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उत्तर खण्ड · अध्याय 134

वेत्रवती नदी की महिमा

अध्याय 133अध्याय-सूचीअध्याय 135

श्लोक 1 (padma.6.134.1)

महादेव उवाच। वेत्रवत्यास्तु माहात्म्यं वक्ष्यामि शृणु सुंदरि । यत्र स्नात्वा विमुच्यंते यावदाभूतसंप्लवम्

mahādeva uvāca vetravatyāstu māhātmyaṁ vakṣyāmi śṛṇu suṁdari yatra snātvā vimucyaṁte yāvadābhūtasaṁplavam

महादेव ने कहा — हे सुंदरी, अब मैं वेत्रवती की महिमा कहता हूँ, सुनो — जहाँ स्नान करके लोग प्रलय-काल तक मुक्त हो जाते हैं।

श्लोक 2 (padma.6.134.2)

वृत्रेण च कृतः कूपो महागंभीरसंज्ञकः । कूपात्सा निःसृता देवी महापापौघनाशिनी

vṛtreṇa ca kṛtaḥ kūpo mahāgaṁbhīrasaṁjñakaḥ kūpātsā niḥsṛtā devī mahāpāpaughanāśinī

वृत्रासुर द्वारा एक अत्यंत गहरा कुआँ बनाया गया, जिसे 'महागंभीर' कहा गया। उस कुएँ से यह देवी निकली, जो महापापों के समूह को नष्ट करने वाली है।

श्लोक 3 (padma.6.134.3)

यथा गंगा तथेयं च सरिच्छ्रेष्ठा सुरोत्तमे । अस्या दर्शनमात्रेण पापौघाः शमयंति च

yathā gaṁgā tatheyaṁ ca saricchreṣṭhā surottame asyā darśanamātreṇa pāpaughāḥ śamayaṁti ca

हे देवोत्तमे, यह नदियों में श्रेष्ठ है, गंगा के ही समान। इसके दर्शनमात्र से पापों के समूह शांत हो जाते हैं।

श्लोक 4 (padma.6.134.4)

शृणु देवि प्रवक्ष्यामि इतिहासं पुरातनम् । यच्छ्रुत्वा पापिनो दोषैर्विमुक्ताः कर्मबंधनात्

śṛṇu devi pravakṣyāmi itihāsaṁ purātanam yacchrutvā pāpino doṣairvimuktāḥ karmabaṁdhanāt

हे देवि, सुनो, मैं एक प्राचीन इतिहास कहता हूँ, जिसे सुनकर पापी लोग भी अपने दोषों और कर्म-बंधन से मुक्त हो जाते हैं।

श्लोक 5 (padma.6.134.5)

चंपके नगरे चैव राजा राज्यं करोति सः । सदा दुष्टो दुष्टरूपो जनानां स प्रपीडकः

caṁpake nagare caiva rājā rājyaṁ karoti saḥ sadā duṣṭo duṣṭarūpo janānāṁ sa prapīḍakaḥ

चंपक नगर में एक राजा राज्य करता था; वह सदा दुष्ट, दुष्ट-रूप वाला और अपनी प्रजा को पीड़ा देने वाला था।

श्लोक 6 (padma.6.134.6)

अधर्मो धर्मरूपश्च विष्णुनिंदापरायणः । देव द्विज निहंता च आश्रमाणां विदूषकः

adharmo dharmarūpaśca viṣṇuniṁdāparāyaṇaḥ deva dvija nihaṁtā ca āśramāṇāṁ vidūṣakaḥ

वह अधर्मी होते हुए भी धर्म का रूप धरता था, विष्णु की निंदा में लीन रहता था, देवताओं और ब्राह्मणों का हत्यारा था, और आश्रमों को दूषित करने वाला था।

श्लोक 7 (padma.6.134.7)

वेदनिंदापरः श्रीमान्मूर्खो वा निर्घृणः शठः । असच्छास्त्रेषु निरतः परदाराभिमर्शकः

vedaniṁdāparaḥ śrīmānmūrkho vā nirghṛṇaḥ śaṭhaḥ asacchāstreṣu nirataḥ paradārābhimarśakaḥ

वह वेद-निंदा में तत्पर, धनवान, मूर्ख, निर्दय और धूर्त था; असत् शास्त्रों में रत, और पराई स्त्रियों को छूने वाला था।

श्लोक 8 (padma.6.134.8)

विदारुणेति नामा च संजातो मूर्ख एव च । कदाचिद्दैवयोगेन आगतस्तां नदीं प्रति

vidāruṇeti nāmā ca saṁjāto mūrkha eva ca kadāciddaivayogena āgatastāṁ nadīṁ prati

उसका नाम विदारुण था, और वह जन्म से ही मूर्ख था। एक बार दैव-योग से वह उस नदी की ओर आ पहुँचा।

श्लोक 9 (padma.6.134.9)

आखेटकसमायुक्तः स्वयं कुष्ठी सुरेश्वरि । महापापादयं जातो ब्राह्मणानां च निंदनात्

ākheṭakasamāyuktaḥ svayaṁ kuṣṭhī sureśvari mahāpāpādayaṁ jāto brāhmaṇānāṁ ca niṁdanāt

हे सुरेश्वरि, वह शिकार के लिए निकला था, और स्वयं कुष्ठ रोग से पीड़ित था — यह उसे महापाप के कारण, ब्राह्मणों की निंदा के कारण प्राप्त हुआ था।

श्लोक 10 (padma.6.134.10)

वृथावादी दुरात्मा च शठो वै निर्घृणः पशुः । वेदनिंदारतो नित्यं गोशास्त्राणां प्रदूषकः

vṛthāvādī durātmā ca śaṭho vai nirghṛṇaḥ paśuḥ vedaniṁdārato nityaṁ gośāstrāṇāṁ pradūṣakaḥ

वह व्यर्थ बोलने वाला, दुरात्मा, धूर्त, निर्दय और पशु-सम था; सदा वेद-निंदा में लीन और गौओं तथा शास्त्रों को दूषित करने वाला था।

श्लोक 11 (padma.6.134.11)

एवंविधो वने भ्राम्यंस्तृषार्तः स सुहृद्वृतः । अश्वादुत्तीर्य राजाऽसौ जलं पीत्वा गृहं गतः

evaṁvidho vane bhrāmyaṁstṛṣārtaḥ sa suhṛdvṛtaḥ aśvāduttīrya rājā'sau jalaṁ pītvā gṛhaṁ gataḥ

ऐसा वह राजा, अपने मित्रों से घिरा हुआ, वन में भटकते हुए प्यास से व्याकुल हो गया। घोड़े से उतरकर उसने वहाँ का जल पीया और फिर घर चला गया।

श्लोक 12 (padma.6.134.12)

तेनैवोदकपानेन गतं कुष्ठं न संशयः । बुद्धिस्तु निर्मला जाता तस्य राज्ञो विशेषतः

tenaivodakapānena gataṁ kuṣṭhaṁ na saṁśayaḥ buddhistu nirmalā jātā tasya rājño viśeṣataḥ

उसी जल-पान से उसका कुष्ठ रोग दूर हो गया, इसमें कोई संशय नहीं। और उस राजा की बुद्धि भी विशेष रूप से निर्मल हो गई।

श्लोक 13 (padma.6.134.13)

विष्णौ भक्तिः समुत्पन्ना तदा तस्य सुरेश्वरि । ततः प्रभृति कालेन स्नानं वै कृतवान्सदा

viṣṇau bhaktiḥ samutpannā tadā tasya sureśvari tataḥ prabhṛti kālena snānaṁ vai kṛtavānsadā

हे सुरेश्वरि, तब उसमें विष्णु के प्रति भक्ति उत्पन्न हो गई; उसके बाद से समय-समय पर वह सदा वहाँ स्नान करने लगा।

श्लोक 14 (padma.6.134.14)

निर्मलो बहुरूपाढ्यो जातस्तत्र सुरेश्वरि । इहलोके सुखं भुक्त्वा कृत्वा यज्ञाननेकशः

nirmalo bahurūpāḍhyo jātastatra sureśvari ihaloke sukhaṁ bhuktvā kṛtvā yajñānanekaśaḥ

हे सुरेश्वरि, वह वहाँ निर्मल और अनेक सुंदर रूपों से संपन्न हो गया। इस लोक में सुख भोगकर, अनेक यज्ञ करके,

श्लोक 15 (padma.6.134.15)

विप्रेभ्यो दक्षिणां दत्वा स गतो वैष्णवं पदम् । इति ज्ञात्वा तु भो देवि वेत्रवत्यां विशेषतः

viprebhyo dakṣiṇāṁ datvā sa gato vaiṣṇavaṁ padam iti jñātvā tu bho devi vetravatyāṁ viśeṣataḥ

और ब्राह्मणों को दक्षिणा देकर वह वैष्णव पद को प्राप्त हुआ। हे देवि, यह जानकर, वेत्रवती में विशेष रूप से —

श्लोक 16 (padma.6.134.16)

स्नानं कुर्वंति ये विप्रास्ते मुक्ता नगनंदिनि । राजन्यो वाथ वैश्यो वा शूद्रो वा सुरसत्तमे

snānaṁ kurvaṁti ye viprāste muktā naganaṁdini rājanyo vātha vaiśyo vā śūdro vā surasattame

हे पर्वत-पुत्री, जो ब्राह्मण वहाँ स्नान करते हैं, वे मुक्त हो जाते हैं। हे देवोत्तमे, चाहे वह क्षत्रिय हो, वैश्य हो, या शूद्र हो —

श्लोक 17 (padma.6.134.17)

यत्र स्नानं प्रकुर्वंति ते मुक्ताः पापबंधनात् । कार्तिके वाऽथ माघे वा बाह्यो वा वेदनिंदकः

yatra snānaṁ prakurvaṁti te muktāḥ pāpabaṁdhanāt kārtike vā'tha māghe vā bāhyo vā vedaniṁdakaḥ

जो भी वहाँ स्नान करते हैं, वे पाप-बंधन से मुक्त हो जाते हैं — चाहे कार्तिक में हो या माघ में हो, चाहे वह बाह्य हो या वेद-निंदक ही क्यों न हो।

श्लोक 18 (padma.6.134.18)

सरितां संगमे स्नात्वा मुच्यते देवि किल्बिषात् । साभ्रमत्याः समं यत्र तस्याः संगः प्रदृश्यते

saritāṁ saṁgame snātvā mucyate devi kilbiṣāt sābhramatyāḥ samaṁ yatra tasyāḥ saṁgaḥ pradṛśyate

नदियों के संगम में स्नान करके, हे देवि, मनुष्य पाप से मुक्त हो जाता है — जहाँ इसका संगम साभ्रमती के साथ दिखाई देता है,

श्लोक 19 (padma.6.134.19)

तत्र स्नात्वा विशेषेण मुच्यते ब्रह्महा सदा । खेटकं नगरं दिव्यं स्वर्गरूपं तु वाऽनघे

tatra snātvā viśeṣeṇa mucyate brahmahā sadā kheṭakaṁ nagaraṁ divyaṁ svargarūpaṁ tu vā'naghe

वहाँ स्नान करके ब्रह्महत्यारा भी विशेष रूप से सदा के लिए मुक्त हो जाता है। हे निष्पाप, खेटक नगर तो दिव्य और स्वर्ग-सदृश है।

श्लोक 20 (padma.6.134.20)

ब्रह्मणा तत्र वै देवि योगाश्च बहवः कृताः । तत्र स्नात्वा च भुक्त्वा च पुनर्जन्म न विद्यते

brahmaṇā tatra vai devi yogāśca bahavaḥ kṛtāḥ tatra snātvā ca bhuktvā ca punarjanma na vidyate

हे देवि, वहाँ ब्रह्मा ने भी अनेक योग-साधनाएँ की थीं। वहाँ स्नान करके और भोग भोगकर मनुष्य को पुनर्जन्म नहीं होता।

श्लोक 21 (padma.6.134.21)

सा द्वितीया स्मृता गंगा कलौ देवि विशेषतः । ये नराः सुखमिच्छंति धनमिच्छंति ये नराः

sā dvitīyā smṛtā gaṁgā kalau devi viśeṣataḥ ye narāḥ sukhamicchaṁti dhanamicchaṁti ye narāḥ

हे देवि, कलियुग में विशेष रूप से यह दूसरी गंगा ही मानी गई है। जो मनुष्य सुख की इच्छा रखते हैं, जो धन की इच्छा रखते हैं,

श्लोक 22 (padma.6.134.22)

स्वर्गमिच्छंति ये लोकास्ते वै स्नात्वा पुनःपुनः । इहलोके सुखं भुक्त्वा यांति विष्णोः सनातनम्

svargamicchaṁti ye lokāste vai snātvā punaḥpunaḥ ihaloke sukhaṁ bhuktvā yāṁti viṣṇoḥ sanātanam

और जो लोग स्वर्ग की इच्छा रखते हैं — वे बार-बार वहाँ स्नान करके, इस लोक में सुख भोगकर, विष्णु के सनातन धाम को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 23 (padma.6.134.23)

सूर्यवंशे च ये जाताः सोमवंशे तथैव च । आगता वेत्रवत्यां तु स्नात्वा निर्वृतिमागताः

sūryavaṁśe ca ye jātāḥ somavaṁśe tathaiva ca āgatā vetravatyāṁ tu snātvā nirvṛtimāgatāḥ

सूर्यवंश में उत्पन्न, और वैसे ही सोमवंश में उत्पन्न लोग भी, वेत्रवती में आकर स्नान करके परम शांति को प्राप्त हुए हैं।

श्लोक 24 (padma.6.134.24)

दर्शनाद्धरते दुःखं स्पर्शनान्मानसं ह्यघम् । स्नात्वा भुक्त्वा तथा देवि मुक्तिभागी न संशयः

darśanāddharate duḥkhaṁ sparśanānmānasaṁ hyagham snātvā bhuktvā tathā devi muktibhāgī na saṁśayaḥ

इसके दर्शन से दुःख हर जाता है, और स्पर्श से मानसिक पाप भी। हे देवि, वहाँ स्नान करके और भोग भोगकर मनुष्य मुक्ति का भागी बनता है, इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 25 (padma.6.134.25)

स्नानाज्जपात्तथाहोमादनंतं फलमश्नुते । गत्वा वाराणसीतीर्थं भक्त्या चांद्रायणं चरेत्

snānājjapāttathāhomādanaṁtaṁ phalamaśnute gatvā vārāṇasītīrthaṁ bhaktyā cāṁdrāyaṇaṁ caret

स्नान से, जप से, तथा हवन से मनुष्य अनंत फल को प्राप्त करता है। वाराणसी तीर्थ में जाकर भक्तिपूर्वक चांद्रायण व्रत करने पर,

श्लोक 26 (padma.6.134.26)

तत्र गत्वा महत्पुण्यं तत्पुण्यं सुरसत्तमे । वेत्रवत्यां विशेषेण पंचत्वं यदि गच्छति

tatra gatvā mahatpuṇyaṁ tatpuṇyaṁ surasattame vetravatyāṁ viśeṣeṇa paṁcatvaṁ yadi gacchati

हे देवोत्तमे, वहाँ जाकर जो महान पुण्य प्राप्त होता है — वही पुण्य वेत्रवती में विशेष रूप से, कम प्रयास में ही प्राप्त हो जाता है। यदि कोई वहीं देहत्याग करे,

श्लोक 27 (padma.6.134.27)

स वै चतुर्भुजो भूत्वा याति विष्णोः परं पदम् । पृथिव्यां यानि तीर्थानि ये देवाः पितरस्तथा

sa vai caturbhujo bhūtvā yāti viṣṇoḥ paraṁ padam pṛthivyāṁ yāni tīrthāni ye devāḥ pitarastathā

तो वह चार भुजाओं वाला होकर विष्णु के परम पद को प्राप्त होता है। पृथ्वी पर जितने भी तीर्थ हैं, जितने भी देवता और पितर हैं,

श्लोक 28 (padma.6.134.28)

ते सर्वे च वसंतीह वेत्रवत्यां सुरेश्वरि । किमन्यद्बहुनोक्तेन भूयो भूयो वरानने

te sarve ca vasaṁtīha vetravatyāṁ sureśvari kimanyadbahunoktena bhūyo bhūyo varānane

हे सुरेश्वरि, वे सब भी यहाँ वेत्रवती में निवास करते हैं। हे वरानने, बार-बार बहुत कहने से और क्या लाभ?

श्लोक 29 (padma.6.134.29)

वेत्रवत्याः समं तीर्थं पृथिव्यां न सनातनि । अहं विष्णुस्तथा ब्रह्मा देवाश्च परमर्षयः

vetravatyāḥ samaṁ tīrthaṁ pṛthivyāṁ na sanātani ahaṁ viṣṇustathā brahmā devāśca paramarṣayaḥ

वेत्रवती के समान कोई सनातन तीर्थ इस पृथ्वी पर नहीं है। मैं, विष्णु, ब्रह्मा तथा देवगण और परम ऋषिगण —

श्लोक 30 (padma.6.134.30)

तिष्ठंति देवताः सर्वे वेत्रवत्यां महेश्वरि । एककालं द्विकालं वा त्रिकालं च विशेषतः

tiṣṭhaṁti devatāḥ sarve vetravatyāṁ maheśvari ekakālaṁ dvikālaṁ vā trikālaṁ ca viśeṣataḥ

हे महेश्वरि, सभी देवता वेत्रवती में निवास करते हैं। जो एक बार, दो बार अथवा विशेष रूप से तीन बार —

श्लोक 31 (padma.6.134.31)

स्नानं कुर्वंति ये तत्र ते वै मुक्ता न संशयः

snānaṁ kurvaṁti ye tatra te vai muktā na saṁśayaḥ

वहाँ स्नान करते हैं, वे निश्चय ही मुक्त हो जाते हैं, इसमें कोई संशय नहीं।

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