उत्तर खण्ड · अध्याय 123
मासोपवास-विधि (पुनः वर्णन)
श्लोक 1 (padma.6.123.1)
कार्तिकेय उवाच। भगवञ्च्छ्रोतुमिच्छामि व्रतानामुत्तमं व्रतम् । विधिं मासोपवासस्य फलं चास्य यथोदितम्
kārtikeya uvāca bhagavañcchrotumicchāmi vratānāmuttamaṁ vratam vidhiṁ māsopavāsasya phalaṁ cāsya yathoditam
कार्तिकेय ने कहा — हे भगवन्! मैं व्रतों में सर्वश्रेष्ठ इस व्रत की विधि तथा इसके यथोक्त फल को सुनना चाहता हूँ — मासोपवास की।
श्लोक 2 (padma.6.123.2)
यथाविधि नरैः कार्या व्रतचर्या यथा भवेत् । आरभ्यते यथापूर्वं समाप्यं हि यथाविधि
yathāvidhi naraiḥ kāryā vratacaryā yathā bhavet ārabhyate yathāpūrvaṁ samāpyaṁ hi yathāvidhi
मनुष्यों को विधिपूर्वक व्रत का आचरण कैसे करना चाहिए, यह पहले किस प्रकार आरंभ होता है और विधिपूर्वक कैसे पूर्ण किया जाता है —
श्लोक 3 (padma.6.123.3)
यावत्संख्यं तु कर्तव्यं तत्प्रब्रूहि महेश्वर । व्रतमेतत्सुरश्रेष्ठ विस्तरेण ममानघ
yāvatsaṁkhyaṁ tu kartavyaṁ tatprabrūhi maheśvara vratametatsuraśreṣṭha vistareṇa mamānagha
— यह कितने दिनों तक करना चाहिए, हे महेश्वर! यह मुझे बताइए। हे देवश्रेष्ठ, अनघ! इस व्रत को विस्तार से मुझे बताइए।
श्लोक 4 (padma.6.123.4)
श्रीरुद्र उवाच। साधु पावकि सर्वं ते यत्पृष्टं प्रब्रुवेऽनघ । भक्त्या मतिमतां श्रेष्ठ शृणुष्व गदतो मम
śrīrudra uvāca sādhu pāvaki sarvaṁ te yatpṛṣṭaṁ prabruve'nagha bhaktyā matimatāṁ śreṣṭha śṛṇuṣva gadato mama
श्रीरुद्र ने कहा — हे पावकि (अग्नि-पुत्र)! तुमने जो कुछ पूछा है, वह सब मैं भली-भाँति बताता हूँ। हे बुद्धिमानों में श्रेष्ठ! भक्तिपूर्वक मेरे कहे हुए वचन को सुनो।
श्लोक 5 (padma.6.123.5)
सुराणां च यथा विष्णुस्तपतां च यथा रविः । मेरुः शिखरिणां यद्वद्वैनतेयश्च पक्षिणाम्
surāṇāṁ ca yathā viṣṇustapatāṁ ca yathā raviḥ meruḥ śikhariṇāṁ yadvadvainateyaśca pakṣiṇām
जैसे देवताओं में विष्णु, तेजस्वियों में सूर्य, पर्वतों में मेरु तथा पक्षियों में गरुड़ श्रेष्ठ हैं,
श्लोक 6 (padma.6.123.6)
तीर्थानां तु यथा गंगा प्रजानां तु यथा वणिक् । श्रेष्ठं सर्वव्रतानां तु तद्वन्मासोपवासनम्
tīrthānāṁ tu yathā gaṁgā prajānāṁ tu yathā vaṇik śreṣṭhaṁ sarvavratānāṁ tu tadvanmāsopavāsanam
— तीर्थों में जैसे गंगा और प्रजा में जैसे वणिक् श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार समस्त व्रतों में मासोपवास सर्वश्रेष्ठ है।
श्लोक 7 (padma.6.123.7)
सर्वव्रतेषु यत्पुण्यं सर्वतीर्थेषु चैव हि । सर्वदानोद्भवं चैव लभेन्मासोपवासकृत्
sarvavrateṣu yatpuṇyaṁ sarvatīrtheṣu caiva hi sarvadānodbhavaṁ caiva labhenmāsopavāsakṛt
समस्त व्रतों में जो पुण्य है, समस्त तीर्थों में जो पुण्य है, तथा समस्त दानों से जो उत्पन्न होता है, वह सब मासोपवास करने वाला प्राप्त कर लेता है।
श्लोक 8 (padma.6.123.8)
अग्निष्टोमादिभिर्यज्ञैर्विविधैर्भूरिदक्षिणैः । न तत्पुण्यमवाप्नोति यन्मासपरिलंघनात्
agniṣṭomādibhiryajñairvividhairbhūridakṣiṇaiḥ na tatpuṇyamavāpnoti yanmāsaparilaṁghanāt
भरपूर दक्षिणा वाले अग्निष्टोम आदि विविध यज्ञों से भी वह पुण्य नहीं मिलता, जो पूरे मास के उपवास से मिलता है।
श्लोक 9 (padma.6.123.9)
तेन जप्तं हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृता स्वधा । यः करोति विधानेन नरो मासमुपोषणम्
tena japtaṁ hutaṁ dattaṁ tapastaptaṁ kṛtā svadhā yaḥ karoti vidhānena naro māsamupoṣaṇam
जो मनुष्य विधिपूर्वक मासभर उपवास करता है, उसके द्वारा जप, हवन, दान, तप तथा स्वधा — सब कुछ किया हुआ माना जाता है।
श्लोक 10 (padma.6.123.10)
उद्दिश्य वैष्णवं यज्ञं समभ्यर्च्य जनार्दनम् । गुरोराज्ञां ततो लब्ध्वा कुर्यान्मासोपवासनम्
uddiśya vaiṣṇavaṁ yajñaṁ samabhyarcya janārdanam gurorājñāṁ tato labdhvā kuryānmāsopavāsanam
वैष्णव-यज्ञ का संकल्प करके तथा जनार्दन की भली-भाँति पूजा करके, फिर गुरु की आज्ञा प्राप्त करके मासोपवास करना चाहिए।
श्लोक 11 (padma.6.123.11)
वैष्णवानि यथोक्तानि कृत्वा सर्वव्रतानि तु । द्वादश्यादीनि पुण्यानि ततो मासमुपावसेत्
vaiṣṇavāni yathoktāni kṛtvā sarvavratāni tu dvādaśyādīni puṇyāni tato māsamupāvaset
यथोक्त विधि से समस्त वैष्णव व्रत तथा द्वादशी आदि पुण्य व्रत करके फिर मासभर उपवास करना चाहिए।
श्लोक 12 (padma.6.123.12)
अतिकृच्छॄं च पाराकं कृत्वा चांद्रायणं ततः । मासोपवासं कुर्वीत ज्ञात्वा देह बलाबलम्
atikṛcchṝṁ ca pārākaṁ kṛtvā cāṁdrāyaṇaṁ tataḥ māsopavāsaṁ kurvīta jñātvā deha balābalam
अतिकृच्छ्र, पाराक तथा चांद्रायण व्रत करके, शरीर के बल-अबल को जानकर मासोपवास करे।
श्लोक 13 (padma.6.123.13)
वानप्रस्थो यतिर्वापि नारी वा विधवा मुने । मासोपवासं कुर्वीतगुरोर्विप्राज्ञया ततः
vānaprastho yatirvāpi nārī vā vidhavā mune māsopavāsaṁ kurvītagurorviprājñayā tataḥ
हे मुने! वानप्रस्थ, यति, स्त्री अथवा विधवा भी मासोपवास कर सकते हैं, तत्पश्चात् विद्वान ब्राह्मण की आज्ञा से।
श्लोक 14 (padma.6.123.14)
आश्विनस्यामले पक्षे एकादश्यामुपोषितः । व्रतमेतत्तु गृह्णीयाद्यावत्त्रिंशद्दिनानि तु
āśvinasyāmale pakṣe ekādaśyāmupoṣitaḥ vratametattu gṛhṇīyādyāvattriṁśaddināni tu
आश्विन के शुक्ल पक्ष की एकादशी को उपवास करके, इस व्रत को तीस दिनों तक ग्रहण करना चाहिए।
श्लोक 15 (padma.6.123.15)
वासुदेवं समभ्यर्च्य कार्तिकं सकलं नरः । मासं चोपवसेद्यस्तु स मुक्तिफलभाग्भवेत्
vāsudevaṁ samabhyarcya kārtikaṁ sakalaṁ naraḥ māsaṁ copavasedyastu sa muktiphalabhāgbhavet
जो मनुष्य वासुदेव की भली-भाँति पूजा करके सम्पूर्ण कार्तिक-मास उपवास करता है, वह मुक्ति-फल का भागी होता है।
श्लोक 16 (padma.6.123.16)
अच्युतस्यालये भक्त्या त्रिकालं कुमुदैः शुभैः । मालतींदीवरैः पद्मैः कमलैस्तु सुगंधिभिः
acyutasyālaye bhaktyā trikālaṁ kumudaiḥ śubhaiḥ mālatīṁdīvaraiḥ padmaiḥ kamalaistu sugaṁdhibhiḥ
अच्युत के मंदिर में भक्तिपूर्वक तीनों समय शुभ कुमुद, मालती, नीलकमल, पद्म तथा सुगंधित कमलों से,
श्लोक 17 (padma.6.123.17)
कुंकुमोशीरकर्पूरैर्विलिप्य वरचंदनैः । नैवेद्यधूपदीपाद्यैरर्चयेच्च जनार्दनम्
kuṁkumośīrakarpūrairvilipya varacaṁdanaiḥ naivedyadhūpadīpādyairarcayecca janārdanam
— कुंकुम, खस तथा कर्पूर से तथा उत्तम चंदन से अनुलेप करके, नैवेद्य, धूप और दीपक आदि से जनार्दन की पूजा करे।
श्लोक 18 (padma.6.123.18)
मनसा कर्मणा वाचा पूजयेद्गरुडध्वजम् । कुर्वन्नरस्त्रीविधवा बृहद्भक्तिर्जितेंद्रियः
manasā karmaṇā vācā pūjayedgaruḍadhvajam kurvannarastrīvidhavā bṛhadbhaktirjiteṁdriyaḥ
मन, वचन और कर्म से गरुड़-ध्वज की पूजा करनी चाहिए। पुरुष, स्त्री अथवा विधवा — कोई भी, गहरी भक्ति और जितेंद्रियता से यह करता हुआ —
श्लोक 19 (padma.6.123.19)
नाम्नामेव तथालापं विष्णोः कुर्यादहर्निशम् । भक्त्या विष्णोस्तुतिर्वाच्या मिथ्यालापविवर्जिता
nāmnāmeva tathālāpaṁ viṣṇoḥ kuryādaharniśam bhaktyā viṣṇostutirvācyā mithyālāpavivarjitā
— दिन-रात केवल विष्णु के नामों की ही चर्चा करे। भक्तिपूर्वक विष्णु की ही स्तुति कहनी चाहिए, मिथ्या वार्तालाप से रहित होकर।
श्लोक 20 (padma.6.123.20)
सर्वसत्वदयायुक्तः शांतवृत्तिरहिंसकः । सुप्तो बाह्यासनस्थो वा वासुदेवं प्रकीर्तयेत्
sarvasatvadayāyuktaḥ śāṁtavṛttirahiṁsakaḥ supto bāhyāsanastho vā vāsudevaṁ prakīrtayet
समस्त प्राणियों पर दया रखने वाला, शांत-वृत्ति, अहिंसक, सोते या बाहर आसन पर बैठे हुए भी वासुदेव का ही कीर्तन करे।
श्लोक 21 (padma.6.123.21)
स्मृत्वालोकनगंधादि स्वादितं परिकीर्तितम् । अन्नस्य वर्जयेद्ग्रासं ग्रासानां सम्प्रमोक्षणम्
smṛtvālokanagaṁdhādi svāditaṁ parikīrtitam annasya varjayedgrāsaṁ grāsānāṁ sampramokṣaṇam
भोजन के स्मरण, दर्शन, गंध तथा स्वाद की चर्चा से बचे; अन्न के ग्रास तथा ग्रास निगलने की लालसा का भी त्याग करे।
श्लोक 22 (padma.6.123.22)
गात्राभ्यंगं शिरोभ्यंगं तांबूलं सविलेपनम् । व्रतस्थो वर्जयेत्सर्वं यच्चान्यच्च निराकृतम्
gātrābhyaṁgaṁ śirobhyaṁgaṁ tāṁbūlaṁ savilepanam vratastho varjayetsarvaṁ yaccānyacca nirākṛtam
शरीर का उबटन, सिर का तेल, पान तथा लेप — व्रती इन सबका तथा अन्य निषिद्ध वस्तुओं का त्याग करे।
श्लोक 23 (padma.6.123.23)
न व्रतस्थः स्पृशेत्किंचिद्विकर्मस्थं न चालयेत् । देवतायतने तिष्ठन्गृहस्थश्चाचरेद् व्रतम्
na vratasthaḥ spṛśetkiṁcidvikarmasthaṁ na cālayet devatāyatane tiṣṭhangṛhasthaścācared vratam
व्रती को विकर्म में लगी किसी वस्तु का स्पर्श या संचालन नहीं करना चाहिए; देवालय में रहते हुए गृहस्थ भी इस व्रत का आचरण करे।
श्लोक 24 (padma.6.123.24)
कृत्वा मासोपवासं तु यथोक्तविधिना नरः । नारी वा विधवा साध्वी वासुदेवं समर्चयेत्
kṛtvā māsopavāsaṁ tu yathoktavidhinā naraḥ nārī vā vidhavā sādhvī vāsudevaṁ samarcayet
यथोक्त विधि से मासोपवास करके — चाहे पुरुष हो, स्त्री हो अथवा सती विधवा हो — वासुदेव की भली-भाँति पूजा करे।
श्लोक 25 (padma.6.123.25)
अन्यूनाधिकमेवं तु व्रतं त्रिंशद्दिनैरिति । कृत्वा मासोपवासं तु संयतात्मा जितेंद्रियः
anyūnādhikamevaṁ tu vrataṁ triṁśaddinairiti kṛtvā māsopavāsaṁ tu saṁyatātmā jiteṁdriyaḥ
इस प्रकार न कम न अधिक, तीस दिनों में यह व्रत — मासोपवास — पूर्ण करके, संयमित मन तथा जितेंद्रिय होकर —
श्लोक 26 (padma.6.123.26)
ततोऽर्चयेदेव पुण्यं द्वादश्यां गरुडध्वजम् । पूजयेत्पुष्पमालाभिर्गंधधूपविलेपनैः
tato'rcayedeva puṇyaṁ dvādaśyāṁ garuḍadhvajam pūjayetpuṣpamālābhirgaṁdhadhūpavilepanaiḥ
— द्वादशी को गरुड़-ध्वज की पवित्र पूजा करे। पुष्प-मालाओं, गंध, धूप तथा उबटन से उनकी पूजा करे।
श्लोक 27 (padma.6.123.27)
वस्त्रालंकारवाद्यैश्च तोषयेदच्युतं नरः । संस्नापयेद्धरिं भक्त्या तीर्थचंदनवारिभिः
vastrālaṁkāravādyaiśca toṣayedacyutaṁ naraḥ saṁsnāpayeddhariṁ bhaktyā tīrthacaṁdanavāribhiḥ
वस्त्र, आभूषण और वाद्यों से मनुष्य अच्युत को संतुष्ट करे। भक्तिपूर्वक तीर्थ-जल तथा चंदन-मिश्रित जल से हरि को स्नान कराए।
श्लोक 28 (padma.6.123.28)
चंदनेनानुलिप्तांगं धूपपुष्पैरलंकृतम् । वस्त्रदानादिभिश्चैव भोजयित्वा द्विजोत्तमान्
caṁdanenānuliptāṁgaṁ dhūpapuṣpairalaṁkṛtam vastradānādibhiścaiva bhojayitvā dvijottamān
उनके शरीर पर चंदन लगाकर, धूप-पुष्पों से अलंकृत करके, वस्त्र-दान आदि से तथा श्रेष्ठ ब्राह्मणों को भोजन कराकर —
श्लोक 29 (padma.6.123.29)
दद्याच्च दक्षिणां तेभ्यः प्रणिपत्य क्षमापयेत् । विप्रान्क्षमापयित्वा तु विसृज्याभ्यर्च्य पूज्य च
dadyācca dakṣiṇāṁ tebhyaḥ praṇipatya kṣamāpayet viprānkṣamāpayitvā tu visṛjyābhyarcya pūjya ca
— उन्हें दक्षिणा दे और प्रणाम करके क्षमा-याचना करे। ब्राह्मणों से क्षमा-याचना करके, उन्हें विदा करके, फिर पूजा-अर्चा करके —
श्लोक 30 (padma.6.123.30)
एवं वित्तानुसारेण भक्तियुक्तेन शक्तितः । एवं मासोपवासान्हि कृत्वाभ्यर्च जनार्दनम्
evaṁ vittānusāreṇa bhaktiyuktena śaktitaḥ evaṁ māsopavāsānhi kṛtvābhyarca janārdanam
— इस प्रकार अपनी सामर्थ्य के अनुसार धन के अनुरूप भक्तियुक्त होकर, इस प्रकार मासोपवास करके जनार्दन की पूजा करके,
श्लोक 31 (padma.6.123.31)
भोजयित्वा द्विजांश्चैव विष्णुलोके महीयते । एवं मासोपवासांते वृत्वा विप्रांस्त्रयोदश
bhojayitvā dvijāṁścaiva viṣṇuloke mahīyate evaṁ māsopavāsāṁte vṛtvā viprāṁstrayodaśa
— तथा ब्राह्मणों को भोजन कराकर मनुष्य विष्णुलोक में महिमामंडित होता है। इस प्रकार मासोपवास के अंत में तेरह ब्राह्मणों को चुनकर —
श्लोक 32 (padma.6.123.32)
निर्यापयेत्ततस्तान्वै विधिना येन तच्छृणु । कारयेद्वैष्णवं यज्ञमेकादश्यामुपोषितः
niryāpayettatastānvai vidhinā yena tacchṛṇu kārayedvaiṣṇavaṁ yajñamekādaśyāmupoṣitaḥ
— विधिपूर्वक विदा करना चाहिए, वह विधि सुनो। एकादशी को उपवास करके वैष्णव-यज्ञ करवाना चाहिए।
श्लोक 33 (padma.6.123.33)
पूजयित्वा तु देवेशमाचार्यानुज्ञया हरिम् । अर्चयित्वा यथाशक्त्या ह्यभिवाद्य गुरुं तथा
pūjayitvā tu deveśamācāryānujñayā harim arcayitvā yathāśaktyā hyabhivādya guruṁ tathā
आचार्य की आज्ञा से देवेश हरि की पूजा करके, यथाशक्ति उनकी अर्चा करके और गुरु को प्रणाम करके,
श्लोक 34 (padma.6.123.34)
ततोनुभोजयेद्विप्रान्नमस्कारपुरःसरम् । विशुद्धकुलचारित्रान्विष्णुपूजनतत्परान्
tatonubhojayedviprānnamaskārapuraḥsaram viśuddhakulacāritrānviṣṇupūjanatatparān
— फिर विशुद्ध कुल-आचरण वाले, विष्णु-पूजन में तत्पर ब्राह्मणों को प्रणाम करके भोजन कराए।
श्लोक 35 (padma.6.123.35)
पूजयित्वा तथा सर्वान्भोजयित्वा त्रयोदश । तांबूलवस्त्रयुग्मानि भोजनाच्छादनानि च
pūjayitvā tathā sarvānbhojayitvā trayodaśa tāṁbūlavastrayugmāni bhojanācchādanāni ca
इस प्रकार सभी तेरह ब्राह्मणों की पूजा करके तथा उन्हें भोजन कराकर, पान और वस्त्र के जोड़े, भोजन तथा ओढ़ने के वस्त्र,
श्लोक 36 (padma.6.123.36)
योगपट्टानि सूत्राणि ब्रह्मसूत्राणि चैव हि । दत्त्वा चैव द्विजाग्र्येभ्यः पूजयित्वा प्रणम्य च
yogapaṭṭāni sūtrāṇi brahmasūtrāṇi caiva hi dattvā caiva dvijāgryebhyaḥ pūjayitvā praṇamya ca
— योगपट्ट, सूत्र तथा यज्ञोपवीत भी श्रेष्ठ ब्राह्मणों को देकर, पूजा करके तथा प्रणाम करके,
श्लोक 37 (padma.6.123.37)
ततोनुपूजयेद्भक्त्या शय्यास्तरणसंस्कृताम् । साच्छादनां शुभां श्रेष्ठां सोपधानामलंकृताम्
tatonupūjayedbhaktyā śayyāstaraṇasaṁskṛtām sācchādanāṁ śubhāṁ śreṣṭhāṁ sopadhānāmalaṁkṛtām
तत्पश्चात् भक्तिपूर्वक बिछौने से सुसज्जित, ढकी हुई, शुभ, श्रेष्ठ, तकिए सहित सुसज्जित शय्या की भी पूजा करे।
श्लोक 38 (padma.6.123.38)
कारयित्वात्मनोमूर्तिं कांचनीं तु स्वशक्तितः । न्यसेत्तस्यां तु शय्यायामर्चयित्वा स्रगादिभिः
kārayitvātmanomūrtiṁ kāṁcanīṁ tu svaśaktitaḥ nyasettasyāṁ tu śayyāyāmarcayitvā sragādibhiḥ
यथाशक्ति अपनी स्वर्ण-मूर्ति बनवाकर, माला आदि से उसकी पूजा करके, उसे उस शय्या पर स्थापित करे।
श्लोक 39 (padma.6.123.39)
आसनं पादुका छत्रं वस्त्रयुग्ममुपानहौ । पवित्राणि च पुष्पाणि शय्यायामुपकल्पयेत्
āsanaṁ pādukā chatraṁ vastrayugmamupānahau pavitrāṇi ca puṣpāṇi śayyāyāmupakalpayet
आसन, खड़ाऊँ, छत्र, वस्त्र का जोड़ा, जूते तथा पवित्र कुश और पुष्प भी उस शय्या पर सजाए।
श्लोक 40 (padma.6.123.40)
एवं शय्यां तु संकल्प्य प्रणिपत्य च तान्द्विजान् । प्रार्थयेच्चानुमोदार्थं विष्णुलोकं व्रजाम्यहम्
evaṁ śayyāṁ tu saṁkalpya praṇipatya ca tāndvijān prārthayeccānumodārthaṁ viṣṇulokaṁ vrajāmyaham
इस प्रकार शय्या का संकल्प करके तथा उन ब्राह्मणों को प्रणाम करके, उनकी अनुमति के लिए यह प्रार्थना करे — "मैं विष्णुलोक जाता हूँ।"
श्लोक 41 (padma.6.123.41)
ततो व्रजेन्नरः प्रेष्ठं विष्णोः स्थानमनामयम् । मंडपस्थांस्तु तान्विप्रानिति वाच्यं मुहुर्मुहुः
tato vrajennaraḥ preṣṭhaṁ viṣṇoḥ sthānamanāmayam maṁḍapasthāṁstu tānviprāniti vācyaṁ muhurmuhuḥ
तब वह मनुष्य विष्णु के प्रिय, निर्दोष धाम को जाए। मंडप में बैठे उन ब्राह्मणों को बार-बार यही कहना चाहिए —
श्लोक 42 (padma.6.123.42)
मंत्रहीनं भक्तिहीनं क्रियाहीनं द्विजोत्तमाः । सर्वं संपूर्णतां यातु भवद्वाक्यप्रसादतः । विधिर्मासोपवासस्य यथावत्परिकीर्तितः
maṁtrahīnaṁ bhaktihīnaṁ kriyāhīnaṁ dvijottamāḥ sarvaṁ saṁpūrṇatāṁ yātu bhavadvākyaprasādataḥ vidhirmāsopavāsasya yathāvatparikīrtitaḥ
— हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! जो कुछ मंत्र-हीन, भक्ति-हीन, क्रिया-हीन अथवा सर्वथा अपूर्ण रह गया हो, वह सब आपके वचन की कृपा से पूर्णता को प्राप्त हो। इस प्रकार मासोपवास की विधि यथावत् वर्णित हुई।