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उत्तर खण्ड · अध्याय 136

नन्दितीर्थ की महिमा

अध्याय 135अध्याय-सूचीअध्याय 137

श्लोक 1 (padma.6.136.1)

पार्वत्युवाच। साभ्रमत्यपि यान्देशान्नंदिकुंडाद्विनिःसृता । गच्छंती पावयामास कान्कान्देशान्वदस्व मे । चकार कानि तीर्थानि विलंघ्यार्बुदपर्वतम्

pārvatyuvāca sābhramatyapi yāndeśānnaṁdikuṁḍādviniḥsṛtā gacchaṁtī pāvayāmāsa kānkāndeśānvadasva me cakāra kāni tīrthāni vilaṁghyārbudaparvatam

पार्वती ने कहा — नंदिकुंड से निकली यह साभ्रमती जिन-जिन देशों से होकर बहती और उन्हें पवित्र करती है, वे मुझे बताइए। अर्बुद पर्वत को लाँघकर उसने कौन-कौन से तीर्थ बनाए?

श्लोक 2 (padma.6.136.2)

सूत उवाच। इति तत्रोदिते देव्या महादेवः स विश्वराट् । उवाच वचनं तां वै पार्वतीं विश्वमोहिनीम्

sūta uvāca iti tatrodite devyā mahādevaḥ sa viśvarāṭ uvāca vacanaṁ tāṁ vai pārvatīṁ viśvamohinīm

सूत ने कहा — देवी द्वारा ऐसा पूछे जाने पर विश्वराट महादेव ने विश्व को मोहित करने वाली उस पार्वती से यह वचन कहा।

श्लोक 3 (padma.6.136.3)

महादेव उवाच। नंदिकुंडात्प्रथमतः तीर्थात्परमपावनात् । कपालमोचनं तीर्थं मुनिभिः संप्रकारितम्

mahādeva uvāca naṁdikuṁḍātprathamataḥ tīrthātparamapāvanāt kapālamocanaṁ tīrthaṁ munibhiḥ saṁprakāritam

महादेव ने कहा — परम पावन नंदिकुंड तीर्थ से सबसे पहले कपालमोचन तीर्थ है, जिसे मुनियों ने भली-भाँति प्रकाशित किया है।

श्लोक 4 (padma.6.136.4)

सर्वतेजोधिकं तीर्थं पावनात्पावनं परम् । अत्र मया परित्यक्तं कपालं ब्रह्मसंज्ञकम्

sarvatejodhikaṁ tīrthaṁ pāvanātpāvanaṁ param atra mayā parityaktaṁ kapālaṁ brahmasaṁjñakam

यह तीर्थ समस्त तेजों में अधिक और पावनों में भी परम पावन है। यहीं मैंने ब्रह्मा के सिर की खोपड़ी को त्यागा था।

श्लोक 5 (padma.6.136.5)

कपालमोचनं तीर्थमतो जातं हि पार्वति । पावनं सर्वभूतानां प्रकटं लोकविश्रुतम्

kapālamocanaṁ tīrthamato jātaṁ hi pārvati pāvanaṁ sarvabhūtānāṁ prakaṭaṁ lokaviśrutam

हे पार्वती, इसीलिए इसका नाम कपालमोचन तीर्थ पड़ा। यह समस्त प्राणियों को पवित्र करने वाला, प्रकट और लोक-विख्यात है।

श्लोक 6 (padma.6.136.6)

कपालकुंडमाख्यातं तत्तीर्थं तीर्थराजकम् । यत्र देवास्तथा नागा गंधर्वाः किंनरादयः

kapālakuṁḍamākhyātaṁ tattīrthaṁ tīrtharājakam yatra devāstathā nāgā gaṁdharvāḥ kiṁnarādayaḥ

उस तीर्थ को कपालकुंड कहा गया है, जो तीर्थों का राजा है, जहाँ देवता, नाग, गंधर्व, किन्नर आदि —

श्लोक 7 (padma.6.136.7)

निवसंति महात्मानस्तीर्थे वै निर्मले शुभे । त्रैलोक्ये विश्रुतं तीर्थं दानदं मुक्तिदायकम्

nivasaṁti mahātmānastīrthe vai nirmale śubhe trailokye viśrutaṁ tīrthaṁ dānadaṁ muktidāyakam

वे सब महात्मा उस निर्मल, शुभ तीर्थ में निवास करते हैं। यह तीर्थ तीनों लोकों में विख्यात है, दान देने वाला और मुक्ति देने वाला है।

श्लोक 8 (padma.6.136.8)

तत्र स्नात्वा शुचिर्भूत्वा कपालेशं प्रपूजयेत् । उपोष्य रजनीमेकां कृत्वा ब्राह्मणभोजनम्

tatra snātvā śucirbhūtvā kapāleśaṁ prapūjayet upoṣya rajanīmekāṁ kṛtvā brāhmaṇabhojanam

वहाँ स्नान करके, शुद्ध होकर, कपालेश की पूजा करनी चाहिए; एक रात्रि उपवास करके ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए।

श्लोक 9 (padma.6.136.9)

तत्रापि वस्त्रदानेन अग्निहोत्रफलं लभेत् । तस्मिंस्तीर्थे तु यः कश्चिद्दर्शनव्रतमास्थितः

tatrāpi vastradānena agnihotraphalaṁ labhet tasmiṁstīrthe tu yaḥ kaściddarśanavratamāsthitaḥ

वहाँ वस्त्र-दान करने से भी अग्निहोत्र का फल प्राप्त होता है। उस तीर्थ में जो कोई दर्शन-व्रत का पालन करता है,

श्लोक 10 (padma.6.136.10)

संत्यज्य देहमात्मानं शिवलोकं व्रजेद्ध्रुवम् । अस्मिंस्तीर्थे पुरा स्नानात्सौदासो ब्रह्महत्यया

saṁtyajya dehamātmānaṁ śivalokaṁ vrajeddhruvam asmiṁstīrthe purā snānātsaudāso brahmahatyayā

वह अपने शरीर का त्याग करके निश्चित रूप से शिवलोक को प्राप्त होता है। इसी तीर्थ में पूर्वकाल में स्नान करके सौदास ब्रह्महत्या के —

श्लोक 11 (padma.6.136.11)

मोचितो विमलं ज्ञानं प्राप्तवान्वै सुरेश्वरि । भागीरथ्यान्वये जातः सुदासाख्यो महाबली

mocito vimalaṁ jñānaṁ prāptavānvai sureśvari bhāgīrathyānvaye jātaḥ sudāsākhyo mahābalī

पाप से मुक्त हुआ, और हे सुरेश्वरि, उसने निर्मल ज्ञान प्राप्त किया। भगीरथ के वंश में उत्पन्न महाबली सुदास नामक राजा —

श्लोक 12 (padma.6.136.12)

तस्य पुत्रो मित्रसहः सौदासेति च विश्रुतः । वसिष्ठशापतः प्राप्तः सौदासो राक्षसीं तनुम्

tasya putro mitrasahaḥ saudāseti ca viśrutaḥ vasiṣṭhaśāpataḥ prāptaḥ saudāso rākṣasīṁ tanum

उसके पुत्र मित्रसह, जो सौदास नाम से प्रसिद्ध थे, वसिष्ठ के शाप से राक्षसी तनु को प्राप्त हुए।

श्लोक 13 (padma.6.136.13)

साभ्रमत्यां कृतस्नानो विमुक्तः शापजादघात् । अत्र गंगा च यमुना गोदावरी सरस्वती

sābhramatyāṁ kṛtasnāno vimuktaḥ śāpajādaghāt atra gaṁgā ca yamunā godāvarī sarasvatī

साभ्रमती में स्नान करके वे शाप से उत्पन्न पाप से मुक्त हो गए। यहाँ गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती —

श्लोक 14 (padma.6.136.14)

नंदितीर्थे वसंत्येताः पवित्राः पुण्यदाः सदा । गोदानं भूमिदानं च शय्यादानं तथैव च

naṁditīrthe vasaṁtyetāḥ pavitrāḥ puṇyadāḥ sadā godānaṁ bhūmidānaṁ ca śayyādānaṁ tathaiva ca

ये सब पवित्र, सदा पुण्य देने वाली नदियाँ नंदितीर्थ में निवास करती हैं। गौ-दान, भूमि-दान, शय्या-दान —

श्लोक 15 (padma.6.136.15)

कन्यादानं विशेषेण कर्तव्यं ज्ञानिभिर्नरैः । एतद्दानसमं प्रोक्तं साभ्रमत्यावगाहनम्

kanyādānaṁ viśeṣeṇa kartavyaṁ jñānibhirnaraiḥ etaddānasamaṁ proktaṁ sābhramatyāvagāhanam

और विशेष रूप से कन्यादान भी ज्ञानी मनुष्यों को करना चाहिए। साभ्रमती में स्नान करना इन्हीं दानों के समान फलदायी कहा गया है।

श्लोक 16 (padma.6.136.16)

यत्र वै सकलान्येव पतितानीह भूतले । वारिणा स्पर्शमात्रेण शुद्धत्वं यांति तान्यपि

yatra vai sakalānyeva patitānīha bhūtale vāriṇā sparśamātreṇa śuddhatvaṁ yāṁti tānyapi

यहाँ इस भूतल पर जो भी पतित वस्तुएँ हैं, वे भी उसके जल के स्पर्शमात्र से शुद्धता को प्राप्त हो जाती हैं।

श्लोक 17 (padma.6.136.17)

अत्र श्राद्धं प्रकुर्वाणो नरो वै भक्तितत्परः । पितरस्तस्य संतुष्टा गच्छंति परमं पदम्

atra śrāddhaṁ prakurvāṇo naro vai bhaktitatparaḥ pitarastasya saṁtuṣṭā gacchaṁti paramaṁ padam

यहाँ भक्तिपूर्वक श्राद्ध करने वाला मनुष्य — उसके पितर संतुष्ट होकर परम पद को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 18 (padma.6.136.18)

एतदाख्यानकं दिव्यं ये शृण्वंति नराः सदा । सर्वपापविनिर्मुक्ता विष्णोः सायुज्यमाप्नुयुः

etadākhyānakaṁ divyaṁ ye śṛṇvaṁti narāḥ sadā sarvapāpavinirmuktā viṣṇoḥ sāyujyamāpnuyuḥ

जो मनुष्य इस दिव्य आख्यान को सदा सुनते हैं, वे समस्त पापों से मुक्त होकर विष्णु के सायुज्य को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 19 (padma.6.136.19)

कर्मणा मनसा वाचा ये स्तुवंति महेश्वरम् । न तेषां विद्यते दुःखं यावदाभूतसंप्लवम्

karmaṇā manasā vācā ye stuvaṁti maheśvaram na teṣāṁ vidyate duḥkhaṁ yāvadābhūtasaṁplavam

जो कर्म, मन और वाणी से महेश्वर की स्तुति करते हैं, उनके लिए प्रलय-काल तक कोई दुःख नहीं रहता।

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