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उत्तर खण्ड · अध्याय 106

कलहा-उद्धार कथा

अध्याय 105अध्याय-सूचीअध्याय 107

श्लोक 1 (padma.6.106.1)

पृथुरुवाच। सेतिहासमिमं ब्रह्मन्माहात्म्यं कथितं त्वया । अत्याश्चर्यकरं सम्यक्तुलस्यास्तु श्रुतं महत्

pṛthuruvāca setihāsamimaṁ brahmanmāhātmyaṁ kathitaṁ tvayā atyāścaryakaraṁ samyaktulasyāstu śrutaṁ mahat

पृथु ने कहा - हे ब्रह्मन्! आपने यह इतिहास सहित महिमा कही, जो अत्यंत आश्चर्यकारी है। तुलसी की यह महती महिमा मैंने भलीभाँति सुनी।

श्लोक 2 (padma.6.106.2)

यदूर्जव्रतिनः पुंसः फलं महदुदाहृतम् । तत्पुनर्ब्रूहि माहात्म्यं केन चीर्णमिदं कथम्

yadūrjavratinaḥ puṁsaḥ phalaṁ mahadudāhṛtam tatpunarbrūhi māhātmyaṁ kena cīrṇamidaṁ katham

कार्तिक-व्रत करने वाले पुरुष का जो महान फल बताया गया, उस महिमा को फिर से बताइए - इसे किसने और कैसे किया, यह भी बताइए।

श्लोक 3 (padma.6.106.3)

नारद उवाच। आसीत्सह्याद्रिविषये करवीरपुरे पुरा । ब्राह्मणो धर्मवित्कश्चिद्धर्मदत्तोऽतिविश्रुतः

nārada uvāca āsītsahyādriviṣaye karavīrapure purā brāhmaṇo dharmavitkaściddharmadatto'tiviśrutaḥ

नारद ने कहा - पूर्वकाल में सह्याद्रि क्षेत्र में करवीरपुर में धर्मदत्त नामक अत्यंत प्रसिद्ध, धर्म का ज्ञाता एक ब्राह्मण था।

श्लोक 4 (padma.6.106.4)

विष्णुव्रतकरः शश्वद्विष्णुपूजारतः सदा । द्वादशाक्षरविद्यायां जपनिष्ठोऽतिथिप्रियः

viṣṇuvratakaraḥ śaśvadviṣṇupūjārataḥ sadā dvādaśākṣaravidyāyāṁ japaniṣṭho'tithipriyaḥ

वह सदा विष्णु-व्रत करने वाला, सदा विष्णु-पूजा में रत, द्वादशाक्षर मंत्र के जप में निष्ठावान और अतिथिप्रिय था।

श्लोक 5 (padma.6.106.5)

कदाचित्कार्तिके मासि हरिजागरणाय सः । रात्र्या तुर्यांशशेषायां जगाम हरिमंदिरम्

kadācitkārtike māsi harijāgaraṇāya saḥ rātryā turyāṁśaśeṣāyāṁ jagāma harimaṁdiram

एक बार कार्तिक मास में हरि-जागरण के लिए, रात्रि का चतुर्थ भाग शेष रहने पर, वह हरि के मंदिर गया।

श्लोक 6 (padma.6.106.6)

हरिपूजोपकरणान्प्रगृह्य व्रजता तदा । तेन दृष्टा समायाता राक्षसी भीमनिःस्वना

haripūjopakaraṇānpragṛhya vrajatā tadā tena dṛṣṭā samāyātā rākṣasī bhīmaniḥsvanā

हरि-पूजा की सामग्री लेकर जाते हुए उसने एक भयंकर आवाज वाली, आती हुई राक्षसी को देखा।

श्लोक 7 (padma.6.106.7)

वक्रदंष्ट्रानना जिह्वा निमग्ना रक्तलोचना । दिगंबरा शुष्कमांसा लंबोष्ठी घर्घरस्वना

vakradaṁṣṭrānanā jihvā nimagnā raktalocanā digaṁbarā śuṣkamāṁsā laṁboṣṭhī ghargharasvanā

टेढ़ी दाढ़ों वाला मुख, धँसी हुई जिह्वा, लाल नेत्र, नग्न, सूखे मांस वाली, लटके होंठ वाली और घर्घर स्वर वाली।

श्लोक 8 (padma.6.106.8)

तां दृष्ट्वा भयवित्रस्तः कंपितावयवस्तदा । पूजोपकरणैर्वेगात्पयोभिश्चाहनद्भयात्

tāṁ dṛṣṭvā bhayavitrastaḥ kaṁpitāvayavastadā pūjopakaraṇairvegātpayobhiścāhanadbhayāt

उसे देखकर भय से त्रस्त और अंगों में कँपकँपाता हुआ वह, भय से पूजा-सामग्री और जल से वेगपूर्वक उस पर प्रहार करने लगा।

श्लोक 9 (padma.6.106.9)

संस्मृत्य च हरेर्नाम तुलसीयुतवारिणा । सा हता पातकं तस्मात्तस्याः सर्वमगात्क्षयम्

saṁsmṛtya ca harernāma tulasīyutavāriṇā sā hatā pātakaṁ tasmāttasyāḥ sarvamagātkṣayam

हरि के नाम का स्मरण करते हुए तुलसी-मिश्रित जल से उसे मारने पर, उसका सारा पाप क्षय को प्राप्त हो गया।

श्लोक 10 (padma.6.106.10)

अथ संस्मृत्य सा पूर्वजन्मकर्मविपाकजम् । स्वां दशामब्रवीत्सर्वां दंडवत्तं प्रणम्य सा

atha saṁsmṛtya sā pūrvajanmakarmavipākajam svāṁ daśāmabravītsarvāṁ daṁḍavattaṁ praṇamya sā

फिर पूर्वजन्म के कर्म-फल से उत्पन्न अपनी उस दशा को स्मरण करते हुए, वह उसे दंडवत् प्रणाम कर अपनी सारी स्थिति बताने लगी।

श्लोक 11 (padma.6.106.11)

कलहोवाच । पूर्वकर्मविपाकेन दशामेतां गता ह्यहम् । तत्कथं तु पुनर्विप्र याम्युत्तमगतिं शुभाम्

kalahovāca pūrvakarmavipākena daśāmetāṁ gatā hyaham tatkathaṁ tu punarvipra yāmyuttamagatiṁ śubhām

कलहा ने कहा - पूर्वकर्म के फल से मैं इस दशा को प्राप्त हुई हूँ। हे विप्र! फिर मैं शुभ, उत्तम गति को कैसे प्राप्त करूँ?

श्लोक 12 (padma.6.106.12)

नारद उवाच। तां दृष्ट्वा प्रणतामग्रे वदमानां स्वकर्म तत् । अतीव विस्मितो विप्रस्तदा वचनमब्रवीत्

nārada uvāca tāṁ dṛṣṭvā praṇatāmagre vadamānāṁ svakarma tat atīva vismito viprastadā vacanamabravīt

नारद ने कहा - अपने सामने झुककर अपने ही कर्म को बताती हुई उसे देखकर, वह ब्राह्मण अत्यंत आश्चर्यचकित हो गया और यह वचन कहा।

श्लोक 13 (padma.6.106.13)

धर्मदत्त उवाच। केन कर्मविपाकेन त्वं दशामीदृशीं गता । कुतस्त्वं का च किं शीला तत्सर्वं कथयस्व मे

dharmadatta uvāca kena karmavipākena tvaṁ daśāmīdṛśīṁ gatā kutastvaṁ kā ca kiṁ śīlā tatsarvaṁ kathayasva me

धर्मदत्त ने कहा - किस कर्म के फल से तुम इस प्रकार की दशा को प्राप्त हुई हो? तुम कहाँ से हो, कौन हो और तुम्हारा स्वभाव क्या था? यह सब मुझे बताओ।

श्लोक 14 (padma.6.106.14)

कलहोवाच। सौराष्ट्रनगरे ब्रह्मन्भिक्षुनामाभवद्द्विजः । तस्याऽहं गृहिणी पूर्वं कलहाख्याति निष्ठुरा

kalahovāca saurāṣṭranagare brahmanbhikṣunāmābhavaddvijaḥ tasyā'haṁ gṛhiṇī pūrvaṁ kalahākhyāti niṣṭhurā

कलहा ने कहा - हे ब्रह्मन्! सौराष्ट्र नगर में भिक्षु नामक एक द्विज था। पूर्वजन्म में मैं उसकी क्रूर स्वभाव वाली गृहिणी थी, जो 'कलहा' कही जाती थी।

श्लोक 15 (padma.6.106.15)

न कदाचिन्मया भर्तुर्वचसापि शुभं कृतम् । नार्पितं तस्य मिष्टान्नं भर्तुर्वचनभंगया

na kadācinmayā bharturvacasāpi śubhaṁ kṛtam nārpitaṁ tasya miṣṭānnaṁ bharturvacanabhaṁgayā

मैंने अपने पति की बात मानकर भी कभी कोई शुभ कार्य नहीं किया। पति के वचन को तोड़ने वाली मैंने उसे मीठा भोजन भी अर्पित नहीं किया।

श्लोक 16 (padma.6.106.16)

कलहप्रियया नित्यं भयोद्विग्नस्तदा द्विजः । परिणेतुं तदाऽन्या स मतिं चक्रे पतिर्मम

kalahapriyayā nityaṁ bhayodvignastadā dvijaḥ pariṇetuṁ tadā'nyā sa matiṁ cakre patirmama

कलह-प्रिय मुझसे सदा भयभीत और उद्विग्न रहने के कारण, तब मेरे पति ने किसी अन्य से विवाह करने का मन बना लिया।

श्लोक 17 (padma.6.106.17)

ततो गरं समादाय प्राणास्त्यक्ता मया द्विज । अथ बध्वा बध्यमानां मां विनिन्युर्यमानुगाः

tato garaṁ samādāya prāṇāstyaktā mayā dvija atha badhvā badhyamānāṁ māṁ vininyuryamānugāḥ

हे द्विज! तब मैंने विष खाकर अपने प्राण त्याग दिए। फिर यमदूतों ने मुझे बाँधकर, बंधे हुए ही, ले जाना शुरू किया।

श्लोक 18 (padma.6.106.18)

यमश्च मां तदा दृष्ट्वा चित्रगुप्तमपृच्छत । यम उवाच। अनया किं कृतं कर्म चित्रगुप्त विलोकय

yamaśca māṁ tadā dṛṣṭvā citraguptamapṛcchata yama uvāca anayā kiṁ kṛtaṁ karma citragupta vilokaya

यमराज ने मुझे देखकर तब चित्रगुप्त से पूछा। यम ने कहा - हे चित्रगुप्त! इसने कौन-सा कर्म किया है, देखो।

श्लोक 19 (padma.6.106.19)

प्राप्नोत्वेषा कर्मफलं शुभं वाशुभमेव च । चित्रगुप्तस्ततो वाक्यं भर्त्सयन्समुवाच ह

prāpnotveṣā karmaphalaṁ śubhaṁ vāśubhameva ca citraguptastato vākyaṁ bhartsayansamuvāca ha

इसे इसके कर्म का फल प्राप्त हो, चाहे शुभ हो या अशुभ। तब चित्रगुप्त ने डाँटते हुए यह वचन कहा।

श्लोक 20 (padma.6.106.20)

चित्रगुप्त उवाच। अनया तु शुभं कर्म कृतं किंचिन्न विद्यते । मिष्टान्नं भुक्तमनया न भर्तरि तदर्पितम्

citragupta uvāca anayā tu śubhaṁ karma kṛtaṁ kiṁcinna vidyate miṣṭānnaṁ bhuktamanayā na bhartari tadarpitam

चित्रगुप्त ने कहा - इसने कोई भी शुभ कर्म नहीं किया है। इसने मीठा भोजन स्वयं खाया, पति को अर्पित नहीं किया।

श्लोक 21 (padma.6.106.21)

अतश्च वल्गुली योन्यां स्वविष्ठादावतिष्ठतु । भर्तुर्द्वेषकरी त्वेषा नित्यं कलहकारिणी

ataśca valgulī yonyāṁ svaviṣṭhādāvatiṣṭhatu bharturdveṣakarī tveṣā nityaṁ kalahakāriṇī

इसलिए यह चमगादड़ की योनि में, अपने ही मल को खाने वाली, रहे। यह पति से द्वेष करने वाली और सदा कलह करने वाली थी।

श्लोक 22 (padma.6.106.22)

विष्ठादा शूकरी योन्यां ततस्तिष्ठत्वियं हरे । पाकभांडे सदा भुक्तं नित्यं चैवानया यतः

viṣṭhādā śūkarī yonyāṁ tatastiṣṭhatviyaṁ hare pākabhāṁḍe sadā bhuktaṁ nityaṁ caivānayā yataḥ

हे हरि! फिर यह मल खाने वाली सुअरनी की योनि में रहे, क्योंकि इसने सदा पाक-पात्र में से ही खाना खाया।

श्लोक 23 (padma.6.106.23)

तस्माद्दोषाद्बिडाली तु स्वजातापत्यभक्षिणी । भर्तारमनयोद्दिश्य ह्यात्मघातः कृतो यतः

tasmāddoṣādbiḍālī tu svajātāpatyabhakṣiṇī bhartāramanayoddiśya hyātmaghātaḥ kṛto yataḥ

इस दोष के कारण यह अपनी ही जाति के बच्चों को खाने वाली बिल्ली बने, क्योंकि इसने अपने पति के प्रति अपराध कर आत्महत्या की थी।

श्लोक 24 (padma.6.106.24)

तस्मात्प्रेतपिशाचेषु तिष्ठत्वेषातिनिंदिता । ततश्चैव मरुं देशं प्रापितव्या भटैः सह

tasmātpretapiśāceṣu tiṣṭhatveṣātiniṁditā tataścaiva maruṁ deśaṁ prāpitavyā bhaṭaiḥ saha

इसलिए यह अत्यंत निंदित होकर प्रेत-पिशाचों में स्थित रहे। फिर भटों के साथ इसे मरुभूमि में ले जाया जाए।

श्लोक 25 (padma.6.106.25)

तत्र प्रेतशरीराख्या चिरं तिष्ठत्वियं ततः । इत्थं योनित्रयं त्वेषा भुनक्त्वा शुभकारिणी

tatra pretaśarīrākhyā ciraṁ tiṣṭhatviyaṁ tataḥ itthaṁ yonitrayaṁ tveṣā bhunaktvā śubhakāriṇī

वहाँ प्रेत-शरीरधारी होकर यह दीर्घकाल तक रहे। इस प्रकार तीन योनियों को भोगकर अंततः यह शुभकारिणी हो।

श्लोक 26 (padma.6.106.26)

कलहोवाच । साहं पंचशताब्दानि प्रेतदेहे स्थिता किल । क्षुतृड्भ्यां पीडिता नित्यं दुःखिता स्वेन कर्मणा

kalahovāca sāhaṁ paṁcaśatābdāni pretadehe sthitā kila kṣutṛḍbhyāṁ pīḍitā nityaṁ duḥkhitā svena karmaṇā

कलहा ने कहा - मैं पाँच सौ वर्षों तक प्रेत-देह में स्थित रही, अपने ही कर्म से भूख और प्यास से सदा पीड़ित और दुःखी रहते हुए।

श्लोक 27 (padma.6.106.27)

ततः क्षुत्पीडिता नित्यं शरीरं वणिजस्त्वहम् । आयाता दक्षिणं देशं कृष्णावेण्यास्तु संगमे

tataḥ kṣutpīḍitā nityaṁ śarīraṁ vaṇijastvaham āyātā dakṣiṇaṁ deśaṁ kṛṣṇāveṇyāstu saṁgame

फिर सदा भूख से पीड़ित मैं एक वणिक के शरीर के बहाने दक्षिण देश में कृष्णा-वेणी के संगम पर आई।

श्लोक 28 (padma.6.106.28)

तत्तीरसंश्रिता यावत्तावत्तस्य शरीरतः । शिवविष्णुगणैर्दूरमपाकृष्टा बलादहम्

tattīrasaṁśritā yāvattāvattasya śarīrataḥ śivaviṣṇugaṇairdūramapākṛṣṭā balādaham

जैसे ही मैं उसके शरीर पर उस तट का आश्रय ले पाई, वैसे ही शिव-विष्णु के गणों ने मुझे बलपूर्वक दूर हटा दिया।

श्लोक 29 (padma.6.106.29)

ततः क्षुत्क्षामया दृष्टो भ्रमंत्या त्वं मया द्विज । प्रक्षिप्ततुलसीवारिसंसर्गगतपापया

tataḥ kṣutkṣāmayā dṛṣṭo bhramaṁtyā tvaṁ mayā dvija prakṣiptatulasīvārisaṁsargagatapāpayā

फिर हे द्विज! भूख से क्षीण, भटकती हुई मैंने आपको देखा; और आपके द्वारा फेंके गए तुलसी-जल के संसर्ग से मेरा पाप नष्ट हो गया।

श्लोक 30 (padma.6.106.30)

तत्कृपां कुरु विप्रेंद्र कथं मुक्तिमियाम्यहम् । योनित्रयादति भयादस्माच्च प्रेतदेहतः

tatkṛpāṁ kuru vipreṁdra kathaṁ muktimiyāmyaham yonitrayādati bhayādasmācca pretadehataḥ

इसलिए हे विप्रेंद्र! कृपा कीजिए - मैं उन तीन अत्यंत भयंकर योनियों और इस प्रेत-देह से कैसे मुक्ति पाऊँ?

श्लोक 31 (padma.6.106.31)

इत्थं निशम्य कलहा वचनं द्विजश्च तत्कर्मपाकभवविस्मयदुःखयुक्तः । तद्ग्लानिदर्शनकृपाचलचित्तवृत्तिर्ध्यात्वा चिरं स वचनं निजगाद दुःखात्

itthaṁ niśamya kalahā vacanaṁ dvijaśca tatkarmapākabhavavismayaduḥkhayuktaḥ tadglānidarśanakṛpācalacittavṛttirdhyātvā ciraṁ sa vacanaṁ nijagāda duḥkhāt

इस प्रकार कलहा के इस वचन को सुनकर, उसके कर्मफल से उत्पन्न आश्चर्य और दुःख से युक्त हुए, उस ब्राह्मण का मन उसकी दुर्दशा देखकर करुणा से विचलित हो गया। दीर्घकाल तक विचार कर उसने दुःखपूर्वक यह वचन कहा।

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