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उत्तर खण्ड · अध्याय 126

माघ-स्नान की प्रशंसा एवं तिलोत्तमा की कथा

अध्याय 125अध्याय-सूचीअध्याय 127

श्लोक 1 (padma.6.126.1)

वसिष्ठ उवाच। अधुना माघमाहात्म्यं प्रवक्ष्यामि नृपोत्तम । पृच्छते कार्तवीर्याय दत्तात्रेयेण भाषितम्

vasiṣṭha uvāca adhunā māghamāhātmyaṁ pravakṣyāmi nṛpottama pṛcchate kārtavīryāya dattātreyeṇa bhāṣitam

वसिष्ठ ने कहा — हे नृपोत्तम! अब मैं माघ का माहात्म्य बताऊँगा, जो दत्तात्रेय ने पूछते हुए कार्तवीर्य से कहा था।

श्लोक 2 (padma.6.126.2)

दत्तात्रेयं हरिं साक्षाद्वसंतं सह्य पर्वते । पप्रच्छ तं द्विजं गत्वा राजा माहिष्मतीपतिः

dattātreyaṁ hariṁ sākṣādvasaṁtaṁ sahya parvate papraccha taṁ dvijaṁ gatvā rājā māhiṣmatīpatiḥ

माहिष्मती का स्वामी राजा साक्षात् हरि-स्वरूप उस ब्राह्मण दत्तात्रेय के पास गया, जो सह्य-पर्वत पर निवास करते थे, और उनसे पूछा।

श्लोक 3 (padma.6.126.3)

सहस्रार्जुन उवाच। भगवन्योगिनां श्रेष्ठ सर्वे धर्माः श्रुता मया । माघस्नानफलं ब्रूहि कृपया मम सुव्रत

sahasrārjuna uvāca bhagavanyogināṁ śreṣṭha sarve dharmāḥ śrutā mayā māghasnānaphalaṁ brūhi kṛpayā mama suvrata

सहस्रार्जुन ने कहा — हे योगियों में श्रेष्ठ भगवन्! मैंने समस्त धर्म सुन लिए हैं। हे सुव्रत! कृपया माघ-स्नान का फल बताइए।

श्लोक 4 (padma.6.126.4)

दत्तात्रेय उवाच। श्रूयतां नृपशार्दूल एतत्प्रश्नोत्तरं शुभम् । ब्रह्मणोक्तं पुरा ह्येतन्नारदाय महात्मने

dattātreya uvāca śrūyatāṁ nṛpaśārdūla etatpraśnottaraṁ śubham brahmaṇoktaṁ purā hyetannāradāya mahātmane

दत्तात्रेय ने कहा — हे नृपशार्दूल! यह शुभ प्रश्नोत्तर सुनो, जो पहले ब्रह्मा द्वारा महात्मा नारद से कहा गया था।

श्लोक 5 (padma.6.126.5)

तत्सर्वं कथयिष्यामि माघस्नानफलं महत् । यथादेशं यथातीर्थं यथाविधि यथाक्रियम्

tatsarvaṁ kathayiṣyāmi māghasnānaphalaṁ mahat yathādeśaṁ yathātīrthaṁ yathāvidhi yathākriyam

मैं वह सब बताऊँगा — माघ-स्नान का महान फल, देश के अनुसार, तीर्थ के अनुसार, विधि तथा क्रिया के अनुसार।

श्लोक 6 (padma.6.126.6)

अस्मिन्वै भारते वर्षे कर्मभूमौ विशेषतः । अमाघस्नायिनां नॄणां निष्फलं जन्मकीर्तितम्

asminvai bhārate varṣe karmabhūmau viśeṣataḥ amāghasnāyināṁ nṝṇāṁ niṣphalaṁ janmakīrtitam

इस भारतवर्ष में, विशेष रूप से कर्मभूमि में, माघ-स्नान न करने वाले मनुष्यों का जन्म निष्फल बताया गया है।

श्लोक 7 (padma.6.126.7)

असूर्यं गगनं यद्वदचन्द्रमुडुमंडलम् । तद्वन्नाभाति सत्कर्म माघस्नानं विना नृप

asūryaṁ gaganaṁ yadvadacandramuḍumaṁḍalam tadvannābhāti satkarma māghasnānaṁ vinā nṛpa

जैसे सूर्य के बिना आकाश तथा चंद्रमा के बिना नक्षत्र-मंडल शोभा नहीं देता, वैसे ही हे नृप! सत्कर्म भी माघ-स्नान के बिना शोभा नहीं देता।

श्लोक 8 (padma.6.126.8)

व्रतैर्दानैस्तपोभिश्च न तथा प्रीयते हरिः । माघमज्जनमात्रेण यथा प्रीणाति केशवः

vratairdānaistapobhiśca na tathā prīyate hariḥ māghamajjanamātreṇa yathā prīṇāti keśavaḥ

व्रत, दान तथा तप से हरि उतने प्रसन्न नहीं होते, जितने केवल माघ के स्नान-मात्र से केशव प्रसन्न होते हैं।

श्लोक 9 (padma.6.126.9)

न समं विद्यते किंचित्तेजः सौरेण तेजसा । तद्वत्स्नानेन माघस्य न समाः क्रतुजाः क्रियाः

na samaṁ vidyate kiṁcittejaḥ saureṇa tejasā tadvatsnānena māghasya na samāḥ kratujāḥ kriyāḥ

जैसे सूर्य के तेज के समान कोई तेज नहीं है, वैसे ही यज्ञों से उत्पन्न क्रियाएँ माघ के स्नान के समान नहीं हैं।

श्लोक 10 (padma.6.126.10)

प्रीतये वासुदेवस्य सर्वपापापनुत्तये । माघस्नानं प्रकुर्वीत स्वर्गलाभाय मानवः

prītaye vāsudevasya sarvapāpāpanuttaye māghasnānaṁ prakurvīta svargalābhāya mānavaḥ

वासुदेव की प्रसन्नता तथा समस्त पापों के निवारण के लिए, स्वर्ग-प्राप्ति के लिए मनुष्य को माघ-स्नान करना चाहिए।

श्लोक 11 (padma.6.126.11)

किं रक्षितेन देहेन सुपुष्टेन बलीयसा । अध्रुवेणाप्यशुचिना माघस्नानं विना भवेत्

kiṁ rakṣitena dehena supuṣṭena balīyasā adhruveṇāpyaśucinā māghasnānaṁ vinā bhavet

सुपुष्ट, बलवान, सुरक्षित शरीर से क्या लाभ, जो अनित्य तथा अशुचि है, यदि वह माघ-स्नान के बिना हो?

श्लोक 12 (padma.6.126.12)

अस्थिस्तंभं स्नायुबद्धं मांसक्षतज लेपनम् । चर्मावनद्धं दुर्गंधं पात्रं मूत्रपुरीषयोः

asthistaṁbhaṁ snāyubaddhaṁ māṁsakṣataja lepanam carmāvanaddhaṁ durgaṁdhaṁ pātraṁ mūtrapurīṣayoḥ

हड्डियों का खंभा, नसों से बँधा, मांस-रक्त से लिपा, चमड़े से मढ़ा, दुर्गंधयुक्त, मूत्र-मल का पात्र —

श्लोक 13 (padma.6.126.13)

जराशोकविपद्व्याप्तं रोगमंदिरमातुरम् । रजस्वलमनित्यं च सर्वदोषसमाश्रयम्

jarāśokavipadvyāptaṁ rogamaṁdiramāturam rajasvalamanityaṁ ca sarvadoṣasamāśrayam

— जरा, शोक तथा विपत्ति से व्याप्त, रोगों का घर, रोगी, अशुद्धि से युक्त, अनित्य तथा समस्त दोषों का आश्रय,

श्लोक 14 (padma.6.126.14)

परोपतापितापार्तं परद्रोहि परं विषम् । लोलुपं पिशुनं क्रूरं कृतघ्नं क्षणिकं तथा

paropatāpitāpārtaṁ paradrohi paraṁ viṣam lolupaṁ piśunaṁ krūraṁ kṛtaghnaṁ kṣaṇikaṁ tathā

— दूसरों को कष्ट देने वाले संताप से पीड़ित, परद्रोही, अत्यंत विषैला, लोलुप, चुगलखोर, क्रूर, कृतघ्न तथा क्षणभंगुर भी,

श्लोक 15 (padma.6.126.15)

दुष्पूरं दुर्धरं दुष्टं दोषत्रयसमन्वितम् । अशुचिस्रावि सच्छिद्रं तापत्रयविमोहितम्

duṣpūraṁ durdharaṁ duṣṭaṁ doṣatrayasamanvitam aśucisrāvi sacchidraṁ tāpatrayavimohitam

— अतृप्त, असह्य, दुष्ट, तीनों दोषों से युक्त, अशुद्धि बहाने वाला, छिद्रों से भरा, तीनों तापों से मोहित,

श्लोक 16 (padma.6.126.16)

निसर्गतोऽधर्मरतं तृष्णाशत समाकुलम् । कामक्रोध महालोभ नरकद्वार संस्थितम्

nisargato'dharmarataṁ tṛṣṇāśata samākulam kāmakrodha mahālobha narakadvāra saṁsthitam

— स्वभाव से अधर्म में रत, सैकड़ों तृष्णाओं से व्याकुल, काम-क्रोध-महालोभ के कारण नरक के द्वार पर स्थित —

श्लोक 17 (padma.6.126.17)

क्रिमिविड्भस्मभवति परिणामे शुनां हविः । ईदृक्शरीरं व्यर्थं हि माघस्नानविवर्जितम्

krimiviḍbhasmabhavati pariṇāme śunāṁ haviḥ īdṛkśarīraṁ vyarthaṁ hi māghasnānavivarjitam

— अंततः कीड़े, मल तथा राख बनकर कुत्तों का हविष्य बनता है। ऐसा शरीर माघ-स्नान से रहित होने पर व्यर्थ ही है।

श्लोक 18 (padma.6.126.18)

बुद्बुदाइव तोयेषु पूतिका इव जंतुषु । जायंते मरणायैव माघस्नानविवर्जिताः

budbudāiva toyeṣu pūtikā iva jaṁtuṣu jāyaṁte maraṇāyaiva māghasnānavivarjitāḥ

जल में बुलबुले की भाँति, प्राणियों में कीड़ों की भाँति, माघ-स्नान से रहित लोग केवल मृत्यु के लिए ही जन्म लेते हैं।

श्लोक 19 (padma.6.126.19)

अवैष्णवो हतो विप्रो हतं श्राद्धमयोगि च । अब्रह्मण्यं हतं क्षेत्रमनाचारं हतं कुलम्

avaiṣṇavo hato vipro hataṁ śrāddhamayogi ca abrahmaṇyaṁ hataṁ kṣetramanācāraṁ hataṁ kulam

अवैष्णव ब्राह्मण नष्ट है, अविधिपूर्वक श्राद्ध नष्ट है, ब्राह्मण-रहित क्षेत्र नष्ट है, आचार-रहित कुल नष्ट है।

श्लोक 20 (padma.6.126.20)

सदंभश्च हतो धर्मः क्रोधेनैव हतं तपः । अदृढं च हतं ज्ञानं प्रमादेन हतं श्रुतम्

sadaṁbhaśca hato dharmaḥ krodhenaiva hataṁ tapaḥ adṛḍhaṁ ca hataṁ jñānaṁ pramādena hataṁ śrutam

पाखंड-युक्त धर्म नष्ट है, क्रोध से किया गया तप नष्ट है, अस्थिर ज्ञान नष्ट है, प्रमाद से श्रुत नष्ट है।

श्लोक 21 (padma.6.126.21)

गुर्वभक्ता हता नारी ब्रह्मचारी तया हतः । अदीप्तेऽग्नौ हतो होमो हता भुंक्तिरसाक्षिका

gurvabhaktā hatā nārī brahmacārī tayā hataḥ adīpte'gnau hato homo hatā bhuṁktirasākṣikā

गुरु-भक्ति रहित स्त्री नष्ट है, उससे भ्रष्ट ब्रह्मचारी नष्ट है, बिना जलती अग्नि में हवन नष्ट है, साक्षी-रहित भोजन नष्ट है।

श्लोक 22 (padma.6.126.22)

उपजीव्या हता कन्या स्वार्थे पाकक्रिया हता । शूद्रभिक्षो हतो यागः कृपणस्य हतं धनम्

upajīvyā hatā kanyā svārthe pākakriyā hatā śūdrabhikṣo hato yāgaḥ kṛpaṇasya hataṁ dhanam

जीविका के लिए दी गई कन्या नष्ट है, स्वार्थ के लिए किया पाक-कर्म नष्ट है, शूद्र की भिक्षा से किया यज्ञ नष्ट है, कंजूस का धन नष्ट है।

श्लोक 23 (padma.6.126.23)

अनभ्यासा हता विद्या हतो राजा विरोधकृत् । जीवनार्थं हतं तीर्थं जीवनार्थं हतं व्रतम्

anabhyāsā hatā vidyā hato rājā virodhakṛt jīvanārthaṁ hataṁ tīrthaṁ jīvanārthaṁ hataṁ vratam

अभ्यास-रहित विद्या नष्ट है, विरोध करने वाला राजा नष्ट है, जीविका के लिए किया गया तीर्थ नष्ट है, जीविका के लिए किया गया व्रत नष्ट है।

श्लोक 24 (padma.6.126.24)

असत्या च हता वाणी तथा पैशुन्यवादिनी । संदिग्धश्च हतो मंत्रो व्यग्रचित्तो हतो जपः

asatyā ca hatā vāṇī tathā paiśunyavādinī saṁdigdhaśca hato maṁtro vyagracitto hato japaḥ

असत्य वाणी नष्ट है, तथा चुगली करने वाली वाणी भी; संदेहयुक्त मंत्र नष्ट है, व्यग्र-चित्त से किया जप नष्ट है।

श्लोक 25 (padma.6.126.25)

हतमश्रोत्रिये दानं हतो लोकश्च नास्तिकः । अश्रद्धया हतं सर्वं कृतं यत्पारलौकिकम्

hatamaśrotriye dānaṁ hato lokaśca nāstikaḥ aśraddhayā hataṁ sarvaṁ kṛtaṁ yatpāralaukikam

अश्रोत्रिय को दिया दान नष्ट है, नास्तिक का परलोक नष्ट है; अश्रद्धा से किया गया समस्त पारलौकिक कर्म नष्ट है।

श्लोक 26 (padma.6.126.26)

इहलोको हतो नॄणां दरिद्राणां यथा नृप । मनुष्याणां तथा जन्म माघस्नानं विना हतम्

ihaloko hato nṝṇāṁ daridrāṇāṁ yathā nṛpa manuṣyāṇāṁ tathā janma māghasnānaṁ vinā hatam

हे नृप! जैसे दरिद्रों का यह लोक नष्ट-सा है, वैसे ही मनुष्यों का जन्म माघ-स्नान के बिना नष्ट है।

श्लोक 27 (padma.6.126.27)

मकरस्थे रवौ यो हि न स्नात्यनुदिते रवौ । कथं पापैः प्रमुच्येत कथं स त्रिदिवं व्रजेत्

makarasthe ravau yo hi na snātyanudite ravau kathaṁ pāpaiḥ pramucyeta kathaṁ sa tridivaṁ vrajet

जो सूर्योदय से पहले सूर्य के मकर-राशि में होने पर स्नान नहीं करता, वह पापों से कैसे मुक्त होगा, स्वर्ग कैसे जाएगा?

श्लोक 28 (padma.6.126.28)

ब्रह्महा हेमहारी च सुरापो गुरुतल्पगः । माघस्नायी विपापः स्यात्तत्संसर्गी च पंचमः

brahmahā hemahārī ca surāpo gurutalpagaḥ māghasnāyī vipāpaḥ syāttatsaṁsargī ca paṁcamaḥ

ब्रह्महत्यारा, स्वर्ण-चोर, मद्यपायी, गुरु-पत्नी-गामी, तथा पाँचवाँ उनका संसर्गी भी — माघ-स्नान करने वाला पापरहित हो जाता है।

श्लोक 29 (padma.6.126.29)

माघमासे रटंत्यापः किंचिदभ्युदिते रवौ । ब्रह्मघ्नं वा सुरापं वा कंपंतं तं पुनीमहे

māghamāse raṭaṁtyāpaḥ kiṁcidabhyudite ravau brahmaghnaṁ vā surāpaṁ vā kaṁpaṁtaṁ taṁ punīmahe

माघ-मास में सूर्योदय होते ही जल मानो कहता है — "चाहे वह ब्रह्महत्यारा हो या मद्यपायी, काँपते हुए हम में प्रवेश करने वाले को हम पवित्र कर देंगे!"

श्लोक 30 (padma.6.126.30)

उपपापानि सर्वाणि पातकानि महांत्यपि । भस्मीभवंति सर्वाणि माघस्नानोद्यतं नरम्

upapāpāni sarvāṇi pātakāni mahāṁtyapi bhasmībhavaṁti sarvāṇi māghasnānodyataṁ naram

समस्त उपपाप तथा महापातक भी माघ-स्नान के लिए उद्यत मनुष्य के लिए भस्म हो जाते हैं।

श्लोक 31 (padma.6.126.31)

कंपंति सर्वपापानि माघस्नानसमागमे । नाशकालोऽयमस्माकं यदि स्नास्यति वारिणि

kaṁpaṁti sarvapāpāni māghasnānasamāgame nāśakālo'yamasmākaṁ yadi snāsyati vāriṇi

माघ-स्नान के समागम से समस्त पाप काँपने लगते हैं — "यदि यह जल में स्नान करेगा, तो यह हमारे विनाश का समय होगा!"

श्लोक 32 (padma.6.126.32)

एवं क्रोशंति पापानि दृष्ट्वा स्नानोद्यतं नरम् । पावका इव दीप्यंते माघस्नानैर्नरोत्तमाः

evaṁ krośaṁti pāpāni dṛṣṭvā snānodyataṁ naram pāvakā iva dīpyaṁte māghasnānairnarottamāḥ

स्नान के लिए उद्यत मनुष्य को देखकर पाप इस प्रकार चिल्लाते हैं। माघ-स्नान से श्रेष्ठ मनुष्य अग्नि की भाँति दैदीप्यमान हो जाते हैं।

श्लोक 33 (padma.6.126.33)

विमुक्ताः सर्वपापेभ्यो मेघेभ्य इव चंद्रमाः । आर्द्रशुष्कं लघुस्थूलं वाङ्मनः कर्मभिः कृतम्

vimuktāḥ sarvapāpebhyo meghebhya iva caṁdramāḥ ārdraśuṣkaṁ laghusthūlaṁ vāṅmanaḥ karmabhiḥ kṛtam

मेघों से चंद्रमा की भाँति समस्त पापों से मुक्त होकर — जो भी पाप गीला या सूखा, छोटा या बड़ा, वाणी-मन-कर्म से किया गया हो,

श्लोक 34 (padma.6.126.34)

माघस्नानं दहेत्पापं पावकः समिधो यथा । प्रामादिकं च यत्पापं ज्ञानाज्ञानकृतं च यत्

māghasnānaṁ dahetpāpaṁ pāvakaḥ samidho yathā prāmādikaṁ ca yatpāpaṁ jñānājñānakṛtaṁ ca yat

— वह माघ-स्नान से जल जाता है, जैसे अग्नि ईंधन को जला देती है; प्रमाद से किया पाप तथा जान-अनजान में किया पाप —

श्लोक 35 (padma.6.126.35)

स्नानमात्रेण तन्नश्येन्मकरस्थे दिवाकरे । निष्पापास्त्रिदिवं यांति पापिष्ठा यांति शुद्धताम्

snānamātreṇa tannaśyenmakarasthe divākare niṣpāpāstridivaṁ yāṁti pāpiṣṭhā yāṁti śuddhatām

— वह सूर्य के मकर-राशि में होने पर केवल स्नान से ही नष्ट हो जाता है। निष्पाप स्वर्ग जाते हैं, पापी शुद्धता को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 36 (padma.6.126.36)

संदेहो नात्र कर्तव्यो माघस्नाने नराधिप । सर्वेऽधिकारिणो माघे विष्णुभक्तौ यथा नृप

saṁdeho nātra kartavyo māghasnāne narādhipa sarve'dhikāriṇo māghe viṣṇubhaktau yathā nṛpa

हे नराधिप! माघ-स्नान में कोई संदेह नहीं करना चाहिए। जैसे विष्णु-भक्ति में सभी अधिकारी हैं, वैसे ही माघ में भी, हे नृप!

श्लोक 37 (padma.6.126.37)

सर्वेषां स्वर्गदो माघः सर्वेषां पापनाशनः । एष एव परो मंत्रो ह्येतदेव परं तपः

sarveṣāṁ svargado māghaḥ sarveṣāṁ pāpanāśanaḥ eṣa eva paro maṁtro hyetadeva paraṁ tapaḥ

माघ सबको स्वर्ग देने वाला है, सबके पाप का नाशक है; यही परम मंत्र है, यही परम तप है।

श्लोक 38 (padma.6.126.38)

प्रायश्चित्तं परं चैतन्माघस्नानमनुत्तमम् । नृणां जन्मांतराभ्यासान्माघस्नाने मतिर्भवेत्

prāyaścittaṁ paraṁ caitanmāghasnānamanuttamam nṛṇāṁ janmāṁtarābhyāsānmāghasnāne matirbhavet

यह माघ-स्नान परम तथा सर्वोत्तम प्रायश्चित है। पूर्व-जन्मों के अभ्यास से ही मनुष्यों की बुद्धि माघ-स्नान की ओर जाती है।

श्लोक 39 (padma.6.126.39)

अध्यात्मज्ञानकौशल्यं जन्माभ्यासाद्यथा नृप । संसारकर्दमालेप प्रक्षालन विशारदम्

adhyātmajñānakauśalyaṁ janmābhyāsādyathā nṛpa saṁsārakardamālepa prakṣālana viśāradam

जैसे हे नृप! जन्म के अभ्यास से अध्यात्म-ज्ञान की कुशलता आती है, वैसे ही यह संसार के कीचड़ के लेप को धोने में निपुण है।

श्लोक 40 (padma.6.126.40)

पावनं पावनानां च माघस्नानपरं नृप । स्नांति माघे न ये राजन्सर्वकामफलप्रदे

pāvanaṁ pāvanānāṁ ca māghasnānaparaṁ nṛpa snāṁti māghe na ye rājansarvakāmaphalaprade

हे नृप! माघ-स्नान पवित्रों में भी पवित्र है। समस्त कामनाओं का फल देने वाले माघ में जो हे राजन्! स्नान नहीं करते,

श्लोक 41 (padma.6.126.41)

कथं ते भुंजते भोगांश्चंद्रसूर्यग्रहोपमान् । शृणु राजन्महाश्चर्यं माघस्नानप्रभावजम्

kathaṁ te bhuṁjate bhogāṁścaṁdrasūryagrahopamān śṛṇu rājanmahāścaryaṁ māghasnānaprabhāvajam

— वे चंद्र, सूर्य तथा ग्रहों के समान भोगों को कैसे भोगते होंगे? हे राजन्! माघ-स्नान के प्रभाव से उत्पन्न एक महान आश्चर्य सुनो।

श्लोक 42 (padma.6.126.42)

कुब्जिका नाम कल्याणी ब्राह्मणी भृगुवंशजा । बालवैधव्यदुःखार्ता तपस्तेपे सुदुस्तरम्

kubjikā nāma kalyāṇī brāhmaṇī bhṛguvaṁśajā bālavaidhavyaduḥkhārtā tapastepe sudustaram

कुब्जिका नाम की एक कल्याणी ब्राह्मणी थी, जो भृगु-वंश में उत्पन्न हुई थी। बचपन में विधवा होने के दुःख से पीड़ित होकर उसने अत्यंत दुष्कर तपस्या की।

श्लोक 43 (padma.6.126.43)

विंध्यपादे महाक्षेत्रे रेवाकपिलसंगमे । तत्र सा व्रतिनी भूत्वा नारायणपरायणा

viṁdhyapāde mahākṣetre revākapilasaṁgame tatra sā vratinī bhūtvā nārāyaṇaparāyaṇā

विंध्य के पादमूल में, रेवा-कपिला के संगम के महाक्षेत्र में, वहाँ व्रतिनी बनकर नारायण-परायणा वह —

श्लोक 44 (padma.6.126.44)

सदाचारवती नित्यं नित्यं संगविवर्जिता । जितेंद्रिया जितक्रोधा सत्यवागल्पभाषिणी

sadācāravatī nityaṁ nityaṁ saṁgavivarjitā jiteṁdriyā jitakrodhā satyavāgalpabhāṣiṇī

— सदा सदाचार से युक्त, सदा संग से रहित, जितेंद्रिय, जित-क्रोध, सत्यवादी तथा अल्पभाषिणी रही।

श्लोक 45 (padma.6.126.45)

सुशीला दानशीला च देहशोषणशालिनी । पितृदेवद्विजेभ्यश्च दत्वा हुत्त्वा तथानले

suśīlā dānaśīlā ca dehaśoṣaṇaśālinī pitṛdevadvijebhyaśca datvā huttvā tathānale

सुशील, दानशील तथा देह को सुखाने वाली, पितरों, देवताओं तथा ब्राह्मणों को देकर तथा अग्नि में हवन करके —

श्लोक 46 (padma.6.126.46)

षष्ठे काले च सा भुङ्क्ते ह्युंच्छवृत्तिः सदा नृप । कृच्छ्रातिकृच्छ्र पाराक तप्तकृच्छ्रादिभिर्व्रतैः

ṣaṣṭhe kāle ca sā bhuṅkte hyuṁcchavṛttiḥ sadā nṛpa kṛcchrātikṛcchra pārāka taptakṛcchrādibhirvrataiḥ

— हे नृप! वह छठे काल में ही भोजन करती, सदा उंछवृत्ति से जीवन-यापन करती, कृच्छ्र, अतिकृच्छ्र, पाराक, तप्तकृच्छ्र आदि व्रतों से —

श्लोक 47 (padma.6.126.47)

पुण्यान्नयति सा मासान्नर्मदायाश्च रोधसि । एवं तया तपस्विन्या वल्कलिन्या सुशीलया

puṇyānnayati sā māsānnarmadāyāśca rodhasi evaṁ tayā tapasvinyā valkalinyā suśīlayā

— वह नर्मदा के तट पर अपने पुण्य महीने बिताती थी। इस प्रकार उस तपस्विनी, वल्कल-धारिणी, सुशील,

श्लोक 48 (padma.6.126.48)

सुमहासत्त्वशालिन्या धृति संतोषयुक्तया । षष्टिर्माघास्तया स्नाता रेवाकपिलसंगमे

sumahāsattvaśālinyā dhṛti saṁtoṣayuktayā ṣaṣṭirmāghāstayā snātā revākapilasaṁgame

— महान सत्त्वशालिनी, धैर्य और संतोष से युक्त स्त्री ने रेवा-कपिला के संगम में साठ माघ-मास स्नान किया।

श्लोक 49 (padma.6.126.49)

ततः सा तपसा क्षीणा तस्मिंस्तीर्थे मृता नृप । माघस्नानजपुण्येन तेन सा वैष्णवे पुरे

tataḥ sā tapasā kṣīṇā tasmiṁstīrthe mṛtā nṛpa māghasnānajapuṇyena tena sā vaiṣṇave pure

तत्पश्चात् तप से क्षीण होकर हे नृप! वह उसी तीर्थ में मर गई। उस माघ-स्नान के पुण्य से वह विष्णु के पुर में —

श्लोक 50 (padma.6.126.50)

उवास प्रमुदा युक्ता चतुर्युगसहस्रकम् । सुंदोपसुंदनाशाय पश्चात्पद्मभवात्पुनः

uvāsa pramudā yuktā caturyugasahasrakam suṁdopasuṁdanāśāya paścātpadmabhavātpunaḥ

— चार हज़ार युगों तक प्रसन्नतापूर्वक निवास करती रही। फिर सुंद-उपसुंद के नाश के लिए ब्रह्मा से पुनः —

श्लोक 51 (padma.6.126.51)

तिलोत्तमेति नाम्ना सा ब्रह्मलोकेऽवतारिता । तेन पुण्यस्यशेषेण रूपस्यैकायनं ययौ

tilottameti nāmnā sā brahmaloke'vatāritā tena puṇyasyaśeṣeṇa rūpasyaikāyanaṁ yayau

— तिलोत्तमा नाम से वह ब्रह्मलोक में अवतरित हुई। उसी पुण्य के शेष से वह रूप का एकमात्र आश्रय बन गई,

श्लोक 52 (padma.6.126.52)

अयोनिजाबलारत्नं देवानामपि मोहिनी । लावण्यहृदनी तन्वी साभूदप्सरसां वरा

ayonijābalāratnaṁ devānāmapi mohinī lāvaṇyahṛdanī tanvī sābhūdapsarasāṁ varā

— अयोनिज स्त्रियों में रत्न-स्वरूपा, देवताओं को भी मोहित करने वाली, सौंदर्य में सर्वस्व हरने वाली, कोमलांगी — वह अप्सराओं में श्रेष्ठ हुई।

श्लोक 53 (padma.6.126.53)

निपुणस्य विधेः स्रष्टुर्नूनमाश्चर्यकारिणी । तामुत्पाद्य विधाता वै तुष्टोऽनुज्ञां तदा ददौ

nipuṇasya vidheḥ sraṣṭurnūnamāścaryakāriṇī tāmutpādya vidhātā vai tuṣṭo'nujñāṁ tadā dadau

वह निपुण सृष्टिकर्ता ब्रह्मा के लिए भी निश्चय ही आश्चर्यकारिणी थी। उसे उत्पन्न करके प्रसन्न हुए विधाता ने तब आज्ञा दी —

श्लोक 54 (padma.6.126.54)

एणशावाक्षि गच्छ त्वं दैत्यनाशाय सत्वरम् । ततः सा ब्रह्मणो लोकाद्वीणामादाय भामिनी

eṇaśāvākṣi gaccha tvaṁ daityanāśāya satvaram tataḥ sā brahmaṇo lokādvīṇāmādāya bhāminī

"हे हरिणी-सी आँखों वाली! तुम शीघ्र ही दैत्यों के नाश के लिए जाओ।" तब वह सुंदरी ब्रह्मलोक से वीणा लेकर —

श्लोक 55 (padma.6.126.55)

गता पुष्करमार्गेण यत्र तौ देववैरिणौ । तत्र स्नात्वा तु रेवायाः पवित्रे निर्मले जले

gatā puṣkaramārgeṇa yatra tau devavairiṇau tatra snātvā tu revāyāḥ pavitre nirmale jale

— पुष्कर के मार्ग से वहाँ गई जहाँ वे दोनों देव-शत्रु थे। वहाँ रेवा के पवित्र निर्मल जल में स्नान करके,

श्लोक 56 (padma.6.126.56)

परिधायांबरं रक्तं बंधूककुसुमप्रभम् । रणद्वलयिनीचारु सिंजन्मेखलनूपुरा

paridhāyāṁbaraṁ raktaṁ baṁdhūkakusumaprabham raṇadvalayinīcāru siṁjanmekhalanūpurā

— बंधूक-पुष्प जैसा लाल वस्त्र धारण करके, अपनी सुंदर चूड़ियों को झंकृत करते हुए, मेखला-नूपुर बजाते हुए,

श्लोक 57 (padma.6.126.57)

लोलमुक्तावलीकंठी चलत्कुंडलशोभना । माधवी कुसुमापीडा कंकेली विटपे स्थिता

lolamuktāvalīkaṁṭhī calatkuṁḍalaśobhanā mādhavī kusumāpīḍā kaṁkelī viṭape sthitā

— झूलती मुक्ता-माला वाली गर्दन, हिलते कुंडलों से सुशोभित, माधवी-पुष्पों का शीश-आभूषण, अशोक की डाल के नीचे खड़ी हुई —

श्लोक 58 (padma.6.126.58)

गायंती सुस्वरं सापि पीडयंती तु वल्लकीम् । मूर्च्छयंती स्वरषट्कं सुस्निग्धं कोमलं कलम्

gāyaṁtī susvaraṁ sāpi pīḍayaṁtī tu vallakīm mūrcchayaṁtī svaraṣaṭkaṁ susnigdhaṁ komalaṁ kalam

— वीणा बजाते हुए मधुर स्वर में गाती हुई, स्निग्ध, कोमल, मधुर छह स्वरों को झंकृत करती हुई।

श्लोक 59 (padma.6.126.59)

इत्थं तिलोत्तमा बाला तिष्ठंत्यशोककानने । दृष्ट्वा दैत्यभटैरिंदोः कलेव सुखदा हृदि

itthaṁ tilottamā bālā tiṣṭhaṁtyaśokakānane dṛṣṭvā daityabhaṭairiṁdoḥ kaleva sukhadā hṛdi

इस प्रकार तिलोत्तमा बाला अशोक-वन में खड़ी दैत्य-सैनिकों को दिखाई दी, हृदय को चंद्रमा की कला के समान सुख देने वाली।

श्लोक 60 (padma.6.126.60)

तां दृष्ट्वा विस्मितै राजन्सानंदैः सैनिकैर्भृशम् । त्वरमाणैरदृष्ट्वैव गत्वा सुंदोपसुंदयोः

tāṁ dṛṣṭvā vismitai rājansānaṁdaiḥ sainikairbhṛśam tvaramāṇairadṛṣṭvaiva gatvā suṁdopasuṁdayoḥ

हे राजन्! उसे देखकर विस्मित, अत्यंत आनंदित सैनिक, बिना पूरी तरह देखे ही शीघ्रतापूर्वक सुंद-उपसुंद के पास गए,

श्लोक 61 (padma.6.126.61)

कथिता संभ्रमेणैव वर्णयित्वा पुनः पुनः । हे दैत्यौ न विजानीमो देवी वा दानवी नु किम्

kathitā saṁbhrameṇaiva varṇayitvā punaḥ punaḥ he daityau na vijānīmo devī vā dānavī nu kim

— और घबराहट में बार-बार वर्णन करते हुए कहा — "हे दैत्यो! हम नहीं जानते कि वह देवी है या दानवी,

श्लोक 62 (padma.6.126.62)

नागांगनाथ वा यक्षी स्त्रीरत्नं सर्वथा तु सा । युवां रत्नभुजौ लोके रत्नभूता हि साबला

nāgāṁganātha vā yakṣī strīratnaṁ sarvathā tu sā yuvāṁ ratnabhujau loke ratnabhūtā hi sābalā

— नाग-कन्या है या यक्षी, वह हर प्रकार से स्त्री-रत्न है। आप दोनों संसार में रत्नों के भोक्ता हैं; वह स्त्री स्वयं रत्न-स्वरूपा है।

श्लोक 63 (padma.6.126.63)

वर्तते नाति दूरेऽग्रे अशोके शोकहारिणी । गत्वा तां पश्यतं शीघ्रं मन्मथस्यापि मोहिनीम्

vartate nāti dūre'gre aśoke śokahāriṇī gatvā tāṁ paśyataṁ śīghraṁ manmathasyāpi mohinīm

वह अधिक दूर नहीं है, आगे शोक-हारिणी अशोक के नीचे खड़ी है। शीघ्र जाकर उसे देखिए, जो कामदेव को भी मोहित करने वाली है।"

श्लोक 64 (padma.6.126.64)

इति सेनापतीनां तौ श्रुत्वा वाचं मनोहराम् । चषकं सीधुनस्त्यक्त्वा विहाय जलसेचनम्

iti senāpatīnāṁ tau śrutvā vācaṁ manoharām caṣakaṁ sīdhunastyaktvā vihāya jalasecanam

सेनापतियों की यह मनोहर वाणी सुनकर वे दोनों, मदिरा का प्याला त्यागकर, जल-क्रीड़ा छोड़कर,

श्लोक 65 (padma.6.126.65)

उत्तमस्त्रीसहस्राणि त्यक्त्वा तस्माज्जलाशयात् । शतभारायसीं क्रूरां कालदंडोपमां गदाम्

uttamastrīsahasrāṇi tyaktvā tasmājjalāśayāt śatabhārāyasīṁ krūrāṁ kāladaṁḍopamāṁ gadām

— हज़ारों उत्तम स्त्रियों को त्यागकर उस जलाशय से निकल पड़े, अपनी-अपनी सौ भार वाली, काल-दंड-सी क्रूर लोहे की गदा —

श्लोक 66 (padma.6.126.66)

भिन्नाभिन्नां गृहीत्वा तु जवेनाभिप्लुतं गतौ । यत्र शृंगारसज्जा सा हंतुं चंडीव संस्थिता

bhinnābhinnāṁ gṛhītvā tu javenābhiplutaṁ gatau yatra śṛṁgārasajjā sā haṁtuṁ caṁḍīva saṁsthitā

— उठाकर वेगपूर्वक वहाँ पहुँचे जहाँ शृंगार से सजी वह मानो चंडी की भाँति उन्हें मारने के लिए खड़ी थी।

श्लोक 67 (padma.6.126.67)

राजन्संधुक्षयंतीव दैत्ययोर्मन्मथानलम् । स्थित्वा तस्याः पुरो जाल्मौ तद्रूपेणविमोहितौ

rājansaṁdhukṣayaṁtīva daityayormanmathānalam sthitvā tasyāḥ puro jālmau tadrūpeṇavimohitau

हे राजन्! मानो दोनों दैत्यों में काम की अग्नि प्रज्वलित करती हुई, वह उनके सामने खड़ी हो गई, और वे दोनों मूर्ख उसके रूप से मोहित होकर,

श्लोक 68 (padma.6.126.68)

विशेषान्मधुनामत्तावूचतुस्तौपरस्परम् । भ्रातर्विरम भार्येयं ममास्तु वरवर्णिनी

viśeṣānmadhunāmattāvūcatustauparasparam bhrātarvirama bhāryeyaṁ mamāstu varavarṇinī

— विशेष रूप से मदिरा से उन्मत्त होकर एक-दूसरे से कहने लगे — "हे भ्राता! रुक जाओ, यह सुंदरी मेरी पत्नी बने।"

श्लोक 69 (padma.6.126.69)

त्वमेवार्य त्यजैतां मे भार्यां तु मदिरेक्षणाम् । इत्याग्रहेण संरब्धौ मातंगाविव सोन्मदौ

tvamevārya tyajaitāṁ me bhāryāṁ tu madirekṣaṇām ityāgraheṇa saṁrabdhau mātaṁgāviva sonmadau

"हे आर्य! तुम्हीं इस मदमाती आँखों वाली को मेरी पत्नी के लिए छोड़ दो।" इस प्रकार आग्रह से क्रुद्ध, उन्मत्त हाथियों के समान वे दोनों —

श्लोक 70 (padma.6.126.70)

अन्योन्यं कालनिर्दिष्टौ गदया जघ्नतुस्तदा । परस्परप्रहारेण गतासू पतितौ भुवि

anyonyaṁ kālanirdiṣṭau gadayā jaghnatustadā parasparaprahāreṇa gatāsū patitau bhuvi

— काल द्वारा निर्दिष्ट होकर एक-दूसरे को गदा से मारने लगे। परस्पर के प्रहार से प्राण-रहित होकर वे दोनों भूमि पर गिर पड़े।

श्लोक 71 (padma.6.126.71)

तौ मृतौ सैनिकैर्दृष्ट्वा कृतः कोलाहलो महान् । कालरात्रिसमा केयं हा किमेतदुपस्थितम्

tau mṛtau sainikairdṛṣṭvā kṛtaḥ kolāhalo mahān kālarātrisamā keyaṁ hā kimetadupasthitam

उन दोनों को मृत देखकर सैनिकों में बड़ा कोलाहल मच गया — "यह कालरात्रि के समान कौन है? हाय! यह क्या हो गया!"

श्लोक 72 (padma.6.126.72)

एवं वदत्सु सैन्येषु दैत्यौ सुंदोपसुंदकौ । पातयित्वा गिरेः शृंगे ह्रादिनीव त्तिलोत्तमा

evaṁ vadatsu sainyeṣu daityau suṁdopasuṁdakau pātayitvā gireḥ śṛṁge hrādinīva ttilottamā

सैनिकों के इस प्रकार कहने पर, सुंद-उपसुंद दोनों दैत्यों को गिराकर, तिलोत्तमा पर्वत के शिखर से बिजली की भाँति —

श्लोक 73 (padma.6.126.73)

प्रस्थिता गगनं शीघ्रं द्योतयंती दिशो दश । देवकार्यं ततः कृत्वा आगता ब्रह्मणः पुरः

prasthitā gaganaṁ śīghraṁ dyotayaṁtī diśo daśa devakāryaṁ tataḥ kṛtvā āgatā brahmaṇaḥ puraḥ

— शीघ्र ही दसों दिशाओं को प्रकाशित करती हुई आकाश की ओर चली गई। इस प्रकार देवताओं का कार्य पूरा करके वह ब्रह्मा के सामने आई।

श्लोक 74 (padma.6.126.74)

ततस्तुष्टेन देवेन विधिना सानुमोदिता । स्थानं सूर्यरथे दत्तं तव चंद्रानने मया

tatastuṣṭena devena vidhinā sānumoditā sthānaṁ sūryarathe dattaṁ tava caṁdrānane mayā

तब प्रसन्न देव ब्रह्मा ने उसकी सराहना की — "हे चंद्रमुखी! मैंने तुम्हें सूर्य के रथ में स्थान दिया है।

श्लोक 75 (padma.6.126.75)

भुंक्ष्व भोगाननेकांस्त्वं यावत्सूर्योंबरे स्थितः । इत्थं सा ब्राह्मणी राजन्भूत्वा चाप्सरसां वरा

bhuṁkṣva bhogānanekāṁstvaṁ yāvatsūryoṁbare sthitaḥ itthaṁ sā brāhmaṇī rājanbhūtvā cāpsarasāṁ varā

जब तक सूर्य आकाश में रहेगा, तब तक तुम अनेक भोगों को भोगो।" इस प्रकार वह ब्राह्मणी, हे राजन्! अप्सराओं में श्रेष्ठ होकर,

श्लोक 76 (padma.6.126.76)

भुंक्तेद्यापि रवेर्लोके माघस्नानफलं महत् । तस्मात्प्रयत्नतो राजन्श्रद्दधानैः सदा नरैः

bhuṁktedyāpi raverloke māghasnānaphalaṁ mahat tasmātprayatnato rājanśraddadhānaiḥ sadā naraiḥ

— आज भी सूर्य-लोक में माघ-स्नान के महान फल को भोग रही है। इसलिए हे राजन्! श्रद्धावान मनुष्यों को सदा यत्नपूर्वक —

श्लोक 77 (padma.6.126.77)

स्नातव्यं मकरादित्ये वांच्छद्भिः परमां गतिम् । नानवाप्तोऽत्र तस्यास्ति पुरुषार्थो हि कश्चन

snātavyaṁ makarāditye vāṁcchadbhiḥ paramāṁ gatim nānavāpto'tra tasyāsti puruṣārtho hi kaścana

— परम गति की इच्छा रखते हुए सूर्य के मकर-राशि में होने पर स्नान करना चाहिए। इससे न पाया जा सकने वाला कोई पुरुषार्थ नहीं है।

श्लोक 78 (padma.6.126.78)

नाक्षीणं पातकं कंचिन्माघे मज्जति यो नरः । तुलयंति न तेनात्र यज्ञाः सर्वे सदक्षिणाः

nākṣīṇaṁ pātakaṁ kaṁcinmāghe majjati yo naraḥ tulayaṁti na tenātra yajñāḥ sarve sadakṣiṇāḥ

जो मनुष्य माघ में स्नान करता है, उसका कोई भी पाप शेष नहीं रहता; दक्षिणा सहित समस्त यज्ञ भी उसकी तुलना नहीं कर सकते।

श्लोक 79 (padma.6.126.79)

माघस्नानेन राजेंद्र तीर्थे चैव विशेषतः । न चान्यत्स्वर्गदं कर्म न चान्यत्पापनाशनम्

māghasnānena rājeṁdra tīrthe caiva viśeṣataḥ na cānyatsvargadaṁ karma na cānyatpāpanāśanam

हे राजेंद्र! माघ-स्नान से, विशेषतः तीर्थ में, स्वर्ग देने वाला कोई अन्य कर्म नहीं है, न पाप का कोई अन्य नाशक है,

श्लोक 80 (padma.6.126.80)

न चान्यन्मोक्षदं यस्मान्माघस्नानसमं भुवि

na cānyanmokṣadaṁ yasmānmāghasnānasamaṁ bhuvi

— और न ही इस पृथ्वी पर माघ-स्नान के समान मोक्ष देने वाला कोई अन्य साधन है।

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