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उत्तर खण्ड · अध्याय 154

खड्गधारेश्वर महात्म्य

अध्याय 153अध्याय-सूचीअध्याय 155

श्लोक 1 (padma.6.154.1)

साभ्रमत्यास्तटे गुप्तं तीर्थं परमपावनम् । खङ्गधारमिति ख्यातं कलौ गुप्तं भविष्यति

sābhramatyāstaṭe guptaṃ tīrthaṃ paramapāvanam khaṅgadhāramiti khyātaṃ kalau guptaṃ bhaviṣyati

साभ्रमती के तट पर एक गुप्त, परम पवित्र तीर्थ है, जो "खड्गधार" नाम से विख्यात है — कलियुग में यह गुप्त रहेगा।

श्लोक 2 (padma.6.154.2)

यत्र प्रसंगतः स्नात्वा पीत्वा वापो यदृच्छया । सर्वपापविनिर्मुक्तो रुद्रलोके महीयते

yatra prasaṃgataḥ snātvā pītvā vāpo yadṛcchayā sarvapāpavinirmukto rudraloke mahīyate

जो कोई भी प्रसंगवश वहाँ स्नान कर ले या संयोगवश उसका जल पी ले, वह सब पापों से मुक्त होकर रुद्रलोक में सम्मानित होता है।

श्लोक 3 (padma.6.154.3)

यत्र साभ्रमती पुण्या कश्यपानुगता सती । रुद्रेण हि जटाजूटे धृता पातालगामिनः

yatra sābhramatī puṇyā kaśyapānugatā satī rudreṇa hi jaṭājūṭe dhṛtā pātālagāminaḥ

जहाँ पुण्य साभ्रमती, कश्यप का अनुसरण करती हुई सती, पाताल की ओर जाते समय रुद्र द्वारा अपनी जटाओं में धारण की गई थी।

श्लोक 4 (padma.6.154.4)

खङ्गधारेति वै नाम्ना रुद्रस्तत्रैव संस्थितः । यत्र स्नात्वा दिवं याताः पापिनोऽपि सुरेश्वरि

khaṅgadhāreti vai nāmnā rudrastatraiva saṃsthitaḥ yatra snātvā divaṃ yātāḥ pāpino'pi sureśvari

वहाँ "खड्गधार" नाम से रुद्र स्वयं स्थित हैं। हे सुरेश्वरी! वहाँ स्नान करके पापी भी स्वर्ग को प्राप्त हुए हैं।

श्लोक 5 (padma.6.154.5)

अत्रैवोदाहरंतीममितिहासं पुरातनम् । किरातेन कृतं यच्च व्रतं परमदुष्करम्

atraivodāharaṃtīmamitihāsaṃ purātanam kirātena kṛtaṃ yacca vrataṃ paramaduṣkaram

यहाँ यह पुरातन इतिहास कहा जाता है — एक किरात द्वारा किए गए अत्यंत दुष्कर व्रत का।

श्लोक 6 (padma.6.154.6)

पार्वत्युवाच। किं नाम वै किरातोऽभूत्किं तेन व्रतमाहितम् । तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि यथातथ्येन कथ्यताम्

pārvatyuvāca kiṃ nāma vai kirāto'bhūtkiṃ tena vratamāhitam tatsarvaṃ śrotumicchāmi yathātathyena kathyatām

पार्वती ने कहा — वह किरात कौन था, और उसने कौन-सा व्रत किया? यह सब मैं यथार्थ रूप से सुनना चाहती हूँ।

श्लोक 7 (padma.6.154.7)

नह्यन्यो विद्यते लोके त्वां विना वदतां वरः । तस्मात्कथय भो देव सर्वं शुश्रूषणे हितम्

nahyanyo vidyate loke tvāṃ vinā vadatāṃ varaḥ tasmātkathaya bho deva sarvaṃ śuśrūṣaṇe hitam

संसार में आपके अतिरिक्त कोई और वक्ताओं में श्रेष्ठ नहीं है। अतः हे देव! सब कुछ कहिए, यह सुनने योग्यों के हित में है।

श्लोक 8 (padma.6.154.8)

महादेव उवाच। आसीत्पुरा महारौद्रश्चंडो नाम दुरात्मवान् । क्रूरः शठो नैष्कृतिको भूतानां च भयावहः

mahādeva uvāca āsītpurā mahāraudraścaṃḍo nāma durātmavān krūraḥ śaṭho naiṣkṛtiko bhūtānāṃ ca bhayāvahaḥ

महादेव ने कहा — पूर्वकाल में चंड नामक एक अत्यंत भयंकर दुरात्मा था — क्रूर, धूर्त, विश्वासघाती और प्राणियों के लिए भयावह।

श्लोक 9 (padma.6.154.9)

जालेन मत्स्यान्दुष्टात्मा घातयत्यनिशं ततः । भल्लैर्मृगान्श्वापदांश्च कृष्णसारान्सशल्लकान्

jālena matsyānduṣṭātmā ghātayatyaniśaṃ tataḥ bhallairmṛgānśvāpadāṃśca kṛṣṇasārānsaśallakān

वह दुष्टात्मा जाल से निरंतर मछलियों का वध करता था, और भालों से मृगों, वन्य पशुओं, कृष्णसार तथा साही का भी।

श्लोक 10 (padma.6.154.10)

खगान्नानाविधांश्चैव विध्वा कांश्चित्प्रपातयेत् । पक्षिणो घातयन्क्रुद्धो बर्हिणश्च विशेषतः

khagānnānāvidhāṃścaiva vidhvā kāṃścitprapātayet pakṣiṇo ghātayankruddho barhiṇaśca viśeṣataḥ

नाना प्रकार के पक्षियों को भी वह वेध कर गिरा देता था। क्रुद्ध होकर वह पक्षियों का, विशेषतः मोरों का वध करता था।

श्लोक 11 (padma.6.154.11)

लुब्धको हि महापापो दुष्टो दुष्टजनप्रियः । भार्या तथाविधा तस्य पुंश्चली च महामया

lubdhako hi mahāpāpo duṣṭo duṣṭajanapriyaḥ bhāryā tathāvidhā tasya puṃścalī ca mahāmayā

वह महापापी, दुष्टजनप्रिय शिकारी था; उसकी पत्नी भी वैसी ही, चरित्रहीन और अत्यंत मायाविनी थी।

श्लोक 12 (padma.6.154.12)

एवं विहरतस्तस्य बहुकालो व्यवर्त्तत । एकदा निशि पापीयान्श्रीवृक्षोपरि संस्थितः

evaṃ viharatastasya bahukālo vyavarttata ekadā niśi pāpīyānśrīvṛkṣopari saṃsthitaḥ

इस प्रकार विचरण करते हुए उसका बहुत समय बीता। एक रात वह पापी बिल्व-वृक्ष पर चढ़ गया,

श्लोक 13 (padma.6.154.13)

कोलं हंतुं धनुःपाणिः शरं संयोज्य कार्मुके । एवं निशा गता तस्य जाग्रतो निमिषस्य हि । माघमासे सितायां वै चतुर्दश्यां नगात्मजे

kolaṃ haṃtuṃ dhanuḥpāṇiḥ śaraṃ saṃyojya kārmuke evaṃ niśā gatā tasya jāgrato nimiṣasya hi māghamāse sitāyāṃ vai caturdaśyāṃ nagātmaje

शूकर को मारने के लिए, धनुष हाथ में लिए, बाण चढ़ाए। इस प्रकार जागते हुए, पलक न झपकाते हुए उसकी रात बीती — यह माघ मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी थी, हे नगात्मजे।

श्लोक 14 (padma.6.154.14)

श्रीवृक्षपत्राणि बहूनि तत्र संच्छेदयामास रुषान्वितोऽपि । श्रीवृक्षमूले परिवर्त्तमानं लिगं च तस्योपरितानि पेतुः

śrīvṛkṣapatrāṇi bahūni tatra saṃcchedayāmāsa ruṣānvito'pi śrīvṛkṣamūle parivarttamānaṃ ligaṃ ca tasyoparitāni petuḥ

क्रोधवश उसने वहाँ बिल्व के अनेक पत्ते काट डाले। बिल्व-वृक्ष की जड़ में एक लिंग था, और वे पत्ते उसी पर गिरे।

श्लोक 15 (padma.6.154.15)

श्रीवृक्षपर्णानि च दैवयोगात्जातं च सर्वं शिवपूजनं तत्

śrīvṛkṣaparṇāni ca daivayogātjātaṃ ca sarvaṃ śivapūjanaṃ tat

दैवयोग से वे बिल्व-पत्र और वह सब, बिना जाने ही, शिव-पूजन बन गया।

श्लोक 16 (padma.6.154.16)

गंडूषकारिणा तेन स्नपनं च महत्कृतम् । अज्ञानिना च तेनैव पुष्कसेन दुरात्मना

gaṃḍūṣakāriṇā tena snapanaṃ ca mahatkṛtam ajñāninā ca tenaiva puṣkasena durātmanā

उसके मुख से गिरे जल-कणों से बड़ा स्नपन (अभिषेक) हुआ — उस अज्ञानी, दुरात्मा पुष्कस के द्वारा।

श्लोक 17 (padma.6.154.17)

माघमासे सिते पक्षे चतुर्दश्यां विधूदये । पुष्कसो हि दुराचारो निष्पन्नो गतकल्मषः

māghamāse site pakṣe caturdaśyāṃ vidhūdaye puṣkaso hi durācāro niṣpanno gatakalmaṣaḥ

माघ मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को, चंद्रोदय के समय, वह दुराचारी पुष्कस निष्पाप होकर शुद्ध हो गया।

श्लोक 18 (padma.6.154.18)

तस्य भार्या प्रचंडा च आगता तस्य सन्निधौ । निराशा च निराहारा यत्रासौ पुष्कसः स्थितः

tasya bhāryā pracaṃḍā ca āgatā tasya sannidhau nirāśā ca nirāhārā yatrāsau puṣkasaḥ sthitaḥ

उसकी प्रचंडा नामक पत्नी उसके पास आई — निराश और भूखी, जहाँ पुष्कस बैठा था।

श्लोक 19 (padma.6.154.19)

न प्राप्तः शूकरस्तेन मृगोऽपि महिषोऽपि वा । अशनार्थं च तस्यैव अन्नमादाय भामिनी

na prāptaḥ śūkarastena mṛgo'pi mahiṣo'pi vā aśanārthaṃ ca tasyaiva annamādāya bhāminī

उसे न शूकर मिला था, न मृग, न महिष। और वह स्त्री उसके भोजन के लिए अन्न लेकर आई थी।

श्लोक 20 (padma.6.154.20)

तेन दृष्टा प्रचंडा सा आयांती क्रूरलोचना । सा तस्य भार्या नद्यां वै जलमध्ये पपात ह

tena dṛṣṭā pracaṃḍā sā āyāṃtī krūralocanā sā tasya bhāryā nadyāṃ vai jalamadhye papāta ha

उसने क्रूर-नेत्रा प्रचंडा को आते देखा। उसकी वह पत्नी नदी के जल में गिर पड़ी।

श्लोक 21 (padma.6.154.21)

तावत्तयोक्तश्चंडात्मा एहि शीघ्रं च भक्षय । समानीतं त्वदर्थं च मत्स्यमांसं मयाधुना

tāvattayoktaścaṃḍātmā ehi śīghraṃ ca bhakṣaya samānītaṃ tvadarthaṃ ca matsyamāṃsaṃ mayādhunā

तब उसने उस चंडात्मा से कहा — "जल्दी आओ और खाओ, मैंने अभी तुम्हारे लिए मत्स्य-मांस लाया है।"

श्लोक 22 (padma.6.154.22)

कृतं किं मूढ पूर्वेद्युर्मांसं पार्श्वे न दृश्यते । नाशितं च त्वया मूढ कुटुंबं लंघते तव

kṛtaṃ kiṃ mūḍha pūrvedyurmāṃsaṃ pārśve na dṛśyate nāśitaṃ ca tvayā mūḍha kuṭuṃbaṃ laṃghate tava

"यह क्या किया, मूर्ख? कल का मांस भी तुम्हारे पास नहीं दिखता। तुमने उसे नष्ट कर दिया, मूर्ख! तुम्हारे कारण परिवार भूखा है।"

श्लोक 23 (padma.6.154.23)

एतच्छ्रुत्वा तु वचनं चंडायाश्चंडरूपवान् । शिवरात्र्युपवासेन रात्रौ जागरणेन च

etacchrutvā tu vacanaṃ caṃḍāyāścaṃḍarūpavān śivarātryupavāsena rātrau jāgaraṇena ca

प्रचंडा के इस वचन को सुनकर वह उग्र-रूप व्यक्ति — शिवरात्रि के उपवास तथा रात्रि-जागरण से,

श्लोक 24 (padma.6.154.24)

शुद्धांतःकरणो जातः स्नातुं नद्यां शुचिव्रतः । यावत्स्नाति स दुष्टात्मा तावत्श्वा तत्र चागतः

śuddhāṃtaḥkaraṇo jātaḥ snātuṃ nadyāṃ śucivrataḥ yāvatsnāti sa duṣṭātmā tāvatśvā tatra cāgataḥ

शुद्ध-हृदय हो गया और शुचि व्रत धारण कर नदी में स्नान करने गया। जब वह दुष्टात्मा स्नान कर रहा था, तभी वहाँ एक कुत्ता आया,

श्लोक 25 (padma.6.154.25)

शुना तदा भक्षितं च सर्वं मांसं सुरेश्वरि । चंडा प्रकुपिता तं च श्वानं हंतुमुपस्थिता

śunā tadā bhakṣitaṃ ca sarvaṃ māṃsaṃ sureśvari caṃḍā prakupitā taṃ ca śvānaṃ haṃtumupasthitā

और हे सुरेश्वरी! उस कुत्ते ने सारा मांस खा लिया। प्रचंडा क्रुद्ध होकर उस कुत्ते को मारने के लिए उठी।

श्लोक 26 (padma.6.154.26)

निवारिता हि चंडेन चंडा प्रकुपिता तदा । न हंतव्यस्त्वया चैष किमनेनाशुभं कृतम्

nivāritā hi caṃḍena caṃḍā prakupitā tadā na haṃtavyastvayā caiṣa kimanenāśubhaṃ kṛtam

चंड ने उसे रोका, तब प्रचंडा और भी क्रुद्ध हुई। उसने कहा — "इसे मत मारो, इसने क्या अनुचित किया है?"

श्लोक 27 (padma.6.154.27)

तयोक्तं भक्षितं चान्नं अनेनैव दुरात्मना । किं त्वं भक्षयिता मूढ भविताद्य बुभुक्षितः

tayoktaṃ bhakṣitaṃ cānnaṃ anenaiva durātmanā kiṃ tvaṃ bhakṣayitā mūḍha bhavitādya bubhukṣitaḥ

उसने कहा — "यह अन्न इसी दुरात्मा (कुत्ते) ने खा लिया है। हे मूर्ख! अब तुम क्या खाओगे? आज तुम भूखे रहोगे।"

श्लोक 28 (padma.6.154.28)

पुष्कस उवाच। यच्छुना भक्षितं चान्नं तेनाहं परितोषितः । किमनेन शरीरेण नश्वरेण गतायुषा

puṣkasa uvāca yacchunā bhakṣitaṃ cānnaṃ tenāhaṃ paritoṣitaḥ kimanena śarīreṇa naśvareṇa gatāyuṣā

पुष्कस ने कहा — "जो अन्न कुत्ते ने खाया, उससे मैं संतुष्ट हूँ। इस नश्वर, समाप्त हो चुकी आयु वाले शरीर से क्या लाभ?

श्लोक 29 (padma.6.154.29)

ये पुष्यंति शरीरं वै सर्वभावेन भामिनि । मूढास्ते पापिनो ज्ञेया लोकद्वय बहिष्कृताः

ye puṣyaṃti śarīraṃ vai sarvabhāvena bhāmini mūḍhāste pāpino jñeyā lokadvaya bahiṣkṛtāḥ

हे भामिनी! जो लोग हर प्रकार से केवल शरीर का ही पोषण करते हैं, वे मूर्ख और पापी जानने चाहिए, दोनों लोकों से बहिष्कृत।

श्लोक 30 (padma.6.154.30)

तस्मान्मानं परित्यज्य कामं चापि दुरात्मताम् । स्वस्थाभावविमर्शेन तत्वबुध्या स्थिरा भव

tasmānmānaṃ parityajya kāmaṃ cāpi durātmatām svasthābhāvavimarśena tatvabudhyā sthirā bhava

इसलिए अभिमान, कामना और दुष्टता को त्यागकर, अपनी वास्तविक स्थिति के चिंतन से, तत्त्व-बुद्धि से स्थिर हो जाओ।

श्लोक 31 (padma.6.154.31)

अहमेतच्छरीरं वै खङ्गधारव्रतेन च । त्यक्ष्याम्यद्य वरारोहे किं चिरंजीवनेन मे

ahametaccharīraṃ vai khaṅgadhāravratena ca tyakṣyāmyadya varārohe kiṃ ciraṃjīvanena me

मैं आज इस शरीर को खड्गधार-व्रत से त्याग दूँगा, हे वरारोहे! मुझे दीर्घ जीवन से क्या प्रयोजन?"

श्लोक 32 (padma.6.154.32)

इत्युक्त्वा खङ्गमाकृष्य यावद्भिनत्ति कं स्वकम् । आगताश्च गणास्तावद्बहवः शिवनोदिताः

ityuktvā khaṅgamākṛṣya yāvadbhinatti kaṃ svakam āgatāśca gaṇāstāvadbahavaḥ śivanoditāḥ

यह कहकर उसने खड्ग खींचा, और जैसे ही वह अपना सिर काटने वाला था, तभी शिव द्वारा भेजे गए अनेक गण वहाँ आ गए।

श्लोक 33 (padma.6.154.33)

विमानानि बहून्यत्र आगतानि तदंतिके । दृष्ट्वा स चैव तान्येवं विमानानि गणांस्तथा

vimānāni bahūnyatra āgatāni tadaṃtike dṛṣṭvā sa caiva tānyevaṃ vimānāni gaṇāṃstathā

वहाँ समीप में अनेक विमान भी आ पहुँचे। उन विमानों तथा गणों को देखकर,

श्लोक 34 (padma.6.154.34)

उवाच परया भक्त्या पुष्कसोऽपि च तान्प्रति । कस्मात्समागता यूयं सर्वे रुद्राक्षधारिणः

uvāca parayā bhaktyā puṣkaso'pi ca tānprati kasmātsamāgatā yūyaṃ sarve rudrākṣadhāriṇaḥ

पुष्कस ने भी परम भक्ति से उनसे कहा — "आप सब रुद्राक्षधारी क्यों यहाँ आए हैं?

श्लोक 35 (padma.6.154.35)

सर्वे स्फटिकसंकाशाः सर्वे चंद्रार्द्धशेखराः । कपर्दिनश्चर्मपरीतवाससो भुजंगभोगैः कृतहारभूषणाः

sarve sphaṭikasaṃkāśāḥ sarve caṃdrārddhaśekharāḥ kapardinaścarmaparītavāsaso bhujaṃgabhogaiḥ kṛtahārabhūṣaṇāḥ

आप सब स्फटिक के समान गौर वर्ण, सभी अर्धचंद्र-शेखर, जटाधारी, चर्म-वस्त्र पहने, सर्पों के फणों से बने हार से भूषित,

श्लोक 36 (padma.6.154.36)

श्रियान्विता रुद्रसमानवीर्या यथातथं भो वदतोचितं मम । पुष्कसेन तदा पृष्टा ऊचुस्ते रुद्रपार्षदाः

śriyānvitā rudrasamānavīryā yathātathaṃ bho vadatocitaṃ mama puṣkasena tadā pṛṣṭā ūcuste rudrapārṣadāḥ

श्रीयुक्त, रुद्र के समान पराक्रमी — मुझे सत्य-सत्य बताइए जो मेरे लिए उचित हो।" तब पुष्कस द्वारा पूछे जाने पर उन रुद्र-पार्षदों ने कहा —

श्लोक 37 (padma.6.154.37)

गणा ऊचुः। प्रेषितास्मो वयं चंड शिवेन परमेष्ठिना । आगच्छ त्वरितो भूत्वा सस्त्रीको यानमारुह

gaṇā ūcuḥ preṣitāsmo vayaṃ caṃḍa śivena parameṣṭhinā āgaccha tvarito bhūtvā sastrīko yānamāruha

गणों ने कहा — "हे चंड! हम परमेष्ठी शिव द्वारा भेजे गए हैं। शीघ्र आओ, अपनी पत्नी सहित इस विमान पर चढ़ो।

श्लोक 38 (padma.6.154.38)

लिगार्चनं कृतं यच्च त्वया रात्रौ शिवस्य च । तेन कर्मविपाकेन प्राप्तोऽसि परमां गतिम्

ligārcanaṃ kṛtaṃ yacca tvayā rātrau śivasya ca tena karmavipākena prāpto'si paramāṃ gatim

तुमने रात्रि में जो शिव का लिंग-अर्चन किया, उस कर्म के फल-विपाक से तुम परम गति को प्राप्त हुए हो।"

श्लोक 39 (padma.6.154.39)

तथोक्तो वीरभद्रेण उवाच प्रहसन्निव । किं मया सुकृतं चीर्णं पापिना पुष्कसेन हि

tathokto vīrabhadreṇa uvāca prahasanniva kiṃ mayā sukṛtaṃ cīrṇaṃ pāpinā puṣkasena hi

वीरभद्र द्वारा यह कहे जाने पर उसने मानो हँसते हुए कहा — "मुझ पापी पुष्कस ने भला कौन-सा सुकृत किया है,

श्लोक 40 (padma.6.154.40)

मृगयारसिकेनैव मूढेन च दुरात्मना । पापाचारोह्यहं नित्यं कथं स्वर्गे वसाम्यहम्

mṛgayārasikenaiva mūḍhena ca durātmanā pāpācārohyahaṃ nityaṃ kathaṃ svarge vasāmyaham

जो मृगया में ही रत, मूर्ख, दुरात्मा हूँ, सदा पापाचारी हूँ — मैं स्वर्ग में कैसे निवास करूँगा?

श्लोक 41 (padma.6.154.41)

कथं लिगार्चनं चाद्या कृतमस्ति तदुच्यताम् । परं कौतुकमापन्नः पृच्छामि कृपया वद

kathaṃ ligārcanaṃ cādyā kṛtamasti taducyatām paraṃ kautukamāpannaḥ pṛcchāmi kṛpayā vada

और यह कैसे हुआ कि मैंने लिंगार्चन किया — यह बताइए। मुझे बड़ा कौतूहल हो रहा है, कृपया कहिए।"

श्लोक 42 (padma.6.154.42)

वीरभद्र उवाच। देवदेवो महादेवो यो गंगाधरसंज्ञकः । परितुष्टोऽद्य ते चंड सभार्यस्य उमापतिः

vīrabhadra uvāca devadevo mahādevo yo gaṃgādharasaṃjñakaḥ parituṣṭo'dya te caṃḍa sabhāryasya umāpatiḥ

वीरभद्र ने कहा — देवदेव महादेव, जो गंगाधर नाम से जाने जाते हैं, वे उमापति आज तुमसे और तुम्हारी पत्नी से प्रसन्न हैं, हे चंड!

श्लोक 43 (padma.6.154.43)

प्रासंगिकं त्वया चाद्य कृतमर्चनमेव च । कोलं निरीक्षमाणेन बिल्वपत्राणि चैव हि

prāsaṃgikaṃ tvayā cādya kṛtamarcanameva ca kolaṃ nirīkṣamāṇena bilvapatrāṇi caiva hi

तुमने आज संयोगवश ही अर्चन कर दिया। शूकर की खोज में देखते हुए तुमने बिल्व-पत्र,

श्लोक 44 (padma.6.154.44)

छेदितानि त्वया चंड पतितानि तदैव हि । लिंगस्य मस्तके तानि तेन त्वं सुकृती प्रभो

cheditāni tvayā caṃḍa patitāni tadaiva hi liṃgasya mastake tāni tena tvaṃ sukṛtī prabho

काटे, हे चंड, और वे उसी क्षण एक लिंग के मस्तक पर गिर पड़े। इससे तुम, हे प्रभु, सुकृती हो गए।

श्लोक 45 (padma.6.154.45)

तवैवं जागरो जातो महावृक्षोपरि ध्रुवम् । तेनैव जागरेणैव तुतोष जगदीश्वरः

tavaivaṃ jāgaro jāto mahāvṛkṣopari dhruvam tenaiva jāgareṇaiva tutoṣa jagadīśvaraḥ

तुम्हारा यह जागरण उस विशाल वृक्ष पर हुआ, निश्चय ही एक जागरण था। उसी जागरण से जगदीश्वर संतुष्ट हुए।

श्लोक 46 (padma.6.154.46)

छलेनैव महाभाग कोलसंदर्शनेन हि । शिवरात्रिदिनं व्याध प्रसंगेनाप्युपोषितम्

chalenaiva mahābhāga kolasaṃdarśanena hi śivarātridinaṃ vyādha prasaṃgenāpyupoṣitam

हे महाभाग! केवल छल से, शूकर की प्रतीक्षा में, हे व्याध! तुमने शिवरात्रि के दिन संयोगवश उपवास भी कर लिया।

श्लोक 47 (padma.6.154.47)

तेनोपवासेन च जागरेणतुष्टो ह्यसौ देववरो महात्मा । तव प्रसादाय महानुभावो ददाति सर्वान्वरदो वरांश्च

tenopavāsena ca jāgareṇatuṣṭo hyasau devavaro mahātmā tava prasādāya mahānubhāvo dadāti sarvānvarado varāṃśca

उस उपवास और जागरण से वह श्रेष्ठ, महात्मा देव संतुष्ट हुए। तुम्हारी कृपा हेतु वह महानुभाव वरदाता तुम्हें सभी वर देते हैं।

श्लोक 48 (padma.6.154.48)

एवमुक्तस्तदा तेन वीरभद्रेण धीमता । पुष्कसोऽपि विमानाग्र्यमारुरोह च पश्यताम्

evamuktastadā tena vīrabhadreṇa dhīmatā puṣkaso'pi vimānāgryamāruroha ca paśyatām

उस बुद्धिमान वीरभद्र द्वारा यह कहे जाने पर, पुष्कस भी सबके देखते-देखते सर्वश्रेष्ठ विमान पर चढ़ गया —

श्लोक 49 (padma.6.154.49)

गणानां देवतानां च सर्वेषां प्राणिनामपि । तदा दुंदुभयो नेदुर्भेरीतूर्याण्यनेकशः

gaṇānāṃ devatānāṃ ca sarveṣāṃ prāṇināmapi tadā duṃdubhayo nedurbherītūryāṇyanekaśaḥ

गणों, देवताओं तथा समस्त प्राणियों के देखते हुए। तब दुंदुभियाँ, भेरियाँ तथा अनेक तूर्य बज उठे।

श्लोक 50 (padma.6.154.50)

वीणावेणुमृदंगानि लास्यनाट्य युतानि च । जगुर्गंधर्वपतयो ननृतुश्चाप्सरोगणाः

vīṇāveṇumṛdaṃgāni lāsyanāṭya yutāni ca jagurgaṃdharvapatayo nanṛtuścāpsarogaṇāḥ

वीणा, वेणु, मृदंग तथा नृत्य-नाट्य के साथ; गंधर्वपति गाने लगे और अप्सराओं के समूह नाचने लगे।

श्लोक 51 (padma.6.154.51)

चामरैर्विज्यमानो हि छत्रैश्च विविधैरपि । महोत्सवेन महता ह्यानीतः शिवसन्निधौ

cāmarairvijyamāno hi chatraiśca vividhairapi mahotsavena mahatā hyānītaḥ śivasannidhau

चामरों से तथा नाना प्रकार के छत्रों से सेवित होकर, वह महान उत्सव के साथ शिव के समीप लाया गया।

श्लोक 52 (padma.6.154.52)

पुष्कसोऽपि तदा प्राप्तस्तीर्थस्नान शिवार्चनात् । किं पुनः श्रद्धया भक्त्या शिवाय परमात्माने

puṣkaso'pi tadā prāptastīrthasnāna śivārcanāt kiṃ punaḥ śraddhayā bhaktyā śivāya paramātmāne

पुष्कस को भी केवल तीर्थ-स्नान तथा शिव-अर्चन मात्र से यह प्राप्त हुआ — फिर श्रद्धा और भक्ति से परमात्मा शिव को,

श्लोक 53 (padma.6.154.53)

पुष्पादिकं फलं गंधं तांबूलाक्षतमेव च । ये प्रयच्छंति लोकेऽस्मिंस्ते रुद्रा नात्र संशयः

puṣpādikaṃ phalaṃ gaṃdhaṃ tāṃbūlākṣatameva ca ye prayacchaṃti loke'smiṃste rudrā nātra saṃśayaḥ

पुष्प, फल, गंध, ताम्बूल और अक्षत जो अर्पित करते हैं, वे इस लोक में रुद्र ही बन जाते हैं, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 54 (padma.6.154.54)

महादेव उवाच। तदाप्रभृति तत्तीर्थं खङ्गधारेति विश्रुतम् । एतत्तीर्थं कलौ गुप्तं भविष्यति सुरेश्वरि

mahādeva uvāca tadāprabhṛti tattīrthaṃ khaṅgadhāreti viśrutam etattīrthaṃ kalau guptaṃ bhaviṣyati sureśvari

महादेव ने कहा — उसी समय से वह तीर्थ "खड्गधार" नाम से विख्यात हुआ। हे सुरेश्वरी! यह तीर्थ कलियुग में गुप्त रहेगा।

श्लोक 55 (padma.6.154.55)

माघमासेऽथ वैशाखे कार्तिक्यां च विशेषतः । स्नानं येन प्रकुर्वंति मुक्तास्ते नगनंदिनि

māghamāse'tha vaiśākhe kārtikyāṃ ca viśeṣataḥ snānaṃ yena prakurvaṃti muktāste naganaṃdini

माघ मास में, वैशाख में तथा विशेषतः कार्तिक में जो स्नान करते हैं, हे नगनंदिनि, वे मुक्त हो जाते हैं।

श्लोक 56 (padma.6.154.56)

वसिष्ठो वामदेवश्च भरद्वाजोऽथ गौतमः । स्नानार्थे वै समायांति देवं द्रष्टुं पिनाकिनम्

vasiṣṭho vāmadevaśca bharadvājo'tha gautamaḥ snānārthe vai samāyāṃti devaṃ draṣṭuṃ pinākinam

वसिष्ठ, वामदेव, भरद्वाज तथा गौतम — ये सब पिनाकधारी देव के दर्शन हेतु यहाँ स्नान करने आते हैं।

श्लोक 57 (padma.6.154.57)

त्रियुगे वर्त्तते लिंगं कलौ नैव तु पार्वति । विश्वामित्रेण ऋषिणा दत्तशापो ह्यहं तदा

triyuge varttate liṃgaṃ kalau naiva tu pārvati viśvāmitreṇa ṛṣiṇā dattaśāpo hyahaṃ tadā

यह लिंग तीन युगों में विद्यमान रहता है, किंतु कलियुग में नहीं, हे पार्वती! मुझे विश्वामित्र ऋषि द्वारा तब शाप दिया गया था।

श्लोक 58 (padma.6.154.58)

पार्वत्युवाच। कथं शापस्तु ऋषिणा दत्तश्चैव सुरेश्वर । तदहं श्रोतुमिच्छामि त्वत्तो देव न संशयः

pārvatyuvāca kathaṃ śāpastu ṛṣiṇā dattaścaiva sureśvara tadahaṃ śrotumicchāmi tvatto deva na saṃśayaḥ

पार्वती ने कहा — हे सुरेश्वर! ऋषि द्वारा वह शाप कैसे दिया गया? यह मैं आपसे सुनना चाहती हूँ, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 59 (padma.6.154.59)

महादेव उवाच। एकस्मिन्समये देवि विश्वामित्रो महातपाः । आगतः खङ्गधारेऽस्मिंस्तीर्थे वै परमाद्भुते

mahādeva uvāca ekasminsamaye devi viśvāmitro mahātapāḥ āgataḥ khaṅgadhāre'smiṃstīrthe vai paramādbhute

महादेव ने कहा — हे देवी! एक समय महातपस्वी विश्वामित्र इस परम अद्भुत खड्गधार तीर्थ में आए।

श्लोक 60 (padma.6.154.60)

साभ्रमत्यां कृतस्नानो दर्शनं कृतवान्मम । तत्र तिष्ठति नित्यं वै पूजां कुर्वन्ननेकधा

sābhramatyāṃ kṛtasnāno darśanaṃ kṛtavānmama tatra tiṣṭhati nityaṃ vai pūjāṃ kurvannanekadhā

साभ्रमती में स्नान करके उन्होंने मेरा दर्शन किया। वे वहाँ नित्य ठहरकर अनेक प्रकार से पूजा करने लगे।

श्लोक 61 (padma.6.154.61)

तत्र कोऽपि महादुष्टः कौलिकः पापरुपधृक् । मांसं दत्तं तदा तेन शिवस्योपरि भामिनि

tatra ko'pi mahāduṣṭaḥ kaulikaḥ pāparupadhṛk māṃsaṃ dattaṃ tadā tena śivasyopari bhāmini

वहाँ कोई महादुष्ट, पापरूपधारी कौलिक (तांत्रिक साधक) आया, और हे भामिनी, उसने शिव पर मांस अर्पित कर दिया।

श्लोक 62 (padma.6.154.62)

दृष्ट्वा तदपि मांसं च विश्वामित्रोऽथ वै पुनः । अब्रवीच्च तदा तत्र दुष्कृतं पापिना कृतम्

dṛṣṭvā tadapi māṃsaṃ ca viśvāmitro'tha vai punaḥ abravīcca tadā tatra duṣkṛtaṃ pāpinā kṛtam

वह मांस देखकर विश्वामित्र ने पुनः कहा — "यहाँ इस पापी द्वारा दुष्कर्म किया गया है।

श्लोक 63 (padma.6.154.63)

न दत्तस्तस्य दंडो हि शर्वेण परमात्मना । तस्मादहं हि निश्चित्य शापं दास्ये न संशयः

na dattastasya daṃḍo hi śarveṇa paramātmanā tasmādahaṃ hi niścitya śāpaṃ dāsye na saṃśayaḥ

फिर भी परमात्मा शर्व द्वारा उसे दंड नहीं दिया गया। इसलिए मैं निश्चय करके शाप दूँगा, इसमें संदेह नहीं।"

श्लोक 64 (padma.6.154.64)

विचार्यैवं तदा तेन शप्तोऽहं देवि वै तदा

vicāryaivaṃ tadā tena śapto'haṃ devi vai tadā

ऐसा विचार करके, हे देवी, उन्होंने तब मुझे शाप दिया।

श्लोक 65 (padma.6.154.65)

अस्मिन्कलियुगे घोरे गुप्तस्त्वं भव सर्वथा । इति दत्वाथ वै शापं गतवान्मुनिसत्तमः

asminkaliyuge ghore guptastvaṃ bhava sarvathā iti datvātha vai śāpaṃ gatavānmunisattamaḥ

"इस घोर कलियुग में तुम सर्वथा गुप्त हो जाओ।" ऐसा शाप देकर वह मुनिश्रेष्ठ चले गए।

श्लोक 66 (padma.6.154.66)

तदा प्रभृति भो देवि गुप्तोऽहं ऋषिशापतः । ममस्थाने विशेषेण पूजनं कुरुते यदि

tadā prabhṛti bho devi gupto'haṃ ṛṣiśāpataḥ mamasthāne viśeṣeṇa pūjanaṃ kurute yadi

तब से, हे देवी, मैं ऋषि-शाप से गुप्त हूँ। फिर भी यदि कोई मेरे स्थान पर विशेष रूप से पूजा करता है,

श्लोक 67 (padma.6.154.67)

तेषां हि दुरितं यच्च नश्यते तत्क्षणादपि । मृन्मयीं मामकीं मूर्तिं कृत्वा ये पूजयंति वै

teṣāṃ hi duritaṃ yacca naśyate tatkṣaṇādapi mṛnmayīṃ māmakīṃ mūrtiṃ kṛtvā ye pūjayaṃti vai

तो उसका पाप उसी क्षण नष्ट हो जाता है। जो मेरी मिट्टी की मूर्ति बनाकर पूजा करते हैं,

श्लोक 68 (padma.6.154.68)

अत्र स्थाने विशेषेण मामके तु वसंति हि । खङ्गधारेश्वर इति नाम्ना ख्यातः कलौयुगे

atra sthāne viśeṣeṇa māmake tu vasaṃti hi khaṅgadhāreśvara iti nāmnā khyātaḥ kalauyuge

वे विशेष रूप से इसी मेरे स्थान पर निवास करते हैं। कलियुग में मैं "खड्गधारेश्वर" नाम से विख्यात हूँ।

श्लोक 69 (padma.6.154.69)

कृते वै मंदिरं नाम त्रेतायां गौरवः स्मृतः । द्वापरे विश्वविख्यातः कलौ खङ्गेश्वरः स्मृतः

kṛte vai maṃdiraṃ nāma tretāyāṃ gauravaḥ smṛtaḥ dvāpare viśvavikhyātaḥ kalau khaṅgeśvaraḥ smṛtaḥ

सतयुग में मेरा नाम "मंदिर" था; त्रेता में "गौरव" के नाम से स्मरण किया गया; द्वापर में विश्वविख्यात रहा; और कलियुग में "खड्गेश्वर" नाम से स्मरण किया जाता हूँ।

श्लोक 70 (padma.6.154.70)

दक्षिणं भागमाश्रित्य मम स्थानं सुरेश्वरि । इति ज्ञात्वा तु तत्रैव कृत्वा मूर्तिं सदा बुधः

dakṣiṇaṃ bhāgamāśritya mama sthānaṃ sureśvari iti jñātvā tu tatraiva kṛtvā mūrtiṃ sadā budhaḥ

हे सुरेश्वरी! मेरा स्थान दक्षिण भाग की ओर है। यह जानकर जो बुद्धिमान वहीं मूर्ति बनाकर,

श्लोक 71 (padma.6.154.71)

पूजनं कुरुते नित्यं वांछितं फलमाप्नुयात् । धर्मार्थकाममोक्षांश्च लभते मानवो भुवि

pūjanaṃ kurute nityaṃ vāṃchitaṃ phalamāpnuyāt dharmārthakāmamokṣāṃśca labhate mānavo bhuvi

नित्य पूजा करता है, वह इच्छित फल प्राप्त करता है। ऐसा मनुष्य पृथ्वी पर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्त करता है।

श्लोक 72 (padma.6.154.72)

धूपं दीपं च नैवेद्यं तथा वै चंदनादिकम् । येऽर्पयंति हि देवेशि लोकनाथे महेश्वरि । न दुःखं तु भवेत्तेषां सत्यं सत्यं वरानने

dhūpaṃ dīpaṃ ca naivedyaṃ tathā vai caṃdanādikam ye'rpayaṃti hi deveśi lokanāthe maheśvari na duḥkhaṃ tu bhavetteṣāṃ satyaṃ satyaṃ varānane

हे देवेशी! जो लोकनाथ महेश्वर को धूप, दीप, नैवेद्य तथा चंदन आदि अर्पित करते हैं, उन्हें कभी दुःख नहीं होता — सत्य, सत्य, हे वरानने!

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