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उत्तर खण्ड · अध्याय 16

जालंधर का मायारूप-परित्याग

अध्याय 15अध्याय-सूचीअध्याय 17

श्लोक 1 (padma.6.16.1)

युधिष्ठिर उवाच। कथं जालंधरो गौरीं हररूपधरो मुने । दृष्ट्वा चकार किं तत्र तन्मे कथय विस्तरात्

yudhiṣṭhira uvāca kathaṁ jālaṁdharo gaurīṁ hararūpadharo mune dṛṣṭvā cakāra kiṁ tatra tanme kathaya vistarāt

युधिष्ठिर ने कहा — हे मुने! हर का रूप धारण किए जालंधर ने गौरी को देखकर वहाँ क्या किया? वह मुझे विस्तार से बताइए।

श्लोक 2 (padma.6.16.2)

नारद उवाच ।यदा मायाशिवस्तत्र प्रार्थयद्गिरिजां प्रति । ततः सा चुक्षुभे राजन्किंचिन्नोवाच तं प्रति

nārada uvāca yadā māyāśivastatra prārthayadgirijāṁ prati tataḥ sā cukṣubhe rājankiṁcinnovāca taṁ prati

नारद ने कहा — जब वह मायावी शिव वहाँ गिरिजा से प्रार्थना करने लगा, तो हे राजन्! वे व्याकुल हो गईं, पर उसे कुछ भी उत्तर नहीं दिया।

श्लोक 3 (padma.6.16.3)

अनातुरस्य देवस्य प्राप्तस्य तपसा मया । न युक्तमिति निश्चित्य पार्वती नाह तं नृप

anāturasya devasya prāptasya tapasā mayā na yuktamiti niścitya pārvatī nāha taṁ nṛpa

यह निश्चय करके कि जो देव पीड़ारहित हैं और मेरे ही तप से प्राप्त हुए हैं, उन पर संदेह करना उचित नहीं है, हे राजन्! पार्वती ने उससे कुछ नहीं कहा।

श्लोक 4 (padma.6.16.4)

सा न तत्र प्रतीकारं दृष्ट्वा तस्य च पश्यतः । निर्गता तत उत्थाय ददर्शाकाशवाहिनीम्

sā na tatra pratīkāraṁ dṛṣṭvā tasya ca paśyataḥ nirgatā tata utthāya dadarśākāśavāhinīm

वहाँ इसका कोई उपाय न पाकर, उसके देखते-देखते ही, वे उठकर वहाँ से चली गईं, और आकाश-गंगा को देखा।

श्लोक 5 (padma.6.16.5)

गंगां वासोचितां मत्वा भवानी तपसे ययौ । पुरापि तपसा लब्धो मयेशः सांप्रतं तथा

gaṁgāṁ vāsocitāṁ matvā bhavānī tapase yayau purāpi tapasā labdho mayeśaḥ sāṁprataṁ tathā

गंगा को निवास के योग्य मानकर भवानी तप के लिए वहाँ गईं — 'पहले भी तप से ही मैंने ईश्वर को पाया था, अब भी वैसे ही पाऊँगी।'

श्लोक 6 (padma.6.16.6)

इत्यव्रजच्चिंतयती सखीभिः सहिता ततः । पुरः क्षीरनिभां राजन्पार्वती गगनात्परम्

ityavrajacciṁtayatī sakhībhiḥ sahitā tataḥ puraḥ kṣīranibhāṁ rājanpārvatī gaganātparam

ऐसा सोचती हुई, सखियों सहित, हे राजन्! पार्वती आगे बढ़ीं, और आकाश से परे दूध के समान कुछ देखा —

श्लोक 7 (padma.6.16.7)

मंदाकिनीं ददर्शाथ पतंतीं मानसोत्तरे । हारमालामिवायांतीं विविक्तां गगनस्रजः

maṁdākinīṁ dadarśātha pataṁtīṁ mānasottare hāramālāmivāyāṁtīṁ viviktāṁ gaganasrajaḥ

उन्होंने मानसोत्तर पर गिरती हुई मंदाकिनी को देखा, मानो आकाश से आती एक अलग-थलग मोतियों की माला हो।

श्लोक 8 (padma.6.16.8)

मंदाकिन्याः पयःपूरो ह्याकृष्टः स्वर्गतो यथा । श्रुतीनां पूरधारेव ब्रह्मणो वदनच्युता

maṁdākinyāḥ payaḥpūro hyākṛṣṭaḥ svargato yathā śrutīnāṁ pūradhāreva brahmaṇo vadanacyutā

मंदाकिनी की जलधारा मानो स्वर्ग से खींच लाई गई हो, ब्रह्मा के मुख से झरती वेद-श्रुतियों की धारा के समान थी।

श्लोक 9 (padma.6.16.9)

दृष्ट्वा मुमोद तां गंगां स्नात्वा चालिसमन्विता । संपूज्य स्वतनुं पश्चान्निविष्टा स्वर्णदीतटे

dṛṣṭvā mumoda tāṁ gaṁgāṁ snātvā cālisamanvitā saṁpūjya svatanuṁ paścānniviṣṭā svarṇadītaṭe

उस गंगा को देखकर वे प्रसन्न हुईं, और सखियों सहित उसमें स्नान किया; फिर अपने शरीर की पूजा करके स्वर्ण-नदी के तट पर बैठ गईं।

श्लोक 10 (padma.6.16.10)

परस्परमथालोक्य गौरी प्राह सखीं जयाम् । त्वं गच्छ मद्वपुः कृत्वा तत्समीपं सखी त्वरा

parasparamathālokya gaurī prāha sakhīṁ jayām tvaṁ gaccha madvapuḥ kṛtvā tatsamīpaṁ sakhī tvarā

तब एक-दूसरे को देखकर गौरी ने अपनी सखी जया से कहा — 'तुम मेरा ही रूप धारण करके शीघ्र उसके पास जाओ, हे सखी।

श्लोक 11 (padma.6.16.11)

जानीहि तत्वं किं शंभुर्यदि वान्यो भविष्यति । यद्यसौ त्वां समालिंग्य कुरुते चुंबनादिकम्

jānīhi tatvaṁ kiṁ śaṁbhuryadi vānyo bhaviṣyati yadyasau tvāṁ samāliṁgya kurute cuṁbanādikam

जानो कि सचमुच वह शंभु है या कोई और है। यदि वह तुम्हें आलिंगन करके चुंबन आदि करने लगे,

श्लोक 12 (padma.6.16.12)

तदा मायां समास्थाय जानीह्यसुरमागतम् । यदि चेत्त्वां प्रतिब्रूयान्मन्निमित्तं शुभाशुभम्

tadā māyāṁ samāsthāya jānīhyasuramāgatam yadi cettvāṁ pratibrūyānmannimittaṁ śubhāśubham

तो अपनी ही एक माया रचकर जान लेना कि कोई असुर आया है। परंतु यदि वह मेरे विषय में शुभ-अशुभ के बारे में तुम्हें पूछे,

श्लोक 13 (padma.6.16.13)

असंशयं पिनाकी स्यादत्रागत्य ब्रवीहि माम् । इत्यादिष्टा जया देव्या गता गंगाधरांतिकम्

asaṁśayaṁ pinākī syādatrāgatya bravīhi mām ityādiṣṭā jayā devyā gatā gaṁgādharāṁtikam

तो निःसंदेह वह पिनाकी ही होंगे — यहाँ आकर मुझे बताना।' इस प्रकार देवी से आदेश पाकर जया गंगाधर के पास गई।

श्लोक 14 (padma.6.16.14)

तामायांतीं स दृष्ट्वा च भृशं मन्मथपीडितः । चकारालिंगनं तस्या गौरीरूपेण भावयन्

tāmāyāṁtīṁ sa dṛṣṭvā ca bhṛśaṁ manmathapīḍitaḥ cakārāliṁganaṁ tasyā gaurīrūpeṇa bhāvayan

उसे आती देखकर, कामवेदना से अत्यंत पीड़ित होकर, उसने उसे गौरी का ही रूप मानते हुए आलिंगन किया।

श्लोक 15 (padma.6.16.15)

ततो जालंधरः सद्यो वीर्यं स्वं प्रमुमोचह । अल्पेंद्रियश्च संजातो वेगतः कुरुनंदन

tato jālaṁdharaḥ sadyo vīryaṁ svaṁ pramumocaha alpeṁdriyaśca saṁjāto vegataḥ kurunaṁdana

तब जालंधर ने तत्काल ही अपना वीर्य त्याग दिया; और हे कुरुनंदन! वेगपूर्वक वह इंद्रियों से क्षीण हो गया।

श्लोक 16 (padma.6.16.16)

तया सप्रोदितो दैत्य न त्वं रुद्रो भविष्यसि । अल्पवीर्योऽधमाचारो नाहं गौरी हि तत्सखी

tayā saprodito daitya na tvaṁ rudro bhaviṣyasi alpavīryo'dhamācāro nāhaṁ gaurī hi tatsakhī

उसने उससे कहा — 'हे दैत्य! तुम कभी रुद्र नहीं बन सकते — क्षीण वीर्य वाले, नीच आचरण वाले; मैं गौरी नहीं, उनकी सखी हूँ।'

श्लोक 17 (padma.6.16.17)

इत्युक्त्वा निजमास्थाय रूपं सा प्राह तं पुनः । अनेन बत पापेन हतस्त्वं हि पिनाकिना

ityuktvā nijamāsthāya rūpaṁ sā prāha taṁ punaḥ anena bata pāpena hatastvaṁ hi pinākinā

यह कहकर अपना ही रूप धारण करके उसने फिर उससे कहा — 'हाय! इस पापकर्म से तुम सचमुच पिनाकी के हाथों मारे जाओगे।'

श्लोक 18 (padma.6.16.18)

इति ज्ञात्वा च सा प्राप्ता तत्र गत्वाब्रवीदुमाम् । देवि जालंधरो ह्येष न शंभुस्तव वल्लभः

iti jñātvā ca sā prāptā tatra gatvābravīdumām devi jālaṁdharo hyeṣa na śaṁbhustava vallabhaḥ

यह जानकर वह वहाँ पहुँचकर उमा से बोली — 'हे देवी! यह जालंधर ही है, आपका प्रियतम शंभु नहीं है।'

श्लोक 19 (padma.6.16.19)

ततो भयार्ता हरवल्लभाभूद्द्रुतं विवेशाथ सरोजमध्ये । सख्यो भ्रमर्यः कमलेषु जाता भयेन जालंधरजेन राजन्

tato bhayārtā haravallabhābhūddrutaṁ viveśātha sarojamadhye sakhyo bhramaryaḥ kamaleṣu jātā bhayena jālaṁdharajena rājan

तब भय से व्याकुल हर की प्रिया शीघ्र ही कमलों के बीच प्रविष्ट हो गईं; हे राजन्! जालंधर के भय से उनकी सखियाँ भ्रमरियाँ बन गईं।

श्लोक 20 (padma.6.16.20)

अत्रांतरे वनगतामदृष्ट्वा तां नृपांगनाम् । भीतास्तु रक्षकास्तस्याः सत्वरं रणमाययुः

atrāṁtare vanagatāmadṛṣṭvā tāṁ nṛpāṁganām bhītāstu rakṣakāstasyāḥ satvaraṁ raṇamāyayuḥ

इसी बीच वन में उस राजरानी (वृंदा) को न पाकर, उसके भयभीत रक्षक तुरंत युद्ध-भूमि की ओर गए।

श्लोक 21 (padma.6.16.21)

ततः शुंभेन ते पृष्टास्तं नत्वोचुः ससाध्वसाः । आत्मनः परिहारार्थो विष्णुमित्यसुरेश्वरम्

tataḥ śuṁbhena te pṛṣṭāstaṁ natvocuḥ sasādhvasāḥ ātmanaḥ parihārārtho viṣṇumityasureśvaram

तब शुंभ द्वारा पूछे जाने पर उन्होंने भयभीत होकर प्रणाम करके, अपने बचाव के लिए, विष्णु को असुरेश्वर बताते हुए यह वृत्तांत सुनाया।

श्लोक 22 (padma.6.16.22)

श्रुत्वा वृंदां हृतां त्रस्तो रुद्रात्त्यक्त्वाथ संगरम् । शुंभेन प्रेषितौ चंडमुंडौ जालंधरं प्रति

śrutvā vṛṁdāṁ hṛtāṁ trasto rudrāttyaktvātha saṁgaram śuṁbhena preṣitau caṁḍamuṁḍau jālaṁdharaṁ prati

वृंदा के हर लिए जाने की बात सुनकर भयभीत शुंभ ने रुद्र के साथ चल रहा युद्ध छोड़कर, चंड और मुंड को जालंधर के पास भेजा।

श्लोक 23 (padma.6.16.23)

मानसोत्तरमागत्य दानवौ वेगवत्तरौ । हररूपधरं दैत्यं ऊचतुर्विटपान्तरे

mānasottaramāgatya dānavau vegavattarau hararūpadharaṁ daityaṁ ūcaturviṭapāntare

अत्यंत वेगवान वे दोनों दानव मानसोत्तर पहुँचकर, हर का रूप धारण किए उस दैत्य से वृक्षों के बीच बोले —

श्लोक 24 (padma.6.16.24)

किं तया नृपशार्दूल विदेशगतया श्रिया । अरयो यां न पश्यंति बंधुभिर्या न भुज्यते

kiṁ tayā nṛpaśārdūla videśagatayā śriyā arayo yāṁ na paśyaṁti baṁdhubhiryā na bhujyate

'हे नृपश्रेष्ठ! उस श्री (लक्ष्मी-सम पत्नी) से क्या लाभ, जो विदेश चली गई हो, जिसे शत्रु देख रहे हों और जिसे अपने ही न भोगें?

श्लोक 25 (padma.6.16.25)

जितः शुंभो हतं सैन्यं देव रुद्रेण ते रणे । एह्येहि कुरु संग्रामं न त्वं प्राप्नोषि पार्वतीम्

jitaḥ śuṁbho hataṁ sainyaṁ deva rudreṇa te raṇe ehyehi kuru saṁgrāmaṁ na tvaṁ prāpnoṣi pārvatīm

शुंभ पराजित हो चुका है, हे देव! युद्ध में रुद्र ने आपकी सेना नष्ट कर दी है। आइए, आइए, युद्ध कीजिए! इस प्रकार आप पार्वती को कभी नहीं पा सकेंगे।

श्लोक 26 (padma.6.16.26)

पंचाननस्य महिषीं कथं प्राप्नोति जंबुकः । अंधकारः कथं राजन्प्राप्नोति सवितुः प्रभाम्

paṁcānanasya mahiṣīṁ kathaṁ prāpnoti jaṁbukaḥ aṁdhakāraḥ kathaṁ rājanprāpnoti savituḥ prabhām

सिंह की रानी को भला सियार कैसे पा सकता है? हे राजन्! अंधकार सूर्य की प्रभा को कैसे पा सकता है?

श्लोक 27 (padma.6.16.27)

तव जालंधरात्पीठाद्धृता राज्ञी मुरारिणा । इति संश्रूयते वार्ता तस्मात्त्वं कुरु संगरम्

tava jālaṁdharātpīṭhāddhṛtā rājñī murāriṇā iti saṁśrūyate vārtā tasmāttvaṁ kuru saṁgaram

आपकी रानी को आपके ही जालंधर-पीठ से मुरारि (विष्णु) ने हर लिया है — यह समाचार सब ओर सुना जा रहा है; इसलिए आपको युद्ध करना चाहिए।

श्लोक 28 (padma.6.16.28)

रणे शर्वं विजित्याशु भव सर्वेश्वरेश्वरः । अथवा शिवनाराचैः खंडितो यासि तत्पदम्

raṇe śarvaṁ vijityāśu bhava sarveśvareśvaraḥ athavā śivanārācaiḥ khaṁḍito yāsi tatpadam

युद्ध में शीघ्र ही शर्व को जीतकर सर्वेश्वरों के भी ईश्वर बनिए; अन्यथा शिव के बाणों से खंडित होकर उन्हीं के पद को प्राप्त कीजिए।'

श्लोक 29 (padma.6.16.29)

इति जालंधरः श्रुत्वा भाषितं चंडमुंडयोः । निःससार गिरेस्तस्मात्सक्रोधं रक्तलोचनः

iti jālaṁdharaḥ śrutvā bhāṣitaṁ caṁḍamuṁḍayoḥ niḥsasāra girestasmātsakrodhaṁ raktalocanaḥ

चंड और मुंड की यह बात सुनकर जालंधर, आँखें रक्त-लाल किए क्रोध से, तुरंत उस पर्वत से उतर आया।

श्लोक 30 (padma.6.16.30)

चंडमुंडौ समाश्वास्य त्यक्त्वा रूपं हरस्य च । गच्छञ्जालंधरो मार्गे दुर्वारणमुवाच ह

caṁḍamuṁḍau samāśvāsya tyaktvā rūpaṁ harasya ca gacchañjālaṁdharo mārge durvāraṇamuvāca ha

चंड-मुंड को सांत्वना देकर, हर का रूप त्यागकर, मार्ग में जाते हुए जालंधर ने दुर्वारण से कहा —

श्लोक 31 (padma.6.16.31)

पश्य दुर्वारणेदानीं तत्र यद्विष्णुना कृतम् । मायामाश्रित्य सा राज्ञी वृंदा नीतात्मनः पदम्

paśya durvāraṇedānīṁ tatra yadviṣṇunā kṛtam māyāmāśritya sā rājñī vṛṁdā nītātmanaḥ padam

'हे दुर्वारण! अब देखो, विष्णु ने वहाँ क्या किया — वह रानी वृंदा माया के सहारे उसी के धाम ले जाई गई है।

श्लोक 32 (padma.6.16.32)

गृहे स्थितस्य जामातुर्विश्वसेन्नैव बुद्धिमान् । नूनं तस्मै प्रदत्वा च कन्यकां विसृजेद्बुधः

gṛhe sthitasya jāmāturviśvasennaiva buddhimān nūnaṁ tasmai pradatvā ca kanyakāṁ visṛjedbudhaḥ

बुद्धिमान व्यक्ति को अपने ही घर में रहने वाले जामाता (दामाद) पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए; निश्चय ही उसे कन्या देकर विदा कर देना ही ठीक है।

श्लोक 33 (padma.6.16.33)

जामातरं गृहे नैव स्थापयेत्सर्वथा नरः । धनदारादिकं सर्वं स गृह्णाति शनैः शनैः

jāmātaraṁ gṛhe naiva sthāpayetsarvathā naraḥ dhanadārādikaṁ sarvaṁ sa gṛhṇāti śanaiḥ śanaiḥ

मनुष्य को कभी भी जामाता को घर में नहीं रखना चाहिए; वह धीरे-धीरे धन, पत्नी आदि सब कुछ हर लेता है।'

श्लोक 34 (padma.6.16.34)

दुर्वारण उवाच ।राजन्यत्क्रियते कर्म तत्तथैव तु भुज्यते । त्वं हर्तुमागतो गौरीं हरिणा ते हृता वधूः । तस्य स्पष्टं वचः श्रुत्वा क्षणं मौनी व्यचिंतयत्

durvāraṇa uvāca rājanyatkriyate karma tattathaiva tu bhujyate tvaṁ hartumāgato gaurīṁ hariṇā te hṛtā vadhūḥ tasya spaṣṭaṁ vacaḥ śrutvā kṣaṇaṁ maunī vyaciṁtayat

दुर्वारण ने कहा — 'हे राजन्! जो कर्म किया जाता है, वैसा ही फल भोगा जाता है। आप गौरी को हरने आए, और हरि ने आपकी ही पत्नी हर ली।' उसकी यह स्पष्ट बात सुनकर वह क्षणभर चुप होकर विचारने लगा।

श्लोक 35 (padma.6.16.35)

जालंधर उवाच ।किं प्रयामि हरं जेतुमथवा हरिमुल्बणम् । कार्यद्वये समुत्पन्ने यत्परं तत्प्रकथ्यताम्

jālaṁdhara uvāca kiṁ prayāmi haraṁ jetumathavā harimulbaṇam kāryadvaye samutpanne yatparaṁ tatprakathyatām

जालंधर ने कहा — 'क्या मैं हर को जीतने जाऊँ, या उस दुर्दांत हरि को? दो कार्य एक साथ आ खड़े हुए हैं — बताओ, इनमें कौन-सा बड़ा है?'

श्लोक 36 (padma.6.16.36)

दुर्वारण उवाच ।यदि यासि हरिं जेतुं हरः पृष्ठे हनिष्यति । हनिष्यंति रणे शूरा यातुं रुद्रो न दास्यति

durvāraṇa uvāca yadi yāsi hariṁ jetuṁ haraḥ pṛṣṭhe haniṣyati haniṣyaṁti raṇe śūrā yātuṁ rudro na dāsyati

दुर्वारण ने कहा — 'यदि आप हरि को जीतने जाएँगे, तो हर पीछे से आघात करेंगे; युद्ध में वीरगण आपको मार डालेंगे, रुद्र आपको जाने नहीं देंगे।

श्लोक 37 (padma.6.16.37)

तस्मात्पशुपतिं जित्वा कृत्वा त्वं वश्यमात्मनः । पश्चात्प्रयाहि गोविंदं यदि जानासि तत्पदम्

tasmātpaśupatiṁ jitvā kṛtvā tvaṁ vaśyamātmanaḥ paścātprayāhi goviṁdaṁ yadi jānāsi tatpadam

इसलिए पहले पशुपति को जीतकर, उन्हें अपने वश में करके, फिर गोविंद के पास जाइए, यदि आप उनका स्थान जानते हों।

श्लोक 38 (padma.6.16.38)

अधुना सत्वरं वीर याहि दैत्यान्महाबलान् । रणं कुरु महाघोरं यथा स्वर्गे सुपच्यते

adhunā satvaraṁ vīra yāhi daityānmahābalān raṇaṁ kuru mahāghoraṁ yathā svarge supacyate

अब शीघ्र, हे वीर! अपने महाबली दैत्यों के पास जाइए; ऐसा भीषण युद्ध कीजिए कि स्वर्ग में भी उसकी चर्चा हो।'

श्लोक 39 (padma.6.16.39)

देशकालोचितं श्रुत्वा दुर्वारणवचस्तदा । ययौ जालंधरो योद्धुं सह रुद्रेण योगिना

deśakālocitaṁ śrutvā durvāraṇavacastadā yayau jālaṁdharo yoddhuṁ saha rudreṇa yoginā

देश-काल के अनुकूल दुर्वारण का यह वचन सुनकर तब जालंधर योगी रुद्र से युद्ध करने के लिए चल पड़ा।

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