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चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 5

नर-नारायण की कथा का वर्णन

अध्याय 4अध्याय-सूचीअध्याय 6

श्लोक 1 (devibhagavatam.4.5.1)

व्यास उवाच । अथ किं बहुनोक्तेन संसारेऽस्मिन्नृपोत्तम । धर्मात्माद्रोहबुद्धिस्तु कश्चिद्भवति कर्हिचित्

vyāsa uvāca atha kiṁ bahunoktena saṁsāre'sminnṛpottama dharmātmādrohabuddhistu kaścidbhavati karhicit

व्यास जी ने कहा — हे नृपोत्तम! अधिक कहने से क्या लाभ? इस संसार में कोई भी धर्मात्मा ऐसा कभी होता है, जिसकी बुद्धि द्रोह-रहित हो?

श्लोक 2 (devibhagavatam.4.5.2)

रागद्वेषावृतं विश्वं सर्वं स्थावरजङ्गमम् । आद्ये युगेऽपि राजेन्द्र किमद्य कलिदूषिते

rāgadveṣāvṛtaṁ viśvaṁ sarvaṁ sthāvarajaṅgamam ādye yuge'pi rājendra kimadya kalidūṣite

चराचर सम्पूर्ण विश्व राग-द्वेष से आवृत है — यह सत्ययुग में भी था, हे राजेन्द्र! फिर आज के कलियुग-दूषित काल की तो बात ही क्या?

श्लोक 3 (devibhagavatam.4.5.3)

देवाः सेर्ष्याश्च सद्रोहाश्छलकर्मरताः सदा । मानुषाणां तिरश्चां च का वार्ता नृप गण्यते

devāḥ serṣyāśca sadrohāśchalakarmaratāḥ sadā mānuṣāṇāṁ tiraścāṁ ca kā vārtā nṛpa gaṇyate

देवता भी ईर्ष्यायुक्त, द्रोहयुक्त और सदा छलकर्म में रत रहते हैं — हे राजन्! फिर मनुष्यों और पशुओं की तो बात ही क्या गिनी जाए?

श्लोक 4 (devibhagavatam.4.5.4)

द्रोहपरे द्रोहपरो भवेदिति समानता । अद्रोहिणि तथा शान्ते विद्वेषः खलता स्मृता

drohapare drohaparo bhavediti samānatā adrohiṇi tathā śānte vidveṣaḥ khalatā smṛtā

द्रोही के प्रति द्रोही होना तो एक समानता ही है। किन्तु अद्रोही और शान्त व्यक्ति के प्रति द्वेष रखना ही खलता कही गई है।

श्लोक 5 (devibhagavatam.4.5.5)

यः कश्चित्तापसः शान्तो जपध्यानपरायणः । भवेत्तस्य जपे विघ्नकर्ता वै मघवा परम्

yaḥ kaścittāpasaḥ śānto japadhyānaparāyaṇaḥ bhavettasya jape vighnakartā vai maghavā param

जो भी शान्त तपस्वी जप-ध्यान में परायण होता है, स्वयं मघवान् ही उसके जप में सबसे बड़ा विघ्नकर्ता बन जाता है।

श्लोक 6 (devibhagavatam.4.5.6)

सतां सत्ययुगं साक्षात्सर्वदैवासतां कलिः । मध्यमो मध्यमानां तु क्रियायोगौ युगे स्मृतौ

satāṁ satyayugaṁ sākṣātsarvadaivāsatāṁ kaliḥ madhyamo madhyamānāṁ tu kriyāyogau yuge smṛtau

सज्जनों के लिए तो सदा साक्षात् सत्ययुग ही है, और दुर्जनों के लिए सदा कलियुग ही है। मध्यम स्वभाव वालों के लिए क्रिया और योग वाले मध्यम युग कहे गए हैं।

श्लोक 7 (devibhagavatam.4.5.7)

कश्चित्कदाचिद्भवति सत्यधर्मानुवर्तकः । अन्यथान्ययुगानां वै सर्वे धर्मपरायणाः

kaścitkadācidbhavati satyadharmānuvartakaḥ anyathānyayugānāṁ vai sarve dharmaparāyaṇāḥ

कोई विरला ही कभी सत्यधर्म का सच्चा अनुयायी होता है; अन्यथा अन्य युगों में सभी स्वयं को धर्मपरायण ही कहते हैं।

श्लोक 8 (devibhagavatam.4.5.8)

वासना कारणं राजन् सर्वत्र धर्मसंस्थितौ । तस्यां वै मलिनायां तु धर्मोऽपि मलिनो भवेत्

vāsanā kāraṇaṁ rājan sarvatra dharmasaṁsthitau tasyāṁ vai malināyāṁ tu dharmo'pi malino bhavet

हे राजन्! धर्म की स्थिति में सर्वत्र वासना ही कारण है। वासना के मलिन होने पर धर्म भी मलिन हो जाता है।

श्लोक 9 (devibhagavatam.4.5.9)

मलिना वासना सत्यं विनाशायेति सर्वथा । ब्रह्मणो हृदयाज्जातः पुत्रो धर्म इति स्मृतः

malinā vāsanā satyaṁ vināśāyeti sarvathā brahmaṇo hṛdayājjātaḥ putro dharma iti smṛtaḥ

मलिन वासना निश्चय ही सर्वथा विनाश की ओर ले जाती है। ब्रह्मा के हृदय से उत्पन्न पुत्र धर्म कहे जाते हैं।

श्लोक 10 (devibhagavatam.4.5.10)

ब्राह्मणः सत्यसम्पन्नो वेदधर्मरतः सदा । दक्षस्य दुहितारो हि वृता दश महात्मना

brāhmaṇaḥ satyasampanno vedadharmarataḥ sadā dakṣasya duhitāro hi vṛtā daśa mahātmanā

वे धर्म सत्यसम्पन्न ब्राह्मण, सदा वेद-धर्म में रत हैं। उन महात्मा ने दक्ष की दस पुत्रियों को पत्नी रूप में वरण किया —

श्लोक 11 (devibhagavatam.4.5.11)

विवाहविधिना सम्यङ्मुनिना गृहधर्मिणा । तास्वजीजनयत्पुत्रान्धर्मः सत्यवतां वरः

vivāhavidhinā samyaṅmuninā gṛhadharmiṇā tāsvajījanayatputrāndharmaḥ satyavatāṁ varaḥ

विधिपूर्वक विवाह-संस्कार द्वारा, गृहस्थ-धर्म पालन करने वाले उन मुनि ने। सत्यवानों में श्रेष्ठ धर्म ने उनसे पुत्रों को उत्पन्न किया —

श्लोक 12 (devibhagavatam.4.5.12)

हरिं कृष्णं नरं चैव तथा नारायणं नृप । योगाभ्यासरतो नित्यं हरिः कृष्णो बभूव ह

hariṁ kṛṣṇaṁ naraṁ caiva tathā nārāyaṇaṁ nṛpa yogābhyāsarato nityaṁ hariḥ kṛṣṇo babhūva ha

हे राजन्! हरि-कृष्ण, तथा नर और नारायण नामक पुत्र। हरि-कृष्ण सदा योगाभ्यास में लीन रहने वाले हुए।

श्लोक 13 (devibhagavatam.4.5.13)

नरनारायणौ चैव चेरतुस्तप उत्तमम् । प्रालेयाद्रिं समागत्य तीर्थे बदरिकाश्रमे

naranārāyaṇau caiva ceratustapa uttamam prāleyādriṁ samāgatya tīrthe badarikāśrame

और नर-नारायण ने हिमालय पर्वत पर आकर, बदरिकाश्रम तीर्थ में, परम उत्तम तपस्या की।

श्लोक 14 (devibhagavatam.4.5.14)

तपस्विषु धुरीणौ तौ पुराणौ मुनिसत्तमौ । गृणन्तौ तत्परं ब्रह्म गङ्गाया विपुले तटे

tapasviṣu dhurīṇau tau purāṇau munisattamau gṛṇantau tatparaṁ brahma gaṅgāyā vipule taṭe

वे दोनों तपस्वियों में श्रेष्ठ, पुरातन मुनिश्रेष्ठ, गंगा के विस्तृत तट पर परब्रह्म का गुणगान करते हुए —

श्लोक 15 (devibhagavatam.4.5.15)

हरेरंशौ स्थितौ तत्र नरनारायणावृषी । पूर्णं वर्षसहस्रं तु चक्राते तप उत्तमम्

hareraṁśau sthitau tatra naranārāyaṇāvṛṣī pūrṇaṁ varṣasahasraṁ tu cakrāte tapa uttamam

वे दोनों ऋषि नर-नारायण, हरि के अंश, वहाँ स्थित होकर पूरे एक हजार वर्ष तक परम उत्तम तप करते रहे।

श्लोक 16 (devibhagavatam.4.5.16)

तापितं च जगत्सर्वं तपसा सचराचरम् । नरनारायणाभ्यां च शक्रः क्षोभं तदा ययौ

tāpitaṁ ca jagatsarvaṁ tapasā sacarācaram naranārāyaṇābhyāṁ ca śakraḥ kṣobhaṁ tadā yayau

उनके तप से सम्पूर्ण चराचर जगत् संतप्त हो उठा; और नर-नारायण के कारण इन्द्र भी क्षुब्ध हो गए।

श्लोक 17 (devibhagavatam.4.5.17)

चिन्ताविष्टः सहस्राक्षो मनसा समकल्पयत् । किं कर्तव्यं धर्मपुत्रौ तापसौ ध्यानसंयुतौ

cintāviṣṭaḥ sahasrākṣo manasā samakalpayat kiṁ kartavyaṁ dharmaputrau tāpasau dhyānasaṁyutau

चिन्ता से भरे हुए सहस्राक्ष इन्द्र ने मन में सोचा — "क्या किया जाए? धर्म के वे दोनों पुत्र, ध्यानमग्न तपस्वी —

श्लोक 18 (devibhagavatam.4.5.18)

सिद्धार्थां सुभृशं श्रेष्ठमासनं मे ग्रहीष्यतः । विघ्नः कथं प्रकर्तव्यस्तपो येन भवेन्न हि

siddhārthāṁ subhṛśaṁ śreṣṭhamāsanaṁ me grahīṣyataḥ vighnaḥ kathaṁ prakartavyastapo yena bhavenna hi

सिद्धार्थ होकर वे मेरे इस श्रेष्ठ आसन को ग्रहण कर लेंगे। ऐसा विघ्न कैसे किया जाए, जिससे यह तप सफल न हो?"

श्लोक 19 (devibhagavatam.4.5.19)

उत्पाद्य कामं क्रोधञ्च लोभं वाप्यतिदारुणम् । इत्युद्दिश्य सहस्राक्षः समारुह्य गजोत्तमम्

utpādya kāmaṁ krodhañca lobhaṁ vāpyatidāruṇam ityuddiśya sahasrākṣaḥ samāruhya gajottamam

"काम, क्रोध अथवा अत्यंत भयंकर लोभ उत्पन्न करके" — ऐसा विचार करके सहस्राक्ष इन्द्र, अपने श्रेष्ठ गज पर सवार होकर,

श्लोक 20 (devibhagavatam.4.5.20)

विघ्नकामस्तु तरसा जगाम गन्धमादनम् । गत्वा तत्राश्रमे पुण्ये तावपश्यच्छतक्रतुः

vighnakāmastu tarasā jagāma gandhamādanam gatvā tatrāśrame puṇye tāvapaśyacchatakratuḥ

विघ्न करने की इच्छा से वेगपूर्वक गन्धमादन पर्वत गए। वहाँ उस पवित्र आश्रम में जाकर शतक्रतु ने उन दोनों को देखा,

श्लोक 21 (devibhagavatam.4.5.21)

तपसा दीप्तदेहौ तु भास्कराविव चोदितौ । ब्रह्मविष्णू किमेतौ वै प्रकटौ वा विभावसू

tapasā dīptadehau tu bhāskarāviva coditau brahmaviṣṇū kimetau vai prakaṭau vā vibhāvasū

तप से देदीप्यमान शरीर वाले, मानो दो उगते हुए सूर्य के समान — "क्या ये ब्रह्मा और विष्णु प्रकट हुए हैं, या दो अग्नियाँ प्रकट हुई हैं?

श्लोक 22 (devibhagavatam.4.5.22)

धर्मपुत्रावृषी एतौ तपसा किं करिष्यतः । इति सञ्चिन्त्य तौ दृष्ट्वा तदोवाच शचीपतिः

dharmaputrāvṛṣī etau tapasā kiṁ kariṣyataḥ iti sañcintya tau dṛṣṭvā tadovāca śacīpatiḥ

ये धर्म के दोनों ऋषि-पुत्र हैं क्या? ये अपने तप से क्या प्राप्त करेंगे?" — ऐसा सोचकर, उन्हें देखकर, शचीपति इन्द्र ने तब कहा —

श्लोक 23 (devibhagavatam.4.5.23)

किं वा कार्यं महाभागौ ब्रूतं धर्मसुतौ किल । ददामि वां वरं श्रेष्ठं दातुं यातोऽस्म्यहमृषी

kiṁ vā kāryaṁ mahābhāgau brūtaṁ dharmasutau kila dadāmi vāṁ varaṁ śreṣṭhaṁ dātuṁ yāto'smyahamṛṣī

"हे महाभागो! हे धर्मसुतो! तुम क्या चाहते हो, कहो। मैं तुम्हें श्रेष्ठ वरदान देने आया हूँ, हे ऋषियो!

श्लोक 24 (devibhagavatam.4.5.24)

अदेयमपि दास्यामि तुष्टोऽस्मि तपसा किल । व्यास उवाच । एवं पुनः पुनः शक्रस्तावुवाच पुरः स्थितः

adeyamapi dāsyāmi tuṣṭo'smi tapasā kila vyāsa uvāca evaṁ punaḥ punaḥ śakrastāvuvāca puraḥ sthitaḥ

मैं तुम्हारे तप से प्रसन्न होकर वह भी दूँगा जो अन्यथा अदेय है।" व्यास जी ने कहा — इस प्रकार बार-बार सामने खड़े होकर इन्द्र ने उनसे कहा —

श्लोक 25 (devibhagavatam.4.5.25)

नोचतुस्तावृषी ध्यानसंस्थितौ दृढचेतसौ । ततो वै मोहिनीं मायां चकार भयदां वृषः

nocatustāvṛṣī dhyānasaṁsthitau dṛḍhacetasau tato vai mohinīṁ māyāṁ cakāra bhayadāṁ vṛṣaḥ

किन्तु वे दोनों दृढ़चित्त ऋषि, ध्यानस्थ रहते हुए, कुछ नहीं बोले। तब इन्द्र ने भयदायक और मोहित करने वाली माया रची।

श्लोक 26 (devibhagavatam.4.5.26)

वृकान्सिंहांश्च व्याघ्रांश्च समुत्पाद्याबिभीषयत् । वर्षं वातं तथा वह्निं समुत्पाद्य पुनः पुनः

vṛkānsiṁhāṁśca vyāghrāṁśca samutpādyābibhīṣayat varṣaṁ vātaṁ tathā vahniṁ samutpādya punaḥ punaḥ

भेड़ियों, सिंहों और बाघों को उत्पन्न करके उसने उन्हें भयभीत करने का प्रयत्न किया; बार-बार वर्षा, आंधी तथा अग्नि उत्पन्न करके,

श्लोक 27 (devibhagavatam.4.5.27)

भीषयामास तौ शक्रो मायां कृत्वा विमोहिनीम् । भयतोऽपि वशं नीतौ न तौ धर्मसुतौ मुनी

bhīṣayāmāsa tau śakro māyāṁ kṛtvā vimohinīm bhayato'pi vaśaṁ nītau na tau dharmasutau munī

इन्द्र ने उस मोहिनी माया द्वारा उन्हें भयभीत करने का प्रयास किया। किन्तु भय से भी वे दोनों धर्मसुत मुनि वश में नहीं आए।

श्लोक 28 (devibhagavatam.4.5.28)

नरनारायणौ दृष्ट्वा शक्रः स्वभवनं गतः । वरदाने प्रलुब्धौ न न भीतौ वह्निवायुतः

naranārāyaṇau dṛṣṭvā śakraḥ svabhavanaṁ gataḥ varadāne pralubdhau na na bhītau vahnivāyutaḥ

नर-नारायण को इस प्रकार देखकर इन्द्र अपने भवन को लौट गए। वे न वरदान के लोभ में आए, न अग्नि-वायु से भयभीत हुए।

श्लोक 29 (devibhagavatam.4.5.29)

व्याघ्रसिंहादिभिः कान्तौ चलितौ नाश्रमात्स्वकात् । न तयोर्ध्यानभङ्गं वै कर्तुं कोऽपि क्षमोऽभवत्

vyāghrasiṁhādibhiḥ kāntau calitau nāśramātsvakāt na tayordhyānabhaṅgaṁ vai kartuṁ ko'pi kṣamo'bhavat

वे तिनके तक भी बाघ-सिंहों से डरकर अपने आश्रम से नहीं हिले। उनके ध्यान को भंग करने में कोई भी समर्थ नहीं हो सका।

श्लोक 30 (devibhagavatam.4.5.30)

इन्द्रोऽपि सदनं गत्वा चिन्तयामास दुःखितः । चलितौ भयलोभाभ्यां नेमौ मुनिवरोत्तमौ

indro'pi sadanaṁ gatvā cintayāmāsa duḥkhitaḥ calitau bhayalobhābhyāṁ nemau munivarottamau

इन्द्र भी अपने भवन में जाकर दुःखी होकर सोचने लगे — "ये दोनों श्रेष्ठ मुनिवर न तो भय से विचलित हुए, न लोभ से।

श्लोक 31 (devibhagavatam.4.5.31)

चिन्तयन्तौ महाविद्यामादिशक्तिं सनातनीम् । ईश्वरीं सर्वलोकानां परां प्रकृतिमद्भुताम्

cintayantau mahāvidyāmādiśaktiṁ sanātanīm īśvarīṁ sarvalokānāṁ parāṁ prakṛtimadbhutām

वे उस महाविद्या, सनातन आदिशक्ति का ध्यान कर रहे हैं — जो सम्पूर्ण लोकों की ईश्वरी, परम अद्भुत प्रकृति हैं।

श्लोक 32 (devibhagavatam.4.5.32)

ध्यायतां कः क्षमो लोके बहुमायाविदप्युत । यन्मूलाः सकला माया देवासुरकृताः किल

dhyāyatāṁ kaḥ kṣamo loke bahumāyāvidapyuta yanmūlāḥ sakalā māyā devāsurakṛtāḥ kila

उनका ध्यान करने वालों को कौन विचलित कर सकता है, चाहे वह कितना ही बड़ा मायावी क्यों न हो? क्योंकि देवताओं और असुरों द्वारा रची गई समस्त माया का मूल तो वही आदिशक्ति है।

श्लोक 33 (devibhagavatam.4.5.33)

ते कथं बाधितुं शक्ता ध्यायन्ति गतकल्मषाः । वाग्बीजं कामबीजञ्च मायाबीजं तथैव च

te kathaṁ bādhituṁ śaktā dhyāyanti gatakalmaṣāḥ vāgbījaṁ kāmabījañca māyābījaṁ tathaiva ca

वे पापरहित होकर ध्यानमग्न हैं, उन्हें भला कौन बाधित कर सकता है? जिसके चित्त में वाग्बीज, कामबीज तथा मायाबीज —

श्लोक 34 (devibhagavatam.4.5.34)

चित्ते यस्य भवेत्तं तु बाधितुं कोऽपि न क्षमः । मायया मोहितः शक्रो भूयस्तस्य प्रतिक्रियाम्

citte yasya bhavettaṁ tu bādhituṁ ko'pi na kṣamaḥ māyayā mohitaḥ śakro bhūyastasya pratikriyām

— विद्यमान हो, उसे बाधित करने में कोई भी समर्थ नहीं है।" माया से मोहित इन्द्र ने पुनः उसका प्रतिकार करने के लिए,

श्लोक 35 (devibhagavatam.4.5.35)

कर्तुं कामवसन्तौ तु समाहूयाब्रवीद्वचः । मनोभव वसन्तेन रत्या युक्तो व्रजाधुना

kartuṁ kāmavasantau tu samāhūyābravīdvacaḥ manobhava vasantena ratyā yukto vrajādhunā

काम और वसन्त को बुलाकर ये वचन कहे — "हे मनोभव! अब तुम वसन्त और रति के साथ जाओ,

श्लोक 36 (devibhagavatam.4.5.36)

अप्सरोभिः समायुक्तस्तरसा गन्धमादनम् । नरनारायणौ तत्र पुराणावृषिसत्तमौ

apsarobhiḥ samāyuktastarasā gandhamādanam naranārāyaṇau tatra purāṇāvṛṣisattamau

अप्सराओं के साथ, शीघ्रता से गन्धमादन पर्वत को जाओ। वहाँ नर-नारायण, वे दोनों पुरातन मुनिश्रेष्ठ,

श्लोक 37 (devibhagavatam.4.5.37)

कुरुतस्तप एकान्ते स्थितौ बदरिकाश्रमे । गत्वा तत्र समीपे तु तयोर्मन्मथ मार्गणैः

kurutastapa ekānte sthitau badarikāśrame gatvā tatra samīpe tu tayormanmatha mārgaṇaiḥ

बदरिकाश्रम में एकांत में स्थित होकर तप कर रहे हैं। हे मन्मथ! वहाँ उनके समीप जाकर, अपने बाणों से —

श्लोक 38 (devibhagavatam.4.5.38)

चित्तं कामातुरं कार्यं कुरु कार्यं ममाधुना । मोहयित्वोच्चाटयित्वा विशिखैस्ताडयाशु च

cittaṁ kāmāturaṁ kāryaṁ kuru kāryaṁ mamādhunā mohayitvoccāṭayitvā viśikhaistāḍayāśu ca

उनके चित्त को कामातुर बना दो — अभी मेरा यह कार्य करो। उन्हें मोहित करके, विचलित करके, शीघ्र ही अपने बाणों से बींध दो,

श्लोक 39 (devibhagavatam.4.5.39)

वशीकुरु महाभाग मुनी धर्मसुतावपि । को ह्यस्मिन् सर्वसंसारे देवो दैत्योऽथ मानवः

vaśīkuru mahābhāga munī dharmasutāvapi ko hyasmin sarvasaṁsāre devo daityo'tha mānavaḥ

और हे महाभाग! धर्मसुत होते हुए भी उन दोनों मुनियों को अपने वश में कर लो। क्योंकि इस समस्त संसार में ऐसा कौन है — देव, दैत्य अथवा मनुष्य —

श्लोक 40 (devibhagavatam.4.5.40)

यस्ते बाणवशं प्राप्तो न याति भृशताडितः । ब्रह्माहं गिरिजानाथश्चन्द्रो वह्निर्विमोहितः

yaste bāṇavaśaṁ prāpto na yāti bhṛśatāḍitaḥ brahmāhaṁ girijānāthaścandro vahnirvimohitaḥ

जो तुम्हारे बाणों के वश में आकर, अत्यंत आहत होकर भी, विचलित न हुआ हो? ब्रह्मा, मैं स्वयं, गिरिजानाथ शिव, चन्द्रमा तथा अग्नि — सभी तुमसे मोहित हो चुके हैं।

श्लोक 41 (devibhagavatam.4.5.41)

गणना कानयोः काम त्वद्बाणानां पराक्रमे । वाराङ्गनागणोऽयं ते सहायार्थं मयेरितः

gaṇanā kānayoḥ kāma tvadbāṇānāṁ parākrame vārāṅganāgaṇo'yaṁ te sahāyārthaṁ mayeritaḥ

हे काम! तुम्हारे बाणों के पराक्रम के सामने इन दोनों की भला क्या गिनती है? यह वारांगनाओं का समूह मैंने तुम्हारी सहायता के लिए भेजा है।

श्लोक 42 (devibhagavatam.4.5.42)

आगमिष्यति तत्रैव रम्भादीनां मनोरमः । एका तिलोत्तमा रम्भा कार्यं साधयितुं क्षमा

āgamiṣyati tatraiva rambhādīnāṁ manoramaḥ ekā tilottamā rambhā kāryaṁ sādhayituṁ kṣamā

वहीं रम्भा आदि का मनोहर समूह भी आएगा। तिलोत्तमा और रम्भा में से एक ही यह कार्य सिद्ध करने में समर्थ है।

श्लोक 43 (devibhagavatam.4.5.43)

त्वमेवैकः क्षमः कामं मिलितैः कस्तु संशयः । कुरु कार्यं महाभाग ददामि तव वाञ्छितम्

tvamevaikaḥ kṣamaḥ kāmaṁ militaiḥ kastu saṁśayaḥ kuru kāryaṁ mahābhāga dadāmi tava vāñchitam

हे काम! तुम अकेले ही समर्थ हो, फिर सबके मिलने पर तो कोई संशय ही नहीं। हे महाभाग! यह कार्य करो, मैं तुम्हें तुम्हारी इच्छित वस्तु दूँगा।"

श्लोक 44 (devibhagavatam.4.5.44)

प्रलोभितौ मयात्यर्थं वरदानैस्तपस्विनौ । स्थानान्न चलितौ शान्तौ वृथायं मे गतः श्रमः

pralobhitau mayātyarthaṁ varadānaistapasvinau sthānānna calitau śāntau vṛthāyaṁ me gataḥ śramaḥ

"उन दोनों तपस्वियों को मैंने वरदानों से अत्यंत प्रलोभित किया, फिर भी वे शान्त होकर अपने स्थान से विचलित नहीं हुए — मेरा यह परिश्रम व्यर्थ गया।

श्लोक 45 (devibhagavatam.4.5.45)

तथा वै मायया कृत्वा भीषितौ तापसौ भृशम् । तथापि नोत्थितौ स्थानाद्देहरक्षापरौ न तौ

tathā vai māyayā kṛtvā bhīṣitau tāpasau bhṛśam tathāpi notthitau sthānāddeharakṣāparau na tau

उसी प्रकार माया रचकर उन तपस्वियों को अत्यंत भयभीत किया, फिर भी वे अपने स्थान से नहीं उठे, क्योंकि उन्हें देह-रक्षा की भी कोई चिंता नहीं थी।"

श्लोक 46 (devibhagavatam.4.5.46)

व्यास उवाच । इति तस्य वचः श्रुत्वा शक्रं प्राह मनोभवः । वासवाद्य करिष्यामि कार्यं ते मनसेप्सितम्

vyāsa uvāca iti tasya vacaḥ śrutvā śakraṁ prāha manobhavaḥ vāsavādya kariṣyāmi kāryaṁ te manasepsitam

व्यास जी ने कहा — उसके ये वचन सुनकर मनोभव ने इन्द्र से कहा — "हे वासव! मैं आज तुम्हारे मनोवांछित कार्य को पूर्ण करूँगा।

श्लोक 47 (devibhagavatam.4.5.47)

यदि विष्णुं महेशं वा ब्रह्माणं वा दिवाकरम् । ध्यायन्तौ तौ तदास्माकं भवितारौ वशौ मुनी

yadi viṣṇuṁ maheśaṁ vā brahmāṇaṁ vā divākaram dhyāyantau tau tadāsmākaṁ bhavitārau vaśau munī

यदि वे दोनों मुनि विष्णु, महेश, ब्रह्मा अथवा सूर्य का ध्यान कर रहे होंगे, तो वे निश्चय ही हमारे वश में आ जाएँगे।

श्लोक 48 (devibhagavatam.4.5.48)

देवीभक्तं वशीकर्तुं नाहं शक्तः कथञ्चन । कामराज महाबीजं चिन्तयन्तं मनस्यलम्

devībhaktaṁ vaśīkartuṁ nāhaṁ śaktaḥ kathañcana kāmarāja mahābījaṁ cintayantaṁ manasyalam

किन्तु देवी-भक्त को मैं किसी भी प्रकार वश में नहीं कर सकता — जो अपने मन में कामराज नामक महाबीज का चिन्तन कर रहा हो,

श्लोक 49 (devibhagavatam.4.5.49)

तां देवीं चेन्महाशक्तिं संश्रितौ भक्तिभावतः । न तदा मम बाणानां गोचरौ तापसौ किल

tāṁ devīṁ cenmahāśaktiṁ saṁśritau bhaktibhāvataḥ na tadā mama bāṇānāṁ gocarau tāpasau kila

यदि वे दोनों तपस्वी भक्तिभाव से उस महाशक्ति देवी की शरण में हैं, तो वे निश्चय ही मेरे बाणों की पहुँच से परे हैं।

श्लोक 50 (devibhagavatam.4.5.50)

इन्द्र उवाच । गच्छ त्वं च महाभाग सर्वैस्तत्र समुद्यतैः । कार्यं ममातिदुःसाध्यं कर्ता हितमनुत्तमम्

indra uvāca gaccha tvaṁ ca mahābhāga sarvaistatra samudyataiḥ kāryaṁ mamātiduḥsādhyaṁ kartā hitamanuttamam

इन्द्र ने कहा — "हे महाभाग! तुम अपनी समस्त सेना के साथ सुसज्जित होकर वहाँ जाओ। मेरा यह अत्यंत दुःसाध्य कार्य पूर्ण करने वाले, तुम मेरा सर्वोत्तम हित करोगे।"

श्लोक 51 (devibhagavatam.4.5.51)

व्यास उवाच । इति तेन समादिष्टा ययुः सर्वे समुद्यताः । यत्र तौ धर्मपुत्रौ द्वौ तेपाते दुष्करं तपः

vyāsa uvāca iti tena samādiṣṭā yayuḥ sarve samudyatāḥ yatra tau dharmaputrau dvau tepāte duṣkaraṁ tapaḥ

व्यास जी ने कहा — इस प्रकार उसके आदेश से सुसज्जित होकर वे सभी उस स्थान की ओर चल पड़े, जहाँ धर्म के वे दोनों पुत्र दुष्कर तप कर रहे थे।

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