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उत्तर खण्ड · अध्याय 104

जलंधर-वध

अध्याय 103अध्याय-सूचीअध्याय 105

श्लोक 1 (padma.6.104.1)

नारद उवाच । ततो जलंधरो दृष्ट्वा रुद्रमद्भुतविक्रमम् । चकार मायया गौरीं त्र्यबकं मोहयंस्तदा

nārada uvāca tato jalaṁdharo dṛṣṭvā rudramadbhutavikramam cakāra māyayā gaurīṁ tryabakaṁ mohayaṁstadā

नारद ने कहा - तब जलंधर ने रुद्र के अद्भुत पराक्रम को देखकर, त्र्यंबक को मोहित करने के लिए माया से गौरी का रूप रच दिया।

श्लोक 2 (padma.6.104.2)

रथोपरिगतां दृष्ट्वा रुदंतीं च तदा शिवः । शुंभनिशुंभदैत्यैश्च वध्यमानां ददर्श सः

rathoparigatāṁ dṛṣṭvā rudaṁtīṁ ca tadā śivaḥ śuṁbhaniśuṁbhadaityaiśca vadhyamānāṁ dadarśa saḥ

शिव ने उसे रथ पर बैठी, रोती हुई और शुंभ-निशुंभ दैत्यों द्वारा मारी जा रही देखा।

श्लोक 3 (padma.6.104.3)

गौरीं तथाविधां दृष्ट्वा शिवोऽप्युद्विग्नमानसः । अवाङ्मुखः स्थितस्तूष्णीं विस्मृत्य स्वपराक्रमम्

gaurīṁ tathāvidhāṁ dṛṣṭvā śivo'pyudvignamānasaḥ avāṅmukhaḥ sthitastūṣṇīṁ vismṛtya svaparākramam

गौरी को इस प्रकार संकट में देखकर शिव भी विचलित मन वाले हो गए, और अपने पराक्रम को भूलकर सिर झुकाए चुपचाप खड़े रहे।

श्लोक 4 (padma.6.104.4)

ततो जलंधरो वेगात्त्रिभिर्विव्याध सायकैः । आपुंखमग्नैस्तं रुद्रं शिरस्युरसि चोदरे

tato jalaṁdharo vegāttribhirvivyādha sāyakaiḥ āpuṁkhamagnaistaṁ rudraṁ śirasyurasi codare

तब जलंधर ने तुरंत तीन बाणों से, जो पंख तक धँस गए थे, रुद्र को सिर पर, वक्षस्थल पर और उदर पर बींध दिया।

श्लोक 5 (padma.6.104.5)

ततो जज्ञे स तां मायां विष्णुना संप्रबोधितः । रौद्ररूपधरो जातो ज्वालामालातिभीषणः

tato jajñe sa tāṁ māyāṁ viṣṇunā saṁprabodhitaḥ raudrarūpadharo jāto jvālāmālātibhīṣaṇaḥ

तब विष्णु द्वारा जगाए जाने पर शिव को उस माया का ज्ञान हुआ, और वे ज्वाला-मालाओं से अत्यंत भयंकर, रौद्र-रूप धारण करने वाले हो गए।

श्लोक 6 (padma.6.104.6)

तस्यातीवमहारौद्रं रूपं दृष्ट्वा महासुराः । न शेकुः प्रमुखे स्थातुं भेजिरे च दिशो दश

tasyātīvamahāraudraṁ rūpaṁ dṛṣṭvā mahāsurāḥ na śekuḥ pramukhe sthātuṁ bhejire ca diśo daśa

उनके उस अत्यंत महारौद्र रूप को देखकर महाअसुर उनके सामने खड़े नहीं रह सके और दसों दिशाओं में भाग गए।

श्लोक 7 (padma.6.104.7)

ततः शापं ददौ देवस्तयोः शुंभनिशुंभयोः । मम युद्धादपक्रांतौ गौर्यावध्यौ भविष्यथः

tataḥ śāpaṁ dadau devastayoḥ śuṁbhaniśuṁbhayoḥ mama yuddhādapakrāṁtau gauryāvadhyau bhaviṣyathaḥ

तब देव ने उन शुंभ और निशुंभ दोनों को शाप दिया - मेरे युद्ध से भागे हुए तुम दोनों गौरी के अंश से वध्य होगे।

श्लोक 8 (padma.6.104.8)

पुनर्जलंधरो वेगाद्ववर्ष निशितैः शरैः । बांणांधकारसंच्छन्नं यथा भूमितलं महत्

punarjalaṁdharo vegādvavarṣa niśitaiḥ śaraiḥ bāṁṇāṁdhakārasaṁcchannaṁ yathā bhūmitalaṁ mahat

फिर जलंधर ने वेग से तीक्ष्ण बाणों की वर्षा की, जिससे विशाल भूतल बाणों के अंधकार से ढक गया।

श्लोक 9 (padma.6.104.9)

यावद्रुद्रः प्रचिच्छेद तस्यबाणांस्त्वरान्वितः । तावत्स परिघेणाशु जघान वृषभं बली

yāvadrudraḥ praciccheda tasyabāṇāṁstvarānvitaḥ tāvatsa parigheṇāśu jaghāna vṛṣabhaṁ balī

जैसे ही रुद्र ने शीघ्रता से उसके बाणों को काट डाला, वैसे ही उस बलवान ने परिघ से तुरंत उनके वृषभ पर प्रहार किया।

श्लोक 10 (padma.6.104.10)

वृषस्तेन प्रहारेण परावृत्तो रणांगणात् । रुद्रेणाकृष्यमाणोऽपि न तस्थौ रणभूमिषु

vṛṣastena prahāreṇa parāvṛtto raṇāṁgaṇāt rudreṇākṛṣyamāṇo'pi na tasthau raṇabhūmiṣu

उस प्रहार से वृषभ युद्धभूमि से पीछे मुड़ गया, और रुद्र द्वारा खींचे जाने पर भी वह युद्धभूमि में स्थिर नहीं रहा।

श्लोक 11 (padma.6.104.11)

ततः परमसंक्रुद्धो रुद्रो रौद्रवपुर्द्धरः । चक्रं सुदर्शनं वेगाच्चिक्षेपादित्यवर्चसम्

tataḥ paramasaṁkruddho rudro raudravapurddharaḥ cakraṁ sudarśanaṁ vegāccikṣepādityavarcasam

तब अत्यंत क्रुद्ध हुए रुद्र ने, रौद्र-शरीर धारण किए हुए, आदित्य के समान तेजस्वी सुदर्शन चक्र को वेग से फेंका।

श्लोक 12 (padma.6.104.12)

प्रदहद्रोदसी वेगात्तदासाद्य जलंधरम् । जहार तच्छिरः कायान्महदायतलोचनम्

pradahadrodasī vegāttadāsādya jalaṁdharam jahāra tacchiraḥ kāyānmahadāyatalocanam

वह वेग से आकाश और पृथ्वी को जलाता हुआ जलंधर तक पहुँचा और उस विशाल-नेत्रों वाले के सिर को धड़ से अलग कर दिया।

श्लोक 13 (padma.6.104.13)

रथात्कायः पपातोर्व्यां नादयन्वसुधातलम् । तेजश्च निर्गतं देहात्तद्रुद्रे लयमागमत्

rathātkāyaḥ papātorvyāṁ nādayanvasudhātalam tejaśca nirgataṁ dehāttadrudre layamāgamat

उसका धड़ रथ से पृथ्वी पर गिर पड़ा, जिससे धरातल गूँज उठा। उसके शरीर से निकला हुआ तेज रुद्र में विलीन हो गया।

श्लोक 14 (padma.6.104.14)

दृष्ट्वा देहोद्भवं तेजस्तद्गौरीशे लयं गतम् । अथ चेंद्रादयो देवा हर्षादुत्फुल्ललोचनाः

dṛṣṭvā dehodbhavaṁ tejastadgaurīśe layaṁ gatam atha ceṁdrādayo devā harṣādutphullalocanāḥ

शरीर से उत्पन्न उस तेज को गौरीश में लीन होते देखकर, तब इंद्र आदि देवगण हर्ष से खिले हुए नेत्रों वाले हो गए।

श्लोक 15 (padma.6.104.15)

प्रणम्य शिरसा रुद्रं शशंसुर्विष्णुचेष्टितम् । देवा ऊचुः। महादेव त्वया देवा रक्षिताः शत्रुजाद्भयात्

praṇamya śirasā rudraṁ śaśaṁsurviṣṇuceṣṭitam devā ūcuḥ mahādeva tvayā devā rakṣitāḥ śatrujādbhayāt

- सिर झुकाकर रुद्र को प्रणाम कर उन्होंने विष्णु की चिंताजनक स्थिति के बारे में बताया। देवताओं ने कहा - हे महादेव! आपने हम देवताओं को शत्रु से उत्पन्न भय से बचा लिया है।

श्लोक 16 (padma.6.104.16)

किंचिदन्यत्समुद्भूतं तत्र किं करवामहै । वृंदालावण्यसंभ्रांतो विष्णुस्तिष्ठति मोहितः

kiṁcidanyatsamudbhūtaṁ tatra kiṁ karavāmahai vṛṁdālāvaṇyasaṁbhrāṁto viṣṇustiṣṭhati mohitaḥ

किंतु वहाँ कुछ और भी उत्पन्न हो गया है - हम उसमें क्या करें? विष्णु वृंदा के सौंदर्य के स्मरण से व्याकुल होकर मोहित अवस्था में स्थित हैं।

श्लोक 17 (padma.6.104.17)

ईश्वर उवाच। गच्छध्वं शरणं देवा विष्णोर्मोहापनुत्तये । शरण्यां मोहिनीं मायां सा वः कार्यं करिष्यति

īśvara uvāca gacchadhvaṁ śaraṇaṁ devā viṣṇormohāpanuttaye śaraṇyāṁ mohinīṁ māyāṁ sā vaḥ kāryaṁ kariṣyati

ईश्वर ने कहा - हे देवगण! विष्णु के मोह को दूर करने के लिए शरणदात्री मोहिनी माया की शरण में जाओ। वही तुम्हारा कार्य सिद्ध करेगी।

श्लोक 18 (padma.6.104.18)

नारद उवाच। इत्युक्त्वांतर्दधे देवः सहभूतगणैस्तथा । देवाश्च तुष्टुवुर्मूलप्रकृतिं भक्तवत्सलाम्

nārada uvāca ityuktvāṁtardadhe devaḥ sahabhūtagaṇaistathā devāśca tuṣṭuvurmūlaprakṛtiṁ bhaktavatsalām

नारद ने कहा - ऐसा कहकर वह देव अपने भूत-गणों सहित अंतर्धान हो गए। तब देवताओं ने भक्तवत्सला मूल प्रकृति की स्तुति की।

श्लोक 19 (padma.6.104.19)

देवा ऊचुः । यदुद्भवाः सत्वरजस्तमोगुणाः सर्गस्थितिध्वंसनिदानकारणम् । यदिच्छया विश्वमिदं भवाभवौ तनोति शुद्धां प्रकृतिं नताः स्म ताम्

devā ūcuḥ yadudbhavāḥ satvarajastamoguṇāḥ sargasthitidhvaṁsanidānakāraṇam yadicchayā viśvamidaṁ bhavābhavau tanoti śuddhāṁ prakṛtiṁ natāḥ sma tām

देवताओं ने कहा - जिससे उत्पन्न सत्व, रज और तम गुण ही सृष्टि, स्थिति और संहार के मूल कारण हैं; जिसकी इच्छा से यह विश्व सृष्टि और प्रलय को विस्तार देता है - उस शुद्ध प्रकृति को हम नमस्कार करते हैं।

श्लोक 20 (padma.6.104.20)

ये हि त्रयोविंशतिभेदिसंज्ञिता जगत्यशेषे समधिष्ठिता पुरा । यद्रूपकर्माणि जडास्त्रयोऽपि ते देवा विदुर्न प्रकृतिं नताः स्म ताम्

ye hi trayoviṁśatibhedisaṁjñitā jagatyaśeṣe samadhiṣṭhitā purā yadrūpakarmāṇi jaḍāstrayo'pi te devā vidurna prakṛtiṁ natāḥ sma tām

जो तेईस भेदों वाली संज्ञाओं से पहचानी जाकर संपूर्ण जगत में पूर्वकाल से अधिष्ठित हैं; जिसके रूप और कर्मों को वे तीनों देवता भी नहीं जानते - उस प्रकृति को हम नमस्कार करते हैं।

श्लोक 21 (padma.6.104.21)

यद्भक्तियुक्ताः पुरुषास्तु नित्यं दारिद्र्यव्यामोहपराभवादिकम् । न प्राप्नुवंत्येव हि भक्तवत्सलां सदैव विष्णोः प्रकृतिं नताः स्म ताम्

yadbhaktiyuktāḥ puruṣāstu nityaṁ dāridryavyāmohaparābhavādikam na prāpnuvaṁtyeva hi bhaktavatsalāṁ sadaiva viṣṇoḥ prakṛtiṁ natāḥ sma tām

जिसकी भक्ति से युक्त पुरुष कभी भी दरिद्रता, मोह, पराभव आदि को नहीं पाते - उस भक्तवत्सला, विष्णु की सदा साथ रहने वाली प्रकृति को हम नमस्कार करते हैं।

श्लोक 22 (padma.6.104.22)

नारद उवाच। स्तोत्रमेतत्त्रिसंध्यं यः पठेदेकाग्रमानसः । दारिद्र मोहदुःखानि न कदाचित्स्पृशंति तम्

nārada uvāca stotrametattrisaṁdhyaṁ yaḥ paṭhedekāgramānasaḥ dāridra mohaduḥkhāni na kadācitspṛśaṁti tam

नारद ने कहा - जो एकाग्रचित्त होकर तीनों संध्याओं में इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसे दरिद्रता, मोह और दुःख कभी स्पर्श नहीं करते।

श्लोक 23 (padma.6.104.23)

इति स्तुवंतस्ते देवास्तेजोमंडलमास्थिताम् । ददृशुर्गगने तत्र ज्वालाव्याप्तदिगंतराम्

iti stuvaṁtaste devāstejomaṁḍalamāsthitām dadṛśurgagane tatra jvālāvyāptadigaṁtarām

इस प्रकार स्तुति करते हुए उन देवताओं ने आकाश में तेज के मंडल में स्थित, ज्वालाओं से व्याप्त दिशाओं के छोर वाली देवी को देखा।

श्लोक 24 (padma.6.104.24)

तन्मध्याद्भारतीं सर्वे ददृशुर्व्योमचारिणीम् । अहमेव त्रिधा भिन्ना तिष्ठामि त्रिविधैर्गुणैः

tanmadhyādbhāratīṁ sarve dadṛśurvyomacāriṇīm ahameva tridhā bhinnā tiṣṭhāmi trividhairguṇaiḥ

उसके मध्य से सभी ने आकाश में विचरण करती हुई वाणी को सुना - मैं ही तीन गुणों के द्वारा तीन रूपों में भिन्न होकर स्थित हूँ।

श्लोक 25 (padma.6.104.25)

गौरीलक्ष्मीस्वरा चेति रजःसत्त्वतमोगुणैः । तत्र गच्छत तं कार्यं विधास्यंति च वः सुराः

gaurīlakṣmīsvarā ceti rajaḥsattvatamoguṇaiḥ tatra gacchata taṁ kāryaṁ vidhāsyaṁti ca vaḥ surāḥ

गौरी, लक्ष्मी और सरस्वती - रज, सत्व और तम गुणों के रूप में। हे सुरगण! वहाँ जाओ, वे तुम्हारा वह कार्य सिद्ध करेंगी।

श्लोक 26 (padma.6.104.26)

नारद उवाच । शृण्वतामिति देवानामंतर्द्धानमगान्महः । देवानां विस्मयोत्फुल्लनेत्राणां तत्तदा नृप

nārada uvāca śṛṇvatāmiti devānāmaṁtarddhānamagānmahaḥ devānāṁ vismayotphullanetrāṇāṁ tattadā nṛpa

नारद ने कहा - देवताओं के सुनते ही वह तेज अंतर्धान हो गया, हे राजन्! तब आश्चर्य से देवताओं के नेत्र खिल उठे।

श्लोक 27 (padma.6.104.27)

ततः सर्वेऽपि ते देवा गत्वा तद्वाक्यनोदिताः । गौरीं लक्ष्मीं स्वरां चैव प्रणेमुर्भक्तितत्पराः

tataḥ sarve'pi te devā gatvā tadvākyanoditāḥ gaurīṁ lakṣmīṁ svarāṁ caiva praṇemurbhaktitatparāḥ

फिर उस वाणी से प्रेरित होकर सभी देवगण जाकर, भक्ति में तत्पर होकर गौरी, लक्ष्मी और सरस्वती को प्रणाम करने लगे।

श्लोक 28 (padma.6.104.28)

ततस्तास्तान्सुरान्दृष्ट्वा प्रणतान्भक्तवत्सलाः । बीजानि प्रददुस्तेभ्यो वाक्यान्यूचुश्च भूमिप

tatastāstānsurāndṛṣṭvā praṇatānbhaktavatsalāḥ bījāni pradadustebhyo vākyānyūcuśca bhūmipa

हे भूमिप! तब उन भक्तवत्सला देवियों ने उन प्रणत देवताओं को देखकर उन्हें बीज दिए और यह वचन कहा।

श्लोक 29 (padma.6.104.29)

देव्य ऊचुः। इमानि क्षेत्रबीजानि विष्णुर्यत्रावतिष्ठति । निर्वपध्वं ततः कार्यं भवतां सिद्धिमेष्यति

devya ūcuḥ imāni kṣetrabījāni viṣṇuryatrāvatiṣṭhati nirvapadhvaṁ tataḥ kāryaṁ bhavatāṁ siddhimeṣyati

देवियों ने कहा - ये क्षेत्र के बीज हैं। जहाँ विष्णु स्थित हैं, वहाँ इन्हें बो दो; तब तुम्हारा कार्य सिद्ध हो जाएगा।

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