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चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 9

प्रह्लाद-नारायण के युद्ध में विष्णु के आगमन का वर्णन

अध्याय 8अध्याय-सूचीअध्याय 10

श्लोक 1 (devibhagavatam.4.9.1)

व्यास उवाच । कुर्वंस्तीर्थविधिं तत्र हिरण्यकशिपोः सुतः । न्यग्रोधं सुमहच्छायमपश्यत्पुरतस्तदा

vyāsa uvāca kurvaṁstīrthavidhiṁ tatra hiraṇyakaśipoḥ sutaḥ nyagrodhaṁ sumahacchāyamapaśyatpuratastadā

व्यास जी ने कहा — वहाँ तीर्थ-विधि करते हुए हिरण्यकशिपु के पुत्र ने तब अपने सामने एक विशाल छायादार वट वृक्ष देखा।

श्लोक 2 (devibhagavatam.4.9.2)

ददर्श बाणानपरान्नानाजातीयकांस्तदा । गृध्रपक्षयुतांस्तीव्राच्छिलाधौतान्महोज्वलान्

dadarśa bāṇānaparānnānājātīyakāṁstadā gṛdhrapakṣayutāṁstīvrācchilādhautānmahojvalān

वहाँ उसने अनेक प्रकार के बाण भी देखे, जो गिद्ध के पंखों से युक्त, शिला पर तीक्ष्ण किए गए और अत्यंत देदीप्यमान थे।

श्लोक 3 (devibhagavatam.4.9.3)

चिन्तयामास मनसा कस्येमे विशिखास्त्विह । ऋषीणामाश्रमे पुण्ये तीर्थे परमपावने

cintayāmāsa manasā kasyeme viśikhāstviha ṛṣīṇāmāśrame puṇye tīrthe paramapāvane

उसने मन में विचार किया — "ऋषियों के इस पुण्य आश्रम में, इस परम पावन तीर्थ में, ये बाण किसके हैं?"

श्लोक 4 (devibhagavatam.4.9.4)

एवं चिन्तयतानेन कृष्णाजिनधरौ मुनी । समुन्नतजटाभारौ दृष्टौ धर्मसुतौ तदा

evaṁ cintayatānena kṛṣṇājinadharau munī samunnatajaṭābhārau dṛṣṭau dharmasutau tadā

इस प्रकार विचार करते हुए उसने तब कृष्णाजिन धारण किए, ऊँची जटाओं वाले, धर्मपुत्र दोनों मुनियों को देखा।

श्लोक 5 (devibhagavatam.4.9.5)

तयोरग्रे धृते शुभ्रे धनुषी लक्षणान्विते । शार्ङ्गमाजगवञ्चैव तथाक्षय्यौ महेषुधी

tayoragre dhṛte śubhre dhanuṣī lakṣaṇānvite śārṅgamājagavañcaiva tathākṣayyau maheṣudhī

उनके सामने दो श्वेत, शुभ लक्षणों वाले धनुष रखे थे — शार्ङ्ग और आजगव — तथा दो अक्षय महान् तूणीर भी।

श्लोक 6 (devibhagavatam.4.9.6)

ध्यानस्थौ तौ महाभागौ नरनारायणावृषी । दृष्ट्वा धर्मसुतौ तत्र दैत्यानामधिपस्तदा

dhyānasthau tau mahābhāgau naranārāyaṇāvṛṣī dṛṣṭvā dharmasutau tatra daityānāmadhipastadā

वहाँ ध्यानमग्न, महाभाग नर-नारायण दोनों धर्मपुत्र ऋषियों को देखकर, दैत्यों के उस अधिपति ने तब —

श्लोक 7 (devibhagavatam.4.9.7)

क्रोधरक्तेक्षणस्तौ तु प्रोवाचासुरपालकः । किं भवद्भ्यां समारब्धो दम्भो धर्मविनाशनः

krodharaktekṣaṇastau tu provācāsurapālakaḥ kiṁ bhavadbhyāṁ samārabdho dambho dharmavināśanaḥ

क्रोध से लाल आँखों वाले उस असुरपालक ने उनसे कहा — "आप दोनों ने यह धर्म-विनाशक पाखंड क्यों आरंभ किया है?

श्लोक 8 (devibhagavatam.4.9.8)

न श्रुतं नैव दृष्टं हि संसारेऽस्मिन्कदापि हि । तपसश्चरणं तीव्रं तथा चापस्य धारणम्

na śrutaṁ naiva dṛṣṭaṁ hi saṁsāre'sminkadāpi hi tapasaścaraṇaṁ tīvraṁ tathā cāpasya dhāraṇam

इस संसार में यह कभी न तो सुना गया है, न देखा गया है — तीव्र तप का आचरण और साथ ही धनुष धारण करना!

श्लोक 9 (devibhagavatam.4.9.9)

विरोधोऽयं युगे चाद्ये कथं युक्तं कलिप्रियम् । ब्राह्मणस्य तपो युक्तं तत्र किं चापधारणम्

virodho'yaṁ yuge cādye kathaṁ yuktaṁ kalipriyam brāhmaṇasya tapo yuktaṁ tatra kiṁ cāpadhāraṇam

यह तो विरोधाभास ही है — भला आद्ययुग में कलि-प्रिय वस्तु कैसे उचित हो सकती है? ब्राह्मण के लिए तप उचित है, फिर धनुष-धारण किसलिए?

श्लोक 10 (devibhagavatam.4.9.10)

क्व जटाधारणं देहे क्वेषुधी च विडम्बनौ । धर्मस्याचरणं युक्तं युवयोर्दिव्यभावयोः

kva jaṭādhāraṇaṁ dehe kveṣudhī ca viḍambanau dharmasyācaraṇaṁ yuktaṁ yuvayordivyabhāvayoḥ

शरीर पर जटा-धारण कहाँ, और तूणीर कहाँ — यह तो उपहास ही है! हे दिव्य स्वभाव वाले तुम दोनों को केवल धर्म का आचरण ही शोभा देता है।"

श्लोक 11 (devibhagavatam.4.9.11)

व्यास उवाच । इति तस्य वचः श्रुत्वा नरः प्रोवाच भारत । का ते चिन्तात्र दैत्येन्द्र वृथा तपसि चावयोः

vyāsa uvāca iti tasya vacaḥ śrutvā naraḥ provāca bhārata kā te cintātra daityendra vṛthā tapasi cāvayoḥ

व्यास जी ने कहा — हे भारत! उसके ये वचन सुनकर नर ने कहा — "हे दैत्येन्द्र! हमारे तप के विषय में आपको व्यर्थ चिंता क्यों है?

श्लोक 12 (devibhagavatam.4.9.12)

सामर्थ्ये सति यत्कुर्यात्तत्सम्पद्येत तस्य हि । आवां कार्यद्वये मन्द समर्थौ लोकविश्रुतौ

sāmarthye sati yatkuryāttatsampadyeta tasya hi āvāṁ kāryadvaye manda samarthau lokaviśrutau

जिसमें सामर्थ्य हो, वह जो भी करे, वह उसके लिए सफल ही होता है। हे मूढ़! हम दोनों दोनों कार्यों में समर्थ और लोकविख्यात हैं —

श्लोक 13 (devibhagavatam.4.9.13)

युद्धे तपसि सामर्थ्यं त्वं पुनः किं करिष्यसि । गच्छ मार्गे यथाकामं कस्मादत्र विकत्थसे

yuddhe tapasi sāmarthyaṁ tvaṁ punaḥ kiṁ kariṣyasi gaccha mārge yathākāmaṁ kasmādatra vikatthase

युद्ध और तप दोनों में समर्थ हैं। तुम भला इसका क्या कर लोगे? अपने मार्ग पर इच्छानुसार चले जाओ — यहाँ क्यों डींग हाँक रहे हो?

श्लोक 14 (devibhagavatam.4.9.14)

ब्रह्मतेजो दुराराध्यं न त्वं वेद विमोहितः । विप्रचर्चा न कर्तव्या प्राणिभिः सुखमीप्सुभिः

brahmatejo durārādhyaṁ na tvaṁ veda vimohitaḥ vipracarcā na kartavyā prāṇibhiḥ sukhamīpsubhiḥ

ब्रह्मतेज को साधना अत्यंत कठिन है — मोहित होने के कारण तुम इसे नहीं जानते। सुख चाहने वाले प्राणियों को ब्राह्मणों से विवाद नहीं करना चाहिए।"

श्लोक 15 (devibhagavatam.4.9.15)

प्रह्लाद उवाच । तापसौ मन्दबुद्धी स्थो मृषा वां गर्वमोहितौ । मयि तिष्ठति दैत्येन्द्रे धर्मसेतुप्रवर्तके

prahlāda uvāca tāpasau mandabuddhī stho mṛṣā vāṁ garvamohitau mayi tiṣṭhati daityendre dharmasetupravartake

प्रह्लाद ने कहा — "आप दोनों तपस्वी मंदबुद्धि होकर व्यर्थ के अभिमान से मोहित खड़े हैं, जबकि मैं, धर्म-सेतु का प्रवर्तक दैत्येन्द्र, यहाँ विद्यमान हूँ —

श्लोक 16 (devibhagavatam.4.9.16)

न युक्तमेतत्तीर्थेऽस्मिन्नधर्माचरणं पुनः । का शक्तिस्तव युद्धेऽस्ति दर्शयाद्य तपोधन

na yuktametattīrthe'sminnadharmācaraṇaṁ punaḥ kā śaktistava yuddhe'sti darśayādya tapodhana

फिर भी इस तीर्थ में यह अधर्माचरण उचित नहीं है। हे तपोधन! युद्ध में तुम्हारी क्या शक्ति है, आज दिखाओ।"

श्लोक 17 (devibhagavatam.4.9.17)

व्यास उवाच । तदाकर्ण्य वचस्तस्य नरस्तं प्रत्युवाच ह । युद्धस्वाद्य मया सार्धं यदि ते मतिरीदृशी

vyāsa uvāca tadākarṇya vacastasya narastaṁ pratyuvāca ha yuddhasvādya mayā sārdhaṁ yadi te matirīdṛśī

व्यास जी ने कहा — उसके वचन सुनकर नर ने उससे कहा — "यदि तुम्हारी ऐसी ही इच्छा है, तो आज मेरे साथ युद्ध करो।

श्लोक 18 (devibhagavatam.4.9.18)

अद्य ते स्फोटयिष्यामि मूर्धानमसुराधम । (युद्धे श्रद्धा न ते पश्चाद्भविष्यति कदाचन ।)॥ व्यास उवाच । तन्निशम्य वचस्तस्य दैत्येन्द्रः कुपितस्तदा

adya te sphoṭayiṣyāmi mūrdhānamasurādhama (yuddhe śraddhā na te paścādbhaviṣyati kadācana ) vyāsa uvāca tanniśamya vacastasya daityendraḥ kupitastadā

हे असुराधम! आज मैं तुम्हारा सिर फोड़ दूँगा। इसके बाद तुम्हें कभी भी युद्ध की इच्छा नहीं होगी।" व्यास जी ने कहा — उसके ये वचन सुनकर दैत्येन्द्र तब कुपित हो उठा।

श्लोक 19 (devibhagavatam.4.9.19)

प्रह्लादो बलवानत्र प्रतिज्ञामारुरोह सः । येन केनाप्युपायेन जेष्यामि तावुभावपि

prahlādo balavānatra pratijñāmāruroha saḥ yena kenāpyupāyena jeṣyāmi tāvubhāvapi

बलवान् प्रह्लाद ने वहाँ यह प्रतिज्ञा की — "किसी भी उपाय से मैं इन दोनों को जीत लूँगा —

श्लोक 20 (devibhagavatam.4.9.20)

नरनारायणौ दान्तावृषी तपिसमन्वितौ । व्यास उवाच । इत्युक्त्वा वचनं दैत्यः प्रतिगृह्य शरासनम्

naranārāyaṇau dāntāvṛṣī tapisamanvitau vyāsa uvāca ityuktvā vacanaṁ daityaḥ pratigṛhya śarāsanam

नर-नारायण, इन दोनों संयमी और तपस्वी ऋषियों को।" व्यास जी ने कहा — ऐसा कहकर उस दैत्य ने अपना धनुष उठाया।

श्लोक 21 (devibhagavatam.4.9.21)

आकृष्य तरसा चापं ज्याशब्दञ्च चकार ह । नरोऽपि धनुरादाय शरांस्तीव्राञ्छिलाशितान्

ākṛṣya tarasā cāpaṁ jyāśabdañca cakāra ha naro'pi dhanurādāya śarāṁstīvrāñchilāśitān

उसने वेगपूर्वक धनुष खींचकर प्रत्यंचा की टंकार की। नर ने भी धनुष उठाकर शिला पर तीक्ष्ण किए गए तीव्र बाणों को,

श्लोक 22 (devibhagavatam.4.9.22)

मुमोच बहुशः कोधात्प्रह्लादोपरि पार्थिव

mumoca bahuśaḥ kodhātprahlādopari pārthiva

क्रोधवश बार-बार प्रह्लाद पर छोड़ा, हे राजन्।

श्लोक 23 (devibhagavatam.4.9.23)

तान्दैत्यराजस्तपनीयपुङ्खै- श्चिच्छेद बाणैस्तरसा समेत्य । समीक्ष्य छिन्नांश्च नरः स्वसृष्टा- नन्यान्मुमोचाशु रुषान्वितो वै

tāndaityarājastapanīyapuṅkhai- ściccheda bāṇaistarasā sametya samīkṣya chinnāṁśca naraḥ svasṛṣṭā- nanyānmumocāśu ruṣānvito vai

उस दैत्यराज ने वेगपूर्वक अपने स्वर्ण-पुंख बाणों से उन बाणों को काट डाला। अपने बाणों को कटा हुआ देखकर, क्रोधित नर ने तुरंत अन्य नए बाण छोड़े।

श्लोक 24 (devibhagavatam.4.9.24)

दैत्याथिपस्तानपि तीव्रवेगै- श्छित्त्वा जघानोरसि तं मुनीन्द्रम् । नरोऽपि तं पञ्चभिराशुगैश्च कुद्धोऽहनद्दैत्यपतिं बाहुदेशे

daityāthipastānapi tīvravegai- śchittvā jaghānorasi taṁ munīndram naro'pi taṁ pañcabhirāśugaiśca kuddho'hanaddaityapatiṁ bāhudeśe

दैत्यपति ने उन्हें भी अपने तीव्रवेगी बाणों से काटकर उस मुनीन्द्र की छाती पर प्रहार किया। नर ने भी क्रुद्ध होकर पाँच तीव्र बाणों से दैत्यपति की भुजा पर प्रहार किया।

श्लोक 25 (devibhagavatam.4.9.25)

सेन्द्राः सुरास्तत्र तयोर्हि युद्धं द्रष्टुं विमानैर्गगनस्थिताश्च । नरस्य वीर्यं युधि संस्थितस्य ते तुष्टुवुर्दैत्यपतेश्च भूयः

sendrāḥ surāstatra tayorhi yuddhaṁ draṣṭuṁ vimānairgaganasthitāśca narasya vīryaṁ yudhi saṁsthitasya te tuṣṭuvurdaityapateśca bhūyaḥ

इन्द्र सहित देवगण उस युद्ध को देखने के लिए विमानों में आकाश में स्थित हो गए। युद्ध में डटे हुए नर के तथा दैत्यपति के पराक्रम की उन्होंने बार-बार प्रशंसा की।

श्लोक 26 (devibhagavatam.4.9.26)

ववर्ष दैत्याधिप आत्तचापः शिलीमुखानम्बुधरो यथापः । आदाय शार्ङ्ग धनुरप्रमेयं मुमोच बाणाञ्छितहेमपुङ्खान्

vavarṣa daityādhipa āttacāpaḥ śilīmukhānambudharo yathāpaḥ ādāya śārṅga dhanuraprameyaṁ mumoca bāṇāñchitahemapuṅkhān

दैत्याधिप ने धनुष उठाकर बाणों की वर्षा की, मानो मेघ जल की वर्षा कर रहा हो। अप्रमेय शार्ङ्ग धनुष उठाकर उसने तीक्ष्ण स्वर्ण-पुंख वाले बाण छोड़े।

श्लोक 27 (devibhagavatam.4.9.27)

बभूव युद्धं तुमुलं तयोस्तु जयैषिणोः पार्थिव देवदैत्ययोः । ववर्षुराकाशपथे स्थितास्ते पुष्पाणि दिव्यानि प्रहृष्टचित्ताः

babhūva yuddhaṁ tumulaṁ tayostu jayaiṣiṇoḥ pārthiva devadaityayoḥ vavarṣurākāśapathe sthitāste puṣpāṇi divyāni prahṛṣṭacittāḥ

हे राजन्! उन दोनों — देव और दैत्य — के बीच, विजय की कामना करते हुए, घमासान युद्ध हुआ। आकाश-मार्ग में स्थित वे प्रसन्नचित्त होकर दिव्य पुष्पों की वर्षा करने लगे।

श्लोक 28 (devibhagavatam.4.9.28)

चुकोप दैत्याधिपतिर्हरौ स मुमोच बाणानतितीव्रवेगान् । चिच्छेद तान्धर्मसुतः सुतीक्ष्णै- र्धनुर्विमुक्तैर्विशिखैस्तदाऽऽशु

cukopa daityādhipatirharau sa mumoca bāṇānatitīvravegān ciccheda tāndharmasutaḥ sutīkṣṇai- rdhanurvimuktairviśikhaistadā''śu

दैत्याधिपति ने हरि पर क्रुद्ध होकर अत्यंत तीव्रवेगी बाण छोड़े। धर्मपुत्र ने अपने धनुष से छोड़े गए अत्यंत तीक्ष्ण बाणों से उन्हें तुरंत काट डाला।

श्लोक 29 (devibhagavatam.4.9.29)

ततो नारायणं बाणैः प्रह्लादश्चातिकर्षितैः । ववर्ष सुस्थितं वीरं धर्मपुत्रं सनातनम् । नारायणोऽपि तं वेगान्मुक्तैर्बाणैः शिलाशितैः

tato nārāyaṇaṁ bāṇaiḥ prahlādaścātikarṣitaiḥ vavarṣa susthitaṁ vīraṁ dharmaputraṁ sanātanam nārāyaṇo'pi taṁ vegānmuktairbāṇaiḥ śilāśitaiḥ

तब प्रह्लाद ने पूरे वेग से खींचे गए बाणों की वर्षा उस स्थिर वीर, सनातन धर्मपुत्र नारायण पर की; और नारायण ने भी वेगपूर्वक शिला पर तीक्ष्ण किए गए बाणों से उस पर प्रहार किया।

श्लोक 30 (devibhagavatam.4.9.30)

तुतोदातीव पुरतो दैत्यानामधिपं स्थितम् । सन्निपातोऽम्बरे तत्र दिदृक्षूणां बभूव ह

tutodātīva purato daityānāmadhipaṁ sthitam sannipāto'mbare tatra didṛkṣūṇāṁ babhūva ha

उसने अत्यंत तीव्रता से सामने खड़े दैत्याधिपति को बींध दिया। वहाँ आकाश में देखने के इच्छुकों का एक बड़ा जनसमूह एकत्र हो गया।

श्लोक 31 (devibhagavatam.4.9.31)

देवानां दानवानाञ्च कुर्वतां जयघोषणम् । उभयोः शरवर्षेण छादिते गगने तदा

devānāṁ dānavānāñca kurvatāṁ jayaghoṣaṇam ubhayoḥ śaravarṣeṇa chādite gagane tadā

देवता और दानव दोनों जय-घोष करने लगे; उसी समय दोनों के बाणों की वर्षा से आकाश आच्छादित हो गया।

श्लोक 32 (devibhagavatam.4.9.32)

दिवापि रात्रिसदृशं बभूव तिमिरं महत् । ऊचुः परस्परं देवा दैत्याश्चातीव विस्मिताः

divāpi rātrisadṛśaṁ babhūva timiraṁ mahat ūcuḥ parasparaṁ devā daityāścātīva vismitāḥ

दिन में भी रात्रि जैसा महान अंधकार छा गया। अत्यंत विस्मित देवता और दैत्य परस्पर कहने लगे —

श्लोक 33 (devibhagavatam.4.9.33)

अदृष्टपूर्वं युद्धं वै वर्ततेऽद्य सुदारुणम् । देवर्षयोऽथ गन्धर्वा यक्षकिन्नरपन्नगाः

adṛṣṭapūrvaṁ yuddhaṁ vai vartate'dya sudāruṇam devarṣayo'tha gandharvā yakṣakinnarapannagāḥ

"आज ऐसा भीषण युद्ध हो रहा है, जो पहले कभी नहीं देखा गया!" देवर्षि, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर तथा नाग,

श्लोक 34 (devibhagavatam.4.9.34)

विद्याधराश्चारणाश्च विस्मयं परमं ययुः । नारदः पर्वतश्चैव प्रेक्षणार्थं स्थितौ मुनी

vidyādharāścāraṇāśca vismayaṁ paramaṁ yayuḥ nāradaḥ parvataścaiva prekṣaṇārthaṁ sthitau munī

तथा विद्याधर और चारण भी परम विस्मय को प्राप्त हुए। नारद और पर्वत नामक दोनों मुनि भी वहाँ देखने के लिए खड़े थे —

श्लोक 35 (devibhagavatam.4.9.35)

नारदः पर्वतं प्राह नेदृशं चाभवत्पुरा । तारकासुरयुद्धञ्च तथा वृत्रासुरस्य च

nāradaḥ parvataṁ prāha nedṛśaṁ cābhavatpurā tārakāsurayuddhañca tathā vṛtrāsurasya ca

नारद ने पर्वत से कहा — "ऐसा युद्ध पहले कभी नहीं हुआ — न तारकासुर के युद्ध में, न वृत्रासुर के युद्ध में,

श्लोक 36 (devibhagavatam.4.9.36)

मधुकैटभयोर्युद्धं हरिणा चेदृशं कृतम् । प्रह्लादः प्रबलः शूरो यस्मान्नारायणेन च

madhukaiṭabhayoryuddhaṁ hariṇā cedṛśaṁ kṛtam prahlādaḥ prabalaḥ śūro yasmānnārāyaṇena ca

और न ही हरि द्वारा मधु-कैटभ के साथ किया गया युद्ध ही ऐसा था! प्रह्लाद इतना प्रबल और शूरवीर है कि वह नारायण के साथ भी,

श्लोक 37 (devibhagavatam.4.9.37)

करोति सदृशं युद्धं सिद्धेनाद्भुतकर्मणा । व्यास उवाच । दिने दिने तथा रात्रौ कृत्वा कृत्वा पुनः पुनः

karoti sadṛśaṁ yuddhaṁ siddhenādbhutakarmaṇā vyāsa uvāca dine dine tathā rātrau kṛtvā kṛtvā punaḥ punaḥ

उसी के समान युद्ध कर रहा है, यह सिद्ध और अद्भुत-कर्मा है!" व्यास जी ने कहा — प्रतिदिन तथा प्रतिरात्रि, बार-बार युद्ध करते हुए,

श्लोक 38 (devibhagavatam.4.9.38)

चक्रतुः परमं युद्धं तौ तदा दैत्यतापसौ । नारायणस्तु चिच्छेद प्रह्लादस्य शरासनम्

cakratuḥ paramaṁ yuddhaṁ tau tadā daityatāpasau nārāyaṇastu ciccheda prahlādasya śarāsanam

वे दोनों — दैत्य और तपस्वी — तब परम युद्ध करने लगे। नारायण ने प्रह्लाद के धनुष को,

श्लोक 39 (devibhagavatam.4.9.39)

तरसैकेन बाणेन स चान्यद्धनुराददे । नारायणस्तु तरसा मुक्त्वान्यञ्च शिलीमुखम्

tarasaikena bāṇena sa cānyaddhanurādade nārāyaṇastu tarasā muktvānyañca śilīmukham

एक ही बाण से वेगपूर्वक काट डाला; और उसने दूसरा धनुष उठा लिया। नारायण ने पुनः वेगपूर्वक एक और बाण छोड़कर,

श्लोक 40 (devibhagavatam.4.9.40)

तदैव मध्यतश्चापं चिच्छेद लघुहस्तकः । छिन्नं छिन्नं पुनर्दैत्यो धनुरन्यत्समाददे

tadaiva madhyataścāpaṁ ciccheda laghuhastakaḥ chinnaṁ chinnaṁ punardaityo dhanuranyatsamādade

उसी क्षण, हल्के हाथ से, उस धनुष को भी बीच से काट डाला। जितनी बार धनुष कटता, उतनी ही बार दैत्य दूसरा धनुष उठा लेता।

श्लोक 41 (devibhagavatam.4.9.41)

नारायणस्तु चिच्छेद विशिखैराशु कोपितः । छिन्ने धनुषि दैत्येन्द्रः परिघं तु समाददे

nārāyaṇastu ciccheda viśikhairāśu kopitaḥ chinne dhanuṣi daityendraḥ parighaṁ tu samādade

क्रोधित नारायण उन्हें अपने बाणों से तुरंत काट डालते। धनुष कट जाने पर दैत्येन्द्र ने एक लोहे की गदा उठा ली।

श्लोक 42 (devibhagavatam.4.9.42)

जघान धर्मजं तूर्णं बाह्वोर्मध्येऽतिकोपनः । तमायान्तं स बलवान्मार्गणैर्नवभिर्मुनिः

jaghāna dharmajaṁ tūrṇaṁ bāhvormadhye'tikopanaḥ tamāyāntaṁ sa balavānmārgaṇairnavabhirmuniḥ

अत्यंत क्रोधित होकर उसने धर्मपुत्र की दोनों भुजाओं के मध्य शीघ्र प्रहार किया। उस आती हुई गदा को देखकर उस बलवान् मुनि ने नौ बाणों से,

श्लोक 43 (devibhagavatam.4.9.43)

चिच्छेद परिघं घोरं दशभिस्तमताडयत् । गदामादाय दैत्येन्द्रः सर्वायसमयीं दृढाम्

ciccheda parighaṁ ghoraṁ daśabhistamatāḍayat gadāmādāya daityendraḥ sarvāyasamayīṁ dṛḍhām

उस भयंकर गदा को काट डाला, और फिर दस बाणों से उस पर प्रहार किया। तब दैत्येन्द्र ने पूर्णतः लोहे की एक दृढ़ गदा उठाई,

श्लोक 44 (devibhagavatam.4.9.44)

जानुदेशे जघानाशु देवं नारायणं रुषा । गदया चापि गिरिवत्संस्थितः स्थिरमानसः

jānudeśe jaghānāśu devaṁ nārāyaṇaṁ ruṣā gadayā cāpi girivatsaṁsthitaḥ sthiramānasaḥ

और क्रोधवश उससे तुरंत देव नारायण के घुटने पर प्रहार किया। किन्तु गदा से आहत होने पर भी वे पर्वत के समान स्थिरचित्त होकर खड़े रहे।

श्लोक 45 (devibhagavatam.4.9.45)

धर्मपुत्रोऽतिबलवान्मुमोचाशु शिलीमुखान् । गदां चिच्छेद भगवांस्तदा दैत्यपतेर्दृढाम्

dharmaputro'tibalavānmumocāśu śilīmukhān gadāṁ ciccheda bhagavāṁstadā daityapaterdṛḍhām

अत्यंत बलवान् धर्मपुत्र ने तुरंत बाण छोड़े, और भगवान् ने तब दैत्यपति की उस दृढ़ गदा को काट डाला।

श्लोक 46 (devibhagavatam.4.9.46)

विस्मयं परमं जग्मुः प्रेक्षका गगने स्थिताः । स तु शक्तिं समादाय प्रह्लादः परवीरहा

vismayaṁ paramaṁ jagmuḥ prekṣakā gagane sthitāḥ sa tu śaktiṁ samādāya prahlādaḥ paravīrahā

आकाश में स्थित दर्शक परम विस्मय को प्राप्त हुए। तब शत्रुवीरों का नाशक प्रह्लाद ने एक शक्ति उठाकर,

श्लोक 47 (devibhagavatam.4.9.47)

चिक्षेप तरसा क्रुद्धो बलान्नारायणोरसि । तामापतन्तीं संवीक्ष्य बाणेनैकेन लीलया

cikṣepa tarasā kruddho balānnārāyaṇorasi tāmāpatantīṁ saṁvīkṣya bāṇenaikena līlayā

क्रोधवश उसे वेगपूर्वक नारायण की छाती पर फेंका। उसे आते देखकर, एक ही बाण से, सहज लीला में,

श्लोक 48 (devibhagavatam.4.9.48)

सप्तधा कृतवानाशु सप्तभिस्तं जघान ह । दिव्यवर्षशतं चैव तद्युद्धं परमं तयोः

saptadhā kṛtavānāśu saptabhistaṁ jaghāna ha divyavarṣaśataṁ caiva tadyuddhaṁ paramaṁ tayoḥ

उन्होंने उसे तुरंत सात टुकड़ों में काट डाला, और फिर सात बाणों से उस पर प्रहार किया। उन दोनों का वह परम युद्ध पूरे सौ दिव्य वर्षों तक चला,

श्लोक 49 (devibhagavatam.4.9.49)

जातं विस्मयदं राजन् सर्वेषां तत्र चाश्रमे । तदाऽऽजगाम तरसा पीतवासाश्चतुर्भुजः

jātaṁ vismayadaṁ rājan sarveṣāṁ tatra cāśrame tadā''jagāma tarasā pītavāsāścaturbhujaḥ

हे राजन्! जो उस आश्रम में सभी के लिए विस्मयकारी बन गया। तब वेगपूर्वक वहाँ पीतवस्त्रधारी चतुर्भुज भगवान् पधारे —

श्लोक 50 (devibhagavatam.4.9.50)

प्रह्लादस्याश्रमं तत्र जगाम च गदाधरः । चतुर्भुजो रमाकान्तो रथाङ्गदरपद्मभृत्

prahlādasyāśramaṁ tatra jagāma ca gadādharaḥ caturbhujo ramākānto rathāṅgadarapadmabhṛt

वे गदाधर प्रह्लाद के आश्रम में गए — चतुर्भुज, रमाकांत, चक्र और कमल धारण किए हुए।

श्लोक 51 (devibhagavatam.4.9.51)

दृष्ट्वा तमागतं तत्र हिरण्यकशिपोः सुतः । प्रणम्य परया भक्त्या प्राञ्जलिः प्रत्युवाच ह

dṛṣṭvā tamāgataṁ tatra hiraṇyakaśipoḥ sutaḥ praṇamya parayā bhaktyā prāñjaliḥ pratyuvāca ha

उन्हें वहाँ आया देखकर हिरण्यकशिपु के पुत्र ने परम भक्तिपूर्वक प्रणाम करके, हाथ जोड़कर उनसे कहा —

श्लोक 52 (devibhagavatam.4.9.52)

प्रह्लाद उवाच । देवदेव जगनाथ भक्तवत्सल माधव । कथं न जितवानाजावहमेतौ तपस्विनौ । सङ्ग्रामस्तु मया देव कृतः पूर्णं शतं समाः

prahlāda uvāca devadeva jaganātha bhaktavatsala mādhava kathaṁ na jitavānājāvahametau tapasvinau saṅgrāmastu mayā deva kṛtaḥ pūrṇaṁ śataṁ samāḥ

प्रह्लाद ने कहा — "हे देवदेव! हे जगन्नाथ! हे भक्तवत्सल माधव! मैं युद्ध में इन दोनों तपस्वियों को क्यों नहीं जीत सका? हे देव! मैंने पूरे सौ वर्षों तक युद्ध किया है —

श्लोक 53 (devibhagavatam.4.9.53)

सुराणां न जितौ कस्मादिति मे विस्मयो महान् । विष्णुरुवाच । सिद्धाविमौ मदंशौ च विस्मयः कोऽत्र मारिष

surāṇāṁ na jitau kasmāditi me vismayo mahān viṣṇuruvāca siddhāvimau madaṁśau ca vismayaḥ ko'tra māriṣa

फिर भी इन देवों को क्यों नहीं जीत सका, यह मेरे लिए बड़ा विस्मय है।" विष्णु ने कहा — "हे मारिष! ये दोनों सिद्ध और मेरे ही अंश हैं, इसमें विस्मय की क्या बात है?

श्लोक 54 (devibhagavatam.4.9.54)

तापसौ न जितात्मानौ नरनारायणौ जितौ । गच्छ त्वं वितलं राजन् कुरु भक्तिं ममाचलाम्

tāpasau na jitātmānau naranārāyaṇau jitau gaccha tvaṁ vitalaṁ rājan kuru bhaktiṁ mamācalām

वे तपस्वी नर-नारायण अजितात्मा हैं, वे जीते नहीं जा सकते। हे राजन्! अब तुम वितल को जाओ, और मेरी अचल भक्ति करो।

श्लोक 55 (devibhagavatam.4.9.55)

नाभ्यां कुरु विरोधं त्वं तापसाभ्यां महामते । व्यास उवाच । इत्याज्ञप्तो दैत्यराजो निर्ययावसुरैः सह

nābhyāṁ kuru virodhaṁ tvaṁ tāpasābhyāṁ mahāmate vyāsa uvāca ityājñapto daityarājo niryayāvasuraiḥ saha

हे महामते! तुम इन दोनों तपस्वियों के साथ पुनः विरोध मत करो।" व्यास जी ने कहा — इस प्रकार आज्ञा पाकर दैत्यराज असुरों के साथ वहाँ से चला गया।

श्लोक 56 (devibhagavatam.4.9.56)

नरनारायणौ भूयस्तपोयुक्तौ बभूवतुः

naranārāyaṇau bhūyastapoyuktau babhūvatuḥ

नर-नारायण पुनः तप में लीन हो गए।

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