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उत्तर खण्ड · अध्याय 17

शुक्र का योनि-प्रवेश

अध्याय 16अध्याय-सूचीअध्याय 18

श्लोक 1 (padma.6.17.1)

नारद उवाच ।अथ जालंधरोऽपश्यत्कबंधचयभीषणम् । रणं रुधिरमांसौघ मज्जा मेदोऽस्थिदुर्गमम्

nārada uvāca atha jālaṁdharo'paśyatkabaṁdhacayabhīṣaṇam raṇaṁ rudhiramāṁsaugha majjā medo'sthidurgamam

नारद ने कहा — तब जालंधर ने कटे धड़ों के ढेर से भयानक, रक्त-मांस-मज्जा-चर्बी-हड्डियों से दुर्गम उस युद्ध-भूमि को देखा।

श्लोक 2 (padma.6.17.2)

तत्र जालंधरो दैत्यः प्रियाहरणदुःखितः । रणे विलोकयामास वृषस्थं पार्वतीपतिम्

tatra jālaṁdharo daityaḥ priyāharaṇaduḥkhitaḥ raṇe vilokayāmāsa vṛṣasthaṁ pārvatīpatim

वहाँ प्रिया के हरण से दुःखी दैत्य जालंधर ने युद्ध में बैल पर सवार पार्वतीपति को देखा।

श्लोक 3 (padma.6.17.3)

घोराहिभोगेनविभूषितांगं जटाकलापे शशिभूषणांकितम् । नेत्राग्निकीलोपरिशोभितांगं विना रणं संप्रददर्श सिंधुजः

ghorāhibhogenavibhūṣitāṁgaṁ jaṭākalāpe śaśibhūṣaṇāṁkitam netrāgnikīlopariśobhitāṁgaṁ vinā raṇaṁ saṁpradadarśa siṁdhujaḥ

भयानक सर्पों के फणों से सुशोभित अंगों वाले, जटाजूट में चंद्रमा के आभूषण से चिह्नित, नेत्राग्नि की ज्वाला के ऊपर शोभित अंगों वाले — उस सागर-पुत्र ने युद्ध के बिना ही उन्हें देखा (अर्थात् वे युद्ध से पृथक्, शांत खड़े थे)।

श्लोक 4 (padma.6.17.4)

शीघ्रं स्वरथमारुह्य समुद्रतनयस्तदा । संरुष्टः प्राह तं शुंभं तापसो न हतस्त्वया

śīghraṁ svarathamāruhya samudratanayastadā saṁruṣṭaḥ prāha taṁ śuṁbhaṁ tāpaso na hatastvayā

तुरंत अपने रथ पर सवार होकर सागर-पुत्र ने क्रोध से शुंभ से कहा — 'क्या वह तपस्वी अभी तक तुमसे मारा नहीं गया?'

श्लोक 5 (padma.6.17.5)

प्राह जालंधरं शुंभस्तपस्तेन महत्कृतम् । हंतुं न शक्यतेऽस्माभिर्हरः संग्रामदुर्जयः

prāha jālaṁdharaṁ śuṁbhastapastena mahatkṛtam haṁtuṁ na śakyate'smābhirharaḥ saṁgrāmadurjayaḥ

शुंभ ने जालंधर से कहा — 'उसने महान तप किया है; हर को हम मार नहीं सकते — वह युद्ध में अजेय है।'

श्लोक 6 (padma.6.17.6)

इतिशुंभोक्तमाकर्ण्यसिंधुजःक्रोधमूर्च्छितः । हरं पद्मसहस्रेण दैत्यसैन्येन संवृतम्

itiśuṁbhoktamākarṇyasiṁdhujaḥkrodhamūrcchitaḥ haraṁ padmasahasreṇa daityasainyena saṁvṛtam

शुंभ की यह बात सुनकर, क्रोध से व्याकुल सागर-पुत्र ने हर को हज़ार महापद्म दैत्य-सेना से घिरा हुआ देखा।

श्लोक 7 (padma.6.17.7)

गृहीत्वा कालकेदारं धनुर्जालंधरो ययौ । बाणांस्तीक्ष्णानतिस्थूलान्लोहस्तंभान्तथा बहून्

gṛhītvā kālakedāraṁ dhanurjālaṁdharo yayau bāṇāṁstīkṣṇānatisthūlānlohastaṁbhāntathā bahūn

अपना कालकेदार नामक धनुष उठाकर जालंधर आगे बढ़ा; तीक्ष्ण, अत्यंत मोटे बाण, मानो अनेक लौह-स्तंभ हों,

श्लोक 8 (padma.6.17.8)

मुमोच युधि दुर्धर्षो वर्षन्मेघ इवागमे । आयांतं रुरुधुः सिंधुसूनुं शंभुगणा युधि

mumoca yudhi durdharṣo varṣanmegha ivāgame āyāṁtaṁ rurudhuḥ siṁdhusūnuṁ śaṁbhugaṇā yudhi

उस दुर्धर्ष ने युद्ध में इस तरह छोड़े जैसे वर्षा के आरंभ में मेघ बरसता है। आते हुए सागर-पुत्र को शंभु के गणों ने युद्ध में रोक दिया।

श्लोक 9 (padma.6.17.9)

ततो रुद्रेण रौद्रैश्च शरौघैस्ताडितो रुषा । रुद्रबाणैस्तदा तस्य कवचं भुवि पातितम्

tato rudreṇa raudraiśca śaraughaistāḍito ruṣā rudrabāṇaistadā tasya kavacaṁ bhuvi pātitam

तब रुद्र के भीषण बाणों की झड़ी से क्रोधपूर्वक आहत होकर, रुद्र के ही बाणों से उसका कवच पृथ्वी पर गिरा दिया गया।

श्लोक 10 (padma.6.17.10)

विवर्मापि बभौ सोऽथ मेघमुक्तो यथाचलः । पुनर्जालंधरस्यांगं शंभुना कीलितं शरैः

vivarmāpi babhau so'tha meghamukto yathācalaḥ punarjālaṁdharasyāṁgaṁ śaṁbhunā kīlitaṁ śaraiḥ

कवच-रहित होकर भी वह ऐसे शोभित हुआ जैसे बादल से मुक्त हुआ पर्वत; फिर शंभु ने जालंधर के शरीर को बाणों से बींध डाला।

श्लोक 11 (padma.6.17.11)

रुधिरं बहु सुस्राव जालंधरशरीरतः । तेनाशु रुधिरौघेण प्लाविता सकला मही

rudhiraṁ bahu susrāva jālaṁdharaśarīrataḥ tenāśu rudhiraugheṇa plāvitā sakalā mahī

जालंधर के शरीर से बहुत रक्त बहने लगा; उस रक्त की बाढ़ से समूची पृथ्वी शीघ्र ही आप्लावित हो गई।

श्लोक 12 (padma.6.17.12)

ततो देवा भयं जग्मुर्दानवाश्च चकंपिरे । त्यक्त्वा ते प्रमथा वीरा रणभूमिं प्रदुद्रुवुः

tato devā bhayaṁ jagmurdānavāśca cakaṁpire tyaktvā te pramathā vīrā raṇabhūmiṁ pradudruvuḥ

तब देवता भयभीत हो उठे और दानव काँप उठे; वे वीर प्रमथगण युद्ध-भूमि छोड़कर भाग खड़े हुए।

श्लोक 13 (padma.6.17.13)

नद्या इव परा मूर्त्तिः प्रसृता सर्वतोऽपि च । अथाहार्णवजो रुद्रं धनुर्धर वरो ह्यसि

nadyā iva parā mūrttiḥ prasṛtā sarvato'pi ca athāhārṇavajo rudraṁ dhanurdhara varo hyasi

वह रक्त-धारा किसी विशाल नदी के मूर्तिमान रूप-सी सब ओर फैल गई। तब सागर-पुत्र ने रुद्र से कहा — 'तुम श्रेष्ठ धनुर्धर हो,

श्लोक 14 (padma.6.17.14)

इदानीं तत्करिष्यामि येन गच्छसि संक्षयम् । इत्युक्त्वा कालकेदारं सशरं प्रतिगृह्य तत्

idānīṁ tatkariṣyāmi yena gacchasi saṁkṣayam ityuktvā kālakedāraṁ saśaraṁ pratigṛhya tat

अब मैं वह करूँगा जिससे तुम पूर्ण विनाश को प्राप्त होगे।' यह कहकर कालकेदार धनुष को बाण सहित उठाकर,

श्लोक 15 (padma.6.17.15)

शीघ्रं संपूरयामास शरैर्नानाविधैः शिवम् । शिवः सहस्रकोटीभिः पूरितांगो रणे बभौ

śīghraṁ saṁpūrayāmāsa śarairnānāvidhaiḥ śivam śivaḥ sahasrakoṭībhiḥ pūritāṁgo raṇe babhau

उसने शीघ्र ही शिव को अनेक प्रकार के बाणों से भर दिया; युद्ध में हज़ारों करोड़ बाणों से भरा हुआ शिव का शरीर शोभित हुआ,

श्लोक 16 (padma.6.17.16)

विहंगमैर्यथाकाशं वृक्षैरिव महागिरिः । दैत्यमुक्तैस्तुतैर्बाणैर्दृष्ट्वा व्याप्तं महेश्वरम्

vihaṁgamairyathākāśaṁ vṛkṣairiva mahāgiriḥ daityamuktaistutairbāṇairdṛṣṭvā vyāptaṁ maheśvaram

जैसे आकाश पक्षियों से भर जाए, या महापर्वत वृक्षों से; दैत्य द्वारा छोड़े गए तीक्ष्ण बाणों से महेश्वर को इस प्रकार व्याप्त देखकर,

श्लोक 17 (padma.6.17.17)

वीरभद्रस्तथा कोपाज्जालंधरमधावत । अपीडयदमेयात्मा समुद्रतनयं बली

vīrabhadrastathā kopājjālaṁdharamadhāvata apīḍayadameyātmā samudratanayaṁ balī

वीरभद्र भी क्रोध से जालंधर की ओर दौड़ा; उस अमेय-आत्मा, बलवान ने सागर-पुत्र को पीड़ित किया।

श्लोक 18 (padma.6.17.18)

जालंधरोऽथ संक्रुद्धो विध्यन्बाणैः सहस्रशः । धनुः शरान्रथं छत्रं सारथिं तिलशः शरैः

jālaṁdharo'tha saṁkruddho vidhyanbāṇaiḥ sahasraśaḥ dhanuḥ śarānrathaṁ chatraṁ sārathiṁ tilaśaḥ śaraiḥ

तब क्रुद्ध जालंधर ने हज़ारों बाणों से बींधकर वीरभद्र के धनुष, बाण, रथ, छत्र और सारथि को तिल-तिल टुकड़ों में बाणों से काट डाला —

श्लोक 19 (padma.6.17.19)

चकार वीरभद्रस्य सिंधुसूनुः प्रतापवान् । वीरभद्रोऽथ विरथो हतवान्गदयाब्धिजम्

cakāra vīrabhadrasya siṁdhusūnuḥ pratāpavān vīrabhadro'tha viratho hatavāngadayābdhijam

यह सब प्रतापी सागर-पुत्र ने किया। तब वीरभद्र ने रथहीन होकर गदा से सागर-पुत्र को मारा।

श्लोक 20 (padma.6.17.20)

तथैव गदया सोऽपि तं हत्वापातयद्भुवि । गदाप्रहारपतितमालोक्यातिविमूर्च्छितम्

tathaiva gadayā so'pi taṁ hatvāpātayadbhuvi gadāprahārapatitamālokyātivimūrcchitam

और उसने भी उसी प्रकार गदा से मारकर उसे पृथ्वी पर गिरा दिया। गदा के प्रहार से गिरकर पूर्णतः मूर्च्छित हुए उसे देखकर,

श्लोक 21 (padma.6.17.21)

मणिभद्रोऽथ समरे जालंधरमधावत । अतिक्रुद्धं तमायांतं दृष्ट्वा दैत्यो महारणे

maṇibhadro'tha samare jālaṁdharamadhāvata atikruddhaṁ tamāyāṁtaṁ dṛṣṭvā daityo mahāraṇe

मणिभद्र तब युद्ध में जालंधर की ओर दौड़ा; उसे अत्यंत क्रुद्ध होकर आते देखकर दैत्य ने उस महासंग्राम में,

श्लोक 22 (padma.6.17.22)

शरैर्व्यस्तोपकरणं स चकार नदीसुतः । अथ मूर्च्छां परित्यज्य उत्तस्थौ सिंहवन्नदन्

śarairvyastopakaraṇaṁ sa cakāra nadīsutaḥ atha mūrcchāṁ parityajya uttasthau siṁhavannadan

नदी-पुत्र (जालंधर) ने उसके शस्त्रों को बाणों से बिखेर दिया। फिर मूर्च्छा त्यागकर वह (वीरभद्र) सिंह की भाँति गरजते हुए उठ खड़ा हुआ।

श्लोक 23 (padma.6.17.23)

वीरभद्रस्ततः कोपान्मणिभद्रः प्रतापवान् । जघ्नतुः पर्वताभ्यां तौ व्योमस्थं तटिनीसुतम्

vīrabhadrastataḥ kopānmaṇibhadraḥ pratāpavān jaghnatuḥ parvatābhyāṁ tau vyomasthaṁ taṭinīsutam

तब क्रोध से वीरभद्र और प्रतापी मणिभद्र दोनों ने आकाश में खड़े उस नदी-पुत्र पर पर्वतों से आघात किया।

श्लोक 24 (padma.6.17.24)

तदंगे पतितौ दृष्ट्वा पर्वतौ विनिनद्य च । जघान मुष्टिपातेन वीरभद्रो नदीसुतम्

tadaṁge patitau dṛṣṭvā parvatau vininadya ca jaghāna muṣṭipātena vīrabhadro nadīsutam

उसके शरीर पर वे दोनों पर्वत गिरते देखकर, गरजते हुए वीरभद्र ने मुट्ठी के प्रहार से नदी-पुत्र को मारा।

श्लोक 25 (padma.6.17.25)

मणिभद्रश्चरणयोर्धृत्वा सागरनंदनम् । स्यंदनाद्भ्रामयामास तदद्भुतमिवाभवत्

maṇibhadraścaraṇayordhṛtvā sāgaranaṁdanam syaṁdanādbhrāmayāmāsa tadadbhutamivābhavat

मणिभद्र ने सागर-पुत्र को दोनों पैरों से पकड़कर रथ से उसे घुमा दिया — यह मानो कोई अद्भुत दृश्य था।

श्लोक 26 (padma.6.17.26)

मणिभद्र गृहीतोऽपि दैत्यराट्स महाबलः । हत्वा चरणघातेन मणिभद्रमपातयत्

maṇibhadra gṛhīto'pi daityarāṭsa mahābalaḥ hatvā caraṇaghātena maṇibhadramapātayat

मणिभद्र द्वारा पकड़े जाने पर भी वह महाबली दैत्यराज पैर के प्रहार से मणिभद्र को पृथ्वी पर गिरा दिया।

श्लोक 27 (padma.6.17.27)

जालंधरो महाबाहुर्वीरभद्रं च मुष्टिना । अथागतः परिवृतो गणैर्वै नंदिकेश्वरः

jālaṁdharo mahābāhurvīrabhadraṁ ca muṣṭinā athāgataḥ parivṛto gaṇairvai naṁdikeśvaraḥ

महाबाहु जालंधर ने वीरभद्र को मुट्ठी से मारा; तभी नंदिकेश्वर अपने गणों से घिरे हुए वहाँ आ पहुँचे।

श्लोक 28 (padma.6.17.28)

शुंभस्तमागतं दृष्ट्वा रुरोध सह सैनिकैः । द्वंद्वयुद्धैरथाजग्मुर्गणा दैत्यैः परस्परम्

śuṁbhastamāgataṁ dṛṣṭvā rurodha saha sainikaiḥ dvaṁdvayuddhairathājagmurgaṇā daityaiḥ parasparam

उसे आया देखकर शुंभ ने अपने सैनिकों सहित उसे रोक दिया; तब गण और दानव परस्पर द्वंद्वयुद्ध में जुट गए।

श्लोक 29 (padma.6.17.29)

शुंभः शिलादजं राहुर्महाकालं रणे ययौ । कोलाहलं निशुंभोऽथ केतुः कालमधावत

śuṁbhaḥ śilādajaṁ rāhurmahākālaṁ raṇe yayau kolāhalaṁ niśuṁbho'tha ketuḥ kālamadhāvata

शुंभ शिलादज (नंदी) से, राहु महाकाल से युद्ध में भिड़ गया; निशुंभ कोलाहल से, केतु काल की ओर दौड़ा;

श्लोक 30 (padma.6.17.30)

शैलोदरो गुहं जंभो माल्यवंतं महाबलः । महापार्श्वो ययौ चंडं चंडीशो रोमकंटकम्

śailodaro guhaṁ jaṁbho mālyavaṁtaṁ mahābalaḥ mahāpārśvo yayau caṁḍaṁ caṁḍīśo romakaṁṭakam

शैलोदर गुह (स्कंद) से, महाबली जंभ माल्यवंत से; महापार्श्व चंड की ओर गया, चंडीश रोमकंटक की ओर;

श्लोक 31 (padma.6.17.31)

विकटास्योऽथ वै भृंगिमुरुनेत्रो विनायकम् । एवं दैत्येश्वरैः सार्द्धं गणानामधिपा ययुः

vikaṭāsyo'tha vai bhṛṁgimurunetro vināyakam evaṁ daityeśvaraiḥ sārddhaṁ gaṇānāmadhipā yayuḥ

विकटास्य भृंगी से, उरुनेत्र विनायक से — इस प्रकार दैत्य-स्वामियों सहित गणों के अधिपति भी युद्ध में उतरे।

श्लोक 32 (padma.6.17.32)

अथ शुंभायुधैर्बाणैः प्रहतश्च शिलादजः । चूर्णीचकाराद्रिशृंगैः कपितुंडो महत्तरैः

atha śuṁbhāyudhairbāṇaiḥ prahataśca śilādajaḥ cūrṇīcakārādriśṛṁgaiḥ kapituṁḍo mahattaraiḥ

तब शुंभ के शस्त्रों-बाणों से आहत शिलादज ने बड़े पर्वत-शिखरों से कपितुंड को चूर-चूर कर डाला।

श्लोक 33 (padma.6.17.33)

शुंभस्तेनार्दितः शक्त्या शिलादं च जघान तम् । महाकालो जघानाथ तं राहुं रणमूर्द्धनि

śuṁbhastenārditaḥ śaktyā śilādaṁ ca jaghāna tam mahākālo jaghānātha taṁ rāhuṁ raṇamūrddhani

उस शक्ति (भाले) से पीड़ित शुंभ ने शिलादज को मार डाला; महाकाल ने उस राहु को युद्ध के शीर्ष पर मारा।

श्लोक 34 (padma.6.17.34)

शक्त्याथ तस्य हतवान्स्यंदनं स महाद्रिणा । कोलाहलो हतः शक्त्या निशुंभेन प्रतापवान्

śaktyātha tasya hatavānsyaṁdanaṁ sa mahādriṇā kolāhalo hataḥ śaktyā niśuṁbhena pratāpavān

फिर उसने शक्ति से उसके रथ को एक महापर्वत सहित नष्ट कर डाला। प्रतापी कोलाहल निशुंभ की शक्ति से आहत हुआ।

श्लोक 35 (padma.6.17.35)

शक्तिं गृहीत्वा ह्यहनद्रथं सारथिना सह । विरथेनाथ दैत्येन भृशं क्रुद्धेन संयुगे

śaktiṁ gṛhītvā hyahanadrathaṁ sārathinā saha virathenātha daityena bhṛśaṁ kruddhena saṁyuge

वह शक्ति लेकर सारथि सहित उसके रथ को मार गिराया; तब अत्यंत क्रुद्ध, रथहीन उस दैत्य ने युद्ध में —

श्लोक 36 (padma.6.17.36)

कोलाहलो सुरेंद्रेण सहस्रफणिना हतः । तं हत्वा चातिवेगेन रथं चान्यमुपागतः

kolāhalo sureṁdreṇa sahasraphaṇinā hataḥ taṁ hatvā cātivegena rathaṁ cānyamupāgataḥ

कोलाहल को सहस्रफणी सुरेंद्र (नागराज) से मरवा दिया। उसे अत्यंत वेग से मारकर वह किसी अन्य रथ पर पहुँचा।

श्लोक 37 (padma.6.17.37)

फणिचक्रहतः संख्ये क्षणान्मूर्च्छां विहाय च । स्वरथात्शीघ्रमुत्तीर्य गृहीत्वा खड्गचर्मणी

phaṇicakrahataḥ saṁkhye kṣaṇānmūrcchāṁ vihāya ca svarathātśīghramuttīrya gṛhītvā khaḍgacarmaṇī

सर्प-चक्र से आहत होकर युद्ध में क्षणभर की मूर्च्छा त्यागकर, वह शीघ्र अपने रथ से उतरकर तलवार-ढाल लेकर,

श्लोक 38 (padma.6.17.38)

सर्वं चक्रे निशुंभस्य स रथाद्यसिना पृथक् । पुनः स्वरथमारुह्य दैत्यं बाणैरताडयत्

sarvaṁ cakre niśuṁbhasya sa rathādyasinā pṛthak punaḥ svarathamāruhya daityaṁ bāṇairatāḍayat

तलवार से निशुंभ के पूरे रथ को टुकड़े-टुकड़े कर डाला; फिर अपने ही रथ पर सवार होकर उसने दैत्य को बाणों से मारा।

श्लोक 39 (padma.6.17.39)

निशुंभोऽप्यतिरोषाच्च तत्पराक्रमविस्मितः । शक्त्या महाबलस्तस्य रथं साश्वं न्यषूदयत्

niśuṁbho'pyatiroṣācca tatparākramavismitaḥ śaktyā mahābalastasya rathaṁ sāśvaṁ nyaṣūdayat

निशुंभ भी अत्यंत क्रोध से, उसकी पराक्रम-शक्ति से विस्मित होकर, अपनी शक्ति से उस महाबली के रथ को घोड़ों सहित नष्ट कर डाला।

श्लोक 40 (padma.6.17.40)

कोलाहलो रणे धावन्निशुंभं विरथो बली । गतः स सरथं चक्रे विरथं भुजबंधनात्

kolāhalo raṇe dhāvanniśuṁbhaṁ viratho balī gataḥ sa sarathaṁ cakre virathaṁ bhujabaṁdhanāt

रथहीन कोलाहल युद्ध में दौड़ते हुए निशुंभ की ओर गया; उसने अपनी भुजाओं की जकड़ से निशुंभ को भी रथहीन कर डाला।

श्लोक 41 (padma.6.17.41)

केतुपुच्छं गृहीत्वा च भ्रामयामास चांबरे । कालश्चिक्षेप सोऽप्यद्रिं स चिच्छेद गिरिं जवात्

ketupucchaṁ gṛhītvā ca bhrāmayāmāsa cāṁbare kālaścikṣepa so'pyadriṁ sa ciccheda giriṁ javāt

केतु की पूँछ पकड़कर उसने उसे आकाश में घुमाया; काल ने एक पर्वत फेंका, और उसने वेगपूर्वक उस पर्वत को दो टुकड़ों में काट डाला।

श्लोक 42 (padma.6.17.42)

तं नगं चूर्णितं दृष्ट्वा ताडयामास मुष्टिना । कालश्चूर्णितसर्वांगः केतुना प्राद्रवद्भयात्

taṁ nagaṁ cūrṇitaṁ dṛṣṭvā tāḍayāmāsa muṣṭinā kālaścūrṇitasarvāṁgaḥ ketunā prādravadbhayāt

उस पर्वत को चूर्ण होते देख उसने मुट्ठी से आघात किया; सारे अंगों के चूर्ण हो जाने पर काल केतु के भय से भाग खड़ा हुआ।

श्लोक 43 (padma.6.17.43)

शैलोदरस्तथा स्कंदं जघान गदयोरसि । षडाननोऽपि तं शक्त्या हत्वा भूमावपातयत्

śailodarastathā skaṁdaṁ jaghāna gadayorasi ṣaḍānano'pi taṁ śaktyā hatvā bhūmāvapātayat

शैलोदर ने भी गदा से स्कंद को छाती पर मारा; षड्मुख (स्कंद) ने भी शक्ति से उसे मारकर पृथ्वी पर गिरा दिया।

श्लोक 44 (padma.6.17.44)

शक्तिप्रहारेण मृतं दानवं वीक्ष्य षण्मुखः । जगर्ज तत्र वैचित्र्यं यथा क्रौंचे विदारिते

śaktiprahāreṇa mṛtaṁ dānavaṁ vīkṣya ṣaṇmukhaḥ jagarja tatra vaicitryaṁ yathā krauṁce vidārite

शक्ति के प्रहार से दानव को मरा देखकर षण्मुख ने वहाँ ऐसी गर्जना की, जैसी क्रौंच पर्वत के विदीर्ण होने पर हुई थी।

श्लोक 45 (padma.6.17.45)

माल्यवानथ बाणौघैर्जंभमभ्यर्दयद्रणे । जंभोऽपि सायकैस्तीक्ष्णैर्भित्त्वा तं मूर्च्छितं जहौ

mālyavānatha bāṇaughairjaṁbhamabhyardayadraṇe jaṁbho'pi sāyakaistīkṣṇairbhittvā taṁ mūrcchitaṁ jahau

तब माल्यवंत ने बाणों की झड़ी से जंभ को युद्ध में पीड़ित किया; जंभ ने भी तीक्ष्ण बाणों से उसे बींधकर मूर्च्छित छोड़ दिया।

श्लोक 46 (padma.6.17.46)

महापार्श्वो रथं धृत्वा बाणौघैर्वाजिवर्जितम् । लीलयैव च खे नीत्वा व्यश्वं चंडमपातयत्

mahāpārśvo rathaṁ dhṛtvā bāṇaughairvājivarjitam līlayaiva ca khe nītvā vyaśvaṁ caṁḍamapātayat

महापार्श्व ने बाणों की झड़ी से रथ को घोड़ों से रहित करके, उसे लीलापूर्वक आकाश में उठाकर चंड के घोड़ाविहीन रथ पर गिरा दिया।

श्लोक 47 (padma.6.17.47)

व्यश्वं रथं विलोक्याथ ततश्चंडोऽग्रहीद्गजम् । आपतंतं महापार्श्वं चंडस्तं गदयाहनत्

vyaśvaṁ rathaṁ vilokyātha tataścaṁḍo'grahīdgajam āpataṁtaṁ mahāpārśvaṁ caṁḍastaṁ gadayāhanat

अपना रथ घोड़ाविहीन देखकर चंड ने तब एक हाथी पकड़ लिया; आते हुए महापार्श्व को चंड ने गदा से मारा।

श्लोक 48 (padma.6.17.48)

अचिंत्यैव गदापातं सोऽसुरो भृशदारुणः । प्रहत्य मुष्टिना चंडं पातयामास भूतले

aciṁtyaiva gadāpātaṁ so'suro bhṛśadāruṇaḥ prahatya muṣṭinā caṁḍaṁ pātayāmāsa bhūtale

उस अत्यंत भयंकर असुर ने गदा के अकल्पनीय प्रहार के बाद मुट्ठी से चंड को मारकर पृथ्वी पर गिरा दिया।

श्लोक 49 (padma.6.17.49)

चंडीशशस्त्राभिहतो रोमकंठो महासुरः । चंडीशं पादयोर्धृत्वा रथमूर्ध्नि न्यपातयत्

caṁḍīśaśastrābhihato romakaṁṭho mahāsuraḥ caṁḍīśaṁ pādayordhṛtvā rathamūrdhni nyapātayat

चंडीश के शस्त्र से आहत महादानव रोमकंठ ने चंडीश को पैरों से पकड़कर रथ के ऊपर पटक दिया।

श्लोक 50 (padma.6.17.50)

पपात सहसा भूमौ ययौ तं भीषणेक्षणः । उरुनेत्रेण समरे हतो लंबोदरः शरैः

papāta sahasā bhūmau yayau taṁ bhīṣaṇekṣaṇaḥ urunetreṇa samare hato laṁbodaraḥ śaraiḥ

वह सहसा पृथ्वी पर गिर पड़ा; भयंकर आँखों वाला (रोमकंठ) उसकी ओर गया। युद्ध में उरुनेत्र द्वारा लंबोदर बाणों से मारा गया।

श्लोक 51 (padma.6.17.51)

दंतेनोरसि तं हत्वा पातयामास भूतले । ऊरुनेत्रः क्षणाच्छांतिमागत्याशु रथं क्षणात्

daṁtenorasi taṁ hatvā pātayāmāsa bhūtale ūrunetraḥ kṣaṇācchāṁtimāgatyāśu rathaṁ kṣaṇāt

उसे दाँत से छाती पर मारकर उसने पृथ्वी पर गिरा दिया; उरुनेत्र क्षणभर में शांत होकर, तुरंत रथ पर —

श्लोक 52 (padma.6.17.52)

जघान मुद्गरेणासौ मूर्ध्नि सिंदूरमंडिते । गणेश्वरः पट्टिशेन जघानोरसि दानवम्

jaghāna mudgareṇāsau mūrdhni siṁdūramaṁḍite gaṇeśvaraḥ paṭṭiśena jaghānorasi dānavam

सिंदूर से सुशोभित उसके सिर पर मुद्गर से प्रहार किया। गणेश्वर ने पट्टिश से उस दानव की छाती पर आघात किया।

श्लोक 53 (padma.6.17.53)

तन्मुखादथ निष्क्रांतो नवशीर्षोऽसुरो महान् । अष्टादशभुजो राजन्सोऽप्यधावत शांकरिम्

tanmukhādatha niṣkrāṁto navaśīrṣo'suro mahān aṣṭādaśabhujo rājanso'pyadhāvata śāṁkarim

उसके मुख से तब एक महान असुर निकला, नौ सिरों और अठारह भुजाओं वाला; हे राजन्! वह भी शंकर-पुत्र की ओर दौड़ा।

श्लोक 54 (padma.6.17.54)

नवशीर्षोरुनेत्राभ्यां रणे रुद्धो विनायकः । जर्जरीकृतदेहोऽपि जग्राह परशुं रुषा

navaśīrṣorunetrābhyāṁ raṇe ruddho vināyakaḥ jarjarīkṛtadeho'pi jagrāha paraśuṁ ruṣā

युद्ध में विनायक उस नौ सिरों और भयानक आँखों वाले से रोक दिए गए; शरीर जर्जर होने पर भी उन्होंने क्रोध से अपनी कुल्हाड़ी उठा ली,

श्लोक 55 (padma.6.17.55)

तेन चिच्छेद शस्त्राणि तयोराजौ गणेश्वरः । रुद्धं गणेश्वरं दृष्ट्वा ताभ्यां संख्येऽथ षण्मुखः

tena ciccheda śastrāṇi tayorājau gaṇeśvaraḥ ruddhaṁ gaṇeśvaraṁ dṛṣṭvā tābhyāṁ saṁkhye'tha ṣaṇmukhaḥ

और उससे उन दोनों के शस्त्रों को उस संग्राम में काट डाला। गणेश्वर को इस प्रकार रोका हुआ देखकर, षण्मुख —

श्लोक 56 (padma.6.17.56)

शीघ्रमागत्य सेनानीर्जघान नवशीर्षकम् । नवशीर्षं रणे हत्वा उरुनेत्रमधावत

śīghramāgatya senānīrjaghāna navaśīrṣakam navaśīrṣaṁ raṇe hatvā urunetramadhāvata

उनका सेनापति, शीघ्र आकर नौ सिर वाले को मार डाला; युद्ध में नौ सिर वाले को मारकर वह उरुनेत्र की ओर दौड़ा।

श्लोक 57 (padma.6.17.57)

स्कंदः स्वशक्तिघातेन पातयामास तं नृप । पश्यञ्जालंधरः स्कंदं ययौ सैन्येन संवृतः

skaṁdaḥ svaśaktighātena pātayāmāsa taṁ nṛpa paśyañjālaṁdharaḥ skaṁdaṁ yayau sainyena saṁvṛtaḥ

हे राजन्! स्कंद ने अपनी ही शक्ति के प्रहार से उसे भी गिरा दिया। यह देखते हुए जालंधर स्कंद की ओर सेना सहित बढ़ा।

श्लोक 58 (padma.6.17.58)

पुत्रप्रीत्यासुरान्हंतुं सगणः शंकरोऽपि च । ततो घोरतरं युद्धमभूदद्भुतसैन्ययोः

putraprītyāsurānhaṁtuṁ sagaṇaḥ śaṁkaro'pi ca tato ghorataraṁ yuddhamabhūdadbhutasainyayoḥ

पुत्र-प्रेम से गणों सहित शंकर भी दैत्यों को मारने के लिए आगे बढ़े; तब दोनों ओर की अद्भुत सेनाओं में अत्यंत घोर युद्ध छिड़ गया।

श्लोक 59 (padma.6.17.59)

हरसिंधुजयोर्युद्धे गतप्राणेव रोदसी । अथ जालंधरः क्रुद्धो बाणं संधाय दारुणम्

harasiṁdhujayoryuddhe gataprāṇeva rodasī atha jālaṁdharaḥ kruddho bāṇaṁ saṁdhāya dāruṇam

हर और सागर-पुत्र के इस युद्ध में मानो आकाश और पृथ्वी प्राणहीन हो गए हों। तब क्रुद्ध जालंधर ने एक भयंकर बाण चढ़ाया,

श्लोक 60 (padma.6.17.60)

सहस्रशतसंख्याकैः पत्रैः सर्वत्र भूषितम् । दैत्येंद्रस्तेन बाणेन ललाटेताडयच्छिवम्

sahasraśatasaṁkhyākaiḥ patraiḥ sarvatra bhūṣitam daityeṁdrastena bāṇena lalāṭetāḍayacchivam

जो सब ओर से लाखों पंखों से सज्जित था; उस बाण से दैत्येंद्र ने शिव के ललाट पर आघात किया।

श्लोक 61 (padma.6.17.61)

ममज्जापुंखमर्यादं ललाटे शंकरस्य च । भाले शशांकवच्छंभोः स रराज महाप्रभः

mamajjāpuṁkhamaryādaṁ lalāṭe śaṁkarasya ca bhāle śaśāṁkavacchaṁbhoḥ sa rarāja mahāprabhaḥ

वह पूरे फल-भाग तक शंकर के ललाट में धँस गया; शंभु के भाल पर वह चंद्रमा की भाँति महातेजस्वी होकर शोभित हुआ,

श्लोक 62 (padma.6.17.62)

यथादित्यो हि घर्मांते संध्याकालेंबुदागमे । अथ रुद्रो महाबाणं जग्राह ज्वलनोपमम्

yathādityo hi gharmāṁte saṁdhyākāleṁbudāgame atha rudro mahābāṇaṁ jagrāha jvalanopamam

जैसे ग्रीष्म के अंत में, संध्या-काल में, बादलों के आने पर सूर्य शोभित होता है। तब रुद्र ने अग्नि के समान एक महाबाण उठाया,

श्लोक 63 (padma.6.17.63)

यस्य वेगे तु पवनः फले यस्याग्निभास्करौ । कालो ग्रंथिषु सर्वेषु शरे देवी धरा स्थिता

yasya vege tu pavanaḥ phale yasyāgnibhāskarau kālo graṁthiṣu sarveṣu śare devī dharā sthitā

जिसके वेग में वायु, जिसके फल में अग्नि और सूर्य, जिसकी सभी संधियों में काल, और जिस बाण में देवी पृथ्वी स्वयं स्थित थीं।

श्लोक 64 (padma.6.17.64)

हरस्तेन शरेणाशु विव्याध हृदि सिंधुजम् । तेन बाणप्रहारेण रुधिरौघपरिप्लुतः

harastena śareṇāśu vivyādha hṛdi siṁdhujam tena bāṇaprahāreṇa rudhiraughapariplutaḥ

उस बाण से हर ने शीघ्र ही सागर-पुत्र के हृदय को बींध डाला; उस बाण के आघात से रक्त की धारा में डूबकर,

श्लोक 65 (padma.6.17.65)

पपात शरभिन्नांगो वज्राहत इवाचलः । तदा दैत्याः समाक्रंदन्जगर्जुः प्रमथास्तथा

papāta śarabhinnāṁgo vajrāhata ivācalaḥ tadā daityāḥ samākraṁdanjagarjuḥ pramathāstathā

बाण से क्षत-विक्षत होकर वह वज्र से आहत पर्वत की भाँति गिर पड़ा। तब दैत्य विलाप करने लगे, और प्रमथगण गरज उठे।

श्लोक 66 (padma.6.17.66)

सिंधुजं मूर्छितं दृष्ट्वा रुरुधुर्दानवाः शिवम् । रक्षार्थमुद्यताः केचित्केचित्तं परितः स्थिताः

siṁdhujaṁ mūrchitaṁ dṛṣṭvā rurudhurdānavāḥ śivam rakṣārthamudyatāḥ kecitkecittaṁ paritaḥ sthitāḥ

सागर-पुत्र को मूर्च्छित देखकर दानवों ने शिव को घेर लिया; कुछ रक्षा के लिए तत्पर हुए, कुछ उसके चारों ओर खड़े हो गए।

श्लोक 67 (padma.6.17.67)

यावज्जालंधरो मूर्छां प्राप्तो वारिधिनंदनः । तावद्रुद्रेण नाराचैर्हता जालंधरी चमूः

yāvajjālaṁdharo mūrchāṁ prāpto vāridhinaṁdanaḥ tāvadrudreṇa nārācairhatā jālaṁdharī camūḥ

जब तक सागर का यह पुत्र जालंधर मूर्च्छित रहा, तब तक रुद्र ने अपने बाणों से जालंधर की सेना का नाश कर डाला।

श्लोक 68 (padma.6.17.68)

चिराज्जालंधरस्त्यक्त्वा मूर्छां सैन्यं हतं नृप । दृष्ट्वा भयान्वितः सेनां विकीर्णां च तथा रणे

cirājjālaṁdharastyaktvā mūrchāṁ sainyaṁ hataṁ nṛpa dṛṣṭvā bhayānvitaḥ senāṁ vikīrṇāṁ ca tathā raṇe

बहुत देर बाद जालंधर ने मूर्च्छा त्यागकर, हे राजन्! अपनी सेना को नष्ट हुआ और युद्ध में तितर-बितर हुआ देखकर, भयभीत होकर —

श्लोक 69 (padma.6.17.69)

ततः काव्यं स सस्मार मनसा परमं गुरुम् । स्मृतस्तेन त्वरन्प्राप्तः कविर्जालंधरं प्रति

tataḥ kāvyaṁ sa sasmāra manasā paramaṁ gurum smṛtastena tvaranprāptaḥ kavirjālaṁdharaṁ prati

तब उसने मन में परम गुरु काव्य (शुक्राचार्य) का स्मरण किया; उसके स्मरण मात्र से शीघ्र आकर वह कवि जालंधर के पास पहुँचा।

श्लोक 70 (padma.6.17.70)

स्वस्ति कृत्वा जगादाथ भार्गवः सिंधुनंदनम् । किं करोमि महाराज तव कार्यं महाबल

svasti kṛtvā jagādātha bhārgavaḥ siṁdhunaṁdanam kiṁ karomi mahārāja tava kāryaṁ mahābala

आशीर्वाद देकर भार्गव ने सागर-पुत्र से कहा — 'हे महाराज! मैं क्या करूँ? हे महाबली! अपना कार्य बताइए।'

श्लोक 71 (padma.6.17.71)

नारद उवाच ।इति काव्यवचः श्रुत्वा भार्गवं बहु मानयन् । नत्वा गुरुमुवाचाथ राजा जालंधरस्तथा

nārada uvāca iti kāvyavacaḥ śrutvā bhārgavaṁ bahu mānayan natvā gurumuvācātha rājā jālaṁdharastathā

नारद ने कहा — कवि का यह वचन सुनकर, भार्गव का बहुत सम्मान करते हुए, गुरु को प्रणाम करके राजा जालंधर ने कहा —

श्लोक 72 (padma.6.17.72)

राजोवाच ।जीवयैतान्मृताञ्छुक्र दैत्यान्सर्वान्समंततः । इत्युक्तः सिंधुजेनाजौ सैन्यं तत्र व्यलोकयत्

rājovāca jīvayaitānmṛtāñchukra daityānsarvānsamaṁtataḥ ityuktaḥ siṁdhujenājau sainyaṁ tatra vyalokayat

राजा ने कहा — 'हे शुक्र! इन सभी मृत दैत्यों को सब ओर से जीवित कर दो।' सागर-पुत्र के ऐसा कहने पर, उन्होंने उस युद्ध-भूमि में सेना का निरीक्षण किया।

श्लोक 73 (padma.6.17.73)

पंचविंशत्सहस्राणि योजनानां प्रमाणतः । दैत्यांगरथसंकीर्णमुपर्युपरि पार्थिव

paṁcaviṁśatsahasrāṇi yojanānāṁ pramāṇataḥ daityāṁgarathasaṁkīrṇamuparyupari pārthiva

हे राजन्! पच्चीस हज़ार योजन के विस्तार में दैत्यों के शरीरों और रथों से भरा हुआ, एक के ऊपर एक ढेर लगा हुआ था,

श्लोक 74 (padma.6.17.74)

उच्छ्रये पंचनवतियोजनानां महीं चिताम् । योधवाहनदेहाद्यैरिव पूर्णां धरां ततः

ucchraye paṁcanavatiyojanānāṁ mahīṁ citām yodhavāhanadehādyairiva pūrṇāṁ dharāṁ tataḥ

पंचानवे योजन ऊँची पृथ्वी की वह चिता, योद्धाओं, वाहनों और शरीरों आदि से भरी हुई थी।

श्लोक 75 (padma.6.17.75)

मंत्रोदकेन चाभ्युक्ष्य दैत्यानुत्थापयत्कविः । यावद्रुद्रो जटाजूटं बबंध भुजगैर्दृढम्

maṁtrodakena cābhyukṣya daityānutthāpayatkaviḥ yāvadrudro jaṭājūṭaṁ babaṁdha bhujagairdṛḍham

मंत्र-जल छिड़ककर कवि ने दैत्यों को जीवित कर दिया; जब तक रुद्र सर्पों से अपने जटाजूट को दृढ़ता से बाँध रहे थे,

श्लोक 76 (padma.6.17.76)

तावत्काव्येन तत्सैन्यं मंत्रेणोत्थापितं नृप । व्याघ्रान्यथा केसरिणो गजेंद्राः शूकरान्यथा

tāvatkāvyena tatsainyaṁ maṁtreṇotthāpitaṁ nṛpa vyāghrānyathā kesariṇo gajeṁdrāḥ śūkarānyathā

तब तक, हे राजन्! काव्य (शुक्र) ने मंत्र द्वारा उस सेना को उठा दिया — जैसे बाघ सिंह बन जाएँ, हाथी वराह बन जाएँ।

श्लोक 77 (padma.6.17.77)

आगतान्दानवान्दृष्ट्वा चिंतयामास शंकरः । किमेतदिह संजातं मृतान्सृजति कुत्रचित्

āgatāndānavāndṛṣṭvā ciṁtayāmāsa śaṁkaraḥ kimetadiha saṁjātaṁ mṛtānsṛjati kutracit

दानवों को फिर से आया देखकर शंकर ने सोचा — 'यह यहाँ क्या हुआ? कोई कहीं मृतकों को फिर से जीवित कर रहा है।'

श्लोक 78 (padma.6.17.78)

ददर्श चिंतयन्काव्य इति तस्मिन्रणे भवः । जीवयंतं रणे दैत्यान्धावंतं वेगवत्तरम्

dadarśa ciṁtayankāvya iti tasminraṇe bhavaḥ jīvayaṁtaṁ raṇe daityāndhāvaṁtaṁ vegavattaram

विचार करते हुए भव ने उस युद्ध में उस कवि को देखा, जो युद्ध में दैत्यों को जीवित करता हुआ अत्यंत वेग से दौड़ रहा था।

श्लोक 79 (padma.6.17.79)

ततः क्रुद्धो महादेवः शुक्रं हंतुं मनो दधे । त्रिशूलिनमनुज्ञाय रहश्चोवाच तं कविः

tataḥ kruddho mahādevaḥ śukraṁ haṁtuṁ mano dadhe triśūlinamanujñāya rahaścovāca taṁ kaviḥ

तब क्रुद्ध महादेव ने शुक्र को मारने का मन बनाया; त्रिशूल उठाते हुए उन्हें देखकर कवि ने एकांत में उनसे कहा —

श्लोक 80 (padma.6.17.80)

ब्राह्मणोऽहं कथं हंसि सर्वविद्याविशारदम् । ब्रह्महत्या मयि हते तव रुद्र भविष्यति

brāhmaṇo'haṁ kathaṁ haṁsi sarvavidyāviśāradam brahmahatyā mayi hate tava rudra bhaviṣyati

'मैं ब्राह्मण हूँ, सर्वविद्याओं में निपुण — मुझे कैसे मारोगे? मेरे मारे जाने पर, हे रुद्र, ब्रह्महत्या तुम्हें लगेगी।'

श्लोक 81 (padma.6.17.81)

इति श्रुत्वा कवेर्वाक्यं शूलं तत्याज शंकरः । स्मृत्वा तत्पूर्ववृत्तांतं यल्लग्नं ब्रह्मणः शिरः

iti śrutvā kavervākyaṁ śūlaṁ tatyāja śaṁkaraḥ smṛtvā tatpūrvavṛttāṁtaṁ yallagnaṁ brahmaṇaḥ śiraḥ

कवि की यह बात सुनकर शंकर ने त्रिशूल त्याग दिया, उस पूर्व घटना का स्मरण करते हुए जब ब्रह्मा का सिर उनके हाथ से चिपक गया था।

श्लोक 82 (padma.6.17.82)

ब्राह्मणो न हि हंतव्यो हरन्प्राणानपि प्रियान् । अयं तु जीवयन्दैत्यान्निग्राह्यः सर्वथा मया

brāhmaṇo na hi haṁtavyo haranprāṇānapi priyān ayaṁ tu jīvayandaityānnigrāhyaḥ sarvathā mayā

'ब्राह्मण को, अपने प्रिय प्राण हरने वाले को भी, नहीं मारना चाहिए; परंतु दैत्यों को जीवित करने वाले इसे मुझे हर प्रकार से रोकना ही होगा।

श्लोक 83 (padma.6.17.83)

तस्मादेनं क्षिपाम्याशु स्त्रीयोनौ दैत्यजीवनम् । एवमुक्तवतः शंभोस्तृतीयनयनाद्द्रुतम्

tasmādenaṁ kṣipāmyāśu strīyonau daityajīvanam evamuktavataḥ śaṁbhostṛtīyanayanāddrutam

इसलिए मैं इसे शीघ्र ही किसी स्त्री की योनि में डाल दूँगा।' यह कहकर शंभु ने तुरंत अपने ही तीसरे नेत्र से,

श्लोक 84 (padma.6.17.84)

कृत्या विवासा चात्युग्रा मुक्तकेशी महोदरा । स्थूललंबस्तनी योनी दंष्ट्रालोचनभीषणा

kṛtyā vivāsā cātyugrā muktakeśī mahodarā sthūlalaṁbastanī yonī daṁṣṭrālocanabhīṣaṇā

एक अत्यंत भयंकर कृत्या (मंत्र-सिद्ध स्त्री) प्रकट की — नग्न, खुले केश वाली, विशाल पेट वाली, स्थूल-लंबे स्तनों वाली, भयंकर योनि, दाढ़ों और नेत्रों वाली।

श्लोक 85 (padma.6.17.85)

आज्ञापयेति स तया प्रोक्तस्तामब्रवीच्छिवः । कृत्ये त्वं दानवाचार्यं स्वयोनौ क्षिप दुर्मतिम्

ājñāpayeti sa tayā proktastāmabravīcchivaḥ kṛtye tvaṁ dānavācāryaṁ svayonau kṣipa durmatim

'मुझे आज्ञा दीजिए' — यह कहे जाने पर शिव ने उससे कहा — 'हे कृत्ये! इस दुर्बुद्धि दानवाचार्य को अपनी ही योनि में डाल लो।

श्लोक 86 (padma.6.17.86)

यावज्जालंधरं हन्मि तावदेनं भगे वह । हते जालंधरे दैत्ये पश्चान्निस्तीर्य मोचय

yāvajjālaṁdharaṁ hanmi tāvadenaṁ bhage vaha hate jālaṁdhare daitye paścānnistīrya mocaya

जब तक मैं जालंधर को नहीं मार देता, तब तक इसे अपनी योनि में धारण करो; दैत्य जालंधर के मारे जाने पर, बाद में इसे निकालकर मुक्त कर देना।'

श्लोक 87 (padma.6.17.87)

हरेणोक्तेति सा कृत्या भार्गवं समधावत । पपात भूमौ तां दृष्ट्वा कविर्दैत्याः प्रदुद्रुवुः

hareṇokteti sā kṛtyā bhārgavaṁ samadhāvata papāta bhūmau tāṁ dṛṣṭvā kavirdaityāḥ pradudruvuḥ

हर की आज्ञा से वह कृत्या भार्गव की ओर दौड़ी; उसे गिरते देखकर कवि और दैत्य भाग खड़े हुए।

श्लोक 88 (padma.6.17.88)

केशेष्वाकृष्य धुन्वाना नग्नमालिंग्य भार्गवम् । योनौ दधार सा कृत्या हसंती जयनंदन

keśeṣvākṛṣya dhunvānā nagnamāliṁgya bhārgavam yonau dadhāra sā kṛtyā hasaṁtī jayanaṁdana

केशों से पकड़कर झकझोरते हुए, नग्न भार्गव को आलिंगन करके, हे जय-नंदन! वह कृत्या हँसती हुई उसे अपनी योनि में धारण कर बैठी।

श्लोक 89 (padma.6.17.89)

भगे क्षिप्तं गुरुं दृष्ट्वा यावज्जालंधरोऽसुरः । संदधे मार्गणांस्तावत्सा कृत्यादृश्यतां गता

bhage kṣiptaṁ guruṁ dṛṣṭvā yāvajjālaṁdharo'suraḥ saṁdadhe mārgaṇāṁstāvatsā kṛtyādṛśyatāṁ gatā

अपने गुरु को योनि में डाला हुआ देखकर, जब तक दैत्य जालंधर बाणों को धनुष पर चढ़ाता, तब तक वह कृत्या अदृश्य हो चुकी थी।

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