कारण से रहित कार्य कैसे संभव हो सकता है?

श्लोक 18 (devibhagavatam.4.13.18)

ब्रह्मादीनां च सर्वेषां गुणा एव हि कारणम् । पञ्चविंशत्समुद्भूता देहास्तेषां न चान्यथा

brahmādīnāṁ ca sarveṣāṁ guṇā eva hi kāraṇam pañcaviṁśatsamudbhūtā dehāsteṣāṁ na cānyathā

ब्रह्मा आदि सभी के लिए गुण ही एकमात्र कारण हैं। उनके शरीर उन पच्चीस तत्त्वों से ही उत्पन्न हुए हैं, अन्यथा नहीं।

श्लोक 19 (devibhagavatam.4.13.19)

काले मरणधर्मास्ते सन्देहः कोऽत्र ते नृप । परोपदेशे विस्पष्टं शिष्टाः सर्वे भवन्ति च

kāle maraṇadharmāste sandehaḥ ko'tra te nṛpa paropadeśe vispaṣṭaṁ śiṣṭāḥ sarve bhavanti ca

समय आने पर वे मरणधर्मा ही हैं — हे राजन्! इसमें तुम्हें क्या संदेह है? दूसरों को उपदेश देने में तो सभी स्पष्ट रूप से शिष्ट प्रतीत होते हैं —

श्लोक 20 (devibhagavatam.4.13.20)

विप्लुतिर्ह्यविशेषेण स्वकार्ये समुपस्थिते । कामः क्रोधस्तथा लोभद्रोहाहङ्कारमत्सराः

viplutirhyaviśeṣeṇa svakārye samupasthite kāmaḥ krodhastathā lobhadrohāhaṅkāramatsarāḥ

किन्तु जब स्वयं का कार्य उपस्थित हो, तो सर्वत्र ही विक्षोभ उत्पन्न हो जाता है। काम, क्रोध, लोभ, द्रोह, अहंकार तथा मात्सर्य —

श्लोक 21 (devibhagavatam.4.13.21)

देहवान्कः परित्यक्तुमीशो भवति तान्पुनः । संसारोऽयं महाराज सदैवैवंविधः स्मृतः

dehavānkaḥ parityaktumīśo bhavati tānpunaḥ saṁsāro'yaṁ mahārāja sadaivaivaṁvidhaḥ smṛtaḥ

इनका पूर्णतः त्याग करने में कोई भी देहधारी समर्थ नहीं है। हे महाराज! यह संसार सदा से ऐसा ही स्मरण किया गया है।

श्लोक 22 (devibhagavatam.4.13.22)

नान्यथा प्रभवत्येव शुभाशुभमयः किल । कदाचिद्भगवान्विष्णुस्तपश्चरति दारुणम्

nānyathā prabhavatyeva śubhāśubhamayaḥ kila kadācidbhagavānviṣṇustapaścarati dāruṇam

यह शुभ-अशुभमय संसार अन्यथा हो ही नहीं सकता। कभी भगवान् विष्णु अत्यंत घोर तपस्या करते हैं;

श्लोक 23 (devibhagavatam.4.13.23)

कदाचिद्विविधान्यज्ञान्वितनोति सुराधिपः । कदाचित्तु रमारङ्गरञ्जितः परमेश्वरः

kadācidvividhānyajñānvitanoti surādhipaḥ kadācittu ramāraṅgarañjitaḥ parameśvaraḥ

कभी वे देवाधिपति नाना यज्ञों का विस्तार करते हैं; और कभी वे परमेश्वर रमा-रंग में रंगे हुए,

श्लोक 24 (devibhagavatam.4.13.24)

रमते किल वैकुण्ठे तद्वशस्तरुणो विभुः । कदाचिद्दानवैः सार्धं युद्धं परमदारुणम्

ramate kila vaikuṇṭhe tadvaśastaruṇo vibhuḥ kadāciddānavaiḥ sārdhaṁ yuddhaṁ paramadāruṇam

वैकुण्ठ में उसी के वशीभूत तरुण विभु होकर रमण करते हैं; और कभी दानवों के साथ अत्यंत भीषण युद्ध करते हैं,

श्लोक 25 (devibhagavatam.4.13.25)

करोति करुणासिन्धुस्तद्बाणापीडितो भृशम् । कदाचिज्जयमाप्नोति दैवात्सोऽपि पराजयम्

karoti karuṇāsindhustadbāṇāpīḍito bhṛśam kadācijjayamāpnoti daivātso'pi parājayam

वे करुणासागर उनके बाणों से अत्यंत पीड़ित भी होते हैं। कभी वे विजय प्राप्त करते हैं, तो कभी दैववश उन्हें भी पराजय मिलती है —

श्लोक 26 (devibhagavatam.4.13.26)

सुखदुःखाभिभूतोऽसौ भवत्येव न संशयः । शेषे शेते कदाचिद्वै योगनिद्रासमावृतः

sukhaduḥkhābhibhūto'sau bhavatyeva na saṁśayaḥ śeṣe śete kadācidvai yoganidrāsamāvṛtaḥ

वे निश्चय ही सुख-दुःख से अभिभूत होते ही हैं। कभी वे शेषनाग पर योगनिद्रा से आवृत होकर शयन करते हैं;

श्लोक 27 (devibhagavatam.4.13.27)

काले जागर्ति विश्वात्मा स्वभावप्रतिबोधितः । शर्वो ब्रह्मा हरिश्चेति इन्द्राद्या ये सुरास्तथा

kāle jāgarti viśvātmā svabhāvapratibodhitaḥ śarvo brahmā hariśceti indrādyā ye surāstathā

और समय आने पर वह विश्वात्मा अपने स्वभाव से जाग जाता है। शिव, ब्रह्मा, हरि तथा इन्द्र आदि अन्य देवगण भी —

श्लोक 28 (devibhagavatam.4.13.28)

मुनयश्च विनिर्माणैः स्वायुषो विचरन्ति हि । निशावसाने सञ्जाते जगत्स्थावरजङ्गमम्

munayaśca vinirmāṇaiḥ svāyuṣo vicaranti hi niśāvasāne sañjāte jagatsthāvarajaṅgamam

तथा मुनि भी अपने-अपने आयु के अनुसार विचरण करते हैं। रात्रि के अंत में, सम्पूर्ण चराचर जगत्,

श्लोक 29 (devibhagavatam.4.13.29)

म्रियते नात्र सन्देहो नृप किञ्चित्कदापि च । स्वायुषोऽन्ते पद्यजाद्याः क्षयमृच्छन्ति पार्थिव

mriyate nātra sandeho nṛpa kiñcitkadāpi ca svāyuṣo'nte padyajādyāḥ kṣayamṛcchanti pārthiva

कभी भी किंचित् नष्ट नहीं होता — हे राजन्! इसमें कोई संदेह नहीं। हे पार्थिव! अपनी-अपनी आयु के अंत में ब्रह्मा आदि भी क्षय को प्राप्त होते हैं,

श्लोक 30 (devibhagavatam.4.13.30)

प्रभवन्ति पुनर्विष्णुहरशक्रादयः सुराः । तस्मात्कामादिकान्भावान्देहवान्प्रतिपद्यते

prabhavanti punarviṣṇuharaśakrādayaḥ surāḥ tasmātkāmādikānbhāvāndehavānpratipadyate

और फिर से विष्णु, हर, इन्द्र आदि देवता उत्पन्न होते हैं। इसलिए देहधारी काम आदि भावों को अवश्य ही प्राप्त करता है —

श्लोक 31 (devibhagavatam.4.13.31)

नात्र ते विस्मयः कार्यः कदाचिदपि पार्थिव । संसारोऽयं तु सन्दिग्धः कामक्रोधादिभिर्नृप

nātra te vismayaḥ kāryaḥ kadācidapi pārthiva saṁsāro'yaṁ tu sandigdhaḥ kāmakrodhādibhirnṛpa

हे पार्थिव! इसमें तुम्हें कभी भी विस्मय नहीं करना चाहिए। हे राजन्! यह संसार तो काम-क्रोध आदि से संदिग्ध ही है;

श्लोक 32 (devibhagavatam.4.13.32)

दुर्लभस्तद्विनिर्मुक्तः पुरुषः परमार्थवित् । यो बिभेतीह संसारे स दारान्न करोत्यपि

durlabhastadvinirmuktaḥ puruṣaḥ paramārthavit yo bibhetīha saṁsāre sa dārānna karotyapi

उससे पूर्णतः मुक्त और परमार्थ-ज्ञाता पुरुष दुर्लभ है। जो इस संसार से भयभीत रहता है, वह विवाह भी नहीं करता;

श्लोक 33 (devibhagavatam.4.13.33)

विमुक्तः सर्वसङ्गेभ्यो विचरत्यविशङ्कितः । तस्माद्बृहस्पतेर्भार्या शशिना लम्भिता पुनः

vimuktaḥ sarvasaṅgebhyo vicaratyaviśaṅkitaḥ tasmādbṛhaspaterbhāryā śaśinā lambhitā punaḥ

वह समस्त संगों से मुक्त होकर निःशंक विचरण करता है। इसी प्रकार बृहस्पति की पत्नी को भी चन्द्रमा ने हर लिया था;

श्लोक 34 (devibhagavatam.4.13.34)

गुरूणा लम्भिता भार्या तथा भ्रातुर्यवीयसः । एवं संसारचक्रेऽस्मिन् रागलोभादिभिर्वृतः

gurūṇā lambhitā bhāryā tathā bhrāturyavīyasaḥ evaṁ saṁsāracakre'smin rāgalobhādibhirvṛtaḥ

और गुरु ने भी अपने छोटे भाई की पत्नी को हर लिया था। इस प्रकार इस संसार-चक्र में राग-लोभ आदि से आवृत होकर —

श्लोक 35 (devibhagavatam.4.13.35)

गार्हस्थ्यञ्च समास्थाय कथं मुक्तो भवेन्नरः । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन हित्वा संसारसारताम्

gārhasthyañca samāsthāya kathaṁ mukto bhavennaraḥ tasmātsarvaprayatnena hitvā saṁsārasāratām

तो फिर गृहस्थाश्रम में रहते हुए मनुष्य मुक्त कैसे हो सकता है? इसलिए सम्पूर्ण प्रयत्न से संसार की सारता को त्यागकर,

श्लोक 36 (devibhagavatam.4.13.36)

आराधयेन्महेशानीं सच्चिदानन्दरूपिणीम् । तन्मायागुणतश्छन्नं जगदेतच्चराचरम्

ārādhayenmaheśānīṁ saccidānandarūpiṇīm tanmāyāguṇataśchannaṁ jagadetaccarācaram

उस सच्चिदानन्दस्वरूपिणी महेश्वरी की आराधना करनी चाहिए। उन्हीं के माया-गुणों से आच्छादित यह सम्पूर्ण चराचर जगत्,

श्लोक 37 (devibhagavatam.4.13.37)

भ्रमत्युन्मत्तवत्सर्वं मदिरामत्तवन्नृप । तस्या आराधनेनैव गुणान्सर्वान्विमृद्य च

bhramatyunmattavatsarvaṁ madirāmattavannṛpa tasyā ārādhanenaiva guṇānsarvānvimṛdya ca

हे राजन्! यह सब मानो पागल के समान, मदिरा से उन्मत्त के समान भ्रमण करता रहता है। उन्हीं की आराधना से ही समस्त गुणों को कुचलकर,

श्लोक 38 (devibhagavatam.4.13.38)

मुक्तिं भजेत मतिमान्नान्यः पन्थास्त्वितः परः । आराधिता महेशानी न यावत्कुरुते कृपाम्

muktiṁ bhajeta matimānnānyaḥ panthāstvitaḥ paraḥ ārādhitā maheśānī na yāvatkurute kṛpām

बुद्धिमान् व्यक्ति मुक्ति को प्राप्त होता है — इससे परे कोई अन्य मार्ग नहीं है। जब तक आराधित महेश्वरी कृपा नहीं करतीं,

श्लोक 39 (devibhagavatam.4.13.39)

तावद्भवेत्सुखं कस्मात्कोऽन्योऽस्ति दयया युतः । करुणासागरामेतां भजेत्तस्मादमायया

tāvadbhavetsukhaṁ kasmātko'nyo'sti dayayā yutaḥ karuṇāsāgarāmetāṁ bhajettasmādamāyayā

तब तक भला सुख कैसे प्राप्त हो सकता है? उनके अतिरिक्त दया से युक्त और कौन है? इसलिए निष्कपट भाव से इस करुणासागरा देवी की आराधना करनी चाहिए —

श्लोक 40 (devibhagavatam.4.13.40)

यस्यास्तु भजनेनैव जीवन्मुक्तत्वमश्नुते । मानुष्यं दुर्लभं प्राप्य सेविता न महेश्वरी

yasyāstu bhajanenaiva jīvanmuktatvamaśnute mānuṣyaṁ durlabhaṁ prāpya sevitā na maheśvarī

क्योंकि उनकी उपासना से ही जीवन्मुक्ति प्राप्त होती है। इस दुर्लभ मानव-जन्म को पाकर भी जिसने महेश्वरी की सेवा नहीं की,

श्लोक 41 (devibhagavatam.4.13.41)

निःश्रेणिकाग्रात्पतिता अध इत्येव विद्महे । अहङ्कारावृतं विश्वं गुणत्रयसमन्वितम्

niḥśreṇikāgrātpatitā adha ityeva vidmahe ahaṅkārāvṛtaṁ viśvaṁ guṇatrayasamanvitam

वह मानो सीढ़ी के शिखर से नीचे गिर गया — ऐसा ही हम मानते हैं। अहंकार से आवृत, त्रिगुणयुक्त यह विश्व,

श्लोक 42 (devibhagavatam.4.13.42)

असत्येनापि सम्बद्धं मुच्यते कथमन्यथा । हित्वा सर्वं ततः सर्वेः संसेव्या भुवनेश्वरी

asatyenāpi sambaddhaṁ mucyate kathamanyathā hitvā sarvaṁ tataḥ sarveḥ saṁsevyā bhuvaneśvarī

और असत्य से भी बंधा हुआ है — इससे अन्यथा मुक्ति कैसे हो सकती है? इसलिए सब कुछ त्यागकर सभी को भुवनेश्वरी की सेवा करनी चाहिए।

श्लोक 43 (devibhagavatam.4.13.43)

राजोवाच । किं कृतं गुरूणा तत्र काव्यरूपधरेण च । कदा शुक्रः समायातस्तन्मे ब्रूहि पितामह

rājovāca kiṁ kṛtaṁ gurūṇā tatra kāvyarūpadhareṇa ca kadā śukraḥ samāyātastanme brūhi pitāmaha

राजा ने कहा — काव्य का रूप धारण करने वाले उन गुरु ने वहाँ आगे क्या किया? शुक्राचार्य कब लौटे? हे पितामह! मुझे यह बताइए।

श्लोक 44 (devibhagavatam.4.13.44)

व्यास उवाच । शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि यत्कृतं गुरुणा तदा । कृत्वा काव्यस्वरूपञ्च प्रच्छन्नेन महात्मना

vyāsa uvāca śṛṇu rājan pravakṣyāmi yatkṛtaṁ guruṇā tadā kṛtvā kāvyasvarūpañca pracchannena mahātmanā

व्यास जी ने कहा — हे राजन्! सुनिए, मैं बताता हूँ कि उन गुरु ने तब क्या किया — काव्य का रूप धारण करके, अपनी पहचान छिपाकर उन महात्मा ने,

श्लोक 45 (devibhagavatam.4.13.45)

गुरुणा बोधिता दैत्या मत्वा काव्यं स्वकं गुरुम् । विश्वासं परमं कृत्वा बभूवुस्तन्मयास्तदा

guruṇā bodhitā daityā matvā kāvyaṁ svakaṁ gurum viśvāsaṁ paramaṁ kṛtvā babhūvustanmayāstadā

गुरु द्वारा उपदेश दिए जाने पर, उन्हें अपना गुरु काव्य समझकर, परम विश्वास करके दैत्य तब उनके ही वचनों में तन्मय हो गए।

श्लोक 46 (devibhagavatam.4.13.46)

विद्यार्थं शरणं प्राप्ता भृगुं मत्वातिमोहिताः । गुरुणा विप्रलब्धास्ते लोभात्को वा न मुह्यति

vidyārthaṁ śaraṇaṁ prāptā bhṛguṁ matvātimohitāḥ guruṇā vipralabdhāste lobhātko vā na muhyati

विद्या के लिए शरण में आए, अत्यंत मोहित होकर भृगु समझकर, वे गुरु द्वारा छले गए — लोभ से भला कौन मोहित नहीं होता?

श्लोक 47 (devibhagavatam.4.13.47)

दशवर्षात्मके काले सम्पूर्णसमये तदा । जयन्त्या सह क्रीडित्वा काव्यो याज्यानचिन्तयत्

daśavarṣātmake kāle sampūrṇasamaye tadā jayantyā saha krīḍitvā kāvyo yājyānacintayat

दस वर्षों की वह अवधि पूर्ण होने पर, जयन्ती के साथ रमण करते हुए काव्य को अपने यजमानों की चिंता हुई —

श्लोक 48 (devibhagavatam.4.13.48)

आशया मम मार्गं ते पश्यन्तः संस्थिताः किल । गत्वा तान्वै प्रपश्येऽहं याज्यानतिभयातुरान्

āśayā mama mārgaṁ te paśyantaḥ saṁsthitāḥ kila gatvā tānvai prapaśye'haṁ yājyānatibhayāturān

"आशा से वे निश्चय ही मेरे मार्ग की प्रतीक्षा में खड़े हैं। मुझे जाकर उन अत्यंत भयातुर यजमानों को देखना चाहिए,

श्लोक 49 (devibhagavatam.4.13.49)

मा देवेभ्यो भयं तेषां मद्भक्तानां भवेदिति । सञ्चिन्त्य बुद्धिमास्थाय जयन्तीं प्रत्युवाच ह

mā devebhyo bhayaṁ teṣāṁ madbhaktānāṁ bhavediti sañcintya buddhimāsthāya jayantīṁ pratyuvāca ha

कहीं मेरे भक्तों को देवताओं का भय न सताए।" ऐसा विचार करके, बुद्धिपूर्वक निश्चय करके, उन्होंने जयन्ती से कहा —

श्लोक 50 (devibhagavatam.4.13.50)

देवानेवोपसंयान्ति पुत्रा मे चारुलोचने । समयस्तेऽद्य सम्पूर्णो जातोऽयं दशवार्षिकः

devānevopasaṁyānti putrā me cārulocane samayaste'dya sampūrṇo jāto'yaṁ daśavārṣikaḥ

"हे चारुलोचने! मेरे पुत्रगण देवताओं के पास ही जाते होंगे। आज यह दस वर्षों की अवधि पूर्ण हो चुकी है —

श्लोक 51 (devibhagavatam.4.13.51)

तस्माद् गच्छाम्यहं देवि द्रष्टुं याज्यान्सुमध्यमे । पुनरेवागमिष्यामि तवान्तिकमनुद्रुतः

tasmād gacchāmyahaṁ devi draṣṭuṁ yājyānsumadhyame punarevāgamiṣyāmi tavāntikamanudrutaḥ

इसलिए हे देवि! हे सुमध्यमे! मैं अपने यजमानों को देखने जाता हूँ। मैं शीघ्र ही पुनः तुम्हारे पास लौट आऊँगा।"

श्लोक 52 (devibhagavatam.4.13.52)

तथेति तमुवाचाथ जयन्ती धर्मवित्तमा । यथेष्टं गच्छ धर्मज्ञ न ते धर्मं विलोपये

tatheti tamuvācātha jayantī dharmavittamā yatheṣṭaṁ gaccha dharmajña na te dharmaṁ vilopaye

"ऐसा ही हो," ऐसा कहकर धर्मज्ञा जयन्ती ने उत्तर दिया। "हे धर्मज्ञ! अपनी इच्छानुसार जाइए; मैं आपके धर्म का लोप नहीं करूँगी।"

श्लोक 53 (devibhagavatam.4.13.53)

तच्छ्रुत्वा वचनं काव्यो जगाम त्वरितस्ततः । अपश्यद्दानवानां च पार्श्वे वाचस्पतिं तदा

tacchrutvā vacanaṁ kāvyo jagāma tvaritastataḥ apaśyaddānavānāṁ ca pārśve vācaspatiṁ tadā

यह वचन सुनकर काव्य वहाँ से शीघ्रता से चल पड़े; और उन्होंने दानवों के पास ही वाचस्पति को देखा,

श्लोक 54 (devibhagavatam.4.13.54)

छद्मरूपधरं सौम्यं बोधयन्तं छलेन तान् । जैनं धर्मं कृतं स्वेन यज्ञनिन्दापरं तथा

chadmarūpadharaṁ saumyaṁ bodhayantaṁ chalena tān jainaṁ dharmaṁ kṛtaṁ svena yajñanindāparaṁ tathā

वे सौम्य रूप में छद्मवेश धारण किए, छलपूर्वक उन्हें उपदेश दे रहे थे, अपने द्वारा रचित जैन-सदृश धर्म, जो यज्ञ-निन्दा में लीन था —

श्लोक 55 (devibhagavatam.4.13.55)

भो देवरिपवः सत्यं ब्रवीमि भवतां हितम् । अहिंसा परमो धर्मोऽहन्तव्या ह्याततायिनः

bho devaripavaḥ satyaṁ bravīmi bhavatāṁ hitam ahiṁsā paramo dharmo'hantavyā hyātatāyinaḥ

"हे देव-शत्रुओ! मैं सत्य ही कहता हूँ, तुम्हारे हित की बात कहता हूँ — अहिंसा ही परम धर्म है; आततायी का भी वध नहीं करना चाहिए।

श्लोक 56 (devibhagavatam.4.13.56)

द्विजैर्भोगरतैर्वेदे दर्शितं हिंसनं पशोः । जिह्वास्वादपरैः काममहिंसैव परा मता

dvijairbhogaratairvede darśitaṁ hiṁsanaṁ paśoḥ jihvāsvādaparaiḥ kāmamahiṁsaiva parā matā

वेद में जो पशु-हिंसा दिखाई गई है, वह जिह्वा के स्वाद में लीन भोगपरायण ब्राह्मणों द्वारा रची गई है — अहिंसा ही वास्तव में परम श्रेष्ठ मानी गई है।"

श्लोक 57 (devibhagavatam.4.13.57)

एवंविधानि वाक्यानि वेदशास्त्रपराणि च । ब्रुवाणं गुरुमाकर्ण्य विस्मितोऽसौ भृगोः सुतः

evaṁvidhāni vākyāni vedaśāstraparāṇi ca bruvāṇaṁ gurumākarṇya vismito'sau bhṛgoḥ sutaḥ

वेद-शास्त्रों के परायण-से प्रतीत होने वाले ऐसे वचन कहते हुए गुरु को सुनकर, भृगु-पुत्र काव्य विस्मित हो गए,

श्लोक 58 (devibhagavatam.4.13.58)

चिन्तयामास मनसा मम द्वेष्यो गुरुः किल । वञ्चिताः किल धूर्तेन याज्या मे नात्र संशयः

cintayāmāsa manasā mama dveṣyo guruḥ kila vañcitāḥ kila dhūrtena yājyā me nātra saṁśayaḥ

और मन में विचार करने लगे — "यह गुरु निश्चय ही मेरा द्वेषी है। इस धूर्त ने निश्चय ही मेरे यजमानों को छल लिया है, इसमें कोई संदेह नहीं।

श्लोक 59 (devibhagavatam.4.13.59)

धिग्लोभं पापबीजं वै नरकद्वारमूर्जितम् । गुरुरप्यनृतं ब्रूते प्रेरितो येन पाप्मना

dhiglobhaṁ pāpabījaṁ vai narakadvāramūrjitam gururapyanṛtaṁ brūte prerito yena pāpmanā

धिक्कार है उस लोभ को, जो पाप का बीज और नरक का प्रबल द्वार है — जिससे प्रेरित होकर गुरु भी असत्य बोलते हैं।

श्लोक 60 (devibhagavatam.4.13.60)

प्रमाणं वचनं यस्य सोऽपि पाखण्डधारकः । गुरुः सुराणां सर्वेषां धर्मशास्त्रप्रवर्तकः

pramāṇaṁ vacanaṁ yasya so'pi pākhaṇḍadhārakaḥ guruḥ surāṇāṁ sarveṣāṁ dharmaśāstrapravartakaḥ

जिसका वचन प्रमाण माना जाता है, वही पाखण्ड धारण करने वाला बन गया है — जो समस्त देवताओं का गुरु और धर्मशास्त्रों का प्रवर्तक है!

श्लोक 61 (devibhagavatam.4.13.61)

किं किं न लभते लोभान्मलिनीकृतमानसः । अन्योऽपि गुरुरप्येवं जातः पाखण्डपण्डितः

kiṁ kiṁ na labhate lobhānmalinīkṛtamānasaḥ anyo'pi gururapyevaṁ jātaḥ pākhaṇḍapaṇḍitaḥ

लोभ से मलिन हुए मन वाला व्यक्ति क्या-क्या नहीं कर सकता? इस प्रकार गुरु भी पाखण्ड में निपुण पण्डित बन गए हैं!

श्लोक 62 (devibhagavatam.4.13.62)

शैलूषचेष्टितं सर्वं परिगृह्य द्विजोत्तमः । वञ्जयत्यतिसम्मूढान्दैत्यान्याज्यान्ममाप्यसौ

śailūṣaceṣṭitaṁ sarvaṁ parigṛhya dvijottamaḥ vañjayatyatisammūḍhāndaityānyājyānmamāpyasau

वह द्विजोत्तम, पूर्णतः एक अभिनेता की भाँति चेष्टा करते हुए, उन अत्यंत मोहित मेरे ही यजमानों, दैत्यों को छल रहा है!"

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