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उत्तर खण्ड · अध्याय 101

गण-दैत्य द्वंद्व-युद्ध

अध्याय 100अध्याय-सूचीअध्याय 102

श्लोक 1 (padma.6.101.1)

नारद उवाच । ते गणाधिपतीन्दृष्ट्वा नंदीभमुखषण्मुखान् । अमर्षादभ्यधावंत द्वंद्वयुद्धाय दानवाः

nārada uvāca te gaṇādhipatīndṛṣṭvā naṁdībhamukhaṣaṇmukhān amarṣādabhyadhāvaṁta dvaṁdvayuddhāya dānavāḥ

नारद ने कहा - नंदी, गणेश और कार्तिकेय आदि गणों के अधिपतियों को देखकर, क्रोध से दानव द्वंद्व-युद्ध के लिए दौड़ पड़े।

श्लोक 2 (padma.6.101.2)

नंदिनं कालनेमिश्च शुंभो लंबोदरं तथा । निशुंभः षण्मुखं वेगादभ्यधावत दंशितः

naṁdinaṁ kālanemiśca śuṁbho laṁbodaraṁ tathā niśuṁbhaḥ ṣaṇmukhaṁ vegādabhyadhāvata daṁśitaḥ

कालनेमि नंदी की ओर, शुंभ लंबोदर की ओर, तथा कवच पहने हुए निशुंभ वेग से षण्मुख की ओर दौड़ा।

श्लोक 3 (padma.6.101.3)

निशुंभः कार्तिकेयस्य मयूरं पंचभिः शरैः । हृदि विव्याध वेगेन मूर्छितः स पपात च

niśuṁbhaḥ kārtikeyasya mayūraṁ paṁcabhiḥ śaraiḥ hṛdi vivyādha vegena mūrchitaḥ sa papāta ca

निशुंभ ने कार्तिकेय के मयूर वाहन को पाँच बाणों से हृदय में वेगपूर्वक बींध दिया, जिससे वह मूर्च्छित होकर गिर पड़ा।

श्लोक 4 (padma.6.101.4)

ततः शक्तिधरः शक्तिं यावज्जग्राह रोषितः । तावन्निशुंभो वेगेन स्वशक्त्या तमपातयत्

tataḥ śaktidharaḥ śaktiṁ yāvajjagrāha roṣitaḥ tāvanniśuṁbho vegena svaśaktyā tamapātayat

तब शक्ति-धारी कार्तिकेय ने क्रोधित होकर जैसे ही अपनी शक्ति उठाई, वैसे ही निशुंभ ने वेग से अपनी शक्ति से उसे गिरा दिया।

श्लोक 5 (padma.6.101.5)

ततो नंदीश्वरो बाणैः कालनेमिमविध्यत । सप्तभिश्च हयान्केतूंस्त्रिभिः सारथिमच्छिनत्

tato naṁdīśvaro bāṇaiḥ kālanemimavidhyata saptabhiśca hayānketūṁstribhiḥ sārathimacchinat

फिर नंदीश्वर ने कालनेमि को बाणों से बींध दिया। सात बाणों से उसके घोड़ों और ध्वजों को, और तीन बाणों से उसके सारथी को काट डाला।

श्लोक 6 (padma.6.101.6)

कालनेमिस्तु संक्रुद्धो धनुश्चिच्छेद नंदिनः । तदपास्य सशूलेन तं वक्षस्य हनद्दृढम्

kālanemistu saṁkruddho dhanuściccheda naṁdinaḥ tadapāsya saśūlena taṁ vakṣasya hanaddṛḍham

तब अत्यंत क्रुद्ध कालनेमि ने नंदी के धनुष को काट डाला। उसे दूर फेंककर, शूल सहित उसने नंदी के वक्षस्थल पर दृढ़ता से प्रहार किया।

श्लोक 7 (padma.6.101.7)

सशूलभिन्नहृदयो हताश्वो हतसारथिः । अद्रेः शिखरमामुच्य शैलाद्रिं सोऽप्यपातयत्

saśūlabhinnahṛdayo hatāśvo hatasārathiḥ adreḥ śikharamāmucya śailādriṁ so'pyapātayat

शूल से हृदय बिंधे हुए, घोड़े मारे गए और सारथी मारा गया - ऐसी स्थिति में उसने पर्वत के शिखर को उठाकर शैलाद्रि पर भी फेंक दिया।

श्लोक 8 (padma.6.101.8)

अथ शुंभो गणेशश्च रथमूषकवाहनौ । युध्यमानौ शरव्रातैः परस्परमविध्यताम्

atha śuṁbho gaṇeśaśca rathamūṣakavāhanau yudhyamānau śaravrātaiḥ parasparamavidhyatām

फिर शुंभ और गणेश, रथ और मूषक पर आरूढ़ होकर, युद्ध करते हुए बाणों के समूहों से परस्पर एक-दूसरे को बींधने लगे।

श्लोक 9 (padma.6.101.9)

अथ शुंभं गणाध्यक्षो हृदि विव्याध पत्रिणा । सारथिं पंचभिर्बाणैः पातयामास भूतले

atha śuṁbhaṁ gaṇādhyakṣo hṛdi vivyādha patriṇā sārathiṁ paṁcabhirbāṇaiḥ pātayāmāsa bhūtale

तब गणों के अध्यक्ष ने शुंभ को पंखयुक्त बाण से हृदय में बींध दिया, और पाँच बाणों से उसके सारथी को भूमि पर गिरा दिया।

श्लोक 10 (padma.6.101.10)

ततः शुंभोऽतिक्रुद्धोऽपि बाणषष्ट्या गणाधिपम् । मूषकं च त्रिभिर्विद्ध्वा ननाद जलदस्वनः

tataḥ śuṁbho'tikruddho'pi bāṇaṣaṣṭyā gaṇādhipam mūṣakaṁ ca tribhirviddhvā nanāda jaladasvanaḥ

तब अत्यंत क्रुद्ध शुंभ ने साठ बाणों से गणाधिप को और तीन बाणों से मूषक को बींधकर मेघ के समान गर्जना की।

श्लोक 11 (padma.6.101.11)

मूषकः शरभिन्नांगश्चचाल कृतवेदनः । लंबोदरः समुत्तीर्य पदातिरभवन्नृप

mūṣakaḥ śarabhinnāṁgaścacāla kṛtavedanaḥ laṁbodaraḥ samuttīrya padātirabhavannṛpa

बाणों से बिंधे हुए अंगों वाला मूषक पीड़ा से काँप उठा। हे राजन्! लंबोदर उतरकर पैदल हो गए।

श्लोक 12 (padma.6.101.12)

ततो लंबोदरः शुंभं हत्वा परशुना हृदि । अपातयत्तदा भूमौ मूषकं चारुहत्पुनः

tato laṁbodaraḥ śuṁbhaṁ hatvā paraśunā hṛdi apātayattadā bhūmau mūṣakaṁ cāruhatpunaḥ

तब लंबोदर ने फरसे से शुंभ के हृदय पर प्रहार कर उसे भूमि पर गिरा दिया, और फिर पुनः मूषक पर सवार हो गए।

श्लोक 13 (padma.6.101.13)

कालनेमिर्निशुंभश्च उभौ लंबोदरं शरैः । युगपज्जघ्नतुः कोपात्तोत्रेणेव महाद्विपम्

kālanemirniśuṁbhaśca ubhau laṁbodaraṁ śaraiḥ yugapajjaghnatuḥ kopāttotreṇeva mahādvipam

तब कालनेमि और निशुंभ, दोनों ने क्रोध से एक साथ बाणों द्वारा लंबोदर पर प्रहार किया, मानो अंकुश से किसी विशाल हाथी पर प्रहार कर रहे हों।

श्लोक 14 (padma.6.101.14)

तं पीड्यमानमालोक्य वीरभद्रो महाबलः । अभ्यधावत वेगेन भूतकोटियुतस्तदा

taṁ pīḍyamānamālokya vīrabhadro mahābalaḥ abhyadhāvata vegena bhūtakoṭiyutastadā

उसे पीड़ित होते देखकर महाबली वीरभद्र करोड़ों भूतों के साथ वेगपूर्वक दौड़ पड़ा।

श्लोक 15 (padma.6.101.15)

कूष्मांडा भैरवाश्चापि वेताला योगिनीगणाः । पिशाचा योगिनीसंघा गणाश्चापि तमन्वयुः

kūṣmāṁḍā bhairavāścāpi vetālā yoginīgaṇāḥ piśācā yoginīsaṁghā gaṇāścāpi tamanvayuḥ

कूष्मांड, भैरव, वेताल, योगिनियों के समूह, पिशाच तथा गणों के समूह - ये सब भी उसके पीछे-पीछे चले।

श्लोक 16 (padma.6.101.16)

ततः किलकिलाशब्दैः सिंहनादैः सघुर्घुरैः । विनादिता डमरुकैः पृथिवी समकंपत

tataḥ kilakilāśabdaiḥ siṁhanādaiḥ saghurghuraiḥ vināditā ḍamarukaiḥ pṛthivī samakaṁpata

तब किलकिला की ध्वनियों, सिंहनादों, घुर्घुर के शब्दों तथा डमरुओं की ध्वनि से गूँजती हुई पृथ्वी काँप उठी।

श्लोक 17 (padma.6.101.17)

ततो भूतानि धावंति भक्षयंति स्म दानवान् । उत्पतंति पतंति स्म ननृतुश्चरणांगणे

tato bhūtāni dhāvaṁti bhakṣayaṁti sma dānavān utpataṁti pataṁti sma nanṛtuścaraṇāṁgaṇe

तब भूत दौड़ते हुए दानवों को खाने लगे; वे उछलते और गिरते हुए युद्ध-भूमि रूपी आँगन में नाचने लगे।

श्लोक 18 (padma.6.101.18)

नंदी च कार्तिकेयश्च समायातौ त्वरान्वितौ । निजघ्नतू रणे दैत्यान्निरंतर शरव्रजैः

naṁdī ca kārtikeyaśca samāyātau tvarānvitau nijaghnatū raṇe daityānniraṁtara śaravrajaiḥ

नंदी और कार्तिकेय भी शीघ्रता से लौट आए और युद्ध में निरंतर बाणों की झड़ी से दैत्यों को मारने लगे।

श्लोक 19 (padma.6.101.19)

छिन्नभिन्नाह तैर्दैत्यैः पातितैर्भर्त्सितैस्तथा । व्याकुला सा भवत्सेना विषण्णवदना तदा

chinnabhinnāha tairdaityaiḥ pātitairbhartsitaistathā vyākulā sā bhavatsenā viṣaṇṇavadanā tadā

कटे-फटे, मारे गए, गिराए गए तथा तिरस्कृत दैत्यों के कारण वह सेना व्याकुल और उदास मुख वाली हो गई।

श्लोक 20 (padma.6.101.20)

प्रविध्वस्तां ततः सेनां दृष्ट्वा सागरनंदनः । रथेनातिपताकेन गणानभिययौ बली

pravidhvastāṁ tataḥ senāṁ dṛṣṭvā sāgaranaṁdanaḥ rathenātipatākena gaṇānabhiyayau balī

अपनी सेना को इस प्रकार तितर-बितर देखकर सागर-पुत्र बली, विशाल पताका वाले रथ पर सवार होकर स्वयं गणों की ओर बढ़ चला।

श्लोक 21 (padma.6.101.21)

हस्त्यश्वरथसंह्रादः शंखभेरीरवस्तदा । अभवत्सिंहनादश्च सेनयोरुभयोस्तदा

hastyaśvarathasaṁhrādaḥ śaṁkhabherīravastadā abhavatsiṁhanādaśca senayorubhayostadā

तब हाथियों, घोड़ों और रथों की गड़गड़ाहट, शंख और भेरी की ध्वनि तथा सिंहनाद दोनों सेनाओं में होने लगे।

श्लोक 22 (padma.6.101.22)

जालंधरशरव्रातैर्नीहारपटलैरिव । द्यावापृथिव्योराच्छन्नमंतरं समपद्यत

jālaṁdharaśaravrātairnīhārapaṭalairiva dyāvāpṛthivyorācchannamaṁtaraṁ samapadyata

जलंधर के बाणों के समूहों से, मानो कोहरे के परदे से, आकाश और पृथ्वी के बीच का अंतर ढक गया।

श्लोक 23 (padma.6.101.23)

गणेशं पंचभिर्विध्वा शैलाद्रिमपि पंचभिः । वीरभद्रं च विंशत्या ननाद जलदस्वनः

gaṇeśaṁ paṁcabhirvidhvā śailādrimapi paṁcabhiḥ vīrabhadraṁ ca viṁśatyā nanāda jaladasvanaḥ

उसने गणेश को पाँच बाणों से, शैलाद्रि को भी पाँच बाणों से और वीरभद्र को बीस बाणों से बींधकर मेघ के समान गर्जना की।

श्लोक 24 (padma.6.101.24)

कार्तिकेयस्ततो दैत्यं शक्त्या विव्याध सत्वरः । व्याघूर्णः शक्तिनिर्भिन्नः किंचिद्व्याकुलमानसः

kārtikeyastato daityaṁ śaktyā vivyādha satvaraḥ vyāghūrṇaḥ śaktinirbhinnaḥ kiṁcidvyākulamānasaḥ

तब कार्तिकेय ने तुरंत उस दैत्य को शक्ति से बींध दिया। शक्ति से बिंधकर वह डगमगा गया और उसका मन कुछ व्याकुल हो गया।

श्लोक 25 (padma.6.101.25)

ततः क्रोधपरीताक्षः कार्तिकेयं जलंधरः । गदया ताडयामास स च भूमितलेऽपतत्

tataḥ krodhaparītākṣaḥ kārtikeyaṁ jalaṁdharaḥ gadayā tāḍayāmāsa sa ca bhūmitale'patat

तब क्रोध से लाल नेत्रों वाले जलंधर ने कार्तिकेय पर गदा से प्रहार किया, और वह भूमितल पर गिर पड़े।

श्लोक 26 (padma.6.101.26)

तथैव नंदिनं वेगादपातयत भूतले । ततो गणेश्वरः क्रुद्धो गदां परशुनाच्छिनत्

tathaiva naṁdinaṁ vegādapātayata bhūtale tato gaṇeśvaraḥ kruddho gadāṁ paraśunācchinat

उसी प्रकार उसने नंदी को भी वेग से भूमितल पर गिरा दिया। तब क्रुद्ध हुए गणेश्वर ने अपने फरसे से उसकी गदा को काट डाला।

श्लोक 27 (padma.6.101.27)

वीरभद्रस्त्रिभिर्बाणैर्हृदि विव्याध दानवम् । सप्तभिश्च हयान्केतून्धनुश्छन्नं च चिच्छिदे

vīrabhadrastribhirbāṇairhṛdi vivyādha dānavam saptabhiśca hayānketūndhanuśchannaṁ ca cicchide

वीरभद्र ने तीन बाणों से उस दानव के हृदय को बींध दिया, और सात बाणों से उसके घोड़ों, ध्वजों तथा ढके हुए धनुष को काट डाला।

श्लोक 28 (padma.6.101.28)

ततोऽतिक्रुद्धो दैत्येंद्रः शक्तिमुद्यम्य दारुणाम् । गणेशं पातयामास रथमन्यं समारुहत्

tato'tikruddho daityeṁdraḥ śaktimudyamya dāruṇām gaṇeśaṁ pātayāmāsa rathamanyaṁ samāruhat

तब अत्यंत क्रुद्ध दैत्येंद्र ने एक भयंकर शक्ति उठाकर गणेश को गिरा दिया, और स्वयं दूसरे रथ पर आरूढ़ हो गया।

श्लोक 29 (padma.6.101.29)

अभ्ययादथ वेगेन वीरभद्रं रुषान्वितः । ततस्तौ सूर्यसंकाशौ युयुधाते परस्परम्

abhyayādatha vegena vīrabhadraṁ ruṣānvitaḥ tatastau sūryasaṁkāśau yuyudhāte parasparam

फिर क्रोध से युक्त होकर वह वेगपूर्वक वीरभद्र की ओर बढ़ा। तब सूर्य के समान तेजस्वी वे दोनों परस्पर युद्ध करने लगे।

श्लोक 30 (padma.6.101.30)

वीरभद्रस्तस्य हयांस्तथा बाणैरपातयत् । धनुश्चिच्छेद दैत्येंद्रो युयुधे परिघायुधः

vīrabhadrastasya hayāṁstathā bāṇairapātayat dhanuściccheda daityeṁdro yuyudhe parighāyudhaḥ

वीरभद्र ने उसके घोड़ों को बाणों से गिरा दिया, और उसका धनुष भी काट डाला। तब दैत्येंद्र परिघ आयुध लेकर युद्ध करने लगा।

श्लोक 31 (padma.6.101.31)

स वीरभद्रं त्वरयाभिगम्य जघान दैत्यः परिघेन मूर्ध्नि । स चापि दैत्यः प्रविभिन्नमूर्द्धा पपात भूमौ रुधिरं समुद्गिरन्

sa vīrabhadraṁ tvarayābhigamya jaghāna daityaḥ parighena mūrdhni sa cāpi daityaḥ pravibhinnamūrddhā papāta bhūmau rudhiraṁ samudgiran

उस दैत्य ने शीघ्रता से वीरभद्र के पास जाकर परिघ से उसके सिर पर प्रहार किया। किंतु वह दैत्य भी सिर फट जाने से रक्त उगलता हुआ भूमि पर गिर पड़ा।

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