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उत्तर खण्ड · अध्याय 155

दुग्धेश्वर महात्म्य (दधीचि तीर्थ)

अध्याय 154अध्याय-सूचीअध्याय 156

श्लोक 1 (padma.6.155.1)

महादेव उवाच। खड्गधाराद्दक्षिणतस्तीर्थं परमपावनम् । दुग्धेश्वरमिति प्रोक्तं सर्वपापप्रणाशनम्

mahādeva uvāca khaḍgadhārāddakṣiṇatastīrthaṃ paramapāvanam dugdheśvaramiti proktaṃ sarvapāpapraṇāśanam

महादेव ने कहा — खड्गधार से दक्षिण की ओर एक परम पवित्र तीर्थ है, जो "दुग्धेश्वर" नाम से कहा जाता है, जो सभी पापों का नाश करने वाला है।

श्लोक 2 (padma.6.155.2)

यस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा दुग्धेश्वरं हरम् । पुमान्सद्यो विमुच्येत दुःखात्पापसमुद्भवात्

yasmiṃstīrthe naraḥ snātvā dṛṣṭvā dugdheśvaraṃ haram pumānsadyo vimucyeta duḥkhātpāpasamudbhavāt

जिस तीर्थ में स्नान करके तथा दुग्धेश्वर हर का दर्शन करके, मनुष्य तत्काल पाप से उत्पन्न दुःख से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 3 (padma.6.155.3)

दधीचिना तपस्तप्तं साभ्रमत्यास्तटे शुभे । चन्द्रभागा महत्पुण्यं गंगाया संगता यतः

dadhīcinā tapastaptaṃ sābhramatyāstaṭe śubhe candrabhāgā mahatpuṇyaṃ gaṃgāyā saṃgatā yataḥ

वहाँ, साभ्रमती के शुभ तट पर, दधीचि ने तप किया — जहाँ महापुण्यमयी चंद्रभागा गंगा से मिलती है।

श्लोक 4 (padma.6.155.4)

तत्र स्नानं च दानं जपः पूजा तपस्तथा । सर्वमक्षयतां याति दुग्धतीर्थप्रभावतः

tatra snānaṃ ca dānaṃ japaḥ pūjā tapastathā sarvamakṣayatāṃ yāti dugdhatīrthaprabhāvataḥ

वहाँ स्नान, दान, जप, पूजा तथा तप — सब कुछ दुग्ध-तीर्थ के प्रभाव से अक्षय हो जाता है।

श्लोक 5 (padma.6.155.5)

पार्वत्युवाच। दुग्धेश्वरसमुत्पत्तिं श्रोतुमिच्छामि वै प्रभो । महिमा दुग्धतीर्थस्य कथ्यतां च सुरेश्वर

pārvatyuvāca dugdheśvarasamutpattiṃ śrotumicchāmi vai prabho mahimā dugdhatīrthasya kathyatāṃ ca sureśvara

पार्वती ने कहा — हे प्रभु! मैं दुग्धेश्वर की उत्पत्ति सुनना चाहती हूँ। हे सुरेश्वर! दुग्ध-तीर्थ की महिमा कहिए।

श्लोक 6 (padma.6.155.6)

महादेव उवाच। पुरा देवासुरे युद्धे दैत्यैर्देवाः पराजिताः । पलायनपरा भूत्वा दधीचाश्रममागताः

mahādeva uvāca purā devāsure yuddhe daityairdevāḥ parājitāḥ palāyanaparā bhūtvā dadhīcāśramamāgatāḥ

महादेव ने कहा — पूर्वकाल में देव-असुर युद्ध में देवगण दैत्यों से पराजित हो गए। भागते हुए वे दधीचि के आश्रम में आए।

श्लोक 7 (padma.6.155.7)

मुक्त्वा तत्रायुधान्येव गता देवा दिशो दश । पश्चात्कोलाहलं श्रुत्वा दधीचो दैत्यसंभवम्

muktvā tatrāyudhānyeva gatā devā diśo daśa paścātkolāhalaṃ śrutvā dadhīco daityasaṃbhavam

वहाँ अपने आयुध छोड़कर देवगण दसों दिशाओं में चले गए। बाद में दैत्यों से उत्पन्न कोलाहल सुनकर दधीचि ने,

श्लोक 8 (padma.6.155.8)

पीतवांस्तानि शस्त्राणि जलेनाप्लाय्य भार्गवः । कालेन ते सुराः सर्वे अस्त्राण्यादातुमुत्सुकाः

pītavāṃstāni śastrāṇi jalenāplāyya bhārgavaḥ kālena te surāḥ sarve astrāṇyādātumutsukāḥ

भार्गव ने उन शस्त्रों को जल से अभिमंत्रित करके पी लिया। समय बीतने पर वे सभी देवगण अपने अस्त्र वापस लेने को उत्सुक हुए।

श्लोक 9 (padma.6.155.9)

गुरुणा सहिताः सर्वे परस्परमुदान्विताः । नकुलैः सह सर्पाश्च क्रीडंते ते परस्परम्

guruṇā sahitāḥ sarve parasparamudānvitāḥ nakulaiḥ saha sarpāśca krīḍaṃte te parasparam

गुरु सहित सभी परस्पर हर्षित होकर वहाँ आए — जहाँ नेवले और सर्प परस्पर एक साथ क्रीड़ा कर रहे थे।

श्लोक 10 (padma.6.155.10)

एवंविधान्यनेकानि साश्चर्याणि तदाश्रमे । पश्यंतो विबुधाः सर्वे विस्मयं परमं गताः

evaṃvidhānyanekāni sāścaryāṇi tadāśrame paśyaṃto vibudhāḥ sarve vismayaṃ paramaṃ gatāḥ

उस आश्रम में इस प्रकार के अनेक आश्चर्य देखकर सभी देवगण परम विस्मय को प्राप्त हुए।

श्लोक 11 (padma.6.155.11)

ददृशुस्ते मुनिवरं आसनोपरिसंस्थितम् । यत्र साभ्रमती पुण्या मिलिता चंद्रभागया

dadṛśuste munivaraṃ āsanoparisaṃsthitam yatra sābhramatī puṇyā militā caṃdrabhāgayā

उन्होंने उस मुनिश्रेष्ठ को आसन पर विराजमान देखा — जहाँ पुण्य साभ्रमती चंद्रभागा से मिलती है,

श्लोक 12 (padma.6.155.12)

वर्चसा परमेणैव भ्राजमानं यथा रविम् । विभावसु द्वितीयं च सुवर्चा भार्यया सह

varcasā parameṇaiva bhrājamānaṃ yathā ravim vibhāvasu dvitīyaṃ ca suvarcā bhāryayā saha

परम तेज से सूर्य के समान चमकते हुए, मानो दूसरे अग्नि, अपनी पत्नी सुवर्चा के साथ,

श्लोक 13 (padma.6.155.13)

यथा ब्रह्माहि सावित्र्या तथाऽसौ मुनिसत्तमः । दृष्टः सुरवरैः सर्वैः प्रणिपातपुरःसरम्

yathā brahmāhi sāvitryā tathā'sau munisattamaḥ dṛṣṭaḥ suravaraiḥ sarvaiḥ praṇipātapuraḥsaram

जैसे सावित्री सहित ब्रह्मा हों, वैसे ही उस मुनिश्रेष्ठ को सभी श्रेष्ठ देवताओं ने प्रणाम करते हुए देखा।

श्लोक 14 (padma.6.155.14)

ऊचिरे तं तदा देवा बृहस्पतिपुरोगमाः । त्वं दाता त्रिषु लोकेषु विदितः पूर्वमेव च

ūcire taṃ tadā devā bṛhaspatipurogamāḥ tvaṃ dātā triṣu lokeṣu viditaḥ pūrvameva ca

तब बृहस्पति के नेतृत्व में देवगण ने उनसे कहा — "आप तीनों लोकों में पहले से ही दाता के रूप में विख्यात हैं।

श्लोक 15 (padma.6.155.15)

याच्ञार्थं च वयं सर्वे त्वत्सकाशं समागताः । भयभीता वयं सर्वेऽस्त्राणि नोदातु मर्हसि

yācñārthaṃ ca vayaṃ sarve tvatsakāśaṃ samāgatāḥ bhayabhītā vayaṃ sarve'strāṇi nodātu marhasi

याचना के लिए हम सब आपके समीप आए हैं। हम सब भयभीत हैं — आप हमें हमारे अस्त्र लौटा दें।"

श्लोक 16 (padma.6.155.16)

इत्युक्तो मुनिवर्योऽसौ देवानाह महामतिः । पीतानि तानि भो देवा जलेनाप्लाव्य मंत्रतः

ityukto munivaryo'sau devānāha mahāmatiḥ pītāni tāni bho devā jalenāplāvya maṃtrataḥ

यह सुनकर उस महामति मुनिश्रेष्ठ ने देवताओं से कहा — "हे देवगण! वे शस्त्र मैंने मंत्र सहित जल से अभिमंत्रित करके पी लिए हैं।"

श्लोक 17 (padma.6.155.17)

ततो देवाब्रुवन्विप्रं दैत्यानां निधनाय च । देह्यस्थीनि त्वरा विप्र दत्तानीति द्विजोऽवदत्

tato devābruvanvipraṃ daityānāṃ nidhanāya ca dehyasthīni tvarā vipra dattānīti dvijo'vadat

तब देवताओं ने उस विप्र से कहा — "दैत्यों के वध हेतु शीघ्र अपनी अस्थियाँ दीजिए।" द्विज ने कहा — "दे दी गईं।"

श्लोक 18 (padma.6.155.18)

इत्युक्त्वा तान्स्वपत्नीं स प्रेषयामास चाश्रमम् । तदोवाच द्विजो हृष्टो देवान्स्मित्वा महामतिः

ityuktvā tānsvapatnīṃ sa preṣayāmāsa cāśramam tadovāca dvijo hṛṣṭo devānsmitvā mahāmatiḥ

यह कहकर उन्होंने अपनी पत्नी को आश्रम भेज दिया। तब वह प्रसन्न, महामति द्विज मुस्कुराते हुए देवताओं से बोले —

श्लोक 19 (padma.6.155.19)

पीतानि तानि भो देवा गृह्णीध्वं च यथातथम् । इत्युक्त्वा च द्विजो देवि योगमास्थाय योगवित्

pītāni tāni bho devā gṛhṇīdhvaṃ ca yathātatham ityuktvā ca dvijo devi yogamāsthāya yogavit

"हे देवगण! वे शस्त्र जो मैंने पी लिए थे, उन्हें यथावत् ग्रहण करो।" यह कहकर, हे देवी, वह द्विज योगवेत्ता योग में स्थित हो गए।

श्लोक 20 (padma.6.155.20)

ततोब्रुवन्सुरा विप्रं स्मयं तं छलया गिरा । त्वयि जीवति भो ब्रह्मन्कुतोस्थीनि लभामहे

tatobruvansurā vipraṃ smayaṃ taṃ chalayā girā tvayi jīvati bho brahmankutosthīni labhāmahe

तब देवताओं ने छल भरे शब्दों में विस्मित होकर उस विप्र से कहा — "हे ब्रह्मन्! आपके जीवित रहते हम अस्थियाँ कहाँ से प्राप्त करें?"

श्लोक 21 (padma.6.155.21)

प्रहस्योवाच विप्रर्षिस्तिष्ठध्वं क्षणमेकतः । स्वयमेव च भो देवास्त्यक्ष्याम्यद्य कलेवरम्

prahasyovāca viprarṣistiṣṭhadhvaṃ kṣaṇamekataḥ svayameva ca bho devāstyakṣyāmyadya kalevaram

उस विप्रऋषि ने हँसते हुए कहा — "आप सब एक क्षण ठहरिए। हे देवगण! मैं स्वयं ही आज अपना शरीर त्याग दूँगा।"

श्लोक 22 (padma.6.155.22)

इत्युक्त्वा स द्विजो देवि योगमास्थाय योगवित् । ब्रह्मलोकं गतः सद्यो यतो नावर्त्तते पुनः

ityuktvā sa dvijo devi yogamāsthāya yogavit brahmalokaṃ gataḥ sadyo yato nāvarttate punaḥ

यह कहकर, हे देवी, वह योगवेत्ता द्विज योग में स्थित होकर तत्काल ब्रह्मलोक चले गए, जहाँ से पुनः लौटना नहीं होता।

श्लोक 23 (padma.6.155.23)

ततः सर्वे सुरास्तत्र दृष्ट्वा तं विलयं गतम् । चिंतयंतः सुरगणाः कथं च विशसामहे

tataḥ sarve surāstatra dṛṣṭvā taṃ vilayaṃ gatam ciṃtayaṃtaḥ suragaṇāḥ kathaṃ ca viśasāmahe

तब सभी देवता उन्हें इस प्रकार विलीन हुआ देखकर चिंतित हो गए — "अब हम इनके शरीर से मांस कैसे अलग करें?"

श्लोक 24 (padma.6.155.24)

सुरभिं चाह्वयामास तामुवाच शचीपतिः । कलेवरं द्विजेंद्रस्य लिह त्वं वचसा मम

surabhiṃ cāhvayāmāsa tāmuvāca śacīpatiḥ kalevaraṃ dvijeṃdrasya liha tvaṃ vacasā mama

शचीपति इंद्र ने कामधेनु सुरभि को बुलाया और उससे कहा — "मेरे वचन से तुम इस द्विजेंद्र के शरीर को चाट लो।"

श्लोक 25 (padma.6.155.25)

तथेति च वचो मत्वा तत्क्षणादेव लिह्य तत् । निर्मांसं च कृतं सद्यस्तया धेन्वा कलेवरम्

tatheti ca vaco matvā tatkṣaṇādeva lihya tat nirmāṃsaṃ ca kṛtaṃ sadyastayā dhenvā kalevaram

"ऐसा ही होगा" — उनका वचन स्वीकार कर उसी क्षण उसने उसे चाट लिया, और उस गौ द्वारा वह शरीर तत्काल मांसरहित कर दिया गया।

श्लोक 26 (padma.6.155.26)

जगृहुस्तानि चास्थीनि चक्रुः शस्त्राणि वै सुराः । तस्य वंशोद्भवं त्वस्त्रमासीद्ब्रह्मशिरस्तथा

jagṛhustāni cāsthīni cakruḥ śastrāṇi vai surāḥ tasya vaṃśodbhavaṃ tvastramāsīdbrahmaśirastathā

देवताओं ने उन अस्थियों को लेकर अपने शस्त्र बनाए। उनकी रीढ़ से "ब्रह्मशिरस्" नामक अस्त्र उत्पन्न हुआ।

श्लोक 27 (padma.6.155.27)

शस्त्राण्यस्त्राणि कृत्वा ते महाबलपराक्रमाः । ययुर्देवास्त्वरा युक्ता वृत्रघातनतत्पराः

śastrāṇyastrāṇi kṛtvā te mahābalaparākramāḥ yayurdevāstvarā yuktā vṛtraghātanatatparāḥ

महाबली, महापराक्रमी उन देवताओं ने शस्त्र और अस्त्र बनाकर, शीघ्रतापूर्वक वृत्र-वध के लिए प्रस्थान किया।

श्लोक 28 (padma.6.155.28)

ततः सुवर्चा तु दधीचपत्नी संप्रेषिता या सुरकार्यसिद्धये । विलोकयामास समेत्य तत्र मृतं पतिं देहमथो विशस्तम्

tataḥ suvarcā tu dadhīcapatnī saṃpreṣitā yā surakāryasiddhaye vilokayāmāsa sametya tatra mṛtaṃ patiṃ dehamatho viśastam

तब सुवर्चा, जो देवकार्य-सिद्धि हेतु दधीचि की पत्नी वहाँ से भेज दी गई थी, आकर अपने मृत तथा विदीर्ण पति के शरीर को देखने लगी।

श्लोक 29 (padma.6.155.29)

ज्ञात्वा तु तत्सर्वमथो सुराणां कृत्यं तदानीं च चुकोप साध्वी । ददौ तदा शापमतीव रुष्टा तदा सुवर्चा ऋषिवर्यपत्नी

jñātvā tu tatsarvamatho surāṇāṃ kṛtyaṃ tadānīṃ ca cukopa sādhvī dadau tadā śāpamatīva ruṣṭā tadā suvarcā ṛṣivaryapatnī

देवताओं द्वारा किया गया वह सब कर्म जानकर वह साध्वी क्रुद्ध हो उठी। अत्यंत रुष्ट होकर उस मुनिश्रेष्ठ की पत्नी सुवर्चा ने तब शाप दिया —

श्लोक 30 (padma.6.155.30)

अहो सुरा दुष्टतराश्च सर्वे ह्यनेकशप्ताश्च तथैव लुब्धाः । तस्मात्तु सर्वे ह्यप्रजा भवंतु सेंद्रा सुराद्यप्रभृतीत्युवाच

aho surā duṣṭatarāśca sarve hyanekaśaptāśca tathaiva lubdhāḥ tasmāttu sarve hyaprajā bhavaṃtu seṃdrā surādyaprabhṛtītyuvāca

"हाय! सभी देवता अत्यंत दुष्ट, अनेक बार शाप के योग्य तथा लोभी हैं। इसलिए इंद्र सहित तुम सब आज से अप्रजा (संतानहीन) हो जाओ" — ऐसा उसने कहा।

श्लोक 31 (padma.6.155.31)

एवं शापं ददौ तेषां सुराणां सा तपस्विनी । उपविश्याश्वत्थमूले साभ्रमत्यास्तटे स्थिता

evaṃ śāpaṃ dadau teṣāṃ surāṇāṃ sā tapasvinī upaviśyāśvatthamūle sābhramatyāstaṭe sthitā

इस प्रकार उस तपस्विनी ने उन देवताओं को शाप दिया। फिर साभ्रमती के तट पर पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर,

श्लोक 32 (padma.6.155.32)

सगर्भा सा सती साध्वी स्वोदरं विददार ह । निर्गतो जठराद्गर्भो दधीचस्य महात्मनः

sagarbhā sā satī sādhvī svodaraṃ vidadāra ha nirgato jaṭharādgarbho dadhīcasya mahātmanaḥ

वह गर्भवती, सती, साध्वी ने अपना उदर स्वयं विदीर्ण कर लिया। महात्मा दधीचि के उस गर्भ से पुत्र उत्पन्न हुआ,

श्लोक 33 (padma.6.155.33)

साक्षाद्रुद्रावतारोऽसौ पिप्पलादो महाप्रभुः । प्रहस्य जननी गर्भं उवाच वचनं महत्

sākṣādrudrāvatāro'sau pippalādo mahāprabhuḥ prahasya jananī garbhaṃ uvāca vacanaṃ mahat

जो साक्षात् रुद्र के अवतार, महाप्रभु पिप्पलाद थे। हँसते हुए माता ने उस गर्भ (शिशु) से यह महान वचन कहा —

श्लोक 34 (padma.6.155.34)

सुवर्चा तं पिप्पलादं चिरं तिष्ठास्य सन्निधौ । अश्वत्थस्य महाभाग सर्वेषां शुभदो भव

suvarcā taṃ pippalādaṃ ciraṃ tiṣṭhāsya sannidhau aśvatthasya mahābhāga sarveṣāṃ śubhado bhava

"हे पिप्पलाद! तुम इस पीपल के समीप दीर्घकाल तक स्थित रहो, हे महाभाग, और सबके लिए शुभदायक बनो।"

श्लोक 35 (padma.6.155.35)

तथैव भाषमाणा सा सुवर्चा तनयं प्रति । पतिं प्रत्यगमत्साध्वी परमेन समाधिना

tathaiva bhāṣamāṇā sā suvarcā tanayaṃ prati patiṃ pratyagamatsādhvī paramena samādhinā

अपने पुत्र से इस प्रकार कहते हुए, वह साध्वी सुवर्चा परम समाधि के साथ अपने पति के पास चली गईं।

श्लोक 36 (padma.6.155.36)

एवं दधीचपत्नी सा पतिना स्वर्गमास्थिता । ते देवाः कृतशस्त्रास्त्र दैत्यान्प्रति समुत्सुकाः

evaṃ dadhīcapatnī sā patinā svargamāsthitā te devāḥ kṛtaśastrāstra daityānprati samutsukāḥ

इस प्रकार दधीचि की वह पत्नी अपने पति के साथ स्वर्ग में प्रतिष्ठित हुई। और वे देवगण, शस्त्र-अस्त्र तैयार कर, दैत्यों की ओर उत्सुक हो गए।

श्लोक 37 (padma.6.155.37)

आजग्मुश्चेंद्रमुख्याश्च महाबलपराक्रमाः । कामधेनुः प्रसुस्राव ययौ यत्र द्विजः क्षयम्

ājagmuśceṃdramukhyāśca mahābalaparākramāḥ kāmadhenuḥ prasusrāva yayau yatra dvijaḥ kṣayam

इंद्र-प्रमुख महाबली, महापराक्रमी देवगण वहाँ आए, और कामधेनु ने उसी स्थान पर अपना दूध बहाया, जहाँ वह द्विज (दधीचि) निर्वाण को प्राप्त हुए थे।

श्लोक 38 (padma.6.155.38)

मुनेः प्रभावतो दुग्धं लिंगरूपं व्यजायत । दुग्धेश्वरमिति ख्यातं देवि साभ्रमती तटे

muneḥ prabhāvato dugdhaṃ liṃgarūpaṃ vyajāyata dugdheśvaramiti khyātaṃ devi sābhramatī taṭe

मुनि के प्रभाव से वह दूध लिंग-रूप में परिणत हो गया। हे देवी! साभ्रमती के तट पर वह "दुग्धेश्वर" नाम से विख्यात हुआ।

श्लोक 39 (padma.6.155.39)

तदा प्रभृति तीर्थं हि तन्नाम्ना प्रथितं भुवि । अतुलं यस्य माहात्म्यं श्रवणात्पातकापहम्

tadā prabhṛti tīrthaṃ hi tannāmnā prathitaṃ bhuvi atulaṃ yasya māhātmyaṃ śravaṇātpātakāpaham

उसी समय से यह तीर्थ पृथ्वी पर उसी नाम से प्रसिद्ध हुआ — जिसकी महिमा अतुलनीय है, जिसके श्रवण मात्र से पाप नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 40 (padma.6.155.40)

ये शृण्वंति नरा भक्त्या दुग्धेश्वरसमुद्भवम् । तेऽपि पापविनिर्मुक्ता यांति रुद्रपदं महत्

ye śṛṇvaṃti narā bhaktyā dugdheśvarasamudbhavam te'pi pāpavinirmuktā yāṃti rudrapadaṃ mahat

जो मनुष्य भक्तिपूर्वक दुग्धेश्वर की इस उत्पत्ति-कथा को सुनते हैं, वे भी पाप से मुक्त होकर रुद्र के महान पद को प्राप्त करते हैं।

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