उत्तर खण्ड · अध्याय 151
धवलेश्वर महात्म्य (इंद्र तीर्थ)
श्लोक 1 (padma.6.151.1)
महादेव उवाच । अस्मात्तीर्थात्परं तीर्थं इंद्रग्राममिति स्मृतम् । यत्र स्नात्वा पुरा शक्रो विमुक्तो घोरकिल्बिषात्
mahādeva uvāca asmāttīrthātparaṃ tīrthaṃ iṃdragrāmamiti smṛtam yatra snātvā purā śakro vimukto ghorakilbiṣāt
महादेव ने कहा — इस तीर्थ से आगे इंद्रग्राम नामक तीर्थ है, जहाँ स्नान करके पूर्वकाल में इंद्र घोर पाप से मुक्त हुए थे।
श्लोक 2 (padma.6.151.2)
पार्वत्युवाच। केनेह कर्मणा शक्रः प्राप्तवान्घोरकिल्बिषम् । विपाप्मा च कथं सोऽभूदिति विस्तरतो वद
pārvatyuvāca keneha karmaṇā śakraḥ prāptavānghorakilbiṣam vipāpmā ca kathaṃ so'bhūditi vistarato vada
पार्वती ने कहा — इंद्र को किस कर्म से यह घोर पाप प्राप्त हुआ, और वे पापरहित कैसे हुए, यह विस्तार से कहिए।
श्लोक 3 (padma.6.151.3)
महादेव उवाच। इंद्रः सुरेश्वरः पूर्वं नमुचिश्चासुरेश्वरः । अशस्त्रवधमन्योऽन्य समयं तौ प्रचक्रतुः
mahādeva uvāca iṃdraḥ sureśvaraḥ pūrvaṃ namuciścāsureśvaraḥ aśastravadhamanyo'nya samayaṃ tau pracakratuḥ
महादेव ने कहा — पूर्वकाल में देवेश्वर इंद्र और असुरेश्वर नमुचि ने परस्पर यह प्रतिज्ञा की थी कि कोई भी शस्त्र से एक-दूसरे का वध नहीं करेगा।
श्लोक 4 (padma.6.151.4)
अथेंद्रस्तु नभोवाणीनिर्देशान्नमुचिं तदा । जघान फेनमादाय ब्रह्महत्या तदाऽभवत्
atheṃdrastu nabhovāṇīnirdeśānnamuciṃ tadā jaghāna phenamādāya brahmahatyā tadā'bhavat
तब आकाशवाणी के निर्देश से इंद्र ने फेन (झाग) लेकर नमुचि का वध कर दिया, जिससे उन्हें ब्रह्महत्या का पाप लगा।
श्लोक 5 (padma.6.151.5)
पप्रच्छ च गुरुं शक्रः पापनिर्नाशकारणम् । बृहस्पतेरथादेशात्साभ्रामत्युत्तरे तटे
papraccha ca guruṃ śakraḥ pāpanirnāśakāraṇam bṛhaspaterathādeśātsābhrāmatyuttare taṭe
तब इंद्र ने अपने गुरु से उस पाप के नाश का उपाय पूछा, और बृहस्पति के आदेश से साभ्रमती के उत्तर तट पर,
श्लोक 6 (padma.6.151.6)
अस्मिन्स्थाने समागत्य स्थानं चक्रे सुरेश्वरः । तस्येह स्नानमात्रेण गतपापस्य तत्क्षणात्
asminsthāne samāgatya sthānaṃ cakre sureśvaraḥ tasyeha snānamātreṇa gatapāpasya tatkṣaṇāt
इस स्थान पर आकर देवेश्वर इंद्र ने निवास किया। यहाँ केवल स्नानमात्र से उनका पाप उसी क्षण नष्ट हो गया,
श्लोक 7 (padma.6.151.7)
पूर्णेंदुधवलाकांतिः शरीरे समजायत । धवलेश्वरमीशानं स्थापयामास वृत्रहा
pūrṇeṃdudhavalākāṃtiḥ śarīre samajāyata dhavaleśvaramīśānaṃ sthāpayāmāsa vṛtrahā
और उनके शरीर में पूर्ण चंद्रमा के समान धवल कांति उत्पन्न हो गई। वृत्रहा (इंद्र) ने ईशान को धवलेश्वर नाम से स्थापित किया।
श्लोक 8 (padma.6.151.8)
इंद्र नाम्ना च तल्लिंगं विश्रुतं पृथिवीतले । पूर्णिमास्यां तथा दर्शे संक्रांतौ ग्रहणे तथा
iṃdra nāmnā ca talliṃgaṃ viśrutaṃ pṛthivītale pūrṇimāsyāṃ tathā darśe saṃkrāṃtau grahaṇe tathā
उस लिंग को इंद्र नाम से पृथ्वी पर विख्यात किया गया। पूर्णिमा, अमावस्या, संक्रांति तथा ग्रहण के समय,
श्लोक 9 (padma.6.151.9)
श्राद्धे कृते पितॄणां तु तृप्तिर्द्वादशवार्षिकी । धवलेश्वरमासाद्य यः कुर्याद्विप्रभोजनम्
śrāddhe kṛte pitṝṇāṃ tu tṛptirdvādaśavārṣikī dhavaleśvaramāsādya yaḥ kuryādviprabhojanam
पितरों का श्राद्ध करने पर उनकी तृप्ति बारह वर्ष तक रहती है। जो धवलेश्वर में आकर विप्र-भोजन कराता है,
श्लोक 10 (padma.6.151.10)
एकस्मिन्भोजिते विप्रे सहस्रं भोजितं भवेत् । हिरण्यभूमिवासांसि दातव्यानि स्वशक्तितः
ekasminbhojite vipre sahasraṃ bhojitaṃ bhavet hiraṇyabhūmivāsāṃsi dātavyāni svaśaktitaḥ
एक विप्र को भोजन कराने से सहस्र विप्रों को भोजन कराने का फल मिलता है। स्वशक्ति के अनुसार स्वर्ण, भूमि तथा वस्त्र दान करने चाहिए।
श्लोक 11 (padma.6.151.11)
शुक्ला गौ ब्राह्मणे देया सवत्सा च पयस्विनी । अत्रागत्य तु यो विप्रो रुद्रजाप्यादिकं चरेत्
śuklā gau brāhmaṇe deyā savatsā ca payasvinī atrāgatya tu yo vipro rudrajāpyādikaṃ caret
ब्राह्मण को श्वेत, दुधारू, बछड़े सहित गौ देनी चाहिए। यहाँ आकर जो विप्र रुद्र-जप आदि करता है,
श्लोक 12 (padma.6.151.12)
तत्कृतं कोटिगुणितं श्रीमहेशप्रसादतः । अत्र तीर्थे नरो यस्तु उपवासादिकं चरेत्
tatkṛtaṃ koṭiguṇitaṃ śrīmaheśaprasādataḥ atra tīrthe naro yastu upavāsādikaṃ caret
श्रीमहेश की कृपा से उसका फल करोड़ गुना हो जाता है। इस तीर्थ में जो मनुष्य उपवास आदि करता है,
श्लोक 13 (padma.6.151.13)
स एव सर्वकामाढ्यो भवत्येव न संशयः । बिल्वपत्रं समानीय यः पूजयति तं प्रभुम्
sa eva sarvakāmāḍhyo bhavatyeva na saṃśayaḥ bilvapatraṃ samānīya yaḥ pūjayati taṃ prabhum
वह निश्चय ही सर्वकामनाओं से संपन्न हो जाता है। जो बिल्वपत्र लाकर उस प्रभु की पूजा करता है,
श्लोक 14 (padma.6.151.14)
धर्ममर्थं च कामं च लभते मानवो भुवि । सोमवारे विशेषेण ये गच्छंति नरोत्तमाः
dharmamarthaṃ ca kāmaṃ ca labhate mānavo bhuvi somavāre viśeṣeṇa ye gacchaṃti narottamāḥ
वह मनुष्य पृथ्वी पर धर्म, अर्थ और काम प्राप्त करता है। जो श्रेष्ठ पुरुष विशेषतः सोमवार को वहाँ जाते हैं,
श्लोक 15 (padma.6.151.15)
तेषां रोगं तथा दोषं शमयेद्धवलेश्वरः । रवौ वाऽथ विशेषेण अर्चनं कुरुते यदा
teṣāṃ rogaṃ tathā doṣaṃ śamayeddhavaleśvaraḥ ravau vā'tha viśeṣeṇa arcanaṃ kurute yadā
उनके रोग और दोष को धवलेश्वर शांत कर देते हैं। और जब कोई विशेषतः रविवार को अर्चना करता है,
श्लोक 16 (padma.6.151.16)
तेषां महिमा तु भो देवि न ज्ञातः कर्हिचिन्मया । दूर्वया चार्कपुष्पैर्वा कल्हारैः कमलैर्दलैः
teṣāṃ mahimā tu bho devi na jñātaḥ karhicinmayā dūrvayā cārkapuṣpairvā kalhāraiḥ kamalairdalaiḥ
हे देवी! उसकी महिमा मुझसे भी कभी पूर्णतः ज्ञात नहीं हुई। दूर्वा से, अर्क-पुष्पों से, कल्हार तथा कमल-दलों से,
श्लोक 17 (padma.6.151.17)
पूजनं कुर्वते येऽत्र ते नराः पुण्यभागिनः । श्वेतार्कपुष्पमानीय धवलेशं प्रपूज्य तु
pūjanaṃ kurvate ye'tra te narāḥ puṇyabhāginaḥ śvetārkapuṣpamānīya dhavaleśaṃ prapūjya tu
यहाँ जो पूजा करते हैं, वे मनुष्य पुण्यभागी होते हैं। श्वेत अर्क-पुष्प लाकर धवलेश की भलीभाँति पूजा करके,
श्लोक 18 (padma.6.151.18)
वांच्छितं लभते नित्यं धवलेशप्रसादतः । कृते वै नीलकंठस्तु सर्वेषां शंकरः सदा
vāṃcchitaṃ labhate nityaṃ dhavaleśaprasādataḥ kṛte vai nīlakaṃṭhastu sarveṣāṃ śaṃkaraḥ sadā
मनुष्य सदा धवलेश की कृपा से इच्छित वस्तु प्राप्त करता है। सतयुग में वे सबके लिए सदा नीलकंठ शंकर थे;
श्लोक 19 (padma.6.151.19)
त्रेतायुगे स विख्यातो हरो वै भगवान्प्रभुः । द्वापरे शर्वसंज्ञस्तु कलौ वै धवलेश्वरः
tretāyuge sa vikhyāto haro vai bhagavānprabhuḥ dvāpare śarvasaṃjñastu kalau vai dhavaleśvaraḥ
त्रेतायुग में वे भगवान् हर के नाम से विख्यात हुए; द्वापर में शर्व नाम से; और कलियुग में वे धवलेश्वर हैं।
श्लोक 20 (padma.6.151.20)
अत्रार्थे यत्पुरावृत्तं तच्छृणुष्व सुरेश्वरि । नंदिर्नाम पुरा वैश्य इंद्रग्रामे समावसत्
atrārthe yatpurāvṛttaṃ tacchṛṇuṣva sureśvari naṃdirnāma purā vaiśya iṃdragrāme samāvasat
हे देवेश्वरी! इस विषय में जो पुरातन कथा है, उसे सुनिए। पूर्वकाल में इंद्रग्राम में नंदी नामक एक वैश्य निवास करता था।
श्लोक 21 (padma.6.151.21)
शिवध्यानपरो भूत्वा शिवपूजां चकार सः । नित्यं तपोवनस्थं हि लिंगं धवलसंज्ञकम्
śivadhyānaparo bhūtvā śivapūjāṃ cakāra saḥ nityaṃ tapovanasthaṃ hi liṃgaṃ dhavalasaṃjñakam
शिव-ध्यान में तत्पर होकर वह शिव-पूजा करता था — नित्य तपोवन में स्थित धवल नामक लिंग की,
श्लोक 22 (padma.6.151.22)
उषस्युषसि चोत्थाय प्रत्यहं शिववल्लभः । नंदी लिंगार्चनरतो बभूवातिशयेन हि
uṣasyuṣasi cotthāya pratyahaṃ śivavallabhaḥ naṃdī liṃgārcanarato babhūvātiśayena hi
प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर, वह शिव का प्रिय भक्त नंदी अत्यधिक लिंग-अर्चन में रत रहता था।
श्लोक 23 (padma.6.151.23)
यथाशास्त्रेण विधिना पुष्पार्चनपरोऽभवत् । एकदा मृगयालुब्धः किरातो भूतहिंसकः
yathāśāstreṇa vidhinā puṣpārcanaparo'bhavat ekadā mṛgayālubdhaḥ kirāto bhūtahiṃsakaḥ
शास्त्रोक्त विधि के अनुसार वह पुष्प-अर्चन में तत्पर रहता था। एक दिन मृगया के लोभी, प्राणियों की हिंसा करने वाला एक किरात,
श्लोक 24 (padma.6.151.24)
पापी पापसमाचारश्चरन्साभ्रमती तटे । अनेक श्वापदाकीर्णे हन्यमानो मृगान्शरैः
pāpī pāpasamācāraścaransābhramatī taṭe aneka śvāpadākīrṇe hanyamāno mṛgānśaraiḥ
पापी तथा पाप-आचरण वाला, साभ्रमती के तट पर विचरण करता हुआ, अनेक वन्य पशुओं से भरे वन में बाणों से मृगों का वध कर रहा था।
श्लोक 25 (padma.6.151.25)
एवं विचरमाणोऽसौ किरातो भूतहिंसकः । यदृच्छयागतस्तत्र यत्र लिंगं सुपूजितम्
evaṃ vicaramāṇo'sau kirāto bhūtahiṃsakaḥ yadṛcchayāgatastatra yatra liṃgaṃ supūjitam
इस प्रकार विचरण करते हुए उस हिंसक किरात को संयोगवश वहाँ आना पड़ा, जहाँ भलीभाँति पूजित लिंग था —
श्लोक 26 (padma.6.151.26)
धवलेश्वरविख्यातं अनेकाश्चर्यमंडितम् । दृष्टं सुपूजितं लिंगं नानापुष्पैः फलैस्तथा
dhavaleśvaravikhyātaṃ anekāścaryamaṃḍitam dṛṣṭaṃ supūjitaṃ liṃgaṃ nānāpuṣpaiḥ phalaistathā
धवलेश्वर नाम से विख्यात, अनेक आश्चर्यों से मंडित। उसने नाना पुष्पों और फलों से सुपूजित उस लिंग को देखा।
श्लोक 27 (padma.6.151.27)
एवं लिंगं समालिंग्य गतः साभ्रमतीतटे । तत्र पीत्वा पयः सोऽथ मुखं गंडूषपूरितम्
evaṃ liṃgaṃ samāliṃgya gataḥ sābhramatītaṭe tatra pītvā payaḥ so'tha mukhaṃ gaṃḍūṣapūritam
लिंग का इस प्रकार आलिंगन करके वह साभ्रमती के तट पर गया। वहाँ जल पीकर, मुख में जल भरकर,
श्लोक 28 (padma.6.151.28)
कृत्वा चैकेनहस्तेन मृगमांसं समुद्वहन् । करेणैकेन पूजार्थं बिल्वपत्राणि वै दधत्
kṛtvā caikenahastena mṛgamāṃsaṃ samudvahan kareṇaikena pūjārthaṃ bilvapatrāṇi vai dadhat
एक हाथ से मृगमांस उठाए, और दूसरे हाथ में पूजा के लिए बिल्वपत्र लिए हुए,
श्लोक 29 (padma.6.151.29)
शीघ्रमागत्य लिंगांते पदा पूजां समाहनत् । पुष्पाणि तानि सर्वाणि विधूतानि इतस्ततः
śīghramāgatya liṃgāṃte padā pūjāṃ samāhanat puṣpāṇi tāni sarvāṇi vidhūtāni itastataḥ
वह शीघ्र लिंग के पास आया और पैर से पूर्व की पूजा को छिन्न-भिन्न कर दिया — वे सारे पुष्प इधर-उधर बिखर गए।
श्लोक 30 (padma.6.151.30)
स्नापनं तस्य लिंगस्य कृतं गंडूषवारिणा । करेणैकेन पूजार्थं बिल्वपत्राणि सोऽर्पयत्
snāpanaṃ tasya liṃgasya kṛtaṃ gaṃḍūṣavāriṇā kareṇaikena pūjārthaṃ bilvapatrāṇi so'rpayat
उसने मुखगत जल से उस लिंग को स्नान कराया, तथा एक हाथ से पूजा हेतु बिल्वपत्र अर्पित किए;
श्लोक 31 (padma.6.151.31)
द्वितीयेन करेणैव मृगमांसं समर्पयत् । दंडप्रणामसंयुक्तः संकल्पं मनसाऽकरोत्
dvitīyena kareṇaiva mṛgamāṃsaṃ samarpayat daṃḍapraṇāmasaṃyuktaḥ saṃkalpaṃ manasā'karot
दूसरे हाथ से मृगमांस अर्पित किया। दंडवत् प्रणाम करके उसने मन में यह संकल्प किया —
श्लोक 32 (padma.6.151.32)
अद्यप्रभृति पूजां वै करिष्यामि प्रयत्नतः । त्वं मे स्वामी च भक्तोऽहं अद्यप्रभृति शंकर
adyaprabhṛti pūjāṃ vai kariṣyāmi prayatnataḥ tvaṃ me svāmī ca bhakto'haṃ adyaprabhṛti śaṃkara
"आज से मैं प्रयत्नपूर्वक पूजा करूँगा। हे शंकर! तुम मेरे स्वामी हो और आज से मैं तुम्हारा भक्त हूँ।"
श्लोक 33 (padma.6.151.33)
एवं नियमवान्भूत्वा किरातो गृहमागमत् । तथा प्रभातसमये देवायतनमागतः
evaṃ niyamavānbhūtvā kirāto gṛhamāgamat tathā prabhātasamaye devāyatanamāgataḥ
इस प्रकार नियमवान् होकर किरात अपने घर लौट गया। इधर प्रातःकाल के समय नंदी देवालय में आया।
श्लोक 34 (padma.6.151.34)
नंदी ददर्श तं सर्वं किरातेन च यत्कृतम् । अव्यवस्थं च तं दृंष्ट्वा अमेध्यं शिवसन्निधौ
naṃdī dadarśa taṃ sarvaṃ kirātena ca yatkṛtam avyavasthaṃ ca taṃ dṛṃṣṭvā amedhyaṃ śivasannidhau
नंदी ने किरात द्वारा किया गया वह सब कुछ देखा, और शिव के समीप उस अव्यवस्था तथा अपवित्रता को देखकर,
श्लोक 35 (padma.6.151.35)
विधूतानि च सर्वाणि हिंसकेन दुरात्मना । चिंतायुक्तोभवन्नंदी जातं किं चित्रमद्य मे
vidhūtāni ca sarvāṇi hiṃsakena durātmanā ciṃtāyuktobhavannaṃdī jātaṃ kiṃ citramadya me
दुरात्मा हिंसक द्वारा बिखेरे गए उन सब पुष्पों को देख नंदी चिंतित हो गया — "आज मेरे साथ यह कैसा विचित्र घटित हुआ?"
श्लोक 36 (padma.6.151.36)
कथितानि च विघ्नानि शिवपूजारतस्य हि । उपस्थितानि तान्येव मम भाग्यविपर्ययात्
kathitāni ca vighnāni śivapūjāratasya hi upasthitāni tānyeva mama bhāgyaviparyayāt
"शिव-पूजा में रत व्यक्ति के लिए जिन विघ्नों की बात कही जाती है, वे ही विघ्न मेरे दुर्भाग्य से मुझ पर आ पड़े हैं।"
श्लोक 37 (padma.6.151.37)
एवं विमृश्य सुचिरं प्रक्षाल्य शिवमंदिरम् । यथागतेन मार्गेण नंदी स्वगृहमागमत्
evaṃ vimṛśya suciraṃ prakṣālya śivamaṃdiram yathāgatena mārgeṇa naṃdī svagṛhamāgamat
इस प्रकार बहुत देर तक विचार करके, शिव-मंदिर को धोकर, नंदी जिस मार्ग से आया था उसी मार्ग से अपने घर लौट गया।
श्लोक 38 (padma.6.151.38)
ततो नंदिनमालक्ष्य पुरोधा गतमानसम् । अब्रवीद्वचनं तं तु कस्मात्त्वं गतमानसः
tato naṃdinamālakṣya purodhā gatamānasam abravīdvacanaṃ taṃ tu kasmāttvaṃ gatamānasaḥ
तब पुरोहित ने नंदी को उदास मन देखकर उससे कहा — "तुम किस कारण उदास हो?"
श्लोक 39 (padma.6.151.39)
पुरोहितं प्रति तदा नंदी वचनमब्रवीत् । अद्य दृष्टं मया विप्र अमेध्यं शिवसन्निधौ
purohitaṃ prati tadā naṃdī vacanamabravīt adya dṛṣṭaṃ mayā vipra amedhyaṃ śivasannidhau
तब नंदी ने पुरोहित से कहा — "हे विप्र! आज मैंने शिव के समीप अपवित्रता देखी है।
श्लोक 40 (padma.6.151.40)
केनेदं कारितं तत्र न जानामीह किंचन । ततः पुरोधा वचनं नंदिनं चाब्रवीत्तथा
kenedaṃ kāritaṃ tatra na jānāmīha kiṃcana tataḥ purodhā vacanaṃ naṃdinaṃ cābravīttathā
यह किसने किया, मुझे यहाँ कुछ भी ज्ञात नहीं।" तब पुरोहित ने नंदी से यह कहा —
श्लोक 41 (padma.6.151.41)
येन विस्खलितं तत्र पुष्पादीनां प्रपूजनम् । सोऽपि मूढो न संदेहः कार्याकार्येषु मंदधीः
yena viskhalitaṃ tatra puṣpādīnāṃ prapūjanam so'pi mūḍho na saṃdehaḥ kāryākāryeṣu maṃdadhīḥ
"जिसने वहाँ पुष्पादि की पूजा को छिन्न-भिन्न किया, वह भी कार्य-अकार्य में मंदबुद्धि, मूर्ख ही होगा, इसमें संदेह नहीं।
श्लोक 42 (padma.6.151.42)
तस्माच्चिंता न कर्तव्या त्वया पुनरपि प्रभो । प्रभाते च मया सार्द्धं गम्यतां तच्छिवालयम्
tasmācciṃtā na kartavyā tvayā punarapi prabho prabhāte ca mayā sārddhaṃ gamyatāṃ tacchivālayam
इसलिए हे प्रभु! तुम्हें पुनः चिंता नहीं करनी चाहिए। प्रातःकाल मेरे साथ उस शिवालय में चलो,
श्लोक 43 (padma.6.151.43)
निरीक्षणार्थं दुष्टस्य तस्य दंडंकरोम्यहम् । एतच्छ्रुत्वा तु वचनं नंदी तस्य पुरोधसः
nirīkṣaṇārthaṃ duṣṭasya tasya daṃḍaṃkaromyaham etacchrutvā tu vacanaṃ naṃdī tasya purodhasaḥ
निरीक्षण के लिए, और मैं उस दुष्ट को दंड दूँगा।" पुरोहित के इन वचनों को सुनकर नंदी,
श्लोक 44 (padma.6.151.44)
आस्थितः स्वगृहे नक्तं दूयमानेन चेतसा । तस्यां रात्र्यां व्यतीतायां आहूय च पुरोधसम्
āsthitaḥ svagṛhe naktaṃ dūyamānena cetasā tasyāṃ rātryāṃ vyatītāyāṃ āhūya ca purodhasam
व्याकुल हृदय से रात्रि में अपने घर में रहा। वह रात्रि बीत जाने पर पुरोहित को बुलाकर,
श्लोक 45 (padma.6.151.45)
गतः शिवालयं नंदी समंतेन महात्मना । प्रक्षाल्य पूजनं कृत्वा नानारत्नपरिच्छदम्
gataḥ śivālayaṃ naṃdī samaṃtena mahātmanā prakṣālya pūjanaṃ kṛtvā nānāratnaparicchadam
नंदी उस महात्मा के साथ शिवालय गया। वहाँ धोकर, नाना रत्नों के आभूषणों सहित पूजा करके,
श्लोक 46 (padma.6.151.46)
पंचोपचारसंयुक्तं कृत्वा वै ब्राह्मणैः सह । एवं यामद्वयं जातं स्तूयमानस्य नंदिनः
paṃcopacārasaṃyuktaṃ kṛtvā vai brāhmaṇaiḥ saha evaṃ yāmadvayaṃ jātaṃ stūyamānasya naṃdinaḥ
पंचोपचार-सहित तथा ब्राह्मणों के साथ पूजा करके — इस प्रकार स्तुति करते हुए नंदी की दो प्रहर बीत गए,
श्लोक 47 (padma.6.151.47)
आयातोऽसौ महाकालस्तथारूपो महाबलः । कालरूपो महारौद्रो धनुष्पाणिः प्रतापवान्
āyāto'sau mahākālastathārūpo mahābalaḥ kālarūpo mahāraudro dhanuṣpāṇiḥ pratāpavān
तब वह महाकाल आया, वैसे ही रूप वाला, महाबली, काल के समान रूप वाला, अत्यंत भयंकर, धनुष हाथ में लिए, प्रतापी।
श्लोक 48 (padma.6.151.48)
तं दृष्ट्वा भयसंत्रस्तो नंदी तत्र न्यलीयत । पुरोधाश्चैव सहसा भयभीतस्तदाभवत्
taṃ dṛṣṭvā bhayasaṃtrasto naṃdī tatra nyalīyata purodhāścaiva sahasā bhayabhītastadābhavat
उसे देखकर भयभीत नंदी वहाँ छिप गया, और पुरोहित भी सहसा भय से युक्त हो गया।
श्लोक 49 (padma.6.151.49)
किरातेन कृतं तत्र यथापूर्वमविस्खलन् । तां पूजां स पदाहृत्य बिल्वपत्रं समर्पयत्
kirātena kṛtaṃ tatra yathāpūrvamaviskhalan tāṃ pūjāṃ sa padāhṛtya bilvapatraṃ samarpayat
वहाँ पूर्ववत् बिना किसी भेद के किरात ने वही किया — उसने पैर से उस पूजा को हटाकर बिल्वपत्र अर्पित किया,
श्लोक 50 (padma.6.151.50)
नैवेद्येन पलेनैव किरातः शिवमार्चयत् । दंडवत्पतितो भूमौ उत्थाय स्वगृहं गतः
naivedyena palenaiva kirātaḥ śivamārcayat daṃḍavatpatito bhūmau utthāya svagṛhaṃ gataḥ
और केवल मांस के नैवेद्य से किरात ने शिव की पूजा की। दंडवत् भूमि पर गिरकर वह उठा और अपने घर चला गया।
श्लोक 51 (padma.6.151.51)
तं दृष्ट्वा महदाश्चर्यं चिंतयामास वै चिरम् । पुरोधसा तदा नंदी सह व्याकुलचेतसा
taṃ dṛṣṭvā mahadāścaryaṃ ciṃtayāmāsa vai ciram purodhasā tadā naṃdī saha vyākulacetasā
यह महान आश्चर्य देखकर नंदी व्याकुल चित्त से पुरोहित सहित बहुत देर तक विचार करता रहा।
श्लोक 52 (padma.6.151.52)
तेन पृष्टास्तदा विप्राः कथ्यतां च यथातथम् । संप्रधार्य ततः सर्वे मिलित्वा धर्मशास्त्रतः
tena pṛṣṭāstadā viprāḥ kathyatāṃ ca yathātatham saṃpradhārya tataḥ sarve militvā dharmaśāstrataḥ
उसने ब्राह्मणों से पूछा कि यथार्थ बात बताएँ। तब सभी ने मिलकर धर्मशास्त्र के अनुसार विचार करके,
श्लोक 53 (padma.6.151.53)
ऊचुः सर्वे तदा विप्रा नंदिनं जातशंकितम् । ईशविघ्नं समुत्पन्नं दुर्निवार्यं सुरैरपि
ūcuḥ sarve tadā viprā naṃdinaṃ jātaśaṃkitam īśavighnaṃ samutpannaṃ durnivāryaṃ surairapi
शंकाग्रस्त हुए नंदी से सभी ब्राह्मणों ने कहा — "यह ईश्वर-पूजा में विघ्न उत्पन्न हुआ है, जो देवताओं द्वारा भी दुर्निवार्य है।
श्लोक 54 (padma.6.151.54)
तस्मादानय लिंगं त्वं स्वगृहे वैश्यसत्तम । तथेति मत्वाऽसौ नंदी शिवस्योत्पाटनं महत्
tasmādānaya liṃgaṃ tvaṃ svagṛhe vaiśyasattama tatheti matvā'sau naṃdī śivasyotpāṭanaṃ mahat
इसलिए हे वैश्यश्रेष्ठ! तुम लिंग को अपने घर ले आओ।" "ऐसा ही होगा" — यह मानकर नंदी ने शिव के उस महान उत्पाटन को,
श्लोक 55 (padma.6.151.55)
कृत्वा स्वगृहमानीय प्रतिष्ठाप्य यथाविधि । सुवर्णपीठिकां कृत्वा नवरंभासुशोभिताम्
kṛtvā svagṛhamānīya pratiṣṭhāpya yathāvidhi suvarṇapīṭhikāṃ kṛtvā navaraṃbhāsuśobhitām
कर के अपने घर लाकर, विधिपूर्वक प्रतिष्ठित किया — नए केले के वृक्षों से सुशोभित स्वर्ण-पीठिका बनाकर,
श्लोक 56 (padma.6.151.56)
उपाहारैरनेकैश्च पूजयामास वै तदा । अथापरेद्युरायातः किरातः शिवमंदिरम्
upāhārairanekaiśca pūjayāmāsa vai tadā athāparedyurāyātaḥ kirātaḥ śivamaṃdiram
अनेक उपहारों से उसकी पूजा की। इसके अगले दिन किरात पुनः शिव-मंदिर आया।
श्लोक 57 (padma.6.151.57)
यावद्विलोकयामास लिंगमैशं न दृष्टवान् । मौनं विहाय सहसा साक्रोशमिदमब्रवीत्
yāvadvilokayāmāsa liṃgamaiśaṃ na dṛṣṭavān maunaṃ vihāya sahasā sākrośamidamabravīt
जब उसने देखा तो ईश का लिंग नहीं पाया। मौन त्यागकर वह सहसा आक्रोश में यह बोला —
श्लोक 58 (padma.6.151.58)
हे शंभो क्व गतोऽसि त्वं दर्शयात्मानमद्य वै । यदि नो दर्शनं हेयं त्यक्ष्याम्यद्य कलेवरम्
he śaṃbho kva gato'si tvaṃ darśayātmānamadya vai yadi no darśanaṃ heyaṃ tyakṣyāmyadya kalevaram
"हे शंभो! तुम कहाँ चले गए? आज अपने-आपको दिखाओ। यदि तुम्हारा दर्शन नहीं होगा, तो मैं आज अपना शरीर त्याग दूँगा।
श्लोक 59 (padma.6.151.59)
हे शंभो हे जगन्नाथ त्रिपुरांतक शंकर । हेरुद्र हे महादेव दर्शयात्मानमात्मना
he śaṃbho he jagannātha tripurāṃtaka śaṃkara herudra he mahādeva darśayātmānamātmanā
हे शंभो! हे जगन्नाथ! त्रिपुरांतक शंकर! हे रुद्र! हे महादेव! अपने-आपको स्वयं दिखाओ।"
श्लोक 60 (padma.6.151.60)
एवं साक्षेपमधुरैर्वाक्यैः क्षिप्त्वा सदाशिवम् । किरातोऽसौ क्षुरिकया धीरो वै जठरं स्वकम्
evaṃ sākṣepamadhurairvākyaiḥ kṣiptvā sadāśivam kirāto'sau kṣurikayā dhīro vai jaṭharaṃ svakam
इस प्रकार तीखे किंतु मधुर वचनों से सदाशिव को उलाहना देकर, वह धीर किरात अपनी छुरी से अपना पेट,
श्लोक 61 (padma.6.151.61)
बिभेद्याशु ततो बाहुमासाद्योच्चै रुषाब्रवीत् । हे शंभो दर्शयात्मानं कुतो मां त्यज्य यास्यसि
bibhedyāśu tato bāhumāsādyoccai ruṣābravīt he śaṃbho darśayātmānaṃ kuto māṃ tyajya yāsyasi
शीघ्र चीरकर, फिर अपनी भुजा पकड़कर ऊँचे स्वर में क्रोधपूर्वक बोला — "हे शंभो! अपने-आपको दिखाओ, मुझे छोड़कर कहाँ जाओगे?"
श्लोक 62 (padma.6.151.62)
इति क्षिप्त्वा ततोंत्राणि मांसमुद्धृत्य सर्वतः । तस्मिन्गर्ते करेणैव किरातः सहसाक्षिपत्
iti kṣiptvā tatoṃtrāṇi māṃsamuddhṛtya sarvataḥ tasmingarte kareṇaiva kirātaḥ sahasākṣipat
यह कहकर उसने अपनी आँतें और मांस सब ओर से निकालकर, अपने ही हाथ से उस गड्ढे में सहसा डाल दिया,
श्लोक 63 (padma.6.151.63)
स्वच्छं च हृदयं कृत्वा साभ्रमत्यां निमज्जतु । तथैव जलमानीय बिल्वपत्रं त्वरान्वितः
svacchaṃ ca hṛdayaṃ kṛtvā sābhramatyāṃ nimajjatu tathaiva jalamānīya bilvapatraṃ tvarānvitaḥ
और अपना हृदय खोलकर साभ्रमती में डूब जाने का संकल्प किया — किंतु उसी क्षण शीघ्रता से जल और बिल्वपत्र लाकर,
श्लोक 64 (padma.6.151.64)
पूजयित्वा यथान्यायं दंडवत्पतितो भुवि । यदा ध्यानस्थितस्तत्र किरातः शिवसन्निधौ
pūjayitvā yathānyāyaṃ daṃḍavatpatito bhuvi yadā dhyānasthitastatra kirātaḥ śivasannidhau
विधिपूर्वक पूजा करके वह दंडवत् भूमि पर गिर पड़ा। जब घायल किरात वहाँ शिव के समीप ध्यानमग्न बैठा था,
श्लोक 65 (padma.6.151.65)
प्रादुर्भूतस्तदा रुद्रः प्रमथैः परिवारितः । कर्पूरगौरो द्युतिमान्कपर्दी चंद्रशेखरः
prādurbhūtastadā rudraḥ pramathaiḥ parivāritaḥ karpūragauro dyutimānkapardī caṃdraśekharaḥ
तब प्रमथों से घिरे हुए रुद्र प्रकट हुए — कर्पूर के समान गौर वर्ण, तेजस्वी, जटाधारी, चंद्रशेखर।
श्लोक 66 (padma.6.151.66)
तं गृहीत्वा करे रुद्रः उवाच परिसांत्वयन् । भो भो वीर महाप्राज्ञ मद्भक्तोऽसि महामते
taṃ gṛhītvā kare rudraḥ uvāca parisāṃtvayan bho bho vīra mahāprājña madbhakto'si mahāmate
रुद्र ने उसे हाथ से पकड़कर सांत्वना देते हुए कहा — "हे वीर! हे महाप्राज्ञ! तुम मेरे भक्त हो, हे महामते!
श्लोक 67 (padma.6.151.67)
वरं वृणीष्व भो भक्त यत्ते मनसि वर्त्तते । एवमुक्तः स रुद्रेण महाकालो मुदान्वितः
varaṃ vṛṇīṣva bho bhakta yatte manasi varttate evamuktaḥ sa rudreṇa mahākālo mudānvitaḥ
भक्त! अपने मन में जो हो, वह वर माँगो।" रुद्र द्वारा ऐसा कहे जाने पर वह हर्ष से युक्त महाकाल,
श्लोक 68 (padma.6.151.68)
पपात दंडवद्भूमौ भक्त्या परमया युतः । ततो रुद्रं बभाषेदं न वरं प्रार्थयाम्यहम्
papāta daṃḍavadbhūmau bhaktyā paramayā yutaḥ tato rudraṃ babhāṣedaṃ na varaṃ prārthayāmyaham
परम भक्ति से युक्त होकर भूमि पर दंडवत् गिर पड़ा। फिर उसने रुद्र से कहा — "मैं कोई वर नहीं माँगता।
श्लोक 69 (padma.6.151.69)
अहं दासोऽस्मि ते रुद्र त्वं मे स्वामी न संशयः । एतत्श्लाघ्यतमं लोके देहि जन्मनि जन्मनि
ahaṃ dāso'smi te rudra tvaṃ me svāmī na saṃśayaḥ etatślāghyatamaṃ loke dehi janmani janmani
हे रुद्र! मैं तुम्हारा दास हूँ, तुम निश्चय ही मेरे स्वामी हो। संसार में सबसे प्रशंसनीय यही है — मुझे जन्म-जन्म में यही दो।
श्लोक 70 (padma.6.151.70)
त्वं माता च पिता त्वं च त्वं बंधुश्च सखा च मे । त्वं गुरुस्त्वं महामंत्रो मंत्रैर्वेद्योऽसि सर्वदा
tvaṃ mātā ca pitā tvaṃ ca tvaṃ baṃdhuśca sakhā ca me tvaṃ gurustvaṃ mahāmaṃtro maṃtrairvedyo'si sarvadā
तुम ही मेरी माता हो, तुम ही पिता हो; तुम ही मेरे बंधु और सखा हो। तुम ही गुरु हो, तुम ही महामंत्र हो — मंत्रों से सदा तुम ही जानने योग्य हो।"
श्लोक 71 (padma.6.151.71)
निष्कामं वाक्यमाकर्ण्य किरातस्य तदा भवः । ददौ पार्षदमुख्यत्वं द्वारपालत्वमेव च
niṣkāmaṃ vākyamākarṇya kirātasya tadā bhavaḥ dadau pārṣadamukhyatvaṃ dvārapālatvameva ca
किरात के इस निष्काम वचन को सुनकर भव ने उसे पार्षदों का प्रमुख पद तथा द्वारपाल का पद प्रदान किया।
श्लोक 72 (padma.6.151.72)
तदा डमरुनादेन नादितं भुवनत्रयम् । भेरीभांकारशब्देन शंखानां निनदेन च
tadā ḍamarunādena nāditaṃ bhuvanatrayam bherībhāṃkāraśabdena śaṃkhānāṃ ninadena ca
तब डमरू की ध्वनि से, भेरियों की गड़गड़ाहट से तथा शंखों की ध्वनि से त्रिभुवन गुँज उठा;
श्लोक 73 (padma.6.151.73)
तदा दुंदुभयो नेदुः पटहाश्च सहस्रशः । नंदी तं नादमाकर्ण्य विस्मयात्त्वरितो ययौ
tadā duṃdubhayo neduḥ paṭahāśca sahasraśaḥ naṃdī taṃ nādamākarṇya vismayāttvarito yayau
तब दुंदुभियाँ तथा सहस्रों पटह बज उठे। नंदी उस ध्वनि को सुनकर विस्मय से शीघ्रता से गया,
श्लोक 74 (padma.6.151.74)
तपोवनं यत्र शिवः स्थितः प्रमथसंवृतः । किरातो हि तथा दृष्टो नंदिना च तदा भृशम्
tapovanaṃ yatra śivaḥ sthitaḥ pramathasaṃvṛtaḥ kirāto hi tathā dṛṣṭo naṃdinā ca tadā bhṛśam
उस तपोवन में जहाँ शिव प्रमथों से घिरे खड़े थे — और वहाँ नंदी ने अत्यंत आश्चर्य से किरात को देखा।
श्लोक 75 (padma.6.151.75)
उवाच प्रसृतो वाक्यं स नंदी विस्मयान्वितः । किरातं स्तोतुकामोऽसौ परमेन समाधिना
uvāca prasṛto vākyaṃ sa naṃdī vismayānvitaḥ kirātaṃ stotukāmo'sau paramena samādhinā
विस्मयपूर्ण नंदी ने किरात की स्तुति करने की इच्छा से परम समाधि के साथ यह विस्तृत वचन कहा —
श्लोक 76 (padma.6.151.76)
इहानीतस्त्वया शंभुस्त्वं भक्तोऽसि परंतपः । त्वद्भक्तोऽहमिह प्राप्तो मां निवेदय शंकरे
ihānītastvayā śaṃbhustvaṃ bhakto'si paraṃtapaḥ tvadbhakto'hamiha prāpto māṃ nivedaya śaṃkare
"तुमने यहाँ शंभु को लाया है, तुम निश्चय ही उनके भक्त हो, हे शत्रु-तापन! मैं भी उनका भक्त हूँ, यहाँ आया हूँ — मुझे शंकर से मिलवाओ।"
श्लोक 77 (padma.6.151.77)
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य किरातस्त्वरयान्वितः । नंदिनं च करे गृह्य शंकरं समुपागतः
tacchrutvā vacanaṃ tasya kirātastvarayānvitaḥ naṃdinaṃ ca kare gṛhya śaṃkaraṃ samupāgataḥ
उसका यह वचन सुनकर किरात शीघ्रता से नंदी का हाथ पकड़कर शंकर के पास आया।
श्लोक 78 (padma.6.151.78)
प्रहस्य भगवान्रुद्रः किरातं वाक्यमब्रवीत् । ब्रूहि कोऽसौ त्वयानीतो गणानामिह सन्निधौ
prahasya bhagavānrudraḥ kirātaṃ vākyamabravīt brūhi ko'sau tvayānīto gaṇānāmiha sannidhau
भगवान् रुद्र ने हँसते हुए किरात से कहा — "बताओ, यह कौन है जिसे तुम मेरे गणों के समीप लाए हो?"
श्लोक 79 (padma.6.151.79)
किरात उवाच। त्वद्भक्तोऽसौ तदा देव तव पूजारतो ह्यसौ । प्रत्यहं रत्नमाणिक्यपुष्पैश्चौच्चावचैरिह
kirāta uvāca tvadbhakto'sau tadā deva tava pūjārato hyasau pratyahaṃ ratnamāṇikyapuṣpaiścauccāvacairiha
किरात ने कहा — "हे देव! यह तुम्हारा भक्त है, तुम्हारी पूजा में सदा रत, प्रतिदिन यहाँ रत्न, माणिक्य और नाना प्रकार के पुष्पों से,
श्लोक 80 (padma.6.151.80)
जीवितेन धनेनापि पूजितोऽसि न संशयः । तस्माच्चानीहि भो स्वामिन्नंदिनं भक्तवत्सल
jīvitena dhanenāpi pūjito'si na saṃśayaḥ tasmāccānīhi bho svāminnaṃdinaṃ bhaktavatsala
अपने जीवन और धन से भी तुम्हारी पूजा करने वाला, इसमें संदेह नहीं। इसलिए हे स्वामिन्, हे भक्तवत्सल! नंदी को स्वीकार करो।"
श्लोक 81 (padma.6.151.81)
महादेव उवाच। जानाम्यहं महाभाग नंदिनं वैश्यवर्त्तनम् । त्वं मे भक्तः सखा चेति महाकाल महामते
mahādeva uvāca jānāmyahaṃ mahābhāga naṃdinaṃ vaiśyavarttanam tvaṃ me bhaktaḥ sakhā ceti mahākāla mahāmate
महादेव ने कहा — "हे महाभाग! मैं वैश्य-वृत्ति वाले नंदी को जानता हूँ। तुम भी मेरे भक्त और सखा हो, हे महाकाल, हे महामते!
श्लोक 82 (padma.6.151.82)
उपाधिरहिता ये च ये निष्कपटमानसाः । ते प्रियास्ते च मे भक्तास्ते विशिष्टा नरोत्तमाः । तावुभौ स्वीकृतौ तेन पार्षदत्वेन शंभुना
upādhirahitā ye ca ye niṣkapaṭamānasāḥ te priyāste ca me bhaktāste viśiṣṭā narottamāḥ tāvubhau svīkṛtau tena pārṣadatvena śaṃbhunā
जो लोग बनावट से रहित हैं और निष्कपट मन वाले हैं, वे ही मुझे प्रिय हैं, वे ही मेरे भक्त हैं, वे ही श्रेष्ठ पुरुष हैं।" इस प्रकार शंभु ने उन दोनों को पार्षद-पद पर स्वीकार किया।
श्लोक 83 (padma.6.151.83)
ततो विमानानि बहुनि तत्र समागतान्येव महाप्रभाणि । किरातवर्येण स वैश्यवर्य उद्धारितस्तेन महाप्रभेण
tato vimānāni bahuni tatra samāgatānyeva mahāprabhāṇi kirātavaryeṇa sa vaiśyavarya uddhāritastena mahāprabheṇa
तब वहाँ अनेक महातेजस्वी विमान आ गए, और उस श्रेष्ठ किरात के द्वारा वह श्रेष्ठ वैश्य उस महातेजस्वी के द्वारा उद्धृत हुआ,
श्लोक 84 (padma.6.151.84)
कैलासलोकमापन्नौ विमानैर्वेगवत्तरैः । सारूप्यमेव संप्राप्तो ईश्वरस्य महात्मनः
kailāsalokamāpannau vimānairvegavattaraiḥ sārūpyameva saṃprāpto īśvarasya mahātmanaḥ
और दोनों अत्यंत वेगवान विमानों से कैलासलोक को प्राप्त हुए, तथा उस महात्मा ईश्वर के सारूप्य (समान रूप) को प्राप्त हुए।
श्लोक 85 (padma.6.151.85)
नीराजितौ गिरिजया पुत्रवत्तौ गणावुभौ
nīrājitau girijayā putravattau gaṇāvubhau
गिरिजा ने पुत्रों के समान उन दोनों गणों की आरती उतारी।
श्लोक 86 (padma.6.151.86)
उवाचेदं ततो देवी प्रहस्य गजगामिनी । यथा त्वं हि महादेव तथा चेतौ न संशयः
uvācedaṃ tato devī prahasya gajagāminī yathā tvaṃ hi mahādeva tathā cetau na saṃśayaḥ
तब गजगामिनी देवी ने हँसते हुए यह कहा — "हे महादेव! जैसे तुम हो, वैसे ही ये दोनों भी हैं, इसमें संदेह नहीं।"
श्लोक 87 (padma.6.151.87)
सारूप्येण च गत्या च हास्यभावैः सुपूजितैः । देव्यास्तद्वचनं श्रुत्वा किरातो वैश्य एव च
sārūpyeṇa ca gatyā ca hāsyabhāvaiḥ supūjitaiḥ devyāstadvacanaṃ śrutvā kirāto vaiśya eva ca
रूप में, गति में तथा हास्य-भाव में भी वे भलीभाँति पूजित थे। देवी के इस वचन को सुनकर किरात और वैश्य दोनों,
श्लोक 88 (padma.6.151.88)
सद्यः पराङ्मुखौ भूत्वा शंकरस्य च पश्यतः । ऊचतुस्त्वरया युक्तौ गणौ रुद्रस्य पश्यतः
sadyaḥ parāṅmukhau bhūtvā śaṃkarasya ca paśyataḥ ūcatustvarayā yuktau gaṇau rudrasya paśyataḥ
तत्काल लज्जावश मुख फेरकर, शंकर तथा रुद्र के देखते ही देखते शीघ्रता से यह बोले —
श्लोक 89 (padma.6.151.89)
उभावप्यनुकंप्यौ च भवता हि त्रिलोचन । तव द्वारिस्थितौ नित्यं भवावस्ते नमो नमः
ubhāvapyanukaṃpyau ca bhavatā hi trilocana tava dvāristhitau nityaṃ bhavāvaste namo namaḥ
"हे त्रिलोचन! हम दोनों तुम्हारी दया के पात्र हैं। हम सदा तुम्हारे द्वार पर स्थित रहें — तुम्हें बारंबार नमस्कार।"
श्लोक 90 (padma.6.151.90)
तयोर्भावं स भगवान्विदित्वा प्रहसन्भवः । उवाच परया भक्त्या भवतोरस्तु वांछितम्
tayorbhāvaṃ sa bhagavānviditvā prahasanbhavaḥ uvāca parayā bhaktyā bhavatorastu vāṃchitam
उनके इस भाव को जानकर भगवान् भव ने हँसते हुए कहा — "तुम दोनों की परम भक्ति से यह इच्छा पूर्ण हो।"
श्लोक 91 (padma.6.151.91)
ततः प्रभृति द्वावेतौ द्वारपालौ बभूवतुः । शिवद्वारि स्थितौ देवि मध्याह्ने शिवदर्शिनौ
tataḥ prabhṛti dvāvetau dvārapālau babhūvatuḥ śivadvāri sthitau devi madhyāhne śivadarśinau
तब से वे दोनों द्वारपाल हो गए, हे देवी! शिव के द्वार पर स्थित, मध्याह्न में शिव के दर्शन कराने वाले।
श्लोक 92 (padma.6.151.92)
एको नंदी महाकालो द्वावेतौ शिववल्लभौ । ये पापिनोप्यधर्मिष्ठा अंधा मूकाश्च पंगवाः
eko naṃdī mahākālo dvāvetau śivavallabhau ye pāpinopyadharmiṣṭhā aṃdhā mūkāśca paṃgavāḥ
एक नंदी और दूसरा महाकाल — ये दोनों शिव के प्रिय हैं। जो पापी, अधर्मी, अंधे, गूँगे, लंगड़े,
श्लोक 93 (padma.6.151.93)
कुलहीना दुरात्मानः श्वपचाद्या हि मानवाः । यादृशास्तादृशाश्चान्ये आराध्य धवलेश्वरम्
kulahīnā durātmānaḥ śvapacādyā hi mānavāḥ yādṛśāstādṛśāścānye ārādhya dhavaleśvaram
कुलहीन, दुरात्मा, श्वपच आदि मनुष्य भी — जैसे-तैसे भी हों, वे सब धवलेश्वर की आराधना करके,
श्लोक 94 (padma.6.151.94)
गतास्तेऽपि गमिष्यंति नात्र कार्या विचराणा । अत्र स्नानं च दानं च सांनिध्यं शंकरस्य च
gatāste'pi gamiṣyaṃti nātra kāryā vicarāṇā atra snānaṃ ca dānaṃ ca sāṃnidhyaṃ śaṃkarasya ca
गए हैं और आगे भी जाएँगे — इसमें विचार की आवश्यकता नहीं। यहाँ स्नान, दान तथा शंकर का सान्निध्य,
श्लोक 95 (padma.6.151.95)
साभ्रमत्यां कृतस्नाना धवलेश्वरपूजकाः । ते रुद्रलोकं गच्छंति नात्र कार्या विचारणा
sābhramatyāṃ kṛtasnānā dhavaleśvarapūjakāḥ te rudralokaṃ gacchaṃti nātra kāryā vicāraṇā
साभ्रमती में स्नान करके धवलेश्वर की पूजा करने वाले रुद्रलोक को जाते हैं — इसमें विचार की आवश्यकता नहीं।
श्लोक 96 (padma.6.151.96)
अत्र स्नानं च दानं च ये कुर्वंति नरोत्तमाः । धर्मार्थकामभोगाश्च भुक्त्वा यांति हरालयम्
atra snānaṃ ca dānaṃ ca ye kurvaṃti narottamāḥ dharmārthakāmabhogāśca bhuktvā yāṃti harālayam
यहाँ जो श्रेष्ठ पुरुष स्नान और दान करते हैं, वे धर्म, अर्थ, काम तथा भोगों को भोगकर हरि के धाम को जाते हैं।
श्लोक 97 (padma.6.151.97)
चंद्र सर्योपरागे च पितुः सांवत्सरे दिने । यत्फलं लभते मर्त्यस्तत्फलं प्राप्नुयाद्ध्रुवम्
caṃdra saryoparāge ca pituḥ sāṃvatsare dine yatphalaṃ labhate martyastatphalaṃ prāpnuyāddhruvam
चंद्र या सूर्यग्रहण में, तथा पिता की वार्षिक श्राद्ध-तिथि पर, मनुष्य को जो फल अन्यत्र प्राप्त होता है, वही फल यहाँ निश्चय ही प्राप्त होता है।
श्लोक 98 (padma.6.151.98)
स्वर्गात्कामदुघा देवि नित्यमायाति सर्वथा । आगत्य तं शिवं देवं समभ्यर्च्य यथा तथा
svargātkāmadughā devi nityamāyāti sarvathā āgatya taṃ śivaṃ devaṃ samabhyarcya yathā tathā
हे देवी! कामधेनु सदा स्वर्ग से नित्य हर प्रकार से आती है, आकर उस शिव देव की यथाविधि पूजा करके,
श्लोक 99 (padma.6.151.99)
सा गच्छति सुरश्रेष्ठे स्वर्गं प्रति न संशयः । तेन दुग्धाभियोगेन लिंगं तद्धवलीकृतम्
sā gacchati suraśreṣṭhe svargaṃ prati na saṃśayaḥ tena dugdhābhiyogena liṃgaṃ taddhavalīkṛtam
वह हे सुरश्रेष्ठ, पुनः स्वर्ग को लौट जाती है, इसमें संदेह नहीं। उसके दुग्धाभिषेक से ही वह लिंग धवल (श्वेत) हो गया।
श्लोक 100 (padma.6.151.100)
धवलेश्वरं नाम ततः संजातं भुवि सर्वदा । जंतवोऽत्र सदा देवि म्रियंते कालनोदिताः । ते ते शिवपदं यांति यावच्चंद्रदिवाकरौ
dhavaleśvaraṃ nāma tataḥ saṃjātaṃ bhuvi sarvadā jaṃtavo'tra sadā devi mriyaṃte kālanoditāḥ te te śivapadaṃ yāṃti yāvaccaṃdradivākarau
तभी से पृथ्वी पर उसका नाम सदा के लिए धवलेश्वर हो गया। हे देवी! यहाँ जो भी प्राणी काल से प्रेरित होकर मरते हैं, वे सब जब तक चंद्र-सूर्य रहेंगे, तब तक शिवपद को प्राप्त करते हैं।