उत्तर खण्ड · अध्याय 150
जांबवत् तीर्थ महात्म्य
श्लोक 1 (padma.6.150.1)
महादेवउवाच। जंबूतीर्थं ततो गच्छेत्स्नानार्थं पापनाशनम् । कलिकाले च यत्पुंसां स्वर्गसोपानवत्स्थितम्
mahādevauvāca jaṃbūtīrthaṃ tato gacchetsnānārthaṃ pāpanāśanam kalikāle ca yatpuṃsāṃ svargasopānavatsthitam
महादेव ने कहा — तब पाप का नाश करने वाले जंबू-तीर्थ में स्नान हेतु जाना चाहिए, जो कलिकाल में मनुष्यों के लिए स्वर्ग की सीढ़ी के समान स्थित है।
श्लोक 2 (padma.6.150.2)
यत्र जांबवता पूर्वं दशांगे पर्वतोत्तमे । स्थापितं ऋक्षराजेशं लिगं सुरगणार्चितम्
yatra jāṃbavatā pūrvaṃ daśāṃge parvatottame sthāpitaṃ ṛkṣarājeśaṃ ligaṃ suragaṇārcitam
जहाँ पूर्वकाल में पर्वतों में श्रेष्ठ दशांग पर्वत पर जांबवान ने देवगणों द्वारा पूजित ऋक्षराजेश नामक लिंग की स्थापना की थी।
श्लोक 3 (padma.6.150.3)
रामेण हि यदा पूर्वं हतो वै रावणोऽसुरः । तदा जांबवता दिक्षु भेरीघोषैः प्रघोषितम्
rāmeṇa hi yadā pūrvaṃ hato vai rāvaṇo'suraḥ tadā jāṃbavatā dikṣu bherīghoṣaiḥ praghoṣitam
जब पूर्वकाल में श्रीराम द्वारा असुर रावण मारा गया, तब जांबवान ने सभी दिशाओं में भेरी बजाकर उद्घोष किया —
श्लोक 4 (padma.6.150.4)
जितं वै रामचंद्रेण रावणो निहतो रणे । लब्ध्वा सीतेति संघुष्य स्नातं तीर्थवरे शुभे
jitaṃ vai rāmacaṃdreṇa rāvaṇo nihato raṇe labdhvā sīteti saṃghuṣya snātaṃ tīrthavare śubhe
"रामचंद्र ने विजय पाई! रावण युद्ध में मारा गया! सीता प्राप्त हुईं!" — ऐसी घोषणा करके उन्होंने उस श्रेष्ठ, शुभ तीर्थ में स्नान किया।
श्लोक 5 (padma.6.150.5)
स्थापितं तत्र लिंगं तु स्वनाम्ना तु सुरेश्वरि । तत्र स्नात्वा नरः सद्यः स्मृत्वा रामं सहानुजम्
sthāpitaṃ tatra liṃgaṃ tu svanāmnā tu sureśvari tatra snātvā naraḥ sadyaḥ smṛtvā rāmaṃ sahānujam
हे देवेश्वरी! वहाँ उन्होंने अपने ही नाम से लिंग की स्थापना की। वहाँ स्नान करके, अपने अनुज सहित श्रीराम का स्मरण करते हुए मनुष्य तत्काल,
श्लोक 6 (padma.6.150.6)
जाबवंतेश्वरं स्नात्वा रुद्रलोके महीयते । यत्रयत्र हि भो देवि श्रीरामस्मरणं कृतम् । भवबंधविमोक्षो हि दृश्यते स चराचरे
jābavaṃteśvaraṃ snātvā rudraloke mahīyate yatrayatra hi bho devi śrīrāmasmaraṇaṃ kṛtam bhavabaṃdhavimokṣo hi dṛśyate sa carācare
जांबवंतेश्वर में स्नान कर रुद्रलोक में सम्मानित होता है। हे देवी! जहाँ-जहाँ श्रीराम का स्मरण किया जाता है, वहाँ चराचर सृष्टि में संसार-बंधन से मुक्ति दिखाई देती है।
श्लोक 7 (padma.6.150.7)
अहं रामस्तु विज्ञेयो रामो वै रुद्र एव च । एवं ज्ञात्वा तु ते देवि न भेदो वर्तते क्वचित्
ahaṃ rāmastu vijñeyo rāmo vai rudra eva ca evaṃ jñātvā tu te devi na bhedo vartate kvacit
मैं ही राम हूँ, ऐसा जानो, और राम वास्तव में रुद्र ही हैं। हे देवी! यह जानकर हम दोनों में कहीं भी भेद नहीं है।
श्लोक 8 (padma.6.150.8)
रामरामेति रामेति मनसा ये जपंति च । तेषां सर्वार्थसिद्धिश्च भविष्यति युगेयुगे
rāmarāmeti rāmeti manasā ye japaṃti ca teṣāṃ sarvārthasiddhiśca bhaviṣyati yugeyuge
जो मन ही मन "राम राम राम" इस प्रकार जप करते हैं, उनके समस्त प्रयोजन युग-युग में सिद्ध होंगे।
श्लोक 9 (padma.6.150.9)
अहं हि सर्वदा देवि श्रीरामस्मरणं चरे । यं श्रुत्वा तु पुनर्देवि न भवो जायते क्वचित्
ahaṃ hi sarvadā devi śrīrāmasmaraṇaṃ care yaṃ śrutvā tu punardevi na bhavo jāyate kvacit
हे देवी! मैं सदा श्रीराम का स्मरण करता हूँ, जिसे सुनकर पुनः, हे देवी, संसार में कहीं भी जन्म नहीं होता।
श्लोक 10 (padma.6.150.10)
काश्यां हि निवसन्नित्यं श्रीरामं कमलेक्षणम् । स्मरामि सततं देवि भक्त्या च विधिपूर्वकम्
kāśyāṃ hi nivasannityaṃ śrīrāmaṃ kamalekṣaṇam smarāmi satataṃ devi bhaktyā ca vidhipūrvakam
काशी में सदा निवास करते हुए, हे देवी, मैं कमलनयन श्रीराम का निरंतर, भक्तिपूर्वक तथा विधिवत स्मरण करता हूँ।
श्लोक 11 (padma.6.150.11)
जांबवता तदा पूर्वं स्मृत्वा रामं सुशोभनम् । जांबवंतमिति ख्यातं प्रस्थाप्य जगतां गुरुम्
jāṃbavatā tadā pūrvaṃ smṛtvā rāmaṃ suśobhanam jāṃbavaṃtamiti khyātaṃ prasthāpya jagatāṃ gurum
तब पूर्वकाल में जांबवान ने सुंदर श्रीराम का स्मरण करते हुए जगत् के गुरु को वहाँ स्थापित कर "जांबवंत" नाम से प्रसिद्ध किया।
श्लोक 12 (padma.6.150.12)
तत्र स्नात्वा च भुक्त्वा च कृत्वा देवस्य पूजनम् । शिवलोकमवाप्नोति यावदिंद्राश्चतुर्दश
tatra snātvā ca bhuktvā ca kṛtvā devasya pūjanam śivalokamavāpnoti yāvadiṃdrāścaturdaśa
वहाँ स्नान करके, भोजन करके तथा देव की पूजा करके मनुष्य चौदह इंद्रों के काल तक शिवलोक को प्राप्त करता है।
श्लोक 13 (padma.6.150.13)
अत्र हि स्नानमात्रेण यथा जांबवतो बलम् । तथा वै बलमाप्नोति श्रीविश्वेशप्रसादतः
atra hi snānamātreṇa yathā jāṃbavato balam tathā vai balamāpnoti śrīviśveśaprasādataḥ
यहाँ केवल स्नान मात्र से मनुष्य जांबवान के समान बल को श्रीविश्वेश की कृपा से प्राप्त करता है।
श्लोक 14 (padma.6.150.14)
अत्र गत्वा तु भूदानं पुमान्यश्च करोति वै । फलं सहस्रगुणितं जांबवंतेश दर्शनात्
atra gatvā tu bhūdānaṃ pumānyaśca karoti vai phalaṃ sahasraguṇitaṃ jāṃbavaṃteśa darśanāt
यहाँ आकर जो पुरुष भूमिदान करता है, वह जांबवंतेश के दर्शन से सहस्रगुणित फल प्राप्त करता है।