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उत्तर खण्ड · अध्याय 108

चोलेश्वर-विष्णुदास प्रतियोगिता

अध्याय 107अध्याय-सूचीअध्याय 109

श्लोक 1 (padma.6.108.1)

नारद उवाच। इत्थं तद्वचनं श्रुत्वा धर्मदत्तः सविस्मयः । प्रणम्य दंडवद्भूमौ वाक्यमेतदुवाच ह

nārada uvāca itthaṁ tadvacanaṁ śrutvā dharmadattaḥ savismayaḥ praṇamya daṁḍavadbhūmau vākyametaduvāca ha

नारद ने कहा - इस प्रकार उस वचन को सुनकर आश्चर्यचकित हुए धर्मदत्त ने भूमि पर दंडवत् प्रणाम कर यह वचन कहा।

श्लोक 2 (padma.6.108.2)

धर्मदत्त उवाच। आराधयंति सर्वेऽपि विष्णुं भक्तार्त्तिनाशिनम् । यज्ञैर्दानैर्व्रतैस्तीर्थैस्तपोभिश्च यथाविधि

dharmadatta uvāca ārādhayaṁti sarve'pi viṣṇuṁ bhaktārttināśinam yajñairdānairvrataistīrthaistapobhiśca yathāvidhi

धर्मदत्त ने कहा - सभी लोग भक्तों की पीड़ा हरने वाले विष्णु की यज्ञों, दानों, व्रतों, तीर्थों और तपों से यथाविधि आराधना करते हैं।

श्लोक 3 (padma.6.108.3)

विष्णुप्रीतिकरं तेषां विष्णुसान्निध्यकारकम् । यत्कृत्वा तानि चीर्णानि सर्वाण्यपि भवंति हि

viṣṇuprītikaraṁ teṣāṁ viṣṇusānnidhyakārakam yatkṛtvā tāni cīrṇāni sarvāṇyapi bhavaṁti hi

उनमें से वह कौन-सा है जो विष्णु को प्रसन्न करने वाला और विष्णु की निकटता देने वाला है, जिसे करने से वे सभी अन्य साधन किए हुए ही मान लिए जाते हैं?

श्लोक 4 (padma.6.108.4)

गणावूचतुः । साधु पृष्टं त्वया विप्र शृणुष्वैकाग्रमानसः । सेतिहासां कथां विप्र कथ्यमानां पुराभवाम्

gaṇāvūcatuḥ sādhu pṛṣṭaṁ tvayā vipra śṛṇuṣvaikāgramānasaḥ setihāsāṁ kathāṁ vipra kathyamānāṁ purābhavām

उन दोनों गणों ने कहा - हे विप्र! तुमने अच्छा प्रश्न पूछा है। एकाग्रचित्त होकर सुनो - यह प्राचीन कथा इतिहास सहित कही जा रही है।

श्लोक 5 (padma.6.108.5)

कांतिपुर्यां पुरा चोल चक्रवर्त्ती नृपोऽभवत् । यस्य नाम्ना च ते देशाश्चोलाख्या अभवन्किल

kāṁtipuryāṁ purā cola cakravarttī nṛpo'bhavat yasya nāmnā ca te deśāścolākhyā abhavankila

पूर्वकाल में कांतिपुरी में चोल नामक एक चक्रवर्ती राजा था, जिसके नाम से ही वे देश 'चोल' नाम से प्रसिद्ध हुए।

श्लोक 6 (padma.6.108.6)

यस्मिन्शासति भूचक्रं दरिद्रो नैव दुःखितः । पापबुद्धिः सरुग्वापि नैव कश्चिदभून्नरः

yasminśāsati bhūcakraṁ daridro naiva duḥkhitaḥ pāpabuddhiḥ sarugvāpi naiva kaścidabhūnnaraḥ

उसके पृथ्वीचक्र पर शासन करते समय कोई भी मनुष्य न दरिद्र था, न दुःखी था, न पापी बुद्धि वाला था और न रोगी था।

श्लोक 7 (padma.6.108.7)

यस्याप्यत्यंतयज्ञस्य ताम्रपर्णी तटावुभौ । सुवर्णयूपैः शोभाढ्यावास्तां चैत्ररथोपमौ

yasyāpyatyaṁtayajñasya tāmraparṇī taṭāvubhau suvarṇayūpaiḥ śobhāḍhyāvāstāṁ caitrarathopamau

उसके अत्यंत बड़े यज्ञ के कारण ताम्रपर्णी नदी के दोनों किनारे सुवर्ण-यूपों से सुशोभित होकर चैत्ररथ वन के समान बन गए थे।

श्लोक 8 (padma.6.108.8)

स कदाचिदगाद्राजा ह्यनंतशयनं द्विज । यत्रासौ जगतां नाथो योगनिद्रामुपासते

sa kadācidagādrājā hyanaṁtaśayanaṁ dvija yatrāsau jagatāṁ nātho yoganidrāmupāsate

हे द्विज! वह राजा एक बार अनंतशयनम् गया, जहाँ वह जगत्-नाथ योगनिद्रा में लीन रहते हैं।

श्लोक 9 (padma.6.108.9)

तत्र श्रीरमणं देवं संपूज्य विधिवन्नृपः । मणिमुक्ताफलैर्दिव्यैः स्वर्णपुष्पैश्च शोभनैः

tatra śrīramaṇaṁ devaṁ saṁpūjya vidhivannṛpaḥ maṇimuktāphalairdivyaiḥ svarṇapuṣpaiśca śobhanaiḥ

वहाँ राजा ने विधिपूर्वक श्रीरमण देव की, दिव्य मणियों-मोतियों और सुंदर स्वर्ण-पुष्पों से पूजा की।

श्लोक 10 (padma.6.108.10)

प्रणम्य दंडवद्यावदुपविष्टः स तत्र वै । तावद्ब्राह्मणमायां तमपश्यद्देवसन्निधौ

praṇamya daṁḍavadyāvadupaviṣṭaḥ sa tatra vai tāvadbrāhmaṇamāyāṁ tamapaśyaddevasannidhau

दंडवत् प्रणाम कर जैसे ही वह वहाँ बैठा, तभी उसने देव के समीप एक ब्राह्मण को आते हुए देखा।

श्लोक 11 (padma.6.108.11)

देवार्चनार्थमायांतं तुलस्युदकपाणिनम् । स्वपुरीवासिनं तत्र विष्णुदासाह्वयं द्विजम्

devārcanārthamāyāṁtaṁ tulasyudakapāṇinam svapurīvāsinaṁ tatra viṣṇudāsāhvayaṁ dvijam

वह देव-पूजा के लिए आया था, हाथ में तुलसी और जल लिए हुए। वह उसी नगर में रहने वाला, विष्णुदास नामक द्विज था।

श्लोक 12 (padma.6.108.12)

तत्राभ्येत्य स विप्रर्षिर्देवदेवमपूजयत् । विष्णुसूक्तेन संस्नाप्य तुलसीमंजरीदलैः

tatrābhyetya sa viprarṣirdevadevamapūjayat viṣṇusūktena saṁsnāpya tulasīmaṁjarīdalaiḥ

वहाँ आकर उस विप्र-ऋषि ने विष्णु-सूक्त से स्नान कराकर तुलसी-मंजरी और पत्तों से देवाधिदेव की पूजा की।

श्लोक 13 (padma.6.108.13)

तुलसीपूजया तस्य रत्नपूजां तथा कृताम् । आच्छादितां समालोक्य राजा क्रुद्धोऽब्रवीद्वचः

tulasīpūjayā tasya ratnapūjāṁ tathā kṛtām ācchāditāṁ samālokya rājā kruddho'bravīdvacaḥ

उसकी तुलसी-पूजा से अपनी की गई रत्न-पूजा को ढका हुआ देखकर राजा क्रोधित होकर यह वचन बोला।

श्लोक 14 (padma.6.108.14)

राजोवाच। माणिक्यस्वर्णपूजात्र शोभाढ्या या मया कृता । विष्णुदास कथं सेयमाच्छन्ना तुलसीदलैः

rājovāca māṇikyasvarṇapūjātra śobhāḍhyā yā mayā kṛtā viṣṇudāsa kathaṁ seyamācchannā tulasīdalaiḥ

राजा ने कहा - हे विष्णुदास! यहाँ माणिक्य और सोने से जो शोभायमान पूजा मैंने की है, वह तुलसी के पत्तों से कैसे ढक दी गई?

श्लोक 15 (padma.6.108.15)

विष्णुभक्तिं न जानासि वराकोऽसि मतो मम । यस्त्विमामतिशोभाढ्यां पूजामाच्छादयस्यहो

viṣṇubhaktiṁ na jānāsi varāko'si mato mama yastvimāmatiśobhāḍhyāṁ pūjāmācchādayasyaho

तुम विष्णु-भक्ति को नहीं जानते, तुम मेरी दृष्टि में तुच्छ हो, जो इस अत्यंत शोभायमान पूजा को ढक देते हो, आश्चर्य है!

श्लोक 16 (padma.6.108.16)

इति तद्वचनं श्रुत्वा सक्रोधः स द्विजोत्तमः । राज्ञो गौरवमुल्लंघ्य जगाद वचनं तदा

iti tadvacanaṁ śrutvā sakrodhaḥ sa dvijottamaḥ rājño gauravamullaṁghya jagāda vacanaṁ tadā

यह वचन सुनकर वह श्रेष्ठ द्विज क्रोध से भर गया और राजा के गौरव की परवाह न करते हुए यह वचन कहने लगा।

श्लोक 17 (padma.6.108.17)

विष्णुदास उवाच। राजन्मुक्तिं न जानासि गर्वितोऽसि नृपश्रिया । किंस्विद्विष्णुव्रतं पूर्वं त्वया चीर्णं वदस्व तत्

viṣṇudāsa uvāca rājanmuktiṁ na jānāsi garvito'si nṛpaśriyā kiṁsvidviṣṇuvrataṁ pūrvaṁ tvayā cīrṇaṁ vadasva tat

विष्णुदास ने कहा - हे राजन्! तुम मुक्ति को नहीं जानते, राजऐश्वर्य से घमंडी हो। पूर्वकाल में तुमने कौन-सा विष्णु-व्रत किया है, वह मुझे बताओ।

श्लोक 18 (padma.6.108.18)

गणावूचतुः । तद्ब्राह्मणवचः श्रुत्वा प्रहस्य स नृपोत्तमः । विष्णुदासं तदा गर्वादुवाच वचनं द्विज

gaṇāvūcatuḥ tadbrāhmaṇavacaḥ śrutvā prahasya sa nṛpottamaḥ viṣṇudāsaṁ tadā garvāduvāca vacanaṁ dvija

दोनों गणों ने कहा - उस ब्राह्मण के वचन को सुनकर वह श्रेष्ठ राजा हँसकर, गर्व से विष्णुदास से यह वचन कहने लगा।

श्लोक 19 (padma.6.108.19)

इत्थं चेत्कथ्यसे विप्र विष्णुभक्त्यातिगर्वितः । भक्तिस्ते कियतीविष्णोर्दरिद्रस्याधनस्य च

itthaṁ cetkathyase vipra viṣṇubhaktyātigarvitaḥ bhaktiste kiyatīviṣṇordaridrasyādhanasya ca

हे विप्र! यदि तुम इस प्रकार विष्णु-भक्ति से अत्यंत गर्वित होकर बोलते हो, तो हे दरिद्र! हे धनहीन! तुम्हारी विष्णु के प्रति कितनी भक्ति है?

श्लोक 20 (padma.6.108.20)

यज्ञदानादिकं चैव विष्णुतुष्टिकरं कृतम् । नापि देवालयं पूर्वं त्वया विप्र क्वचित्कृतम्

yajñadānādikaṁ caiva viṣṇutuṣṭikaraṁ kṛtam nāpi devālayaṁ pūrvaṁ tvayā vipra kvacitkṛtam

न तो तुमने विष्णु को प्रसन्न करने वाला कोई यज्ञ-दान आदि किया है, न ही तुमने पहले कभी कोई देवालय बनवाया है, हे विप्र!

श्लोक 21 (padma.6.108.21)

ईदृशस्यापि ते गर्व एष तिष्ठति भक्तितः । तच्छृण्वंतु वचो मेऽद्य सर्वेप्येते द्विजोत्तमाः

īdṛśasyāpi te garva eṣa tiṣṭhati bhaktitaḥ tacchṛṇvaṁtu vaco me'dya sarvepyete dvijottamāḥ

ऐसे होते हुए भी तुम्हारा यह घमंड भक्ति के बल पर टिका है। आज ये सभी श्रेष्ठ द्विज मेरा यह वचन सुनें -

श्लोक 22 (padma.6.108.22)

साक्षात्कारमहं विष्णोरेष वादो गमिष्यति । यथा तु सर्वेऽपि ततो भक्तिं ज्ञास्यथ चावयोः

sākṣātkāramahaṁ viṣṇoreṣa vādo gamiṣyati yathā tu sarve'pi tato bhaktiṁ jñāsyatha cāvayoḥ

- मैं विष्णु का साक्षात्कार प्राप्त करके दिखाऊँगा; यह वाद-विवाद उसी ओर जाएगा, ताकि सभी लोग तब हम दोनों की भक्ति को जान सकें।

श्लोक 23 (padma.6.108.23)

गणावूचतुः । इत्युक्त्वा स नृपो गच्छन्निजं राजगृहं द्विजः । आरेभे वैष्णवं सत्रं कृत्वाचार्यं तु मुद्गलम्

gaṇāvūcatuḥ ityuktvā sa nṛpo gacchannijaṁ rājagṛhaṁ dvijaḥ ārebhe vaiṣṇavaṁ satraṁ kṛtvācāryaṁ tu mudgalam

दोनों गणों ने कहा - ऐसा कहकर वह राजा अपने राजभवन को जाकर मुद्गल को आचार्य बनाकर वैष्णव-यज्ञ करने लगा।

श्लोक 24 (padma.6.108.24)

ऋषिसंघसमाजुष्टं बभूव बहुदक्षिणम् । यद्वद्ब्रह्मकृतं पूर्वं गयाक्षेत्रे समृद्धिमत्

ṛṣisaṁghasamājuṣṭaṁ babhūva bahudakṣiṇam yadvadbrahmakṛtaṁ pūrvaṁ gayākṣetre samṛddhimat

वह यज्ञ ऋषि-संघों से सुसेवित और प्रचुर दक्षिणा वाला बन गया, जैसे पूर्वकाल में गया-क्षेत्र में ब्रह्मा द्वारा किया गया समृद्धिशाली यज्ञ था।

श्लोक 25 (padma.6.108.25)

विष्णुदासोऽपि तत्रैव तस्थौ देवालये व्रती । पंचैतान्नियमान्कृत्वा विष्णुतुष्टिकरान्सदा

viṣṇudāso'pi tatraiva tasthau devālaye vratī paṁcaitānniyamānkṛtvā viṣṇutuṣṭikarānsadā

विष्णुदास भी वहीं देवालय में व्रती होकर रहा, विष्णु को सदा संतुष्ट करने वाले इन पाँच नियमों का पालन करते हुए।

श्लोक 26 (padma.6.108.26)

माघोर्जयोर्व्रतं सम्यक्तुलसीवनपालनम् । एकादशीव्रतं जाप्यं द्वादशाक्षरविद्यया

māghorjayorvrataṁ samyaktulasīvanapālanam ekādaśīvrataṁ jāpyaṁ dvādaśākṣaravidyayā

माघ और कार्तिक के व्रत का भलीभाँति पालन, तुलसी-वन की देखभाल, एकादशी-व्रत तथा द्वादशाक्षर मंत्र का जप -

श्लोक 27 (padma.6.108.27)

उपचारैः षोडशभिर्गीतनृत्यादिमंगलैः । नित्यं विष्णोस्तथा पूजां व्रतान्येतानि सोऽकरोत्

upacāraiḥ ṣoḍaśabhirgītanṛtyādimaṁgalaiḥ nityaṁ viṣṇostathā pūjāṁ vratānyetāni so'karot

- सोलह उपचारों तथा गीत-नृत्य आदि मंगल-कृत्यों सहित सदा विष्णु की पूजा - उसने इन व्रतों का पालन किया।

श्लोक 28 (padma.6.108.28)

नित्यं संस्मरणं विष्णोर्गच्छन्भुंजन्स्वपन्नपि । सर्वभूतस्थितं विष्णुमपश्यत्समदर्शनः

nityaṁ saṁsmaraṇaṁ viṣṇorgacchanbhuṁjansvapannapi sarvabhūtasthitaṁ viṣṇumapaśyatsamadarśanaḥ

चलते, भोजन करते और सोते हुए भी वह सदा विष्णु का स्मरण करता रहा; समदर्शी होकर उसने सभी प्राणियों में स्थित विष्णु को देखा।

श्लोक 29 (padma.6.108.29)

माघकार्तिकयोर्नित्यं विशेषनियमानपि । अकरोद्विष्णुतुष्ट्यर्थं सोद्यापनविधिं तथा

māghakārtikayornityaṁ viśeṣaniyamānapi akarodviṣṇutuṣṭyarthaṁ sodyāpanavidhiṁ tathā

माघ और कार्तिक में उसने सदा विशेष नियमों का पालन किया, तथा विष्णु को प्रसन्न करने के लिए उद्यापन-विधि भी की।

श्लोक 30 (padma.6.108.30)

एवं समाराधयतोः श्रियः पतिं तयोस्तु चोलेश्वरविष्णुदासयोः । अगादनेहा बहु तद्व्रतस्थयोस्तन्निष्ठकर्मेन्द्रियकर्मणोस्तयोः

evaṁ samārādhayatoḥ śriyaḥ patiṁ tayostu coleśvaraviṣṇudāsayoḥ agādanehā bahu tadvratasthayostanniṣṭhakarmendriyakarmaṇostayoḥ

इस प्रकार, अपने-अपने व्रत में स्थित, अपने कर्मेंद्रियों के कार्यों को उसी में निष्ठापूर्वक लगाए हुए, चोलेश्वर और विष्णुदास - इन दोनों के लक्ष्मीपति की आराधना करते हुए बहुत समय बीत गया।

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