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उत्तर खण्ड · अध्याय 120

शालग्राम-शिला की महिमा

अध्याय 119अध्याय-सूचीअध्याय 121

श्लोक 1 (padma.6.120.1)

सूत उवाच। इति वाक्यं समाकर्ण्य पुनः पप्रच्छ पावकिः । शालग्रामार्चनं भूयस्तच्छृणुध्वं तपोधनाः

sūta uvāca iti vākyaṁ samākarṇya punaḥ papraccha pāvakiḥ śālagrāmārcanaṁ bhūyastacchṛṇudhvaṁ tapodhanāḥ

सूत ने कहा — यह वचन सुनकर अग्नि-पुत्र (कार्तिकेय) ने पुनः शालग्राम-अर्चन के विषय में पूछा; हे तपोधनो! उसे सुनिए।

श्लोक 2 (padma.6.120.2)

कार्तिकेय उवाच। भगवन्योगिनां श्रेष्ठ सर्वेधर्माः श्रुता मया । शालग्रामार्चनं ब्रूहि विस्तरेण मम प्रभो

kārtikeya uvāca bhagavanyogināṁ śreṣṭha sarvedharmāḥ śrutā mayā śālagrāmārcanaṁ brūhi vistareṇa mama prabho

कार्तिकेय ने कहा — हे योगियों में श्रेष्ठ भगवन्! मैंने समस्त धर्म सुन लिए। अब हे प्रभो! मुझे शालग्राम-अर्चन विस्तार से बताइए।

श्लोक 3 (padma.6.120.3)

ईश्वर उवाच। साधुसाधु महाप्राज्ञ यन्मां हि परिपृच्छसि । तदहं संप्रवक्ष्यामि श्रूयतां मम वत्सल

īśvara uvāca sādhusādhu mahāprājña yanmāṁ hi paripṛcchasi tadahaṁ saṁpravakṣyāmi śrūyatāṁ mama vatsala

ईश्वर ने कहा — हे महाप्राज्ञ! बहुत अच्छा, बहुत अच्छा, कि तुमने मुझसे यह पूछा। मैं वह बताता हूँ, हे वत्सल! सुनो।

श्लोक 4 (padma.6.120.4)

शालग्रामशिलायां तु त्रैलोक्यं सचराचरम् । महाशय महासेन नित्यं तिष्ठति संहितम्

śālagrāmaśilāyāṁ tu trailokyaṁ sacarācaram mahāśaya mahāsena nityaṁ tiṣṭhati saṁhitam

हे महाशय! हे महासेन! शालग्राम-शिला में चराचर सहित त्रैलोक्य सदा एक साथ स्थित रहता है।

श्लोक 5 (padma.6.120.5)

दृष्टं प्रणमितं येन स्नापितं पूजितं तथा । यज्ञकोटिगुणं पुण्यं गवां कोटिफलं लभेत्

dṛṣṭaṁ praṇamitaṁ yena snāpitaṁ pūjitaṁ tathā yajñakoṭiguṇaṁ puṇyaṁ gavāṁ koṭiphalaṁ labhet

जिसने इसका दर्शन, प्रणाम, स्नपन तथा पूजन किया, उसे करोड़ों यज्ञों के समान पुण्य तथा करोड़ों गौ-दान का फल प्राप्त होता है।

श्लोक 6 (padma.6.120.6)

छिन्नस्तेन तथा वत्स गर्भवासः सुदारुणः । पीतं येन सदा विष्णोः शालग्रामशिलाजलम्

chinnastena tathā vatsa garbhavāsaḥ sudāruṇaḥ pītaṁ yena sadā viṣṇoḥ śālagrāmaśilājalam

हे वत्स! जिसने सदा विष्णु के शालग्राम-शिला का जल पिया है, उसका अत्यंत भयंकर गर्भवास कट जाता है।

श्लोक 7 (padma.6.120.7)

कामासक्तोऽपि यो नित्यं भक्तिभावविवर्जितः । शालग्रामशिला पुत्र पूजयित्वाच्युतो भवेत्

kāmāsakto'pi yo nityaṁ bhaktibhāvavivarjitaḥ śālagrāmaśilā putra pūjayitvācyuto bhavet

हे पुत्र! जो सदा काम में आसक्त और भक्ति-भाव से रहित भी हो, वह भी शालग्राम-शिला की पूजा करके अच्युत हो जाता है।

श्लोक 8 (padma.6.120.8)

शालग्रामशिला बिंबं हत्वा कोटिविनाशनम् । स्मृतं संकीर्तितं ध्यातं पूजितं च नमस्कृतम्

śālagrāmaśilā biṁbaṁ hatvā koṭivināśanam smṛtaṁ saṁkīrtitaṁ dhyātaṁ pūjitaṁ ca namaskṛtam

स्मरण किया गया, संकीर्तित, ध्यान किया गया, पूजित तथा नमस्कृत शालग्राम-शिला का बिंब करोड़ों पापों का नाश करता है।

श्लोक 9 (padma.6.120.9)

शालग्रामशिलां दृष्ट्वा यांति पापान्यनेकशः । सिंहं दृष्ट्वा यथा यांति वने मृगगणा भयात्

śālagrāmaśilāṁ dṛṣṭvā yāṁti pāpānyanekaśaḥ siṁhaṁ dṛṣṭvā yathā yāṁti vane mṛgagaṇā bhayāt

शालग्राम-शिला को देखकर अनेक पाप वैसे ही भाग जाते हैं जैसे वन में सिंह को देखकर मृग-समूह भय से भाग जाते हैं।

श्लोक 10 (padma.6.120.10)

नमस्कारं तु मनुजः शालग्रामशिलार्चने । भक्त्या वा यदि वाऽभक्त्या कृत्वा मुक्तिमवाप्नुयात्

namaskāraṁ tu manujaḥ śālagrāmaśilārcane bhaktyā vā yadi vā'bhaktyā kṛtvā muktimavāpnuyāt

शालग्राम-शिला की पूजा में जो मनुष्य नमस्कार करता है — चाहे भक्ति से हो या बिना भक्ति के — वह मुक्ति प्राप्त करता है।

श्लोक 11 (padma.6.120.11)

वैवस्वतभयं नास्ति तथा मरणजन्मनोः । यः करोति नरो नित्यं शालग्रामशिलार्चनम्

vaivasvatabhayaṁ nāsti tathā maraṇajanmanoḥ yaḥ karoti naro nityaṁ śālagrāmaśilārcanam

जो मनुष्य नित्य शालग्राम-शिला की पूजा करता है, उसे न वैवस्वत (यम) का भय होता है और न मृत्यु-जन्म का।

श्लोक 12 (padma.6.120.12)

गंधपाद्यार्घनैवेद्यैर्दीपैर्धूपैर्विलेपनैः । गीतैर्वाद्यैस्तथा स्तोत्रैः शालग्रामशिलार्चनम्

gaṁdhapādyārghanaivedyairdīpairdhūpairvilepanaiḥ gītairvādyaistathā stotraiḥ śālagrāmaśilārcanam

गंध, पाद्य, अर्घ्य, नैवेद्य, दीप, धूप, उबटन, गीत, वाद्य तथा स्तोत्रों से शालग्राम-शिला की अर्चना —

श्लोक 13 (padma.6.120.13)

कुरुते मानवो यस्तु कलौ भक्तिपरायणः । कल्पकोटिसहस्राणि रमते विष्णुसद्मनि

kurute mānavo yastu kalau bhaktiparāyaṇaḥ kalpakoṭisahasrāṇi ramate viṣṇusadmani

— कलियुग में जो भक्तिपरायण मनुष्य करता है, वह हज़ारों करोड़ों कल्पों तक विष्णु-धाम में रमण करता है।

श्लोक 14 (padma.6.120.14)

शालग्रामनमस्कारो भावेनापि नरैः कृतः । मानुषत्वं कथं तेषां मद्भक्ता ये नरा भुवि

śālagrāmanamaskāro bhāvenāpi naraiḥ kṛtaḥ mānuṣatvaṁ kathaṁ teṣāṁ madbhaktā ye narā bhuvi

मात्र भाव से भी शालग्राम को किया गया नमस्कार — मेरे वे भक्त मनुष्य जो पृथ्वी पर हैं, वे केवल मनुष्यत्व में कैसे रह सकते हैं?

श्लोक 15 (padma.6.120.15)

मद्भक्तास्तीव्रपापिष्ठा मत्प्रभुं न नमंति ये । वासुदेवं न ते ज्ञेया मद्भक्ताः पापमोहिताः

madbhaktāstīvrapāpiṣṭhā matprabhuṁ na namaṁti ye vāsudevaṁ na te jñeyā madbhaktāḥ pāpamohitāḥ

किंतु जो मेरे भक्त होकर भी अत्यंत पापी हैं और मुझ प्रभु को नमस्कार नहीं करते, वे मोहित पापी वासुदेव के सच्चे भक्त नहीं जाने जाने चाहिए।

श्लोक 16 (padma.6.120.16)

मद्भक्तोऽपि च यो भूत्वा भुंक्ते त्वेकादशीदिने । स याति ह्यंधतामिस्रे निरयं मम घातकः

madbhakto'pi ca yo bhūtvā bhuṁkte tvekādaśīdine sa yāti hyaṁdhatāmisre nirayaṁ mama ghātakaḥ

जो मेरा भक्त होकर भी एकादशी के दिन भोजन करता है, वह मेरा हत्यारा होकर अंधतामिस्र नरक में जाता है।

श्लोक 17 (padma.6.120.17)

मल्लिंगस्पर्शनं कार्यं नान्या शुद्धिर्विधीयते । या तिथिर्दयिता विष्णोः सा तिथिर्मम वल्लभा

malliṁgasparśanaṁ kāryaṁ nānyā śuddhirvidhīyate yā tithirdayitā viṣṇoḥ sā tithirmama vallabhā

इसके प्रायश्चित हेतु मेरे लिंग का स्पर्श करना चाहिए, अन्य कोई शुद्धि नहीं बताई गई है। जो तिथि विष्णु को प्रिय है, वही तिथि मुझे भी प्रिय है।

श्लोक 18 (padma.6.120.18)

यस्तां नोपवसेन्मर्त्यः स पापी श्वपचाधिकः । शालग्रामशिलायां तु सदा पुत्र वसाम्यहम्

yastāṁ nopavasenmartyaḥ sa pāpī śvapacādhikaḥ śālagrāmaśilāyāṁ tu sadā putra vasāmyaham

जो मनुष्य उस तिथि को उपवास नहीं करता, वह श्वपच (चांडाल) से भी बढ़कर पापी है। हे पुत्र! मैं स्वयं सदा शालग्राम-शिला में निवास करता हूँ।

श्लोक 19 (padma.6.120.19)

दत्तं देवेन तुष्टेन स्वस्थानं मम भक्तितः । पद्मकोटिसहस्रैस्तु पूजिते मयि यत्फलम्

dattaṁ devena tuṣṭena svasthānaṁ mama bhaktitaḥ padmakoṭisahasraistu pūjite mayi yatphalam

यह मेरा स्थान संतुष्ट देवता (विष्णु) ने भक्तिवश मुझे दिया है। हज़ारों करोड़ कमलों से मेरी पूजा करने पर जो फल मिलता है,

श्लोक 20 (padma.6.120.20)

तत्फलं कोटिगुणितं शालग्रामशिलार्चनात् । पूजितोऽहं न तैर्मर्त्यैर्नमितोऽहं न तैर्नरैः

tatphalaṁ koṭiguṇitaṁ śālagrāmaśilārcanāt pūjito'haṁ na tairmartyairnamito'haṁ na tairnaraiḥ

— वह फल शालग्राम-शिला की अर्चना से करोड़ गुना हो जाता है। जिन मनुष्यों ने शालग्राम-शिला की पूजा नहीं की, उनके द्वारा —

श्लोक 21 (padma.6.120.21)

न कृतं मर्त्यलोके यैः शालग्रामशिलार्चनम् । शालग्रामशिलाग्रे तु यः करोति ममार्चनम्

na kṛtaṁ martyaloke yaiḥ śālagrāmaśilārcanam śālagrāmaśilāgre tu yaḥ karoti mamārcanam

— मृत्युलोक में न तो मेरी पूजा की गई मानी जाती है और न प्रणाम। किंतु जो शालग्राम-शिला के सामने मेरी पूजा करता है,

श्लोक 22 (padma.6.120.22)

तेनार्चितोऽहं सेनानीर्युगानामेकविंशतिम् । किमर्चितैर्लिंगशतैर्विष्णुभक्तिविवर्जितैः

tenārcito'haṁ senānīryugānāmekaviṁśatim kimarcitairliṁgaśatairviṣṇubhaktivivarjitaiḥ

— हे सेनानी! उससे मैं इक्कीस युगों तक पूजित होता हूँ। विष्णु-भक्ति से रहित सैकड़ों लिंगों की पूजा से क्या लाभ?

श्लोक 23 (padma.6.120.23)

शालग्रामशिलाबिंबं नार्चितं यदि पुत्रक । अनर्हं मम नैवेद्यं पत्रं पुष्पं फलं जलम्

śālagrāmaśilābiṁbaṁ nārcitaṁ yadi putraka anarhaṁ mama naivedyaṁ patraṁ puṣpaṁ phalaṁ jalam

हे पुत्रक! यदि शालग्राम-शिला के बिंब की पूजा नहीं हुई, तो अन्यत्र अर्पित पत्र, पुष्प, फल तथा जल मेरे लिए अस्वीकार्य नैवेद्य है।

श्लोक 24 (padma.6.120.24)

शालग्रामशिलाग्रे तु सर्वं याति पवित्रताम् । भुक्त्वान्यदेवनैवेद्यं द्विजश्चांद्रायणं चरेत्

śālagrāmaśilāgre tu sarvaṁ yāti pavitratām bhuktvānyadevanaivedyaṁ dvijaścāṁdrāyaṇaṁ caret

किंतु शालग्राम-शिला के सामने सब कुछ पवित्रता को प्राप्त हो जाता है। जो द्विज अन्य देवता का नैवेद्य पहले खाकर (शालग्राम को न चढ़ाए), उसे चांद्रायण व्रत करना चाहिए।

श्लोक 25 (padma.6.120.25)

भुक्त्वा केशवनैवेद्यं यज्ञकोटिफलं लभेत् । पादोदकेन देवस्य हत्याकोटिसमन्विताः

bhuktvā keśavanaivedyaṁ yajñakoṭiphalaṁ labhet pādodakena devasya hatyākoṭisamanvitāḥ

केशव का नैवेद्य खाकर करोड़ों यज्ञों का फल प्राप्त होता है। देव के चरणोदक से करोड़ों हत्याओं के समान पापी भी —

श्लोक 26 (padma.6.120.26)

शुद्ध्यंति नात्र संदेहस्तथा शंखोदकेन हि । यो हि माहेश्वरो भूत्वा वैष्णवं च न पूजयेत्

śuddhyaṁti nātra saṁdehastathā śaṁkhodakena hi yo hi māheśvaro bhūtvā vaiṣṇavaṁ ca na pūjayet

— शुद्ध हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं, तथा शंख के जल से भी। जो शैव होकर भी वैष्णव का सम्मान नहीं करता,

श्लोक 27 (padma.6.120.27)

द्वेष्टा च याति नरकं यावदिंद्राश्चतुर्दश । ज्येष्ठाश्रमी गृहे यस्य मुहूर्त्तमपि विश्रमेत्

dveṣṭā ca yāti narakaṁ yāvadiṁdrāścaturdaśa jyeṣṭhāśramī gṛhe yasya muhūrttamapi viśramet

— और द्वेष करता है, वह चौदह इंद्रों के काल तक नरक जाता है। जिसके घर में कोई ज्येष्ठ आश्रमी (वैष्णव संन्यासी) एक क्षणभर भी विश्राम करे,

श्लोक 28 (padma.6.120.28)

पितामहा युगान्यष्टौ भवत्यमृतभोजिनः । संसारे दुःखकांतारे निमज्ज्यंते नराधमाः

pitāmahā yugānyaṣṭau bhavatyamṛtabhojinaḥ saṁsāre duḥkhakāṁtāre nimajjyaṁte narādhamāḥ

— उसके पितर आठ युगों तक अमृत-भोजी हो जाते हैं। कृष्ण-आराधना से रहित नराधम इस संसार के दुःख-कांतार में डूबते हैं —

श्लोक 29 (padma.6.120.29)

वर्षकोटिसहस्राणि कृष्णाराधनवर्जिताः । स्नेहादभ्यर्चितैर्लिंगैः शालग्रामसमुद्भवैः

varṣakoṭisahasrāṇi kṛṣṇārādhanavarjitāḥ snehādabhyarcitairliṁgaiḥ śālagrāmasamudbhavaiḥ

— हज़ारों करोड़ों वर्षों तक। किंतु प्रेमपूर्वक पूजित, शालग्राम से उत्पन्न लिंगों से —

श्लोक 30 (padma.6.120.30)

मुक्तिं प्रयांति मनुजा योगसांख्येन वर्जिताः । मल्लिंगकोटिभिर्दृष्टैर्यत्फलं पूजितैः स्तुतैः

muktiṁ prayāṁti manujā yogasāṁkhyena varjitāḥ malliṁgakoṭibhirdṛṣṭairyatphalaṁ pūjitaiḥ stutaiḥ

— मनुष्य योग-सांख्य के बिना ही मुक्ति प्राप्त कर लेते हैं। करोड़ों मेरे लिंगों के दर्शन, पूजन और स्तवन से जो फल मिलता है,

श्लोक 31 (padma.6.120.31)

शालग्रामशिलायां तु एकस्यामिह तद्भवेत् । द्वादशैव शिला यो वै शालग्रामसमुद्भवाः

śālagrāmaśilāyāṁ tu ekasyāmiha tadbhavet dvādaśaiva śilā yo vai śālagrāmasamudbhavāḥ

— वही फल यहाँ एक ही शालग्राम-शिला से प्राप्त हो जाता है। शालग्राम से उत्पन्न जो बारह शिलाएँ हैं,

श्लोक 32 (padma.6.120.32)

अर्चयेद्वैष्णवो नित्यं तस्य पुण्यं न बोध मे । कोटिलिंगसहस्रैस्तु पूजितैर्जाह्नवी तटे

arcayedvaiṣṇavo nityaṁ tasya puṇyaṁ na bodha me koṭiliṁgasahasraistu pūjitairjāhnavī taṭe

— उनकी नित्य पूजा करने वाले वैष्णव का पुण्य मुझे भी ज्ञात नहीं है। गंगा-तट पर हज़ारों करोड़ लिंगों की पूजा से जो प्राप्त होता है,

श्लोक 33 (padma.6.120.33)

काशीवासे युगान्यष्टौ दिनेनैकेन तद्भवेत् । किं पुनर्बहुना यस्तु पूजयेद्वैष्णवो नरः

kāśīvāse yugānyaṣṭau dinenaikena tadbhavet kiṁ punarbahunā yastu pūjayedvaiṣṇavo naraḥ

— तथा काशी में आठ युगों तक निवास करने से जो प्राप्त होता है, वही एक ही दिन में मिल जाता है। फिर अधिक कहने से क्या, जो वैष्णव मनुष्य पूजा करता है —

श्लोक 34 (padma.6.120.34)

नाहं ब्रह्मादयो देवाः संख्यां कर्तुं समीहते । तस्माद्भक्त्या च मद्भक्तैः प्रीत्यर्थं मम पुत्रक

nāhaṁ brahmādayo devāḥ saṁkhyāṁ kartuṁ samīhate tasmādbhaktyā ca madbhaktaiḥ prītyarthaṁ mama putraka

— उसकी गणना करने में न मैं और न ब्रह्मादि देवता समर्थ हैं। इसलिए हे पुत्रक! मेरी प्रसन्नता के लिए मेरे भक्तों द्वारा भक्तिपूर्वक —

श्लोक 35 (padma.6.120.35)

कर्त्तव्यं मम तद्भक्त्या शालग्रामशिलार्च्चनम् । शालग्रामशिलारूपी यत्र तिष्ठति केशवः

karttavyaṁ mama tadbhaktyā śālagrāmaśilārccanam śālagrāmaśilārūpī yatra tiṣṭhati keśavaḥ

— शालग्राम-शिला की पूजा अवश्य करनी चाहिए। जहाँ केशव शालग्राम-शिला-रूप में स्थित हैं,

श्लोक 36 (padma.6.120.36)

तत्र देवासुरा यक्षा भुवनानि चतुर्दश

tatra devāsurā yakṣā bhuvanāni caturdaśa

— वहाँ देवता, असुर, यक्ष तथा चौदहों भुवन उपस्थित रहते हैं।

श्लोक 37 (padma.6.120.37)

सुराणां कीर्तनैः सर्वैः कोटिभिश्च फलं लभेत् । तत्फलं कीर्त्तनादेव केशवे सुकृतं कलौ

surāṇāṁ kīrtanaiḥ sarvaiḥ koṭibhiśca phalaṁ labhet tatphalaṁ kīrttanādeva keśave sukṛtaṁ kalau

समस्त देवताओं के करोड़ों कीर्तनों से जो फल मिलता है, वही फल कलियुग में केवल केशव के कीर्तन से पुण्यरूप में प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 38 (padma.6.120.38)

शालग्रामशिलाग्रे तु सकृत्पिंडेन तर्पिताः । वसंति पितरस्तस्य न संख्या तत्र विद्यते

śālagrāmaśilāgre tu sakṛtpiṁḍena tarpitāḥ vasaṁti pitarastasya na saṁkhyā tatra vidyate

शालग्राम-शिला के सामने एक बार पिंड-दान से तृप्त हुए पितर उसकी अगणित अवधि तक निवास करते हैं।

श्लोक 39 (padma.6.120.39)

ये पिबंति नरा भक्त्या शालग्रामशिलाजलम् । पंचगव्यसहस्रैस्तु प्राशितैः किं प्रयोजनम्

ye pibaṁti narā bhaktyā śālagrāmaśilājalam paṁcagavyasahasraistu prāśitaiḥ kiṁ prayojanam

जो मनुष्य भक्तिपूर्वक शालग्राम-शिला का जल पीते हैं, उनके लिए हज़ारों पंचगव्य पीने से क्या प्रयोजन?

श्लोक 40 (padma.6.120.40)

प्रायश्चित्ते समुत्पन्ने किं दानैः किमुपोषणैः । चांद्रायणैः सुचीर्णैश्च पीत्वा पादोदकं हरेः

prāyaścitte samutpanne kiṁ dānaiḥ kimupoṣaṇaiḥ cāṁdrāyaṇaiḥ sucīrṇaiśca pītvā pādodakaṁ hareḥ

प्रायश्चित की आवश्यकता होने पर, हरि के चरणोदक का पान करने वाले को दान, उपवास तथा सुसंपन्न चांद्रायण व्रतों से क्या लाभ?

श्लोक 41 (padma.6.120.41)

यः करोति तडागे तु प्रतिमां जलशायिनीम् । कोटिभिश्चापि किं कार्यमन्यदेवैश्च पूजितैः

yaḥ karoti taḍāge tu pratimāṁ jalaśāyinīm koṭibhiścāpi kiṁ kāryamanyadevaiśca pūjitaiḥ

जो तालाब में जल में शयन करने वाली प्रतिमा (शालग्राम) की पूजा करता है, उसे अन्य करोड़ों देवताओं की पूजा से क्या प्रयोजन?

श्लोक 42 (padma.6.120.42)

विष्णुमुख्यास्तु वै देवास्तत्र जल्पंति वै सह । प्रमाणमस्ति सर्वस्य सुकृतस्य हि पुत्रक

viṣṇumukhyāstu vai devāstatra jalpaṁti vai saha pramāṇamasti sarvasya sukṛtasya hi putraka

वहाँ विष्णु-प्रधान देवगण स्वयं परस्पर वार्तालाप करते हैं। हे पुत्रक! अन्य समस्त पुण्य-कर्मों का एक निश्चित प्रमाण है,

श्लोक 43 (padma.6.120.43)

फलप्रमाणं नैवास्तिशालग्रामशिलार्चन । यो ददाति शिलां विष्णोः शालग्रामसमुद्भवाम्

phalapramāṇaṁ naivāstiśālagrāmaśilārcana yo dadāti śilāṁ viṣṇoḥ śālagrāmasamudbhavām

— किंतु शालग्राम-शिला-अर्चन के फल का कोई प्रमाण ही नहीं है। जो शालग्राम से उत्पन्न विष्णु की शिला —

श्लोक 44 (padma.6.120.44)

विप्राय विष्णुभक्ताय तेनेष्टं क्रतुभिः शतैः । गृहेऽपि वसतस्तस्य गंगास्नानं दिनेदिने

viprāya viṣṇubhaktāya teneṣṭaṁ kratubhiḥ śataiḥ gṛhe'pi vasatastasya gaṁgāsnānaṁ dinedine

— विष्णु-भक्त ब्राह्मण को देता है, उसने सैकड़ों यज्ञों से इष्ट किया है। घर में रहते हुए भी उसे प्रतिदिन गंगा-स्नान का फल मिलता है।

श्लोक 45 (padma.6.120.45)

स स्नातः सर्वतीर्थेषु सर्वयज्ञेषु दीक्षितः । शालग्रामशिलातोयैरभिषेकं समाचरेत्

sa snātaḥ sarvatīrtheṣu sarvayajñeṣu dīkṣitaḥ śālagrāmaśilātoyairabhiṣekaṁ samācaret

जो शालग्राम-शिला के जल से अभिषेक करता है, वह समस्त तीर्थों में स्नात तथा समस्त यज्ञों में दीक्षित माना जाता है।

श्लोक 46 (padma.6.120.46)

स्वर्गे मर्त्ये च पाताले पाषाणाः संति वै गुह । शालग्रामशिला ग्राव्णा नास्ति नास्ति समा पुनः

svarge martye ca pātāle pāṣāṇāḥ saṁti vai guha śālagrāmaśilā grāvṇā nāsti nāsti samā punaḥ

हे गुह! स्वर्ग, मृत्युलोक तथा पाताल में अनेक पाषाण हैं, किंतु शालग्राम-शिला जैसे पत्थर के समान कोई नहीं, कोई नहीं है।

श्लोक 47 (padma.6.120.47)

मानुषे दुर्ल्लभे लोके सफलं तस्य जीवितम् । तिलप्रस्थशतं भक्त्या यो ददाति दिनेदिने

mānuṣe durllabhe loke saphalaṁ tasya jīvitam tilaprasthaśataṁ bhaktyā yo dadāti dinedine

इस दुर्लभ मनुष्य-लोक में उसी का जीवन सफल है। जो प्रतिदिन भक्तिपूर्वक सौ प्रस्थ तिल का दान करता है,

श्लोक 48 (padma.6.120.48)

तत्फलं समवाप्नोति शालग्रामशिलार्चनात् । पत्रं पुष्पं फलं तोयं मूलं दूर्वादलं तथा

tatphalaṁ samavāpnoti śālagrāmaśilārcanāt patraṁ puṣpaṁ phalaṁ toyaṁ mūlaṁ dūrvādalaṁ tathā

— वही फल शालग्राम-शिला की पूजा से प्राप्त हो जाता है। पत्र, पुष्प, फल, जल, मूल तथा दूर्वादल —

श्लोक 49 (padma.6.120.49)

जायते मेरुणा तुल्यं शालग्रामे समर्पितम् । विधिहीनोऽपि यः कश्चित्क्रियामंत्रविवर्जितः

jāyate meruṇā tulyaṁ śālagrāme samarpitam vidhihīno'pi yaḥ kaścitkriyāmaṁtravivarjitaḥ

— जब शालग्राम को अर्पित होते हैं, तो वे मेरु-पर्वत के समान बन जाते हैं। विधि-रहित तथा क्रिया-मंत्र से भी रहित कोई भी —

श्लोक 50 (padma.6.120.50)

चक्रांकभुज आप्नोति सम्यक्शास्त्रोदितं फलम् । यत्तु पूर्वं मया दृष्टं केशवे क्लेशनाशनम्

cakrāṁkabhuja āpnoti samyakśāstroditaṁ phalam yattu pūrvaṁ mayā dṛṣṭaṁ keśave kleśanāśanam

— यदि चक्रांकित शिला की भुजा प्राप्त कर ले, तो वह शास्त्र-वर्णित सम्पूर्ण फल पाता है। मैंने केशव में पहले जो देखा था, वह क्लेश-नाशक ज्ञान,

श्लोक 51 (padma.6.120.51)

तत्सर्वं कथयिष्यामि तव स्नेहेन पुत्रक । क्व त्वं वससि हे विष्णो किमाधारः किमाश्रयः

tatsarvaṁ kathayiṣyāmi tava snehena putraka kva tvaṁ vasasi he viṣṇo kimādhāraḥ kimāśrayaḥ

— वह सब मैं तुम्हें प्रेमपूर्वक बताऊँगा, हे पुत्रक! [मैंने पूछा:] "हे विष्णो! आप कहाँ निवास करते हैं? आपका आधार क्या है, आश्रय क्या है?

श्लोक 52 (padma.6.120.52)

कथं वा प्रीयसे देव तत्सर्वं कथयस्व मे । श्रीकृष्ण उवाच। निवसामि सदा शंभो शालग्रामोद्भवेऽश्मनि

kathaṁ vā prīyase deva tatsarvaṁ kathayasva me śrīkṛṣṇa uvāca nivasāmi sadā śaṁbho śālagrāmodbhave'śmani

तथा हे देव! आप किससे प्रसन्न होते हैं? यह सब मुझे बताइए।" श्रीकृष्ण ने कहा — [विष्णु ने उत्तर दिया:] "हे शंभो! मैं सदा शालग्राम से उत्पन्न पाषाण में निवास करता हूँ।

श्लोक 53 (padma.6.120.53)

तत्रैव रथचक्रांके यानि नामानि मे शृणु । द्वारदेशे समे चक्रे दृश्येते नांतरं यदि । वासुदेवः स विज्ञेयः शुक्लश्चैवातिशोभनः

tatraiva rathacakrāṁke yāni nāmāni me śṛṇu dvāradeśe same cakre dṛśyete nāṁtaraṁ yadi vāsudevaḥ sa vijñeyaḥ śuklaścaivātiśobhanaḥ

वहीं रथ-चक्र के चिह्न से युक्त मेरे जो नाम हैं, उन्हें सुनो। यदि द्वार-भाग में समान चक्र बिना किसी अंतर के दिखाई दें, तो वह वासुदेव-रूप जानना चाहिए, जो श्वेत तथा अत्यंत सुंदर है।

श्लोक 54 (padma.6.120.54)

प्रद्युम्नः सूर्यवक्त्रस्तु नीलदीप्तिस्तथैव च । सुषिरं च्छिद्रबहुलं दीर्घाकारं तु तद्भवेत्

pradyumnaḥ sūryavaktrastu nīladīptistathaiva ca suṣiraṁ cchidrabahulaṁ dīrghākāraṁ tu tadbhavet

प्रद्युम्न-रूप सूर्य के समान मुख वाला तथा नील-कांति वाला होता है; वह खोखला, अनेक छिद्रों वाला तथा लंबे आकार का होता है।

श्लोक 55 (padma.6.120.55)

अनिरुद्धस्तु पीताभो वर्त्तुलश्चातिशोभनः । रेखात्रयांकितो द्वारि दृष्टपद्मेन चिह्नवत्

aniruddhastu pītābho varttulaścātiśobhanaḥ rekhātrayāṁkito dvāri dṛṣṭapadmena cihnavat

अनिरुद्ध-रूप पीली आभा वाला, गोल तथा अत्यंत सुंदर होता है, द्वार पर तीन रेखाओं से अंकित तथा कमल-चिह्न से युक्त होता है।

श्लोक 56 (padma.6.120.56)

श्यामो नारायणो देवो नाभिचक्रे तथोन्नते । दीर्घ रेषा समोपेतो दक्षिणे सुषिरान्वितः

śyāmo nārāyaṇo devo nābhicakre tathonnate dīrgha reṣā samopeto dakṣiṇe suṣirānvitaḥ

नारायण देव श्याम-वर्ण के होते हैं, नाभि में चक्र उन्नत होता है, लंबी समान रेखा से युक्त तथा दाहिनी ओर छिद्र-सहित होता है।

श्लोक 57 (padma.6.120.57)

ऊर्ध्वंमुखं च जानीयात्सुंदरं हरिरूपिणम् । कामदं मोक्षदं चैव अर्थदं च विशेषतः

ūrdhvaṁmukhaṁ ca jānīyātsuṁdaraṁ harirūpiṇam kāmadaṁ mokṣadaṁ caiva arthadaṁ ca viśeṣataḥ

इसका मुख ऊपर की ओर जानना चाहिए, यह सुंदर तथा हरि-रूप है — विशेष रूप से काम, मोक्ष तथा अर्थ देने वाला है।

श्लोक 58 (padma.6.120.58)

परमेष्ठी च शुक्लाभः पद्मचक्रसमन्वितः । बिंबाकृतिस्तथा पृष्ठे सुषिरं चातिपुष्कलम्

parameṣṭhī ca śuklābhaḥ padmacakrasamanvitaḥ biṁbākṛtistathā pṛṣṭhe suṣiraṁ cātipuṣkalam

परमेष्ठी-रूप श्वेत आभा वाला, कमल और चक्र से युक्त होता है, पीठ पर बिंब के आकार तथा अत्यंत विस्तृत छिद्र वाला होता है।

श्लोक 59 (padma.6.120.59)

कृष्णवर्णस्तथा विष्णुर्मूले चक्रे सुशोभने । द्वारोपरि तथा रेखा लक्ष्यते मध्यदेशतः

kṛṣṇavarṇastathā viṣṇurmūle cakre suśobhane dvāropari tathā rekhā lakṣyate madhyadeśataḥ

विष्णु-रूप श्याम-वर्ण का होता है, मूल में सुंदर चक्र होता है, तथा द्वार के ऊपर मध्य भाग से एक रेखा दिखाई देती है।

श्लोक 60 (padma.6.120.60)

कपिलो नरसिंहश्च पृथुचक्रः सुशोभितः । ब्रह्मचर्येण पूज्योसावन्यथा विघ्नदो भवेत्

kapilo narasiṁhaśca pṛthucakraḥ suśobhitaḥ brahmacaryeṇa pūjyosāvanyathā vighnado bhavet

नरसिंह-रूप पिंगल वर्ण का, विस्तृत चक्र से सुशोभित होता है; इसकी पूजा ब्रह्मचर्य से ही करनी चाहिए, अन्यथा यह विघ्नकारी हो जाता है।

श्लोक 61 (padma.6.120.61)

वाराहः शक्तिलिंगस्तु चक्रे च विषमे स्मृते । इंद्र नीलनिभः स्थूलस्त्रिरेखो नाभितः शुभः

vārāhaḥ śaktiliṁgastu cakre ca viṣame smṛte iṁdra nīlanibhaḥ sthūlastrirekho nābhitaḥ śubhaḥ

वराह-रूप शक्ति-लिंग-चिह्न वाला, असमान चक्र से पहचाना जाता है; यह इंद्रनील मणि के समान नीला, स्थूल, तीन रेखाओं से युक्त तथा नाभि से शुभ होता है।

श्लोक 62 (padma.6.120.62)

दीर्घाकांचनवर्णाया बिंदुत्रयविभूषिता । मत्स्याख्या सा शिला ज्ञेया भुक्तिमुक्तिफलप्रदा

dīrghākāṁcanavarṇāyā biṁdutrayavibhūṣitā matsyākhyā sā śilā jñeyā bhuktimuktiphalapradā

जो शिला लंबी, स्वर्ण-वर्ण की तथा तीन बिंदुओं से सुशोभित है, उसे मत्स्य-रूप जानना चाहिए, जो भोग और मोक्ष दोनों का फल देने वाली है।

श्लोक 63 (padma.6.120.63)

कूर्मस्तथोन्नतः पृष्ठे वर्तुलश्चक्रपूरितः । हरितं वर्णमाधत्ते कौस्तुभेन तु चिह्नितः

kūrmastathonnataḥ pṛṣṭhe vartulaścakrapūritaḥ haritaṁ varṇamādhatte kaustubhena tu cihnitaḥ

कूर्म-रूप पीठ पर उन्नत, गोल तथा चक्रों से भरा होता है; यह हरे रंग को धारण करता है और कौस्तुभ-चिह्न से अंकित होता है।

श्लोक 64 (padma.6.120.64)

हयग्रीवो हयाकारो रेखापंचकभूषितः । बहुबिंदुसमाकीर्णः पृष्ठे नीलं च रूपकम्

hayagrīvo hayākāro rekhāpaṁcakabhūṣitaḥ bahubiṁdusamākīrṇaḥ pṛṣṭhe nīlaṁ ca rūpakam

हयग्रीव-रूप घोड़े के आकार का होता है, पाँच रेखाओं से सुशोभित तथा अनेक बिंदुओं से भरा होता है, पीठ पर नीला चिह्न होता है।

श्लोक 65 (padma.6.120.65)

वैकुंठमविभिन्नांगं चक्रमेकं तथा ध्वजम् । द्वारोपरि तथा रेखा गुंजाकारा सुशोभना

vaikuṁṭhamavibhinnāṁgaṁ cakramekaṁ tathā dhvajam dvāropari tathā rekhā guṁjākārā suśobhanā

वैकुंठ-रूप अखंड अंगों वाला, एक चक्र तथा ध्वज-चिह्न वाला होता है; द्वार के ऊपर गुंजा-फल के आकार की सुंदर रेखा होती है।

श्लोक 66 (padma.6.120.66)

श्रीधरस्तु तथा देवश्चिह्नितो वनमालया । कदंबकुसुमाकारो रेखापंचकभूषितः

śrīdharastu tathā devaścihnito vanamālayā kadaṁbakusumākāro rekhāpaṁcakabhūṣitaḥ

श्रीधर देव वनमाला से चिह्नित होते हैं, कदंब-पुष्प के आकार के तथा पाँच रेखाओं से सुशोभित होते हैं।

श्लोक 67 (padma.6.120.67)

वर्तुलश्चापि हृस्वश्च वामनः परिकीर्तितः । अतसीकुसुमप्रख्यो बिंदुना परिशोभितः

vartulaścāpi hṛsvaśca vāmanaḥ parikīrtitaḥ atasīkusumaprakhyo biṁdunā pariśobhitaḥ

वामन-रूप गोल तथा छोटा बताया गया है, अलसी के फूल के समान वर्ण का तथा एक बिंदु से सुशोभित होता है।

श्लोक 68 (padma.6.120.68)

सुदर्शनस्ततो देवः श्यामवर्णो महाद्युतिः । वामपार्श्वे गदाचक्रे रेखा चैव तु दक्षिणे

sudarśanastato devaḥ śyāmavarṇo mahādyutiḥ vāmapārśve gadācakre rekhā caiva tu dakṣiṇe

सुदर्शन देव श्याम-वर्ण तथा महातेजस्वी होते हैं; बाईं ओर गदा-चक्र का चिह्न तथा दाईं ओर एक रेखा होती है।

श्लोक 69 (padma.6.120.69)

दामोदरस्तथा स्थूलो मध्ये चक्रं प्रतिष्ठितम् । दूर्वाभं द्वारसंकीर्णं पीतरेखं तथैव च

dāmodarastathā sthūlo madhye cakraṁ pratiṣṭhitam dūrvābhaṁ dvārasaṁkīrṇaṁ pītarekhaṁ tathaiva ca

दामोदर-रूप स्थूल होता है, मध्य में चक्र स्थित होता है; इसका रंग दूर्वा के समान तथा द्वार संकरा एवं रेखा पीली होती है।

श्लोक 70 (padma.6.120.70)

नानावर्णो ह्यनंतस्तु नानाभोगेन चिह्नितः । अनेकमूर्तिकोभिन्नः सर्वकामफलप्रदः

nānāvarṇo hyanaṁtastu nānābhogena cihnitaḥ anekamūrtikobhinnaḥ sarvakāmaphalapradaḥ

अनंत-रूप विविध वर्णों का होता है, अनेक सर्प-फणों से चिह्नित होता है; अनेक मूर्तियों में अभिन्न होकर भी यह समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाला है।

श्लोक 71 (padma.6.120.71)

विदिक्षुदिक्षुसर्वासु यस्योर्ध्वं दृश्यते मुखम् । पुरुषोत्तमः स विज्ञेयो भुक्तिमुक्तिफलप्रदः

vidikṣudikṣusarvāsu yasyordhvaṁ dṛśyate mukham puruṣottamaḥ sa vijñeyo bhuktimuktiphalapradaḥ

जिसका मुख समस्त दिशाओं और विदिशाओं में ऊपर की ओर दिखाई देता है, उसे पुरुषोत्तम जानना चाहिए, जो भोग और मोक्ष का फल देने वाला है।

श्लोक 72 (padma.6.120.72)

दृश्यते शिखरे लिंगं शालग्रामशिलोद्भवम् । यस्य योगेश्वरो देवो ब्रह्महत्यां व्यपोहति

dṛśyate śikhare liṁgaṁ śālagrāmaśilodbhavam yasya yogeśvaro devo brahmahatyāṁ vyapohati

जिस शालग्राम-शिला के शिखर पर लिंग-चिह्न दिखाई देता है, उसमें स्थित योगेश्वर देव ब्रह्महत्या के पाप को भी दूर कर देते हैं।

श्लोक 73 (padma.6.120.73)

आरक्तः पद्मनाभस्तु पंकजं वक्त्रसंयुतम् । तस्याभ्यर्चनतो नित्यं द्ररिद्रस्त्वीश्वरो भवेत्

āraktaḥ padmanābhastu paṁkajaṁ vaktrasaṁyutam tasyābhyarcanato nityaṁ draridrastvīśvaro bhavet

पद्मनाभ-रूप कुछ लाल तथा मुख पर कमल-चिह्न से युक्त होता है; इसकी नित्य पूजा से निर्धन भी धनवान हो जाता है।

श्लोक 74 (padma.6.120.74)

चक्रांकितं हिरण्यांगं रश्मिजालं विनिर्दिशेत् । सुवर्णरेखाबहुलं स्फाटिकद्युतिशोभितम्

cakrāṁkitaṁ hiraṇyāṁgaṁ raśmijālaṁ vinirdiśet suvarṇarekhābahulaṁ sphāṭikadyutiśobhitam

जो चक्र-चिह्नित, स्वर्ण-वर्ण, किरण-जाल दर्शाने वाला, स्वर्ण-रेखाओं से भरपूर तथा स्फटिक-सी कांति से सुशोभित हो, वह सर्वश्रेष्ठ मानी जाए।

श्लोक 75 (padma.6.120.75)

अतिस्निग्धा सिद्धिकरी कृष्णा कीर्तिं ददाति च । पांडुरा पापदहनी पितापुत्रफलप्रदा

atisnigdhā siddhikarī kṛṣṇā kīrtiṁ dadāti ca pāṁḍurā pāpadahanī pitāputraphalapradā

अत्यंत चिकनी शिला सिद्धि देती है, काली शिला यश देती है, श्वेत शिला पाप जलाकर पिता-पुत्र का फल देती है।

श्लोक 76 (padma.6.120.76)

नीला प्रयच्छती लक्ष्मीं रक्ता रोगप्रदायिनी । रूक्षा उद्वेगजननी वक्रा दारिद्र्यभागिनी

nīlā prayacchatī lakṣmīṁ raktā rogapradāyinī rūkṣā udvegajananī vakrā dāridryabhāginī

नीली शिला लक्ष्मी देती है, लाल शिला रोग देती है, रूखी शिला उद्वेग उत्पन्न करती है, टेढ़ी शिला दरिद्रता देती है।

श्लोक 77 (padma.6.120.77)

एकं सुदर्शनं ज्ञेयं लक्ष्मीनारायणं द्वयम् । तृतीयं चाच्युतं विद्याच्चतुर्थं तु जनार्दनम्

ekaṁ sudarśanaṁ jñeyaṁ lakṣmīnārāyaṇaṁ dvayam tṛtīyaṁ cācyutaṁ vidyāccaturthaṁ tu janārdanam

पहला सुदर्शन जानना चाहिए, दूसरा लक्ष्मी-नारायण; तीसरा अच्युत तथा चौथा जनार्दन जानना चाहिए।

श्लोक 78 (padma.6.120.78)

पंचमं वासुदेवं च षष्ठं प्रद्युम्नमेव च । संकर्षर्णं सप्तमं च अष्टमं पुरुषोत्तमम्

paṁcamaṁ vāsudevaṁ ca ṣaṣṭhaṁ pradyumnameva ca saṁkarṣarṇaṁ saptamaṁ ca aṣṭamaṁ puruṣottamam

पाँचवाँ वासुदेव, छठा प्रद्युम्न; सातवाँ संकर्षण तथा आठवाँ पुरुषोत्तम है।

श्लोक 79 (padma.6.120.79)

नवमं च नवव्यूहं दशमं तु तदात्मकम् । एकादशं चानिरुद्धं द्वादशं द्वादशात्मकम्

navamaṁ ca navavyūhaṁ daśamaṁ tu tadātmakam ekādaśaṁ cāniruddhaṁ dvādaśaṁ dvādaśātmakam

नौवाँ नवव्यूह है, दसवाँ उसी स्वरूप का है; ग्यारहवाँ अनिरुद्ध तथा बारहवाँ द्वादशात्मक है।

श्लोक 80 (padma.6.120.80)

अत ऊर्ध्वं तु चक्राणि दृश्यंतेऽनंतसंज्ञके । खंडिते त्रुटिते भग्ने सालग्रामे न दोषभाक्

ata ūrdhvaṁ tu cakrāṇi dṛśyaṁte'naṁtasaṁjñake khaṁḍite truṭite bhagne sālagrāme na doṣabhāk

इसके आगे अनंत नामक रूप में चक्र दिखाई देते हैं। खंडित, टूटी या भग्न शालग्राम-शिला में कोई दोष नहीं है।

श्लोक 81 (padma.6.120.81)

इष्टा च यस्य या मूर्तिः स तां यत्नेन पूजयेत् । स्कंधे कृत्वा तु योऽध्वानं वहते शैलनायकम्

iṣṭā ca yasya yā mūrtiḥ sa tāṁ yatnena pūjayet skaṁdhe kṛtvā tu yo'dhvānaṁ vahate śailanāyakam

जिसे जो मूर्ति प्रिय हो, वह उसी की यत्नपूर्वक पूजा करे। जो पर्वत-नायक (शालग्राम) को कंधे पर रखकर यात्रा करता है,

श्लोक 82 (padma.6.120.82)

तस्य वश्यं भवेत्सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् । शालग्रामशिला यत्र तत्र संनिहितो हरिः

tasya vaśyaṁ bhavetsarvaṁ trailokyaṁ sacarācaram śālagrāmaśilā yatra tatra saṁnihito hariḥ

— उसके वश में चराचर सहित समस्त त्रैलोक्य हो जाता है। जहाँ शालग्राम-शिला है, वहाँ हरि सदा उपस्थित रहते हैं।

श्लोक 83 (padma.6.120.83)

तत्र दानं जपः स्नानं वाराणस्याः शताधिकम् । कुरुक्षेत्रे प्रयागे च नैमिषे पुष्करे तथा

tatra dānaṁ japaḥ snānaṁ vārāṇasyāḥ śatādhikam kurukṣetre prayāge ca naimiṣe puṣkare tathā

वहाँ दान, जप और स्नान वाराणसी, कुरुक्षेत्र, प्रयाग, नैमिष तथा पुष्कर से भी सौ गुना अधिक फलदायी हैं।

श्लोक 84 (padma.6.120.84)

तत्र कोटिगुणं पुण्यं वाराणस्यां महाफलम् । ब्रह्महत्यादिकं पापं यत्किंचित्कुरुते नरः

tatra koṭiguṇaṁ puṇyaṁ vārāṇasyāṁ mahāphalam brahmahatyādikaṁ pāpaṁ yatkiṁcitkurute naraḥ

वहाँ वाराणसी के महाफल से भी करोड़ गुना पुण्य है। मनुष्य द्वारा किया गया ब्रह्महत्या आदि जो भी पाप हो,

श्लोक 85 (padma.6.120.85)

तत्सर्वं निर्दहत्याशु शालग्रामशिलार्चनम् । शालग्रामोद्भवो देवो यत्र द्वारावतीभवः

tatsarvaṁ nirdahatyāśu śālagrāmaśilārcanam śālagrāmodbhavo devo yatra dvārāvatībhavaḥ

— उस सबको शालग्राम-शिला की अर्चना शीघ्र जला डालती है। जहाँ शालग्राम से उत्पन्न देव और द्वारका से उत्पन्न प्रतिमा —

श्लोक 86 (padma.6.120.86)

उभयोः संगमो यत्र मुक्तिस्तत्र न संशयः । ब्रह्मचारि गृहस्थैश्च वानप्रस्थैश्च भिक्षुभिः

ubhayoḥ saṁgamo yatra muktistatra na saṁśayaḥ brahmacāri gṛhasthaiśca vānaprasthaiśca bhikṣubhiḥ

— दोनों का संगम होता है, वहाँ निश्चय ही मुक्ति है। ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा भिक्षुओं द्वारा —

श्लोक 87 (padma.6.120.87)

भोक्तव्यं विष्णुनैवेद्यं नात्र कार्या विचारणा । तत्पूजनेन मंत्राश्च न जपो न च भावना

bhoktavyaṁ viṣṇunaivedyaṁ nātra kāryā vicāraṇā tatpūjanena maṁtrāśca na japo na ca bhāvanā

— विष्णु का नैवेद्य ग्रहण करना चाहिए, इसमें कोई विचार नहीं करना चाहिए। उसकी पूजा में न मंत्र चाहिए,

श्लोक 88 (padma.6.120.88)

न स्तुतिर्नापि चाचारः शालग्रामशिलार्चने । शालग्रामशिलाग्रे तु कृत्वा स्वस्तिकमादरात्

na stutirnāpi cācāraḥ śālagrāmaśilārcane śālagrāmaśilāgre tu kṛtvā svastikamādarāt

— न जप और न भावना; न स्तुति और न कोई विशेष आचार शालग्राम-शिला की पूजा में आवश्यक है। शालग्राम-शिला के सामने आदरपूर्वक स्वस्तिक बनाकर,

श्लोक 89 (padma.6.120.89)

कार्तिके तु विशेषेण पुनात्यासप्तमं कुलम् । अणुमात्रं तु यः कुर्यान्मंडलं केशवाग्रतः

kārtike tu viśeṣeṇa punātyāsaptamaṁ kulam aṇumātraṁ tu yaḥ kuryānmaṁḍalaṁ keśavāgrataḥ

— विशेषकर कार्तिक में, यह सात पीढ़ियों तक के कुल को पवित्र करता है। जो केशव के सामने अणुमात्र भी मंडल बनाता है,

श्लोक 90 (padma.6.120.90)

मृदाधातुविकारैश्च कल्पकोटिं दिवं वसेत् । यस्तु संवत्सरं पूर्णमग्निहोत्रमुपासते

mṛdādhātuvikāraiśca kalpakoṭiṁ divaṁ vaset yastu saṁvatsaraṁ pūrṇamagnihotramupāsate

— मिट्टी, धातु या उनके विकारों से, वह करोड़ों कल्पों तक स्वर्ग में निवास करता है। जो पूरे वर्षभर अग्निहोत्र की उपासना करता है,

श्लोक 91 (padma.6.120.91)

कार्तिके स्वस्तिकं कृत्वा सममेतन्न संशयः । अगम्यागमने चैव ह्यभक्षस्य तु भक्षणे

kārtike svastikaṁ kṛtvā samametanna saṁśayaḥ agamyāgamane caiva hyabhakṣasya tu bhakṣaṇe

— कार्तिक में स्वस्तिक बनाना उसके समान है, इसमें संशय नहीं। अगम्य-गमन तथा अभक्ष्य-भक्षण जैसा पाप भी —

श्लोक 92 (padma.6.120.92)

तत्पापं नाशमायाति मंडयित्वा हरेर्गृहम् । मंडलं कुरुते नित्यं या नारी केशवाग्रतः । सप्तजन्मानि वैधव्यं न प्राप्नोति कदाचन

tatpāpaṁ nāśamāyāti maṁḍayitvā harergṛham maṁḍalaṁ kurute nityaṁ yā nārī keśavāgrataḥ saptajanmāni vaidhavyaṁ na prāpnoti kadācana

— हरि के गृह को सजाकर नष्ट हो जाता है। जो स्त्री नित्य केशव के सामने मंडल बनाती है, वह सात जन्मों तक कभी वैधव्य को प्राप्त नहीं होती।

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