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उत्तर खण्ड · अध्याय 131

शालग्राम-शिला पूजन की विधि

अध्याय 130अध्याय-सूचीअध्याय 132

श्लोक 1 (padma.6.131.1)

पार्वत्युवाच। शालग्रामशिला शुद्धा मूर्त्तयः संति भूतले । तासां चैव तु मूर्तीनां पूजनं कतिधा स्मृतम्

pārvatyuvāca śālagrāmaśilā śuddhā mūrttayaḥ saṁti bhūtale tāsāṁ caiva tu mūrtīnāṁ pūjanaṁ katidhā smṛtam

पार्वती ने कहा — पृथ्वी पर शालग्राम-शिला रूपी पवित्र मूर्तियाँ हैं; उन मूर्तियों की पूजा कितने प्रकार से कही गई है?

श्लोक 2 (padma.6.131.2)

ब्राह्मणैः कति पूज्यास्ताः क्षत्रियैर्वा सुरेश्वर । वैश्यैर्वापि कथं शूद्रैः स्त्रीभिर्वापि समादिश

brāhmaṇaiḥ kati pūjyāstāḥ kṣatriyairvā sureśvara vaiśyairvāpi kathaṁ śūdraiḥ strībhirvāpi samādiśa

हे देवेश्वर, ब्राह्मणों द्वारा उनमें से कितनी पूज्य हैं, क्षत्रियों द्वारा कितनी, वैश्यों द्वारा कैसे, शूद्रों और स्त्रियों द्वारा भी — यह मुझे बताइए।

श्लोक 3 (padma.6.131.3)

महादेव उवाच। शालग्रामशिला पुण्या पवित्रा धर्मकारिणी । यस्या दर्शनमात्रेण ब्रह्महा शुध्यते नरः

mahādeva uvāca śālagrāmaśilā puṇyā pavitrā dharmakāriṇī yasyā darśanamātreṇa brahmahā śudhyate naraḥ

महादेव ने कहा — शालग्राम-शिला पुण्यमयी, पवित्र और धर्म को देने वाली है; जिसके दर्शनमात्र से ब्रह्महत्यारा मनुष्य भी शुद्ध हो जाता है।

श्लोक 4 (padma.6.131.4)

तद्गृहं सर्वतीर्थानां प्रवरं श्रुतिनोदितम् । यत्रेयं सर्वदा मूर्तिः शालग्रामशिला शुभा

tadgṛhaṁ sarvatīrthānāṁ pravaraṁ śrutinoditam yatreyaṁ sarvadā mūrtiḥ śālagrāmaśilā śubhā

वह घर, जहाँ यह शुभ शालग्राम-शिला मूर्ति सदा विराजमान रहती है, श्रुति द्वारा समस्त तीर्थों में श्रेष्ठ कहा गया है।

श्लोक 5 (padma.6.131.5)

ब्राह्मणैः पंचपूज्या स्युश्चतस्रः क्षत्रियैस्तथा । वैश्यैस्तिस्रस्तथापूज्याएकापूज्याप्रयत्नतः

brāhmaṇaiḥ paṁcapūjyā syuścatasraḥ kṣatriyaistathā vaiśyaistisrastathāpūjyāekāpūjyāprayatnataḥ

ब्राह्मणों के लिए पाँच शालग्राम पूज्य हैं, क्षत्रियों के लिए चार, वैश्यों के लिए तीन, और शूद्रों के लिए प्रयत्नपूर्वक एक ही पूज्य है।

श्लोक 6 (padma.6.131.6)

तस्यादर्शनमात्रेणशूद्रो मुक्तिमवाप्नुयात् । अनेन विधिना देवि ये नराः पूजयंति वै

tasyādarśanamātreṇaśūdro muktimavāpnuyāt anena vidhinā devi ye narāḥ pūjayaṁti vai

उसके दर्शनमात्र से भी शूद्र मुक्ति प्राप्त कर सकता है। हे देवि, जो मनुष्य इस विधि से पूजा करते हैं,

श्लोक 7 (padma.6.131.7)

भोगान्सर्वांस्तत्र भुक्त्वा यांति विष्णोः सनातनम् । इयं सा महती मूर्तिः सर्वदा पापहारिणी

bhogānsarvāṁstatra bhuktvā yāṁti viṣṇoḥ sanātanam iyaṁ sā mahatī mūrtiḥ sarvadā pāpahāriṇī

वे सब भोगों को भोगकर अंततः विष्णु के सनातन धाम को प्राप्त होते हैं। यह वही महती मूर्ति है, जो सदा पाप का हरण करने वाली है।

श्लोक 8 (padma.6.131.8)

कैलासाद्यं फलं देवि जायते पूजनाद्यतः । तत्र गंगा च यमुना गोदावरी सरस्वती

kailāsādyaṁ phalaṁ devi jāyate pūjanādyataḥ tatra gaṁgā ca yamunā godāvarī sarasvatī

हे देवि, इसकी पूजा से कैलास-लोक आदि की प्राप्ति का फल होता है; जहाँ यह शिला रहती है, वहाँ गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती —

श्लोक 9 (padma.6.131.9)

तिष्ठते च शिला यत्र सर्वं तत्र न संशयः । किमत्र बहुनोक्तेन भूयोभूयो वरानने

tiṣṭhate ca śilā yatra sarvaṁ tatra na saṁśayaḥ kimatra bahunoktena bhūyobhūyo varānane

सब वहाँ निवास करती हैं, इसमें कोई संशय नहीं। हे वरानने, यहाँ बार-बार बहुत कहने से क्या लाभ?

श्लोक 10 (padma.6.131.10)

पूजनं मनुजैः सम्यक्कर्त्तव्यं मुक्तिमिच्छुभिः । भक्तिभावेन देवेशि येऽर्चयंति जनार्दनम्

pūjanaṁ manujaiḥ samyakkarttavyaṁ muktimicchubhiḥ bhaktibhāvena deveśi ye'rcayaṁti janārdanam

मुक्ति चाहने वाले मनुष्यों को इसकी पूजा भली-भाँति करनी चाहिए। हे देवेशि, जो भक्तिभाव से जनार्दन की अर्चना करते हैं —

श्लोक 11 (padma.6.131.11)

तेषां दर्शनमात्रेण ब्रह्महा शुध्यते जनः । दासभावेन ये शूद्राः स्वर्चनं कुर्वते सदा

teṣāṁ darśanamātreṇa brahmahā śudhyate janaḥ dāsabhāvena ye śūdrāḥ svarcanaṁ kurvate sadā

उनके दर्शनमात्र से भी ब्रह्महत्यारा जन शुद्ध हो जाता है। जो शूद्र दास-भाव से सदा उसकी पूजा करते हैं,

श्लोक 12 (padma.6.131.12)

तेषां पुण्यं न जानंति ब्रह्माद्याश्च सुरेश्वरि । भक्तिभावेन ये विप्रा हरिमभ्यर्चयंति वै

teṣāṁ puṇyaṁ na jānaṁti brahmādyāśca sureśvari bhaktibhāvena ye viprā harimabhyarcayaṁti vai

हे सुरेश्वरि, उनके पुण्य को ब्रह्मा आदि देवता भी नहीं जान पाते। जो ब्राह्मण भक्तिभाव से हरि की पूजा करते हैं,

श्लोक 13 (padma.6.131.13)

एकविंशतिकुलं तैस्तु तारितं तेषु जन्मसु । शंखचक्रांकितो यस्तु विप्रः पूजनमाचरेत्

ekaviṁśatikulaṁ taistu tāritaṁ teṣu janmasu śaṁkhacakrāṁkito yastu vipraḥ pūjanamācaret

उनके द्वारा इक्कीस पीढ़ियों का कुल उनके जन्मों में तार दिया जाता है। जो शंख-चक्र से अंकित ब्राह्मण इस पूजा का आचरण करता है,

श्लोक 14 (padma.6.131.14)

पूजितं तु जगत्सर्वं तेन विष्णुप्रपूजनात् । पितरः संवदंत्यस्मत्कुले जाताश्च वैष्णवाः

pūjitaṁ tu jagatsarvaṁ tena viṣṇuprapūjanāt pitaraḥ saṁvadaṁtyasmatkule jātāśca vaiṣṇavāḥ

उसके द्वारा विष्णु की पूजा से समस्त जगत् पूजित हो जाता है। उसके पितर आपस में कहते हैं — हमारे कुल में वैष्णव उत्पन्न हुआ है।

श्लोक 15 (padma.6.131.15)

तत्कुलं तारितं तैस्तु यावदाभूतसंप्लवम् । ते तु चास्मान्समुद्धृत्य नयंते विष्णुमंदिरम्

tatkulaṁ tāritaṁ taistu yāvadābhūtasaṁplavam te tu cāsmānsamuddhṛtya nayaṁte viṣṇumaṁdiram

उसके द्वारा वह कुल प्रलय-काल तक तार दिया जाता है। वे पितर कहते हैं — यह हमें उद्धार कर विष्णु के धाम को ले जाएगा।

श्लोक 16 (padma.6.131.16)

स एव दिवसो धन्यो धन्या माताऽथ बांधवाः । पिता तस्य च वै धन्यो धन्या वै सुहृदस्तथा

sa eva divaso dhanyo dhanyā mātā'tha bāṁdhavāḥ pitā tasya ca vai dhanyo dhanyā vai suhṛdastathā

वही दिन धन्य है, धन्य है उसकी माता और बंधुजन; धन्य है उसका पिता, और धन्य हैं उसके मित्र भी।

श्लोक 17 (padma.6.131.17)

सर्वे धन्यतमा ज्ञेया विष्णुभक्तिपरायणाः । तेषां दर्शनमात्रेण महापापात्प्रमुच्यते

sarve dhanyatamā jñeyā viṣṇubhaktiparāyaṇāḥ teṣāṁ darśanamātreṇa mahāpāpātpramucyate

विष्णु-भक्ति में परायण सभी लोग परम धन्य जानने चाहिए। उनके दर्शनमात्र से मनुष्य महापाप से भी मुक्त हो जाता है।

श्लोक 18 (padma.6.131.18)

उपपातकानि सर्वाणि महांति पातकानि च । तानि सर्वाणि नश्यंति वैष्णवानां च दर्शनात्

upapātakāni sarvāṇi mahāṁti pātakāni ca tāni sarvāṇi naśyaṁti vaiṣṇavānāṁ ca darśanāt

समस्त उपपातक और महापातक — वे सब वैष्णवों के दर्शन मात्र से नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 19 (padma.6.131.19)

पावका इव दीप्यंते ये नरा वैष्णवा भुवि । विमुक्ताः सर्वपापेभ्यो मेघेभ्य इव चंद्रमाः

pāvakā iva dīpyaṁte ye narā vaiṣṇavā bhuvi vimuktāḥ sarvapāpebhyo meghebhya iva caṁdramāḥ

पृथ्वी पर जो वैष्णव मनुष्य हैं, वे अग्नि के समान देदीप्यमान होते हैं, समस्त पापों से वैसे ही मुक्त हो जाते हैं जैसे बादलों से चंद्रमा।

श्लोक 20 (padma.6.131.20)

आर्द्रशुष्कं लघुस्थूलं वाङ्मनः कर्मभिः कृतम् । तत्सर्वं नाशमायाति वैष्णवानां च दर्शनात्

ārdraśuṣkaṁ laghusthūlaṁ vāṅmanaḥ karmabhiḥ kṛtam tatsarvaṁ nāśamāyāti vaiṣṇavānāṁ ca darśanāt

चाहे वह पाप गीला हो या सूखा, छोटा हो या बड़ा, वचन-मन-कर्म से किया गया हो — वह सब वैष्णवों के दर्शन से नष्ट हो जाता है।

श्लोक 21 (padma.6.131.21)

हिंसादिकं च यत्पापं ज्ञानाज्ञानं कृतं च यत् । तत्सर्वं नाशमायाति दर्शनाद्वैष्णवस्य च

hiṁsādikaṁ ca yatpāpaṁ jñānājñānaṁ kṛtaṁ ca yat tatsarvaṁ nāśamāyāti darśanādvaiṣṇavasya ca

हिंसा आदि जो भी पाप, ज्ञानपूर्वक अथवा अज्ञानवश किया गया हो, वह सब भी वैष्णव के दर्शन से नष्ट हो जाता है।

श्लोक 22 (padma.6.131.22)

निःपापास्त्रिदिवं यांति पापिष्ठा यांति शुद्धिताम् । दर्शनादेव साधूनां सत्यं तुभ्यं मयोदितम्

niḥpāpāstridivaṁ yāṁti pāpiṣṭhā yāṁti śuddhitām darśanādeva sādhūnāṁ satyaṁ tubhyaṁ mayoditam

पापरहित लोग स्वर्ग को प्राप्त होते हैं, और पापी भी शुद्धि को प्राप्त हो जाते हैं — केवल साधुजनों के दर्शन से ही। यह मैंने तुम्हें सत्य कहा है।

श्लोक 23 (padma.6.131.23)

संसारकर्दमालेपप्रक्षालनविशारदः । पावनः पावनानां च विष्णुभक्तो न संशयः

saṁsārakardamālepaprakṣālanaviśāradaḥ pāvanaḥ pāvanānāṁ ca viṣṇubhakto na saṁśayaḥ

वह संसार-रूपी कीचड़ के लेप को धोने में कुशल है; विष्णु-भक्त पवित्रों में भी परम पवित्र है, इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 24 (padma.6.131.24)

प्रत्यहं विष्णुभक्ता ये स्मरंति मधुसूदनम् । ते तु विष्णुमया ज्ञेया विष्णुस्तत्र न संशयः

pratyahaṁ viṣṇubhaktā ye smaraṁti madhusūdanam te tu viṣṇumayā jñeyā viṣṇustatra na saṁśayaḥ

जो विष्णु-भक्त प्रतिदिन मधुसूदन का स्मरण करते हैं, वे विष्णुमय ही जानने चाहिए — वहाँ स्वयं विष्णु ही हैं, इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 25 (padma.6.131.25)

नवनीलघनश्यामं नलिनायतलोचनम् । शंखचक्रगदापद्मधरं पीतांबरावृतम्

navanīlaghanaśyāmaṁ nalināyatalocanam śaṁkhacakragadāpadmadharaṁ pītāṁbarāvṛtam

नए, नीले, घने मेघ के समान श्याम वर्ण वाले, कमल के समान विशाल नेत्रों वाले, शंख-चक्र-गदा-पद्म धारण करने वाले, पीताम्बर पहने हुए —

श्लोक 26 (padma.6.131.26)

कौस्तुभेन विराजंतं वनमालाधरं हरिम् । उल्लसत्कुंडलज्योतिः कपोलवदनश्रिया

kaustubhena virājaṁtaṁ vanamālādharaṁ harim ullasatkuṁḍalajyotiḥ kapolavadanaśriyā

कौस्तुभ मणि से सुशोभित, वनमाला धारण करने वाले हरि — जिनके कपोलों और मुख की शोभा चमकते हुए कुंडलों की ज्योति से बढ़ी हुई है —

श्लोक 27 (padma.6.131.27)

विराजितं किरीटेन वलयांगदनूपुरैः । प्रसन्नवदनांभोजं चतुर्बाहुं श्रियान्वितम्

virājitaṁ kirīṭena valayāṁgadanūpuraiḥ prasannavadanāṁbhojaṁ caturbāhuṁ śriyānvitam

मुकुट, कंगन, बाजूबंद और नूपुरों से सुशोभित, प्रसन्न कमल-मुख वाले, चार भुजाओं वाले, लक्ष्मी सहित विराजमान —

श्लोक 28 (padma.6.131.28)

एवं ध्यायंति ये विप्रा विष्णुं चैव तु पार्वति । ते विप्रा विष्णुरूपाश्च वैष्णवास्ते न संशयः

evaṁ dhyāyaṁti ye viprā viṣṇuṁ caiva tu pārvati te viprā viṣṇurūpāśca vaiṣṇavāste na saṁśayaḥ

हे पार्वती, जो ब्राह्मण इस प्रकार विष्णु का ध्यान करते हैं, वे ब्राह्मण स्वयं विष्णु-रूप ही हैं, वे सच्चे वैष्णव हैं, इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 29 (padma.6.131.29)

तेषां दर्शनमात्रेण भक्त्या वा भोजनेन वा । पूजनेन च देवेशि वैकुंठं लभते ध्रुवम्

teṣāṁ darśanamātreṇa bhaktyā vā bhojanena vā pūjanena ca deveśi vaikuṁṭhaṁ labhate dhruvam

हे देवेशि, उनके दर्शनमात्र से, भक्ति से, उन्हें भोजन कराने से, या उनकी पूजा करने से, मनुष्य निश्चित रूप से वैकुंठ को प्राप्त करता है।

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