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उत्तर खण्ड · अध्याय 153

दुर्धर्षेश्वर महात्म्य

अध्याय 152अध्याय-सूचीअध्याय 154

श्लोक 1 (padma.6.153.1)

महादेव उवाच। अन्यत्तीर्थं प्रवक्ष्यामि दुर्द्धर्षेश्वरमुत्तमम् । यस्य स्मरणमात्रेण पापोऽपि पुण्यवान्भवेत्

mahādeva uvāca anyattīrthaṃ pravakṣyāmi durddharṣeśvaramuttamam yasya smaraṇamātreṇa pāpo'pi puṇyavānbhavet

महादेव ने कहा — अब मैं एक और श्रेष्ठ तीर्थ, दुर्धर्षेश्वर, बताऊँगा — जिसके स्मरण मात्र से पापी भी पुण्यवान् हो जाता है।

श्लोक 2 (padma.6.153.2)

वृत्ते देवासुरे युद्धे दैत्ये च निधनं गते । दुर्धर्षं च व्रतं कृत्वा यत्र भार्गवनंदनः

vṛtte devāsure yuddhe daitye ca nidhanaṃ gate durdharṣaṃ ca vrataṃ kṛtvā yatra bhārgavanaṃdanaḥ

जब देव-असुर युद्ध हुआ और दैत्य नष्ट हो गए, तब भार्गवनंदन (शुक्राचार्य) ने अत्यंत दुष्कर व्रत करके,

श्लोक 3 (padma.6.153.3)

समाराध्य महादेवं दुर्द्धर्षं लोककारणम् । मृतसंजीवनीमाप यत्र विद्यां हि त्र्यंबकात्

samārādhya mahādevaṃ durddharṣaṃ lokakāraṇam mṛtasaṃjīvanīmāpa yatra vidyāṃ hi tryaṃbakāt

लोक-कारण, दुर्धर्ष महादेव की आराधना करके यहीं त्र्यंबक से मृतसंजीवनी विद्या प्राप्त की।

श्लोक 4 (padma.6.153.4)

दैत्यार्थमुशनस्तीर्थं विख्यातं जगतीतले । काव्यतीर्थे कृतस्नानः पूज्य देवं महेश्वरम्

daityārthamuśanastīrthaṃ vikhyātaṃ jagatītale kāvyatīrthe kṛtasnānaḥ pūjya devaṃ maheśvaram

दैत्यों के हेतु उशना (शुक्र) ने इस तीर्थ को पृथ्वी पर विख्यात किया। काव्य-तीर्थ में स्नान करके देवता महेश्वर की पूजा करने से,

श्लोक 5 (padma.6.153.5)

दुर्द्धर्षेश्वरसंज्ञं वै सर्वपापैः प्रमुच्यते । अत्र वृत्तं तु श्रोतव्यं त्वया च नगनंदिनि

durddharṣeśvarasaṃjñaṃ vai sarvapāpaiḥ pramucyate atra vṛttaṃ tu śrotavyaṃ tvayā ca naganaṃdini

"दुर्धर्षेश्वर" नामक इस तीर्थ में मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है। हे नगनंदिनि! अब यहाँ की कथा सुनिए।

श्लोक 6 (padma.6.153.6)

पुरा यदाभवद्युद्धं वृत्रवासवयोरिह । तदासुरैर्जिता देवा मघवान्वै सुरेश्वरः । किं कर्त्तव्यमिति ध्यात्वा गतोऽसौ तं गुरुं प्रति

purā yadābhavadyuddhaṃ vṛtravāsavayoriha tadāsurairjitā devā maghavānvai sureśvaraḥ kiṃ karttavyamiti dhyātvā gato'sau taṃ guruṃ prati

पूर्वकाल में जब यहाँ वृत्र और वासव (इंद्र) का युद्ध हुआ, तब असुरों से पराजित हुए देवगण और स्वयं सुरेश्वर मघवान्, "क्या करना चाहिए" यह सोचकर अपने गुरु के पास गए।

श्लोक 7 (padma.6.153.7)

इंद्र उवाच। अस्माकं त्वं गुरुः साक्षाद्देवानां पालकः सदा । ऋषीणां त्वं वरः श्रीमान्कृपां कुरु दयानिधे

iṃdra uvāca asmākaṃ tvaṃ guruḥ sākṣāddevānāṃ pālakaḥ sadā ṛṣīṇāṃ tvaṃ varaḥ śrīmānkṛpāṃ kuru dayānidhe

इंद्र ने कहा — "आप ही साक्षात् हमारे गुरु हैं, सदा देवताओं के पालक। आप ऋषियों में श्रेष्ठ, श्रीमान् हैं — हे दयानिधे! कृपा कीजिए।

श्लोक 8 (padma.6.153.8)

वृत्रेण निर्जितोऽहं च क्व गच्छामि च सुव्रत

vṛtreṇa nirjito'haṃ ca kva gacchāmi ca suvrata

मैं वृत्र से पराजित हो गया हूँ — हे सुव्रत! अब मैं कहाँ जाऊँ?"

श्लोक 9 (padma.6.153.9)

बृहस्पतिरुवाच। शृणु देवेंद्र वक्ष्यामि येन त्वं हि सदा सुखी । मम वाक्यं कुरुष्वैव यदीच्छेच्छुभमात्मनः

bṛhaspatiruvāca śṛṇu deveṃdra vakṣyāmi yena tvaṃ hi sadā sukhī mama vākyaṃ kuruṣvaiva yadīcchecchubhamātmanaḥ

बृहस्पति ने कहा — "सुनो, हे देवेंद्र! मैं वह उपाय बताता हूँ जिससे तुम सदा सुखी रहोगे। यदि अपना कल्याण चाहते हो, तो मेरी बात मानो।

श्लोक 10 (padma.6.153.10)

साभ्रमत्यां तदा गच्छ तत्र गत्वा सुखी भव । दुर्द्धराख्यो यत्र देवो नित्यं तिष्ठति भूतिदः

sābhramatyāṃ tadā gaccha tatra gatvā sukhī bhava durddharākhyo yatra devo nityaṃ tiṣṭhati bhūtidaḥ

तब साभ्रमती नदी पर जाओ, वहाँ जाकर सुखी हो जाओ। जहाँ दुर्धर नामक देव, ऐश्वर्य के दाता, नित्य निवास करते हैं,

श्लोक 11 (padma.6.153.11)

ददाति वांछितान्कामान्सत्यं सत्यं सुरेश्वर । गुरोर्वचनमाकर्ण्य स गतस्तां नदीं प्रति

dadāti vāṃchitānkāmānsatyaṃ satyaṃ sureśvara gurorvacanamākarṇya sa gatastāṃ nadīṃ prati

और सत्य ही, हे सुरेश्वर, वे इच्छित कामनाएँ प्रदान करते हैं।" गुरु के वचन सुनकर वे उस नदी की ओर गए।

श्लोक 12 (padma.6.153.12)

तत्र स्नात्वा तु देवेशो महेशं तमपूजयत् । स्नानाच्च पूजनादेव संतुष्टः श्रीमहेश्वरः

tatra snātvā tu deveśo maheśaṃ tamapūjayat snānācca pūjanādeva saṃtuṣṭaḥ śrīmaheśvaraḥ

वहाँ स्नान करके देवेश्वर ने उस महेश की पूजा की। स्नान तथा पूजन से ही श्रीमहेश्वर संतुष्ट हो गए।

श्लोक 13 (padma.6.153.13)

महादेव उवाच। यं यं प्रार्थयसे नित्यं तत्सर्वं हि ददाम्यहम् । श्रुत्वा वाक्यं तु देवेशो ह्युवाच परमं वचः

mahādeva uvāca yaṃ yaṃ prārthayase nityaṃ tatsarvaṃ hi dadāmyaham śrutvā vākyaṃ tu deveśo hyuvāca paramaṃ vacaḥ

महादेव ने कहा — "तुम जो-जो सदा प्रार्थना करते हो, वह सब मैं तुम्हें देता हूँ।" यह वचन सुनकर देवेश्वर ने यह परम वचन कहा —

श्लोक 14 (padma.6.153.14)

इंद्र उवाच। त्वं नाथः सर्वलोकानां त्वमेव कारणं पदम् । त्वं हि विश्वेश्वरो देवो सर्वदा लक्ष्यसे मया

iṃdra uvāca tvaṃ nāthaḥ sarvalokānāṃ tvameva kāraṇaṃ padam tvaṃ hi viśveśvaro devo sarvadā lakṣyase mayā

इंद्र ने कहा — "आप ही सब लोकों के नाथ हैं, आप ही परम कारण-पद हैं। आप ही विश्वेश्वर देव हैं, मैं सदा आपको ऐसा ही देखता हूँ।

श्लोक 15 (padma.6.153.15)

यदि त्वं मे प्रसन्नोऽसि विश्वेश्वर सुरेश्वर । वृत्रं हन महादेव एष कामो महान्मम

yadi tvaṃ me prasanno'si viśveśvara sureśvara vṛtraṃ hana mahādeva eṣa kāmo mahānmama

हे विश्वेश्वर! हे सुरेश्वर! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो हे महादेव, वृत्र का वध कीजिए — यही मेरी महान कामना है।"

श्लोक 16 (padma.6.153.16)

महादेव उवाच। तव वाक्यात्तु देवेश वृत्रोऽसौ निहतो मया । मया यद्दीयते शस्त्रं तद्गृह्णीष्व सुरेश्वर

mahādeva uvāca tava vākyāttu deveśa vṛtro'sau nihato mayā mayā yaddīyate śastraṃ tadgṛhṇīṣva sureśvara

महादेव ने कहा — "तुम्हारे वचन से, हे देवेश! वह वृत्र मेरे द्वारा मानो मारा ही जा चुका है। मैं जो शस्त्र तुम्हें दे रहा हूँ, उसे ग्रहण करो, हे सुरेश्वर।

श्लोक 17 (padma.6.153.17)

तेनैव चासुयोगेन हनिष्यसि न संशयः

tenaiva cāsuyogena haniṣyasi na saṃśayaḥ

उसी शस्त्र के सम्यक् प्रयोग से तुम निश्चय ही उसका वध करोगे।"

श्लोक 18 (padma.6.153.18)

इंद्र उवाच। किमस्त्रं वद विश्वेश येन वृत्रं हि हन्म्यहम् । वज्रादप्यधिकं किं त्तन्निर्मितं तु त्वया कदा

iṃdra uvāca kimastraṃ vada viśveśa yena vṛtraṃ hi hanmyaham vajrādapyadhikaṃ kiṃ ttannirmitaṃ tu tvayā kadā

इंद्र ने कहा — "हे विश्वेश! वह शस्त्र क्या है, जिससे मैं वृत्र का वध करूँ? वज्र से भी अधिक शक्तिशाली वह क्या है, और आपने उसे कब बनाया?"

श्लोक 19 (padma.6.153.19)

महादेव उवाच। इदं पाशुपतं ह्यस्त्रं निर्मितं तु मया पुरा । न दत्तं कस्यचिच्छक्र तवार्थे रक्षितं मया

mahādeva uvāca idaṃ pāśupataṃ hyastraṃ nirmitaṃ tu mayā purā na dattaṃ kasyacicchakra tavārthe rakṣitaṃ mayā

महादेव ने कहा — "यह पाशुपत नामक अस्त्र है, जो मैंने पूर्वकाल में बनाया था। हे शक्र! यह किसी को नहीं दिया गया, इसे मैंने तुम्हारे ही लिए सुरक्षित रखा है।

श्लोक 20 (padma.6.153.20)

अत्र स्नातं त्वया देव पूजनं वै त्वया कृतम् । अतस्त्वं गृह्ण मे शस्त्रं येन वृत्रं हनिष्यसि

atra snātaṃ tvayā deva pūjanaṃ vai tvayā kṛtam atastvaṃ gṛhṇa me śastraṃ yena vṛtraṃ haniṣyasi

हे देव! तुमने यहाँ स्नान किया है और तुमने ही यहाँ पूजा भी की है। इसलिए मेरा यह शस्त्र ग्रहण करो, जिससे तुम वृत्र का वध करोगे।"

श्लोक 21 (padma.6.153.21)

श्रीमहेशप्रसादाच्च प्राप्तं मघवता ततः । तेन पाशुपतास्त्रेण हतो वृत्रो महाबलः

śrīmaheśaprasādācca prāptaṃ maghavatā tataḥ tena pāśupatāstreṇa hato vṛtro mahābalaḥ

श्रीमहेश की कृपा से तब मघवान् ने वह प्राप्त किया। उसी पाशुपत अस्त्र से महाबली वृत्र मारा गया।

श्लोक 22 (padma.6.153.22)

तत्सर्वमत्र संजातं दुर्द्धर्षेश प्रसादतः । स्नानमात्रात्तु देवेशि पूजनादेव सांप्रतम्

tatsarvamatra saṃjātaṃ durddharṣeśa prasādataḥ snānamātrāttu deveśi pūjanādeva sāṃpratam

यह सब यहाँ दुर्धर्षेश की कृपा से ही घटित हुआ — हे देवेशी! केवल स्नान से तथा केवल पूजन से ही, अभी भी,

श्लोक 23 (padma.6.153.23)

तीर्थप्रभावात्संप्राप्तं सत्यं सत्यं वरानने । एवं ज्ञात्वा तु देवेशि तत्र वै स्नानमाचरेत् । दर्शनं तु महेशस्य सर्वपापप्रणाशनम्

tīrthaprabhāvātsaṃprāptaṃ satyaṃ satyaṃ varānane evaṃ jñātvā tu deveśi tatra vai snānamācaret darśanaṃ tu maheśasya sarvapāpapraṇāśanam

तीर्थ के प्रभाव से यह सब प्राप्त होता है — सत्य, सत्य, हे वरानने! यह जानकर, हे देवेशी, वहाँ स्नान करना चाहिए। महेश का दर्शन ही समस्त पापों का नाश करने वाला है।

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