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उत्तर खण्ड · अध्याय 113

धनेश्वर की कथा

अध्याय 112अध्याय-सूचीअध्याय 114

श्लोक 1 (padma.6.113.1)

श्रीकृष्ण उवाच। पुरावंतीपुरे वासी विप्र आसीद्धनेश्वरः । ब्रह्मकर्मपरिभ्रष्टः पापनिष्ठः सुदुर्मतिः

śrīkṛṣṇa uvāca purāvaṁtīpure vāsī vipra āsīddhaneśvaraḥ brahmakarmaparibhraṣṭaḥ pāpaniṣṭhaḥ sudurmatiḥ

श्रीकृष्ण ने कहा — प्राचीन काल में अवन्तीपुरी में धनेश्वर नामक एक ब्राह्मण रहता था। वह ब्राह्मण-कर्म से भ्रष्ट, पाप में लीन और अत्यंत दुर्बुद्धि था।

श्लोक 2 (padma.6.113.2)

रसकंबलचर्मादि विक्रयानृतवर्त्तनः । स्तेयवेश्यासुरापानद्यूतसंसक्तमानसः

rasakaṁbalacarmādi vikrayānṛtavarttanaḥ steyaveśyāsurāpānadyūtasaṁsaktamānasaḥ

वह रस, कम्बल, चर्म आदि वस्तुओं का असत्य व्यवहार से विक्रय करता था और उसका मन सदैव चोरी, वेश्यागमन, मदिरापान तथा जुए में लिप्त रहता था।

श्लोक 3 (padma.6.113.3)

देशाद्देशांतरं गच्छन्क्रयविक्रयकारणात् । माहिष्मतीं पुरीं यातः कदाचित्स धनेश्वरः

deśāddeśāṁtaraṁ gacchankrayavikrayakāraṇāt māhiṣmatīṁ purīṁ yātaḥ kadācitsa dhaneśvaraḥ

क्रय-विक्रय के निमित्त एक देश से दूसरे देश घूमते हुए वह धनेश्वर एक बार माहिष्मती नगरी में जा पहुँचा।

श्लोक 4 (padma.6.113.4)

महिषेण कृता पूर्वं तस्मान्माहिष्मतीभवत् । यस्यां वप्रतटाभाति नर्मदा पापनाशिनी

mahiṣeṇa kṛtā pūrvaṁ tasmānmāhiṣmatībhavat yasyāṁ vaprataṭābhāti narmadā pāpanāśinī

पूर्वकाल में महिष द्वारा बसाई जाने से यह नगरी माहिष्मती कहलाई, जिसके तटबंधों पर पापनाशिनी नर्मदा नदी सुशोभित होती है।

श्लोक 5 (padma.6.113.5)

कार्तिकव्रतिनस्तत्र नानाग्रामागतान्नरान् । स दृष्ट्वा विक्रयं कुर्वन्मासमेकमुवास ह

kārtikavratinastatra nānāgrāmāgatānnarān sa dṛṣṭvā vikrayaṁ kurvanmāsamekamuvāsa ha

वहाँ अनेक गाँवों से आए हुए कार्तिक-व्रत करने वाले लोगों को देखकर वह वहीं विक्रय करते हुए एक मास तक ठहर गया।

श्लोक 6 (padma.6.113.6)

स नित्यं नर्मदातीरे भ्रमन्विक्रयकारणात् । ददर्श ब्राह्मणान्स्नातान्जपदेवार्चनेरतान्

sa nityaṁ narmadātīre bhramanvikrayakāraṇāt dadarśa brāhmaṇānsnātānjapadevārcaneratān

वह प्रतिदिन विक्रय के निमित्त नर्मदा-तट पर घूमता हुआ स्नान किए हुए, जप और देव-अर्चन में तत्पर ब्राह्मणों को देखता था।

श्लोक 7 (padma.6.113.7)

कांश्चित्पुराणं पठतः कांश्चित्तच्छ्रवणे रतान् । नृत्यगायनवादित्रविष्णुस्तवनतत्परान्

kāṁścitpurāṇaṁ paṭhataḥ kāṁścittacchravaṇe ratān nṛtyagāyanavāditraviṣṇustavanatatparān

कुछ पुराण पढ़ रहे थे, कुछ उसे सुनने में लीन थे, तथा कुछ नृत्य, गायन, वाद्य और विष्णु-स्तवन में तत्पर थे।

श्लोक 8 (padma.6.113.8)

विष्णुमुद्रांकितान्कांश्चिन्मालातुलसिधारिणः । ददर्श कौतुकाविष्टस्तत्र तत्र धनेश्वरः

viṣṇumudrāṁkitānkāṁścinmālātulasidhāriṇaḥ dadarśa kautukāviṣṭastatra tatra dhaneśvaraḥ

कुछ के शरीर पर विष्णु के चिह्न अंकित थे, कुछ तुलसी की माला धारण किए हुए थे — धनेश्वर कौतूहलवश उन्हें इधर-उधर देखता रहा।

श्लोक 9 (padma.6.113.9)

नित्यं परिभ्रमंस्तत्र दर्शनस्पर्शभाषणात् । वैष्णवानां तथा विष्णोर्नामश्रावादि सोऽलभत्

nityaṁ paribhramaṁstatra darśanasparśabhāṣaṇāt vaiṣṇavānāṁ tathā viṣṇornāmaśrāvādi so'labhat

वहाँ नित्य घूमते हुए वैष्णवों के दर्शन, स्पर्श और वार्तालाप से तथा विष्णु के नाम-श्रवण आदि से उसने भी कुछ पुण्य प्राप्त कर लिया।

श्लोक 10 (padma.6.113.10)

एवं मासं स्थितःसोऽथ कार्तिकोद्यापने विधौ । क्रियमाणे ददर्शासौ भक्तैर्जागरणं हरेः

evaṁ māsaṁ sthitaḥso'tha kārtikodyāpane vidhau kriyamāṇe dadarśāsau bhaktairjāgaraṇaṁ hareḥ

इस प्रकार एक मास वहाँ रहते हुए उसने कार्तिक-व्रत के उद्यापन-विधि के समय भक्तों द्वारा किए जाते हुए हरि के जागरण को देखा।

श्लोक 11 (padma.6.113.11)

पौर्णमास्यां ततोऽपश्यद्विविधं पूजनादिकम् । दक्षिणा भोजनाद्यं च दीपदानं व्रतस्थितैः

paurṇamāsyāṁ tato'paśyadvividhaṁ pūjanādikam dakṣiṇā bhojanādyaṁ ca dīpadānaṁ vratasthitaiḥ

तत्पश्चात् पूर्णिमा के दिन उसने व्रतियों द्वारा किए जाते हुए विविध पूजन, दक्षिणा, भोजन-दान तथा दीपदान को देखा।

श्लोक 12 (padma.6.113.12)

ततोऽर्कास्तमये चैवं दीपोत्सवविधिं तदा । क्रियमाणं ददर्शासौ प्रीत्यर्थं त्रिपुरद्विषः

tato'rkāstamaye caivaṁ dīpotsavavidhiṁ tadā kriyamāṇaṁ dadarśāsau prītyarthaṁ tripuradviṣaḥ

फिर सूर्यास्त के समय उसने त्रिपुरारि (शिव) की प्रसन्नता के लिए किए जाते हुए दीपोत्सव की विधि को देखा।

श्लोक 13 (padma.6.113.13)

त्रिपुराणां कृतो दाहो यतस्तस्यां शिवेन तु । अतस्तु क्रियते तस्यां तिथौ भक्तैर्महोत्सवः । मम रुद्रस्य यः कश्चिदंतरं परिकल्पयेत्

tripurāṇāṁ kṛto dāho yatastasyāṁ śivena tu atastu kriyate tasyāṁ tithau bhaktairmahotsavaḥ mama rudrasya yaḥ kaścidaṁtaraṁ parikalpayet

चूँकि उसी तिथि को शिव ने त्रिपुरों का दहन किया था, इसलिए उस तिथि पर भक्तगण महोत्सव मनाते हैं। जो कोई मुझमें और रुद्र में कुछ भी भेद कल्पित करता है —

श्लोक 14 (padma.6.113.14)

तस्य पुण्यक्रियाः सर्वा निष्फलाः स्युर्न संशयः । तत्र नृत्यादिकं पश्यन्बभ्राम स धनेश्वरः । तावत्कृष्णाहिना दष्टो विकलः स पपात ह । जनास्तंपति तं वीक्ष्य परिवव्रुः कृपान्विताः

tasya puṇyakriyāḥ sarvā niṣphalāḥ syurna saṁśayaḥ tatra nṛtyādikaṁ paśyanbabhrāma sa dhaneśvaraḥ tāvatkṛṣṇāhinā daṣṭo vikalaḥ sa papāta ha janāstaṁpati taṁ vīkṣya parivavruḥ kṛpānvitāḥ

— उसके सभी पुण्य-कर्म निष्फल हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं। वहाँ नृत्यादि देखते हुए घूमता हुआ वह धनेश्वर तभी काले सर्प द्वारा डस लिया गया और विकल होकर गिर पड़ा। लोगों ने उसे गिरा हुआ देखकर करुणावश उसे घेर लिया।

श्लोक 15 (padma.6.113.15)

तुलसीमिश्रितैस्तोयैस्तन्मुखं सिषिचुस्तदा । अथ देहे परित्यक्ते तं बद्ध्वा यमकिंकराः

tulasīmiśritaistoyaistanmukhaṁ siṣicustadā atha dehe parityakte taṁ baddhvā yamakiṁkarāḥ

तब उन्होंने तुलसी-मिश्रित जल से उसका मुख सींचा। तत्पश्चात् जब उसका शरीर त्याग दिया गया तो यमदूतों ने उसे बाँधकर,

श्लोक 16 (padma.6.113.16)

बाध्यमानं कशाघातैर्निन्युः संयमिनीं रुषा । चित्रगुप्तस्तु तं दृष्ट्वा निर्भर्त्स्यावेदयत्तदा

bādhyamānaṁ kaśāghātairninyuḥ saṁyaminīṁ ruṣā citraguptastu taṁ dṛṣṭvā nirbhartsyāvedayattadā

और कोड़ों से पीटते हुए क्रोधपूर्वक संयमिनी (यमपुरी) की ओर ले गए। तब चित्रगुप्त ने उसे देखकर धिक्कारते हुए निवेदन किया —

श्लोक 17 (padma.6.113.17)

यमायतेन बाल्यात्तु कर्म यद्दुष्कृतं कृतम् । चित्रगुप्त उवाच। नैवास्य दृश्यते किंचिदाबाल्यात्सुकृतं क्वचित्

yamāyatena bālyāttu karma yadduṣkṛtaṁ kṛtam citragupta uvāca naivāsya dṛśyate kiṁcidābālyātsukṛtaṁ kvacit

— यम को उसके बचपन से किए हुए दुष्कर्मों का विवरण दिया। चित्रगुप्त ने कहा — इसका बचपन से लेकर कहीं भी कोई पुण्य-कर्म दिखाई नहीं देता;

श्लोक 18 (padma.6.113.18)

दुष्कृतं शक्यते वक्तुं शतवर्षैर्न भास्करे । पापमूर्तिरयं दुष्टः केवलं दृश्यते विभो

duṣkṛtaṁ śakyate vaktuṁ śatavarṣairna bhāskare pāpamūrtirayaṁ duṣṭaḥ kevalaṁ dṛśyate vibho

इसके दुष्कर्मों का वर्णन तो सूर्य भी सौ वर्षों में नहीं कर सकते; हे विभो! यह दुष्ट केवल पाप की साक्षात् मूर्ति ही दिखाई देता है।

श्लोक 19 (padma.6.113.19)

तस्मादाकल्पमर्यादं निरये परिपाच्यताम् । श्रीकृष्ण उवाच। निशम्येत्थं वचः क्रोधाद्यमः प्राह स्वकिंकरान्

tasmādākalpamaryādaṁ niraye paripācyatām śrīkṛṣṇa uvāca niśamyetthaṁ vacaḥ krodhādyamaḥ prāha svakiṁkarān

अतः इसे कल्प-पर्यन्त नरक में पकाया जाए। श्रीकृष्ण ने कहा — यह वचन सुनकर यमराज ने क्रोधपूर्वक अपने दूतों से कहा —

श्लोक 20 (padma.6.113.20)

दर्शयन्नात्मनोरूपं कालाग्निसदृशप्रभम् । यम उवाच। भो प्रेतापनयस्वैनं बध्यमानं स्वमुद्गरैः

darśayannātmanorūpaṁ kālāgnisadṛśaprabham yama uvāca bho pretāpanayasvainaṁ badhyamānaṁ svamudgaraiḥ

— अपना वह रूप प्रकट करते हुए, जो प्रलयाग्नि के समान तेजस्वी था। यम ने कहा — हे प्रेतप! अपने मुद्गरों से पीटते हुए इसे बाँधकर ले जाओ,

श्लोक 21 (padma.6.113.21)

कुंभीपाके क्षिपस्वाशु तैलक्वथनशब्दिते । यावत्क्षिप्तस्तु तत्रासौ तावच्छीतलतां ययौ

kuṁbhīpāke kṣipasvāśu tailakvathanaśabdite yāvatkṣiptastu tatrāsau tāvacchītalatāṁ yayau

और उबलते हुए तेल से गरजते हुए कुम्भीपाक नरक में शीघ्र ही फेंक दो। किन्तु ज्यों ही उसे वहाँ फेंका गया, त्यों ही वह शीतल हो गया।

श्लोक 22 (padma.6.113.22)

कुंभीपाको यथा वह्निः प्रह्लादक्षेपणात्पुरा । तद्दृष्ट्वा महदादश्चर्यं प्रेतपो विस्मयान्वितः

kuṁbhīpāko yathā vahniḥ prahlādakṣepaṇātpurā taddṛṣṭvā mahadādaścaryaṁ pretapo vismayānvitaḥ

जैसे पूर्वकाल में प्रह्लाद के डाले जाने पर वह अग्नि शीतल हो गई थी, वैसे ही। इस महान आश्चर्य को देखकर प्रेतप विस्मित हो गया।

श्लोक 23 (padma.6.113.23)

वेगादागत्य तत्सर्वं यमायाकथयत्तदा । यमस्तु कौतुकं श्रुत्वा प्रेतपेन निवेदितम्

vegādāgatya tatsarvaṁ yamāyākathayattadā yamastu kautukaṁ śrutvā pretapena niveditam

तत्काल वहाँ से आकर उसने वह सब यम से कह सुनाया। यम भी प्रेतप द्वारा निवेदित इस कौतुक को सुनकर,

श्लोक 24 (padma.6.113.24)

आः किमेतदिति प्रोच्य सम्यगेतद्विचारयत् । तावदभ्यागतस्तत्र नारदः प्रहसंस्त्वरन्

āḥ kimetaditi procya samyagetadvicārayat tāvadabhyāgatastatra nāradaḥ prahasaṁstvaran

"अरे, यह क्या है?" ऐसा कहकर वह इस पर भली-भाँति विचार करने लगा। इतने में ही हँसते हुए शीघ्रता से नारद वहाँ आ पहुँचे।

श्लोक 25 (padma.6.113.25)

यमेन पूजितः सम्यक्तं दृष्ट्वा वाक्यमब्रवीत् । नारद उवाच। नैवायं निरयान्भोक्तुं क्षमः सवितृनंदन

yamena pūjitaḥ samyaktaṁ dṛṣṭvā vākyamabravīt nārada uvāca naivāyaṁ nirayānbhoktuṁ kṣamaḥ savitṛnaṁdana

यम द्वारा सम्यक् पूजित होकर, यम को देखकर नारद ने यह वचन कहा। नारद ने कहा — हे सूर्यनन्दन! यह नरकों को भोगने योग्य नहीं है,

श्लोक 26 (padma.6.113.26)

यस्मादेतस्य संजातं कर्म यन्निरयापहम् । यः पुण्यकर्मणां कुर्याद्दर्शनस्पर्शभाषणम्

yasmādetasya saṁjātaṁ karma yannirayāpaham yaḥ puṇyakarmaṇāṁ kuryāddarśanasparśabhāṣaṇam

क्योंकि इसमें ऐसा कर्म उत्पन्न हो गया है जो नरक को दूर करने वाला है। जो कोई पुण्यकर्मियों का दर्शन, स्पर्श और वार्तालाप करता है,

श्लोक 27 (padma.6.113.27)

तत्षडंशमवाप्नोति पुण्यस्य नियतं नरः । असंख्यातैस्तुसंसर्गैः कृतवानेष यद्धरेः

tatṣaḍaṁśamavāpnoti puṇyasya niyataṁ naraḥ asaṁkhyātaistusaṁsargaiḥ kṛtavāneṣa yaddhareḥ

वह मनुष्य निश्चय ही उनके पुण्य का छठा अंश प्राप्त कर लेता है। इसने तो हरि के भक्तों के साथ असंख्य बार ऐसा संसर्ग किया है,

श्लोक 28 (padma.6.113.28)

कार्तिकव्रतिभिर्मासं तस्मात्पुण्यांशभागयम् । परिचर्याकरस्तेषां संपूर्णव्रतपुण्यभाक्

kārtikavratibhirmāsaṁ tasmātpuṇyāṁśabhāgayam paricaryākarasteṣāṁ saṁpūrṇavratapuṇyabhāk

एक मास तक कार्तिक-व्रतियों के साथ रहकर — इसलिए यह उनके पुण्य के अंश का भागी है। उनकी सेवा करने से यह उनके सम्पूर्ण व्रत के पुण्य का भागी है।

श्लोक 29 (padma.6.113.29)

अतोऽस्योर्जव्रतोद्भूतपुण्यसंख्या न विद्यते । कार्त्तिकव्रतिनां पुंसां पातकानि महांत्यपि

ato'syorjavratodbhūtapuṇyasaṁkhyā na vidyate kārttikavratināṁ puṁsāṁ pātakāni mahāṁtyapi

अतः इसमें ऊर्ज-व्रत अर्थात् कार्तिक-व्रत से उत्पन्न पुण्य की गणना ही नहीं की जा सकती। कार्तिक-व्रतियों के महान पातक भी —

श्लोक 30 (padma.6.113.30)

नाशयत्येव सर्वाणि विष्णुः सद्भक्तवत्सलः । अंते तन्नामभिस्तोयैस्तुलसीमिश्रितैस्त्वयम्

nāśayatyeva sarvāṇi viṣṇuḥ sadbhaktavatsalaḥ aṁte tannāmabhistoyaistulasīmiśritaistvayam

— विष्णु, जो सच्चे भक्तों पर वत्सल हैं, उन सबका नाश कर देते हैं। इसके अंत समय में भी विष्णु के नामों सहित तुलसी-मिश्रित जल से,

श्लोक 31 (padma.6.113.31)

वैष्णवानुग्रही यस्मान्नरके नैव पच्यते । तस्मान्निहतपापोऽयं सद्गतिं यातुमर्हति

vaiṣṇavānugrahī yasmānnarake naiva pacyate tasmānnihatapāpo'yaṁ sadgatiṁ yātumarhati

— चूँकि इसे वैष्णवों का अनुग्रह प्राप्त हुआ है, इसलिए यह नरक में कदापि नहीं पकाया जाएगा। अतः इसके पाप नष्ट हो चुके हैं, यह सद्गति पाने योग्य है।

श्लोक 32 (padma.6.113.32)

आर्द्रैः शुष्कैर्यथापापैर्निरये भोगसंनिधिः । प्राप्यते सुकृतैस्तद्वत्स्वर्गभोगस्य संनिधिः

ārdraiḥ śuṣkairyathāpāpairniraye bhogasaṁnidhiḥ prāpyate sukṛtaistadvatsvargabhogasya saṁnidhiḥ

जिस प्रकार गीले अथवा सूखे (नए अथवा पुराने) पापों से नरक-भोग की प्राप्ति होती है, उसी प्रकार पुण्यों से स्वर्ग-भोग की प्राप्ति होती है।

श्लोक 33 (padma.6.113.33)

तस्मादकामपुण्यो हि यक्षयोनिस्थितस्त्वसौ । विलोक्य नरकान्सर्वान्पापभोगमवाप्नुयात्

tasmādakāmapuṇyo hi yakṣayonisthitastvasau vilokya narakānsarvānpāpabhogamavāpnuyāt

अतः यह अनिच्छापूर्वक भी पुण्यवान् है; अतः यक्ष-योनि में स्थित रहकर समस्त नरकों को देखकर ही यह अपने पाप-भोग को प्राप्त करे।

श्लोक 34 (padma.6.113.34)

श्रीकृष्ण उवाच। इत्युक्त्वा गतवति नारदेऽथ सौरिस्तद्वाक्यश्रवणविबुद्ध तत्सुकर्मा । विप्रं तं पुनरनयत्स्वकिंकरेण तान्सर्वान्निरयगणान्प्रदर्शयिष्यन्

śrīkṛṣṇa uvāca ityuktvā gatavati nārade'tha sauristadvākyaśravaṇavibuddha tatsukarmā vipraṁ taṁ punaranayatsvakiṁkareṇa tānsarvānnirayagaṇānpradarśayiṣyan

श्रीकृष्ण ने कहा — ऐसा कहकर जब नारद चले गए, तब उनके वचनों को सुनकर सूर्यपुत्र यम की सद्बुद्धि जाग उठी और उन्होंने अपने दूत द्वारा उस ब्राह्मण को पुनः बुलाकर, उसे समस्त नरक-समूह दिखलाने की इच्छा से पास ले आए।

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