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उत्तर खण्ड · अध्याय 121

दीप एवं गंध-पुष्पों की महिमा

अध्याय 120अध्याय-सूचीअध्याय 122

श्लोक 1 (padma.6.121.1)

ईश्वर उवाच। धात्रीच्छायां समाश्रित्य कुर्यात्पिंडं तु यो गुह । मुक्तिं प्रयांति पितरः प्रसादान्माधवस्य तु

īśvara uvāca dhātrīcchāyāṁ samāśritya kuryātpiṁḍaṁ tu yo guha muktiṁ prayāṁti pitaraḥ prasādānmādhavasya tu

ईश्वर ने कहा — हे गुह! जो आँवले की छाया का आश्रय लेकर पिंड-दान करता है, उसके पितर माधव की कृपा से मुक्ति प्राप्त करते हैं।

श्लोक 2 (padma.6.121.2)

मूर्ध्नि पाणौ मुखे चैव देहे चैव तु यो नरः । धत्ते धात्रीफलं वत्स धात्रीफलविभूषितः

mūrdhni pāṇau mukhe caiva dehe caiva tu yo naraḥ dhatte dhātrīphalaṁ vatsa dhātrīphalavibhūṣitaḥ

हे वत्स! जो मनुष्य सिर, हाथ, मुख तथा शरीर पर आँवले का फल धारण करता है, वह आँवले के फल से विभूषित हो जाता है।

श्लोक 3 (padma.6.121.3)

धात्रीफलकृताहारो नरो नारायणो भवेत् । यः कश्चिद्वैष्णवो लोके धत्ते धात्रीफलं गुह

dhātrīphalakṛtāhāro naro nārāyaṇo bhavet yaḥ kaścidvaiṣṇavo loke dhatte dhātrīphalaṁ guha

आँवले के फल का आहार करने वाला मनुष्य नारायण-स्वरूप हो जाता है। हे गुह! इस लोक में जो भी वैष्णव आँवले के फल को धारण करता है,

श्लोक 4 (padma.6.121.4)

प्रियो भवति देवानां मनुष्याणं च का कथा । न जह्यात्तुलसीमालां धात्रीमालां विशेषतः

priyo bhavati devānāṁ manuṣyāṇaṁ ca kā kathā na jahyāttulasīmālāṁ dhātrīmālāṁ viśeṣataḥ

— वह देवताओं का प्रिय हो जाता है, मनुष्यों की तो बात ही क्या। तुलसी की माला तथा विशेष रूप से आँवले की माला कभी नहीं त्यागनी चाहिए।

श्लोक 5 (padma.6.121.5)

यावत्तिष्ठति कंठस्था धात्रीमाला नरस्य हि । तावत्तस्य शरीरे तु प्रतिष्ठति च केशवः

yāvattiṣṭhati kaṁṭhasthā dhātrīmālā narasya hi tāvattasya śarīre tu pratiṣṭhati ca keśavaḥ

जब तक आँवले की माला मनुष्य के गले में रहती है, तब तक उसके शरीर में केशव प्रतिष्ठित रहते हैं।

श्लोक 6 (padma.6.121.6)

धात्रीं फलं तु तुलसीमृत्तिका द्वारकोद्भवा । सफलं जीवितं तस्य त्रितयं यस्य वेश्मनि

dhātrīṁ phalaṁ tu tulasīmṛttikā dvārakodbhavā saphalaṁ jīvitaṁ tasya tritayaṁ yasya veśmani

आँवला, तुलसी तथा द्वारका से उत्पन्न मिट्टी — जिसके घर में ये तीनों हों, उसका जीवन सफल है।

श्लोक 7 (padma.6.121.7)

यावद्दिनानि वहते धात्रीमालां कलौ नरः । तावद्युगसहस्राणि वैकुंठे वसतिर्भवेत्

yāvaddināni vahate dhātrīmālāṁ kalau naraḥ tāvadyugasahasrāṇi vaikuṁṭhe vasatirbhavet

कलियुग में मनुष्य जितने दिन आँवले की माला धारण करता है, उतने ही हज़ार युगों तक उसका निवास वैकुंठ में होता है।

श्लोक 8 (padma.6.121.8)

मालायुग्मं वहेद्यस्तु धात्रीतुलसिसंभवम् । वहते कंठदेशे तु कल्पकोटिं दिवं वसेत्

mālāyugmaṁ vahedyastu dhātrītulasisaṁbhavam vahate kaṁṭhadeśe tu kalpakoṭiṁ divaṁ vaset

जो आँवले और तुलसी से बनी माला-युगल को गले में धारण करता है, वह करोड़ों कल्पों तक स्वर्ग में निवास करता है।

श्लोक 9 (padma.6.121.9)

संनियम्येंद्रियग्रामं शालग्रामशिलार्चनम् । यः कुर्यान्मानवो भक्त्या पुष्पेपुष्पेऽश्वमेधजम्

saṁniyamyeṁdriyagrāmaṁ śālagrāmaśilārcanam yaḥ kuryānmānavo bhaktyā puṣpepuṣpe'śvamedhajam

इंद्रियों के समूह को संयमित करके जो मनुष्य भक्तिपूर्वक शालग्राम-शिला की पूजा करता है, उसे प्रत्येक पुष्प पर अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है।

श्लोक 10 (padma.6.121.10)

सुराणां च यथा विष्णुः पुष्पाणां तुलसी तथा । तुलस्यानुदिनं देवं योऽर्चयेद्गरुडध्वजम्

surāṇāṁ ca yathā viṣṇuḥ puṣpāṇāṁ tulasī tathā tulasyānudinaṁ devaṁ yo'rcayedgaruḍadhvajam

जैसे देवताओं में विष्णु श्रेष्ठ हैं, वैसे ही पुष्पों में तुलसी श्रेष्ठ है। जो प्रतिदिन तुलसी से गरुड़-ध्वज देव की पूजा करता है,

श्लोक 11 (padma.6.121.11)

जन्मदुःखजरारोगैर्मुक्तोऽसौ मुक्तिमाप्नुयात् । तुलसीमालया विष्णुः पूजितो येन कार्तिके

janmaduḥkhajarārogairmukto'sau muktimāpnuyāt tulasīmālayā viṣṇuḥ pūjito yena kārtike

— वह जन्म, दुःख, जरा तथा रोग से मुक्त होकर मुक्ति प्राप्त करता है। जिसने कार्तिक में तुलसी-माला से विष्णु की पूजा की है,

श्लोक 12 (padma.6.121.12)

यमाक्षरकृतां मालां स्फुटं शौरिः प्रमार्जति । श्रीचंदनं सकर्पूरमगुरुं च सकुंकुमम्

yamākṣarakṛtāṁ mālāṁ sphuṭaṁ śauriḥ pramārjati śrīcaṁdanaṁ sakarpūramaguruṁ ca sakuṁkumam

— शौरि (कृष्ण) स्पष्ट रूप से यम के लेखे को मिटा देते हैं। श्रीचंदन कर्पूर सहित, अगुरु कुंकुम सहित,

श्लोक 13 (padma.6.121.13)

केतकी दीपदानं च सर्वदा केशवप्रियम् । कार्तिके केतकीपुष्पं दत्तं येन कलौ युगे

ketakī dīpadānaṁ ca sarvadā keśavapriyam kārtike ketakīpuṣpaṁ dattaṁ yena kalau yuge

— केतकी का पुष्प तथा दीप-दान सदा केशव को प्रिय हैं। जिसने कलियुग में कार्तिक-मास में केतकी का पुष्प अर्पित किया,

श्लोक 14 (padma.6.121.14)

दीपदानं महासेन कुलानां तारयेच्छतम् । सरोरुहाणि तुलसी केतकी मुनिपुष्पकम्

dīpadānaṁ mahāsena kulānāṁ tārayecchatam saroruhāṇi tulasī ketakī munipuṣpakam

— हे महासेन! उसका दीप-दान सौ पीढ़ियों को तार देता है। कमल, तुलसी, केतकी तथा मुनि-पुष्प (चमेली) —

श्लोक 15 (padma.6.121.15)

कार्तिके च दिनान्येव दीपदानं तु पंचमम् । केतकीमालया येन कार्तिके पुष्पमंडपम्

kārtike ca dinānyeva dīpadānaṁ tu paṁcamam ketakīmālayā yena kārtike puṣpamaṁḍapam

— कार्तिक में इन दिनों के अतिरिक्त दीप-दान पाँचवाँ [उपाय] है। जिसने कार्तिक में केतकी की माला से पुष्प-मंडप —

श्लोक 16 (padma.6.121.16)

केशवस्य कृतं वत्स वसतिर्दिवि तस्य च । केतकीपुष्पकेनैव पूजितो गरुडध्वजः

keśavasya kṛtaṁ vatsa vasatirdivi tasya ca ketakīpuṣpakenaiva pūjito garuḍadhvajaḥ

— हे वत्स! केशव के लिए बनाया, उसका निवास स्वर्ग में होता है। केवल केतकी-पुष्प से पूजित गरुड़-ध्वज —

श्लोक 17 (padma.6.121.17)

समाः सहस्रं सुप्रीतो जायते मधुसूदनः । अर्चयित्वा हृषीकेशं कुसुमैः केतकीभवैः

samāḥ sahasraṁ suprīto jāyate madhusūdanaḥ arcayitvā hṛṣīkeśaṁ kusumaiḥ ketakībhavaiḥ

— मधुसूदन हज़ार वर्षों तक अत्यंत प्रसन्न रहते हैं। केतकी से उत्पन्न पुष्पों से हृषीकेश की पूजा करके,

श्लोक 18 (padma.6.121.18)

पुण्यं तद्भवनं याति केशवस्य शिवं गुह । दमनकेनापि देवेशं संप्राप्ते मधुमाधवे

puṇyaṁ tadbhavanaṁ yāti keśavasya śivaṁ guha damanakenāpi deveśaṁ saṁprāpte madhumādhave

— हे गुह! मनुष्य केशव के उस पुण्य, मंगलमय भवन को प्राप्त करता है। मधु-माधव मास आने पर दमनक के पुष्प से भी देवेश की —

श्लोक 19 (padma.6.121.19)

समभ्यर्च्य मुनिश्रेष्ठ अर्चनाल्लभते फलम् । अगस्तिकुसुमैर्देवं योऽर्चयेत जनार्दनम्

samabhyarcya muniśreṣṭha arcanāllabhate phalam agastikusumairdevaṁ yo'rcayeta janārdanam

— हे मुनिश्रेष्ठ! भली-भाँति पूजा करके इस अर्चना से फल मिलता है। जो अगस्ति के पुष्पों से जनार्दन देव की पूजा करता है,

श्लोक 20 (padma.6.121.20)

दर्शनात्तस्य भो विप्र नरकाग्निः प्रणश्यति । न तत्करोति विप्रर्षे तपसा तोषितो हरिः

darśanāttasya bho vipra narakāgniḥ praṇaśyati na tatkaroti viprarṣe tapasā toṣito hariḥ

— हे विप्र! उसके दर्शन मात्र से नरक की अग्नि नष्ट हो जाती है। हे विप्रर्षे! तप से प्रसन्न हुए हरि वह फल नहीं देते जो —

श्लोक 21 (padma.6.121.21)

यत्करोति महासेन मुनिपुष्पैरलंकृतः । विहाय सर्वपुष्पाणि मुनिपुष्पेण केशवम्

yatkaroti mahāsena munipuṣpairalaṁkṛtaḥ vihāya sarvapuṣpāṇi munipuṣpeṇa keśavam

— हे महासेन! मुनि-पुष्पों से अलंकृत होकर वे देते हैं। समस्त अन्य पुष्पों को छोड़कर जो मुनि-पुष्प से केशव की —

श्लोक 22 (padma.6.121.22)

कार्तिके योऽर्चयेद्भक्त्या वाजिमेधफलं लभेत् । मुनिपुष्पकृतां मालां यो ददाति जनार्दने

kārtike yo'rcayedbhaktyā vājimedhaphalaṁ labhet munipuṣpakṛtāṁ mālāṁ yo dadāti janārdane

— कार्तिक में भक्तिपूर्वक पूजा करता है, उसे अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। जो जनार्दन को मुनि-पुष्पों से बनी माला अर्पित करता है,

श्लोक 23 (padma.6.121.23)

देवेंद्रोऽपि मुनिश्रेष्ठ कुरुते तस्य सत्कथाम् । गवामयुतदानेन यत्फलं प्राप्यते गुह

deveṁdro'pi muniśreṣṭha kurute tasya satkathām gavāmayutadānena yatphalaṁ prāpyate guha

— हे मुनिश्रेष्ठ! देवेंद्र भी उसकी सराहना करते हैं। हे गुह! दस हज़ार गौओं के दान से जो फल मिलता है,

श्लोक 24 (padma.6.121.24)

मुनिपुष्पेण चैकेन कार्तिके लभते फलम् । कौस्तुभेन यथा प्रीतो यथा च वनमालया

munipuṣpeṇa caikena kārtike labhate phalam kaustubhena yathā prīto yathā ca vanamālayā

— वही फल कार्तिक में एक ही मुनि-पुष्प से मिल जाता है। जैसे हरि कौस्तुभ-मणि से तथा वनमाला से प्रसन्न होते हैं,

श्लोक 25 (padma.6.121.25)

तुलसीदलेन संप्रीतः कार्तिके च तथा हरिः । सूत उवाच। प्रश्रयावनतं दृष्ट्वा कुमारं भक्तितत्परम्

tulasīdalena saṁprītaḥ kārtike ca tathā hariḥ sūta uvāca praśrayāvanataṁ dṛṣṭvā kumāraṁ bhaktitatparam

— वैसे ही कार्तिक में हरि एक तुलसी-दल से भी अत्यंत प्रसन्न होते हैं। सूत ने कहा — विनम्रतापूर्वक झुके हुए तथा भक्ति में तत्पर कुमार (कार्तिकेय) को देखकर —

श्लोक 26 (padma.6.121.26)

पुनः प्रोवाच भगवान्महादेवो वृषध्वजः । ईश्वर उवाच। शृणु दीपस्य माहात्म्यं कार्तिके शिखिवाहन

punaḥ provāca bhagavānmahādevo vṛṣadhvajaḥ īśvara uvāca śṛṇu dīpasya māhātmyaṁ kārtike śikhivāhana

— वृषभ-ध्वज भगवान महादेव ने पुनः कहा। ईश्वर ने कहा — हे मयूर-वाहन! कार्तिक में दीपक का माहात्म्य सुनो।

श्लोक 27 (padma.6.121.27)

पितरश्चैव वांच्छंति सदा पितृगणैर्वृताः । भविष्यति कुलेऽस्माकं पितृभक्तः सुपुत्रकः

pitaraścaiva vāṁcchaṁti sadā pitṛgaṇairvṛtāḥ bhaviṣyati kule'smākaṁ pitṛbhaktaḥ suputrakaḥ

पितृगणों से घिरे हुए पितर सदा यह चाहते हैं — "हमारे कुल में ऐसा पितृ-भक्त सुपुत्र उत्पन्न हो —

श्लोक 28 (padma.6.121.28)

कार्तिके दीपदानेन यस्तोषयति केशवम् । घृतेन दीपको यस्य तिलतैलेन वा पुनः

kārtike dīpadānena yastoṣayati keśavam ghṛtena dīpako yasya tilatailena vā punaḥ

— जो कार्तिक में दीप-दान से केशव को प्रसन्न करे।" जिसके लिए घी अथवा तिल के तेल से जलता हुआ दीपक —

श्लोक 29 (padma.6.121.29)

ज्वलते यस्य सेनानीरश्वमेधेन तस्य किम् । तेनेष्टं क्रतुभिः सर्वैः कृतं तीर्थावगाहनम्

jvalate yasya senānīraśvamedhena tasya kim teneṣṭaṁ kratubhiḥ sarvaiḥ kṛtaṁ tīrthāvagāhanam

— हे सेनानी! जलता है, उसे अश्वमेध यज्ञ से क्या प्रयोजन? उसके द्वारा समस्त यज्ञ किए गए तथा तीर्थों में स्नान किया गया माना जाता है।

श्लोक 30 (padma.6.121.30)

दीपदानं कृतं येन कार्तिके केशवाग्रतः । कृष्णपक्षे विशेषेण पुत्र पंचदिनानि च

dīpadānaṁ kṛtaṁ yena kārtike keśavāgrataḥ kṛṣṇapakṣe viśeṣeṇa putra paṁcadināni ca

जिसने कार्तिक में केशव के सामने दीप-दान किया — विशेषतः हे पुत्र! कृष्ण-पक्ष के पाँच दिनों में —

श्लोक 31 (padma.6.121.31)

पुण्यानि तेषु यो दत्ते दीपं सोऽक्षयमाप्नुयात् । एकादश्यां परैर्दत्तं दीपं प्रज्वाल्य मूषिका

puṇyāni teṣu yo datte dīpaṁ so'kṣayamāpnuyāt ekādaśyāṁ parairdattaṁ dīpaṁ prajvālya mūṣikā

— उन पुण्य दिनों में जो दीपक देता है, वह अक्षय फल पाता है। एकादशी को दूसरों द्वारा जलाए गए दीपक को पुनः जलाकर एक चूहे ने,

श्लोक 32 (padma.6.121.32)

मानुष्यं दुर्ल्लभं प्राप्य परां गतिमवाप सा । लुब्धकोऽपि चतुर्दश्यां पूजयित्वा महेश्वरम्

mānuṣyaṁ durllabhaṁ prāpya parāṁ gatimavāpa sā lubdhako'pi caturdaśyāṁ pūjayitvā maheśvaram

— दुर्लभ मनुष्य-योनि प्राप्त कर परम गति पाई। एक व्याध ने भी चतुर्दशी को महेश्वर की पूजा करके,

श्लोक 33 (padma.6.121.33)

निर्भक्षः परमं प्राप्य विष्णुलोकं जगाम सः । श्वपाकस्याश्रयाद्वैश्या दीपं कृत्वा परैः कृतम्

nirbhakṣaḥ paramaṁ prāpya viṣṇulokaṁ jagāma saḥ śvapākasyāśrayādvaiśyā dīpaṁ kṛtvā paraiḥ kṛtam

— बिना भोजन किए परम पद पाकर विष्णुलोक को गया। एक वेश्या ने चांडाल के आश्रय में रहते हुए दूसरों द्वारा जलाए दीपक को संभालकर,

श्लोक 34 (padma.6.121.34)

शुद्धा लीलावती भूत्वा जगाम स्वर्गमक्षयम् । गोपः कश्चिदमावस्यां पूजां दृष्ट्वा तु शार्ङ्गिणः

śuddhā līlāvatī bhūtvā jagāma svargamakṣayam gopaḥ kaścidamāvasyāṁ pūjāṁ dṛṣṭvā tu śārṅgiṇaḥ

— शुद्ध होकर लीलावती नाम से अक्षय स्वर्ग को गई। किसी ग्वाले ने अमावस्या को शार्ङ्गी (विष्णु) की पूजा देखकर,

श्लोक 35 (padma.6.121.35)

मुहुर्मुहुर्जयेत्युक्त्वा राजराजेश्वरोऽभवत् । तस्माद्दीपाः प्रदातव्या रात्रावस्तमते रवौ

muhurmuhurjayetyuktvā rājarājeśvaro'bhavat tasmāddīpāḥ pradātavyā rātrāvastamate ravau

— बार-बार "जय" कहते हुए राजराजेश्वर बन गया। इसलिए सूर्यास्त के बाद रात्रि में दीपक अर्पित करने चाहिए —

श्लोक 36 (padma.6.121.36)

गृहेषु सर्वगोष्ठेषु सर्वेष्वायतनेषु च । देवालयेषु देवानां श्मशानेषु सरस्सु च

gṛheṣu sarvagoṣṭheṣu sarveṣvāyataneṣu ca devālayeṣu devānāṁ śmaśāneṣu sarassu ca

— घरों में, सभी गोशालाओं में, सभी मंदिरों में, देवालयों में, श्मशानों में तथा तालाबों में,

श्लोक 37 (padma.6.121.37)

घृतादिना शुभार्थाय यावत्पंचदिनानि च । पापिनः पितरो ये च लुप्तपिंडोदकक्रियाः । तेपि यांति परां मुक्तिं दीपदानस्य पुण्यतः

ghṛtādinā śubhārthāya yāvatpaṁcadināni ca pāpinaḥ pitaro ye ca luptapiṁḍodakakriyāḥ tepi yāṁti parāṁ muktiṁ dīpadānasya puṇyataḥ

— घी आदि से मंगल के लिए पूरे पाँच दिनों तक। लुप्त हो चुकी पिंड-जल क्रिया वाले पापी पितर भी दीप-दान के पुण्य से परम मुक्ति को प्राप्त करते हैं।

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