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उत्तर खण्ड · अध्याय 119

शूकर-क्षेत्र की महिमा और मासोपवास-विधि

अध्याय 118अध्याय-सूचीअध्याय 120

श्लोक 1 (padma.6.119.1)

ईश्वर उवाच। माघस्नानस्य माहात्म्यं शृणु भागवतोत्तम । त्वत्समो नास्ति लोकेऽस्मिन्विष्णुभक्तो महामते

īśvara uvāca māghasnānasya māhātmyaṁ śṛṇu bhāgavatottama tvatsamo nāsti loke'sminviṣṇubhakto mahāmate

ईश्वर ने कहा — हे भागवतोत्तम! माघ-स्नान का माहात्म्य सुनो। हे महामते! इस लोक में तुम्हारे समान विष्णु-भक्त कोई नहीं है।

श्लोक 2 (padma.6.119.2)

चक्रतीर्थे हरिं दृष्ट्वा मथुरायां च केशवम् । यत्फलं लभते मर्त्यो माघस्नानेन तत्फलम्

cakratīrthe hariṁ dṛṣṭvā mathurāyāṁ ca keśavam yatphalaṁ labhate martyo māghasnānena tatphalam

चक्रतीर्थ में हरि का तथा मथुरा में केशव का दर्शन करने से जो फल मनुष्य को मिलता है, वही फल माघ-स्नान से प्राप्त होता है।

श्लोक 3 (padma.6.119.3)

जितेंद्रियः शांतमनाः सदाचारेण संयुतः । स्नानं करोति यो माघे संसारी न भवेत्पुनः

jiteṁdriyaḥ śāṁtamanāḥ sadācāreṇa saṁyutaḥ snānaṁ karoti yo māghe saṁsārī na bhavetpunaḥ

जो जितेंद्रिय, शांत-मन तथा सदाचार से युक्त होकर माघ में स्नान करता है, वह पुनः संसारी नहीं बनता।

श्लोक 4 (padma.6.119.4)

श्रीकृष्ण उवाच। शूकरस्य च माहात्म्यं कथयिष्ये तवाग्रतः । यस्य विज्ञानमात्रेण सान्निध्यं मम सर्वदा

śrīkṛṣṇa uvāca śūkarasya ca māhātmyaṁ kathayiṣye tavāgrataḥ yasya vijñānamātreṇa sānnidhyaṁ mama sarvadā

श्रीकृष्ण ने कहा — अब मैं तुम्हारे सामने शूकर-क्षेत्र का माहात्म्य कहूँगा, जिसके ज्ञानमात्र से मेरी सन्निधि सदा बनी रहती है।

श्लोक 5 (padma.6.119.5)

सूत उवाच। इत्युक्त्वा भगवान्कृष्णः सत्यायै बहुधा जगौ । तदहं संप्रवक्ष्यामि तच्छृणुध्वं तपोधनाः

sūta uvāca ityuktvā bhagavānkṛṣṇaḥ satyāyai bahudhā jagau tadahaṁ saṁpravakṣyāmi tacchṛṇudhvaṁ tapodhanāḥ

सूत ने कहा — यह कहकर भगवान कृष्ण ने सत्या से विस्तारपूर्वक कहा। हे तपोधनो! अब मैं वही बताता हूँ, उसे सुनिए।

श्लोक 6 (padma.6.119.6)

श्रीकृष्ण उवाच। पंचयोजनविस्तीर्णे शूकरे हरिमंदिरे । यस्मिन्वसति यो जीवो गर्दभोऽपि चतुर्भुजः

śrīkṛṣṇa uvāca paṁcayojanavistīrṇe śūkare harimaṁdire yasminvasati yo jīvo gardabho'pi caturbhujaḥ

श्रीकृष्ण ने कहा — पाँच योजन विस्तृत हरि-मंदिर शूकर-क्षेत्र में जो भी जीव निवास करता है, वह गदहा भी चतुर्भुज हो जाता है।

श्लोक 7 (padma.6.119.7)

त्रीणि हस्तसहस्राणि त्रीणि हस्तशतानि च । त्रयो हस्ता शूकरस्य परिमाणं विधीयते

trīṇi hastasahasrāṇi trīṇi hastaśatāni ca trayo hastā śūkarasya parimāṇaṁ vidhīyate

तीन हजार हाथ, तीन सौ हाथ तथा तीन हाथ — यह शूकर-क्षेत्र का परिमाण बताया गया है।

श्लोक 8 (padma.6.119.8)

षष्टिवर्षसहस्राणि योऽन्यत्र कुरुते तपः । तत्फलं लभते देवि प्रहरार्द्धेन शूकरे

ṣaṣṭivarṣasahasrāṇi yo'nyatra kurute tapaḥ tatphalaṁ labhate devi praharārddhena śūkare

जो फल कोई अन्यत्र साठ हजार वर्ष तपस्या करने से पाता है, हे देवि! वही फल शूकर में आधे प्रहर में प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 9 (padma.6.119.9)

सन्निहत्यां कुरुक्षेत्रे राहुग्रस्ते दिवाकरे । तुलापुरुषदानेन तत्फलं परिकीर्त्तितम्

sannihatyāṁ kurukṣetre rāhugraste divākare tulāpuruṣadānena tatphalaṁ parikīrttitam

सूर्य-ग्रहण के समय कुरुक्षेत्र के सन्निहत्य-तीर्थ में तुला-पुरुष दान का जो फल कहा गया है,

श्लोक 10 (padma.6.119.10)

काश्यां दशगुणं प्रोक्तं वेण्यां शतगुणं भवेत् । सहस्रगुणितं प्रोक्तं गंगासागरसंगमे

kāśyāṁ daśaguṇaṁ proktaṁ veṇyāṁ śataguṇaṁ bhavet sahasraguṇitaṁ proktaṁ gaṁgāsāgarasaṁgame

वह काशी में दस गुना, वेणी-संगम में सौ गुना, तथा गंगा-सागर-संगम में हज़ार गुना कहा गया है।

श्लोक 11 (padma.6.119.11)

अनंतं चैव विज्ञेयं शूकरे हरिमंदिरे । अन्यत्र ददते लक्षं संविधानेन कार्तिक

anaṁtaṁ caiva vijñeyaṁ śūkare harimaṁdire anyatra dadate lakṣaṁ saṁvidhānena kārtika

किंतु शूकर के हरि-मंदिर में वह अनंत जानना चाहिए। हे कार्तिकेय! अन्यत्र लोग विधिपूर्वक लाख गुना दान करते हैं,

श्लोक 12 (padma.6.119.12)

इहैवैकेन दत्तेन शूकरे तत्समं भवेत् । शूकरे च तथा वेण्यां गंगासागरसंगमे

ihaivaikena dattena śūkare tatsamaṁ bhavet śūkare ca tathā veṇyāṁ gaṁgāsāgarasaṁgame

किंतु यहाँ शूकर में एक ही बार दान देने से वह उसके समान हो जाता है। शूकर में, वेणी-संगम में तथा गंगा-सागर-संगम में इसी प्रकार —

श्लोक 13 (padma.6.119.13)

सकृदेव नरः स्नात्वा ब्रह्महत्यां व्यपोहति । अलर्केण पुरा प्राप्ता सप्तद्वीपा वसुंधरा । शूकरक्षेत्रमाहात्म्यं श्रुत्वा चैव षडानन

sakṛdeva naraḥ snātvā brahmahatyāṁ vyapohati alarkeṇa purā prāptā saptadvīpā vasuṁdharā śūkarakṣetramāhātmyaṁ śrutvā caiva ṣaḍānana

— एक बार भी स्नान करने से मनुष्य ब्रह्महत्या के पाप को दूर कर देता है। हे षडानन! प्राचीन काल में राजा अलर्क ने शूकर-क्षेत्र का माहात्म्य सुनकर ही सातों द्वीपों वाली पृथ्वी प्राप्त की थी।

श्लोक 14 (padma.6.119.14)

मार्गशीर्षस्य द्वादश्यां शुक्लायां व्रज पुत्रक । कार्त्तिकेय उवाच । भगवन्श्रोतुमिच्छामि व्रतानामुत्तमं व्रतम् । विधिं मासोपवासस्य फलं चास्य यथोचितम्

mārgaśīrṣasya dvādaśyāṁ śuklāyāṁ vraja putraka kārttikeya uvāca bhagavanśrotumicchāmi vratānāmuttamaṁ vratam vidhiṁ māsopavāsasya phalaṁ cāsya yathocitam

[कृष्ण ने कहा:] "हे पुत्रक! मार्गशीर्ष की शुक्ल द्वादशी को जाओ।" कार्तिकेय ने कहा — हे भगवन्! मैं व्रतों में सर्वश्रेष्ठ इस व्रत की विधि तथा इसके यथोचित फल को सुनना चाहता हूँ — मासोपवास की।

श्लोक 15 (padma.6.119.15)

यथाविधि नरैः कार्या व्रतचर्या यथा भवेत् । आरभ्यते यथापूर्वं समाप्यं हि यथाविधि

yathāvidhi naraiḥ kāryā vratacaryā yathā bhavet ārabhyate yathāpūrvaṁ samāpyaṁ hi yathāvidhi

मनुष्यों को विधिपूर्वक व्रत का आचरण कैसे करना चाहिए, यह पहले किस प्रकार आरंभ होता है और विधिपूर्वक कैसे पूर्ण किया जाता है —

श्लोक 16 (padma.6.119.16)

यावत्संख्यं तु कर्त्तव्यं तत्प्रब्रूहि महेश्वर । व्रतमेतत्सुखश्रीदं विस्तरेण ममानघ

yāvatsaṁkhyaṁ tu karttavyaṁ tatprabrūhi maheśvara vratametatsukhaśrīdaṁ vistareṇa mamānagha

— यह कितने दिनों तक करना चाहिए, हे महेश्वर! यह मुझे बताइए। हे अनघ! सुख और श्री देने वाले इस व्रत को विस्तार से मुझे बताइए।

श्लोक 17 (padma.6.119.17)

श्रीरुद्र उवाच। पावके साधु सर्वं ते यत्पृष्टं प्रब्रुवेऽनघ । भक्त्या मतिमतां श्रेष्ठ शृणुष्व गदतो मम

śrīrudra uvāca pāvake sādhu sarvaṁ te yatpṛṣṭaṁ prabruve'nagha bhaktyā matimatāṁ śreṣṭha śṛṇuṣva gadato mama

श्रीरुद्र ने कहा — हे अग्नि के समान पावन अनघ! तुमने जो कुछ पूछा है, वह सब मैं भली-भाँति बताता हूँ। हे बुद्धिमानों में श्रेष्ठ! भक्तिपूर्वक मेरे कहे हुए वचन को सुनो।

श्लोक 18 (padma.6.119.18)

सुराणां च यथा विष्णुस्तपतां च यथा रविः । मेरुःशिखरिणां यद्वद्वैनतेयश्च पक्षिणाम्

surāṇāṁ ca yathā viṣṇustapatāṁ ca yathā raviḥ meruḥśikhariṇāṁ yadvadvainateyaśca pakṣiṇām

जैसे देवताओं में विष्णु, तेजस्वियों में सूर्य, पर्वतों में मेरु तथा पक्षियों में गरुड़ श्रेष्ठ हैं,

श्लोक 19 (padma.6.119.19)

तीर्थानां तु यथा गंगा प्रजानां तु यथा वणिक् । श्रेष्ठं सर्वव्रतानां तु तद्वन्मासोपवासनम्

tīrthānāṁ tu yathā gaṁgā prajānāṁ tu yathā vaṇik śreṣṭhaṁ sarvavratānāṁ tu tadvanmāsopavāsanam

— तीर्थों में जैसे गंगा और प्रजा में जैसे वणिक् श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार समस्त व्रतों में मासोपवास सर्वश्रेष्ठ है।

श्लोक 20 (padma.6.119.20)

सर्वव्रतेषु यत्पुण्यं सर्वतीर्थेषु चैव हि । सर्वदानोद्भवं चैव लभेन्मासोपवासकृत्

sarvavrateṣu yatpuṇyaṁ sarvatīrtheṣu caiva hi sarvadānodbhavaṁ caiva labhenmāsopavāsakṛt

समस्त व्रतों में जो पुण्य है, समस्त तीर्थों में जो पुण्य है, तथा समस्त दानों से जो उत्पन्न होता है, वह सब मासोपवास करने वाला प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 21 (padma.6.119.21)

अग्निष्टोमादिभिर्यज्ञैर्विविधैर्भूरिदक्षिणैः । न तत्पुण्यमवाप्नोति यन्मासपरिलंघनात्

agniṣṭomādibhiryajñairvividhairbhūridakṣiṇaiḥ na tatpuṇyamavāpnoti yanmāsaparilaṁghanāt

भरपूर दक्षिणा वाले अग्निष्टोम आदि विविध यज्ञों से भी वह पुण्य नहीं मिलता, जो पूरे मास के उपवास से मिलता है।

श्लोक 22 (padma.6.119.22)

तेन जप्तं हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं स्वधा । यः करोति विधानेन नरो मासमुपोषणम्

tena japtaṁ hutaṁ dattaṁ tapastaptaṁ kṛtaṁ svadhā yaḥ karoti vidhānena naro māsamupoṣaṇam

जो मनुष्य विधिपूर्वक मासभर उपवास करता है, उसके द्वारा जप, हवन, दान, तप तथा स्वधा — सब कुछ किया हुआ माना जाता है।

श्लोक 23 (padma.6.119.23)

उद्दिश्य वैष्णवं यज्ञं मामभ्यर्च्य जनार्दनम् । गुरोराज्ञां ततो लब्ध्वा कुर्यान्मासोपवासनम्

uddiśya vaiṣṇavaṁ yajñaṁ māmabhyarcya janārdanam gurorājñāṁ tato labdhvā kuryānmāsopavāsanam

वैष्णव-यज्ञ का संकल्प करके तथा मुझ जनार्दन की पूजा करके, फिर गुरु की आज्ञा प्राप्त करके मासोपवास करना चाहिए।

श्लोक 24 (padma.6.119.24)

वैष्णवानि यथोक्तानि कृत्वा सर्वव्रतानि तु । द्वादश्यादीनि पुण्यानि ततो मासमुपावसेत्

vaiṣṇavāni yathoktāni kṛtvā sarvavratāni tu dvādaśyādīni puṇyāni tato māsamupāvaset

यथोक्त विधि से समस्त वैष्णव व्रत तथा द्वादशी आदि पुण्य व्रत करके फिर मासभर उपवास करना चाहिए।

श्लोक 25 (padma.6.119.25)

अतिकृच्छ्रं च पाराकं कृत्वा चांद्रायणं ततः । मासोपवासं कुर्वीत गुरोर्विप्राज्ञया ततः

atikṛcchraṁ ca pārākaṁ kṛtvā cāṁdrāyaṇaṁ tataḥ māsopavāsaṁ kurvīta gurorviprājñayā tataḥ

अतिकृच्छ्र, पाराक तथा चांद्रायण व्रत करके, फिर गुरु-ब्राह्मण की आज्ञा से मासोपवास करे।

श्लोक 26 (padma.6.119.26)

आश्विनस्यामले पक्षे एकादश्यामुपोषितः । व्रतमेनं तु गृह्णीयाद्यावत्त्रिंशद्दिनानि तु

āśvinasyāmale pakṣe ekādaśyāmupoṣitaḥ vratamenaṁ tu gṛhṇīyādyāvattriṁśaddināni tu

आश्विन के शुक्ल पक्ष की एकादशी को उपवास करके, इस व्रत को तीस दिनों तक ग्रहण करना चाहिए।

श्लोक 27 (padma.6.119.27)

वासुदेवं समभ्यर्च्य कार्तिकं सकलं नरः । मासं चोपवसेद्यस्तु स मुक्तिफलभाग्भवेत्

vāsudevaṁ samabhyarcya kārtikaṁ sakalaṁ naraḥ māsaṁ copavasedyastu sa muktiphalabhāgbhavet

जो मनुष्य वासुदेव की भली-भाँति पूजा करके सम्पूर्ण कार्तिक-मास उपवास करता है, वह मुक्ति-फल का भागी होता है।

श्लोक 28 (padma.6.119.28)

अच्युतस्यालये भक्त्या त्रिकालं कुमुदैः शुभैः । मालतींदीवर्रैबुध्नैः कमलैश्च सुगंधिभिः

acyutasyālaye bhaktyā trikālaṁ kumudaiḥ śubhaiḥ mālatīṁdīvarraibudhnaiḥ kamalaiśca sugaṁdhibhiḥ

अच्युत के मंदिर में भक्तिपूर्वक तीनों समय शुभ कुमुद, मालती, नीलकमल तथा सुगंधित कमलों से,

श्लोक 29 (padma.6.119.29)

कुसुमोशीरकर्पूरैर्विलिप्य वरचंदनैः । नैवेद्यापूपदीपाद्यैरर्चयेच्च जनार्दनम्

kusumośīrakarpūrairvilipya varacaṁdanaiḥ naivedyāpūpadīpādyairarcayecca janārdanam

— सुगंधित पुष्पों, खस तथा कर्पूर से तथा उत्तम चंदन से अनुलेप करके, नैवेद्य, पुए और दीपक आदि से जनार्दन की पूजा करे।

श्लोक 30 (padma.6.119.30)

मनसा कर्मणा वाचा पूजयेद्गरुडध्वजम् । कुर्वन्नरः स्त्री विधवा बृहद्भक्तिर्जितेंद्रियः

manasā karmaṇā vācā pūjayedgaruḍadhvajam kurvannaraḥ strī vidhavā bṛhadbhaktirjiteṁdriyaḥ

मन, वचन और कर्म से गरुड़-ध्वज की पूजा करनी चाहिए। पुरुष, स्त्री अथवा विधवा — कोई भी, गहरी भक्ति और जितेंद्रियता से यह करता हुआ —

श्लोक 31 (padma.6.119.31)

नाम्नामेव तथालापं विष्णोः कुर्यादहर्निशम् । भक्त्या विष्णोः स्तुतिर्वाच्या मिथ्यालापविवर्जिता

nāmnāmeva tathālāpaṁ viṣṇoḥ kuryādaharniśam bhaktyā viṣṇoḥ stutirvācyā mithyālāpavivarjitā

— दिन-रात केवल विष्णु के नामों की ही चर्चा करे। भक्तिपूर्वक विष्णु की ही स्तुति कहनी चाहिए, मिथ्या वार्तालाप से रहित होकर।

श्लोक 32 (padma.6.119.32)

सर्वसत्वदयायुक्तः शांतवृत्तिरहिंसकः । सुप्तो बाह्यासनस्थो वा वासुदेवं प्रकीर्तयेत्

sarvasatvadayāyuktaḥ śāṁtavṛttirahiṁsakaḥ supto bāhyāsanastho vā vāsudevaṁ prakīrtayet

समस्त प्राणियों पर दया रखने वाला, शांत-वृत्ति, अहिंसक, सोते या बाहर आसन पर बैठे हुए भी वासुदेव का ही कीर्तन करे।

श्लोक 33 (padma.6.119.33)

स्मृत्यालोकनगंधादि स्वादनं परिकीर्त्तनम् । अन्नस्य वर्जयेद्वासं ग्रासानां संप्रमोक्षणम्

smṛtyālokanagaṁdhādi svādanaṁ parikīrttanam annasya varjayedvāsaṁ grāsānāṁ saṁpramokṣaṇam

भोजन का स्मरण, दर्शन, गंध, स्वाद तथा उसकी चर्चा — इन सबका त्याग करे, और ग्रास निगलने की लालसा का भी त्याग करे।

श्लोक 34 (padma.6.119.34)

गात्राभ्यंगं शिरोभ्यंगं तांबूलं सविलेपनम् । व्रतस्थो वर्जयेत्सर्वं यच्चान्यच्च निराकृतम्

gātrābhyaṁgaṁ śirobhyaṁgaṁ tāṁbūlaṁ savilepanam vratastho varjayetsarvaṁ yaccānyacca nirākṛtam

शरीर का उबटन, सिर का तेल, पान तथा लेप — व्रती इन सबका तथा अन्य निषिद्ध वस्तुओं का त्याग करे।

श्लोक 35 (padma.6.119.35)

न व्रतस्थः स्पृशेत्किंचिद्विकर्मस्थं न चालयेत् । देवतायतने तिष्ठन्न गृहस्थश्चरेत्ध्रुवम्

na vratasthaḥ spṛśetkiṁcidvikarmasthaṁ na cālayet devatāyatane tiṣṭhanna gṛhasthaścaretdhruvam

व्रती को विकर्म में लगी किसी वस्तु का स्पर्श या संचालन नहीं करना चाहिए। देवालय में रहकर निश्चय ही गृहस्थ के समान आचरण नहीं करना चाहिए।

श्लोक 36 (padma.6.119.36)

कृत्वा मासोपवासं तु यथोक्तविधिना नरः । नारी वा विधवा साध्वी वासुदेवं समर्चयेत्

kṛtvā māsopavāsaṁ tu yathoktavidhinā naraḥ nārī vā vidhavā sādhvī vāsudevaṁ samarcayet

यथोक्त विधि से मासोपवास करके — चाहे पुरुष हो, स्त्री हो अथवा सती विधवा हो — वासुदेव की भली-भाँति पूजा करे।

श्लोक 37 (padma.6.119.37)

अन्यूनाधिकमेवं तु व्रतं त्रिंशद्दिनैरिदम् । कृत्वा मासोपवासं तु संयतात्मा जितेंद्रियः

anyūnādhikamevaṁ tu vrataṁ triṁśaddinairidam kṛtvā māsopavāsaṁ tu saṁyatātmā jiteṁdriyaḥ

इस प्रकार न कम न अधिक, तीस दिनों में यह व्रत — मासोपवास — पूर्ण करके, संयमित मन तथा जितेंद्रिय होकर —

श्लोक 38 (padma.6.119.38)

ततोऽर्चयेदेव पुण्यं द्वादश्यां गरुडध्वजम् । पूजयेत्पुष्पमालाभिर्गंधधूपविलेपनैः

tato'rcayedeva puṇyaṁ dvādaśyāṁ garuḍadhvajam pūjayetpuṣpamālābhirgaṁdhadhūpavilepanaiḥ

— द्वादशी को गरुड़-ध्वज की पवित्र पूजा करे। पुष्प-मालाओं, गंध, धूप तथा उबटन से उनकी पूजा करे।

श्लोक 39 (padma.6.119.39)

वस्त्रालंकारवाद्यैश्च तोषयेदच्युतं नरः । संस्नापयेद्धरिं भक्त्या तीर्थचंदनवारिभिः

vastrālaṁkāravādyaiśca toṣayedacyutaṁ naraḥ saṁsnāpayeddhariṁ bhaktyā tīrthacaṁdanavāribhiḥ

वस्त्र, आभूषण और वाद्यों से मनुष्य अच्युत को संतुष्ट करे। भक्तिपूर्वक तीर्थ-जल तथा चंदन-मिश्रित जल से हरि को स्नान कराए।

श्लोक 40 (padma.6.119.40)

चंदनेनानुलिप्तांगं धूपपुष्पैरलंकृतम् । वस्त्रदानादिभिश्चैव भोजयित्वा द्विजोत्तमान्

caṁdanenānuliptāṁgaṁ dhūpapuṣpairalaṁkṛtam vastradānādibhiścaiva bhojayitvā dvijottamān

उनके शरीर पर चंदन लगाकर, धूप-पुष्पों से अलंकृत करके, वस्त्र-दान आदि से तथा श्रेष्ठ ब्राह्मणों को भोजन कराकर —

श्लोक 41 (padma.6.119.41)

दद्याच्च दक्षिणां तेभ्यः प्रणिपत्य क्षमापयेत् । एवं मासोपवासाद्धि कृत्वाभ्यर्च्य जनार्दनम्

dadyācca dakṣiṇāṁ tebhyaḥ praṇipatya kṣamāpayet evaṁ māsopavāsāddhi kṛtvābhyarcya janārdanam

— उन्हें दक्षिणा दे और प्रणाम करके क्षमा-याचना करे। इस प्रकार मासोपवास करके जनार्दन की पूजा करके,

श्लोक 42 (padma.6.119.42)

भोजयित्वा द्विजांश्चैव विष्णुलोके महीयते । एवं मासोपवासांते कृत्वा विप्रान्त्रयोदश

bhojayitvā dvijāṁścaiva viṣṇuloke mahīyate evaṁ māsopavāsāṁte kṛtvā viprāntrayodaśa

— तथा ब्राह्मणों को भोजन कराकर मनुष्य विष्णुलोक में महिमामंडित होता है। इस प्रकार मासोपवास के अंत में तेरह ब्राह्मणों को —

श्लोक 43 (padma.6.119.43)

निर्यापयेत्ततस्तान्वै विधिना येन तच्छृणु । कारयेद्वैष्णवं यज्ञमेकादश्यामुपोषितः

niryāpayettatastānvai vidhinā yena tacchṛṇu kārayedvaiṣṇavaṁ yajñamekādaśyāmupoṣitaḥ

— विधिपूर्वक विदा करना चाहिए, वह विधि सुनो। एकादशी को उपवास करके वैष्णव-यज्ञ करवाना चाहिए।

श्लोक 44 (padma.6.119.44)

पूजयित्वा तु देवेशमाचार्यानुज्ञया हरिम् । अर्चयित्वा यथाशक्त्या ह्यभिवाद्य गुरुं तथा

pūjayitvā tu deveśamācāryānujñayā harim arcayitvā yathāśaktyā hyabhivādya guruṁ tathā

आचार्य की आज्ञा से देवेश हरि की पूजा करके, यथाशक्ति उनकी अर्चा करके और गुरु को प्रणाम करके,

श्लोक 45 (padma.6.119.45)

ततोनुभोजयेद्विप्रान्नमस्कारपुरःसरम् । विशुद्धकुलचारित्र विष्णुपूजनतत्परान्

tatonubhojayedviprānnamaskārapuraḥsaram viśuddhakulacāritra viṣṇupūjanatatparān

— फिर विशुद्ध कुल-आचरण वाले, विष्णु-पूजन में तत्पर ब्राह्मणों को प्रणाम करके भोजन कराए।

श्लोक 46 (padma.6.119.46)

पूजयित्वा तथा सर्वान्भोजयित्वा त्रयोदश । तांबूलवस्त्रयुग्मानि भोजनाच्छादनानि च

pūjayitvā tathā sarvānbhojayitvā trayodaśa tāṁbūlavastrayugmāni bhojanācchādanāni ca

इस प्रकार सभी तेरह ब्राह्मणों की पूजा करके तथा उन्हें भोजन कराकर, पान और वस्त्र के जोड़े, भोजन तथा ओढ़ने के वस्त्र,

श्लोक 47 (padma.6.119.47)

योगपट्टानि सूत्राणि ब्रह्मसूत्राणि चैव हि । दद्याच्चैव द्विजाग्र्येभ्यः पूजयित्वा प्रणम्य च

yogapaṭṭāni sūtrāṇi brahmasūtrāṇi caiva hi dadyāccaiva dvijāgryebhyaḥ pūjayitvā praṇamya ca

— योगपट्ट, सूत्र तथा यज्ञोपवीत भी, पूजा करके तथा प्रणाम करके श्रेष्ठ ब्राह्मणों को देना चाहिए।

श्लोक 48 (padma.6.119.48)

ततोनुपूजयेच्छक्त्या शय्यां स्तरणसंस्कृताम् । साच्छादनां शुभां श्रेष्ठां सोपधानामलंकृताम्

tatonupūjayecchaktyā śayyāṁ staraṇasaṁskṛtām sācchādanāṁ śubhāṁ śreṣṭhāṁ sopadhānāmalaṁkṛtām

तत्पश्चात् यथाशक्ति बिछौने से सुसज्जित, ढकी हुई, शुभ, श्रेष्ठ, तकिए सहित सुसज्जित शय्या की भी पूजा करे।

श्लोक 49 (padma.6.119.49)

कारयित्वात्मनोमूर्तिं कांचनीं तु स्वशक्तितः । न्यसेत्तस्यां तु शय्यायामर्चयित्वा स्रगादिभिः

kārayitvātmanomūrtiṁ kāṁcanīṁ tu svaśaktitaḥ nyasettasyāṁ tu śayyāyāmarcayitvā sragādibhiḥ

यथाशक्ति अपनी स्वर्ण-मूर्ति बनवाकर, माला आदि से उसकी पूजा करके, उसे उस शय्या पर स्थापित करे।

श्लोक 50 (padma.6.119.50)

आसनं पादुकां छत्रं वस्त्रयुग्ममुपानहौ । पवित्राणि च पुष्पाणि शयाय्यामुपकल्पयेत्

āsanaṁ pādukāṁ chatraṁ vastrayugmamupānahau pavitrāṇi ca puṣpāṇi śayāyyāmupakalpayet

आसन, खड़ाऊँ, छत्र, वस्त्र का जोड़ा, जूते तथा पवित्र कुश और पुष्प भी उस शय्या पर सजाए।

श्लोक 51 (padma.6.119.51)

एवं शय्यां तु संकल्प्य प्रणिपत्य च तान्द्विजान् । प्रार्थयेच्चानुमोदार्थं विष्णुलोकं व्रजाम्यहम्

evaṁ śayyāṁ tu saṁkalpya praṇipatya ca tāndvijān prārthayeccānumodārthaṁ viṣṇulokaṁ vrajāmyaham

इस प्रकार शय्या का संकल्प करके तथा उन ब्राह्मणों को प्रणाम करके, उनकी अनुमति के लिए यह प्रार्थना करे — "मैं विष्णुलोक जाता हूँ।"

श्लोक 52 (padma.6.119.52)

ततो व्रजेन्नरश्रेष्ठो विष्णोः स्थानमनामयम् । मंडपस्थां स्तुतान्विप्रानिति वाच्यं मुहुर्मुहुः

tato vrajennaraśreṣṭho viṣṇoḥ sthānamanāmayam maṁḍapasthāṁ stutānviprāniti vācyaṁ muhurmuhuḥ

तब मंडप में बैठे स्तुत ब्राह्मणों को बार-बार यही कहना चाहिए — "यह श्रेष्ठ पुरुष अब विष्णु के निर्दोष धाम को जाए।"

श्लोक 53 (padma.6.119.53)

मंत्रहीनं क्रियाहीनं सर्वहीनं द्विजोत्तमाः । सर्वंसंपूर्णतां यातु भवद्वाक्यप्रसादतः । विधिर्मासोपवासस्य यथावत्परिकीर्तितः

maṁtrahīnaṁ kriyāhīnaṁ sarvahīnaṁ dvijottamāḥ sarvaṁsaṁpūrṇatāṁ yātu bhavadvākyaprasādataḥ vidhirmāsopavāsasya yathāvatparikīrtitaḥ

हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! जो कुछ मंत्र-हीन, क्रिया-हीन अथवा सर्वथा अपूर्ण रह गया हो, वह सब आपके वचन की कृपा से पूर्णता को प्राप्त हो। इस प्रकार मासोपवास की विधि यथावत् वर्णित हुई।

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