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उत्तर खण्ड · अध्याय 132

विष्णु-स्मरण

अध्याय 131अध्याय-सूचीअध्याय 133

श्लोक 1 (padma.6.132.1)

पार्वत्युवाच। अनंतवासुदेवस्य कीदृशं स्मरणं स्मृतम् । यच्छ्रुत्वा न पुनर्मोहो मानुषाणां प्रजायते

pārvatyuvāca anaṁtavāsudevasya kīdṛśaṁ smaraṇaṁ smṛtam yacchrutvā na punarmoho mānuṣāṇāṁ prajāyate

पार्वती ने कहा — अनंत वासुदेव का स्मरण किस प्रकार का कहा गया है, जिसे सुनकर मनुष्यों को फिर मोह उत्पन्न न हो?

श्लोक 2 (padma.6.132.2)

महादेव उवाच। दृष्टतत्वेन देवेशि स्मरंति विष्णुं नित्यशः । तृषातुरो यथा वारि तद्वद्विष्णुं स्मराम्यहम्

mahādeva uvāca dṛṣṭatatvena deveśi smaraṁti viṣṇuṁ nityaśaḥ tṛṣāturo yathā vāri tadvadviṣṇuṁ smarāmyaham

महादेव ने कहा — हे देवेशि, सच्चे तत्व को देखकर लोग सदा विष्णु का स्मरण करते हैं; जैसे प्यासा जल को याद करता है, वैसे ही मैं विष्णु का स्मरण करता हूँ।

श्लोक 3 (padma.6.132.3)

हिमेनाकुलितं विश्वं स्मरत्यग्निं यथा तथा । तद्वदेव तु वै विष्णुं स्मरंति विबुधादयः

himenākulitaṁ viśvaṁ smaratyagniṁ yathā tathā tadvadeva tu vai viṣṇuṁ smaraṁti vibudhādayaḥ

जैसे शीत से आकुल संसार अग्नि का स्मरण करता है, वैसे ही देवता आदि विष्णु का स्मरण करते हैं।

श्लोक 4 (padma.6.132.4)

पतिव्रता यथा नारी पतिं स्मरति नित्यशः । तथा स्मरंति लोकेशं विष्णुं विश्वेश्वरेश्वरम्

pativratā yathā nārī patiṁ smarati nityaśaḥ tathā smaraṁti lokeśaṁ viṣṇuṁ viśveśvareśvaram

जैसे पतिव्रता स्त्री सदा अपने पति का स्मरण करती है, वैसे ही लोग विश्वेश्वरों के भी ईश्वर, लोकनाथ विष्णु का स्मरण करते हैं।

श्लोक 5 (padma.6.132.5)

भयार्त्तः शरणं यद्वदर्थलोभी यथा धनम् । पुत्रकामो यथा पुत्रं तथा विष्णुं स्मराम्यहम्

bhayārttaḥ śaraṇaṁ yadvadarthalobhī yathā dhanam putrakāmo yathā putraṁ tathā viṣṇuṁ smarāmyaham

जैसे भयभीत मनुष्य आश्रय का स्मरण करता है, धन का लोभी धन का, पुत्र की कामना करने वाला पुत्र का — वैसे ही मैं विष्णु का स्मरण करता हूँ।

श्लोक 6 (padma.6.132.6)

दूरस्थोऽपि यथा गेहं चातको माधवं यथा । ब्रह्मविद्यां ब्रह्मविदस्तथा विष्णुं स्मराम्यहम्

dūrastho'pi yathā gehaṁ cātako mādhavaṁ yathā brahmavidyāṁ brahmavidastathā viṣṇuṁ smarāmyaham

जैसे दूर रहने वाला भी अपने घर का स्मरण करता है, चातक पक्षी वर्षा-मास का स्मरण करता है, ब्रह्मविद् ब्रह्मविद्या का स्मरण करते हैं — वैसे ही मैं विष्णु का स्मरण करता हूँ।

श्लोक 7 (padma.6.132.7)

हंसा मानसमिच्छंति ऋषयः स्मरणं हरेः । भक्ताश्च भक्तिमिच्छंति तथा विष्णुं स्मराम्यहम्

haṁsā mānasamicchaṁti ṛṣayaḥ smaraṇaṁ hareḥ bhaktāśca bhaktimicchaṁti tathā viṣṇuṁ smarāmyaham

जैसे हंस मानसरोवर की इच्छा करते हैं, ऋषि हरि के स्मरण की इच्छा करते हैं, भक्त भक्ति की इच्छा करते हैं — वैसे ही मैं विष्णु का स्मरण करता हूँ।

श्लोक 8 (padma.6.132.8)

प्राणिनां वल्लभो देहो यत्र आत्माऽवतिष्ठति । आयुर्वांच्छंति ये जीवास्तथा विष्णुं स्मराम्यहम्

prāṇināṁ vallabho deho yatra ātmā'vatiṣṭhati āyurvāṁcchaṁti ye jīvāstathā viṣṇuṁ smarāmyaham

जिस देह में आत्मा निवास करती है, वह प्राणियों को प्रिय होती है, और जीव जैसे दीर्घायु की कामना करते हैं — वैसे ही मैं विष्णु का स्मरण करता हूँ।

श्लोक 9 (padma.6.132.9)

भ्रमराश्च यथा पुष्पं चक्रवाका दिवाकरम् । यथात्मवल्लभा भक्तिस्तथा विष्णुं स्मराम्यहम्

bhramarāśca yathā puṣpaṁ cakravākā divākaram yathātmavallabhā bhaktistathā viṣṇuṁ smarāmyaham

जैसे भ्रमर पुष्प को, चक्रवाक पक्षी सूर्य को स्मरण करते हैं, जैसे भक्ति आत्मा को प्रिय होती है — वैसे ही मैं विष्णु का स्मरण करता हूँ।

श्लोक 10 (padma.6.132.10)

अंधेनाकुलिता लोका दीपं वांच्छंति वै यथा । तथा वै पुरुषा लोके स्मरणं केशवस्य च

aṁdhenākulitā lokā dīpaṁ vāṁcchaṁti vai yathā tathā vai puruṣā loke smaraṇaṁ keśavasya ca

जैसे अंधकार से व्याकुल लोग दीपक की कामना करते हैं, वैसे ही संसार में मनुष्य केशव के स्मरण की कामना करते हैं।

श्लोक 11 (padma.6.132.11)

यथा श्रमार्त्ता विश्रामं निद्रा व्यसनिनो यथा । गतालस्या यथा विद्यां तथा विष्णुं स्मराम्यहम्

yathā śramārttā viśrāmaṁ nidrā vyasanino yathā gatālasyā yathā vidyāṁ tathā viṣṇuṁ smarāmyaham

जैसे थका हुआ विश्राम चाहता है, आलस्यहीन व्यक्ति नींद की तरह विद्या चाहता है — वैसे ही मैं विष्णु का स्मरण करता हूँ।

श्लोक 12 (padma.6.132.12)

मातंगाः पार्वतीं भूमिं सिंहा वनगजादिकम् । तथैव स्मरणं विष्णोः कर्तव्यं पापभीरुभिः

mātaṁgāḥ pārvatīṁ bhūmiṁ siṁhā vanagajādikam tathaiva smaraṇaṁ viṣṇoḥ kartavyaṁ pāpabhīrubhiḥ

जैसे हाथी पार्वतीय भूमि का, सिंह वन के हाथी आदि का स्मरण करते हैं — वैसे ही पापों से डरने वालों को विष्णु का स्मरण करना चाहिए।

श्लोक 13 (padma.6.132.13)

सूर्यकांते रवेर्योगाद्वह्निस्तत्र प्रजायते । एवं वै साधुसंयोगाद्धरौ भक्तिः प्रजायते

sūryakāṁte raveryogādvahnistatra prajāyate evaṁ vai sādhusaṁyogāddharau bhaktiḥ prajāyate

सूर्यकांत मणि में सूर्य के संयोग से अग्नि उत्पन्न होती है; वैसे ही साधुजनों के संग से हरि में भक्ति उत्पन्न होती है।

श्लोक 14 (padma.6.132.14)

शीतरश्मेर्यथा कांतश्चंद्रयोगादपः श्रयेत् । एवं वैष्णवसंयोगान्मुक्तिर्भवति शाश्वती

śītaraśmeryathā kāṁtaścaṁdrayogādapaḥ śrayet evaṁ vaiṣṇavasaṁyogānmuktirbhavati śāśvatī

चंद्रकांत मणि चंद्रमा के संयोग से जल उत्पन्न करती है; वैसे ही वैष्णवों के संग से शाश्वत मुक्ति प्राप्त होती है।

श्लोक 15 (padma.6.132.15)

कुमुद्वती यथा सोमं दृष्ट्वा पुष्पं विकासते । तद्वद्देवे कृता भक्तिर्मुक्तिदा सर्वदा नृणाम्

kumudvatī yathā somaṁ dṛṣṭvā puṣpaṁ vikāsate tadvaddeve kṛtā bhaktirmuktidā sarvadā nṛṇām

जैसे कुमुदिनी चंद्रमा को देखकर अपने पुष्प खिला देती है, वैसे ही भगवान में की गई भक्ति सदा मनुष्यों को मुक्ति देने वाली है।

श्लोक 16 (padma.6.132.16)

यथानलायाः संत्रस्ता भ्रमरी स्मरणं चरेत् । तेन स्मरणयोगेन नलासारूप्यतामियात्

yathānalāyāḥ saṁtrastā bhramarī smaraṇaṁ caret tena smaraṇayogena nalāsārūpyatāmiyāt

जैसे नल-पीड़ित भ्रमरी निरंतर उसका स्मरण करती हुई उसी स्मरण-योग से उसी रूप को प्राप्त हो जाती है —

श्लोक 17 (padma.6.132.17)

गोपीभिर्जारबुद्ध्या च विष्णोश्च स्मरणं कृतम् । ताश्च सायुज्यतां नीतास्तथा विष्णुं स्मराम्यहम्

gopībhirjārabuddhyā ca viṣṇośca smaraṇaṁ kṛtam tāśca sāyujyatāṁ nītāstathā viṣṇuṁ smarāmyaham

गोपियों ने कामिनी-भाव से भी विष्णु का स्मरण किया, और वे भी उन्हीं में सायुज्य को प्राप्त हुईं — वैसे ही मैं विष्णु का स्मरण करता हूँ।

श्लोक 18 (padma.6.132.18)

केऽपि वै दुष्टभावेन च्छद्मभावेन केचन । के चापि लोभभावेन चिंतयंति जनार्दनम्

ke'pi vai duṣṭabhāvena cchadmabhāvena kecana ke cāpi lobhabhāvena ciṁtayaṁti janārdanam

कोई दुष्ट भाव से, कोई छल भाव से, तो कोई लोभ के भाव से जनार्दन का चिंतन करते हैं।

श्लोक 19 (padma.6.132.19)

भक्त्या वा स्नेहभावेन द्वेषभावेन वा पुनः । केऽपि स्वामित्त्वभावेन बुद्धया वा बुद्धिपूर्वकम्

bhaktyā vā snehabhāvena dveṣabhāvena vā punaḥ ke'pi svāmittvabhāvena buddhayā vā buddhipūrvakam

कोई भक्ति से या स्नेह के भाव से, कोई द्वेष के भाव से, कोई स्वामी-भाव से, और कोई सोच-समझकर बुद्धिपूर्वक —

श्लोक 20 (padma.6.132.20)

येनकेनापि भावेन चिंतयंति जनार्दनम् । इहलोके सुखं भुक्त्वा यांति विष्णोः सनातनम्

yenakenāpi bhāvena ciṁtayaṁti janārdanam ihaloke sukhaṁ bhuktvā yāṁti viṣṇoḥ sanātanam

जिस किसी भी भाव से जो जनार्दन का चिंतन करते हैं, वे इस लोक में सुख भोगकर विष्णु के सनातन धाम को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 21 (padma.6.132.21)

अहो विष्णोश्च माहात्म्यमद्भुतं लोमहर्षणम् । यदृच्छयापि स्मरणं त्रिधामुक्तिप्रदायकम्

aho viṣṇośca māhātmyamadbhutaṁ lomaharṣaṇam yadṛcchayāpi smaraṇaṁ tridhāmuktipradāyakam

अहो, विष्णु की महिमा कितनी अद्भुत और रोमांचकारी है — कि आकस्मिक स्मरण भी तीनों लोकों से मुक्ति देने वाला है!

श्लोक 22 (padma.6.132.22)

न धनेन समृद्धेन विपुलाविद्यया तथा । एकेन भक्तियोगेन समीपे दृश्यते क्षणात्

na dhanena samṛddhena vipulāvidyayā tathā ekena bhaktiyogena samīpe dṛśyate kṣaṇāt

न समृद्ध धन से, न विपुल विद्या से — केवल एक भक्ति-योग से ही वह क्षणभर में समीप दिखाई देते हैं।

श्लोक 23 (padma.6.132.23)

सांनिध्येऽपि स्थितो दूरे नेत्रयोरंजनं यथा । भक्तियोगेन दृश्येन भक्तैश्चैव सनातनः

sāṁnidhye'pi sthito dūre netrayoraṁjanaṁ yathā bhaktiyogena dṛśyena bhaktaiścaiva sanātanaḥ

जैसे आँखों में लगा हुआ अंजन भी निकट रहकर पास न दिखे तो दूर के समान है, वैसे ही वह सनातन प्रभु समीप रहते हुए भी भक्ति-योग द्वारा ही भक्तों को दिखाई देते हैं।

श्लोक 24 (padma.6.132.24)

इदं तत्वमिदं तत्वं मोहितो देवमायया । भक्तितत्वं यदा प्राप्तं तदा विष्णुमयं जगत्

idaṁ tatvamidaṁ tatvaṁ mohito devamāyayā bhaktitatvaṁ yadā prāptaṁ tadā viṣṇumayaṁ jagat

'यह तत्व है, यह तत्व है' कहकर मनुष्य भगवान की माया से मोहित रहता है; परंतु जब भक्ति-तत्व प्राप्त हो जाता है, तब संपूर्ण जगत् विष्णुमय दिखाई देता है।

श्लोक 25 (padma.6.132.25)

इंद्राद्यैरमृतं प्राप्तं सुखार्थे शृणु सुंदरि । तथापि दुःखितास्ते वै भक्त्या विष्णोर्यथा विना

iṁdrādyairamṛtaṁ prāptaṁ sukhārthe śṛṇu suṁdari tathāpi duḥkhitāste vai bhaktyā viṣṇoryathā vinā

हे सुंदरी, सुनो — इंद्र आदि देवताओं ने सुख के लिए अमृत प्राप्त किया, तो भी वे विष्णु-भक्ति के बिना दुःखी ही रहे।

श्लोक 26 (padma.6.132.26)

भक्तिमेवामृतं प्राप्य पुनर्दुःखं न जायते । वैकुंठाख्यं पदं प्राप्य मोदते विष्णुसन्निधौ

bhaktimevāmṛtaṁ prāpya punarduḥkhaṁ na jāyate vaikuṁṭhākhyaṁ padaṁ prāpya modate viṣṇusannidhau

किंतु भक्ति-रूपी अमृत को पाकर मनुष्य को फिर कभी दुःख नहीं होता; वैकुंठ नामक पद को प्राप्त कर वह विष्णु के सान्निध्य में आनंदित होता है।

श्लोक 27 (padma.6.132.27)

वारि त्यक्त्वा यथा हंसः पयः पिबति नित्यशः । एवं धर्मान्परित्यज्य विष्णोर्भक्तिं समाश्रयेत्

vāri tyaktvā yathā haṁsaḥ payaḥ pibati nityaśaḥ evaṁ dharmānparityajya viṣṇorbhaktiṁ samāśrayet

जैसे हंस जल को छोड़कर सदा दूध ही पीता है, वैसे ही अन्य धर्मों को त्यागकर विष्णु की भक्ति का ही आश्रय लेना चाहिए।

श्लोक 28 (padma.6.132.28)

अन्यभक्तिं परित्यज्य विष्णुभक्तिं समाश्रयेत् । तोयं बद्ध्वा तु वस्त्रेण कृतं कार्यं कथं भवेत्

anyabhaktiṁ parityajya viṣṇubhaktiṁ samāśrayet toyaṁ baddhvā tu vastreṇa kṛtaṁ kāryaṁ kathaṁ bhavet

अन्य भक्तियों को त्यागकर विष्णु-भक्ति का ही आश्रय लेना चाहिए। वस्त्र में जल को बाँधकर किया गया कार्य भला कैसे सिद्ध हो सकता है?

श्लोक 29 (padma.6.132.29)

प्राप्य देहं विना भक्तिं क्रियते स वृथाश्रमः । विष्णुभक्तिं विना धर्मानुपदिशंति ये जनाः । ते पतंति सदा घोरे नरके नात्र संशयः

prāpya dehaṁ vinā bhaktiṁ kriyate sa vṛthāśramaḥ viṣṇubhaktiṁ vinā dharmānupadiśaṁti ye janāḥ te pataṁti sadā ghore narake nātra saṁśayaḥ

मानव देह पाकर भी भक्ति के बिना जो श्रम किया जाता है, वह व्यर्थ ही है। जो लोग विष्णु-भक्ति के बिना अन्य धर्मों का उपदेश देते हैं, वे सदा घोर नरक में गिरते हैं, इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 30 (padma.6.132.30)

बाहुभ्यां सागरं तर्तुं यद्वन्मूर्खोऽभिवांछति । संसारसागरं तद्वद्विष्णुभक्तिं विना नरः

bāhubhyāṁ sāgaraṁ tartuṁ yadvanmūrkho'bhivāṁchati saṁsārasāgaraṁ tadvadviṣṇubhaktiṁ vinā naraḥ

जैसे कोई मूर्ख अपनी दोनों भुजाओं से सागर पार करने की इच्छा करता है, वैसे ही विष्णु-भक्ति के बिना मनुष्य संसार-सागर को पार करना चाहता है।

श्लोक 31 (padma.6.132.31)

विष्णुभक्तिं च रक्षंति कर्मणा पात्यते यदि । अकिंचनः स्पृहायुक्तो मेरौ धत्ते यथा स्पृहाम्

viṣṇubhaktiṁ ca rakṣaṁti karmaṇā pātyate yadi akiṁcanaḥ spṛhāyukto merau dhatte yathā spṛhām

यदि कोई कर्म के वशीभूत होकर गिरता है, तो भी विष्णु-भक्ति की रक्षा करनी चाहिए; जैसे कोई निर्धन व्यक्ति भी सुमेरु पर्वत के धन की कामना कर सकता है —

श्लोक 32 (padma.6.132.32)

तव भक्तौ तथा देव मया हि क्रियते स्पृहा । जन्मांतरे हि सा भक्तिर्मामकी यत्करोति हि

tava bhaktau tathā deva mayā hi kriyate spṛhā janmāṁtare hi sā bhaktirmāmakī yatkaroti hi

हे देव, वैसे ही मैं आपकी भक्ति में सतत लालसा रखता हूँ — क्योंकि यही भक्ति ही है जो मुझे जन्म-जन्मांतर में भी अपना बना लेती है।

श्लोक 33 (padma.6.132.33)

वह्निर्यथेह स्वल्पोऽपि दहते विविधं वनम् । तद्वदेव तु सा भक्तिरणुमात्रा कृता मया

vahniryatheha svalpo'pi dahate vividhaṁ vanam tadvadeva tu sā bhaktiraṇumātrā kṛtā mayā

जैसे यहाँ थोड़ी-सी अग्नि भी विशाल वन को जला डालती है, वैसे ही थोड़ी-सी भी भक्ति, जो मैंने की, अणु-मात्र होते हुए भी अपना फल देगी।

श्लोक 34 (padma.6.132.34)

शतैश्च श्रूयते भक्तिः सहस्रैरपि बुध्यते । तेषां मध्ये तु देवेशि भक्तोह्येकः प्रजायते

śataiśca śrūyate bhaktiḥ sahasrairapi budhyate teṣāṁ madhye tu deveśi bhaktohyekaḥ prajāyate

सैकड़ों लोगों में से कोई एक भक्ति की चर्चा सुनता है, सहस्रों में से कोई एक उसे समझ पाता है; हे देवेशि, उनमें से भी कोई एक ही सच्चा भक्त बन पाता है।

श्लोक 35 (padma.6.132.35)

बुद्धिं परेषां दास्यंति लोके बहुविधा जनाः । स्वयमाचरते सोऽपि नरः कोटिषु दृश्यते

buddhiṁ pareṣāṁ dāsyaṁti loke bahuvidhā janāḥ svayamācarate so'pi naraḥ koṭiṣu dṛśyate

संसार में अनेक प्रकार के लोग औरों को उपदेश देते हैं, किंतु जो स्वयं उसका आचरण भी करता हो, ऐसा मनुष्य करोड़ों में कोई एक ही दिखाई देता है।

श्लोक 36 (padma.6.132.36)

पूजया हस्यते भक्तिर्जयेन परिहस्यते । एवं भावो हि देवेशे भक्तिस्तेनैव गृह्यते

pūjayā hasyate bhaktirjayena parihasyate evaṁ bhāvo hi deveśe bhaktistenaiva gṛhyate

पूजा से भक्ति प्रकट होती है, विजय से वह और उभर आती है; हे देवेशि, इस प्रकार जो भाव भगवान के प्रति होता है, उसी भाव से भक्ति ग्रहण की जाती है।

श्लोक 37 (padma.6.132.37)

सागरे च यथा पातः कूपे त्राणोपवेशनम् । यस्य भावो हि तद्वच्च भक्तिः सा तेन गृह्यते

sāgare ca yathā pātaḥ kūpe trāṇopaveśanam yasya bhāvo hi tadvacca bhaktiḥ sā tena gṛhyate

जैसे सागर में गिरना है और कुएँ में बैठकर रक्षा पाना है — जिसका जैसा भाव होता है, भक्ति भी उसी के अनुरूप ग्रहण की जाती है।

श्लोक 38 (padma.6.132.38)

मूले सिक्तस्य वृक्षस्य पत्रं शाखासु दृश्यते । भजनादेव भो देवि फलमग्रे प्रतिष्ठितम्

mūle siktasya vṛkṣasya patraṁ śākhāsu dṛśyate bhajanādeva bho devi phalamagre pratiṣṭhitam

जड़ में सींचे गए वृक्ष के पत्ते शाखाओं में दिखाई देते हैं; हे देवि, भजन से ही फल आगे स्थापित हो जाता है।

श्लोक 39 (padma.6.132.39)

पानीयहारिणा यद्वत्घटे चित्तं प्रधीयते । तद्वद्देवे हरौ चित्तं धृत्वा मोक्षमवाप्नुयात्

pānīyahāriṇā yadvatghaṭe cittaṁ pradhīyate tadvaddeve harau cittaṁ dhṛtvā mokṣamavāpnuyāt

जैसे जल ढोने वाली स्त्री का चित्त बातें करते हुए भी घड़े पर ही टिका रहता है, वैसे ही मन को भगवान हरि में स्थिर रखकर मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर सकता है।

श्लोक 40 (padma.6.132.40)

शैशवे च यथा माता गुडं स्तोकं ददाति वै । पुनर्याचति वै बालो गुडं वै लोभकारणात्

śaiśave ca yathā mātā guḍaṁ stokaṁ dadāti vai punaryācati vai bālo guḍaṁ vai lobhakāraṇāt

जैसे बचपन में माता थोड़ा-सा गुड़ देती है, तो लोभवश बालक बार-बार और गुड़ माँगता है —

श्लोक 41 (padma.6.132.41)

नीरे नीरं यथाक्षिप्तं दुग्धे दुग्धं घृते घृतम् । तद्वद्भेदं न पश्यंति विष्णुभक्तिप्रसादतः

nīre nīraṁ yathākṣiptaṁ dugdhe dugdhaṁ ghṛte ghṛtam tadvadbhedaṁ na paśyaṁti viṣṇubhaktiprasādataḥ

जैसे जल में मिलाया गया जल, दूध में दूध, घी में घी अलग नहीं दिखता, वैसे ही विष्णु-भक्ति की कृपा से जीव और ईश्वर में भेद नहीं दिखाई देता।

श्लोक 42 (padma.6.132.42)

भानुः सर्वगतो यद्वद्वह्निः सर्वगतो यथा । भक्तिः स्थितस्तथा भक्तः कर्मभिर्नैव बाध्यते

bhānuḥ sarvagato yadvadvahniḥ sarvagato yathā bhaktiḥ sthitastathā bhaktaḥ karmabhirnaiva bādhyate

जैसे सूर्य सर्वत्र व्याप्त है, जैसे अग्नि सर्वत्र व्याप्त है, वैसे ही भक्ति में स्थित भक्त कर्मों से कभी बाधित नहीं होता।

श्लोक 43 (padma.6.132.43)

अजामिलः स्वधर्मं च त्यक्त्वा पापं समाचरन् । पुत्रं नारायणं स्मृत्वा मुक्तिं वै प्राप्तवान्ध्रुवम्

ajāmilaḥ svadharmaṁ ca tyaktvā pāpaṁ samācaran putraṁ nārāyaṇaṁ smṛtvā muktiṁ vai prāptavāndhruvam

अजामिल ने अपना धर्म त्यागकर पाप का आचरण किया था, फिर भी अपने पुत्र 'नारायण' के नाम का स्मरण कर उसने निश्चित रूप से मुक्ति प्राप्त की।

श्लोक 44 (padma.6.132.44)

दिवारात्रौ च ये भक्ता नाममात्रोपजीविनः । वैकुंठवासिनस्ते वै तत्र वेदा हि साक्षिणः

divārātrau ca ye bhaktā nāmamātropajīvinaḥ vaikuṁṭhavāsinaste vai tatra vedā hi sākṣiṇaḥ

जो भक्त दिन-रात केवल भगवान के नाम के सहारे ही जीवन बिताते हैं, वे वैकुंठवासी होते हैं — इसके साक्षी स्वयं वेद हैं।

श्लोक 45 (padma.6.132.45)

अश्वमेधादियज्ञानां फलं स्वर्गेऽपि दृश्यते । तत्फलं तु समग्रं वै भुक्त्वा वै संपतंति च

aśvamedhādiyajñānāṁ phalaṁ svarge'pi dṛśyate tatphalaṁ tu samagraṁ vai bhuktvā vai saṁpataṁti ca

अश्वमेध आदि यज्ञों का फल स्वर्ग में तो प्राप्त होता है, किंतु उस समस्त फल को भोगकर मनुष्य फिर पृथ्वी पर गिर जाते हैं।

श्लोक 46 (padma.6.132.46)

विष्णुभक्तिस्तथा देवि भुक्त्वा भोगाननेकशः । वैकुंठं प्राप्य वा तेषां पुनरागमनं कदा

viṣṇubhaktistathā devi bhuktvā bhogānanekaśaḥ vaikuṁṭhaṁ prāpya vā teṣāṁ punarāgamanaṁ kadā

किंतु, हे देवि, विष्णु-भक्ति से अनेक भोगों को भोगकर भी, वैकुंठ को प्राप्त करने वाले उन भक्तों का पुनः लौटना कभी नहीं होता।

श्लोक 47 (padma.6.132.47)

विष्णुभक्तिः कृता येन विष्णुलोके वसत्यसौ । दृष्टांतं पश्य देवेशि विष्णुभक्तिप्रसादतः

viṣṇubhaktiḥ kṛtā yena viṣṇuloke vasatyasau dṛṣṭāṁtaṁ paśya deveśi viṣṇubhaktiprasādataḥ

जिसने विष्णु की भक्ति की है, वह विष्णुलोक में ही निवास करता है। हे देवेशि, विष्णु-भक्ति की कृपा का यह उदाहरण देखिए —

श्लोक 48 (padma.6.132.48)

ग्रावाणो जलमध्यस्थाः शतशस्तेन तारिताः । विना जलं सोमकांतो विष्णुभक्तस्य मानसम्

grāvāṇo jalamadhyasthāḥ śataśastena tāritāḥ vinā jalaṁ somakāṁto viṣṇubhaktasya mānasam

जल में डूबे हुए सैकड़ों पत्थर भी उसी जल के गुण से तार दिए जाते हैं। बिना जल के भी चंद्रकांत मणि चंद्र-किरण से पिघलती है, वैसे ही विष्णु-भक्त का मन केवल स्मरण मात्र से पिघल जाता है।

श्लोक 49 (padma.6.132.49)

दर्दुरो वसते नीरे षट्पदो हि वनांतरे । गंधं वेत्ति कुमुद्वत्या भक्तो भक्तौ तथा हरेः

darduro vasate nīre ṣaṭpado hi vanāṁtare gaṁdhaṁ vetti kumudvatyā bhakto bhaktau tathā hareḥ

मेंढक जल में रहता है, भ्रमर वन के भीतर रहता है, फिर भी भ्रमर कुमुदिनी की सुगंध को पहचान लेता है — वैसे ही भक्त हरि की भक्ति के रस को पहचान लेता है।

श्लोक 50 (padma.6.132.50)

गंगातटे वसंत्येके एके वै शतयोजनम् । कश्चिद्गंगाफलं वेत्ति विष्णुभक्तिं परस्तथा

gaṁgātaṭe vasaṁtyeke eke vai śatayojanam kaścidgaṁgāphalaṁ vetti viṣṇubhaktiṁ parastathā

कोई गंगा के तट पर निवास करता है, कोई सौ योजन दूर रहता है; कोई गंगा के फल को जानता है, वैसे ही कोई विष्णु-भक्ति के फल को जानता है।

श्लोक 51 (padma.6.132.51)

कर्पूरागुरुभारं हि उष्ट्रो वहति नित्यशः । मध्यगंधं न जानाति तथा विष्णुं बहिर्मुखाः

karpūrāgurubhāraṁ hi uṣṭro vahati nityaśaḥ madhyagaṁdhaṁ na jānāti tathā viṣṇuṁ bahirmukhāḥ

ऊँट सदा कर्पूर और अगर की गठरी ढोता है, फिर भी उसके बीच की सुगंध को नहीं पहचानता; वैसे ही बहिर्मुखी लोग विष्णु को नहीं पहचानते।

श्लोक 52 (padma.6.132.52)

मृगाः शालं हि जिघ्रंति कस्तूरीगंधमिच्छवः । स्वनाभिस्थं न जानंति तथा विष्णुं बहिर्मुखाः

mṛgāḥ śālaṁ hi jighraṁti kastūrīgaṁdhamicchavaḥ svanābhisthaṁ na jānaṁti tathā viṣṇuṁ bahirmukhāḥ

मृग कस्तूरी की गंध चाहते हुए वन को सूँघते फिरते हैं, अपनी ही नाभि में स्थित उस गंध को नहीं जानते; वैसे ही बहिर्मुखी लोग विष्णु को नहीं जानते।

श्लोक 53 (padma.6.132.53)

उपदेशो हि मूर्खाणां वृथा वै नगनंदिनि । तथैव विष्णुभक्तेर्हि उपदेशो बहिर्मुखे

upadeśo hi mūrkhāṇāṁ vṛthā vai naganaṁdini tathaiva viṣṇubhakterhi upadeśo bahirmukhe

हे पर्वत-पुत्री, मूर्खों को उपदेश देना व्यर्थ ही है; उसी प्रकार बहिर्मुखी व्यक्ति को विष्णु-भक्ति का उपदेश देना भी व्यर्थ है।

श्लोक 54 (padma.6.132.54)

अहिना च पयः पीतं तत्पयो हि विषायते । तथा वै चान्यभक्तानां विष्णुभक्तिर्विषायते

ahinā ca payaḥ pītaṁ tatpayo hi viṣāyate tathā vai cānyabhaktānāṁ viṣṇubhaktirviṣāyate

सर्प द्वारा पिया गया दूध भी विष बन जाता है; वैसे ही अन्य देवताओं की भक्ति में रत लोगों के लिए विष्णु-भक्ति भी विष के समान हो जाती है।

श्लोक 55 (padma.6.132.55)

चक्षुर्विना यथा दीपं दृष्ट्वा दर्पणमेव च । समीपस्था न पश्यंति तथा विष्णुं बहिर्मुखाः

cakṣurvinā yathā dīpaṁ dṛṣṭvā darpaṇameva ca samīpasthā na paśyaṁti tathā viṣṇuṁ bahirmukhāḥ

जैसे बिना आँखों के कोई दीपक अथवा दर्पण को देखकर भी नहीं देखता, वैसे ही बहिर्मुखी लोग निकट होकर भी विष्णु को नहीं देखते।

श्लोक 56 (padma.6.132.56)

पावको हि यथा धूमैरादर्शोपि मलेन च । यथोल्बेनावृतो गर्भो देहे कृष्णस्तथावृतः

pāvako hi yathā dhūmairādarśopi malena ca yatholbenāvṛto garbho dehe kṛṣṇastathāvṛtaḥ

जैसे अग्नि धुएँ से ढकी रहती है, दर्पण मैल से ढका रहता है, गर्भ जिस प्रकार झिल्ली से ढका रहता है — उसी प्रकार श्रीकृष्ण भी देह में ढके रहते हैं।

श्लोक 57 (padma.6.132.57)

दुग्धे सर्पिः स्थितं यद्वत्तिले तैलं तु सर्वदा । चराचरे तथा विष्णुर्दृश्यते नगनंदिनि

dugdhe sarpiḥ sthitaṁ yadvattile tailaṁ tu sarvadā carācare tathā viṣṇurdṛśyate naganaṁdini

हे पर्वत-पुत्री, जैसे दूध में घी और तिल में तेल सदा विद्यमान रहता है, वैसे ही विष्णु समस्त चराचर में विद्यमान देखे जाते हैं।

श्लोक 58 (padma.6.132.58)

एकसूत्रे मणिगणा धार्यंते बहवो यथा । एवं ब्रह्मादिभिर्विश्वं संप्रोतं ब्रह्मचिन्मये

ekasūtre maṇigaṇā dhāryaṁte bahavo yathā evaṁ brahmādibhirviśvaṁ saṁprotaṁ brahmacinmaye

जैसे एक ही धागे में अनेक मणियाँ पिरोई जाती हैं, वैसे ही ब्रह्मा आदि सहित यह संपूर्ण विश्व चिन्मय ब्रह्म में ही पिरोया हुआ है।

श्लोक 59 (padma.6.132.59)

यथा काष्ठे स्थितो वह्निर्मंथनादेव दृश्यते । एवं सर्वगतो विष्णुर्ध्यानादेव प्रदृश्यते

yathā kāṣṭhe sthito vahnirmaṁthanādeva dṛśyate evaṁ sarvagato viṣṇurdhyānādeva pradṛśyate

जैसे लकड़ी में स्थित अग्नि मंथन से ही प्रकट होती है, वैसे ही सर्वव्यापी विष्णु ध्यान से ही दिखाई पड़ते हैं।

श्लोक 60 (padma.6.132.60)

आदिरेको भवेद्दीपस्तस्माज्जाताः सहस्रशः । एवमेकः स्थितो विष्णुः सर्वव्याप्य प्रतिष्ठति

ādireko bhaveddīpastasmājjātāḥ sahasraśaḥ evamekaḥ sthito viṣṇuḥ sarvavyāpya pratiṣṭhati

पहले एक ही दीपक होता है, उससे सहस्रों दीपक प्रज्वलित हो जाते हैं; वैसे ही एक ही विष्णु सर्वव्यापी होकर प्रतिष्ठित हैं।

श्लोक 61 (padma.6.132.61)

यथा सूर्योदये ज्योतिः पुष्करे तिष्ठते सदा । दृश्यते बहुधा नीरे लोके विष्णुस्तथा हि सः

yathā sūryodaye jyotiḥ puṣkare tiṣṭhate sadā dṛśyate bahudhā nīre loke viṣṇustathā hi saḥ

जैसे सूर्योदय होने पर एक ही ज्योति आकाश में रहती है, किंतु जल के अनेक पात्रों में वह अनेक रूप में दिखाई देती है, वैसे ही संसार में विष्णु भी अनेक रूपों में दिखाई देते हैं।

श्लोक 62 (padma.6.132.62)

मारुतः प्रकृतिस्थोऽपि नानागंधवहः सदा । ईश्वरः सर्वजीवस्थो भुंक्ते प्रकृतिजान्गुणान्

mārutaḥ prakṛtistho'pi nānāgaṁdhavahaḥ sadā īśvaraḥ sarvajīvastho bhuṁkte prakṛtijānguṇān

वायु, प्रकृति में स्थित रहते हुए भी सदा नाना गंधों को वहन करती है; वैसे ही ईश्वर, समस्त जीवों में स्थित रहते हुए, प्रकृति से उत्पन्न गुणों का अनुभव करता है।

श्लोक 63 (padma.6.132.63)

शर्करा विषसंयोगान्नीरं भवति यादृशम् । संभूत्त्वा तादृशो ह्यात्मा कर्मणः फलमश्नुते

śarkarā viṣasaṁyogānnīraṁ bhavati yādṛśam saṁbhūttvā tādṛśo hyātmā karmaṇaḥ phalamaśnute

चीनी और विष के संयोग से जल जैसा बन जाता है, वैसा ही बनकर आत्मा भी अपने कर्मों के फल को भोगता है।

श्लोक 64 (padma.6.132.64)

उर्वी च नीरसंयोगान्नानावृक्षा प्रजायते । प्रकृतेर्गुणसंयोगान्नानायोनिषु जायते

urvī ca nīrasaṁyogānnānāvṛkṣā prajāyate prakṛterguṇasaṁyogānnānāyoniṣu jāyate

पृथ्वी जल के संयोग से नाना प्रकार के वृक्ष उत्पन्न करती है; वैसे ही प्रकृति के गुणों के संयोग से आत्मा नाना योनियों में जन्म लेता है।

श्लोक 65 (padma.6.132.65)

गजे वै मशके चैव देवे वा मानुषेऽपि वा । नाधिको न च न्यूनो वै निष्ठो देहे स निश्चलः

gaje vai maśake caiva deve vā mānuṣe'pi vā nādhiko na ca nyūno vai niṣṭho dehe sa niścalaḥ

चाहे हाथी में हो, मच्छर में हो, देवता में हो या मनुष्य में — वह न अधिक होता है न न्यून; वह अचल होकर देह में स्थित रहता है।

श्लोक 66 (padma.6.132.66)

ब्रह्मादिस्तंबपर्यंता ये चात्र भुवि मानवाः । देवा यज्ञास्तथा नागा गंधर्वाः किन्नरादयः

brahmādistaṁbaparyaṁtā ye cātra bhuvi mānavāḥ devā yajñāstathā nāgā gaṁdharvāḥ kinnarādayaḥ

ब्रह्मा से लेकर घास के तिनके तक, इस पृथ्वी पर जो भी मनुष्य हैं, देवता, यज्ञ, नाग, गंधर्व, किन्नर आदि —

श्लोक 67 (padma.6.132.67)

तेषु सर्वेषु दृश्यंते जले चंद्रमसो यथा । स सच्चिदानंदशिवः स महेशो हि दृश्यते

teṣu sarveṣu dṛśyaṁte jale caṁdramaso yathā sa saccidānaṁdaśivaḥ sa maheśo hi dṛśyate

उन सबमें वह वैसे ही दिखाई देते हैं जैसे जल में चंद्रमा दिखाई देता है; वही सच्चिदानंद शिव, वही महेश्वर देखे जाते हैं।

श्लोक 68 (padma.6.132.68)

स वै विष्णुस्तथा प्रोक्तः सोऽयं सर्वगतो हरिः । वेदांतवेद्यः सर्वेशः कालातीतो ह्यनामयः

sa vai viṣṇustathā proktaḥ so'yaṁ sarvagato hariḥ vedāṁtavedyaḥ sarveśaḥ kālātīto hyanāmayaḥ

वही विष्णु कहा गया है, वही सर्वव्यापी हरि है, वेदांत द्वारा जानने योग्य, सबका स्वामी, काल से परे और रोगरहित।

श्लोक 69 (padma.6.132.69)

एवं तं वेत्ति यो देवि स भक्तो नात्र संशयः । एको हि बहुधा ज्ञेयो बहुधाप्येक एव सः

evaṁ taṁ vetti yo devi sa bhakto nātra saṁśayaḥ eko hi bahudhā jñeyo bahudhāpyeka eva saḥ

हे देवि, जो इस प्रकार उसे जानता है, वही सच्चा भक्त है, इसमें कोई संशय नहीं। वह एक ही है, फिर भी अनेक रूपों में जाना जाता है; अनेक होते हुए भी वह एक ही है।

श्लोक 70 (padma.6.132.70)

नामरूपविभेदेन जल्प्यते बहुधा भुवि । चक्षुषा न रवेर्ज्योतिर्भानुना चक्षुरेधते

nāmarūpavibhedena jalpyate bahudhā bhuvi cakṣuṣā na raverjyotirbhānunā cakṣuredhate

नाम-रूप के भेद से पृथ्वी पर वह अनेक प्रकार से कहा जाता है। आँख से सूर्य की ज्योति नहीं देखी जाती, बल्कि सूर्य से ही आँख सक्षम होती है।

श्लोक 71 (padma.6.132.71)

परमात्मा तथा चात्मा प्रतिदेहे तु सर्वदा । घटे घटे यथाकाशस्तस्मिन्भग्ने यथा स्थितः

paramātmā tathā cātmā pratidehe tu sarvadā ghaṭe ghaṭe yathākāśastasminbhagne yathā sthitaḥ

वैसे ही परमात्मा प्रत्येक देह में सदा आत्मा के रूप में विद्यमान रहता है; जैसे प्रत्येक घड़े में आकाश रहता है, और घड़ा टूटने पर भी वह वैसे ही रहता है।

श्लोक 72 (padma.6.132.72)

रूपे रूपे तथा त्वं हि भग्ने तस्मिन्सुनिश्चलः । यथा काष्ठमयं रूपं पतते प्रभुणा विना

rūpe rūpe tathā tvaṁ hi bhagne tasminsuniścalaḥ yathā kāṣṭhamayaṁ rūpaṁ patate prabhuṇā vinā

उसी प्रकार आप भी प्रत्येक रूप में विद्यमान हैं, और उस रूप के नष्ट होने पर भी सर्वथा अचल रहते हैं। जैसे लकड़ी की मूर्ति भी उसके स्वामी (प्राण-चेतना) के बिना गिर जाती है,

श्लोक 73 (padma.6.132.73)

क्रिमिभेदमयो देहो पतते चात्मना विना । हेम्नो भवंति वर्णाश्च वह्निना यांति पूर्ववत्

krimibhedamayo deho patate cātmanā vinā hemno bhavaṁti varṇāśca vahninā yāṁti pūrvavat

वैसे ही कीड़ों का भक्ष्य बनने वाला यह शरीर भी आत्मा के बिना गिर पड़ता है। सोने के रंग अग्नि से ही उभरते हैं और पहले जैसे ही शुद्ध हो जाते हैं।

श्लोक 74 (padma.6.132.74)

तद्वज्जीवाः प्रपद्यंते भक्ता वै पूर्वरूपताम् । स्वघनेनावृतं सूर्यं मूढाः पश्यंति निष्प्रभम्

tadvajjīvāḥ prapadyaṁte bhaktā vai pūrvarūpatām svaghanenāvṛtaṁ sūryaṁ mūḍhāḥ paśyaṁti niṣprabham

उसी प्रकार भक्त जीव अपने पूर्व स्वरूप को प्राप्त कर लेते हैं। जैसे मूढ़ लोग अपने ही बादलों से ढके सूर्य को कांतिहीन देखते हैं,

श्लोक 75 (padma.6.132.75)

तथाऽज्ञानधियो मूढा न जानंति तमीश्वरम् । निर्विकल्पं निराकारं वेदां तैः परिपाठ्यते

tathā'jñānadhiyo mūḍhā na jānaṁti tamīśvaram nirvikalpaṁ nirākāraṁ vedāṁ taiḥ paripāṭhyate

वैसे ही अज्ञान-बुद्धि वाले मूढ़ लोग उस ईश्वर को नहीं जानते, जो निर्विकल्प और निराकार है, जिसका वर्णन वेदों द्वारा किया जाता है।

श्लोक 76 (padma.6.132.76)

निराकाराच्च साकारं स्वेच्छया च प्रकाशते । तस्मात्संजातमाकाशं निःशब्दं गुणवर्जितम्

nirākārācca sākāraṁ svecchayā ca prakāśate tasmātsaṁjātamākāśaṁ niḥśabdaṁ guṇavarjitam

निराकार से ही साकार रूप अपनी इच्छा से प्रकट होता है। उससे ही आकाश उत्पन्न हुआ, जो आरंभ में शब्दरहित और गुणों से रहित था।

श्लोक 77 (padma.6.132.77)

आकाशान्मारुतो जातः सशब्दं च तदाऽभवत् । वातादजायत ज्योतिर्ज्योतिषश्चाभवज्जलम्

ākāśānmāruto jātaḥ saśabdaṁ ca tadā'bhavat vātādajāyata jyotirjyotiṣaścābhavajjalam

आकाश से वायु उत्पन्न हुई, तब उसमें शब्द उत्पन्न हुआ। वायु से तेज उत्पन्न हुआ, और तेज से जल उत्पन्न हुआ।

श्लोक 78 (padma.6.132.78)

तज्जले रुक्मगर्भश्च विराड्वै विश्वरूपधृक् । तस्य नाभिसरोजे च ब्रह्मांडानां च कोटयः

tajjale rukmagarbhaśca virāḍvai viśvarūpadhṛk tasya nābhisaroje ca brahmāṁḍānāṁ ca koṭayaḥ

उस जल में सुवर्ण-गर्भ (हिरण्यगर्भ), विराट पुरुष, विश्वरूपधारी उत्पन्न हुआ। उसकी नाभि के कमल में करोड़ों ब्रह्मांड स्थित हैं।

श्लोक 79 (padma.6.132.79)

प्रकृतिः पुरुषस्तस्मान्निर्मितं तु त्रिधा जगत् । तयोर्द्वयोश्च संयोगात्तत्त्वयोगो ऽभ्यजायत

prakṛtiḥ puruṣastasmānnirmitaṁ tu tridhā jagat tayordvayośca saṁyogāttattvayogo 'bhyajāyata

उससे प्रकृति और पुरुष उत्पन्न हुए, और उन दोनों से यह त्रिविध जगत् रचा गया। उन दोनों के संयोग से ही तत्वों का सम्मिलन उत्पन्न हुआ।

श्लोक 80 (padma.6.132.80)

सात्विकी विष्णुसंभूतिर्ब्रह्मा वै राजसः स्मृतः । शिवस्तु तामसः प्रोक्त एभिः सर्वं प्रवर्तितम्

sātvikī viṣṇusaṁbhūtirbrahmā vai rājasaḥ smṛtaḥ śivastu tāmasaḥ prokta ebhiḥ sarvaṁ pravartitam

सात्विक अभिव्यक्ति विष्णु से हुई, ब्रह्मा राजसिक कहे गए हैं, और शिव तामसिक कहे गए हैं — इन्हीं तीनों से सारा जगत् प्रवृत्त हुआ है।

श्लोक 81 (padma.6.132.81)

एका ब्राह्मी स्थितिर्लोके कर्मबीजानुसारतः । तया संहरते विष्णुः सर्वलोकानुशेषतः

ekā brāhmī sthitirloke karmabījānusārataḥ tayā saṁharate viṣṇuḥ sarvalokānuśeṣataḥ

संसार में एक ही ब्रह्म-स्थिति है, जो कर्म-बीज के अनुसार चलती है; उसी के द्वारा विष्णु सारे लोकों का, शेष सहित, संहार करते हैं।

श्लोक 82 (padma.6.132.82)

तिष्ठत्यसौ तदा तत्र भगवान्विष्णुरव्ययः । एवं सर्वगतो विष्णुरादिमध्यांत एव च

tiṣṭhatyasau tadā tatra bhagavānviṣṇuravyayaḥ evaṁ sarvagato viṣṇurādimadhyāṁta eva ca

तब वह अविनाशी भगवान विष्णु ही वहाँ शेष रहते हैं। इस प्रकार विष्णु ही आदि, मध्य और अंत में सर्वव्यापी हैं।

श्लोक 83 (padma.6.132.83)

अविद्यया न जानंति लोका वै कर्मनिश्चिताः । वर्णोचितानि कर्माणि यः कालेषु प्रकारयेत्

avidyayā na jānaṁti lokā vai karmaniścitāḥ varṇocitāni karmāṇi yaḥ kāleṣu prakārayet

अविद्या के कारण, कर्म में निश्चित रहने वाले लोग उसे नहीं जानते। जो अपने वर्ण के अनुरूप कर्म समय-समय पर करता है,

श्लोक 84 (padma.6.132.84)

यत्कर्मविष्णुदैवत्यं न हि गर्भस्य कारणम् । वेदांतशास्त्रे मुनिभिः सर्वदैव विचार्यते

yatkarmaviṣṇudaivatyaṁ na hi garbhasya kāraṇam vedāṁtaśāstre munibhiḥ sarvadaiva vicāryate

जो कर्म विष्णु को अर्पित होकर किया गया है, वह पुनर्जन्म का कारण नहीं बनता — यह बात वेदांत-शास्त्र में मुनियों द्वारा सदा विचारित की गई है।

श्लोक 85 (padma.6.132.85)

ब्रह्मज्ञानमिदं देहे तदहं परिकीर्त्तये । शुभाशुभस्य कार्यं च कारणं मन एव हि

brahmajñānamidaṁ dehe tadahaṁ parikīrttaye śubhāśubhasya kāryaṁ ca kāraṇaṁ mana eva hi

यह ब्रह्मज्ञान देह में ही निहित है, इसका मैं वर्णन करता हूँ। शुभ और अशुभ कार्य का कारण मन ही है।

श्लोक 86 (padma.6.132.86)

मनसा शुध्यते सर्वं तदा ब्रह्म सनातनम् । मन एव सदा बंधुर्मन एव सदा रिपुः

manasā śudhyate sarvaṁ tadā brahma sanātanam mana eva sadā baṁdhurmana eva sadā ripuḥ

मन से ही सब कुछ शुद्ध होता है, तभी सनातन ब्रह्म प्राप्त होता है। मन ही सदा मित्र है, और मन ही सदा शत्रु है।

श्लोक 87 (padma.6.132.87)

मनसा तारिताः केचिन्मनसा यातिताश्च के । मध्ये सर्वपरित्यागः बाह्ये कर्म तथाचरन्

manasā tāritāḥ kecinmanasā yātitāśca ke madhye sarvaparityāgaḥ bāhye karma tathācaran

कोई मन के द्वारा तार दिए जाते हैं, कोई मन के द्वारा ही नष्ट कर दिए जाते हैं। भीतर से सबका त्याग करते हुए, बाहर से विहित कर्म का आचरण करते हुए —

श्लोक 88 (padma.6.132.88)

एवमेव कृतं कर्म कुर्वन्नपि न लिप्यते । पद्मपत्रं यथा नीर लेशैरपि न लिप्यते

evameva kṛtaṁ karma kurvannapi na lipyate padmapatraṁ yathā nīra leśairapi na lipyate

इस प्रकार किया गया कर्म करते हुए भी मनुष्य उससे लिप्त नहीं होता — जैसे कमल का पत्ता जल की बूँदों से भी नहीं भीगता।

श्लोक 89 (padma.6.132.89)

अग्निरग्नौ यथा क्षिप्तो भक्त्या च किं प्रयोजनम् । यदा भक्तिरसो ज्ञातो न मुक्ती रोचते तदा

agniragnau yathā kṣipto bhaktyā ca kiṁ prayojanam yadā bhaktiraso jñāto na muktī rocate tadā

जैसे अग्नि को अग्नि में डालने से कोई भेद नहीं होता, वैसे ही जब भक्ति का रस जान लिया जाता है, तब मुक्ति भी नहीं रुचती।

श्लोक 90 (padma.6.132.90)

योगैरष्टविधैर्विष्णुर्न प्राप्यश्चेह जन्मनि । भक्त्या वा प्राप्यते विष्णुः सर्वदा सुलभो भवेत्

yogairaṣṭavidhairviṣṇurna prāpyaśceha janmani bhaktyā vā prāpyate viṣṇuḥ sarvadā sulabho bhavet

आठ प्रकार के योगों से भी विष्णु इस जन्म में प्राप्त नहीं होते, किंतु भक्ति से विष्णु सदा सुलभ हो जाते हैं।

श्लोक 91 (padma.6.132.91)

वेदांतैः प्राप्यते ज्ञानं ज्ञानेन ज्ञेयमेव च । तत्तु ज्ञेयं यदा प्राप्तं तदा शून्यमिदं जगत्

vedāṁtaiḥ prāpyate jñānaṁ jñānena jñeyameva ca tattu jñeyaṁ yadā prāptaṁ tadā śūnyamidaṁ jagat

वेदांत से ज्ञान प्राप्त होता है, और ज्ञान से ही ज्ञेय (परमात्मा) प्राप्त होता है। जब वह ज्ञेय प्राप्त हो जाता है, तब यह जगत् शून्य-सा प्रतीत होने लगता है।

श्लोक 92 (padma.6.132.92)

बलेन प्राप्यते विष्णुर्योगैरष्टविधैश्च किम् । सर्वेषामेव भावानां भावशुद्धिः प्रशस्यते

balena prāpyate viṣṇuryogairaṣṭavidhaiśca kim sarveṣāmeva bhāvānāṁ bhāvaśuddhiḥ praśasyate

विष्णु बल से प्राप्त किए जाते हैं, फिर आठ प्रकार के योगों से क्या लाभ? समस्त भावों में भाव की शुद्धि ही सराही जाती है।

श्लोक 93 (padma.6.132.93)

आलिंग्यते यथा कांता यथा भावस्तथा फलम् । उपानद्युक्तपादो हि वेत्ति चर्ममयीं महीम्

āliṁgyate yathā kāṁtā yathā bhāvastathā phalam upānadyuktapādo hi vetti carmamayīṁ mahīm

जैसे प्रिया का आलिंगन किया जाता है, वैसे ही जैसा भाव होता है, फल भी वैसा ही मिलता है। जिसके पैर में जूते हों, वह पृथ्वी को मानो चमड़े से ढकी हुई ही अनुभव करता है।

श्लोक 94 (padma.6.132.94)

बुद्धिर्यथाविधा यस्य तद्वत्स मन्यते जगत् । दुग्धेन सिक्तो निंबोऽपि कटुभावं न तु त्यजेत्

buddhiryathāvidhā yasya tadvatsa manyate jagat dugdhena sikto niṁbo'pi kaṭubhāvaṁ na tu tyajet

जिसकी जैसी बुद्धि होती है, वह जगत् को उसी रूप में देखता है। नीम को दूध से सींचने पर भी वह अपना कड़वापन नहीं छोड़ता।

श्लोक 95 (padma.6.132.95)

प्रकृतिं यांति भूतानि उपदेशो निरर्थकः । छित्वा वै सहकारं च फलं पत्रं कथं लभेत्

prakṛtiṁ yāṁti bhūtāni upadeśo nirarthakaḥ chitvā vai sahakāraṁ ca phalaṁ patraṁ kathaṁ labhet

प्राणी अपनी ही प्रकृति की ओर लौट जाते हैं — उपदेश तो निरर्थक ही है। आम के वृक्ष को काट डालकर भला उससे फल और पत्ते कैसे पाए जा सकते हैं?

श्लोक 96 (padma.6.132.96)

इंद्रियाणां सुखार्थेन वृथा जन्म कथं नयेत् । स्थाल्यां वैडूर्यमय्यां हि पच्यते चौषधं यथा

iṁdriyāṇāṁ sukhārthena vṛthā janma kathaṁ nayet sthālyāṁ vaiḍūryamayyāṁ hi pacyate cauṣadhaṁ yathā

केवल इंद्रियों के सुख के लिए मनुष्य अपने जन्म को व्यर्थ क्यों बिताए? जैसे वैडूर्यमणि के पात्र में औषधि पकाई जाती है,

श्लोक 97 (padma.6.132.97)

दह्यते चागदस्तद्वद्वृथाजन्म कथं भवेत् । निधानं च गृहे क्षिप्त्वा शुभः सेवां कथं चरेत्

dahyate cāgadastadvadvṛthājanma kathaṁ bhavet nidhānaṁ ca gṛhe kṣiptvā śubhaḥ sevāṁ kathaṁ caret

और वह पात्र ही जल जाता है, वैसे ही यह जन्म भी व्यर्थ क्यों हो? घर में खजाना रखकर भला शुभ मनुष्य दूसरों की सेवा (भिक्षा) क्यों करेगा?

श्लोक 98 (padma.6.132.98)

त्यक्त्वा वैकुंठनाथं तमन्यमार्गे कथं रमेत् । भक्तिहीनैश्चतुर्वेदैः पठितैः किं प्रयोजनम्

tyaktvā vaikuṁṭhanāthaṁ tamanyamārge kathaṁ ramet bhaktihīnaiścaturvedaiḥ paṭhitaiḥ kiṁ prayojanam

वैकुंठनाथ को त्यागकर मनुष्य किसी अन्य मार्ग में भला क्यों रमे? भक्तिरहित होकर पढ़े गए चारों वेदों से भी क्या प्रयोजन सिद्ध होता है?

श्लोक 99 (padma.6.132.99)

श्वापचो भक्तियुक्तस्तु त्रिदशैरपि पूज्यते । स्वकरे कंकणं बद्ध्वा दर्पणैः किं प्रयोजनम्

śvāpaco bhaktiyuktastu tridaśairapi pūjyate svakare kaṁkaṇaṁ baddhvā darpaṇaiḥ kiṁ prayojanam

भक्तियुक्त चांडाल भी देवताओं द्वारा पूजनीय हो जाता है। अपने ही हाथ में कंगन बाँधकर दर्पण से भला क्या प्रयोजन?

श्लोक 100 (padma.6.132.100)

ब्रह्मरुद्रादिभिर्देवैर्दत्तैश्वर्याश्च सेवकाः । अर्पितं नैव गृह्णंति प्रभोश्चैव तु किंचन

brahmarudrādibhirdevairdattaiśvaryāśca sevakāḥ arpitaṁ naiva gṛhṇaṁti prabhoścaiva tu kiṁcana

ब्रह्मा, रुद्र आदि देवताओं द्वारा जिन्हें ऐश्वर्य प्रदान किया गया है, वे सेवक भी अपने स्वामी को अर्पित कुछ भी वस्तु स्वयं ग्रहण नहीं करते।

श्लोक 101 (padma.6.132.101)

अकिंचनाय भक्ताय दातुं नालं गतो वरम् । निःशरीरस्य कृष्णस्य तत्र ध्यानं कथं भवेत्

akiṁcanāya bhaktāya dātuṁ nālaṁ gato varam niḥśarīrasya kṛṣṇasya tatra dhyānaṁ kathaṁ bhavet

निर्धन भक्त को कुछ देने के लिए भी श्रीकृष्ण समर्थ न हों, ऐसा नहीं हो सकता। शरीररहित कृष्ण का वहाँ ध्यान भला कैसे संभव हो?

श्लोक 102 (padma.6.132.102)

साकारं बहवो दृष्ट्वा गता भक्त्या च तत्पदम् । पूजा भक्तिः कथं शून्ये साकारे कथ्यते बुधैः

sākāraṁ bahavo dṛṣṭvā gatā bhaktyā ca tatpadam pūjā bhaktiḥ kathaṁ śūnye sākāre kathyate budhaiḥ

अनेक लोगों ने साकार रूप को देखकर भक्ति से उसी पद को प्राप्त किया है। पूजा और भक्ति भला शून्य में कैसे हो सकती है? ज्ञानीजन साकार रूप की ही बात कहते हैं।

श्लोक 103 (padma.6.132.103)

शून्यमार्गे कथं याति आधारेण विना नरः । साकारो यः स्वयं स्वामी निराकारः स वै प्रभुः

śūnyamārge kathaṁ yāti ādhāreṇa vinā naraḥ sākāro yaḥ svayaṁ svāmī nirākāraḥ sa vai prabhuḥ

बिना किसी आधार के मनुष्य शून्य के मार्ग पर भला कैसे चले? जो स्वयं स्वामी है, वह साकार है; निराकार होते हुए भी वही प्रभु है।

श्लोक 104 (padma.6.132.104)

साकारो हि सुखेनैव निराकारो न दृश्यते । सेवारसश्च साकारे निराकारेण वैरसः

sākāro hi sukhenaiva nirākāro na dṛśyate sevārasaśca sākāre nirākāreṇa vairasaḥ

साकार रूप का ध्यान तो सुखपूर्वक हो सकता है, निराकार तो दिखाई ही नहीं देता। सेवा का रस साकार में है, निराकार में तो नीरसता ही है।

श्लोक 105 (padma.6.132.105)

साकारेण निराकारो ज्ञायते स्वयमेव हि । हरिस्मृतिप्रसादेन रोमांचित तनुर्यदा

sākāreṇa nirākāro jñāyate svayameva hi harismṛtiprasādena romāṁcita tanuryadā

साकार के द्वारा ही निराकार भी स्वयं जाना जाता है। जब हरि के स्मरण की कृपा से शरीर रोमांचित हो उठता है,

श्लोक 106 (padma.6.132.106)

नयनानंदसलिलं मुक्तिर्दासी भवेत्तदा । बाल्ये च यत्कृतं पापं तत्कथं न विनश्यति

nayanānaṁdasalilaṁ muktirdāsī bhavettadā bālye ca yatkṛtaṁ pāpaṁ tatkathaṁ na vinaśyati

और आँखों से आनंद के अश्रु बहने लगते हैं, तब मुक्ति भी दासी के समान बन जाती है। बचपन में किया गया पाप भी भला क्यों न नष्ट हो जाए?

श्लोक 107 (padma.6.132.107)

पूजादानव्रतैस्तीर्थैर्जपहोमैस्त्वदर्पितैः । निजधर्मं परित्यज्य तपो घोरं कथं चरेत्

pūjādānavrataistīrthairjapahomaistvadarpitaiḥ nijadharmaṁ parityajya tapo ghoraṁ kathaṁ caret

पूजा, दान, व्रत, तीर्थ, जप और हवन — जब ये सब आपको ही अर्पित हों, तो मनुष्य अपने धर्म को त्यागकर घोर तप भला क्यों करे?

श्लोक 108 (padma.6.132.108)

स्वधर्मे निधनं श्रेयः परमधर्मो भयावहः । विधिं संत्यज्य शास्त्रीयं तपो घोरं कथं चरेत्

svadharme nidhanaṁ śreyaḥ paramadharmo bhayāvahaḥ vidhiṁ saṁtyajya śāstrīyaṁ tapo ghoraṁ kathaṁ caret

अपने ही धर्म में मृत्यु भी श्रेयस्कर है, परधर्म तो भयावह है। शास्त्रीय विधि को त्यागकर घोर तप भला कैसे किया जाए?

श्लोक 109 (padma.6.132.109)

आश्रमेण विना मूढो नैव सिद्धिमवाप्नुयात् । ब्रह्मणा निर्मिता वर्णाः स्वे स्वे धर्मे नियोजिताः

āśrameṇa vinā mūḍho naiva siddhimavāpnuyāt brahmaṇā nirmitā varṇāḥ sve sve dharme niyojitāḥ

बिना अपने आश्रम के मूढ़ मनुष्य सिद्धि प्राप्त नहीं कर सकता। ब्रह्मा द्वारा रचे गए वर्ण अपने-अपने धर्म में नियुक्त किए गए हैं।

श्लोक 110 (padma.6.132.110)

स्वधर्मेणागतं द्रव्यं शुक्लद्रव्यं तदुच्यते । शुक्लद्रव्येण यद्दानं दीयते श्रद्धयान्वितम्

svadharmeṇāgataṁ dravyaṁ śukladravyaṁ taducyate śukladravyeṇa yaddānaṁ dīyate śraddhayānvitam

अपने धर्म से प्राप्त धन ही 'शुक्ल-द्रव्य' कहलाता है। शुक्ल-द्रव्य से जो श्रद्धापूर्वक दान दिया जाता है,

श्लोक 111 (padma.6.132.111)

स्वल्पेनापि महत्पुण्यं तस्य संख्या न विद्यते । नीचसंगेन यद्द्रव्यमानीतं गृहकर्मसु

svalpenāpi mahatpuṇyaṁ tasya saṁkhyā na vidyate nīcasaṁgena yaddravyamānītaṁ gṛhakarmasu

वह थोड़ा-सा होते हुए भी महान पुण्य देता है, जिसकी कोई गणना नहीं की जा सकती। जो धन नीच-संगति द्वारा घर-कार्यों के लिए लाया गया हो,

श्लोक 112 (padma.6.132.112)

तेन द्रव्येण यद्दानं कृतं वै मनुजादिभिः । तत्फलं न भवेत्ते वै नैव तत्फलभागिनः

tena dravyeṇa yaddānaṁ kṛtaṁ vai manujādibhiḥ tatphalaṁ na bhavette vai naiva tatphalabhāginaḥ

उस धन से मनुष्यों आदि द्वारा जो दान किया जाता है, उसका कोई फल नहीं होता — वे उसके फल के भागी नहीं बनते।

श्लोक 113 (padma.6.132.113)

यादृशं कुरुते कर्म इंद्रियाणां सुखेच्छया । तादृशीं योनिमाप्नोति मूढो हि ज्ञानदुर्बलः

yādṛśaṁ kurute karma iṁdriyāṇāṁ sukhecchayā tādṛśīṁ yonimāpnoti mūḍho hi jñānadurbalaḥ

जैसा कर्म मनुष्य इंद्रियों के सुख की इच्छा से करता है, वैसी ही योनि उसे प्राप्त होती है — क्योंकि ज्ञान से रहित मूढ़ मनुष्य उसमें फँस जाता है।

श्लोक 114 (padma.6.132.114)

इह यत्कुरुते कर्म तत्परत्रोपभुज्यते । पुण्यमाचरतः पुंसो यदि दुःखं प्रजायते

iha yatkurute karma tatparatropabhujyate puṇyamācarataḥ puṁso yadi duḥkhaṁ prajāyate

यहाँ जो कर्म किया जाता है, वह अगले जन्म में भोगा जाता है। यदि पुण्य का आचरण करने वाले मनुष्य को भी दुःख उत्पन्न होता दिखे,

श्लोक 115 (padma.6.132.115)

तदा तापो न कर्त्तव्यस्तत्कर्म पूर्वदेहजम् । पापमाचरतः पुंसो जायते दुःखमेव च

tadā tāpo na karttavyastatkarma pūrvadehajam pāpamācarataḥ puṁso jāyate duḥkhameva ca

तो उसे संताप नहीं करना चाहिए — वह कर्म पूर्वजन्म के शरीर से उत्पन्न है। पाप का आचरण करने वाले मनुष्य को भी यदि दुःख ही उत्पन्न होता दिखे,

श्लोक 116 (padma.6.132.116)

न कर्त्तव्यस्तदा हर्षः सुखे तत्र सुरेश्वरि । रज्जुबद्धाश्च पशवः प्रभुणा स्वेच्छया यथा

na karttavyastadā harṣaḥ sukhe tatra sureśvari rajjubaddhāśca paśavaḥ prabhuṇā svecchayā yathā

तो हे सुरेश्वरि, उसे उस सुख में भी हर्ष नहीं मानना चाहिए। जैसे रस्सी से बँधे पशुओं को स्वामी अपनी इच्छा से ले जाता है,

श्लोक 117 (padma.6.132.117)

नीयंते कर्मबंधेन मनुजा अपि भूतले । शाखामृगो वनचरो नृत्यते च गृहे गृहे

nīyaṁte karmabaṁdhena manujā api bhūtale śākhāmṛgo vanacaro nṛtyate ca gṛhe gṛhe

वैसे ही मनुष्य भी इस पृथ्वी पर कर्म के बंधन से इधर-उधर ले जाए जाते हैं। वन में विचरण करने वाला बंदर घर-घर नचाया जाता है,

श्लोक 118 (padma.6.132.118)

एवं च कर्मणा जीवा नीयंते सर्वयोनिषु । क्रीडता कंदुको यद्वत्प्रेर्यते प्रभुणेच्छया

evaṁ ca karmaṇā jīvā nīyaṁte sarvayoniṣu krīḍatā kaṁduko yadvatpreryate prabhuṇecchayā

इसी प्रकार जीव कर्म द्वारा समस्त योनियों में ले जाए जाते हैं। जैसे खेलते हुए बालक की इच्छा से गेंद इधर-उधर उछाली जाती है,

श्लोक 119 (padma.6.132.119)

कर्मणा वा तथा जंतुर्नीयते सुखदुःखयोः । प्राणी स्वकर्मभिर्बद्धो न शक्तो बंधनिग्रहे

karmaṇā vā tathā jaṁturnīyate sukhaduḥkhayoḥ prāṇī svakarmabhirbaddho na śakto baṁdhanigrahe

वैसे ही प्राणी भी कर्म द्वारा सुख-दुःख के बीच ले जाया जाता है। जीव अपने ही कर्मों से बँधा हुआ है, बंधन को रोकने में समर्थ नहीं है।

श्लोक 120 (padma.6.132.120)

देवा वै कर्मभिर्बद्धा ऋषयश्च तथापरे । कैलासे रुद्रदेहस्था भुजंगा विषभोजिनः

devā vai karmabhirbaddhā ṛṣayaśca tathāpare kailāse rudradehasthā bhujaṁgā viṣabhojinaḥ

देवता भी कर्मों से बँधे हुए हैं, और ऋषिगण भी वैसे ही बँधे हैं। कैलास पर रुद्र के शरीर पर स्थित सर्प भी विष का ही भोजन करते हैं,

श्लोक 121 (padma.6.132.121)

असमर्थाः सुधा भोक्तुं कर्मयोनिर्बलीयसी । नीरोगदेहदाता यो बुधैः सूर्यो हि कथ्यते

asamarthāḥ sudhā bhoktuṁ karmayonirbalīyasī nīrogadehadātā yo budhaiḥ sūryo hi kathyate

वे अमृत खाने में असमर्थ रहते हैं — कर्म ही योनि से भी अधिक बलवान है। जो सूर्य ज्ञानियों द्वारा रोगरहित शरीर का दाता कहा जाता है,

श्लोक 122 (padma.6.132.122)

तद्रथे सारथिः पंगुः कर्मयोनिर्बलीयसी । इंद्रद्युम्नो हि राजर्षिर्गजत्वं कर्मणा गतः

tadrathe sārathiḥ paṁguḥ karmayonirbalīyasī iṁdradyumno hi rājarṣirgajatvaṁ karmaṇā gataḥ

उसके रथ का सारथी भी लंगड़ा है — कर्म ही योनि से भी अधिक बलवान है। राजर्षि इंद्रद्युम्न भी कर्म के कारण हाथी-योनि को प्राप्त हुआ।

श्लोक 123 (padma.6.132.123)

समर्थस्वामिना तस्मिन्कर्मयोनिर्वृथा कृता । रुद्रब्रह्मादयो देवा मानवाश्चासुराश्च ये

samarthasvāminā tasminkarmayonirvṛthā kṛtā rudrabrahmādayo devā mānavāścāsurāśca ye

समर्थ स्वामी होते हुए भी उसमें कर्म-योनि व्यर्थ नहीं हुई। रुद्र, ब्रह्मा आदि देवता, मनुष्य और असुर — ये सब भी —

श्लोक 124 (padma.6.132.124)

ते सर्वे कर्मबद्धाश्च विचरंति महीतले । कर्माधीनं जगत्सर्वं विष्णुना निर्मितं पुरा

te sarve karmabaddhāśca vicaraṁti mahītale karmādhīnaṁ jagatsarvaṁ viṣṇunā nirmitaṁ purā

वे सब भी कर्म से बँधे हुए इस पृथ्वी पर विचरण करते हैं। पहले विष्णु द्वारा रचा गया यह सारा जगत् कर्म के ही अधीन है।

श्लोक 125 (padma.6.132.125)

तत्कर्मकेशवाधीनं रामनाम्ना विनश्यति । सर्वत्रापि स्थितं तोयं मुक्तिदं तु सितासिते

tatkarmakeśavādhīnaṁ rāmanāmnā vinaśyati sarvatrāpi sthitaṁ toyaṁ muktidaṁ tu sitāsite

वह कर्म भी केशव के अधीन है और राम-नाम के द्वारा नष्ट हो जाता है। जल तो सर्वत्र ही विद्यमान है, परंतु मुक्ति देने वाला जल श्वेत-श्याम संगम में ही है।

श्लोक 126 (padma.6.132.126)

एवमाचरतां कर्म मुक्तिदं केशवार्चनम् । इंद्रियाणां सुखार्थाय यः कर्म मनसाचरेत्

evamācaratāṁ karma muktidaṁ keśavārcanam iṁdriyāṇāṁ sukhārthāya yaḥ karma manasācaret

इस प्रकार जो कर्म करते हैं, उनके लिए केशव की अर्चना ही मुक्तिदायिनी है। जो मनुष्य केवल इंद्रियों के सुख के लिए मन से कर्म करता है,

श्लोक 127 (padma.6.132.127)

अहं कृतेन मन्येत केवलं देहमेव हि । मनसा संस्मरन्जंतुः प्रायश्चित्तं समाचरेत्

ahaṁ kṛtena manyeta kevalaṁ dehameva hi manasā saṁsmaranjaṁtuḥ prāyaścittaṁ samācaret

वह सोचता है कि 'मैंने किया' — यह केवल देह ही मानती है। जो जीव मन से भगवान का स्मरण करते हुए प्रायश्चित्त का आचरण करता है,

श्लोक 128 (padma.6.132.128)

स पूर्वकर्मभोक्ता च अग्रे कर्म न वर्द्धते । प्रशंसंति ग्रहान्केचित्केचित्प्रेतपिशाचकान्

sa pūrvakarmabhoktā ca agre karma na varddhate praśaṁsaṁti grahānkecitkecitpretapiśācakān

वह अपने पूर्व कर्मों का ही भोक्ता बनता है, आगे उसके कर्म नहीं बढ़ते। कोई ग्रहों की प्रशंसा करता है, कोई प्रेत-पिशाचों की,

श्लोक 129 (padma.6.132.129)

केचिद्देवान्प्रशंसंति ह्योषधीः केचिदूचिरे । केचिन्मंत्रं च सिद्धिं च केचिद्बुद्धिपराक्रमम्

keciddevānpraśaṁsaṁti hyoṣadhīḥ kecidūcire kecinmaṁtraṁ ca siddhiṁ ca kecidbuddhiparākramam

कोई देवताओं की प्रशंसा करता है, कोई औषधियों की बात कहता है, कोई मंत्र और सिद्धि की, कोई बुद्धि और पराक्रम की —

श्लोक 130 (padma.6.132.130)

उद्यमं साहसं धैर्यं केचिन्नीतिं बलं तथा । अहंकर्मप्रशंसाभिः सर्वे कामानुवर्तिनः

udyamaṁ sāhasaṁ dhairyaṁ kecinnītiṁ balaṁ tathā ahaṁkarmapraśaṁsābhiḥ sarve kāmānuvartinaḥ

कोई उद्यम, साहस, धैर्य की, तो कोई नीति और बल की प्रशंसा करता है — ये सब 'मैं ही करता हूँ' के अहंकार में, अपनी-अपनी कामनाओं के अनुगामी होकर बोलते हैं।

श्लोक 131 (padma.6.132.131)

इति मे निश्चिता बुद्धिः कथ्यते पूर्वसूरिभिः । यदा पुण्यमयो जंतुः पापं किंचिन्नः विद्यते

iti me niścitā buddhiḥ kathyate pūrvasūribhiḥ yadā puṇyamayo jaṁtuḥ pāpaṁ kiṁcinnaḥ vidyate

इस प्रकार मेरी निश्चित बुद्धि है, जैसा पूर्व मुनियों ने कहा है। जब कोई जीव पूर्णतः पुण्यमय हो और उसमें कोई पाप न हो,

श्लोक 132 (padma.6.132.132)

ज्ञानं हि द्विविधं चैव तदा पुण्यं सुखं भवेत् । पापं पुण्यं समं यस्य तदा कर्मसु विद्यते

jñānaṁ hi dvividhaṁ caiva tadā puṇyaṁ sukhaṁ bhavet pāpaṁ puṇyaṁ samaṁ yasya tadā karmasu vidyate

तब वह पुण्य ही उसे सुख देता है — ज्ञान दो प्रकार का होता है। जिसके लिए पाप और पुण्य समान हो जाते हैं, तब वह कर्मों में स्थित होते हुए भी उनसे मुक्त रहता है।

श्लोक 133 (padma.6.132.133)

समं योगं यदा द्वंद्वं तदानंदपदं व्रजेत् । बाह्ये सर्वपरित्यागी मनसा संस्पृही भवेत्

samaṁ yogaṁ yadā dvaṁdvaṁ tadānaṁdapadaṁ vrajet bāhye sarvaparityāgī manasā saṁspṛhī bhavet

जब द्वंद्व समान हो जाते हैं, तब मनुष्य आनंद-पद को प्राप्त होता है। जो बाहर से तो सब कुछ त्यागी हो, पर मन से इच्छाओं में आसक्त हो,

श्लोक 134 (padma.6.132.134)

तद्वृथाचरितं तस्य तेन तत्पापभोगिनः । बाह्ये करोति कर्माणि मनसा निःस्पृहो भवेत्

tadvṛthācaritaṁ tasya tena tatpāpabhoginaḥ bāhye karoti karmāṇi manasā niḥspṛho bhavet

उसका वह त्याग व्यर्थ है, और वह उसी कारण पाप का भोगी होता है। जो बाहर से तो कर्म करता है, परंतु मन से निःस्पृह है,

श्लोक 135 (padma.6.132.135)

त्यागोऽसौ मध्यमो ज्ञेयो न तु पूर्णफलं लभेत् । बाह्यमध्ये परित्यज्य बुद्ध्या शून्यावलंबनम्

tyāgo'sau madhyamo jñeyo na tu pūrṇaphalaṁ labhet bāhyamadhye parityajya buddhyā śūnyāvalaṁbanam

उसका त्याग मध्यम श्रेणी का जानना चाहिए, उसे पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता। जो बाहर और भीतर दोनों को त्यागकर, बुद्धि से शून्य का ही आलंबन लेता है,

श्लोक 136 (padma.6.132.136)

त्यागः स उत्तमो ज्ञेयो योगिनामपि दुर्ल्लभः । क्रोधात्सर्वं त्यजंत्येके केचिद्वादप्रभावतः

tyāgaḥ sa uttamo jñeyo yogināmapi durllabhaḥ krodhātsarvaṁ tyajaṁtyeke kecidvādaprabhāvataḥ

उसका त्याग उत्तम जानना चाहिए, जो योगियों के लिए भी दुर्लभ है। कोई क्रोध से सब कुछ त्याग देता है, कोई वाद-विवाद के प्रभाव से,

श्लोक 137 (padma.6.132.137)

कष्टात्सर्वं त्यजंत्येके त्यागाः सर्वेनुमध्यमाः । सुबुद्ध्या श्रद्धया युक्तो न क्रोधादिवशंगतः

kaṣṭātsarvaṁ tyajaṁtyeke tyāgāḥ sarvenumadhyamāḥ subuddhyā śraddhayā yukto na krodhādivaśaṁgataḥ

कोई कष्ट से सब कुछ त्याग देता है — ये सब त्याग मध्यम श्रेणी के ही हैं। जो सुबुद्धि और श्रद्धा से युक्त होकर, क्रोध आदि के वश में न होकर त्याग करता है,

श्लोक 138 (padma.6.132.138)

कर्मणां ह्यवलिप्तोऽपि सुगतिं याति मानवः । शुचीनां श्रीमतां गेहे धीमतां योगिनामपि

karmaṇāṁ hyavalipto'pi sugatiṁ yāti mānavaḥ śucīnāṁ śrīmatāṁ gehe dhīmatāṁ yogināmapi

वह मनुष्य कर्मों से लिप्त होते हुए भी सद्गति को प्राप्त होता है। पवित्र, समृद्ध, बुद्धिमान और योगियों के भी घर में —

श्लोक 139 (padma.6.132.139)

योगाद्भ्रष्टस्तु जायेत कुले वै द्विजपूर्वके । स्वल्पेनैव तु कालेन पूर्णं योगं च विंदति

yogādbhraṣṭastu jāyeta kule vai dvijapūrvake svalpenaiva tu kālena pūrṇaṁ yogaṁ ca viṁdati

योग-भ्रष्ट व्यक्ति भी एक श्रेष्ठ ब्राह्मण-कुल में जन्म लेता है। थोड़े ही समय में वह पूर्ण योग को प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 140 (padma.6.132.140)

चिदानंदपदं गच्छेद्योगभक्तिप्रसादतः । पंकेनैव यथा पंकं रुधिरं रुधिरेण वै

cidānaṁdapadaṁ gacchedyogabhaktiprasādataḥ paṁkenaiva yathā paṁkaṁ rudhiraṁ rudhireṇa vai

योग और भक्ति की कृपा से वह चिदानंद-पद को प्राप्त होता है। जैसे कीचड़ से कीचड़ धोया नहीं जाता, रक्त से रक्त धोया नहीं जाता,

श्लोक 141 (padma.6.132.141)

हिंसया कर्मणा कर्म कथं क्षालयितुं क्षमः । हिंसाकर्ममयोयज्ञः कथं कर्मक्षये क्षमः

hiṁsayā karmaṇā karma kathaṁ kṣālayituṁ kṣamaḥ hiṁsākarmamayoyajñaḥ kathaṁ karmakṣaye kṣamaḥ

वैसे ही हिंसा-रूपी कर्म से भला दूसरा कर्म कैसे धोया जा सकता है? हिंसा-कर्म से युक्त यज्ञ भला कर्मों के क्षय में कैसे समर्थ हो सकता है?

श्लोक 142 (padma.6.132.142)

स्वर्गकामकृता यज्ञा स्वर्गे ते चाल्पसौख्यदाः । अनित्यानि तु सौख्यानि भवंति च बहून्यपि

svargakāmakṛtā yajñā svarge te cālpasaukhyadāḥ anityāni tu saukhyāni bhavaṁti ca bahūnyapi

स्वर्ग की कामना से किए गए यज्ञ स्वर्ग में तो थोड़ा-सा सुख देते हैं। वे सुख अनित्य होते हैं, चाहे वे कितने ही अधिक क्यों न हों।

श्लोक 143 (padma.6.132.143)

नित्यं सौख्यं न तेष्वस्ति विना भक्त्या हरेः क्वचित् । सार्वभौमसुखं राज्यं स्वर्गे चापि तथा सुखम्

nityaṁ saukhyaṁ na teṣvasti vinā bhaktyā hareḥ kvacit sārvabhaumasukhaṁ rājyaṁ svarge cāpi tathā sukham

बिना हरि की भक्ति के उनमें कहीं भी स्थायी सुख नहीं है। संपूर्ण पृथ्वी का राज्य-सुख हो या स्वर्ग का सुख हो —

श्लोक 144 (padma.6.132.144)

अन्यत्किंचिन्न वांछामि गर्भवासाद्बिभेम्यहम् । ग्रावा वै भिद्यते लोहैर्माणिक्यं नैव भिद्यते

anyatkiṁcinna vāṁchāmi garbhavāsādbibhemyaham grāvā vai bhidyate lohairmāṇikyaṁ naiva bhidyate

मुझे और कुछ नहीं चाहिए, मैं तो केवल गर्भवास से भयभीत हूँ। पत्थर लोहे से तोड़ा जा सकता है, किंतु माणिक्य नहीं टूटता।

श्लोक 145 (padma.6.132.145)

नानाकाममयी बुद्ध्या विष्णुभक्तिर्न भिद्यते । बको जलचरान्भुंक्ते मंडूकादींश्च वर्जयेत्

nānākāmamayī buddhyā viṣṇubhaktirna bhidyate bako jalacarānbhuṁkte maṁḍūkādīṁśca varjayet

वैसे ही विष्णु-भक्ति नाना कामनाओं से भरी बुद्धि से भी विचलित नहीं होती। बगुला जलचर प्राणियों को खाता है, किंतु मेंढक आदि को छोड़ देता है,

श्लोक 146 (padma.6.132.146)

तथा यमः सर्वहंता वर्जयेत्कृष्णसेवकान् । यो रक्षति स हर्ता च स वै पालक उच्यते

tathā yamaḥ sarvahaṁtā varjayetkṛṣṇasevakān yo rakṣati sa hartā ca sa vai pālaka ucyate

उसी प्रकार सबका संहार करने वाले यम भी कृष्ण के सेवकों को छोड़ देते हैं। जो रक्षा करता है, वही कभी-कभी संहारक भी होता है, और वही पालक भी कहा जाता है।

श्लोक 147 (padma.6.132.147)

अपराधशतैर्युक्तं स्वं स्थाने यत्र वासिता । यथा कृतापराधस्य कृष्णस्तस्य कृपाकरः

aparādhaśatairyuktaṁ svaṁ sthāne yatra vāsitā yathā kṛtāparādhasya kṛṣṇastasya kṛpākaraḥ

सैकड़ों अपराधों से युक्त होते हुए भी, अपने ही स्थान पर जिसे बसाया गया — जैसे अपराध किए हुए के प्रति भी कृष्ण कृपा करने वाले हैं।

श्लोक 148 (padma.6.132.148)

फलं च लभते वाद्य रक्षकः किं करोति चेत् । एवमात्मा च देहेस्मिन्परवश्यकृपाकरः

phalaṁ ca labhate vādya rakṣakaḥ kiṁ karoti cet evamātmā ca dehesminparavaśyakṛpākaraḥ

और यदि रक्षक कुछ करे, तो उसे भी उसका फल प्राप्त होता है। इसी प्रकार यह आत्मा भी इस देह में परवश होकर भी कृपापात्र बनी रहती है।

श्लोक 149 (padma.6.132.149)

प्राप्तो न पारः शनकैर्मल्लैर्युक्ता न वापि ता । व्याधस्य मुक्तिदाता च कुब्जका तारिता स्वयम्

prāpto na pāraḥ śanakairmallairyuktā na vāpi tā vyādhasya muktidātā ca kubjakā tāritā svayam

धीरे-धीरे भी पार नहीं पाया गया, मल्लों जैसे शक्तिशाली सहायकों के साथ भी नहीं। व्याध को भी मुक्ति देने वाले कृष्ण ने कुब्जा को भी स्वयं तार दिया।

श्लोक 150 (padma.6.132.150)

ब्रह्माद्यैर्दुर्लभः स्वप्ने सुलभो गोपमंदिरे । गोपोच्छिष्टं यदा भुक्तं तदा ते तारिताः स्वयम्

brahmādyairdurlabhaḥ svapne sulabho gopamaṁdire gopocchiṣṭaṁ yadā bhuktaṁ tadā te tāritāḥ svayam

जो ब्रह्मा आदि के लिए स्वप्न में भी दुर्लभ है, वही गोपों के घर में सहज सुलभ हो गया। जब उन्होंने गोपों का जूठा भोजन भी खाया, तब वे स्वयं ही तार दिए गए।

श्लोक 151 (padma.6.132.151)

योगिभिर्गीयते नित्यं परमात्मा जनार्दनः । अव्ययः पुरुषः श्रीमान्दृष्ट्वा तैर्देवि विस्मये

yogibhirgīyate nityaṁ paramātmā janārdanaḥ avyayaḥ puruṣaḥ śrīmāndṛṣṭvā tairdevi vismaye

योगीजन सदा उस परमात्मा जनार्दन का गान करते हैं — वह अविनाशी, श्रीमान पुरुष, जिन्हें देखकर हे देवि, वे विस्मय में पड़ जाते हैं।

श्लोक 152 (padma.6.132.152)

एतत्स्मरणकं दिव्यं ये पठंति दिने दिने । सर्वपापविनिर्मुक्ता यांति विष्णोः सनातनम्

etatsmaraṇakaṁ divyaṁ ye paṭhaṁti dine dine sarvapāpavinirmuktā yāṁti viṣṇoḥ sanātanam

जो लोग इस दिव्य स्मरण-वर्णन का प्रतिदिन पाठ करते हैं, वे समस्त पापों से मुक्त होकर विष्णु के सनातन धाम को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 153 (padma.6.132.153)

अनया भावबुद्ध्या च पठनं विष्णुसन्निधौ । इहलोके सुखं भुक्त्वा परं पदमवाप्नुयात्

anayā bhāvabuddhyā ca paṭhanaṁ viṣṇusannidhau ihaloke sukhaṁ bhuktvā paraṁ padamavāpnuyāt

इस भाव और बुद्धि के साथ विष्णु के सान्निध्य में इसका पाठ करने से, मनुष्य इस लोक में सुख भोगकर परम पद को प्राप्त करता है।

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