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उत्तर खण्ड · अध्याय 130

विष्णु-भक्ति की महिमा

अध्याय 129अध्याय-सूचीअध्याय 131

श्लोक 1 (padma.6.130.1)

पार्वत्युवाच। श्रुतं कार्तिकमाहात्म्यं माघस्य च मया विभो । अधुना श्रोतुमिच्छामि मुक्तिदं कर्म चोत्तमम्

pārvatyuvāca śrutaṁ kārtikamāhātmyaṁ māghasya ca mayā vibho adhunā śrotumicchāmi muktidaṁ karma cottamam

पार्वती ने कहा — हे विभु, मैंने कार्तिक और माघ मास की महिमा सुन ली है। अब मैं मुक्ति देने वाला उत्तम कर्म सुनना चाहती हूँ।

श्लोक 2 (padma.6.130.2)

श्रेष्ठा भक्तिस्तु का प्रोक्ता वद विश्वेश्वर प्रभो । येन विज्ञानमात्रेण नराः सुखमवाप्नुयुः

śreṣṭhā bhaktistu kā proktā vada viśveśvara prabho yena vijñānamātreṇa narāḥ sukhamavāpnuyuḥ

हे विश्वेश्वर प्रभो, सबसे श्रेष्ठ भक्ति कौन-सी कही गई है, यह बताइए — जिसके ज्ञानमात्र से ही मनुष्य सुख प्राप्त कर लें।

श्लोक 3 (padma.6.130.3)

महादेव उवाच। तल्लीनचित्तः स पुमान्सा भक्तिः परमा मता । दयाधर्मपरो नित्यं विष्णुधर्मेषु तत्परः

mahādeva uvāca tallīnacittaḥ sa pumānsā bhaktiḥ paramā matā dayādharmaparo nityaṁ viṣṇudharmeṣu tatparaḥ

महादेव ने कहा — जिस पुरुष का चित्त उन्हीं में लीन रहता है, वही परम भक्ति मानी गई है; जो सदा दया-धर्म में तत्पर और विष्णु-धर्म में लीन रहता है,

श्लोक 4 (padma.6.130.4)

फलमूलजलाहारी शंखचक्रप्रधारकः । त्रिकालं पूजयेद्विष्णुं सा भक्तिः सात्विकी मता

phalamūlajalāhārī śaṁkhacakrapradhārakaḥ trikālaṁ pūjayedviṣṇuṁ sā bhaktiḥ sātvikī matā

फल-मूल और जल का आहार करने वाला, शंख-चक्र धारण करने वाला, जो तीनों संध्याओं में विष्णु की पूजा करता है — वह भक्ति सात्विक मानी गई है।

श्लोक 5 (padma.6.130.5)

उत्तमा सात्विकी प्रोक्ता राजसी चैव मध्यमा । कनिष्ठा तामसी चैव त्रिविधा भक्तिरुच्यते

uttamā sātvikī proktā rājasī caiva madhyamā kaniṣṭhā tāmasī caiva trividhā bhaktirucyate

सात्विक भक्ति को श्रेष्ठ कहा गया है, राजसी को मध्यम, और तामसी को निम्न — इस प्रकार भक्ति तीन प्रकार की कही गई है।

श्लोक 6 (padma.6.130.6)

श्रीधरे तु प्रकर्त्तव्या मुक्तिकामफलेप्सुभिः । अहंकारेण रूपेण दंभमात्सर्यमायया

śrīdhare tu prakarttavyā muktikāmaphalepsubhiḥ ahaṁkāreṇa rūpeṇa daṁbhamātsaryamāyayā

श्रीधर के प्रति मुक्ति की कामना रखने वालों को भक्ति करनी चाहिए। परंतु जो अहंकार, दिखावे, पाखंड, ईर्ष्या और छल के साथ —

श्लोक 7 (padma.6.130.7)

ये कुर्वंति जना भक्तिं तामसी सा उदाहृता । परस्योत्सादनार्थं वा दंभमुद्दिश्यवाऽथवा

ye kurvaṁti janā bhaktiṁ tāmasī sā udāhṛtā parasyotsādanārthaṁ vā daṁbhamuddiśyavā'thavā

लोग जो भक्ति करते हैं, वह तामसी कही गई है — चाहे वह दूसरे को नीचा दिखाने के लिए हो, या पाखंड दिखाने के उद्देश्य से हो।

श्लोक 8 (padma.6.130.8)

या भक्तिः क्रियते देवे तामसी सा प्रकीर्तिता । विषयान्प्रतिसंधाय यश ऐश्वर्यमेव वा

yā bhaktiḥ kriyate deve tāmasī sā prakīrtitā viṣayānpratisaṁdhāya yaśa aiśvaryameva vā

जो भक्ति भगवान के प्रति की जाती है, विषय-भोगों की प्राप्ति के लिए, या यश और ऐश्वर्य की कामना से — वह भी तामसी ही कही गई है।

श्लोक 9 (padma.6.130.9)

अर्चादावर्चयेद्यो मां पृथग्भावः स राजसः । कर्मक्षयार्थे कर्त्तव्या ब्राह्मणैर्ज्ञानतत्परैः

arcādāvarcayedyo māṁ pṛthagbhāvaḥ sa rājasaḥ karmakṣayārthe karttavyā brāhmaṇairjñānatatparaiḥ

जो अलग-अलग भावों से मेरी अर्चा आदि करता है, वह राजसी है। ज्ञान में तत्पर ब्राह्मणों को अपने कर्मों के क्षय के लिए भक्ति करनी चाहिए,

श्लोक 10 (padma.6.130.10)

विष्णौ ह्यात्मार्पणीं बुद्धिं सा भक्तिः सात्विकी मता । अतो वै सर्वथा देवि संसेव्यः सर्वदा हरिः

viṣṇau hyātmārpaṇīṁ buddhiṁ sā bhaktiḥ sātvikī matā ato vai sarvathā devi saṁsevyaḥ sarvadā hariḥ

विष्णु में अपनी बुद्धि को पूर्णतः समर्पित कर देना ही सात्विक भक्ति मानी गई है। अतः, हे देवि, हरि की सेवा सदा सब प्रकार से करनी चाहिए।

श्लोक 11 (padma.6.130.11)

तामसेन तु भावेन तामसत्वं हि लभ्यते । राजसो राजसेनैव सात्विकेन तु सात्विकः

tāmasena tu bhāvena tāmasatvaṁ hi labhyate rājaso rājasenaiva sātvikena tu sātvikaḥ

तामसी भाव से तामसत्व ही प्राप्त होता है; राजसी भाव से राजसत्व, और सात्विक भाव से सात्विकत्व प्राप्त होता है।

श्लोक 12 (padma.6.130.12)

वेदाध्यायरतः श्रीमान्रागद्वेषविवर्जितः । शंखचक्रधरो विप्रः सर्वदा शुचिरुच्यते

vedādhyāyarataḥ śrīmānrāgadveṣavivarjitaḥ śaṁkhacakradharo vipraḥ sarvadā śucirucyate

वेदाध्ययन में रत, श्रीमान, राग-द्वेष से रहित, शंख-चक्र धारण करने वाला ब्राह्मण सदा पवित्र कहा जाता है।

श्लोक 13 (padma.6.130.13)

कर्मकांडे प्रवृत्तो यः सर्वदा विष्णुनिंदकः । निंदकस्तज्जनानां च महाचंडाल उच्यते

karmakāṁḍe pravṛtto yaḥ sarvadā viṣṇuniṁdakaḥ niṁdakastajjanānāṁ ca mahācaṁḍāla ucyate

जो कर्मकांड में प्रवृत्त होकर भी सदा विष्णु की निंदा करता है, तथा विष्णु-भक्तों की भी निंदा करता है, वह महाचांडाल कहा जाता है।

श्लोक 14 (padma.6.130.14)

वेदाध्यायरता नित्यं नित्यं वै यज्ञयाजकाः । अग्निहोत्ररता नित्यं विष्णुधर्मपराङ्मुखाः । निंदंति विष्णुधर्मांश्च वेदबाह्याः सुरेश्वरि

vedādhyāyaratā nityaṁ nityaṁ vai yajñayājakāḥ agnihotraratā nityaṁ viṣṇudharmaparāṅmukhāḥ niṁdaṁti viṣṇudharmāṁśca vedabāhyāḥ sureśvari

हे सुरेश्वरि, जो सदा वेदाध्ययन में रत हों, सदा यज्ञ करने वाले हों, सदा अग्निहोत्र में लीन हों, फिर भी विष्णु-धर्म से विमुख होकर उसकी निंदा करते हैं — वे वेद से बाह्य ही हैं।

श्लोक 15 (padma.6.130.15)

कुर्वंति शांतिं विबुधाः प्रहृष्टाः क्षेमं प्रकुर्वंति पितामहाद्याः । स्वस्ति प्रयच्छंति मुनींद्रमुख्या गोविंदभक्तिं वहतां नराणाम्

kurvaṁti śāṁtiṁ vibudhāḥ prahṛṣṭāḥ kṣemaṁ prakurvaṁti pitāmahādyāḥ svasti prayacchaṁti munīṁdramukhyā goviṁdabhaktiṁ vahatāṁ narāṇām

गोविंद-भक्ति धारण करने वाले मनुष्यों के लिए देवगण प्रसन्न होकर शांति करते हैं, ब्रह्मा आदि उनका क्षेम करते हैं, और श्रेष्ठ मुनिगण उन्हें कल्याण प्रदान करते हैं।

श्लोक 16 (padma.6.130.16)

शुभा ग्रहा भूतपिशाचयुक्ता ब्रह्मादयो देवगणाः प्रसन्नाः । लक्ष्मी स्थिरा तिष्ठति मंदिरे च गोविंदभक्तिं वहतां नराणाम्

śubhā grahā bhūtapiśācayuktā brahmādayo devagaṇāḥ prasannāḥ lakṣmī sthirā tiṣṭhati maṁdire ca goviṁdabhaktiṁ vahatāṁ narāṇām

गोविंद-भक्ति धारण करने वाले मनुष्यों के लिए ग्रह शुभ होते हैं, भूत-पिशाच भी अनुकूल हो जाते हैं, ब्रह्मा आदि देवगण प्रसन्न रहते हैं, और लक्ष्मी उनके घर में स्थिर होकर निवास करती हैं।

श्लोक 17 (padma.6.130.17)

गंगा गया नैमिषपुष्कराणि काशी प्रयागं कुरुजांगलानि । तिष्ठंति देहे कृतभक्तिपूर्वं गोविंदभक्तिं वहतां नराणाम्

gaṁgā gayā naimiṣapuṣkarāṇi kāśī prayāgaṁ kurujāṁgalāni tiṣṭhaṁti dehe kṛtabhaktipūrvaṁ goviṁdabhaktiṁ vahatāṁ narāṇām

गोविंद-भक्ति धारण करने वाले, पहले से भक्ति-संपन्न मनुष्यों के शरीर में ही गंगा, गया, नैमिष, पुष्कर, काशी, प्रयाग और कुरुजांगल जैसे तीर्थ निवास करते हैं।

श्लोक 18 (padma.6.130.18)

एवमाराधयेद्विद्वान्भगवंतं श्रिया सह । कृतकृत्यो भवेन्नित्यं स विप्रो नात्र संशयः

evamārādhayedvidvānbhagavaṁtaṁ śriyā saha kṛtakṛtyo bhavennityaṁ sa vipro nātra saṁśayaḥ

इस प्रकार जो विद्वान भगवान की, लक्ष्मी सहित, आराधना करता है, वह ब्राह्मण सदा कृतकृत्य होता है, इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 19 (padma.6.130.19)

क्षत्रियो वाथ वैश्यो वा शूद्रो वासुरसत्तमे । भक्तिं कुर्वन्विशेषेण मुक्तिं याति स वै नरः

kṣatriyo vātha vaiśyo vā śūdro vāsurasattame bhaktiṁ kurvanviśeṣeṇa muktiṁ yāti sa vai naraḥ

हे देवश्रेष्ठा, चाहे वह क्षत्रिय हो, वैश्य हो या शूद्र — जो विशेष रूप से भक्ति करता है, वह मनुष्य निश्चय ही मुक्ति को प्राप्त होता है।

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