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उत्तर खण्ड · अध्याय 135

साभ्रमती नदी की महिमा

अध्याय 134अध्याय-सूचीअध्याय 136

श्लोक 1 (padma.6.135.1)

श्रीमहादेव उवाच। साभ्रमत्यास्तु माहात्म्यं वक्ष्ये देवि यथातथम् । कश्यपो वै मुनिश्रेष्ठस्तपो वै तप्तवान्महत्

śrīmahādeva uvāca sābhramatyāstu māhātmyaṁ vakṣye devi yathātatham kaśyapo vai muniśreṣṭhastapo vai taptavānmahat

श्री महादेव ने कहा — हे देवि, अब मैं साभ्रमती की महिमा यथार्थ रूप में कहूँगा। मुनिश्रेष्ठ कश्यप ने महान तप किया था।

श्लोक 2 (padma.6.135.2)

अनेकवर्षपर्यंतं तेन तप्तं महत्तपः । अर्बुदे पर्वते रम्ये नानाद्रुमसमाकुले

anekavarṣaparyaṁtaṁ tena taptaṁ mahattapaḥ arbude parvate ramye nānādrumasamākule

उसने अनेक वर्षों तक वह महान तप किया, अर्बुद पर्वत पर, जो अत्यंत रमणीय और नाना वृक्षों से भरा हुआ था।

श्लोक 3 (padma.6.135.3)

तत्र गत्वा तपस्तप्तं ऋषिणा कश्यपेन वै । सरस्वती यत्र रम्या पवित्रा पापनाशिनी

tatra gatvā tapastaptaṁ ṛṣiṇā kaśyapena vai sarasvatī yatra ramyā pavitrā pāpanāśinī

वहाँ जाकर ऋषि कश्यप ने तप किया, जहाँ रमणीय, पवित्र और पाप-नाशिनी सरस्वती नदी बहती थी।

श्लोक 4 (padma.6.135.4)

एकस्मिन्दिवसे देवि गतोऽसौ नैमिषं प्रति । तदा ते ऋषयः सर्वे कथां चक्रुरनेकशः

ekasmindivase devi gato'sau naimiṣaṁ prati tadā te ṛṣayaḥ sarve kathāṁ cakruranekaśaḥ

हे देवि, एक दिन वे नैमिष क्षेत्र की ओर गए। तब वहाँ के समस्त ऋषियों ने अनेक विषयों पर चर्चा की।

श्लोक 5 (padma.6.135.5)

तदा तैस्तु द्विजैः सम्यक्पृष्टोऽसौ कश्यपो मुनिः । अहो कश्यप नः प्रीत्यै गंगेहानीयतां प्रभो

tadā taistu dvijaiḥ samyakpṛṣṭo'sau kaśyapo muniḥ aho kaśyapa naḥ prītyai gaṁgehānīyatāṁ prabho

तब उन ब्राह्मणों ने मुनि कश्यप से भली-भाँति पूछा — 'अहो कश्यप, हे प्रभो, हमारी प्रसन्नता के लिए यहाँ गंगा को लाइए।'

श्लोक 6 (padma.6.135.6)

भवन्नाम्ना तु सा गंगा भविष्यति सरिद्वरा । तेषां वाक्यमुपाकर्ण्य नमस्कृत्य द्विजांश्च तान्

bhavannāmnā tu sā gaṁgā bhaviṣyati saridvarā teṣāṁ vākyamupākarṇya namaskṛtya dvijāṁśca tān

'आपके ही नाम से वह गंगा नदियों में श्रेष्ठ नदी बन जाएगी।' उनका यह वचन सुनकर, उन ब्राह्मणों को नमस्कार कर,

श्लोक 7 (padma.6.135.7)

आगतो ह्यर्बुदारण्ये सरस्वतीतीरसंनिधौ । तत्र तप्तं तदा तेन तपः परमदुष्करम्

āgato hyarbudāraṇye sarasvatītīrasaṁnidhau tatra taptaṁ tadā tena tapaḥ paramaduṣkaram

वे अर्बुद के वन में सरस्वती के तट के निकट पहुँचे। वहाँ उन्होंने अत्यंत दुष्कर तप किया।

श्लोक 8 (padma.6.135.8)

आराधितो ह्यहं तेन कश्यपेन द्विजेन वै । प्रत्यक्षोऽहं तदा जातस्तस्य द्विजवरस्य च

ārādhito hyahaṁ tena kaśyapena dvijena vai pratyakṣo'haṁ tadā jātastasya dvijavarasya ca

उस ब्राह्मण कश्यप द्वारा मेरी आराधना की गई; तब मैं उस श्रेष्ठ ब्राह्मण के समक्ष प्रत्यक्ष प्रकट हुआ।

श्लोक 9 (padma.6.135.9)

वरं वरय भद्रं ते यत्ते मनसि वर्त्तते

varaṁ varaya bhadraṁ te yatte manasi varttate

मैंने कहा — 'तुम्हारा कल्याण हो, जो तुम्हारे मन में है, वह वर माँगो।'

श्लोक 10 (padma.6.135.10)

कश्यप उवाच। वरं दातुं समर्थोऽसि देवदेव जगत्पते । शिरःस्थिता या गंगेयं पवित्रा पापहारिणी

kaśyapa uvāca varaṁ dātuṁ samartho'si devadeva jagatpate śiraḥsthitā yā gaṁgeyaṁ pavitrā pāpahāriṇī

कश्यप ने कहा — हे देवदेव, हे जगत्पते, आप वर देने में समर्थ हैं। आपके सिर पर स्थित जो यह पवित्र, पाप-हारिणी गंगा है,

श्लोक 11 (padma.6.135.11)

मम देया विशेषेण महादेव नमोस्तुते । तदा देवि मयोक्तं च गृह्णीष्व त्वं द्विजोत्तम

mama deyā viśeṣeṇa mahādeva namostute tadā devi mayoktaṁ ca gṛhṇīṣva tvaṁ dvijottama

हे महादेव, आपको नमस्कार है, वह मुझे विशेष रूप से दी जानी चाहिए। तब, हे देवि, मैंने कहा — 'हे द्विजोत्तम, तुम इसे ग्रहण करो।'

श्लोक 12 (padma.6.135.12)

जटामेकां परित्यज्य दत्ता गंगा तदा मया । तां गृहीत्वा द्विजश्रेष्ठः स्वस्थानं हर्षतो ययौ

jaṭāmekāṁ parityajya dattā gaṁgā tadā mayā tāṁ gṛhītvā dvijaśreṣṭhaḥ svasthānaṁ harṣato yayau

तब मैंने अपनी एक जटा को खोलकर उससे गंगा प्रदान की। उसे ग्रहण करके वह श्रेष्ठ ब्राह्मण हर्षपूर्वक अपने स्थान को चला गया।

श्लोक 13 (padma.6.135.13)

केशरन्ध्रं नाम तीर्थं वासो वै कश्यपस्य च । गतस्तत्र तु देवेशि मुनिभिः परिवारितः

keśarandhraṁ nāma tīrthaṁ vāso vai kaśyapasya ca gatastatra tu deveśi munibhiḥ parivāritaḥ

'केशरंध्र' नामक तीर्थ ही कश्यप का निवास-स्थान है। हे देवेशि, वहाँ जाकर वे मुनियों से घिरे हुए रहते थे।

श्लोक 14 (padma.6.135.14)

कश्यपेन समानीता काश्यपी सा सरिद्वरा । यस्या दर्शनमात्रेण ब्रह्महा मुच्यते किल

kaśyapena samānītā kāśyapī sā saridvarā yasyā darśanamātreṇa brahmahā mucyate kila

कश्यप द्वारा लाई गई वह श्रेष्ठ नदी 'काश्यपी' कहलाई। उसके दर्शनमात्र से ब्रह्महत्यारा भी मुक्त हो जाता है।

श्लोक 15 (padma.6.135.15)

पार्वत्युवाच। स्नानमात्रेण किं पुण्यं तत्र तीर्थे वदस्व मे । विश्वनाथ कृपालुस्त्वं दयां कुरु ममोपरि

pārvatyuvāca snānamātreṇa kiṁ puṇyaṁ tatra tīrthe vadasva me viśvanātha kṛpālustvaṁ dayāṁ kuru mamopari

पार्वती ने कहा — उस तीर्थ में स्नानमात्र से क्या पुण्य होता है, यह मुझे बताइए। हे विश्वनाथ, आप कृपालु हैं, मुझ पर दया कीजिए।

श्लोक 16 (padma.6.135.16)

दर्शने किं भवेत्पुण्यं स्नाने किं वद देवराट् । महिमा कीदृशो ब्रह्मन्सर्वं त्वं वक्तुमर्हसि

darśane kiṁ bhavetpuṇyaṁ snāne kiṁ vada devarāṭ mahimā kīdṛśo brahmansarvaṁ tvaṁ vaktumarhasi

दर्शन से क्या पुण्य होता है, स्नान से क्या होता है, हे देवराज बताइए। हे ब्रह्मन्, उसकी महिमा कैसी है — यह सब आप कहने योग्य हैं।

श्लोक 17 (padma.6.135.17)

महादेव उवाच। मया श्रुतान्यनेकानि तीर्थान्यायतनानि च । श्रीविष्णोश्च प्रसादाच्च नद्यः सागरगाः प्रभोः

mahādeva uvāca mayā śrutānyanekāni tīrthānyāyatanāni ca śrīviṣṇośca prasādācca nadyaḥ sāgaragāḥ prabhoḥ

महादेव ने कहा — मैंने अनेक तीर्थों और मंदिरों के विषय में सुना है। श्री विष्णु प्रभु की कृपा से समुद्र में मिलने वाली नदियाँ —

श्लोक 18 (padma.6.135.18)

गंगा च यमुना रेवा तापी चैव महानदी । गोदावरी तुंगभद्रा कौशिकी गल्लिका तथा

gaṁgā ca yamunā revā tāpī caiva mahānadī godāvarī tuṁgabhadrā kauśikī gallikā tathā

गंगा, यमुना, रेवा, तापी और महानदी, गोदावरी, तुंगभद्रा, कौशिकी और गल्लिका —

श्लोक 19 (padma.6.135.19)

कावेरी वेदिका भद्रा सरयूः पापहारिणी । अन्याश्च विविधा नद्यः सर्वपापहरा भुवि

kāverī vedikā bhadrā sarayūḥ pāpahāriṇī anyāśca vividhā nadyaḥ sarvapāpaharā bhuvi

कावेरी, वेदिका, भद्रा, पाप-हारिणी सरयू, और भूतल पर अन्य भी नाना नदियाँ, जो समस्त पाप को हरने वाली हैं —

श्लोक 20 (padma.6.135.20)

प्रयागस्तीर्थराजश्च काशी पुष्कर एव च । नैमिषारण्यसंज्ञं तु तीर्थं चामरकंटकम्

prayāgastīrtharājaśca kāśī puṣkara eva ca naimiṣāraṇyasaṁjñaṁ tu tīrthaṁ cāmarakaṁṭakam

प्रयाग तीर्थराज है, काशी और पुष्कर भी हैं; नैमिषारण्य नामक तीर्थ भी है, और अमरकंटक भी।

श्लोक 21 (padma.6.135.21)

उत्तमं द्वारकाक्षेत्रमर्बुदारण्यमुत्तमम् । एवंविधानि दिव्यानि क्षेत्राणि विविधानि च

uttamaṁ dvārakākṣetramarbudāraṇyamuttamam evaṁvidhāni divyāni kṣetrāṇi vividhāni ca

उत्तम द्वारका क्षेत्र, और उत्तम अर्बुद वन — इस प्रकार के अनेक दिव्य क्षेत्र —

श्लोक 22 (padma.6.135.22)

श्रुतानि तत्र देवेशि माया विष्णोः प्रसादतः । पूर्वं भगीरथेनैव याचितोऽहं तु पार्वति

śrutāni tatra deveśi māyā viṣṇoḥ prasādataḥ pūrvaṁ bhagīrathenaiva yācito'haṁ tu pārvati

हे देवेशि, विष्णु की कृपा से मैंने उनके विषय में सुना है। हे पार्वती, पूर्वकाल में भगीरथ द्वारा मुझसे याचना की गई थी,

श्लोक 23 (padma.6.135.23)

तदा दत्ता इयं गंगा विष्णोर्लोकमभीप्सुना । कश्यपाय पुनर्दत्ता ऋषीणां वचनान्मया

tadā dattā iyaṁ gaṁgā viṣṇorlokamabhīpsunā kaśyapāya punardattā ṛṣīṇāṁ vacanānmayā

और तब, विष्णु के लोक को पाने की इच्छा रखने वाले उस भगीरथ को यह गंगा दी गई थी। फिर ऋषियों के वचन से मैंने इसे कश्यप को भी प्रदान किया।

श्लोक 24 (padma.6.135.24)

इयं वै काश्यपी गंगा रोगदोषहरा सदा । इयं या कथ्यते लोके युगे वै नामपूर्वकम्

iyaṁ vai kāśyapī gaṁgā rogadoṣaharā sadā iyaṁ yā kathyate loke yuge vai nāmapūrvakam

यही काश्यपी गंगा सदा रोग और दोषों को हरने वाली है। यही वह नदी है, जो प्रत्येक युग में अलग नाम से पुकारी जाती है।

श्लोक 25 (padma.6.135.25)

तदहं कथयिष्यामि शृणु सुंदरि तत्वतः । कृते कृतवती नाम त्रेतायां गिरिकर्णिका

tadahaṁ kathayiṣyāmi śṛṇu suṁdari tatvataḥ kṛte kṛtavatī nāma tretāyāṁ girikarṇikā

वह मैं यथार्थ रूप से कहता हूँ, सुनो हे सुंदरी। सत्ययुग में इसका नाम कृतवती था, त्रेतायुग में गिरिकर्णिका था,

श्लोक 26 (padma.6.135.26)

द्वापरे चंदना नाम कलौ साभ्रमती स्मृता । दिनेदिने विशेषेण स्नानार्थं तु नराश्च ये

dvāpare caṁdanā nāma kalau sābhramatī smṛtā dinedine viśeṣeṇa snānārthaṁ tu narāśca ye

द्वापरयुग में चंदना नाम था, और कलियुग में साभ्रमती कही गई है। जो मनुष्य प्रतिदिन विशेष रूप से स्नान के लिए वहाँ जाते हैं,

श्लोक 27 (padma.6.135.27)

सर्वपापविनिर्मुक्ता यांति विष्णोः सनातनम् । प्लक्षावतरणे तीर्थे सरस्वत्यां तथेश्वरि

sarvapāpavinirmuktā yāṁti viṣṇoḥ sanātanam plakṣāvataraṇe tīrthe sarasvatyāṁ tatheśvari

वे समस्त पापों से मुक्त होकर विष्णु के सनातन धाम को प्राप्त होते हैं। हे ईश्वरि, प्लक्षावतरण तीर्थ में, सरस्वती में भी —

श्लोक 28 (padma.6.135.28)

केदारे च कुरुक्षेत्रे यत्फलं स्नानतो भवेत् । तत्फलं तु नृणां नूनं साभ्रमत्या दिने दिने

kedāre ca kurukṣetre yatphalaṁ snānato bhavet tatphalaṁ tu nṛṇāṁ nūnaṁ sābhramatyā dine dine

केदार में और कुरुक्षेत्र में स्नान से जो फल प्राप्त होता है, वही फल मनुष्यों को निश्चय ही साभ्रमती में प्रतिदिन प्राप्त होता है।

श्लोक 29 (padma.6.135.29)

भवतीति न संदेहो व्यासस्य वचनं यथा । नभस्येपरपक्षे तु प्रत्यहं वा सुरेश्वरि

bhavatīti na saṁdeho vyāsasya vacanaṁ yathā nabhasyeparapakṣe tu pratyahaṁ vā sureśvari

इसमें कोई संदेह नहीं, जैसा व्यास जी का वचन है। हे सुरेश्वरि, भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष में, या प्रतिदिन भी —

श्लोक 30 (padma.6.135.30)

अमावास्यादिने सम्यक्श्राद्धदाने च यत्फलम् । नरस्तत्फलमाप्नोति साभ्रमत्यावगाहनात्

amāvāsyādine samyakśrāddhadāne ca yatphalam narastatphalamāpnoti sābhramatyāvagāhanāt

अमावस्या के दिन उचित रीति से श्राद्ध-दान करने पर जो फल मिलता है, वही फल मनुष्य को साभ्रमती में स्नान करने से प्राप्त होता है।

श्लोक 31 (padma.6.135.31)

कार्तिक्यां कृत्तिकायोगे श्रीस्थले माधवाग्रतः । तत्फलं लभते मर्त्यो साभ्रमत्यावगाहनात्

kārtikyāṁ kṛttikāyoge śrīsthale mādhavāgrataḥ tatphalaṁ labhate martyo sābhramatyāvagāhanāt

कार्तिक मास में कृत्तिका-योग के समय, श्रीस्थल में माधव के समक्ष जो फल प्राप्त होता है, वह फल भी मनुष्य साभ्रमती में स्नान करने से प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 32 (padma.6.135.32)

एषा श्रेष्ठतमा देवि सर्वलोकेषु पावनी । इयं धन्यतमा देवि पवित्रा ह्यघनाशिनी

eṣā śreṣṭhatamā devi sarvalokeṣu pāvanī iyaṁ dhanyatamā devi pavitrā hyaghanāśinī

हे देवि, यह सर्वलोकों में सबसे श्रेष्ठ और पावन है। हे देवि, यह परम धन्य, पवित्र और पाप-नाशिनी है।

श्लोक 33 (padma.6.135.33)

यस्यां वै साभ्रमत्यां च एते तिष्ठंति नित्यशः । पूर्वं संबंधिनो ये च उत्तरे ये तथा पुनः

yasyāṁ vai sābhramatyāṁ ca ete tiṣṭhaṁti nityaśaḥ pūrvaṁ saṁbaṁdhino ye ca uttare ye tathā punaḥ

इस साभ्रमती में जो पूर्व के संबंधी हैं, और जो उत्तर के भी हैं, वे सब सदा निवास करते हैं।

श्लोक 34 (padma.6.135.34)

पाश्चात्या दाक्षिणात्याश्च सर्वे यांति च नित्यशः । तीर्थयात्रामिषेणैव खेटके ब्रह्मसन्निधौ

pāścātyā dākṣiṇātyāśca sarve yāṁti ca nityaśaḥ tīrthayātrāmiṣeṇaiva kheṭake brahmasannidhau

पश्चिम और दक्षिण के लोग भी सब सदा वहाँ जाते हैं। तीर्थयात्रा के बहाने से ही, खेटक में, ब्रह्मा के सान्निध्य में —

श्लोक 35 (padma.6.135.35)

आयांति सर्वदा देवि कार्तिक्यां च न संशयः । तत्र श्राद्धं प्रकुर्वंति तथा वै विप्रभोजनम्

āyāṁti sarvadā devi kārtikyāṁ ca na saṁśayaḥ tatra śrāddhaṁ prakurvaṁti tathā vai viprabhojanam

हे देवि, वे सदा आते हैं, और कार्तिक मास में तो निश्चय ही आते हैं। वहाँ वे श्राद्ध करते हैं और ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं।

श्लोक 36 (padma.6.135.36)

नाना धर्मान्प्रकुर्वंति नानायज्ञांश्च नित्यशः । विविधानि च दानानि प्रकुर्वंति जनाः सदा

nānā dharmānprakurvaṁti nānāyajñāṁśca nityaśaḥ vividhāni ca dānāni prakurvaṁti janāḥ sadā

वे नाना प्रकार के धर्म-कार्य करते हैं, सदा नाना प्रकार के यज्ञ करते हैं। लोग सदा नाना प्रकार के दान भी करते हैं।

श्लोक 37 (padma.6.135.37)

चतुर्युगेषु सर्वेषु नात्र कार्या विचारणा । यवक्रीतोऽथ रैभ्यश्च काक्षीवानुशिजस्तथा

caturyugeṣu sarveṣu nātra kāryā vicāraṇā yavakrīto'tha raibhyaśca kākṣīvānuśijastathā

चारों युगों में इसमें कोई संदेह नहीं करना चाहिए। यवक्रीत, रैभ्य, काक्षीवान और उशिज —

श्लोक 38 (padma.6.135.38)

भृग्वंगिरास्तथा कण्वो मेधावी च पुनर्वसुः । बंदी च गुणसंपन्नः प्राच्यां दिशि उपश्रिताः

bhṛgvaṁgirāstathā kaṇvo medhāvī ca punarvasuḥ baṁdī ca guṇasaṁpannaḥ prācyāṁ diśi upaśritāḥ

भृगु, अंगिरा, कण्व, मेधावी, पुनर्वसु, तथा गुणसंपन्न बंदी — ये सब पूर्व दिशा के निवासी हैं।

श्लोक 39 (padma.6.135.39)

उदीच्यां ये महाभागा मधुमत्प्रमुखास्तथा । सुबंधुश्च महाभागो दत्तात्रेयश्च वीर्यवान्

udīcyāṁ ye mahābhāgā madhumatpramukhāstathā subaṁdhuśca mahābhāgo dattātreyaśca vīryavān

उत्तर दिशा में महाभाग्यशाली मधुमत् आदि हैं; महाभाग सुबंधु और वीर्यवान दत्तात्रेय भी वहीं हैं।

श्लोक 40 (padma.6.135.40)

शिखी दीर्घतमाश्चैव गौतमः कश्यपस्तथा । श्वेतकेतुः कहोडश्च पुलहो देवलस्तथा

śikhī dīrghatamāścaiva gautamaḥ kaśyapastathā śvetaketuḥ kahoḍaśca pulaho devalastathā

शिखी, दीर्घतमा, गौतम, कश्यप, श्वेतकेतु, कहोड, पुलह और देवल —

श्लोक 41 (padma.6.135.41)

विश्वामित्र भरद्वाजौ जमदग्निश्च वीर्यवान् । ऋचीकपुत्रो गर्गश्च ऋषिरुद्दालकस्तथा

viśvāmitra bharadvājau jamadagniśca vīryavān ṛcīkaputro gargaśca ṛṣiruddālakastathā

विश्वामित्र, भरद्वाज, वीर्यवान जमदग्नि, ऋचीक-पुत्र, गर्ग, तथा ऋषि उद्दालक —

श्लोक 42 (padma.6.135.42)

देवशर्माऽथ धौम्यश्च आस्तीकः कश्यपस्तथा । लोमशो नाभिकेतुश्च लोमहर्षण एव च

devaśarmā'tha dhaumyaśca āstīkaḥ kaśyapastathā lomaśo nābhiketuśca lomaharṣaṇa eva ca

देवशर्मा, धौम्य, आस्तीक, कश्यप, लोमश, नाभिकेतु, और लोमहर्षण —

श्लोक 43 (padma.6.135.43)

ऋषिरुग्रश्रवाश्चैव भार्गवश्च्यवनस्तथा । वालखिल्यादयो ये च सर्वे गच्छंति तत्र वै

ṛṣirugraśravāścaiva bhārgavaścyavanastathā vālakhilyādayo ye ca sarve gacchaṁti tatra vai

ऋषि उग्रश्रवा, भार्गव च्यवन, तथा वालखिल्य आदि — ये सब वहाँ जाते हैं।

श्लोक 44 (padma.6.135.44)

कृतस्नाना निराहाराः सदा विष्णुपरायणाः । शंखचक्रगदाधरास्तटे तिष्ठंति नित्यशः

kṛtasnānā nirāhārāḥ sadā viṣṇuparāyaṇāḥ śaṁkhacakragadādharāstaṭe tiṣṭhaṁti nityaśaḥ

स्नान किए हुए, अन्न-रहित, सदा विष्णु-परायण, शंख-चक्र-गदा धारण किए हुए, वे सदा उसके तट पर निवास करते हैं।

श्लोक 45 (padma.6.135.45)

पितृतीर्थं गयानाम सर्वतीर्थवरं शुभम् । यत्रास्ते देवदेवेशः स्वयमेव पितामहः

pitṛtīrthaṁ gayānāma sarvatīrthavaraṁ śubham yatrāste devadeveśaḥ svayameva pitāmahaḥ

गया नामक पितृतीर्थ समस्त तीर्थों में श्रेष्ठ और शुभ है, जहाँ स्वयं ब्रह्मा, देवों के भी देव, विराजते हैं।

श्लोक 46 (padma.6.135.46)

गीतायाः पितृभिर्गाथा श्राद्धभागमपीप्सुभिः । एष्टव्या बहवः पुत्रा यद्येकोऽपि गयां व्रजेत्

gītāyāḥ pitṛbhirgāthā śrāddhabhāgamapīpsubhiḥ eṣṭavyā bahavaḥ putrā yadyeko'pi gayāṁ vrajet

पितरों द्वारा गाई गई एक गाथा है, जो श्राद्ध-भाग की इच्छा रखते हुए कहती है — अनेक पुत्रों की कामना करनी चाहिए, यदि उनमें से एक भी गया जाए,

श्लोक 47 (padma.6.135.47)

यजेत वाश्वमेधेन नीलं वा वृषमुत्सृजेत् । तथा वाराणसी पुण्या पितॄणां वल्लभा सदा

yajeta vāśvamedhena nīlaṁ vā vṛṣamutsṛjet tathā vārāṇasī puṇyā pitṝṇāṁ vallabhā sadā

तो मानो अश्वमेध यज्ञ किया गया हो, या नीलवर्ण बैल छोड़ा गया हो। इसी प्रकार वाराणसी भी पुण्यमयी है, पितरों की सदा प्रिय है।

श्लोक 48 (padma.6.135.48)

या चैव मम सांनिध्याद्भुक्तिमुक्तिफलप्रदा । ममाज्ञया तु देवेशो बिंदुमाधवसंज्ञकः

yā caiva mama sāṁnidhyādbhuktimuktiphalapradā mamājñayā tu deveśo biṁdumādhavasaṁjñakaḥ

वह मेरे सान्निध्य से भोग और मोक्ष दोनों फल देने वाली है। मेरी आज्ञा से बिंदुमाधव नामक देवेश —

श्लोक 49 (padma.6.135.49)

नित्यं तिष्ठति देवेशि वाराणस्यां विशेषतः । अतो धन्यतमा श्रेष्ठा पुरीयं मम सर्वदा

nityaṁ tiṣṭhati deveśi vārāṇasyāṁ viśeṣataḥ ato dhanyatamā śreṣṭhā purīyaṁ mama sarvadā

हे देवेशि, वाराणसी में विशेष रूप से सदा निवास करते हैं। इसीलिए यह नगरी मुझे सदा सबसे धन्य और श्रेष्ठ लगती है।

श्लोक 50 (padma.6.135.50)

पितॄणां वल्लभं तीर्थं पुण्यं वै विमलेश्वरम् । पितृतीर्थं प्रयागं च सर्वतीर्थसमन्वितम्

pitṝṇāṁ vallabhaṁ tīrthaṁ puṇyaṁ vai vimaleśvaram pitṛtīrthaṁ prayāgaṁ ca sarvatīrthasamanvitam

पितरों को प्रिय, पुण्यमय विमलेश्वर तीर्थ है; प्रयाग भी पितृतीर्थ है, जो समस्त तीर्थों से युक्त है।

श्लोक 51 (padma.6.135.51)

साभ्रमत्युदके देवि आयांति वचनान्मम । वटेश्वरश्च भगवान्माधवेन समन्वितः

sābhramatyudake devi āyāṁti vacanānmama vaṭeśvaraśca bhagavānmādhavena samanvitaḥ

हे देवि, मेरे ही वचन से वे सब साभ्रमती के जल में आते हैं। भगवान वटेश्वर भी माधव के साथ वहीं वास करते हैं।

श्लोक 52 (padma.6.135.52)

दशाश्वमेधकं पुण्यं गंगाद्वारं तथैव च । मन्नियोगाच्च देवेशि साभ्रमत्यां वसंति हि

daśāśvamedhakaṁ puṇyaṁ gaṁgādvāraṁ tathaiva ca manniyogācca deveśi sābhramatyāṁ vasaṁti hi

पुण्यमय दशाश्वमेध तीर्थ और गंगाद्वार भी, हे देवेशि, मेरी ही आज्ञा से साभ्रमती में निवास करते हैं।

श्लोक 53 (padma.6.135.53)

नदाथ ललितादेवी तीर्थं यत्सप्तधारकम् । तथा मित्रपदं नाम केदारं शंकरालयम्

nadātha lalitādevī tīrthaṁ yatsaptadhārakam tathā mitrapadaṁ nāma kedāraṁ śaṁkarālayam

नद, ललिता देवी का तीर्थ, सप्तधार नामक तीर्थ, तथा मित्रपद नामक केदार, जो शंकर का धाम है —

श्लोक 54 (padma.6.135.54)

गंगासागरमित्याहुः सर्वतीर्थमयं शुभम् । तीर्थं ब्रह्मसरस्तद्वच्छतद्रु सलिले ह्रदे

gaṁgāsāgaramityāhuḥ sarvatīrthamayaṁ śubham tīrthaṁ brahmasarastadvacchatadru salile hrade

जिसे गंगासागर कहा जाता है, वह समस्त तीर्थों से युक्त और शुभ है; ब्रह्मसर नामक तीर्थ भी है, और शतद्रु नदी के जलाशय में भी वैसा ही तीर्थ है।

श्लोक 55 (padma.6.135.55)

तीर्थं तु नैमिषं नाम आज्ञया मम सर्वदा । साभ्रमत्युदके देवि निवसंति न संशयः

tīrthaṁ tu naimiṣaṁ nāma ājñayā mama sarvadā sābhramatyudake devi nivasaṁti na saṁśayaḥ

और नैमिष नामक तीर्थ भी — ये सब मेरी ही आज्ञा से सदा, हे देवि, साभ्रमती के जल में निवास करते हैं, इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 56 (padma.6.135.56)

श्वेता वल्कलिनी पुण्या ततः श्वेता हिरण्मयी । हस्तिमत्यथवार्त्तघ्नी नदी सागरगामिनी

śvetā valkalinī puṇyā tataḥ śvetā hiraṇmayī hastimatyathavārttaghnī nadī sāgaragāminī

श्वेता, पुण्यमयी वल्कलिनी, फिर श्वेता हिरण्मयी, हस्तिमती अथवा वार्तघ्नी — ये सब नदियाँ सागर की ओर बहने वाली हैं।

श्लोक 57 (padma.6.135.57)

पितॄणां वल्लभा ह्येताः श्राद्धकोटिफलप्रदः । तत्र श्राद्धानि देयानि पुत्रैः पितृहिताय वै

pitṝṇāṁ vallabhā hyetāḥ śrāddhakoṭiphalapradaḥ tatra śrāddhāni deyāni putraiḥ pitṛhitāya vai

ये सब पितरों को प्रिय हैं, और करोड़ों श्राद्धों के फल के समान फल देने वाली हैं। पुत्रों को वहाँ पितरों के हित के लिए श्राद्ध करने चाहिए।

श्लोक 58 (padma.6.135.58)

पाटलं वाडवाख्यं च नगरं तत्र सुंदरि । साभ्रमत्यां सदा एताः प्राप्ता नद्यो विशेषतः

pāṭalaṁ vāḍavākhyaṁ ca nagaraṁ tatra suṁdari sābhramatyāṁ sadā etāḥ prāptā nadyo viśeṣataḥ

हे सुंदरी, वहाँ पाटल और वाडव नामक नगर हैं। ये सब नदियाँ विशेष रूप से सदा साभ्रमती में मिली हुई हैं।

श्लोक 59 (padma.6.135.59)

तत्र स्नानं च दानं च ये कुर्वंति नरा भुवि । इहलोके सुखं भुक्त्वा यांति विष्णोः सनातनम्

tatra snānaṁ ca dānaṁ ca ye kurvaṁti narā bhuvi ihaloke sukhaṁ bhuktvā yāṁti viṣṇoḥ sanātanam

पृथ्वी पर जो मनुष्य वहाँ स्नान और दान करते हैं, वे इस लोक में सुख भोगकर विष्णु के सनातन धाम को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 60 (padma.6.135.60)

जंबूद्वीपं महापुण्यं यत्र पुण्यं विवर्द्धते । तत्रार्याख्यं महापुण्यं सर्वकामफलप्रदम्

jaṁbūdvīpaṁ mahāpuṇyaṁ yatra puṇyaṁ vivarddhate tatrāryākhyaṁ mahāpuṇyaṁ sarvakāmaphalapradam

जंबूद्वीप अत्यंत पुण्यमय है, जहाँ पुण्य निरंतर बढ़ता है; वहाँ आर्य नामक अत्यंत पुण्यमय तीर्थ है, जो समस्त कामनाओं का फल देने वाला है।

श्लोक 61 (padma.6.135.61)

नीलकंठमिति ख्यातं तीर्थं नंदह्रदस्तथा । तथा रुद्रह्रदस्तीर्थं पुण्यं रुद्र महालयम्

nīlakaṁṭhamiti khyātaṁ tīrthaṁ naṁdahradastathā tathā rudrahradastīrthaṁ puṇyaṁ rudra mahālayam

नीलकंठ नाम से प्रसिद्ध तीर्थ, नंदह्रद तीर्थ, तथा पुण्यमय रुद्रह्रद तीर्थ और रुद्र-महालय भी हैं।

श्लोक 62 (padma.6.135.62)

मंदाकिनी महापुण्या तथाच्छोदा महानदी । साभ्रमत्यां वहंत्येते स्वात्मना दर्शनीकृते

maṁdākinī mahāpuṇyā tathācchodā mahānadī sābhramatyāṁ vahaṁtyete svātmanā darśanīkṛte

महापुण्यमयी मंदाकिनी और महानदी अच्छोदा — ये सब अपने ही स्वरूप में दर्शनीय होकर साभ्रमती में बहती हैं।

श्लोक 63 (padma.6.135.63)

धूम्रा मित्रपदं तद्वद्वैजनाथं दृषद्वरम् । क्षिप्रा नदी महाकालं तथा कालिंजरो गिरिः

dhūmrā mitrapadaṁ tadvadvaijanāthaṁ dṛṣadvaram kṣiprā nadī mahākālaṁ tathā kāliṁjaro giriḥ

धूम्रा नदी, मित्रपद तीर्थ, वैजनाथ, दृषद्वती नदी, क्षिप्रा नदी, महाकाल तीर्थ, तथा कालिंजर पर्वत —

श्लोक 64 (padma.6.135.64)

गंगोद्भूतं हरोद्भेदं नर्मदाकारमेव च । गंगापिंडप्रदानेन समान्याहुर्मनीषिणः

gaṁgodbhūtaṁ harodbhedaṁ narmadākārameva ca gaṁgāpiṁḍapradānena samānyāhurmanīṣiṇaḥ

गंगा से उत्पन्न हरोद्भेद, तथा नर्मदा के समान रूप — इन्हें ज्ञानीजन गंगा में पिंड-दान के समान फलदायी कहते हैं।

श्लोक 65 (padma.6.135.65)

एतानि ब्रह्मतीर्थानि साभ्रमत्युत्तरे तटे । गुप्तीकृतानि देवेशि देवैर्ब्रह्मपुरोगमैः

etāni brahmatīrthāni sābhramatyuttare taṭe guptīkṛtāni deveśi devairbrahmapurogamaiḥ

ये सब ब्रह्मा के तीर्थ साभ्रमती के उत्तरी तट पर, हे देवेशि, ब्रह्मा-प्रमुख देवताओं द्वारा गुप्त रूप से स्थापित किए गए हैं।

श्लोक 66 (padma.6.135.66)

स्मरणादपि लोकानां पापघ्नानि महेश्वरि । किं पुनः श्राद्धदातॄणां मानवानां सुरेश्वरि

smaraṇādapi lokānāṁ pāpaghnāni maheśvari kiṁ punaḥ śrāddhadātṝṇāṁ mānavānāṁ sureśvari

हे महेश्वरि, केवल स्मरण से ही ये संसार के पापों को नष्ट करने वाले हैं — फिर श्राद्ध करने वाले मनुष्यों के लिए तो कहना ही क्या, हे सुरेश्वरि?

श्लोक 67 (padma.6.135.67)

ॐकारं पितृतीर्थं च कावेरी कपिलोदकम् । संभेदश्चंडवेगायास्तथैवामरकंटकम्

oṁkāraṁ pitṛtīrthaṁ ca kāverī kapilodakam saṁbhedaścaṁḍavegāyāstathaivāmarakaṁṭakam

ॐकार तीर्थ, पितृतीर्थ, कावेरी, कपिलोदक, चंडवेगा का संगम, तथा अमरकंटक भी —

श्लोक 68 (padma.6.135.68)

कुरुक्षेत्राच्छतगुणमस्मिन्स्नानादिकं भवेत् । वार्तघ्नीसंगमे देवि गणेश्वरपुरःसरम्

kurukṣetrācchataguṇamasminsnānādikaṁ bhavet vārtaghnīsaṁgame devi gaṇeśvarapuraḥsaram

इस तीर्थ में स्नान आदि करना कुरुक्षेत्र से सौ गुना अधिक फलदायी है। हे देवि, वार्तघ्नी के संगम पर गणेश्वर आदि —

श्लोक 69 (padma.6.135.69)

साभ्रमत्यां पुरा नीतं गणैस्तीर्थकदंकबम् । एष तूद्देशतः प्रोक्तस्तीर्थानां संगमो मया

sābhramatyāṁ purā nītaṁ gaṇaistīrthakadaṁkabam eṣa tūddeśataḥ proktastīrthānāṁ saṁgamo mayā

पहले गणों द्वारा साभ्रमती में तीर्थों का यह समूह लाया गया था। यह तो मैंने संक्षेप में तीर्थों के इस संगम का वर्णन किया है।

श्लोक 70 (padma.6.135.70)

वागीशापि न शक्नोति तीर्थानां तत्वविस्तरम् । सत्यं तीर्थं दयातीर्थं तीर्थमिंद्रियविग्रहः

vāgīśāpi na śaknoti tīrthānāṁ tatvavistaram satyaṁ tīrthaṁ dayātīrthaṁ tīrthamiṁdriyavigrahaḥ

स्वयं वाणी की देवी भी इन तीर्थों का पूर्ण विस्तार वर्णन करने में समर्थ नहीं है। सत्य ही एक तीर्थ है, दया ही एक तीर्थ है, इंद्रियों का निग्रह भी एक तीर्थ है।

श्लोक 71 (padma.6.135.71)

तस्यास्तीर्थे प्रयत्नेन स्नानं कुर्यान्न संशयः । प्रातःकालो मुहूर्तांस्त्रीन्संगवस्तावदेव तु

tasyāstīrthe prayatnena snānaṁ kuryānna saṁśayaḥ prātaḥkālo muhūrtāṁstrīnsaṁgavastāvadeva tu

उसके तीर्थ में प्रयत्नपूर्वक स्नान करना चाहिए, इसमें कोई संशय नहीं। प्रातःकाल तीन मुहूर्तों तक रहता है, फिर उतने ही समय तक संगव-काल रहता है।

श्लोक 72 (padma.6.135.72)

तदा स्नानादिकं तीर्थे देवानां प्रीतिदायकम् । मध्याह्नस्त्रिमुहूर्तः स्यादपराह्णस्ततः परम्

tadā snānādikaṁ tīrthe devānāṁ prītidāyakam madhyāhnastrimuhūrtaḥ syādaparāhṇastataḥ param

उस समय तीर्थ में स्नान आदि करना देवताओं को प्रसन्न करने वाला है। दोपहर भी तीन मुहूर्तों का होता है, और उसके बाद अपराह्न आता है।

श्लोक 73 (padma.6.135.73)

पितॄणां प्रीतिजननं स्नानपिंडादि तर्पणम् । सायाह्नस्त्रिमुहूर्तः स्याच्छ्राद्धं तत्र न कारयेत्

pitṝṇāṁ prītijananaṁ snānapiṁḍādi tarpaṇam sāyāhnastrimuhūrtaḥ syācchrāddhaṁ tatra na kārayet

स्नान, पिंड-दान आदि तर्पण पितरों को प्रसन्न करने वाले हैं। संध्याकाल भी तीन मुहूर्तों का होता है, किंतु उस समय श्राद्ध नहीं करना चाहिए।

श्लोक 74 (padma.6.135.74)

राक्षसी नाम सा वेला गर्हिता सर्वकर्मसु । अह्नो मुहूर्ता विख्याता दशपंच च सर्वदा

rākṣasī nāma sā velā garhitā sarvakarmasu ahno muhūrtā vikhyātā daśapaṁca ca sarvadā

उस समय को 'राक्षसी वेला' कहा जाता है, जो समस्त कर्मों में निंदित है। दिन के मुहूर्त सदा पंद्रह की संख्या में प्रसिद्ध हैं।

श्लोक 75 (padma.6.135.75)

तत्राष्टमो मुहूर्तो यः स कालः कुतुपः स्मृतः । मध्याह्ने सर्वदा यस्मान्मंदी भवति भास्करः

tatrāṣṭamo muhūrto yaḥ sa kālaḥ kutupaḥ smṛtaḥ madhyāhne sarvadā yasmānmaṁdī bhavati bhāskaraḥ

उनमें जो आठवाँ मुहूर्त है, वह काल 'कुतप' कहा जाता है, क्योंकि उस समय दोपहर में सूर्य सदा मंद हो जाता है।

श्लोक 76 (padma.6.135.76)

तस्मादनंतफलदः पितॄणां पिंडदानतः । मध्याह्नः खङ्गपात्रं च तथा नेपालकंबलः

tasmādanaṁtaphaladaḥ pitṝṇāṁ piṁḍadānataḥ madhyāhnaḥ khaṅgapātraṁ ca tathā nepālakaṁbalaḥ

इसीलिए पितरों को पिंड-दान करने से यह अनंत फल देने वाला है, और वह मध्याह्न ही श्रेष्ठ है। खड्ग-पात्र और नेपाली कंबल भी श्राद्ध में आवश्यक हैं।

श्लोक 77 (padma.6.135.77)

रूप्यं दर्भास्तथा गावो दौहित्रं कुतपास्तिलाः । पापं कुत्सितमित्याहुस्तस्य संतापकारकाः

rūpyaṁ darbhāstathā gāvo dauhitraṁ kutapāstilāḥ pāpaṁ kutsitamityāhustasya saṁtāpakārakāḥ

चाँदी, कुश, गौएँ, दौहित्र, कुतप-काल और तिल — इनके अभाव में किया गया श्राद्ध पापपूर्ण और निंदित कहा जाता है, जो संताप देने वाला है।

श्लोक 78 (padma.6.135.78)

अष्टावेते यतस्तस्मात्कुतपा इति विश्रुताः । ऊर्द्ध्वं मुहूर्तात्कुतुपात्यन्मुहूर्त चतुष्टयम्

aṣṭāvete yatastasmātkutapā iti viśrutāḥ ūrddhvaṁ muhūrtātkutupātyanmuhūrta catuṣṭayam

चूँकि ये आठ हैं, इसीलिए 'कुतप' नाम से प्रसिद्ध हुए हैं। कुतप-मुहूर्त के आगे चार मुहूर्तों का समय होता है,

श्लोक 79 (padma.6.135.79)

महूर्तपंचकं चैतच्छ्राद्धकाले समिष्यते । विष्णोर्देहात्समुद्भूताः कुशाः कृष्णतिलाः स्मृताः

mahūrtapaṁcakaṁ caitacchrāddhakāle samiṣyate viṣṇordehātsamudbhūtāḥ kuśāḥ kṛṣṇatilāḥ smṛtāḥ

और यह पाँच मुहूर्तों का समय ही श्राद्ध-काल के लिए उपयुक्त माना गया है। कुश और काले तिल विष्णु के शरीर से उत्पन्न हुए माने गए हैं।

श्लोक 80 (padma.6.135.80)

श्राद्धस्य रक्षणार्थाय एवमाहुर्दिवौकसः । तिलोदकांजलिर्देयो जलस्थैस्तीर्थवासिभिः

śrāddhasya rakṣaṇārthāya evamāhurdivaukasaḥ tilodakāṁjalirdeyo jalasthaistīrthavāsibhiḥ

यही देवताओं ने श्राद्ध की रक्षा के लिए कहा है। तीर्थ में निवास करने वाले जल में खड़े होकर तिल-मिश्रित जल की अंजलि देनी चाहिए।

श्लोक 81 (padma.6.135.81)

सदर्भहस्तैरेकेन श्राद्धमेवं न हिंस्यते । साभ्रमत्यां नामधेयैरिति तीर्थप्रवेशनम्

sadarbhahastairekena śrāddhamevaṁ na hiṁsyate sābhramatyāṁ nāmadheyairiti tīrthapraveśanam

कुश-सहित एक हाथ से यह करना चाहिए, ऐसा करने से श्राद्ध का उल्लंघन नहीं होता। इस प्रकार साभ्रमती में नामपूर्वक तीर्थ-प्रवेश की विधि है।

श्लोक 82 (padma.6.135.82)

कारयित्वा मया देवि दत्ता वै कश्यपाय च । मम भक्तः कश्यपोसौ वल्लभो मम सर्वदा

kārayitvā mayā devi dattā vai kaśyapāya ca mama bhaktaḥ kaśyaposau vallabho mama sarvadā

हे देवि, यह विधि करवाकर मैंने ही उसे कश्यप को प्रदान किया था। कश्यप मेरे भक्त हैं, वे मुझे सदा प्रिय हैं।

श्लोक 83 (padma.6.135.83)

दत्ता तस्मादियं गंगा पवित्रा पापनाशिनी । साभ्रमत्यां महाभागे तीर्थे वै ब्रह्मचारिके

dattā tasmādiyaṁ gaṁgā pavitrā pāpanāśinī sābhramatyāṁ mahābhāge tīrthe vai brahmacārike

इसीलिए यह पवित्र, पाप-नाशिनी गंगा उसे प्रदान की गई। साभ्रमती के महाभाग्यशाली ब्रह्मचारी-तीर्थ में —

श्लोक 84 (padma.6.135.84)

आत्मानं च प्रतिष्ठाप्य तन्नाम्ना शंकरो ह्यहम् । स्थितो लोकहितार्थाय ब्रह्मचारीश संज्ञकः

ātmānaṁ ca pratiṣṭhāpya tannāmnā śaṁkaro hyaham sthito lokahitārthāya brahmacārīśa saṁjñakaḥ

वहाँ मैंने, शंकर ने, स्वयं को प्रतिष्ठापित करके, उसी नाम से लोक-हित के लिए 'ब्रह्मचारीश' नाम से निवास किया।

श्लोक 85 (padma.6.135.85)

साभ्रमत्यामुपकंठे ब्रह्मचारीश संज्ञके । कलौ भक्तो विशेषेण पूजनं कुरुते यदा

sābhramatyāmupakaṁṭhe brahmacārīśa saṁjñake kalau bhakto viśeṣeṇa pūjanaṁ kurute yadā

साभ्रमती के तट पर, ब्रह्मचारीश नामक स्थान पर, कलियुग में जब कोई भक्त विशेष रूप से पूजा करता है,

श्लोक 86 (padma.6.135.86)

इहलोके सुखं भुक्त्वा याति शैवं पदं महत् । महद्भिर्व्याधिभिश्चैव पीडितो यदि गच्छति

ihaloke sukhaṁ bhuktvā yāti śaivaṁ padaṁ mahat mahadbhirvyādhibhiścaiva pīḍito yadi gacchati

तो वह इस लोक में सुख भोगकर शिव के महान पद को प्राप्त होता है। यदि कोई बड़े रोगों से पीड़ित होकर वहाँ जाता है,

श्लोक 87 (padma.6.135.87)

यस्याशु नश्यति व्याधिर्दर्शनाच्च महेश्वरि । गत्वा वै तस्य संस्थाने उपवासी जितेंद्रियः

yasyāśu naśyati vyādhirdarśanācca maheśvari gatvā vai tasya saṁsthāne upavāsī jiteṁdriyaḥ

हे महेश्वरि, उसका रोग शीघ्र ही उसके दर्शन से नष्ट हो जाता है। उस स्थान पर जाकर, उपवास करते हुए, इंद्रियों को जीतकर —

श्लोक 88 (padma.6.135.88)

पूजनं कुरुते भक्त्या रात्रौ तिष्ठन्सुनिश्चलः । तदाहं योगिरूपेण दर्शनं तस्य यामि हि

pūjanaṁ kurute bhaktyā rātrau tiṣṭhansuniścalaḥ tadāhaṁ yogirūpeṇa darśanaṁ tasya yāmi hi

जो भक्तिपूर्वक पूजा करता है और रात्रि में स्थिर रहकर वहाँ ठहरता है, तब मैं योगी के रूप में उसे दर्शन देने जाता हूँ।

श्लोक 89 (padma.6.135.89)

ददामि वांच्छितान्कामान्सत्यं सत्यं वरानने । ममस्थाने विशेषेण समायांति च ये जनाः

dadāmi vāṁcchitānkāmānsatyaṁ satyaṁ varānane mamasthāne viśeṣeṇa samāyāṁti ca ye janāḥ

हे वरानने, सत्य है, सत्य है — मैं उसे उसकी अभिलषित कामनाएँ देता हूँ। जो लोग मेरे इस स्थान पर विशेष रूप से आते हैं,

श्लोक 90 (padma.6.135.90)

तेषां व्याधिप्रशमनं करोमि सुचिरादहम् । चतुरशीतिसंज्ञेयो व्याधिः संकथितो मया

teṣāṁ vyādhipraśamanaṁ karomi sucirādaham caturaśītisaṁjñeyo vyādhiḥ saṁkathito mayā

उनके रोगों को मैं शीघ्र ही शांत कर देता हूँ। चौरासी नामक जो रोग बताया गया है,

श्लोक 91 (padma.6.135.91)

स स व्याधिर्विनश्येत दर्शनादेव सुंदरि । न लिंगं वर्तते तत्र मामकं नगनंदिनि

sa sa vyādhirvinaśyeta darśanādeva suṁdari na liṁgaṁ vartate tatra māmakaṁ naganaṁdini

हे सुंदरी, वह रोग मेरे दर्शन मात्र से ही नष्ट हो जाता है। हे पर्वत-पुत्री, वहाँ मेरा कोई लिंग-रूप विद्यमान नहीं है —

श्लोक 92 (padma.6.135.92)

स्नानमात्रं तु तत्रैव मामकं नात्र संशयः । एकस्मिन्नेव काले तु अस्यां भूमौ महातपाः

snānamātraṁ tu tatraiva māmakaṁ nātra saṁśayaḥ ekasminneva kāle tu asyāṁ bhūmau mahātapāḥ

वहाँ केवल स्नान ही मेरा रूप है, इसमें कोई संशय नहीं। एक समय की बात है, इस भूमि पर एक महातपस्वी —

श्लोक 93 (padma.6.135.93)

राजा वै सूर्यवंशीयो ब्रह्मदत्तस्तु वीर्यवान् । तेन राज्ञा तपस्तप्तं बहुकालं सुरेश्वरि

rājā vai sūryavaṁśīyo brahmadattastu vīryavān tena rājñā tapastaptaṁ bahukālaṁ sureśvari

सूर्यवंशी राजा ब्रह्मदत्त, जो अत्यंत पराक्रमी था। हे सुरेश्वरि, उस राजा ने दीर्घकाल तक तप किया।

श्लोक 94 (padma.6.135.94)

पंचाग्निसाधनं तेन कृतं च बहुधा ततः । मासोपवासकादीनि तपस्तप्तान्यनेकशः

paṁcāgnisādhanaṁ tena kṛtaṁ ca bahudhā tataḥ māsopavāsakādīni tapastaptānyanekaśaḥ

उसने पंचाग्नि-साधना भी अनेक प्रकार से की, और महीने भर के उपवास आदि अनेक तप भी किए।

श्लोक 95 (padma.6.135.95)

एवं बहुतरं कालं राज्ञा तप्तं तपो महत् । प्रत्यक्षोऽहं तदा जातो वरार्थं वरवर्णिनि

evaṁ bahutaraṁ kālaṁ rājñā taptaṁ tapo mahat pratyakṣo'haṁ tadā jāto varārthaṁ varavarṇini

इस प्रकार बहुत काल तक उस राजा ने महान तप किया। तब, हे वरवर्णिनी, वर देने के लिए मैं प्रत्यक्ष प्रकट हुआ।

श्लोक 96 (padma.6.135.96)

ब्रह्मदत्त शृणुष्व त्वं महद्वाक्यं नरेश्वर । यं यं वांछयसे नित्यं तं तं दद्मि न संशयः

brahmadatta śṛṇuṣva tvaṁ mahadvākyaṁ nareśvara yaṁ yaṁ vāṁchayase nityaṁ taṁ taṁ dadmi na saṁśayaḥ

मैंने कहा — 'हे ब्रह्मदत्त, हे नरेश्वर, सुनो मेरा यह महान वचन — तुम जिस-जिस वस्तु की सदा कामना करते हो, वह-वह मैं तुम्हें अवश्य दूँगा।'

श्लोक 97 (padma.6.135.97)

तेनोक्तं मम देवेश वांच्छितं यदि दीयते । एक एव वरो देव दीयतां मम सर्वदा

tenoktaṁ mama deveśa vāṁcchitaṁ yadi dīyate eka eva varo deva dīyatāṁ mama sarvadā

उसने कहा — हे देवेश, यदि मेरी अभिलाषा दी ही जानी है, तो हे देव, केवल एक ही वर मुझे सदा के लिए दिया जाए।

श्लोक 98 (padma.6.135.98)

मम नाम्ना हि देवेश ईश्वरो भुवि जायताम् । तेन वाक्येन संतुष्टो वरो दत्तो मयाऽनघे

mama nāmnā hi deveśa īśvaro bhuvi jāyatām tena vākyena saṁtuṣṭo varo datto mayā'naghe

'हे देवेश, मेरे ही नाम से एक ईश्वर इस भूतल पर विख्यात हो जाएँ।' उसके इस वचन से संतुष्ट होकर, हे निष्पाप, मैंने वह वर दे दिया।

श्लोक 99 (padma.6.135.99)

तदाहं तेन वै सार्द्धं निवसामि सुरेश्वरि । अत्र स्थित्वा निराहारो भक्तिं कुर्यादशेषतः

tadāhaṁ tena vai sārddhaṁ nivasāmi sureśvari atra sthitvā nirāhāro bhaktiṁ kuryādaśeṣataḥ

हे सुरेश्वरि, तब से मैं उसके साथ ही वहाँ निवास करता हूँ। जो यहाँ रहकर निराहार होकर पूर्ण भक्ति करता है,

श्लोक 100 (padma.6.135.100)

ददामि वांछितान्कामान्यावदिंद्राश्चतुर्दश । अत्रागत्य तु ये विप्रा रुद्रजाप्यादिकं च यत्

dadāmi vāṁchitānkāmānyāvadiṁdrāścaturdaśa atrāgatya tu ye viprā rudrajāpyādikaṁ ca yat

उसे मैं उसकी अभिलषित कामनाएँ प्रदान करता हूँ, चाहे चौदह इंद्रों तक का काल क्यों न बीत जाए। जो ब्राह्मण यहाँ आकर रुद्र-जप आदि —

श्लोक 101 (padma.6.135.101)

प्रकुर्वंति विशेषेण तेषां दद्मि शृणुष्व तत् । स्त्रीसौख्यं पुत्रसौख्यं च लक्ष्मीवृद्धिकरं पुनः

prakurvaṁti viśeṣeṇa teṣāṁ dadmi śṛṇuṣva tat strīsaukhyaṁ putrasaukhyaṁ ca lakṣmīvṛddhikaraṁ punaḥ

विशेष रूप से करते हैं, उन्हें मैं जो देता हूँ, वह सुनो — स्त्री-सुख, पुत्र-सुख, और साथ ही लक्ष्मी की वृद्धि करने वाला वरदान।

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