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उत्तर खण्ड · अध्याय 105

तुलसी-धात्री उत्पत्ति एवं माहात्म्य

अध्याय 104अध्याय-सूचीअध्याय 106

श्लोक 1 (padma.6.105.1)

नारद उवाच। क्षिप्तेभ्यस्तत्रबीजेभ्यो वनस्पत्यस्त्रयोभवन् । धात्री च मालती चैव तुलसी च नृपोत्तम

nārada uvāca kṣiptebhyastatrabījebhyo vanaspatyastrayobhavan dhātrī ca mālatī caiva tulasī ca nṛpottama

नारद ने कहा - वहाँ बोए गए बीजों से तीन वनस्पतियाँ उत्पन्न हुईं - हे नृपोत्तम! धात्री, मालती और तुलसी।

श्लोक 2 (padma.6.105.2)

धात्र्युद्भवा स्मृता धात्री माभवा मालती स्मृता । गौरीभवा च तुलसी तमः सत्त्व रजोगुणाः

dhātryudbhavā smṛtā dhātrī mābhavā mālatī smṛtā gaurībhavā ca tulasī tamaḥ sattva rajoguṇāḥ

धात्री, सरस्वती से उत्पन्न मानी गई; मालती, लक्ष्मी से उत्पन्न मानी गई; और तुलसी, गौरी से उत्पन्न मानी गई - ये क्रमशः तम, सत्व और रज गुणों से संबंधित हैं।

श्लोक 3 (padma.6.105.3)

स्त्रीरूपिण्यौ वनस्पत्यौ दृष्ट्वा विष्णुस्तदा नृप । उत्तस्थौ संभ्रमाद्वृंदारूपातिशयमोहितः

strīrūpiṇyau vanaspatyau dṛṣṭvā viṣṇustadā nṛpa uttasthau saṁbhramādvṛṁdārūpātiśayamohitaḥ

हे राजन्! उन दो वनस्पतियों को स्त्री-रूप में देखकर विष्णु घबराहट से उठ खड़े हुए, वृंदा के रूप की अत्यधिक स्मृति से मोहित होकर।

श्लोक 4 (padma.6.105.4)

ददर्श तास्तदा मोहात्कामासक्तेन चेतसा । तं चापि तुलसीधात्र्यौ रागेणैवावलोकताम्

dadarśa tāstadā mohātkāmāsaktena cetasā taṁ cāpi tulasīdhātryau rāgeṇaivāvalokatām

उन्होंने मोह से, काम-आसक्त चित्त से उन्हें देखा। और तुलसी तथा धात्री ने भी उन्हें राग की दृष्टि से ही देखा।

श्लोक 5 (padma.6.105.5)

यच्चलक्ष्म्यापुराबीजंमाययैवसमर्पितम् । तस्मात्तदुद्भवानारीतस्मिन्नीर्ष्यायुताभवत्

yaccalakṣmyāpurābījaṁmāyayaivasamarpitam tasmāttadudbhavānārītasminnīrṣyāyutābhavat

चूँकि पूर्वकाल में लक्ष्मी द्वारा वह बीज माया से ही समर्पित किया गया था, इसलिए उससे उत्पन्न स्त्री ईर्ष्या से युक्त हो गई।

श्लोक 6 (padma.6.105.6)

अतःसाबर्बरीत्याख्यामाधवस्यातिगर्हिता । धात्रीतुलस्यैतद्रा गात्तस्यप्रीतिप्रदेसदा

ataḥsābarbarītyākhyāmādhavasyātigarhitā dhātrītulasyaitadrā gāttasyaprītipradesadā

इसलिए वह माधव के लिए अत्यंत निंदित होकर 'बर्बरी' नाम से जानी गई। धात्री और तुलसी अपने इस राग के कारण उनकी सदा प्रिय बनी रहीं।

श्लोक 7 (padma.6.105.7)

ततो विस्मृतदुःखोऽसौ विष्णुस्ताभ्यां सहैव तु । वैकुंठमगमद्धृष्टः सर्वदेवनमस्कृतः

tato vismṛtaduḥkho'sau viṣṇustābhyāṁ sahaiva tu vaikuṁṭhamagamaddhṛṣṭaḥ sarvadevanamaskṛtaḥ

तब अपने दुःख को भूलकर वह विष्णु उन दोनों के साथ ही हर्षित होकर वैकुंठ चले गए, सभी देवताओं द्वारा नमस्कृत होते हुए।

श्लोक 8 (padma.6.105.8)

कार्तिकोद्यापने विष्णोस्तस्मात्पूजा विधीयते । तुलसीमूलदेशे तु प्रीतिदा सा यतः स्मृता

kārtikodyāpane viṣṇostasmātpūjā vidhīyate tulasīmūladeśe tu prītidā sā yataḥ smṛtā

इसीलिए कार्तिक के उद्यापन में विष्णु की पूजा तुलसी की जड़ के स्थान पर की जाती है, क्योंकि वह उन्हें प्रीति देने वाली स्मरण की गई है।

श्लोक 9 (padma.6.105.9)

तुलसीकाननं राजन्गृहे यस्यावतिष्ठते । तद्गृहं तीर्थरूपं तु नायांति यमकिंकराः

tulasīkānanaṁ rājangṛhe yasyāvatiṣṭhate tadgṛhaṁ tīrtharūpaṁ tu nāyāṁti yamakiṁkarāḥ

हे राजन्! जिसके घर में तुलसी-वन स्थित है, वह घर तीर्थ-रूप हो जाता है; वहाँ यम के दूत नहीं आते।

श्लोक 10 (padma.6.105.10)

सर्वपापहरं पुण्यं कामदं तुलसीवनम् । रोपयंति नरश्रेष्ठा न तेपश्यंति भास्करिम्

sarvapāpaharaṁ puṇyaṁ kāmadaṁ tulasīvanam ropayaṁti naraśreṣṭhā na tepaśyaṁti bhāskarim

तुलसी-वन सभी पापों को हरने वाला, पुण्यदायक और कामनाओं को पूर्ण करने वाला है। जो श्रेष्ठ मनुष्य इसे लगाते हैं, वे यम को नहीं देखते।

श्लोक 11 (padma.6.105.11)

दर्शनं नर्मदायास्तु गंगास्नानं तथैव च । तुलसीवनसंसर्गः सममेतत्त्रयं स्मृतम्

darśanaṁ narmadāyāstu gaṁgāsnānaṁ tathaiva ca tulasīvanasaṁsargaḥ samametattrayaṁ smṛtam

नर्मदा का दर्शन, गंगा में स्नान और तुलसी-वन का संसर्ग - ये तीनों समान फल देने वाले स्मरण किए गए हैं।

श्लोक 12 (padma.6.105.12)

रोपणात्पालनात्सेकाद्दर्शनात्स्पर्शनान्नृणाम् । तुलसी दहते पापं वाङ्मनःकाय संचितम्

ropaṇātpālanātsekāddarśanātsparśanānnṛṇām tulasī dahate pāpaṁ vāṅmanaḥkāya saṁcitam

तुलसी को लगाने से, उसका पालन करने से, सींचने से, दर्शन करने से और स्पर्श करने से मनुष्यों का वाणी, मन और शरीर से संचित पाप जल जाता है।

श्लोक 13 (padma.6.105.13)

तुलसीमंजरीभिर्यः कुर्याद्धरिहरार्चनम् । न स गर्भगृहं याति मुक्तिभागी न संशयः

tulasīmaṁjarībhiryaḥ kuryāddhariharārcanam na sa garbhagṛhaṁ yāti muktibhāgī na saṁśayaḥ

जो तुलसी की मंजरियों से हरि और हर की पूजा करता है, वह गर्भ-गृह में नहीं जाता; वह निश्चय ही मुक्ति का भागी होता है।

श्लोक 14 (padma.6.105.14)

पुष्करादीनि तीर्थानि गंगाद्याः सरितस्तथा । वासुदेवादयो देवास्तिष्ठंति तुलसीदले

puṣkarādīni tīrthāni gaṁgādyāḥ saritastathā vāsudevādayo devāstiṣṭhaṁti tulasīdale

पुष्कर आदि तीर्थ, गंगा आदि नदियाँ, तथा वासुदेव आदि देवता - सभी तुलसी के पत्ते में निवास करते हैं।

श्लोक 15 (padma.6.105.15)

तुलसीमंजरीयुक्तो यदि प्राणान्विमुंचति । विष्णोः सायुज्यमाप्नोति सत्यं सत्यं नृपोत्तम

tulasīmaṁjarīyukto yadi prāṇānvimuṁcati viṣṇoḥ sāyujyamāpnoti satyaṁ satyaṁ nṛpottama

यदि कोई तुलसी की मंजरी के साथ प्राण त्यागता है, तो वह विष्णु के सायुज्य को प्राप्त करता है - हे नृपोत्तम! यह सत्य है, सत्य है।

श्लोक 16 (padma.6.105.16)

तुलसीमृत्तिकालिप्तो यस्तु प्राणान्विमुचंति । यमोऽपि नेक्षितुं शक्तो युक्तं पापशतैरपि

tulasīmṛttikālipto yastu prāṇānvimucaṁti yamo'pi nekṣituṁ śakto yuktaṁ pāpaśatairapi

तुलसी की मिट्टी से लिप्त होकर जो प्राण त्यागता है, उसे सैकड़ों पापों से युक्त होते हुए भी यमराज भी देखने में समर्थ नहीं होते।

श्लोक 17 (padma.6.105.17)

तुलसीकाष्ठजं यस्तु चंदनं धारयेन्नरः । तद्देहं नस्पृशेत्पापं क्रियमाणमपीह यत्

tulasīkāṣṭhajaṁ yastu caṁdanaṁ dhārayennaraḥ taddehaṁ naspṛśetpāpaṁ kriyamāṇamapīha yat

जो मनुष्य तुलसी की लकड़ी से बनी चंदन-सी माला धारण करता है, उसके शरीर को इस लोक में किया जा रहा पाप भी स्पर्श नहीं करता।

श्लोक 18 (padma.6.105.18)

तुलसीविपिनच्छाया यत्र यत्र भवेन्नृप । तत्र श्राद्धं प्रकर्त्तव्यं पितॄणां दत्तमक्षयम्

tulasīvipinacchāyā yatra yatra bhavennṛpa tatra śrāddhaṁ prakarttavyaṁ pitṝṇāṁ dattamakṣayam

हे राजन्! जहाँ-जहाँ तुलसी-वन की छाया हो, वहाँ श्राद्ध करना चाहिए; वहाँ पितरों को दिया गया दान अक्षय होता है।

श्लोक 19 (padma.6.105.19)

धात्रीछायासु यः कुर्यात्पिंडदानं नृपोत्तम । तृप्तिं च यांति पितरस्तस्य ये नरके स्थिताः

dhātrīchāyāsu yaḥ kuryātpiṁḍadānaṁ nṛpottama tṛptiṁ ca yāṁti pitarastasya ye narake sthitāḥ

हे नृपोत्तम! जो आँवले की छाया में पिंडदान करता है, उसके जो भी पितर नरक में स्थित हों, वे भी तृप्ति को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 20 (padma.6.105.20)

मूर्ध्नि पाणौ मुखे चैव देहे च नृपसत्तम । धत्ते धात्रीफलं यस्तु स विज्ञेयो हरिः स्वयम्

mūrdhni pāṇau mukhe caiva dehe ca nṛpasattama dhatte dhātrīphalaṁ yastu sa vijñeyo hariḥ svayam

हे नृपसत्तम! जो सिर पर, हाथ में, मुख में तथा शरीर पर आँवले का फल धारण करता है, वह साक्षात् हरि ही जानने योग्य है।

श्लोक 21 (padma.6.105.21)

धात्रीफलं च तुलसीमृत्तिका द्वारकोद्भवा । यस्य देहे स्थिता नित्यं स जीवन्मुक्त उच्यते

dhātrīphalaṁ ca tulasīmṛttikā dvārakodbhavā yasya dehe sthitā nityaṁ sa jīvanmukta ucyate

जिसके शरीर पर आँवले का फल, तुलसी की मिट्टी और द्वारका से उत्पन्न शिला सदा स्थित रहती है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है।

श्लोक 22 (padma.6.105.22)

धात्रीफलविमिश्रैस्तु तुलसीदलमिश्रितैः । जलैः स्नाति नरस्तस्य गंगास्नानफलं स्मृतम्

dhātrīphalavimiśraistu tulasīdalamiśritaiḥ jalaiḥ snāti narastasya gaṁgāsnānaphalaṁ smṛtam

जो मनुष्य आँवले के फल और तुलसीदल से मिश्रित जल से स्नान करता है, उसका फल गंगा-स्नान के फल के समान स्मरण किया गया है।

श्लोक 23 (padma.6.105.23)

देवार्चनं नरः कुर्याद्धात्रीपत्रैः फलैरपि । सुवर्णपुष्पैर्विविधैरर्चनस्याप्नुयात्फलम्

devārcanaṁ naraḥ kuryāddhātrīpatraiḥ phalairapi suvarṇapuṣpairvividhairarcanasyāpnuyātphalam

मनुष्य को आँवले के पत्तों और फलों से देव-पूजा करनी चाहिए; इससे उसे विविध सुवर्ण-पुष्पों से की गई पूजा का फल प्राप्त होता है।

श्लोक 24 (padma.6.105.24)

तीर्थानि मुनयो देवा यज्ञाः सर्वेऽपि कार्तिके । नित्यं धात्रीं समाश्रित्य तिष्ठंत्यर्के तुलाश्रिते

tīrthāni munayo devā yajñāḥ sarve'pi kārtike nityaṁ dhātrīṁ samāśritya tiṣṭhaṁtyarke tulāśrite

कार्तिक में, जब सूर्य तुला राशि में हो, सभी तीर्थ, मुनि, देवता और यज्ञ सदा आँवले के वृक्ष का आश्रय लेकर स्थित रहते हैं।

श्लोक 25 (padma.6.105.25)

द्वादश्यां तुलसीपत्रं धात्रीपत्रं तु कार्तिके । लुनाति स नरो गच्छेन्निरयानतिगर्हितान्

dvādaśyāṁ tulasīpatraṁ dhātrīpatraṁ tu kārtike lunāti sa naro gacchennirayānatigarhitān

द्वादशी को जो मनुष्य कार्तिक में तुलसी-पत्र अथवा आँवले के पत्ते को तोड़ता है, वह अत्यंत निंदित नरकों में जाता है।

श्लोक 26 (padma.6.105.26)

धात्रीछायां समाश्रित्य कार्तिकेऽन्नं भुनक्ति यः । अन्नसंसर्गजं पापमावर्षं तस्य नश्यति

dhātrīchāyāṁ samāśritya kārtike'nnaṁ bhunakti yaḥ annasaṁsargajaṁ pāpamāvarṣaṁ tasya naśyati

कार्तिक में जो आँवले की छाया का आश्रय लेकर भोजन करता है, उसका अन्न के संसर्ग से उत्पन्न पाप एक वर्ष तक नष्ट रहता है।

श्लोक 27 (padma.6.105.27)

धात्रीमूले तु यो विष्णुं कार्तिकेऽर्चयते नरः । विष्णुक्षेत्रेषु सर्वेषु पूजितस्तेन सर्वदा

dhātrīmūle tu yo viṣṇuṁ kārtike'rcayate naraḥ viṣṇukṣetreṣu sarveṣu pūjitastena sarvadā

जो मनुष्य कार्तिक में आँवले की जड़ के पास विष्णु की पूजा करता है, उसके द्वारा सभी विष्णु-क्षेत्रों में सदा पूजा हो जाती है।

श्लोक 28 (padma.6.105.28)

धात्रीतुलस्योर्माहात्म्यमपिदेवश्चतुर्मुखः । न समर्थो भवेद्वक्तुं यथा देवस्यशार्ङ्गिणः

dhātrītulasyormāhātmyamapidevaścaturmukhaḥ na samartho bhavedvaktuṁ yathā devasyaśārṅgiṇaḥ

आँवले और तुलसी की महिमा को चतुर्मुख ब्रह्मा भी, शार्ङ्गधारी देव विष्णु की महिमा के समान, कहने में समर्थ नहीं हैं।

श्लोक 29 (padma.6.105.29)

धात्री तुलस्युद्भवकारणं च शृणोति यः श्रावयते च भक्त्या । विधूतपाप्मा सह पूर्वजैश्च स्वर्गं व्रजत्यग्र्यविमानसंस्थः

dhātrī tulasyudbhavakāraṇaṁ ca śṛṇoti yaḥ śrāvayate ca bhaktyā vidhūtapāpmā saha pūrvajaiśca svargaṁ vrajatyagryavimānasaṁsthaḥ

जो कोई भक्तिपूर्वक आँवले और तुलसी की उत्पत्ति के इस कारण को सुनता है अथवा सुनाता है, वह पापरहित होकर अपने पूर्वजों सहित श्रेष्ठ विमान पर बैठकर स्वर्ग को जाता है।

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