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उत्तर खण्ड · अध्याय 118

कार्तिक-मास के दान एवं व्रतों का फल

अध्याय 117अध्याय-सूचीअध्याय 119

श्लोक 1 (padma.6.118.1)

सूत उवाच। पुनः प्रोवाच भगवान्महादेवो वृषध्वजः । श्रोतारमुपसंगम्य भक्तियुक्तं षडाननम्

sūta uvāca punaḥ provāca bhagavānmahādevo vṛṣadhvajaḥ śrotāramupasaṁgamya bhaktiyuktaṁ ṣaḍānanam

सूत ने कहा — वृषभ-ध्वज भगवान महादेव ने भक्तियुक्त श्रोता षडानन के पास जाकर पुनः कहा।

श्लोक 2 (padma.6.118.2)

ईश्वर उवाच। कार्तिको वैष्णवो मासः सर्वमासेषु चोत्तमः । अस्मिन्मासे त्रयस्त्रिंशद्देवाः संनिहिताः कलौ

īśvara uvāca kārtiko vaiṣṇavo māsaḥ sarvamāseṣu cottamaḥ asminmāse trayastriṁśaddevāḥ saṁnihitāḥ kalau

ईश्वर ने कहा — कार्तिक विष्णु का मास है, समस्त महीनों में सर्वश्रेष्ठ है। इस मास में कलियुग में भी तैंतीस देवता उपस्थित रहते हैं।

श्लोक 3 (padma.6.118.3)

ऊर्जे मासि महाभागौ भोजनानि द्विजातये । तिलधेनुं हिरण्यं च रजतं भूमिवाससी

ūrje māsi mahābhāgau bhojanāni dvijātaye tiladhenuṁ hiraṇyaṁ ca rajataṁ bhūmivāsasī

हे महाभाग! ऊर्ज (कार्तिक) मास में द्विजों को भोजन, तिल-धेनु, स्वर्ण, चाँदी, भूमि तथा वस्त्र —

श्लोक 4 (padma.6.118.4)

गोप्रदानानि दास्यंति सर्वभावेन सुव्रत । सर्वेषामेव दानानां कन्यादानं विशिष्यते

gopradānāni dāsyaṁti sarvabhāvena suvrata sarveṣāmeva dānānāṁ kanyādānaṁ viśiṣyate

— हे सुव्रत! सर्वभाव से गौ-दान देना चाहिए। समस्त दानों में कन्यादान सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

श्लोक 5 (padma.6.118.5)

ब्राह्मणायात्र ये कन्यां दास्यंति विधिवन्नराः । वैकुंठे वसतिस्तेषां यावदिंद्राश्चतुर्दश

brāhmaṇāyātra ye kanyāṁ dāsyaṁti vidhivannarāḥ vaikuṁṭhe vasatisteṣāṁ yāvadiṁdrāścaturdaśa

जो मनुष्य इस मास में विधिपूर्वक ब्राह्मण को कन्या का दान करते हैं, वे चौदह इंद्रों के काल तक वैकुंठ में निवास करते हैं।

श्लोक 6 (padma.6.118.6)

रोमकाले तु संप्राप्ते सोमो भुंक्ते तु कन्यकाम् । ऋतुकाले तु गंधर्वा वह्निस्तु कुचदर्शने

romakāle tu saṁprāpte somo bhuṁkte tu kanyakām ṛtukāle tu gaṁdharvā vahnistu kucadarśane

रोम-काल आने पर सोम कन्या का भोग करता है; ऋतु-काल में गंधर्व, तथा कुच-दर्शन में अग्नि —

श्लोक 7 (padma.6.118.7)

तावद्विवाहयेत्कन्यां यावन्नर्तुमती भवेत् । विवाहस्त्वष्टवर्षायाः कन्यायाः शस्यते बुधैः

tāvadvivāhayetkanyāṁ yāvannartumatī bhavet vivāhastvaṣṭavarṣāyāḥ kanyāyāḥ śasyate budhaiḥ

— अतः कन्या का विवाह उसके ऋतुमती होने से पहले ही कर देना चाहिए। विद्वानों ने आठ वर्ष की कन्या का विवाह श्रेष्ठ बताया है।

श्लोक 8 (padma.6.118.8)

दातव्या श्रोत्रियायैव ब्राह्मणाय तपस्विने । साक्षादधीतवेदाय विधिना ब्रह्मचारिणे

dātavyā śrotriyāyaiva brāhmaṇāya tapasvine sākṣādadhītavedāya vidhinā brahmacāriṇe

वह केवल श्रोत्रिय, तपस्वी ब्राह्मण को, जिसने स्वयं साक्षात् वेद का अध्ययन किया हो तथा विधिपूर्वक ब्रह्मचर्य पालन किया हो, दी जानी चाहिए।

श्लोक 9 (padma.6.118.9)

कन्यावरप्रमाणाया एष एव विधिः स्मृतः । यावंति चैव रोमाणि कन्यायाश्च तनौ सुत

kanyāvarapramāṇāyā eṣa eva vidhiḥ smṛtaḥ yāvaṁti caiva romāṇi kanyāyāśca tanau suta

वर-कन्या के अनुपात का यही नियम स्मरण किया गया है। हे पुत्र! कन्या के शरीर में जितने रोम हैं,

श्लोक 10 (padma.6.118.10)

तावद्वर्षसहस्राणि रुद्रलोके महीयते । सहस्रमेव धेनूनां शतं चानुडुहां समम्

tāvadvarṣasahasrāṇi rudraloke mahīyate sahasrameva dhenūnāṁ śataṁ cānuḍuhāṁ samam

— उतने ही हजार वर्षों तक (दान करने वाला) रुद्रलोक में महिमामंडित होता है। एक हजार गौएँ सौ बैलों के समान हैं,

श्लोक 11 (padma.6.118.11)

दशानुडुत्समं यानं दशयानसमो हयः । हयदानसहस्रेभ्यो गजदानं विशिष्यते

daśānuḍutsamaṁ yānaṁ daśayānasamo hayaḥ hayadānasahasrebhyo gajadānaṁ viśiṣyate

दस बैल एक रथ के समान हैं, दस रथ एक घोड़े के समान हैं। हजार घोड़ों के दान से भी गज-दान श्रेष्ठ है।

श्लोक 12 (padma.6.118.12)

गजदानसहस्राणां स्वर्णदानं च तत्समम् । स्वर्णभारसहस्राणां विद्यादानं च तत्समम्

gajadānasahasrāṇāṁ svarṇadānaṁ ca tatsamam svarṇabhārasahasrāṇāṁ vidyādānaṁ ca tatsamam

हजार हाथियों के दान के समान स्वर्ण-दान है; हजार स्वर्ण-भार के दान के समान विद्या-दान है।

श्लोक 13 (padma.6.118.13)

विद्यादानात्कोटिगुणं भूमिदानं विशिष्यते । भूमिदानसहस्रेभ्यो गोप्रदानं विशिष्यते

vidyādānātkoṭiguṇaṁ bhūmidānaṁ viśiṣyate bhūmidānasahasrebhyo gopradānaṁ viśiṣyate

विद्या-दान से करोड़ गुना श्रेष्ठ भूमि-दान है; हजार भूमि-दानों से भी गौ-दान श्रेष्ठ है।

श्लोक 14 (padma.6.118.14)

गोप्रदानसहस्रेभ्यो ह्यन्नदानं विशिष्यते । अन्नाधारमिदं सर्वं जगत्स्थावरजंगमम्

gopradānasahasrebhyo hyannadānaṁ viśiṣyate annādhāramidaṁ sarvaṁ jagatsthāvarajaṁgamam

हजार गौ-दानों से भी अन्न-दान श्रेष्ठ है, क्योंकि यह सम्पूर्ण जगत् — स्थावर और जंगम — अन्न पर ही आधारित है।

श्लोक 15 (padma.6.118.15)

तस्माद्देयं प्रयत्नेन कार्तिके शिखिवाहन । त्रीणि तुल्यप्रदानानि त्रीणि तुल्यफलानि च

tasmāddeyaṁ prayatnena kārtike śikhivāhana trīṇi tulyapradānāni trīṇi tulyaphalāni ca

अतः हे मयूर-वाहन! कार्तिक में यत्नपूर्वक अन्न-दान करना चाहिए। तीन दान समान माने गए हैं और तीन के फल समान हैं —

श्लोक 16 (padma.6.118.16)

कार्तिकेय उवाच। अन्यानपि महादेव धर्मान्मे वक्तुमर्हसि । यान्कृत्वा सर्वपापानि प्रक्षाल्य त्रिदशो भवेत्

kārtikeya uvāca anyānapi mahādeva dharmānme vaktumarhasi yānkṛtvā sarvapāpāni prakṣālya tridaśo bhavet

कार्तिकेय ने कहा — हे महादेव! मुझे अन्य धर्मों के विषय में भी बताइए, जिन्हें करके मनुष्य समस्त पापों को धोकर देवता बन जाता है।

श्लोक 17 (padma.6.118.17)

सूत उवाच। इतिपृष्टस्तदा शंभुः पुनर्वक्तुं प्रचक्रमे । यावत्किं बहुधा स्तुत्वात्तच्छृणुध्वं तपोधनाः

sūta uvāca itipṛṣṭastadā śaṁbhuḥ punarvaktuṁ pracakrame yāvatkiṁ bahudhā stutvāttacchṛṇudhvaṁ tapodhanāḥ

सूत ने कहा — इस प्रकार पूछे जाने पर शंभु ने पुनः कहना आरंभ किया। हे तपोधनो! अनेक प्रकार से स्तुति किए जाने पर उन्होंने जो कहा, वह सुनिए।

श्लोक 18 (padma.6.118.18)

ईश्वर उवाच। परान्नं वर्जयेद्यस्तु कार्तिके नियमे कृते । परान्नवर्जनादेव लभेच्चांद्रायणं फलम्

īśvara uvāca parānnaṁ varjayedyastu kārtike niyame kṛte parānnavarjanādeva labheccāṁdrāyaṇaṁ phalam

ईश्वर ने कहा — जो व्यक्ति कार्तिक में नियम लेकर दूसरे के अन्न का त्याग करता है, वह इस अन्न-त्याग मात्र से चांद्रायण व्रत का फल पाता है।

श्लोक 19 (padma.6.118.19)

तं प्राप्तं कार्तिकं दृष्ट्वा परान्नं यस्तु वर्जयेत् । दिनेदिने तु कृच्छ्रस्य फलंप्राप्नोति मानवः

taṁ prāptaṁ kārtikaṁ dṛṣṭvā parānnaṁ yastu varjayet dinedine tu kṛcchrasya phalaṁprāpnoti mānavaḥ

जो कार्तिक आया देखकर दूसरे के अन्न का त्याग करता है, वह मनुष्य प्रतिदिन कृच्छ्र-व्रत का फल प्राप्त करता है।

श्लोक 20 (padma.6.118.20)

कार्तिके वर्जयेत्तैलं कार्तिके वर्जयेन्मधु । कार्तिके वर्जयेत्कांस्यं संघान्नं च विशेषतः

kārtike varjayettailaṁ kārtike varjayenmadhu kārtike varjayetkāṁsyaṁ saṁghānnaṁ ca viśeṣataḥ

कार्तिक में तेल त्यागे, कार्तिक में मधु त्यागे; कार्तिक में कांस्य-पात्र तथा विशेष रूप से समूह-भोजन का त्याग करे।

श्लोक 21 (padma.6.118.21)

राक्षसीं योनिमाप्नोति सकृन्मांसस्य भक्षणात् । षष्टिवर्षसहस्राणि विष्ठायां परिपच्यते

rākṣasīṁ yonimāpnoti sakṛnmāṁsasya bhakṣaṇāt ṣaṣṭivarṣasahasrāṇi viṣṭhāyāṁ paripacyate

एक बार भी मांस खाने से राक्षस-योनि प्राप्त होती है और साठ हजार वर्षों तक विष्ठा में पकाया जाता है।

श्लोक 22 (padma.6.118.22)

तन्मुक्तो जायते पापो विष्ठाशी ग्रामसूकरः । प्रवृत्तानां तु भक्षाणां कार्तिके नियमे कृते

tanmukto jāyate pāpo viṣṭhāśī grāmasūkaraḥ pravṛttānāṁ tu bhakṣāṇāṁ kārtike niyame kṛte

उससे मुक्त होकर वह पापी विष्ठा-भक्षी ग्राम्य-सूकर होकर जन्म लेता है। किंतु सामान्य रूप से खाई जाने वाली वस्तुओं का कार्तिक में नियमपूर्वक त्याग करने से —

श्लोक 23 (padma.6.118.23)

अवश्यं विष्णुरूपत्वं प्राप्यते मोक्षदं पदम् । न कार्तिकसमो मासो न दैवं केशवात्परम्

avaśyaṁ viṣṇurūpatvaṁ prāpyate mokṣadaṁ padam na kārtikasamo māso na daivaṁ keśavātparam

— निश्चय ही मोक्षदायक विष्णु-रूप प्राप्त होता है। कार्तिक के समान कोई मास नहीं है, केशव से बढ़कर कोई देवता नहीं है,

श्लोक 24 (padma.6.118.24)

न वेदसदृशं शास्त्रं न तीर्थं गंगया समम् । न सत्यं न समं वृत्तं न कृतेन समं युगम्

na vedasadṛśaṁ śāstraṁ na tīrthaṁ gaṁgayā samam na satyaṁ na samaṁ vṛttaṁ na kṛtena samaṁ yugam

वेद के समान कोई शास्त्र नहीं, गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं, सत्य के समान कुछ नहीं, सदाचार के समान कुछ नहीं, तथा कृतयुग के समान कोई युग नहीं है।

श्लोक 25 (padma.6.118.25)

न तृप्ती रसना तुल्या न दानसदृशं सुखम् । न धर्मसदृशं मित्रं न ज्योतिश्चक्षुषा समम्

na tṛptī rasanā tulyā na dānasadṛśaṁ sukham na dharmasadṛśaṁ mitraṁ na jyotiścakṣuṣā samam

जिह्वा की तृप्ति के समान कोई तृप्ति नहीं, दान के समान कोई सुख नहीं, धर्म के समान कोई मित्र नहीं, तथा नेत्र के समान कोई प्रकाश नहीं है।

श्लोक 26 (padma.6.118.26)

अव्रतेन क्षिपेद्यस्तु मासं दामोदरप्रियम् । कर्मभ्रष्टः स विज्ञेयो हीनयोनिषु जायते

avratena kṣipedyastu māsaṁ dāmodarapriyam karmabhraṣṭaḥ sa vijñeyo hīnayoniṣu jāyate

जो व्यक्ति दामोदर के प्रिय इस मास को व्रत-रहित होकर व्यर्थ जाने देता है, वह कर्म-भ्रष्ट जानना चाहिए, वह नीच योनियों में जन्म लेता है।

श्लोक 27 (padma.6.118.27)

कार्तिकः प्रवरो मासो वैष्णवानां सदा प्रियः । समुद्रगा नदी पुण्या दुर्लभा स्नानशालिनाम्

kārtikaḥ pravaro māso vaiṣṇavānāṁ sadā priyaḥ samudragā nadī puṇyā durlabhā snānaśālinām

कार्तिक श्रेष्ठ मास है, वैष्णवों को सदा प्रिय है। सागर में मिलने वाली पुण्य नदी स्नान-प्रेमियों को दुर्लभ है।

श्लोक 28 (padma.6.118.28)

कुलशीलवतीकन्या दुर्लभा दंपती नृणाम् । दुर्लभा जननी लोके पिता चैव विशेषतः

kulaśīlavatīkanyā durlabhā daṁpatī nṛṇām durlabhā jananī loke pitā caiva viśeṣataḥ

कुलीन एवं शीलवती कन्या दुर्लभ है, मनुष्यों को सामंजस्यपूर्ण दंपती दुर्लभ है; संसार में सच्ची माता दुर्लभ है और विशेष रूप से सच्चा पिता।

श्लोक 29 (padma.6.118.29)

दुर्लभं साधुसन्मानं दुर्लभो धार्मिकः सुतः । दुर्लभो द्वारिकावासो दुर्लभं कृष्णदर्शनम्

durlabhaṁ sādhusanmānaṁ durlabho dhārmikaḥ sutaḥ durlabho dvārikāvāso durlabhaṁ kṛṣṇadarśanam

साधुजनों का सम्मान दुर्लभ है, धार्मिक पुत्र दुर्लभ है, द्वारका में निवास दुर्लभ है, कृष्ण का दर्शन दुर्लभ है।

श्लोक 30 (padma.6.118.30)

दुर्लभं गोमतीस्नानं दुर्लभं कार्तिकव्रतम् । ब्राह्मणेभ्यो महीं दत्त्वा ग्रहणे चंद्रसूर्ययोः

durlabhaṁ gomatīsnānaṁ durlabhaṁ kārtikavratam brāhmaṇebhyo mahīṁ dattvā grahaṇe caṁdrasūryayoḥ

गोमती में स्नान दुर्लभ है, कार्तिक-व्रत दुर्लभ है। चंद्र या सूर्य-ग्रहण में ब्राह्मणों को भूमि-दान करने से,

श्लोक 31 (padma.6.118.31)

यत्फलं लभते वत्स तत्फलं भूमिशायिनः । भोजनं द्विजदंपत्योः पूजयेच्च विलेपनैः

yatphalaṁ labhate vatsa tatphalaṁ bhūmiśāyinaḥ bhojanaṁ dvijadaṁpatyoḥ pūjayecca vilepanaiḥ

हे वत्स! जो फल प्राप्त होता है, वही फल कार्तिक में भूमि पर शयन करने वाले को प्राप्त होता है। ब्राह्मण-दंपती को भोजन कराए तथा उन्हें उबटन आदि से सम्मानित करे,

श्लोक 32 (padma.6.118.32)

कंबलानि च रत्नानि वासांसि विविधानि च । तूलिकाश्च प्रदातव्याः प्रच्छादनपटैः सह

kaṁbalāni ca ratnāni vāsāṁsi vividhāni ca tūlikāśca pradātavyāḥ pracchādanapaṭaiḥ saha

तथा कंबल, रत्न, विविध वस्त्र दे। गद्दे भी ओढ़ने के कपड़ों सहित दान करने चाहिए।

श्लोक 33 (padma.6.118.33)

उपानहा वातपत्रं कार्तिके देहि पावके । यः करोति नरो नित्यं कार्तिके पत्रभोजनम्

upānahā vātapatraṁ kārtike dehi pāvake yaḥ karoti naro nityaṁ kārtike patrabhojanam

हे पावन! कार्तिक में जूते और पंखा भी दे। जो मनुष्य कार्तिक में प्रतिदिन पत्तल पर भोजन करता है,

श्लोक 34 (padma.6.118.34)

न दुर्गतिमवाप्नोति यावदिंद्राश्चतुर्दश । सर्वकामफलं तस्य सर्वतीर्थफलं लभेत्

na durgatimavāpnoti yāvadiṁdrāścaturdaśa sarvakāmaphalaṁ tasya sarvatīrthaphalaṁ labhet

वह चौदह इंद्रों के काल तक दुर्गति को प्राप्त नहीं होता। उसे समस्त कामनाओं का फल और समस्त तीर्थों का फल प्राप्त होता है,

श्लोक 35 (padma.6.118.35)

न चापि नरकं पश्येद्ब्रह्मपत्रेषु भोजनात् । ब्रह्मा एष स्मृतः साक्षात्पालाशः सर्वकामदः

na cāpi narakaṁ paśyedbrahmapatreṣu bhojanāt brahmā eṣa smṛtaḥ sākṣātpālāśaḥ sarvakāmadaḥ

तथा ब्रह्म-पत्रों (पत्तलों) में भोजन करने से वह नरक भी नहीं देखता। यह पलाश-पत्र साक्षात् ब्रह्मा ही माना गया है, जो समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाला है।

श्लोक 36 (padma.6.118.36)

मध्यमं वर्जयेत्पत्रं कार्तिके शिखिवाहन । ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च त्रयो देवास्त्रिपत्रके

madhyamaṁ varjayetpatraṁ kārtike śikhivāhana brahmā viṣṇuśca rudraśca trayo devāstripatrake

हे मयूर-वाहन! कार्तिक में मध्य पत्ते का त्याग करे। ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र — ये तीनों देवता त्रिपत्र में स्थित हैं —

श्लोक 37 (padma.6.118.37)

ऐश्वरं वर्जयेत्पत्रं ब्रह्माविष्णुरनुत्तमः । सर्वपुण्यमवाप्नोति शेषपत्रेषु भोजनात्

aiśvaraṁ varjayetpatraṁ brahmāviṣṇuranuttamaḥ sarvapuṇyamavāpnoti śeṣapatreṣu bhojanāt

— ईश्वर (शिव) के पत्ते का त्याग करे; ब्रह्मा और विष्णु का पत्ता सर्वोत्तम है। शेष पत्तों में भोजन करने से समस्त पुण्य प्राप्त होता है।

श्लोक 38 (padma.6.118.38)

भोजनान्मध्यपत्रे तु कपिलापयसस्तथा । प्राशनान्मुनिशार्दूल नरो नरकमाप्नुयात्

bhojanānmadhyapatre tu kapilāpayasastathā prāśanānmuniśārdūla naro narakamāpnuyāt

किंतु हे मुनिश्रेष्ठ! मध्य पत्ते पर भोजन करने से तथा उसी प्रकार कपिला गौ के दूध का सेवन करने से मनुष्य नरक को प्राप्त होता है।

श्लोक 39 (padma.6.118.39)

अज्ञानाद्भुंजते यस्तु शूद्रो वा कपिलापयः । कपिलां ब्राह्मणे दत्त्वा शुद्धो भवति कार्तिके

ajñānādbhuṁjate yastu śūdro vā kapilāpayaḥ kapilāṁ brāhmaṇe dattvā śuddho bhavati kārtike

जो शूद्र अथवा अन्य कोई अज्ञानवश कपिला-दुग्ध का सेवन कर लेता है, वह ब्राह्मण को कपिला गौ दान करके कार्तिक में शुद्ध हो जाता है।

श्लोक 40 (padma.6.118.40)

तिलदानं नदीस्नानं सर्वदा साधुदर्शनम् । भोजनं ब्रह्मपत्रेषु कार्तिके मुक्तिदायकम्

tiladānaṁ nadīsnānaṁ sarvadā sādhudarśanam bhojanaṁ brahmapatreṣu kārtike muktidāyakam

तिल-दान, नदी-स्नान, सदा साधुओं का दर्शन, तथा कार्तिक में ब्रह्म-पत्रों में भोजन — ये मुक्तिदायक हैं।

श्लोक 41 (padma.6.118.41)

मौनी पालाशभोजी च जलस्नायी सदा क्षमी । कार्तिके क्षितिशायी च हन्यात्पापं युगार्जितम्

maunī pālāśabhojī ca jalasnāyī sadā kṣamī kārtike kṣitiśāyī ca hanyātpāpaṁ yugārjitam

जो मौन रहकर पलाश-पत्र में भोजन करता है, सदा जल में स्नान करता है, सदा क्षमाशील रहता है, तथा कार्तिक में भूमि पर शयन करता है, वह युगभर में अर्जित पाप का नाश करता है।

श्लोक 42 (padma.6.118.42)

जागरं कार्तिके मासि यः करोत्यरुणोदये । दामोदराग्रे सेनानीर्गोसहस्रफलं लभेत्

jāgaraṁ kārtike māsi yaḥ karotyaruṇodaye dāmodarāgre senānīrgosahasraphalaṁ labhet

हे सेनानी! जो कार्तिक-मास में अरुणोदय के समय दामोदर के आगे जागरण करता है, वह सहस्र गौ-दान का फल पाता है।

श्लोक 43 (padma.6.118.43)

पितृपक्षेऽन्नदानेन ज्येष्ठाषाढे च वारिणा । कार्तिके तत्फलं पुंसां परदीपप्रबोधनात्

pitṛpakṣe'nnadānena jyeṣṭhāṣāḍhe ca vāriṇā kārtike tatphalaṁ puṁsāṁ paradīpaprabodhanāt

पितृ-पक्ष में अन्नदान से तथा ज्येष्ठ-आषाढ़ में जल-दान से जो फल प्राप्त होता है, वही फल कार्तिक में केवल दूसरे के दीपक को पुनः जलाने से मनुष्यों को प्राप्त होता है।

श्लोक 44 (padma.6.118.44)

बोधनात्परदीपस्य वैष्णवानां च सेवनात् । कार्तिके फलमाप्नोति राजसूयाश्वमेधयोः

bodhanātparadīpasya vaiṣṇavānāṁ ca sevanāt kārtike phalamāpnoti rājasūyāśvamedhayoḥ

दूसरे के दीपक को जलाने से तथा वैष्णवों की सेवा करने से मनुष्य कार्तिक में राजसूय और अश्वमेध यज्ञ का फल पाता है।

श्लोक 45 (padma.6.118.45)

नदीस्नानं कथाविष्णोर्वैष्णवानां च दर्शनम् । न भवेत्कार्तिके यस्य हरेत्पुण्यं दशाब्दिकम्

nadīsnānaṁ kathāviṣṇorvaiṣṇavānāṁ ca darśanam na bhavetkārtike yasya haretpuṇyaṁ daśābdikam

जिसका कार्तिक में नदी-स्नान, विष्णु-कथा-श्रवण तथा वैष्णवों का दर्शन नहीं होता, वह दस वर्षों के पुण्य को खो देता है।

श्लोक 46 (padma.6.118.46)

पुष्करं यः स्मरेत्प्राज्ञः कर्मणा मनसा गिरा । कार्तिके मुनिशार्दूल लक्षकोटिगुणं भवेत्

puṣkaraṁ yaḥ smaretprājñaḥ karmaṇā manasā girā kārtike muniśārdūla lakṣakoṭiguṇaṁ bhavet

हे मुनिश्रेष्ठ! जो बुद्धिमान कर्म, मन तथा वाणी से पुष्कर का स्मरण करता है, कार्तिक में वह फल लाख-करोड़ गुना हो जाता है।

श्लोक 47 (padma.6.118.47)

प्रयागो माघमासे तु पुष्करं कार्तिके तथा । अवंती माधवे मासि हन्यात्पापं युगार्जितम्

prayāgo māghamāse tu puṣkaraṁ kārtike tathā avaṁtī mādhave māsi hanyātpāpaṁ yugārjitam

माघ-मास में प्रयाग, कार्तिक में पुष्कर, तथा माधव (वैशाख) मास में अवंती — इनका स्मरण युगभर के पाप का नाश कर देता है।

श्लोक 48 (padma.6.118.48)

धन्यास्ते मानवा लोके कलिकाले विशेषतः । कुर्वंति स्कंद नित्यं ये सर्वथा हरिसेवनम्

dhanyāste mānavā loke kalikāle viśeṣataḥ kurvaṁti skaṁda nityaṁ ye sarvathā harisevanam

हे स्कंद! धन्य हैं वे मनुष्य इस लोक में, विशेषतः कलिकाल में, जो सदा सर्वथा हरि की सेवा करते हैं।

श्लोक 49 (padma.6.118.49)

किं दत्तैर्बहुभिः पिंडैर्गयाश्राद्धादिभिर्मुने । तारितास्तेन पितरो नरकाच्च न संशयः

kiṁ dattairbahubhiḥ piṁḍairgayāśrāddhādibhirmune tāritāstena pitaro narakācca na saṁśayaḥ

हे मुने! गया आदि में अनेक पिंड-दान और श्राद्ध देने से क्या लाभ? उससे (हरि-सेवा से) ही पितर निश्चय ही नरक से तार दिए जाते हैं, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 50 (padma.6.118.50)

क्षीरादिस्नपनं विष्णोः क्रियते पितृकारणात् । कल्पकोटिं दिवं प्राप्य वसंति त्रिदशैः सह

kṣīrādisnapanaṁ viṣṇoḥ kriyate pitṛkāraṇāt kalpakoṭiṁ divaṁ prāpya vasaṁti tridaśaiḥ saha

पितरों के निमित्त जब विष्णु का दूध आदि से स्नपन किया जाता है, तो वे करोड़ों कल्पों तक स्वर्ग प्राप्त कर देवताओं के साथ निवास करते हैं।

श्लोक 51 (padma.6.118.51)

कार्तिके नार्चितो यैस्तु कृष्णस्तु कमलेक्षणः । जन्मकोटिषु विप्रेंद्र न तेषां कमला गृहे

kārtike nārcito yaistu kṛṣṇastu kamalekṣaṇaḥ janmakoṭiṣu vipreṁdra na teṣāṁ kamalā gṛhe

हे विप्रेंद्र! जिन्होंने कार्तिक में कमल-नयन कृष्ण की पूजा नहीं की, उनके घर में करोड़ों जन्मों तक कमला (लक्ष्मी) निवास नहीं करतीं।

श्लोक 52 (padma.6.118.52)

दष्टा मुष्टा विनष्टास्ते पतिताः कलिकंदरे । यैर्नार्चितो हरिर्भक्त्या कमलैरसितैः सितैः

daṣṭā muṣṭā vinaṣṭāste patitāḥ kalikaṁdare yairnārcito harirbhaktyā kamalairasitaiḥ sitaiḥ

जिन्होंने काले-सफेद कमलों से भक्तिपूर्वक हरि की पूजा नहीं की, वे डसे हुए, लुटे हुए, नष्ट होकर कलिकाल की गर्त में गिर जाते हैं।

श्लोक 53 (padma.6.118.53)

पद्मेनैकेन देवेशं योऽर्चयेत्कमलापतिम् । वर्षायुतसहस्रस्य पापस्य कुरुते क्षयम्

padmenaikena deveśaṁ yo'rcayetkamalāpatim varṣāyutasahasrasya pāpasya kurute kṣayam

जो एक ही कमल से कमला-पति देवेश की पूजा करता है, वह दस हजार करोड़ वर्षों के पाप का नाश कर देता है।

श्लोक 54 (padma.6.118.54)

अपराधसहस्राणि तथा सप्तशतानि च । पद्मेनैकेन देवेशः क्षमेत प्रणतोऽर्चितः

aparādhasahasrāṇi tathā saptaśatāni ca padmenaikena deveśaḥ kṣameta praṇato'rcitaḥ

एक ही कमल से पूजित और प्रणाम किया गया देवेश एक हजार सात सौ अपराधों को भी क्षमा कर देते हैं।

श्लोक 55 (padma.6.118.55)

तुलसीपत्रलक्षेण कार्तिके योऽर्चयेद्धरिम् । पत्रेपत्रे मुनिश्रेष्ठ मौक्तिकं लभते फलम्

tulasīpatralakṣeṇa kārtike yo'rcayeddharim patrepatre muniśreṣṭha mauktikaṁ labhate phalam

हे मुनिश्रेष्ठ! जो कार्तिक में एक लाख तुलसी-पत्रों से हरि की पूजा करता है, उसे प्रत्येक पत्ते पर मोती-दान का फल प्राप्त होता है।

श्लोक 56 (padma.6.118.56)

तुलसीगंधमिश्रं तु यत्किंचित्क्रियते सुत । कल्पकोटिसहस्राणि प्रीतो भवति केशवः

tulasīgaṁdhamiśraṁ tu yatkiṁcitkriyate suta kalpakoṭisahasrāṇi prīto bhavati keśavaḥ

हे पुत्र! तुलसी की सुगंध मिश्रित जो कुछ भी अर्पित किया जाता है, उससे केशव करोड़ों कल्पों तक प्रसन्न रहते हैं।

श्लोक 57 (padma.6.118.57)

मुखे शिरसि देहे तु कृष्णोत्तीर्णां तु यो वहेत् । तुलसीं षण्मुखप्रीत्या न तस्य स्पृशते कलिः

mukhe śirasi dehe tu kṛṣṇottīrṇāṁ tu yo vahet tulasīṁ ṣaṇmukhaprītyā na tasya spṛśate kaliḥ

हे षडानन! जो मुख, सिर तथा शरीर पर कृष्ण को अर्पित की गई तुलसी को प्रेमपूर्वक धारण करता है, उसे कलि स्पर्श नहीं करता।

श्लोक 58 (padma.6.118.58)

कृष्णोत्तीर्णैस्तु निर्माल्यैर्यो गात्रं परिमार्जयेत् । सर्वरोगैस्तथा पापैर्मुक्तो भवति षण्मुख

kṛṣṇottīrṇaistu nirmālyairyo gātraṁ parimārjayet sarvarogaistathā pāpairmukto bhavati ṣaṇmukha

हे षडानन! जो कृष्ण को अर्पित निर्माल्य (शेष पुष्पादि) से अपने शरीर को साफ करता है, वह समस्त रोगों तथा पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 59 (padma.6.118.59)

विष्णोरंगारशेषेण यस्यांगं स्पृशते सुत । दुरितानि विनश्यंति व्याधयो यांति संक्षयम्

viṣṇoraṁgāraśeṣeṇa yasyāṁgaṁ spṛśate suta duritāni vinaśyaṁti vyādhayo yāṁti saṁkṣayam

हे पुत्र! विष्णु को अर्पित धूप के शेष अंगारों से जिसका शरीर स्पर्श होता है, उसके पाप नष्ट हो जाते हैं और रोग क्षीण हो जाते हैं।

श्लोक 60 (padma.6.118.60)

शंखोदकं हरेर्भक्तिर्निर्माल्यं पादयोर्जलम् । चंदनं धूपशेषं तु ब्रह्महत्यापहारकम्

śaṁkhodakaṁ harerbhaktirnirmālyaṁ pādayorjalam caṁdanaṁ dhūpaśeṣaṁ tu brahmahatyāpahārakam

शंख का जल, हरि-भक्ति, निर्माल्य, चरणामृत, चंदन तथा धूप का शेष — ये सब ब्रह्महत्या के पाप को भी दूर कर देते हैं।

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