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उत्तर खण्ड · अध्याय 157

पिप्पलाद तीर्थ महात्म्य

अध्याय 156अध्याय-सूचीअध्याय 158

श्लोक 1 (padma.6.157.1)

महादेव उवाच। दुग्धेश्वरसमीपे तु तीर्थं चातीवपावनम् । रम्यं तत्पिप्पलादस्य नाम्ना वै प्रथितं भुवि

mahādeva uvāca dugdheśvarasamīpe tu tīrthaṃ cātīvapāvanam ramyaṃ tatpippalādasya nāmnā vai prathitaṃ bhuvi

महादेव ने कहा — दुग्धेश्वर के समीप एक अत्यंत पवित्र, रमणीय तीर्थ है, जो पिप्पलाद के नाम से पृथ्वी पर विख्यात है।

श्लोक 2 (padma.6.157.2)

यत्र कृत्वा तपः पूर्वं मातुर्वचनतो मुनिः । उत्पादयामास कृत्यां वडवानलसम्मिताम्

yatra kṛtvā tapaḥ pūrvaṃ māturvacanato muniḥ utpādayāmāsa kṛtyāṃ vaḍavānalasammitām

जहाँ पूर्वकाल में माता के वचन से मुनि ने तप करके वडवानल के समान एक कृत्या (सृजित शक्ति) उत्पन्न की,

श्लोक 3 (padma.6.157.3)

पितुरानृण्यमन्विच्छन्दधीचस्य महात्मनः । तत्र स्नात्वा च पीत्वा च ब्रह्महत्यां व्यपोहति

piturānṛṇyamanvicchandadhīcasya mahātmanaḥ tatra snātvā ca pītvā ca brahmahatyāṃ vyapohati

महात्मा दधीचि, अपने पिता के ऋण से उऋण होने की इच्छा से। वहाँ स्नान करके तथा जल पीकर मनुष्य ब्रह्महत्या को भी दूर कर देता है।

श्लोक 4 (padma.6.157.4)

साभ्रमत्यास्तटे गुप्तं पिप्पलादं सुरेश्वरम् । तत्र स्नात्वा तु भो देवि मुक्तिभागी भवेन्नरः

sābhramatyāstaṭe guptaṃ pippalādaṃ sureśvaram tatra snātvā tu bho devi muktibhāgī bhavennaraḥ

साभ्रमती के तट पर गुप्त रूप से देव पिप्पलाद विराजमान हैं। हे देवी! वहाँ स्नान करके मनुष्य मुक्तिभागी होता है।

श्लोक 5 (padma.6.157.5)

आरोपणं पिप्पलानां कर्त्तव्यं विधिपूर्वकम् । कृते सति महादेवि मुच्यते कर्मबंधनात्

āropaṇaṃ pippalānāṃ karttavyaṃ vidhipūrvakam kṛte sati mahādevi mucyate karmabaṃdhanāt

वहाँ विधिपूर्वक पीपल के वृक्षों का रोपण करना चाहिए। हे महादेवी! ऐसा करने से मनुष्य कर्म-बंधन से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 6 (padma.6.157.6)

पार्वत्युउवाच। किमर्थं सा तु कृत्या वै उत्पन्ना तां निबोधय । तया वै कृत्यया पूर्वं किं कृतं वद मे प्रभो

pārvatyuuvāca kimarthaṃ sā tu kṛtyā vai utpannā tāṃ nibodhaya tayā vai kṛtyayā pūrvaṃ kiṃ kṛtaṃ vada me prabho

पार्वती ने कहा — वह कृत्या किसलिए उत्पन्न हुई, यह मुझे बताइए। हे प्रभु! उस कृत्या ने पूर्वकाल में क्या किया, यह कहिए,

श्लोक 7 (padma.6.157.7)

येन पुत्रेण सा नीता पितुरानृण्यकारणात्

yena putreṇa sā nītā piturānṛṇyakāraṇāt

जिस पुत्र द्वारा पिता का ऋण चुकाया गया, उसका कारण भी बताइए।

श्लोक 8 (padma.6.157.8)

महादेव उवाच। दाधीचो ऋषिवर्योऽसौ ह्यागतस्तपकारणात् । अत्र तेन महत्तप्तमृषिणा परमात्मना

mahādeva uvāca dādhīco ṛṣivaryo'sau hyāgatastapakāraṇāt atra tena mahattaptamṛṣiṇā paramātmanā

महादेव ने कहा — दधीचि के वे मुनिश्रेष्ठ पुत्र तप के हेतु यहाँ आए। यहाँ उस परमात्म-लीन ऋषि ने महान तप किया।

श्लोक 9 (padma.6.157.9)

तत्र कोलासुरो नाम विघ्नार्थं वै समागतः । तेन विघ्नं बहुतरं कृतं वै नात्र संशयः

tatra kolāsuro nāma vighnārthaṃ vai samāgataḥ tena vighnaṃ bahutaraṃ kṛtaṃ vai nātra saṃśayaḥ

वहाँ कोल नामक असुर विघ्न डालने के लिए आया। उसने अनेक विघ्न उत्पन्न किए, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 10 (padma.6.157.10)

तद्दृष्टं तु सुपुत्रेण कहोडेन च धीमता । कृत्या ह्युत्पादिता तत्र हननार्थं सुरेश्वरि

taddṛṣṭaṃ tu suputreṇa kahoḍena ca dhīmatā kṛtyā hyutpāditā tatra hananārthaṃ sureśvari

यह देखकर उस बुद्धिमान श्रेष्ठ पुत्र कहोड (पिप्पलाद) ने, हे सुरेश्वरी, उसके वध हेतु वहाँ एक कृत्या उत्पन्न की।

श्लोक 11 (padma.6.157.11)

तया वै निहतो दैत्यः कोलो नाम महासुरः । तस्मात्तीर्थं महज्जातं कलौ गुप्तं तु पार्वति

tayā vai nihato daityaḥ kolo nāma mahāsuraḥ tasmāttīrthaṃ mahajjātaṃ kalau guptaṃ tu pārvati

उसके द्वारा कोल नामक वह महाअसुर मारा गया। इससे यहाँ एक महान तीर्थ उत्पन्न हुआ — किंतु, हे पार्वती, यह कलियुग में गुप्त है।

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