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उत्तर खण्ड · अध्याय 115

अश्वत्थ-वट की महिमा

अध्याय 114अध्याय-सूचीअध्याय 116

श्लोक 1 (padma.6.115.1)

सूत उवाच। इत्युक्त्वा वासुदेवोऽसौ सत्यभामामतिप्रियाम् । सायंसंध्यादिकं कर्तुं जगाम जननीगृहम्

sūta uvāca ityuktvā vāsudevo'sau satyabhāmāmatipriyām sāyaṁsaṁdhyādikaṁ kartuṁ jagāma jananīgṛham

सूत ने कहा — यह कहकर वासुदेव अपनी अत्यंत प्रिय सत्यभामा के पास से सायं-संध्या आदि करने के लिए अपनी माता के घर चले गए।

श्लोक 2 (padma.6.115.2)

एवं प्रभावः प्रोक्तोयं कार्तिकः पापनाशनः । विष्णुप्रियकरो नित्यं भुक्तिमुक्तिप्रदः सदा

evaṁ prabhāvaḥ proktoyaṁ kārtikaḥ pāpanāśanaḥ viṣṇupriyakaro nityaṁ bhuktimuktipradaḥ sadā

इस प्रकार इस पापनाशक कार्तिक-मास का प्रभाव बताया गया, जो विष्णु को सदा प्रिय है तथा सदा भोग और मुक्ति दोनों देने वाला है।

श्लोक 3 (padma.6.115.3)

हरिजागरणं प्रातः स्नानं तुलसिसेवनम् । उद्यापनं दीपदानं व्रतान्येतानि कार्तिके

harijāgaraṇaṁ prātaḥ snānaṁ tulasisevanam udyāpanaṁ dīpadānaṁ vratānyetāni kārtike

हरि का जागरण, प्रातःस्नान, तुलसी-सेवा, उद्यापन तथा दीपदान — ये कार्तिक-मास के व्रत हैं।

श्लोक 4 (padma.6.115.4)

पंचकैर्व्रतकैरेभिः संपूर्णं कार्तिकव्रतम् । फलं प्राप्नोति तत्प्रोक्तं भुक्तिमुक्तिफलप्रदम्

paṁcakairvratakairebhiḥ saṁpūrṇaṁ kārtikavratam phalaṁ prāpnoti tatproktaṁ bhuktimuktiphalapradam

इन पाँच व्रतों से कार्तिक-व्रत सम्पूर्ण होता है और उससे वह फल प्राप्त होता है जो भोग तथा मोक्ष दोनों देने वाला बताया गया है।

श्लोक 5 (padma.6.115.5)

ऋषय ऊचुः। विष्णोः प्रियोऽतिफलदः प्रोक्तोऽयं रोमहर्षणे । कार्तिकस्य विधिः सम्यक्पावनः पापनाशनः

ṛṣaya ūcuḥ viṣṇoḥ priyo'tiphaladaḥ prokto'yaṁ romaharṣaṇe kārtikasya vidhiḥ samyakpāvanaḥ pāpanāśanaḥ

ऋषियों ने कहा — हे रोमहर्षण! आपने विष्णु को प्रिय, महाफलदायक, पूर्णतः पावन और पापनाशक इस कार्तिक-विधि को भली-भाँति बताया है।

श्लोक 6 (padma.6.115.6)

अवश्यमेव कर्त्तव्यः प्राप्य दुःखनिवारणः । मोक्षार्थिभिर्नरः सम्यग्भोगकामैरथापिवा

avaśyameva karttavyaḥ prāpya duḥkhanivāraṇaḥ mokṣārthibhirnaraḥ samyagbhogakāmairathāpivā

इसे प्राप्त करके मोक्षार्थियों को तथा भोग की कामना रखने वालों को भी अवश्य ही करना चाहिए, क्योंकि यह दुःखों का निवारण करता है।

श्लोक 7 (padma.6.115.7)

एवं स्थिते यथाकश्चिद्व्रतस्थः संकटे स्थितः । दुर्गारण्यस्थितो वापि व्याधिभिः परिपीडितः । कथं तेन प्रकर्तव्यं कार्तिकव्रतकं शुभम्

evaṁ sthite yathākaścidvratasthaḥ saṁkaṭe sthitaḥ durgāraṇyasthito vāpi vyādhibhiḥ paripīḍitaḥ kathaṁ tena prakartavyaṁ kārtikavratakaṁ śubham

ऐसी स्थिति में यदि कोई व्रती संकट में पड़ जाए, अथवा दुर्गम वन में स्थित हो, या रोगों से पीड़ित हो, तो वह इस शुभ कार्तिक-व्रत को कैसे करे?

श्लोक 8 (padma.6.115.8)

सूत उवाच। यस्मादत्यंतफलदं कर्तव्यं तु यथा नरैः । तत्सर्वं कथयिष्येऽहं शृणुध्वं मुनिपुंगवाः

sūta uvāca yasmādatyaṁtaphaladaṁ kartavyaṁ tu yathā naraiḥ tatsarvaṁ kathayiṣye'haṁ śṛṇudhvaṁ munipuṁgavāḥ

सूत ने कहा — चूँकि यह अत्यंत फलदायी है, अतः मनुष्यों को इसे जिस प्रकार करना चाहिए, वह सब मैं बताऊँगा; हे श्रेष्ठ मुनियो! सुनिए।

श्लोक 9 (padma.6.115.9)

विष्णोः शिवस्य वा कुर्यादालये हरिजागरम् । शिवविष्णुग्रहाभावे सर्वदेवालयेष्वपि

viṣṇoḥ śivasya vā kuryādālaye harijāgaram śivaviṣṇugrahābhāve sarvadevālayeṣvapi

विष्णु अथवा शिव के मंदिर में हरि-जागरण करे; शिव-विष्णु के मंदिर के अभाव में किसी भी अन्य देवालय में भी कर सकता है।

श्लोक 10 (padma.6.115.10)

दुर्गारण्यस्थितो यश्च यदि वा यद्गतो भवेत् । कुर्यात्तदाश्वत्थमूले तुलसीनां वनेष्वपि

durgāraṇyasthito yaśca yadi vā yadgato bhavet kuryāttadāśvatthamūle tulasīnāṁ vaneṣvapi

जो कोई दुर्गम वन में स्थित हो या जहाँ कहीं भी चला गया हो, वह वहीं अश्वत्थ (पीपल) के मूल में या तुलसी के वन में यह व्रत करे।

श्लोक 11 (padma.6.115.11)

विष्णुनामप्रधानानां गायनाद्विष्णुसन्निधौ । गोसहस्रप्रदानस्य फलं प्राप्नोति मानवः

viṣṇunāmapradhānānāṁ gāyanādviṣṇusannidhau gosahasrapradānasya phalaṁ prāpnoti mānavaḥ

विष्णु की उपस्थिति में विष्णु-नाम प्रधान गीत गाने से मनुष्य सहस्र गौ-दान का फल प्राप्त करता है।

श्लोक 12 (padma.6.115.12)

वाद्यकृत्पुरुषश्चापि वाजपेयफलं लभेत् । सर्वतीर्थावगाहोत्थं नर्तकः फलमाप्नुयात्

vādyakṛtpuruṣaścāpi vājapeyaphalaṁ labhet sarvatīrthāvagāhotthaṁ nartakaḥ phalamāpnuyāt

वाद्य बजाने वाला मनुष्य वाजपेय-यज्ञ का फल पाता है; नर्तक समस्त तीर्थों में स्नान करने से उत्पन्न फल पाता है।

श्लोक 13 (padma.6.115.13)

सर्वमेतल्लभेत्पुण्यं तेषां तु द्रव्यदः पुमान् । प्रशंसादर्शनाभ्यां हि तत्षडंशमवाप्नुयात्

sarvametallabhetpuṇyaṁ teṣāṁ tu dravyadaḥ pumān praśaṁsādarśanābhyāṁ hi tatṣaḍaṁśamavāpnuyāt

इन सबका पुण्य वह मनुष्य पाता है जो उन्हें द्रव्य देता है; तथा जो केवल प्रशंसा करता है अथवा देखता है, वह उसका छठा भाग पाता है।

श्लोक 14 (padma.6.115.14)

आपद्गतो यदाप्यंभो न लभेत्स्नपनाय सः । व्याधितो वा पुनः कुर्याद्विष्णोर्नामापमार्जनम्

āpadgato yadāpyaṁbho na labhetsnapanāya saḥ vyādhito vā punaḥ kuryādviṣṇornāmāpamārjanam

यदि विपत्ति में पड़ा हुआ मनुष्य स्नान के लिए जल न पा सके, अथवा रोगी हो, तो वह विष्णु के नाम-स्मरण से ही अपने को शुद्ध करे।

श्लोक 15 (padma.6.115.15)

उद्यापनविधिं कर्तुं न शक्तो यो व्रते स्थितः । ब्राह्मणान्भोजयेच्छक्त्या व्रतसंपूर्णहेतवे

udyāpanavidhiṁ kartuṁ na śakto yo vrate sthitaḥ brāhmaṇānbhojayecchaktyā vratasaṁpūrṇahetave

जो व्रती उद्यापन-विधि करने में असमर्थ हो, वह व्रत को पूर्ण करने के लिए अपनी शक्ति के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन कराए।

श्लोक 16 (padma.6.115.16)

यस्मादत्यंतफलदो न त्याज्यः सर्वदा नरैः । अव्यक्तरूपिणो विष्णोः स्वरूपं ब्राह्मणा भुवि

yasmādatyaṁtaphalado na tyājyaḥ sarvadā naraiḥ avyaktarūpiṇo viṣṇoḥ svarūpaṁ brāhmaṇā bhuvi

चूँकि यह व्रत अत्यंत फलदायी है, अतः मनुष्यों को इसे कभी नहीं त्यागना चाहिए। पृथ्वी पर ब्राह्मण ही अव्यक्त-रूप विष्णु का साक्षात् स्वरूप हैं।

श्लोक 17 (padma.6.115.17)

तत्संतुष्ट्या सुसंतुष्टः सर्वदा स्यां न संशयः । अशक्तो दीपदाने तु परदीपं प्रबोधयेत्

tatsaṁtuṣṭyā susaṁtuṣṭaḥ sarvadā syāṁ na saṁśayaḥ aśakto dīpadāne tu paradīpaṁ prabodhayet

उनकी संतुष्टि से मैं सदा सुसंतुष्ट रहता हूँ, इसमें संशय नहीं — ऐसा विष्णु कहते हैं। जो दीपदान में असमर्थ हो, वह दूसरे के बुझते हुए दीपक को फिर से जला दे।

श्लोक 18 (padma.6.115.18)

तेषां वा रक्षणं कुर्याद्वातादिभ्यः प्रयत्नतः । अभावे तुलसीनां तु पूजयेद्वैष्णवं द्विजम्

teṣāṁ vā rakṣaṇaṁ kuryādvātādibhyaḥ prayatnataḥ abhāve tulasīnāṁ tu pūjayedvaiṣṇavaṁ dvijam

अथवा प्रयत्नपूर्वक उन दीपकों को वायु आदि से बचाए। तुलसी के अभाव में वैष्णव ब्राह्मण की पूजा करे।

श्लोक 19 (padma.6.115.19)

यस्मात्संनिहितो विष्णुः स्वभक्तेष्वेव सर्वदा । सर्वाभावे व्रती कुर्याद्ब्राह्मणानां गवामपि

yasmātsaṁnihito viṣṇuḥ svabhakteṣveva sarvadā sarvābhāve vratī kuryādbrāhmaṇānāṁ gavāmapi

क्योंकि विष्णु सदा अपने भक्तों में ही निवास करते हैं। इन सबके भी अभाव में व्रती ब्राह्मणों तथा गौओं की —

श्लोक 20 (padma.6.115.20)

सेवां वाश्वत्थवटयोर्व्रतसंपूर्णहेतवे

sevāṁ vāśvatthavaṭayorvratasaṁpūrṇahetave

— अथवा अश्वत्थ और वट वृक्षों की सेवा करे, ताकि व्रत पूर्ण हो सके।

श्लोक 21 (padma.6.115.21)

ऋषय ऊचुः । कथं त्वयाश्वत्थवटौ गोब्राह्मणसमौ कृतौ । सर्वेभ्योऽपि तरुभ्यस्तौ कस्मात्पूज्यतरौ कृतौ

ṛṣaya ūcuḥ kathaṁ tvayāśvatthavaṭau gobrāhmaṇasamau kṛtau sarvebhyo'pi tarubhyastau kasmātpūjyatarau kṛtau

ऋषियों ने कहा — आपने अश्वत्थ और वट को गौ तथा ब्राह्मण के समान क्यों बताया है? समस्त वृक्षों में से इन्हीं दोनों को अधिक पूज्य क्यों बनाया गया है?

श्लोक 22 (padma.6.115.22)

सूत उवाच। अश्वत्थरूपी भगवान्विष्णुरेव न संशयः । रुद्ररूपी वटस्तद्वत्पालाशो ब्रह्मरूपधृक्

sūta uvāca aśvattharūpī bhagavānviṣṇureva na saṁśayaḥ rudrarūpī vaṭastadvatpālāśo brahmarūpadhṛk

सूत ने कहा — अश्वत्थ-रूप में साक्षात् भगवान् विष्णु ही हैं, इसमें संशय नहीं। उसी प्रकार वट रुद्र-रूप है और पलाश ब्रह्म-रूप को धारण करता है।

श्लोक 23 (padma.6.115.23)

दर्शनं पूजनं सेवा तेषां पापहरा स्मृता । दुःखापद्व्याधिदुष्टानां विनाशकरणी ध्रुवम्

darśanaṁ pūjanaṁ sevā teṣāṁ pāpaharā smṛtā duḥkhāpadvyādhiduṣṭānāṁ vināśakaraṇī dhruvam

इनका दर्शन, पूजन और सेवा पाप का नाश करने वाला माना गया है, तथा यह निश्चय ही दुःख, विपत्ति और रोग-दोष का नाशक है।

श्लोक 24 (padma.6.115.24)

ऋषय ऊचुः। कथं वृक्षत्वमापन्ना ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः । एतत्कथय सर्वज्ञ संशयोऽत्र महान्हि नः

ṛṣaya ūcuḥ kathaṁ vṛkṣatvamāpannā brahmaviṣṇumaheśvarāḥ etatkathaya sarvajña saṁśayo'tra mahānhi naḥ

ऋषियों ने कहा — ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर वृक्ष-रूप को कैसे प्राप्त हुए? हे सर्वज्ञ! यह बताइए, इस विषय में हमें बड़ा संशय है।

श्लोक 25 (padma.6.115.25)

सूत उवाच। पार्वतीशिवयोर्देवैः सुरतं कुर्वतोः किल । अग्निर्ब्राह्मणरूपेण प्रेषितो विघ्नकृत्पुरा

sūta uvāca pārvatīśivayordevaiḥ surataṁ kurvatoḥ kila agnirbrāhmaṇarūpeṇa preṣito vighnakṛtpurā

सूत ने कहा — एक बार जब पार्वती और शिव रति-क्रीड़ा कर रहे थे, तब देवताओं ने विघ्न उत्पन्न करने के लिए अग्नि को ब्राह्मण-रूप में भेजा।

श्लोक 26 (padma.6.115.26)

ततः सा पार्वती क्रुद्धा शशाप त्रिदिवौकसः । रतोत्सवसुखभ्रंशात्कंपमाना रुषा तदा

tataḥ sā pārvatī kruddhā śaśāpa tridivaukasaḥ ratotsavasukhabhraṁśātkaṁpamānā ruṣā tadā

तब उस रति-सुख के भंग होने से क्रोधित और क्रोधवश काँपती हुई पार्वती ने स्वर्गवासी देवताओं को शाप दे दिया।

श्लोक 27 (padma.6.115.27)

पार्वत्युवाच। कृमिकीटादयोप्येते जानंति सुरतं सुखम् । तद्विघ्नकरणाद्देवा ह्युद्भिज्जत्वमवाप्स्यथ

pārvatyuvāca kṛmikīṭādayopyete jānaṁti surataṁ sukham tadvighnakaraṇāddevā hyudbhijjatvamavāpsyatha

पार्वती ने कहा — कीड़े-मकोड़े तक रति-सुख को जानते हैं। तुमने उसमें विघ्न डाला है, अतः हे देवगण! तुम वृक्ष होकर पृथ्वी से उगोगे।

श्लोक 28 (padma.6.115.28)

सूत उवाच। एवं सा पार्वती देवानशपत्क्रुद्धमानसा । तस्माद्वृक्षत्वमापन्नाः सर्वे देवगणाः किल

sūta uvāca evaṁ sā pārvatī devānaśapatkruddhamānasā tasmādvṛkṣatvamāpannāḥ sarve devagaṇāḥ kila

सूत ने कहा — इस प्रकार क्रोधित मन वाली पार्वती ने देवताओं को शाप दिया; उसी से समस्त देवगण वृक्ष-रूप को प्राप्त हो गए।

श्लोक 29 (padma.6.115.29)

तस्मादिमौ विष्णुमहेश्वरावुभौ बभूवतुर्बोधिवटौ मुनीश्वराः । बोधिस्त्वगादार्किदिने स्पृशत्वमस्पृश्यतामर्कजविष्टियोगात्

tasmādimau viṣṇumaheśvarāvubhau babhūvaturbodhivaṭau munīśvarāḥ bodhistvagādārkidine spṛśatvamaspṛśyatāmarkajaviṣṭiyogāt

हे मुनीश्वरो! इसीलिए विष्णु और महेश्वर दोनों पीपल और वट-वृक्ष बने। पीपल रविवार को स्पर्श योग्य हो जाता है, जबकि शनि (अर्कज) तथा विष्टि के योग से वह अस्पृश्य बन जाता है।

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