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उत्तर खण्ड · अध्याय 18

श्री जालंधर-वध महोत्सव

अध्याय 17अध्याय-सूचीअध्याय 19

श्लोक 1 (padma.6.18.1)

श्रीनारद उवाच ।अथ जालंधरः प्राह रक्षात्मानमितः शिवम् । शिवाद्य त्वां क्षिपाम्याशु यत्रास्ते मधुसूदनः

śrīnārada uvāca atha jālaṁdharaḥ prāha rakṣātmānamitaḥ śivam śivādya tvāṁ kṣipāmyāśu yatrāste madhusūdanaḥ

श्री नारद ने कहा — तब जालंधर ने कहा, स्वयं को बचाने वाले शिव से — 'हे शिव! आज मैं तुम्हें तुरंत वहाँ फेंक दूँगा, जहाँ मधुसूदन रहते हैं।

श्लोक 2 (padma.6.18.2)

पश्चाद्ब्रह्माणमाकृष्य पातयिष्यामि सागरे । धृतेषु युष्मासु यदा तदा सर्वेश्वरो ह्यहम्

paścādbrahmāṇamākṛṣya pātayiṣyāmi sāgare dhṛteṣu yuṣmāsu yadā tadā sarveśvaro hyaham

फिर ब्रह्मा को भी खींचकर सागर में डाल दूँगा; जब तुम दोनों बंदी हो जाओगे, तब मैं ही सबका ईश्वर बनूँगा।'

श्लोक 3 (padma.6.18.3)

इत्युक्त्वा सैन्यसंभारं न्यस्य शुंभासुरादिषु । भटैर्गुप्तं निशुंभाद्यैश्चतुरंगमनंतकम्

ityuktvā sainyasaṁbhāraṁ nyasya śuṁbhāsurādiṣu bhaṭairguptaṁ niśuṁbhādyaiścaturaṁgamanaṁtakam

यह कहकर सेना का सारा भार शुंभासुर आदि को सौंपकर, निशुंभ आदि योद्धाओं से सुरक्षित अपनी अनंत चतुरंगिणी सेना —

श्लोक 4 (padma.6.18.4)

शुंभो निशुंभः फेंकारो फेरुंडो धूम्रलोचनः । केतुर्बिडालजंघश्च राहुर्दुर्वारणो यमः

śuṁbho niśuṁbhaḥ pheṁkāro pheruṁḍo dhūmralocanaḥ keturbiḍālajaṁghaśca rāhurdurvāraṇo yamaḥ

शुंभ, निशुंभ, फेंकार, फेरुंड, धूम्रलोचन, केतु, बिडालजंघ, राहु, दुर्वारण, यम,

श्लोक 5 (padma.6.18.5)

कालासुरोऽथ लवणो भूमिरेतोंधकासुरः । रक्तवीर्यादयश्चंडी चामुंडी दैत्यपुंगवाः

kālāsuro'tha lavaṇo bhūmiretoṁdhakāsuraḥ raktavīryādayaścaṁḍī cāmuṁḍī daityapuṁgavāḥ

कालासुर, लवण, भूमिरेता, अंधकासुर, रक्तवीर्य आदि, चंडी, चामुंडी — ये सब दैत्यश्रेष्ठ थे।

श्लोक 6 (padma.6.18.6)

सर्वानेवोद्यतान्दृष्ट्वा संख्ये दानवपुंगवान् । रुरुधुः समरे राजन्वीरभद्रादयो गणाः

sarvānevodyatāndṛṣṭvā saṁkhye dānavapuṁgavān rurudhuḥ samare rājanvīrabhadrādayo gaṇāḥ

इन सभी दैत्यश्रेष्ठों को युद्ध के लिए तैयार देखकर, हे राजन्! वीरभद्र आदि गणों ने उन्हें युद्ध में रोक लिया।

श्लोक 7 (padma.6.18.7)

ततो युद्धमभूद्धोरं तुमुलं लोमहर्षणम् । पतंति प्रथमा यत्र दैत्याश्चापि क्षतातुराः

tato yuddhamabhūddhoraṁ tumulaṁ lomaharṣaṇam pataṁti prathamā yatra daityāścāpi kṣatāturāḥ

तब एक भीषण, तुमुल, रोंगटे खड़े कर देने वाला युद्ध हुआ, जिसमें पहले घायल-पीड़ित दैत्य ही गिरने लगे।

श्लोक 8 (padma.6.18.8)

अथ शुंभादिभिर्दैत्यैः सर्वशस्त्रैर्महामृधे । हताः पेतुर्गणाश्चान्ये पलायांचक्रिरे नृप

atha śuṁbhādibhirdaityaiḥ sarvaśastrairmahāmṛdhe hatāḥ peturgaṇāścānye palāyāṁcakrire nṛpa

फिर उस महासंग्राम में शुंभ आदि दैत्यों के सभी शस्त्रों से मारे गए अन्य गण भी गिर पड़े, और हे राजन्! कुछ भाग निकले।

श्लोक 9 (padma.6.18.9)

गणान्विजित्य समरे रुरुधुर्दानवाः शिवम् । वर्षंतः शरधाराभिर्घना मेरुगिरिं यथा

gaṇānvijitya samare rurudhurdānavāḥ śivam varṣaṁtaḥ śaradhārābhirghanā merugiriṁ yathā

युद्ध में गणों को जीतकर दानवों ने शिव को घेर लिया, मानो घने बादल मेरु पर्वत पर बाणों की धारा बरसा रहे हों।

श्लोक 10 (padma.6.18.10)

ततः पिनाकमाकृष्य वृषभोपरि भैरवः । जघान बाणनिवहैर्दानवान्समरांगणे । तीक्ष्णाग्रैस्तु क्षुरप्रौघैर्दानवानहनद्बली

tataḥ pinākamākṛṣya vṛṣabhopari bhairavaḥ jaghāna bāṇanivahairdānavānsamarāṁgaṇe tīkṣṇāgraistu kṣurapraughairdānavānahanadbalī

तब पिनाक धनुष खींचकर बैल पर बैठे भैरव ने बाणों के समूहों से युद्ध-भूमि में दानवों को मार डाला; तीक्ष्ण-अग्र क्षुरप्रों से उस बलवान ने दानवों को नष्ट किया।

श्लोक 11 (padma.6.18.11)

केचिन्नंदिप्रहारेण पेतुः संग्राममूर्धनि । बाणैश्च जर्जरान्कृत्वा शुंभादीन्वृषभध्वजः

kecinnaṁdiprahāreṇa petuḥ saṁgrāmamūrdhani bāṇaiśca jarjarānkṛtvā śuṁbhādīnvṛṣabhadhvajaḥ

कुछ नंदी के प्रहार से युद्ध के अग्रभाग में गिर पड़े; और वृषभध्वज ने शुंभ आदि को बाणों से जर्जर करके,

श्लोक 12 (padma.6.18.12)

शेषं सैन्यं जघानाशु शस्त्रास्त्रैः समरांगणे । गजैर्नरैर्हयैर्व्याप्तं पतितैः समरांगणम्

śeṣaṁ sainyaṁ jaghānāśu śastrāstraiḥ samarāṁgaṇe gajairnarairhayairvyāptaṁ patitaiḥ samarāṁgaṇam

शीघ्र ही शस्त्रों-अस्त्रों से युद्ध-भूमि में शेष सेना को भी मार डाला; हाथियों, मनुष्यों और घोड़ों से पटा युद्ध-क्षेत्र —

श्लोक 13 (padma.6.18.13)

बभूव वज्रनिर्भिन्नैः पर्वतैरिव भूतलम् । अथ मायामयीं गौरीं विदधे सिंधुनंदनः

babhūva vajranirbhinnaiḥ parvatairiva bhūtalam atha māyāmayīṁ gaurīṁ vidadhe siṁdhunaṁdanaḥ

वज्र से टूटे पर्वतों से भरी पृथ्वी जैसा हो गया। तब सागर-पुत्र ने एक मायावी गौरी रची,

श्लोक 14 (padma.6.18.14)

सौंदर्यगुणसंपन्नां सर्वालंकारभूषिताम् । जयां मायामयीं कृत्वा समुवाचाब्धिनंदनः

sauṁdaryaguṇasaṁpannāṁ sarvālaṁkārabhūṣitām jayāṁ māyāmayīṁ kṛtvā samuvācābdhinaṁdanaḥ

सौंदर्य और गुणों से संपन्न, सभी आभूषणों से सुसज्जित; इस मायावी 'जया' को बनाकर सागर-पुत्र ने उससे कहा —

श्लोक 15 (padma.6.18.15)

गच्छ त्वं पुरतो रुद्रं विमोहय रणे द्रुतम् । इत्युक्त्वा दैत्यपतिना ययौ मायामयी जया

gaccha tvaṁ purato rudraṁ vimohaya raṇe drutam ityuktvā daityapatinā yayau māyāmayī jayā

'जाओ, रुद्र के आगे जाकर युद्ध में उन्हें शीघ्र मोहित कर दो।' दैत्यराज के ऐसा कहने पर वह मायावी जया चली गई।

श्लोक 16 (padma.6.18.16)

रणे गत्वा शिवस्याग्रे मुक्तकेशी रुरोद ह । पृष्टा हरेण सा प्राह मानसोत्तरपर्वतात्

raṇe gatvā śivasyāgre muktakeśī ruroda ha pṛṣṭā hareṇa sā prāha mānasottaraparvatāt

युद्ध में जाकर शिव के सामने, खुले केशों वाली वह रो पड़ी; हर के पूछने पर उसने कहा — 'मानसोत्तर पर्वत से,

श्लोक 17 (padma.6.18.17)

हृता तव प्रिया देव पार्वती सिंधुसूनुना । श्रुत्वेति वचनं तस्यास्तामुवाच वृषध्वजः

hṛtā tava priyā deva pārvatī siṁdhusūnunā śrutveti vacanaṁ tasyāstāmuvāca vṛṣadhvajaḥ

हे देव! सागर-पुत्र ने आपकी प्रिया पार्वती को हर लिया है!' उसकी यह बात सुनकर वृषभध्वज ने उससे कहा —

श्लोक 18 (padma.6.18.18)

जये त्वमेहि वृषभं त्वां हरिष्यंति दानवाः । ततो वृषभमारुह्य जया चालिंग्य शंकरम्

jaye tvamehi vṛṣabhaṁ tvāṁ hariṣyaṁti dānavāḥ tato vṛṣabhamāruhya jayā cāliṁgya śaṁkaram

'हे जया! आओ, बैल पर चढ़ो — दानव तुम्हें भी हर सकते हैं।' तब बैल पर सवार होकर, शंकर को आलिंगन करके जया ने,

श्लोक 19 (padma.6.18.19)

प्राह प्रयामि पार्वत्या न जीवामि विना हर । चंद्रं शंभुजटाविष्टं गृहीत्वा वृषभाद्द्रुतम्

prāha prayāmi pārvatyā na jīvāmi vinā hara caṁdraṁ śaṁbhujaṭāviṣṭaṁ gṛhītvā vṛṣabhāddrutam

कहा — 'मैं पार्वती के पास जाती हूँ, हे हर! मैं उसके बिना नहीं जी सकती।' शंभु की ही जटा में लगे चंद्रमा को शीघ्र लेकर, बैल से,

श्लोक 20 (padma.6.18.20)

अवारोहत सा माया मायाष्वक्तो रणं ययौ । ततो गौरीं हृतां श्रुत्वा चिंतयामास शंकरः

avārohata sā māyā māyāṣvakto raṇaṁ yayau tato gaurīṁ hṛtāṁ śrutvā ciṁtayāmāsa śaṁkaraḥ

वह माया उतर गई, और माया से मुक्त होकर युद्ध में चली गई। तब गौरी को हर लिया गया सुनकर शंकर व्याकुल हो उठे —

श्लोक 21 (padma.6.18.21)

दैत्यमायापरिष्वक्तो नात्मानं बुबुधे नृप । एतस्मिन्नंतरे प्राप्तः सैन्येन महता वृतः

daityamāyāpariṣvakto nātmānaṁ bubudhe nṛpa etasminnaṁtare prāptaḥ sainyena mahatā vṛtaḥ

हे राजन्! दैत्य की माया से आवृत होकर उन्हें अपनी वास्तविक स्थिति का बोध नहीं रहा। इसी बीच विशाल सेना से घिरा सागर-पुत्र —

श्लोक 22 (padma.6.18.22)

मायामृडानीं स्वरथे निधायार्णवजः शिवम् । जालंधरजये तद्वदासीद्वादित्रनिस्वनः

māyāmṛḍānīṁ svarathe nidhāyārṇavajaḥ śivam jālaṁdharajaye tadvadāsīdvāditranisvanaḥ

अपने रथ में एक मायावी मृडानी (पार्वती) बैठाकर शिव के सामने लाया; और जालंधर की उस विजय में वाद्यों की गूँज इस तरह उठी,

श्लोक 23 (padma.6.18.23)

चचाल वसुधा येन प्रतिनेदुर्महीधराः । हरस्य दर्शयामास पार्वतीं सिंधुनंदनः

cacāla vasudhā yena pratinedurmahīdharāḥ harasya darśayāmāsa pārvatīṁ siṁdhunaṁdanaḥ

जिससे पृथ्वी काँप उठी और पर्वत प्रतिध्वनित हो उठे। सागर-पुत्र ने हर को पार्वती दिखाई।

श्लोक 24 (padma.6.18.24)

रुद्रोऽप्यरिरथस्थां तां ददर्श निजवल्लभाम् । वियोगविधुरां दीनां तन्वीमातुरलोचनाम्

rudro'pyarirathasthāṁ tāṁ dadarśa nijavallabhām viyogavidhurāṁ dīnāṁ tanvīmāturalocanām

रुद्र ने भी शत्रु के रथ में बैठी अपनी उस प्रिया को देखा — वियोग से क्षीण, दीन, कोमलांगी, व्याकुल नेत्रों वाली,

श्लोक 25 (padma.6.18.25)

हा नाथ प्रिय रुद्रेति प्रजल्पंतीं पुनः पुनः । प्रौढवैरिरथे दृष्ट्वा पाखंडिस्थां यथा श्रुतिम्

hā nātha priya rudreti prajalpaṁtīṁ punaḥ punaḥ prauḍhavairirathe dṛṣṭvā pākhaṁḍisthāṁ yathā śrutim

बार-बार 'हाय नाथ! हे प्रिय रुद्र!' कहती हुई; बलशाली शत्रु के रथ में उसे इस प्रकार देखकर, जैसे किसी पाखंडी के मुख में वेद-वाणी हो,

श्लोक 26 (padma.6.18.26)

गौरीं दध्यौ तथा स्थाणुः कथं प्राप्या प्रिया मया । विललाप ततः शंभुर्दैत्यमायाविमोहितः

gaurīṁ dadhyau tathā sthāṇuḥ kathaṁ prāpyā priyā mayā vilalāpa tataḥ śaṁbhurdaityamāyāvimohitaḥ

स्थाणु ने गौरी के विषय में यही सोचा — 'मैं अपनी प्रिया को फिर से कैसे पाऊँ?' तब दैत्य की माया से मोहित शंभु विलाप करने लगे —

श्लोक 27 (padma.6.18.27)

मोहो मे दानवैः कांते हृतासि त्वां कथं प्रिये । शोकमोहप्लुतं दृष्ट्वा शंकरं सागरात्मजः

moho me dānavaiḥ kāṁte hṛtāsi tvāṁ kathaṁ priye śokamohaplutaṁ dṛṣṭvā śaṁkaraṁ sāgarātmajaḥ

'हे प्रिये! दानवों ने मुझे मोहित कर दिया है — तुम मुझसे कैसे हर ली गईं?' शोक और मोह से अभिभूत शंकर को इस प्रकार देखकर सागर-पुत्र ने —

श्लोक 28 (padma.6.18.28)

जगाद प्रहसन्वाक्यं कश्चित्कारुण्यवान्यथा । सर्वप्रमाणशून्योऽसि स्मर शृंगारवर्जितः

jagāda prahasanvākyaṁ kaścitkāruṇyavānyathā sarvapramāṇaśūnyo'si smara śṛṁgāravarjitaḥ

हँसते हुए, मानो कोई करुणामय हो, यह वचन कहा — 'तुम पूर्णतः मानरहित हो गए हो, कामदेव के आकर्षण से भी रहित।

श्लोक 29 (padma.6.18.29)

ईश्वरोऽपि वराकस्त्वं संजातोंबिकया विना । मा रोदीर्हि विरूपाक्ष ददामि तव वल्लभाम्

īśvaro'pi varākastvaṁ saṁjātoṁbikayā vinā mā rodīrhi virūpākṣa dadāmi tava vallabhām

ईश्वर होकर भी अंबिका के बिना तुम अभागे बन गए हो। मत रो, हे विरूपाक्ष! मैं तुम्हें तुम्हारी प्रिया दे देता हूँ।

श्लोक 30 (padma.6.18.30)

रक्षितोऽसि मया रुद्र गृहीत्वा पार्वतीं रणात् । इत्युक्त्वा गिरिशं तूर्णमुत्तार्य स्वरथादुमाम्

rakṣito'si mayā rudra gṛhītvā pārvatīṁ raṇāt ityuktvā giriśaṁ tūrṇamuttārya svarathādumām

हे रुद्र! युद्ध से पार्वती को लेकर मैंने तुम्हें बचा लिया है।' यह कहकर शीघ्र गिरीश को अपने रथ से पार्वती उतारकर,

श्लोक 31 (padma.6.18.31)

सैन्यं संप्रेषयामास शंकराभिमुखं किल । हरोऽपि वृषभेणाशु तत्सैन्यं समधावत

sainyaṁ saṁpreṣayāmāsa śaṁkarābhimukhaṁ kila haro'pi vṛṣabheṇāśu tatsainyaṁ samadhāvata

शंकर के सामने सेना भेज दी। हर भी शीघ्र ही बैल पर सवार होकर उस सेना की ओर दौड़ा,

श्लोक 32 (padma.6.18.32)

गृहीतुं पार्वतीं पाहि त्राहित्राहीति जल्पतीम् । यावद्गृह्णाति तां गौरीं करेण वृषभध्वजः

gṛhītuṁ pārvatīṁ pāhi trāhitrāhīti jalpatīm yāvadgṛhṇāti tāṁ gaurīṁ kareṇa vṛṣabhadhvajaḥ

'बचाओ, बचाओ' कहती हुई पार्वती को लेने के लिए। ज्यों ही वृषभध्वज ने उस गौरी को हाथ से पकड़ना चाहा,

श्लोक 33 (padma.6.18.33)

तावच्छुंभासुरः शीघ्रं गृहीत्वा चांबरे स्थितः । शूलं मुमोच बलवान्हंतुं शुंभासुरं हरः

tāvacchuṁbhāsuraḥ śīghraṁ gṛhītvā cāṁbare sthitaḥ śūlaṁ mumoca balavānhaṁtuṁ śuṁbhāsuraṁ haraḥ

त्यों ही शुंभासुर ने शीघ्र उसे छीन लिया और आकाश में खड़े होकर, हर को मारने के लिए उस बलवान ने भाला छोड़ दिया।

श्लोक 34 (padma.6.18.34)

शुंभेन सा परित्यक्ता शूलोपरि पपात ह । रुदंती चारुसर्वांगी त्यक्ता शूलेन संयुता

śuṁbhena sā parityaktā śūlopari papāta ha rudaṁtī cārusarvāṁgī tyaktā śūlena saṁyutā

शुंभ द्वारा त्यागी गई वह उसी भाले पर गिर पड़ी; रोती हुई, सुंदर सारे अंगों वाली, भाले से बींधी हुई,

श्लोक 35 (padma.6.18.35)

पतिता शंकरस्याग्रे तथेत्युक्त्वा ममार च । मायागौरीं मृतां दृष्ट्वा शोकमोहपरिप्लुतः

patitā śaṁkarasyāgre tathetyuktvā mamāra ca māyāgaurīṁ mṛtāṁ dṛṣṭvā śokamohapariplutaḥ

शंकर के सामने गिरकर 'ऐसा ही हो' कहकर मर गई। उस मायावी गौरी को मरा हुआ देखकर, शोक-मोह से आप्लावित होकर,

श्लोक 36 (padma.6.18.36)

हा प्रियेति रुदन्रुद्रः पपात भुवि मूर्च्छितः । क्षणं संज्ञामवाप्याथ रणभूमावुमापतिः । शशाप शुंभप्रमुखान्गौरी युष्मान्हनिष्यति

hā priyeti rudanrudraḥ papāta bhuvi mūrcchitaḥ kṣaṇaṁ saṁjñāmavāpyātha raṇabhūmāvumāpatiḥ śaśāpa śuṁbhapramukhāngaurī yuṣmānhaniṣyati

'हाय प्रिये' कहते हुए रुद्र मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। क्षणभर में चेतना पाकर, युद्ध-भूमि में उमापति ने,

श्लोक 37 (padma.6.18.37)

नारद उवाच ।अथ शुंभादयो दैत्या रणे देव्या निपातिताः । महेश्वरस्य शापेन गते मंन्वतरे नृप

nārada uvāca atha śuṁbhādayo daityā raṇe devyā nipātitāḥ maheśvarasya śāpena gate maṁnvatare nṛpa

शुंभ आदि को शाप दिया — 'गौरी स्वयं तुम्हें मार डालेगी!' नारद ने कहा — तब हे राजन्! उस युग के बीत जाने पर, महेश्वर के शाप से,

श्लोक 38 (padma.6.18.38)

शपित्वा तान्रुरोदाथ जल्पन्निर्गत्य शंकरः । क्व गतासि प्रियेत्युक्त्वा दुःखितं मां रणांगणे

śapitvā tānrurodātha jalpannirgatya śaṁkaraḥ kva gatāsi priyetyuktvā duḥkhitaṁ māṁ raṇāṁgaṇe

शुंभ आदि दैत्य युद्ध में देवी द्वारा मारे गए। उन्हें शाप देकर शंकर तब रोते हुए बाहर निकलकर विलाप करने लगे — 'हे प्रिये, तुम कहाँ चली गईं' — यह कहते हुए, दुःखी होकर उस युद्ध-भूमि में,

श्लोक 39 (padma.6.18.39)

रतिं त्यक्त्वा वियोगार्तः श्रीकंठोऽहं त्वया कृतः । वासुदेवोऽपि मां त्यक्तं न जानाति त्वया प्रिये

ratiṁ tyaktvā viyogārtaḥ śrīkaṁṭho'haṁ tvayā kṛtaḥ vāsudevo'pi māṁ tyaktaṁ na jānāti tvayā priye

'अपने ही प्रेम को त्यागकर, वियोग से पीड़ित मुझ श्रीकंठ को तुमने ऐसा बना दिया है। वासुदेव भी नहीं जानते कि मैं तुम्हारे द्वारा त्याग दिया गया हूँ, हे प्रिये।

श्लोक 40 (padma.6.18.40)

यज्ञे दक्षस्याग्निकुंडे शिरो देवि हुतं त्वया । भूयो हि भवती लब्धा कथं त्यजसि मां पुनः

yajñe dakṣasyāgnikuṁḍe śiro devi hutaṁ tvayā bhūyo hi bhavatī labdhā kathaṁ tyajasi māṁ punaḥ

दक्ष के यज्ञ की अग्नि-कुंड में, हे देवी! तुमने अपना सिर होम कर दिया था; तुम्हें फिर से पाकर, अब मुझे फिर से क्यों त्याग रही हो?

श्लोक 41 (padma.6.18.41)

उतिष्ठोतिष्ठ चार्वंगि गिरिजे मां प्रबोधय । अत्रांतरे शिवं ज्ञात्वा दैत्यमायाविमोहितम्

utiṣṭhotiṣṭha cārvaṁgi girije māṁ prabodhaya atrāṁtare śivaṁ jñātvā daityamāyāvimohitam

उठो, उठो, हे सुंदरांगी गिरिजे! मुझे जगा दो।' इसी बीच शिव को दैत्य-माया से मोहित जानकर,

श्लोक 42 (padma.6.18.42)

देवतागणमध्यस्थो ह्यंतरिक्षादुपागमत् । विलपंतमुवाचेदमदृश्यः कमलासनः

devatāgaṇamadhyastho hyaṁtarikṣādupāgamat vilapaṁtamuvācedamadṛśyaḥ kamalāsanaḥ

देवताओं के बीच अदृश्य होकर बैठे कमलासन (ब्रह्मा) आकाश से उतरे, और विलाप करते हुए उनसे यह कहा —

श्लोक 43 (padma.6.18.43)

ब्रह्मोवाच ।त्वं शोकमोहपितृमातृविवर्जितोऽसि दुःखं सुखं सुतकलत्ररिपुर्न चास्ति । जातोऽसि नैव जनकेन जनिष्यमाणस्त्वं मन्यसे ऋषिगणैश्च कुतो विमोहः

brahmovāca tvaṁ śokamohapitṛmātṛvivarjito'si duḥkhaṁ sukhaṁ sutakalatraripurna cāsti jāto'si naiva janakena janiṣyamāṇastvaṁ manyase ṛṣigaṇaiśca kuto vimohaḥ

ब्रह्मा ने कहा — 'तुम शोक, मोह, पिता, माता से रहित हो; न तुम्हें दुःख है, न सुख, न पुत्र, न पत्नी, न शत्रु है; तुम किसी जनक से जन्मे ही नहीं, न ही जन्म लोगे — तुम स्वयं को कैसे ऐसा मानते हो, ऋषिगणों के बीच भी भला यह मोह कहाँ से?

श्लोक 44 (padma.6.18.44)

एकोऽसि नाथ बहुधा कृतविग्रहोऽसि सूर्यो यथा जलधिवीचिषु दृश्यमानः । ध्यानेन यांति यमिनस्तव पादमूलं रूपं परं दुरवबोधमवाच्यमेव

eko'si nātha bahudhā kṛtavigraho'si sūryo yathā jaladhivīciṣu dṛśyamānaḥ dhyānena yāṁti yaminastava pādamūlaṁ rūpaṁ paraṁ duravabodhamavācyameva

तुम एक हो, हे नाथ, फिर भी अनेक रूपों में प्रकट होते हो, जैसे सूर्य समुद्र की लहरों में दिखाई देता है; योगीजन ध्यान से ही तुम्हारे चरणों तक पहुँचते हैं; तुम्हारा परम रूप दुर्बोध और वाणी से परे ही है।

श्लोक 45 (padma.6.18.45)

नैषा प्रिया तव समानतया विपन्ना जालंधरेण रचितां जहि देव मायाम् । सा पार्वती कमलकोशगता हि शंभो युद्धस्व वैरिनिवहं जहि पाहि चास्मान्

naiṣā priyā tava samānatayā vipannā jālaṁdhareṇa racitāṁ jahi deva māyām sā pārvatī kamalakośagatā hi śaṁbho yuddhasva vairinivahaṁ jahi pāhi cāsmān

यह तुम्हारी प्रिया नहीं है, केवल समानता से भ्रमित होकर गिरी है — हे देव! जालंधर द्वारा रचित इस माया को त्याग दो। वह असली पार्वती तो कमल-कोश में सुरक्षित है, हे शंभु! शत्रु-समूह से युद्ध करो, उन्हें मार डालो और हमारी रक्षा करो!'

श्लोक 46 (padma.6.18.46)

श्रुत्वेति ब्रह्मणो वाक्यमवबुद्धो महेश्वरः । ज्ञात्वा तां दानवीमायां मुमोच महती शिलाम्

śrutveti brahmaṇo vākyamavabuddho maheśvaraḥ jñātvā tāṁ dānavīmāyāṁ mumoca mahatī śilām

ब्रह्मा की यह बात सुनकर महेश्वर सचेत हो गए; उस दानव-माया को पहचानकर उन्होंने एक विशाल शिला फेंक दी,

श्लोक 47 (padma.6.18.47)

तया जघान समरे दैत्यकोटिशतत्रयम् । ततो वृषभमारुह्य क्रोधेन महता नृप

tayā jaghāna samare daityakoṭiśatatrayam tato vṛṣabhamāruhya krodhena mahatā nṛpa

और उससे युद्ध में तीन सौ करोड़ दैत्यों को मार डाला। फिर बैल पर सवार होकर, हे राजन्! अत्यंत क्रोध से,

श्लोक 48 (padma.6.18.48)

धनुः पिनाकं युद्धाय धूर्जटिर्जगृहे शरान् । अथ मायापरित्यक्तं शर्वमालोक्य सिंधुजः

dhanuḥ pinākaṁ yuddhāya dhūrjaṭirjagṛhe śarān atha māyāparityaktaṁ śarvamālokya siṁdhujaḥ

धूर्जटि ने युद्ध के लिए पिनाक धनुष और बाण उठाए। तब शर्व को माया से मुक्त देखकर सागर-पुत्र ने —

श्लोक 49 (padma.6.18.49)

सुरेशमोहनं मायाजालमत्यद्भुतं नृप । अन्यदाविश्चकाराशु भृशं मायामहाबलम्

sureśamohanaṁ māyājālamatyadbhutaṁ nṛpa anyadāviścakārāśu bhṛśaṁ māyāmahābalam

हे राजन्! देवताओं को मोहित करने वाला, अत्यंत अद्भुत, अत्यंत शक्तिशाली एक और माया-जाल शीघ्र ही रच डाला।

श्लोक 50 (padma.6.18.50)

जालंधरः कोटिभुजो बभूव वृक्षास्त्रशस्त्रैर्युयुधे वृषांकम् । अथांतराले पृथिवीं चकार समुद्रसूनुर्गिरिधातुमंडिताम्

jālaṁdharaḥ koṭibhujo babhūva vṛkṣāstraśastrairyuyudhe vṛṣāṁkam athāṁtarāle pṛthivīṁ cakāra samudrasūnurgiridhātumaṁḍitām

जालंधर करोड़ों भुजाओं वाला बन गया, वृक्ष-अस्त्रों से वृषभध्वज से युद्ध करने लगा; और इस बीच सागर-पुत्र ने पर्वत-धातुओं से सुशोभित एक पृथ्वी रच दी —

श्लोक 51 (padma.6.18.51)

देवतायतनै रम्यैर्नानापुष्पसमाकुलैः । मंडितां नृप भूमिं च चकारोदधिनंदनः । नृत्यंति यत्राप्सरसो मेनकाद्या मनोहरा

devatāyatanai ramyairnānāpuṣpasamākulaiḥ maṁḍitāṁ nṛpa bhūmiṁ ca cakārodadhinaṁdanaḥ nṛtyaṁti yatrāpsaraso menakādyā manoharā

हे राजन्! सागर-पुत्र ने उस पृथ्वी को सुंदर देव-मंदिरों और अनेक फूलों से सजा दिया, जहाँ मेनका आदि मनोहर अप्सराएँ नाचती थीं।

श्लोक 52 (padma.6.18.52)

विस्मृत्य शंभुस्तदपास्यकार्मुकं सद्यः प्रतस्थे वृषभोपरि स्थितः । वादित्रगीतैर्भुवि मोहितो भृशं दैत्येंद्रमायामय तांडवेन सः

vismṛtya śaṁbhustadapāsyakārmukaṁ sadyaḥ pratasthe vṛṣabhopari sthitaḥ vāditragītairbhuvi mohito bhṛśaṁ daityeṁdramāyāmaya tāṁḍavena saḥ

शंभु स्वयं को भूलकर, अपने धनुष को त्यागकर, तुरंत उस पृथ्वी पर बैल पर सवार चल पड़े, वाद्य-गीतों से और दैत्येंद्र की मायामय तांडव-लीला से अत्यंत मोहित होकर।

श्लोक 53 (padma.6.18.53)

विमोहितं वीक्ष्य वृषस्थितं हरं नित्यं समुद्रः सह तांडवेन । गीतेन वाद्येन च नृत्यलीलया ननाद रूपी तरसा विमोहितुम्

vimohitaṁ vīkṣya vṛṣasthitaṁ haraṁ nityaṁ samudraḥ saha tāṁḍavena gītena vādyena ca nṛtyalīlayā nanāda rūpī tarasā vimohitum

बैल पर सवार हर को इस प्रकार मोहित देखकर, वह सागर, तांडव-नृत्य, गीत, वाद्य और नृत्य-लीला के साथ रूप धारण करके, उसे और अधिक मोहित करने के लिए वेगपूर्वक गरज उठा।

श्लोक 54 (padma.6.18.54)

जंतून्क्षिप्त्वोदधौ तांश्च सहस्रं स ततोत्सवः । क्व च ता देवताः सर्वाः क्व नंदिप्रमुखा गणाः

jaṁtūnkṣiptvodadhau tāṁśca sahasraṁ sa tatotsavaḥ kva ca tā devatāḥ sarvāḥ kva naṁdipramukhā gaṇāḥ

हज़ारों जीवों को सागर में फेंककर वह उत्सव चलता रहा; अब कहाँ थे वे सब देवता? कहाँ थे नंदी आदि गण?

श्लोक 55 (padma.6.18.55)

अपि त्वं माननीयोऽसि मोहितो दैत्यमायया । किमद्य शंभो भगवन्नुपेक्ष्यते उदीर्यचक्रं जठरस्थितं च

api tvaṁ mānanīyo'si mohito daityamāyayā kimadya śaṁbho bhagavannupekṣyate udīryacakraṁ jaṭharasthitaṁ ca

फिर भी तुम आदरणीय ही हो, दैत्य की माया से मोहित होते हुए भी। 'हे शंभु, प्रभो! आज इसकी उपेक्षा क्यों की जा रही है — वह चक्र, जो उसी के पेट में स्थित है, उभर रहा है;

श्लोक 56 (padma.6.18.56)

वधाय चास्यैव कृतं महेश जालंधरं संहरते न चाजौ । इति कृष्णस्य वचनात्तत्स्मृत्वात्मानमीश्वरम्

vadhāya cāsyaiva kṛtaṁ maheśa jālaṁdharaṁ saṁharate na cājau iti kṛṣṇasya vacanāttatsmṛtvātmānamīśvaram

हे महेश! यह चक्र इसी के वध के लिए बनाया गया था — फिर भी इस युद्ध में जालंधर का संहार नहीं किया जा रहा!' कृष्ण की इस वाणी से स्वयं को ईश्वर स्मरण करके,

श्लोक 57 (padma.6.18.57)

आरुह्य वृषभं शीघ्रमाजगाम महारणम् । तमागतं शिवं दृष्ट्वा सर्वसैन्यसमावृतः

āruhya vṛṣabhaṁ śīghramājagāma mahāraṇam tamāgataṁ śivaṁ dṛṣṭvā sarvasainyasamāvṛtaḥ

बैल पर सवार होकर वे शीघ्र ही उस महासंग्राम में आ पहुँचे। शिव को इस प्रकार आया देखकर, सारी सेना सहित,

श्लोक 58 (padma.6.18.58)

रुरोध समरे राजन्क्रुद्धो जालंधरोऽसुरः । हरस्य कुपितस्यासीत्सृष्टिसंहारकारकम्

rurodha samare rājankruddho jālaṁdharo'suraḥ harasya kupitasyāsītsṛṣṭisaṁhārakārakam

हे राजन्! क्रुद्ध दैत्य जालंधर ने युद्ध में उन्हें रोक लिया। क्रुद्ध हर का वह रूप, जो सृष्टि और संहार दोनों करने वाला था —

श्लोक 59 (padma.6.18.59)

रूपं तृतीयनेत्राग्नौ दानवाः शलभा यथा । रुपं दृष्ट्वा भगवतो रौद्रज्वालामयं नृप

rūpaṁ tṛtīyanetrāgnau dānavāḥ śalabhā yathā rupaṁ dṛṣṭvā bhagavato raudrajvālāmayaṁ nṛpa

उनके तीसरे नेत्र की अग्नि में दानव पतंगों की भाँति भस्म होने लगे। हे राजन्! भगवान के उस भयंकर ज्वालामय रूप को देखकर,

श्लोक 60 (padma.6.18.60)

शुंभादयस्तदा दैत्या राहुप्रभृतयश्च ये । रुद्रं निरीक्ष्य संत्रस्ताः पातालं विविशुर्भयात्

śuṁbhādayastadā daityā rāhuprabhṛtayaśca ye rudraṁ nirīkṣya saṁtrastāḥ pātālaṁ viviśurbhayāt

शुंभ आदि दैत्य और राहु आदि, रुद्र को देखकर भयभीत होकर, भय से पाताल में घुस गए।

श्लोक 61 (padma.6.18.61)

सेनाभटाननेकांश्च हतान्दृष्ट्वा महामृधे । शुंभादीन्हतशेषांस्तान्दृष्ट्वात्मानं पलायितान्

senābhaṭānanekāṁśca hatāndṛṣṭvā mahāmṛdhe śuṁbhādīnhataśeṣāṁstāndṛṣṭvātmānaṁ palāyitān

उस महासंग्राम में अनेक सैनिक-योद्धाओं को मारा गया देखकर, और शुंभ आदि शेष बचों को भी भाग जाते देखकर,

श्लोक 62 (padma.6.18.62)

तदा जालंधरः संख्ये एको गिरिरिवस्थितः । परमार्थं रुद्ररूपं हृष्टः साक्षाद्विलोकयन्

tadā jālaṁdharaḥ saṁkhye eko giririvasthitaḥ paramārthaṁ rudrarūpaṁ hṛṣṭaḥ sākṣādvilokayan

तब जालंधर अकेला ही युद्ध में पर्वत की तरह डटा रहा, रुद्र के परमार्थ स्वरूप को स्वयं हर्षित होकर साक्षात् देखते हुए।

श्लोक 63 (padma.6.18.63)

ततो जालंधरः प्राह महादेवं प्रहस्य च । रूपं संहर येन त्वं दहसे सचराचरम्

tato jālaṁdharaḥ prāha mahādevaṁ prahasya ca rūpaṁ saṁhara yena tvaṁ dahase sacarācaram

तब जालंधर ने हँसते हुए महादेव से कहा — 'उस रूप को समेट लो, जिससे तुम चराचर को जला रहे हो।

श्लोक 64 (padma.6.18.64)

शस्त्रेण कुरु संग्रामं त्यक्त्वा योगबलं निजम् । इति जालंधरवचः श्रुत्वोवाच ततः शिवः

śastreṇa kuru saṁgrāmaṁ tyaktvā yogabalaṁ nijam iti jālaṁdharavacaḥ śrutvovāca tataḥ śivaḥ

अपनी योगशक्ति त्यागकर शस्त्रों से युद्ध करो।' जालंधर की यह बात सुनकर शिव ने कहा —

श्लोक 65 (padma.6.18.65)

वरं वरय दैत्येश प्रीतोऽस्मि तव कर्मणा । ईदृक्षमपि मद्रूपं दृष्ट्वा यन्निर्भयोऽधुना

varaṁ varaya daityeśa prīto'smi tava karmaṇā īdṛkṣamapi madrūpaṁ dṛṣṭvā yannirbhayo'dhunā

'हे दैत्येश! वर माँगो, मैं तुम्हारे इस कर्म से प्रसन्न हूँ, कि मेरा ऐसा रूप देखकर भी अब तुम निर्भय हो।

श्लोक 66 (padma.6.18.66)

अपि ब्रह्मांडमखिलं मद्रूपस्यास्य दानव । तेजसो वीक्षणेनालं तत्र त्वमसि निर्भयः

api brahmāṁḍamakhilaṁ madrūpasyāsya dānava tejaso vīkṣaṇenālaṁ tatra tvamasi nirbhayaḥ

हे दानव! इस मेरे रूप के तेज को देखना तो पूरा ब्रह्मांड भी सह नहीं सकता — और वहाँ तुम निर्भय खड़े हो।'

श्लोक 67 (padma.6.18.67)

नारद उवाच ।इति शंभोः प्रसादं च मत्वा संसारनिस्पृहः । जालंधरो हराद्वव्रे मुक्तिं सायुज्यतां पराम्

nārada uvāca iti śaṁbhoḥ prasādaṁ ca matvā saṁsāranispṛhaḥ jālaṁdharo harādvavre muktiṁ sāyujyatāṁ parām

नारद ने कहा — शंभु की इस कृपा को मानकर, संसार से विरक्त होकर, जालंधर ने हर से मुक्ति, परम सायुज्य माँगा।

श्लोक 68 (padma.6.18.68)

श्रीमहादेव उवाच । दिव्यं देहमिदं दैत्य भोगसिद्धियुतं तव । वृंदा मनोहरं रम्यमिहस्थं कालमश्नुते

śrīmahādeva uvāca divyaṁ dehamidaṁ daitya bhogasiddhiyutaṁ tava vṛṁdā manoharaṁ ramyamihasthaṁ kālamaśnute

श्री महादेव ने कहा — 'हे दैत्य! तुम्हारा यह दिव्य शरीर, सभी भोग-सिद्धियों से युक्त — वृंदा, मनोहर और रम्य, अभी भी तुम्हारे समय की प्रतीक्षा कर रही है।

श्लोक 69 (padma.6.18.69)

मुहूर्तं परमात्मानं तमेकाकिनमव्ययम् । अबुद्ध्वा त्यजसे मूर्ख कथं त्वं मुक्तिमिच्छसि

muhūrtaṁ paramātmānaṁ tamekākinamavyayam abuddhvā tyajase mūrkha kathaṁ tvaṁ muktimicchasi

उस परमात्मा को, अद्वितीय और अविनाशी को, एक क्षण भी बिना जाने, हे मूर्ख! तुम मुक्ति की कामना कैसे करते हो?

श्लोक 70 (padma.6.18.70)

वृंदा तव प्रिया राज्ञी हृता सा योगमायया । ब्रह्मस्वरूपं विज्ञाय प्राप्ता तत्परमं पदम्

vṛṁdā tava priyā rājñī hṛtā sā yogamāyayā brahmasvarūpaṁ vijñāya prāptā tatparamaṁ padam

तुम्हारी प्रिया रानी वृंदा को योग-माया से हर लिया गया है; ब्रह्म-स्वरूप को जानकर उसने वह परम पद प्राप्त कर लिया है।

श्लोक 71 (padma.6.18.71)

इदानीं दुर्ल्लभा सा च तत्पदं चैव दुर्ल्लभम् । स्वर्गापवर्गयोर्मध्ये संसारे वरमाप्नुहि

idānīṁ durllabhā sā ca tatpadaṁ caiva durllabham svargāpavargayormadhye saṁsāre varamāpnuhi

अब वह दुर्लभ है, और वह पद भी दुर्लभ है। स्वर्ग और मोक्ष के बीच, संसार में जो श्रेष्ठ हो, वही प्राप्त करो।'

श्लोक 72 (padma.6.18.72)

जालंधर उवाच ।देवमुक्तपदं लभ्यं कृतकृत्येन केनचित् । इदानीं कृतकृत्योऽस्मि यत्त्वां पश्ये त्वया हतः

jālaṁdhara uvāca devamuktapadaṁ labhyaṁ kṛtakṛtyena kenacit idānīṁ kṛtakṛtyo'smi yattvāṁ paśye tvayā hataḥ

जालंधर ने कहा — 'देव द्वारा दिया गया वह पद उसी को मिलता है जिसने अपना समस्त कार्य पूरा कर लिया हो; अब मैं भी कृतकृत्य हूँ, क्योंकि मैं आपको देख रहा हूँ, और आपके द्वारा ही मारा जाऊँगा।'

श्लोक 73 (padma.6.18.73)

शिव उवाच ।मत्स्थानं परमं क्षेत्रं यदि त्वं गंतुमुत्सुकः । तर्हि मां कोपयस्वाशु दैत्यं हत्वा दृढैः शरैः

śiva uvāca matsthānaṁ paramaṁ kṣetraṁ yadi tvaṁ gaṁtumutsukaḥ tarhi māṁ kopayasvāśu daityaṁ hatvā dṛḍhaiḥ śaraiḥ

शिव ने कहा — 'यदि तुम मेरे परम स्थान, परम क्षेत्र में जाने के उत्सुक हो, तो शीघ्र ही मुझे क्रोधित करो — दृढ़ बाणों से इस दैत्य को मारकर।

श्लोक 74 (padma.6.18.74)

ततोऽहं त्वां हनिष्यामि मत्स्थानं यास्यसेऽनघ । महेश्वरवचः श्रुत्वा प्राह जालंधरः शिवम्

tato'haṁ tvāṁ haniṣyāmi matsthānaṁ yāsyase'nagha maheśvaravacaḥ śrutvā prāha jālaṁdharaḥ śivam

फिर मैं तुम्हें मार दूँगा, और तुम मेरे ही स्थान को प्राप्त करोगे, हे निष्पाप!' महेश्वर की यह बात सुनकर जालंधर ने शिव से कहा —

श्लोक 75 (padma.6.18.75)

त्वयि सर्वजगत्पूज्ये पूर्वं न प्रहराम्यहम्

tvayi sarvajagatpūjye pūrvaṁ na praharāmyaham

'समूचे जगत के पूज्य आप पर मैं पहले प्रहार नहीं करूँगा।'

श्लोक 76 (padma.6.18.76)

नारद उवाच ।एवमुक्तो जघानाशु सिंधुजं विशिखैः शिवः । ते शराः सिंधुपुत्रस्य देहलग्ना विभांति च

nārada uvāca evamukto jaghānāśu siṁdhujaṁ viśikhaiḥ śivaḥ te śarāḥ siṁdhuputrasya dehalagnā vibhāṁti ca

नारद ने कहा — यह कहे जाने पर शिव ने शीघ्र ही सागर-पुत्र को बाणों से मारा; वे बाण सागर-पुत्र के शरीर में लगे हुए ऐसे शोभित हुए,

श्लोक 77 (padma.6.18.77)

यथा लोहगिरिप्रांते वेणवो वह्निदीपिताः । जालंधरो हरस्यांगं पूरयामास मार्गणैः

yathā lohagiriprāṁte veṇavo vahnidīpitāḥ jālaṁdharo harasyāṁgaṁ pūrayāmāsa mārgaṇaiḥ

जैसे लोह-पर्वत के किनारे अग्नि से प्रज्वलित बाँस हों। जालंधर ने भी हर के शरीर को अपने बाणों से भर दिया।

श्लोक 78 (padma.6.18.78)

तैः शरैः शुशुभे रुद्रो यथा खं खेचराकुलम् । जालंधरेशयोर्युद्धं तथा द्वंद्वमभून्नृप

taiḥ śaraiḥ śuśubhe rudro yathā khaṁ khecarākulam jālaṁdhareśayoryuddhaṁ tathā dvaṁdvamabhūnnṛpa

उन बाणों से रुद्र ऐसे शोभित हुए जैसे पक्षियों से भरा आकाश। इस प्रकार, हे राजन्! जालंधर और ईश्वर के बीच द्वंद्वयुद्ध हुआ।

श्लोक 79 (padma.6.18.79)

हरादन्येन हंतास्ति न सोढान्योऽर्णवात्मजात् । गिरिकोटिसहस्रैस्तु तदा पृथ्वीपुटोद्धृतैः

harādanyena haṁtāsti na soḍhānyo'rṇavātmajāt girikoṭisahasraistu tadā pṛthvīpuṭoddhṛtaiḥ

उसे हर के अतिरिक्त कोई और नहीं मार सकता था, और सागर-पुत्र के अतिरिक्त कोई और उसके आघात नहीं सह सकता था। तब लाखों-करोड़ों पर्वतों को, धरती की तहों से उखाड़कर,

श्लोक 80 (padma.6.18.80)

पूरयामास समरे सिंधुजः पार्वतीपतिम् । ततः शूलेन निहतो रुद्रेणोरसि दानवः

pūrayāmāsa samare siṁdhujaḥ pārvatīpatim tataḥ śūlena nihato rudreṇorasi dānavaḥ

सागर-पुत्र ने युद्ध में पार्वतीपति को भर दिया। तब रुद्र के त्रिशूल से छाती पर आहत होकर वह दैत्य,

श्लोक 81 (padma.6.18.81)

निःससार मुखात्तस्य ज्वरो जंभो भयंकरः । स च वीरज्वरोनाम सिंहवक्त्रो नराकृतिः

niḥsasāra mukhāttasya jvaro jaṁbho bhayaṁkaraḥ sa ca vīrajvaronāma siṁhavaktro narākṛtiḥ

अपने मुख से भयंकर जंभ नामक एक ज्वर उगल बैठा; और वह वीरज्वर नाम का, सिंहमुख, मनुष्याकृति ज्वर —

श्लोक 82 (padma.6.18.82)

दैत्यदेहाद्विनिष्क्रांतं दृष्ट्वा सिंहमुखं ज्वरम् । हुंकारमकरोद्घोरं शरभस्तत्र निर्ययौ

daityadehādviniṣkrāṁtaṁ dṛṣṭvā siṁhamukhaṁ jvaram huṁkāramakarodghoraṁ śarabhastatra niryayau

दैत्य के शरीर से निकले सिंहमुख ज्वर को देखकर उसने एक भयानक हुंकार भरी; तब वहाँ शरभ प्रकट हुआ।

श्लोक 83 (padma.6.18.83)

शिवस्य निःसृतेनासौ शरभेण निपातितः । अजेयं शंकरं दृष्ट्वा वृषभेंद्रेण संयुतम्

śivasya niḥsṛtenāsau śarabheṇa nipātitaḥ ajeyaṁ śaṁkaraṁ dṛṣṭvā vṛṣabheṁdreṇa saṁyutam

शिव से निकले उस शरभ द्वारा वह गिरा दिया गया। श्रेष्ठ बैल सहित अजेय शंकर को देखकर,

श्लोक 84 (padma.6.18.84)

आययौ वृषभाभ्याशे तरसा सागरात्मजः । वृषं पुच्छे गृहीत्वा च भ्रामयामास चांबरे

āyayau vṛṣabhābhyāśe tarasā sāgarātmajaḥ vṛṣaṁ pucche gṛhītvā ca bhrāmayāmāsa cāṁbare

सागर-पुत्र वेगपूर्वक बैल के समीप पहुँचा; बैल को पूँछ से पकड़कर उसने उसे आकाश में घुमाया,

श्लोक 85 (padma.6.18.85)

जालंधरो महाबाहुश्चिक्षेप हिमवद्गिरौ । ततस्त्रिशूलमत्युग्रं मुमोच गिरिजापतिः

jālaṁdharo mahābāhuścikṣepa himavadgirau tatastriśūlamatyugraṁ mumoca girijāpatiḥ

महाबाहु जालंधर ने उसे हिमालय पर्वत पर फेंक दिया। तब गिरिजापति ने अपना अत्यंत भयंकर त्रिशूल छोड़ा।

श्लोक 86 (padma.6.18.86)

तद्धस्तेन गृहीत्वा च दैत्येशः शिवसन्निधौ । रथारूढो धनुर्गृह्य कालकेदारमब्धिजः

taddhastena gṛhītvā ca daityeśaḥ śivasannidhau rathārūḍho dhanurgṛhya kālakedāramabdhijaḥ

उसे हाथ से पकड़कर, शिव के सामने ही, दैत्यराज सागर-पुत्र रथ पर सवार होकर, कालकेदार धनुष उठाकर,

श्लोक 87 (padma.6.18.87)

पूरयामास विशिखैः शिवमुर्वीतले स्थितम् । उग्रः शस्त्राञ्छरान्छित्वा बाणै रथमचूर्णयत्

pūrayāmāsa viśikhaiḥ śivamurvītale sthitam ugraḥ śastrāñcharānchitvā bāṇai rathamacūrṇayat

पृथ्वी पर खड़े शिव को बाणों से भर दिया। उग्र होकर शस्त्रों-बाणों को काटकर, उसने बाणों से उसका रथ चूर-चूर कर डाला —

श्लोक 88 (padma.6.18.88)

दशयोजनविस्तीर्णं सारथ्यश्व समन्वितम् । जालंरोऽपि विरथो अभ्यधावन्मृधे शिवम्

daśayojanavistīrṇaṁ sārathyaśva samanvitam jālaṁro'pi viratho abhyadhāvanmṛdhe śivam

दस योजन विस्तृत, सारथि और घोड़ों सहित। जालंधर भी रथहीन होकर युद्ध में शिव की ओर दौड़ा।

श्लोक 89 (padma.6.18.89)

तयोर्युद्धमभूद्घोरमद्भुतं लोमहर्षणम् । तद्दृष्ट्वाऽकांडकल्पांत शंकया तत्र सुःसुराः

tayoryuddhamabhūdghoramadbhutaṁ lomaharṣaṇam taddṛṣṭvā'kāṁḍakalpāṁta śaṁkayā tatra suḥsurāḥ

उन दोनों के बीच एक भीषण, अद्भुत, रोंगटे खड़े कर देने वाला युद्ध हुआ; उसे देखकर वहाँ के देवगण असमय-प्रलय की आशंका से भयभीत हो गए।

श्लोक 90 (padma.6.18.90)

सर्वास्त्रैस्तावदन्योन्यं जघ्नतुर्भीमविक्रमौ । पद्भिः पृथ्वीं चालयंतौ कंपयंतौ नभः स्वनैः

sarvāstraistāvadanyonyaṁ jaghnaturbhīmavikramau padbhiḥ pṛthvīṁ cālayaṁtau kaṁpayaṁtau nabhaḥ svanaiḥ

भयंकर पराक्रम वाले वे दोनों सभी अस्त्रों से एक-दूसरे पर प्रहार करने लगे, अपने पैरों से पृथ्वी हिलाते और अपनी गर्जना से आकाश काँपाते हुए।

श्लोक 91 (padma.6.18.91)

अथोत्कटं बलं दृष्ट्वा दानवेंद्रस्य शंकरः । शस्त्रजालं जहाराशु योगमायाबलेन सः

athotkaṭaṁ balaṁ dṛṣṭvā dānaveṁdrasya śaṁkaraḥ śastrajālaṁ jahārāśu yogamāyābalena saḥ

तब दानवराज के प्रचंड बल को देखकर शंकर ने अपनी योगमाया-शक्ति से शीघ्र ही उसके सारे शस्त्र हर लिए।

श्लोक 92 (padma.6.18.92)

ततः कोटिभुजो दैत्यो दंष्ट्रा भीषणलोचनः । शस्त्रहीनोऽपि तरसा धावमानो हरं ययौ

tataḥ koṭibhujo daityo daṁṣṭrā bhīṣaṇalocanaḥ śastrahīno'pi tarasā dhāvamāno haraṁ yayau

तब वह करोड़ों भुजाओं वाला दैत्य, भयानक दाढ़ों-नेत्रों वाला, शस्त्रहीन होते हुए भी वेगपूर्वक हर की ओर दौड़ा,

श्लोक 93 (padma.6.18.93)

विशालकरबंधेन बबंध समरे शिवम् । ततस्तस्य कृपाणेन चिच्छेद करकाननम्

viśālakarabaṁdhena babaṁdha samare śivam tatastasya kṛpāṇena ciccheda karakānanam

और युद्ध में अपनी विशाल भुजाओं की जकड़ से शिव को बाँध लिया। तब उन्होंने कटार से उसकी उन भुजाओं के वन को काट डाला।

श्लोक 94 (padma.6.18.94)

सिंधुजेन भुजाक्रांतो रुद्रोभून्नीललोहितः । लीलया योधयामास रणेऽसौ सिंधुनंदनः

siṁdhujena bhujākrāṁto rudrobhūnnīlalohitaḥ līlayā yodhayāmāsa raṇe'sau siṁdhunaṁdanaḥ

सागर-पुत्र की भुजाओं में जकड़े हुए रुद्र नीले-लाल हो गए; सागर-पुत्र वहाँ लीलापूर्वक युद्ध करता रहा।

श्लोक 95 (padma.6.18.95)

छिन्नहस्तोऽपि युयुधे स्वर्भानुः शिरसा यथा । नियुद्धेन नदीसूनुस्तोषयामास शंकरम्

chinnahasto'pi yuyudhe svarbhānuḥ śirasā yathā niyuddhena nadīsūnustoṣayāmāsa śaṁkaram

हाथ कट जाने पर भी वह युद्ध करता रहा, जैसे स्वर्भानु केवल सिर से ही युद्ध करता है; उस कुश्ती-युद्ध से नदी-पुत्र ने शंकर को संतुष्ट कर दिया।

श्लोक 96 (padma.6.18.96)

परितुष्टोऽब्रवीच्छंभुर्वरं वरय दुर्लभम् । जालंधरेणसोऽप्युक्तस्त्वं मे देह्यात्मनः पदम्

parituṣṭo'bravīcchaṁbhurvaraṁ varaya durlabham jālaṁdhareṇaso'pyuktastvaṁ me dehyātmanaḥ padam

संतुष्ट होकर शंभु ने कहा — 'दुर्लभ वर भी माँगो।' जालंधर के ऐसा कहे जाने पर उससे कहा गया — 'तुम मुझे अपना ही पद दे दो।

श्लोक 97 (padma.6.18.97)

मम दोःशस्त्रहीनस्य नावज्ञां कर्तुमर्हसि । शीघ्रं प्रयच्छ मे सिद्धिं नोचेत्त्वां संहराम्यहम्

mama doḥśastrahīnasya nāvajñāṁ kartumarhasi śīghraṁ prayaccha me siddhiṁ nocettvāṁ saṁharāmyaham

निःशस्त्र और भुजाहीन मुझ पर अवमानना मत करो; शीघ्र मुझे सिद्धि दो, अन्यथा मैं तुम्हारा संहार कर दूँगा।'

श्लोक 98 (padma.6.18.98)

इत्युक्त्वा सभुजो भूत्वा जघ्ने तं मुष्टिनोरसि । ततः सुदर्शनं चक्रं पुरा यन्निर्मितं स्वयम्

ityuktvā sabhujo bhūtvā jaghne taṁ muṣṭinorasi tataḥ sudarśanaṁ cakraṁ purā yannirmitaṁ svayam

यह कहकर, फिर से भुजाओं सहित होकर उसने मुट्ठी से उनकी छाती पर प्रहार किया। तब पहले उन्हीं के द्वारा बनाया गया वह सुदर्शन चक्र,

श्लोक 99 (padma.6.18.99)

मुखादुद्गीर्य तद्धस्ते गृहीत्वा तोलयद्रुषा । सूर्यकोटिसहस्राभं ग्रसंतं सचराचरम्

mukhādudgīrya taddhaste gṛhītvā tolayadruṣā sūryakoṭisahasrābhaṁ grasaṁtaṁ sacarācaram

अपने ही मुख से निकालकर, हाथ में लेकर, क्रोधपूर्वक तौलते हुए — करोड़ों-अरबों सूर्यों के समान तेजस्वी, चराचर को निगलने वाला —

श्लोक 100 (padma.6.18.100)

तेन चक्रेण चिच्छेद शिरो जालंधरस्य च । ततस्तच्छीर्षमुत्प्लुत्य गगने शतयोजनम्

tena cakreṇa ciccheda śiro jālaṁdharasya ca tatastacchīrṣamutplutya gagane śatayojanam

उस चक्र से उन्होंने जालंधर का सिर काट डाला। तब वह सिर उछलकर आकाश में सौ योजन तक उड़ गया,

श्लोक 101 (padma.6.18.101)

दंष्ट्रा शतकरालास्यं स्वर्भूमिनयनं च यत् । व्याघ्रगत्या ततो यातं सदनं ब्रह्मणो नृप

daṁṣṭrā śatakarālāsyaṁ svarbhūminayanaṁ ca yat vyāghragatyā tato yātaṁ sadanaṁ brahmaṇo nṛpa

सौ भयानक दाढ़ों वाला विकराल मुख, स्वर्ग-लोक जैसे नेत्रों वाला — हे राजन्! व्याघ्र की गति से वह ब्रह्मा के भवन तक जा पहुँचा।

श्लोक 102 (padma.6.18.102)

भूयः स्वर्गे ततो दृष्ट्वा मृडः शीर्षमधावत । स्रवत्तद्रुधिरं भूरि प्रकुर्वद्भैरवस्वनम्

bhūyaḥ svarge tato dṛṣṭvā mṛḍaḥ śīrṣamadhāvata sravattadrudhiraṁ bhūri prakurvadbhairavasvanam

फिर स्वर्ग में उसे फिर से देखकर मृड (शिव) उस सिर के पीछे दौड़े, जिससे बहुत रक्त बह रहा था और जो भयानक ध्वनि कर रहा था।

श्लोक 103 (padma.6.18.103)

ततो दिशः प्रणष्टास्ता गगनं विलयं गतम् । न तेजसां प्रकाशोऽस्ति चचाल वसुधा भयात्

tato diśaḥ praṇaṣṭāstā gaganaṁ vilayaṁ gatam na tejasāṁ prakāśo'sti cacāla vasudhā bhayāt

तब दिशाएँ लुप्त हो गईं, आकाश ही लीन हो गया; कहीं कोई प्रकाश नहीं रहा, भय से पृथ्वी काँप उठी।

श्लोक 104 (padma.6.18.104)

आपतंतं जघानाशु रुद्रश्चक्रेण तच्छिरः । द्विधा भूत्वाथ राजेंद्र पपात हिमवद्गिरौ

āpataṁtaṁ jaghānāśu rudraścakreṇa tacchiraḥ dvidhā bhūtvātha rājeṁdra papāta himavadgirau

उस उड़ते हुए सिर को रुद्र ने शीघ्र ही चक्र से मारा; हे राजेंद्र! दो टुकड़ों में विभक्त होकर वह हिमालय पर्वत पर गिर पड़ा।

श्लोक 105 (padma.6.18.105)

ततो जालंधरस्याशु शिरसः शकले किल । विशतः सर्वभूतानां पश्यतां स्म वृषाकपौ

tato jālaṁdharasyāśu śirasaḥ śakale kila viśataḥ sarvabhūtānāṁ paśyatāṁ sma vṛṣākapau

फिर तुरंत जालंधर के सिर के उन दोनों टुकड़ों से, सभी प्राणियों के देखते-देखते, वृषाकपि (शिव) के सामने प्रविष्ट होते हुए,

श्लोक 106 (padma.6.18.106)

तस्य कंठात्समुद्भूता दैत्याः शतसहस्रशः । ते हतास्तेन चक्रेण कपर्दिकरशालिना

tasya kaṁṭhātsamudbhūtā daityāḥ śatasahasraśaḥ te hatāstena cakreṇa kapardikaraśālinā

उसके गले से लाखों की संख्या में दैत्य उत्पन्न हुए; वे उसी जटाधारी के हाथ में स्थित चक्र से मारे गए।

श्लोक 107 (padma.6.18.107)

जालंधरकबंधं तन्ननर्त रुधिरारुणम् । पुनः पुनः समुद्भूतास्तस्य कंठात्तु दानवाः

jālaṁdharakabaṁdhaṁ tannanarta rudhirāruṇam punaḥ punaḥ samudbhūtāstasya kaṁṭhāttu dānavāḥ

रक्त से लाल हुआ जालंधर का वह धड़ नाचता रहा; बार-बार उसके गले से दानव उत्पन्न होते रहे,

श्लोक 108 (padma.6.18.108)

पुनः पुनर्बलवता छिन्नाश्चक्रेण शंभुना । मेदसा सिंधुपुत्रस्य पूरिता सकला मही

punaḥ punarbalavatā chinnāścakreṇa śaṁbhunā medasā siṁdhuputrasya pūritā sakalā mahī

और बार-बार शंभु के उस बलवान चक्र से काटे जाते रहे; सागर-पुत्र की चर्बी से समूची पृथ्वी भर गई।

श्लोक 109 (padma.6.18.109)

मेदिनी मेदसैवैषा ख्यातिं प्राप्ता तु पार्थिव । यत्र दैत्यवरस्यास्य शोणितं शैलतां गतम्

medinī medasaivaiṣā khyātiṁ prāptā tu pārthiva yatra daityavarasyāsya śoṇitaṁ śailatāṁ gatam

हे राजन्! यह पृथ्वी उसी चर्बी के कारण 'मेदिनी' नाम से विख्यात हुई; जहाँ उस श्रेष्ठ दैत्य का रक्त पत्थर बन गया,

श्लोक 110 (padma.6.18.110)

कैलासस्योत्तरे भागे तत्राभूच्छोणितं पुरम् । अथ मांसचयान्दृष्ट्वा सर्वतो व्याप्य तिष्ठतः

kailāsasyottare bhāge tatrābhūcchoṇitaṁ puram atha māṁsacayāndṛṣṭvā sarvato vyāpya tiṣṭhataḥ

कैलास के उत्तर भाग में वहाँ शोणितपुर नामक नगर बना। फिर सब ओर फैले उन मांस-ढेरों को देखकर,

श्लोक 111 (padma.6.18.111)

तदा सस्मार देवेशश्चतुःषष्टिगणं रणे । विज्ञानस्मरणाद्देव्यः संप्राप्ताः शंकरांतिकम्

tadā sasmāra deveśaścatuḥṣaṣṭigaṇaṁ raṇe vijñānasmaraṇāddevyaḥ saṁprāptāḥ śaṁkarāṁtikam

तब देवेश ने युद्ध में अपने चौंसठ योगिनी-गणों का स्मरण किया; उसी स्मरण मात्र से वे देवियाँ शंकर के समीप आ पहुँचीं।

श्लोक 112 (padma.6.18.112)

कृतांजलिपुटाः प्रोचुः शिव किं करवामहे

kṛtāṁjalipuṭāḥ procuḥ śiva kiṁ karavāmahe

हाथ जोड़कर उन्होंने कहा — 'हे शिव! हम क्या करें?'

श्लोक 113 (padma.6.18.113)

महादेव उवाच ।य एते दैत्यमांसस्य राशयो गिरिसन्निभाः । भक्षयध्वं युताः शीघ्रं दत्तानुज्ञा मया तु वः

mahādeva uvāca ya ete daityamāṁsasya rāśayo girisannibhāḥ bhakṣayadhvaṁ yutāḥ śīghraṁ dattānujñā mayā tu vaḥ

महादेव ने कहा — 'ये जो पर्वत-सम दैत्य-मांस के ढेर हैं, उन्हें मिलकर शीघ्र खा जाओ; मैं तुम सबको इसकी आज्ञा देता हूँ।

श्लोक 114 (padma.6.18.114)

ब्राह्मी माहेश्वरी चैव कौमारी वैष्णवी तथा । वाराही चैव माहेंद्री सर्वाः स्वगणशोभिताः

brāhmī māheśvarī caiva kaumārī vaiṣṇavī tathā vārāhī caiva māheṁdrī sarvāḥ svagaṇaśobhitāḥ

ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही और माहेंद्री भी — सभी अपने-अपने गणों से सुशोभित,

श्लोक 115 (padma.6.18.115)

एवं शंकरनिर्दिष्टा देव्यस्ता मांससंचयान् । क्रूरेण चक्षुषालोक्य निन्युश्चादर्शनं क्षणात्

evaṁ śaṁkaranirdiṣṭā devyastā māṁsasaṁcayān krūreṇa cakṣuṣālokya ninyuścādarśanaṁ kṣaṇāt

इस प्रकार शंकर द्वारा आदिष्ट वे देवियाँ, क्रूर दृष्टि से उन मांस-ढेरों को देखकर, उन्हें क्षणभर में अदृश्य कर गईं।

श्लोक 116 (padma.6.18.116)

अथ जालंधरवपुः क्षीणं क्रांतं तु शक्तिभिः । ताभिर्ग्रस्ते शरीरे तु तस्य देहाद्विनिःसृता

atha jālaṁdharavapuḥ kṣīṇaṁ krāṁtaṁ tu śaktibhiḥ tābhirgraste śarīre tu tasya dehādviniḥsṛtā

तब जालंधर की देह उनकी शक्तियों से क्षीण और आक्रांत हो गई; उनके द्वारा ग्रस्त उस शरीर से,

श्लोक 117 (padma.6.18.117)

प्रभासा शंकरं प्राप्ता जगामादर्शनं क्षणात् । तत्तेजः सूर्यसंकाशं लयं प्राप्तं महेश्वरे

prabhāsā śaṁkaraṁ prāptā jagāmādarśanaṁ kṣaṇāt tattejaḥ sūryasaṁkāśaṁ layaṁ prāptaṁ maheśvare

शंकर तक पहुँचा हुआ एक तेज निकला और क्षणभर में अदृश्य हो गया; वह सूर्य-सम तेज महेश्वर में लीन हो गया।

श्लोक 118 (padma.6.18.118)

एवं स विलयं प्राप्तः त्रिदिशारिस्त्रिलोचनात् । वृणुध्वं च वरं सर्वाः प्रीतः प्राह महेश्वरः

evaṁ sa vilayaṁ prāptaḥ tridiśāristrilocanāt vṛṇudhvaṁ ca varaṁ sarvāḥ prītaḥ prāha maheśvaraḥ

इस प्रकार तीनों लोकों का शत्रु त्रिनेत्र के द्वारा विलीन कर दिया गया। 'तुम सब वर माँगो' — प्रसन्न होकर महेश्वर ने कहा।

श्लोक 119 (padma.6.18.119)

तदा ताः सर्वयोगिन्यः पप्रच्छुर्जगदीश्वरम् । मर्त्यलोकेषु ये लोका भोगमोक्षवरेप्सवः

tadā tāḥ sarvayoginyaḥ papracchurjagadīśvaram martyalokeṣu ye lokā bhogamokṣavarepsavaḥ

तब उन सभी योगिनियों ने जगदीश्वर से पूछा — 'मर्त्यलोक में जो लोग भोग या मोक्ष के वर की इच्छा रखते हैं,

श्लोक 120 (padma.6.18.120)

पूजयिष्यंति ते नित्यं स्वगृहे योगिनीगणम् । तत्तेषां वांछितं सर्वं सिध्यतां त्वत्प्रसादतः

pūjayiṣyaṁti te nityaṁ svagṛhe yoginīgaṇam tatteṣāṁ vāṁchitaṁ sarvaṁ sidhyatāṁ tvatprasādataḥ

जो अपने घर में नित्य योगिनी-गण की पूजा करेंगे — आपकी कृपा से उनकी वह सभी अभिलाषा पूर्ण हो।'

श्लोक 121 (padma.6.18.121)

महादेव उवाच ।यः कश्चित्पूजयेन्नित्यं भक्तिभावसमन्वितः । युष्मद्गणं च तस्याहं वरदोऽस्मि धरातले

mahādeva uvāca yaḥ kaścitpūjayennityaṁ bhaktibhāvasamanvitaḥ yuṣmadgaṇaṁ ca tasyāhaṁ varado'smi dharātale

महादेव ने कहा — 'जो कोई भी भक्तिभाव से युक्त होकर नित्य तुम्हारे गण की पूजा करेगा, उसके लिए मैं इस पृथ्वी पर वरदाता हूँ।

श्लोक 122 (padma.6.18.122)

मद्भक्तः केशवस्यापि द्वेष्टि यो योगिनीगणम् । भैरवोऽहं तदा तस्य हरिष्ये सुकृतं कृतम्

madbhaktaḥ keśavasyāpi dveṣṭi yo yoginīgaṇam bhairavo'haṁ tadā tasya hariṣye sukṛtaṁ kṛtam

मेरा भक्त होकर भी जो केशव के प्रिय योगिनी-गण से द्वेष करता है, तब मैं भैरव-रूप में उसका किया हुआ सत्कर्म भी हर लूँगा।'

श्लोक 123 (padma.6.18.123)

इति दत्तवरा हृष्टा योगिन्यो विभुना मृधे । अत्रांतरे भवानीं तां सस्मार वृषभं हरः

iti dattavarā hṛṣṭā yoginyo vibhunā mṛdhe atrāṁtare bhavānīṁ tāṁ sasmāra vṛṣabhaṁ haraḥ

इस प्रकार युद्ध में प्रभु द्वारा वर पाकर योगिनियाँ हर्षित हुईं। इसी बीच हर ने भवानी और बैल का स्मरण किया;

श्लोक 124 (padma.6.18.124)

स्मृतमात्रा पार्वती सा वृषभश्चागमत्क्षणात् । सखीगणसमायुक्ता संप्राप्ता हरवल्लभा

smṛtamātrā pārvatī sā vṛṣabhaścāgamatkṣaṇāt sakhīgaṇasamāyuktā saṁprāptā haravallabhā

स्मरण मात्र से पार्वती और बैल क्षणभर में आ पहुँचे; सखी-समूह सहित हर की प्रिया वहाँ पहुँच गईं।

श्लोक 125 (padma.6.18.125)

संत्यक्त्वा भ्रामरीं मूर्तिं हरस्यार्द्धं समारुहत् । गिरिजासहितो राजन्महेशो मुमुदे ततः

saṁtyaktvā bhrāmarīṁ mūrtiṁ harasyārddhaṁ samāruhat girijāsahito rājanmaheśo mumude tataḥ

अपना भ्रामरी रूप त्यागकर वे हर के आधे शरीर पर विराजमान हो गईं; हे राजन्! गिरिजा सहित महेश तब अत्यंत आनंदित हुए।

श्लोक 126 (padma.6.18.126)

योगिनीं प्रत्युवाचेदं पिबध्वं रुधिरं नृप । जालंधरकबंधस्थं ताः श्रुत्वा जहृषुर्भृशम्

yoginīṁ pratyuvācedaṁ pibadhvaṁ rudhiraṁ nṛpa jālaṁdharakabaṁdhasthaṁ tāḥ śrutvā jahṛṣurbhṛśam

उन्होंने योगिनियों से कहा — 'हे राजन्! जालंधर के उस धड़ में स्थित रक्त पिओ।' यह सुनकर वे अत्यंत हर्षित हुईं।

श्लोक 127 (padma.6.18.127)

मांसमेदोह्यसृक्पीत्वा योगिन्यो ननृतुर्मुदा । ततो हरः प्रसन्नोऽभूत्तासां क्रीडनवीक्षणात्

māṁsamedohyasṛkpītvā yoginyo nanṛturmudā tato haraḥ prasanno'bhūttāsāṁ krīḍanavīkṣaṇāt

मांस, चर्बी और रक्त पीकर योगिनियाँ आनंद से नाचने लगीं; तब हर उनकी क्रीड़ा देखकर प्रसन्न हो उठे।

श्लोक 128 (padma.6.18.128)

स्वयं च भैरवं रूपं कृत्वा तन्मध्यगः पपौ । तीक्ष्णदंष्ट्रा महाकायास्तदासन्योगिनी गणाः

svayaṁ ca bhairavaṁ rūpaṁ kṛtvā tanmadhyagaḥ papau tīkṣṇadaṁṣṭrā mahākāyāstadāsanyoginī gaṇāḥ

वे स्वयं भी भैरव-रूप धारण करके उनके बीच जाकर पीने लगे। तीक्ष्ण दाढ़ों वाले, विशालकाय वे योगिनी-गण तब से —

श्लोक 129 (padma.6.18.129)

ग्रसंतोऽद्यापि मांसानि काले चापि पिबंत्यसृक् । तेन जालंधरो दैत्यो नोत्तिष्ठति रणे हतः

grasaṁto'dyāpi māṁsāni kāle cāpi pibaṁtyasṛk tena jālaṁdharo daityo nottiṣṭhati raṇe hataḥ

आज भी मांस निगलते हैं और समय-समय पर रक्त पीते हैं। इसीलिए युद्ध में मारा गया दैत्य जालंधर फिर कभी नहीं उठता।

श्लोक 130 (padma.6.18.130)

ततस्तत्र समाजग्मुर्ब्रह्माद्या देवतागणाः । ऋषयो मरुतो देवा स्तुवंति स्म महेश्वरम्

tatastatra samājagmurbrahmādyā devatāgaṇāḥ ṛṣayo maruto devā stuvaṁti sma maheśvaram

तब वहाँ ब्रह्मा आदि देवगण एकत्र हुए; ऋषिगण, मरुद्गण और देवता महेश्वर की स्तुति करने लगे।

श्लोक 131 (padma.6.18.131)

दिशः प्रसेदुः सुरभिर्ववौ मरुद्दिवः प्रपेतुर्भुवि पुष्पवृष्टयः । कृताभिषेकस्य च तस्य निःस्वनान्संनादिता दुंदुभयोऽपि चक्रिरे

diśaḥ praseduḥ surabhirvavau maruddivaḥ prapeturbhuvi puṣpavṛṣṭayaḥ kṛtābhiṣekasya ca tasya niḥsvanānsaṁnāditā duṁdubhayo'pi cakrire

दिशाएँ प्रसन्न हो उठीं, सुगंधित पवन बहने लगी, स्वर्ग से पृथ्वी पर फूलों की वर्षा होने लगी; उनके अभिषेक के समय नगाड़े भी गूँज उठे।

श्लोक 132 (padma.6.18.132)

उपरि परिमलांधैः सुस्वरं संपतद्भिर्मधुकरनिकुरं बैरुह्यमाणाभरेण । अविरलमधुधारासारसंसिक्तभूमिः सदसि सुरविमुक्ता प्रापतत्पुष्पवृष्टिः

upari parimalāṁdhaiḥ susvaraṁ saṁpatadbhirmadhukaranikuraṁ bairuhyamāṇābhareṇa aviralamadhudhārāsārasaṁsiktabhūmiḥ sadasi suravimuktā prāpatatpuṣpavṛṣṭiḥ

ऊपर से सुगंध में अंधे, मधुर गुंजार करते, भारी शहद से लदे भँवरों के झुंड उतरते हुए, अटूट मधु-धारा से भीगी भूमि पर — उस सभा में देवताओं द्वारा छोड़ी गई पुष्प-वर्षा गिरने लगी।

श्लोक 133 (padma.6.18.133)

हते तदा सिंधुसुते हरेण नाराचघातैस्त्रिजगत्तदा बभौ । प्रसूनवृष्टिर्ननृतुस्तदांगना जगुश्च यक्षाः सुरकिन्नराद्याः

hate tadā siṁdhusute hareṇa nārācaghātaistrijagattadā babhau prasūnavṛṣṭirnanṛtustadāṁganā jaguśca yakṣāḥ surakinnarādyāḥ

सागर-पुत्र के हर के बाण-प्रहारों से मारे जाने पर, तीनों लोक उस समय शोभित हो उठे; फूलों की वर्षा हुई, स्त्रियाँ नाचने लगीं, और यक्ष, देवता, किन्नर आदि गाने लगे।

श्लोक 134 (padma.6.18.134)

शंभुर्वैरिजयोत्थितेन यशसा स्फारांगकीर्तिर्गिरिं । स्वं भेजे सुरसिद्धचारणगणैः संस्तूयमानः सदा । गौरी चापि जगाम चाशु गिरितः श्वेतः । सखीसंवृता संचक्रुस्त्वभिसेवनं सुमनसां वर्षेण देवांगना

śaṁbhurvairijayotthitena yaśasā sphārāṁgakīrtirgiriṁ svaṁ bheje surasiddhacāraṇagaṇaiḥ saṁstūyamānaḥ sadā gaurī cāpi jagāma cāśu giritaḥ śvetaḥ sakhīsaṁvṛtā saṁcakrustvabhisevanaṁ sumanasāṁ varṣeṇa devāṁganā

शत्रु पर विजय से उठी कीर्ति से विशाल-यशस्वी शंभु देव-सिद्ध-चारण-गणों द्वारा सदा स्तुति किए जाते हुए अपने ही पर्वत पर लौट गए। और गौरी भी उसी पर्वत से शीघ्र चली गईं, श्वेत-वर्णा, सखियों से घिरी हुई; देवांगनाओं ने फूलों की वर्षा से उनकी सेवा-अर्चना की।

श्लोक 135 (padma.6.18.135)

देवोऽसौ करुणामयः सुरगणान्स्वे स्वे पदे स्थापयन्। प्रादादन्यदपि स्वकं वसु ततो ज्ञात्वा पतिं शंकरः । किं वक्तव्यमतः परं यदि भवेदीशानुकंपा परा । कोऽयं वा त्रिदिवो धरातलमिदं स्यादात्मसात्सर्वतः

devo'sau karuṇāmayaḥ suragaṇānsve sve pade sthāpayan prādādanyadapi svakaṁ vasu tato jñātvā patiṁ śaṁkaraḥ kiṁ vaktavyamataḥ paraṁ yadi bhavedīśānukaṁpā parā ko'yaṁ vā tridivo dharātalamidaṁ syādātmasātsarvataḥ

वह करुणामय देव, देवताओं को उनके अपने-अपने पदों पर स्थापित करते हुए, अपना अतिरिक्त धन भी उन्हें प्रदान करने लगे; तब शंकर को पति के रूप में पहचानकर — इससे बढ़कर और क्या कहा जाए, जब ईश्वर की परम कृपा इतनी हो? यह स्वर्ग क्या है, यह पृथ्वी क्या है, जो पूर्णतः अपना न बन जाए?

श्लोक 136 (padma.6.18.136)

देवाः स्वराज्यमासाद्य यथापूर्वं चकाशिरे । बुभुजुर्यज्ञभागांस्ते लोकपालत्वमाश्रिताः

devāḥ svarājyamāsādya yathāpūrvaṁ cakāśire bubhujuryajñabhāgāṁste lokapālatvamāśritāḥ

देवगण अपने-अपने राज्य को पाकर पहले की भाँति शोभित हुए; वे यज्ञ-भागों का उपभोग करते हुए फिर से लोकपाल-पद पर आसीन हुए।

श्लोक 137 (padma.6.18.137)

नारद उवाच ।इति जालंधरस्योक्तं यथावदनुपूर्वशः । चरितं लोकवीरस्य राजन्नत्यद्भुतं तव

nārada uvāca iti jālaṁdharasyoktaṁ yathāvadanupūrvaśaḥ caritaṁ lokavīrasya rājannatyadbhutaṁ tava

नारद ने कहा — इस प्रकार, हे राजन्! क्रमशः यथावत् वह अत्यंत अद्भुत कथा तुम्हें सुनाई गई — उस लोकवीर जालंधर का चरित्र।

श्लोक 138 (padma.6.18.138)

विष्णुस्त्यजति नाद्यापि क्षीराब्धिं यद्वशो नृप । सर्वोऽपि भुंक्ते स्वं कर्म कर्म तद्विद्ध्यसंशयम्

viṣṇustyajati nādyāpi kṣīrābdhiṁ yadvaśo nṛpa sarvo'pi bhuṁkte svaṁ karma karma tadviddhyasaṁśayam

हे राजन्! आज भी विष्णु क्षीरसागर को नहीं छोड़ते, क्योंकि वे उसके वश में हैं; सभी अपने ही कर्म का फल भोगते हैं — इसे निःसंदेह कर्म ही जानो।

श्लोक 139 (padma.6.18.139)

तुभ्यं दुःखनिरासाय प्रोक्तमाख्यानमुत्तमम् । यावद्देहोस्ति कर्माणि सुखदुःखानि कर्मतः

tubhyaṁ duḥkhanirāsāya proktamākhyānamuttamam yāvaddehosti karmāṇi sukhaduḥkhāni karmataḥ

तुम्हारे दुःख को दूर करने के लिए यह उत्तम आख्यान कहा गया; जब तक देह है, तब तक कर्मानुसार सुख-दुःख होते ही रहते हैं।

श्लोक 140 (padma.6.18.140)

देही भुंक्ते वशो राजन्त्राणं न ज्ञानतः परम् । कृष्णादीनां देहबंधे सुखदुःखादि वर्तते

dehī bhuṁkte vaśo rājantrāṇaṁ na jñānataḥ param kṛṣṇādīnāṁ dehabaṁdhe sukhaduḥkhādi vartate

हे राजन्! देहधारी भोग के वश में रहता है, ज्ञान से बढ़कर कोई रक्षा नहीं है। कृष्ण जैसों के लिए भी, देह के बंधन में सुख-दुःख आदि होते रहते हैं।

श्लोक 141 (padma.6.18.141)

तत्रेतरेषां किं वाच्यं ये वैराग्यपराङ्मुखाः । ज्ञात्वेदृशीं कर्मगतिं सर्वेभ्यो बलवत्तमाम्

tatretareṣāṁ kiṁ vācyaṁ ye vairāgyaparāṅmukhāḥ jñātvedṛśīṁ karmagatiṁ sarvebhyo balavattamām

फिर उन अन्य लोगों की तो बात ही क्या, जो वैराग्य से मुख मोड़े हुए हैं? कर्म की इस गति को सबसे बलवान जानकर,

श्लोक 142 (padma.6.18.142)

धीरो भव प्रतीक्षस्व शुभकर्मागमं पुनः । शत्रून्जित्वा तु समये स्वं राज्यं पुनराप्स्यसि

dhīro bhava pratīkṣasva śubhakarmāgamaṁ punaḥ śatrūnjitvā tu samaye svaṁ rājyaṁ punarāpsyasi

धैर्यवान बनो, शुभ कर्म के फिर से आने की प्रतीक्षा करो; समय पर शत्रुओं को जीतकर तुम अपना राज्य फिर से प्राप्त कर लोगे।

श्लोक 143 (padma.6.18.143)

इतिहासमिमं श्रुत्वा न दुःखै परिभूयते । धर्मार्थकाममोक्षाश्च यथावच्चात्र कीर्त्तिताः

itihāsamimaṁ śrutvā na duḥkhai paribhūyate dharmārthakāmamokṣāśca yathāvaccātra kīrttitāḥ

इस इतिहास को सुनकर मनुष्य दुःखों से पराभूत नहीं होता; यहाँ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — सभी यथावत् वर्णित हुए हैं।

श्लोक 144 (padma.6.18.144)

स्वर्ग्यं पापहरं पुण्यं शोकमोहविनाशनम् । ब्राह्मणो ज्ञानमाप्नोति राज्यं प्राप्नोति क्षत्रियः

svargyaṁ pāpaharaṁ puṇyaṁ śokamohavināśanam brāhmaṇo jñānamāpnoti rājyaṁ prāpnoti kṣatriyaḥ

यह स्वर्गदायक, पापहारी, पुण्यमय, शोक-मोह का नाश करने वाला है। ब्राह्मण इससे ज्ञान पाता है, क्षत्रिय राज्य पाता है,

श्लोक 145 (padma.6.18.145)

वैश्यश्च बह्वीं संपत्तिं श्रुत्वा शूद्रः सुखं लभेत् । यो राजा भ्रष्टराज्योऽपि रतः सन्नेव सत्पथि

vaiśyaśca bahvīṁ saṁpattiṁ śrutvā śūdraḥ sukhaṁ labhet yo rājā bhraṣṭarājyo'pi rataḥ sanneva satpathi

वैश्य विपुल संपत्ति पाता है, और सुनकर शूद्र सुख पाता है। जो राजा राज्य-भ्रष्ट होकर भी सन्मार्ग में रत रहता है,

श्लोक 146 (padma.6.18.146)

स राज्यं पुनराप्नोति श्रवणान्नित्यमस्य तु । आकर्ण्यैतत्सतां राजन्श्राव्यमन्यन्न रोचते

sa rājyaṁ punarāpnoti śravaṇānnityamasya tu ākarṇyaitatsatāṁ rājanśrāvyamanyanna rocate

वह इसे नित्य सुनने से फिर से राज्य प्राप्त कर लेता है। हे राजन्! इसे सुनने के बाद सज्जनों को अन्य कुछ भी सुनना नहीं भाता,

श्लोक 147 (padma.6.18.147)

कलं च कोकिलालापं रूक्षं ध्वांक्षरुतं यथा । आख्यानमेतदनघं श्रुत्वा सज्जनहृत्प्रियः

kalaṁ ca kokilālāpaṁ rūkṣaṁ dhvāṁkṣarutaṁ yathā ākhyānametadanaghaṁ śrutvā sajjanahṛtpriyaḥ

जैसे कोयल की मधुर बोली के बाद कौवे का कर्कश शब्द अप्रिय लगे। यह निष्पाप आख्यान, एक बार सुनने पर, सज्जनों के हृदय को प्रिय होता है।

श्लोक 148 (padma.6.18.148)

हिरण्यतिलवस्त्राद्यैर्धेनुभूमिप्रदानतः । संतोषयेद्वाचकं तु तस्मिंस्तुष्टे फलं लभेत्

hiraṇyatilavastrādyairdhenubhūmipradānataḥ saṁtoṣayedvācakaṁ tu tasmiṁstuṣṭe phalaṁ labhet

स्वर्ण, तिल, वस्त्र आदि से, गौ और भूमि के दान से, वाचक (कथावाचक) को संतुष्ट करना चाहिए — उसके संतुष्ट होने पर फल प्राप्त होता है।

श्लोक 149 (padma.6.18.149)

देवताश्च प्रसीदेयुरर्चिते वाचके गुरौ । अन्नदानानि दद्याच्च ब्राह्मणेभ्यः प्रपूजयेत्

devatāśca prasīdeyurarcite vācake gurau annadānāni dadyācca brāhmaṇebhyaḥ prapūjayet

वाचक-गुरु का सम्मान करने पर देवता भी प्रसन्न होते हैं। अन्न-दान देना चाहिए और ब्राह्मणों की पूजा करनी चाहिए;

श्लोक 150 (padma.6.18.150)

जायते विजयी नित्यं पुत्रपौत्रसमृद्धिमान् । जायते विष्णुलोके यः शृणोत्याख्यानमुत्तमम्

jāyate vijayī nityaṁ putrapautrasamṛddhimān jāyate viṣṇuloke yaḥ śṛṇotyākhyānamuttamam

ऐसा व्यक्ति सदा विजयी होता है, पुत्र-पौत्रों से समृद्ध होता है। जो यह उत्तम आख्यान सुनता है, वह विष्णुलोक में जन्म पाता है।

श्लोक 151 (padma.6.18.151)

इति व्याजेन भो भूप तुलस्युत्पत्तिकारणम् । ये शृण्वंति नरश्रेष्ठा न तेषां पातकं क्वचित्

iti vyājena bho bhūpa tulasyutpattikāraṇam ye śṛṇvaṁti naraśreṣṭhā na teṣāṁ pātakaṁ kvacit

इस प्रकार, हे राजन्! व्याज से यह तुलसी की उत्पत्ति का कारण बताया गया है; जो श्रेष्ठ मनुष्य इसे सुनते हैं, उन्हें कभी कोई पाप नहीं लगता।

श्लोक 152 (padma.6.18.152)

तुलसीमाहात्म्यमिदं पवित्रं पापनाशनम् । श्रुत्वा तु लभते मोक्षमुक्त्वा चैव न संशयः

tulasīmāhātmyamidaṁ pavitraṁ pāpanāśanam śrutvā tu labhate mokṣamuktvā caiva na saṁśayaḥ

यह तुलसी का माहात्म्य पवित्र और पाप-नाशक है; इसे सुनने से मोक्ष मिलता है, और इसे कहने से भी, निःसंदेह।

श्लोक 153 (padma.6.18.153)

स्वगृहे रोपिता चैव तुलसी पापनाशिनी । दर्शनाद्ब्रह्महत्यापि नश्यते नात्र संशयः

svagṛhe ropitā caiva tulasī pāpanāśinī darśanādbrahmahatyāpi naśyate nātra saṁśayaḥ

अपने घर में लगाई गई तुलसी पाप का नाश करने वाली है; उसके दर्शन मात्र से ब्रह्महत्या का पाप भी निःसंदेह नष्ट हो जाता है।

श्लोक 154 (padma.6.18.154)

कार्तिके चैव माघे तु तुलस्या पूजयेद्धरिम् । वैशाखे तु विशेषेण पूजनं च हरेः स्मृतम्

kārtike caiva māghe tu tulasyā pūjayeddharim vaiśākhe tu viśeṣeṇa pūjanaṁ ca hareḥ smṛtam

कार्तिक और माघ मास में तुलसी से हरि की पूजा करनी चाहिए; वैशाख में विशेष रूप से तुलसी सहित हरि की पूजा स्मृत है।

श्लोक 155 (padma.6.18.155)

एकेनैव प्रदक्षिणेन सकलं पापं गतं वै सदा ये शूद्रा । भुवि संति दाननिरताः कालेन शुद्धिं गताः । तेपि स्युः सुरपूजनार्हतनवः पापाच्च दूरं गताः ये वै। विष्णुजनाश्च दुर्लभतरा ह्यस्मिन्कलौ सांप्रतम्

ekenaiva pradakṣiṇena sakalaṁ pāpaṁ gataṁ vai sadā ye śūdrā bhuvi saṁti dānaniratāḥ kālena śuddhiṁ gatāḥ tepi syuḥ surapūjanārhatanavaḥ pāpācca dūraṁ gatāḥ ye vai viṣṇujanāśca durlabhatarā hyasminkalau sāṁpratam

एक ही प्रदक्षिणा से सारा पाप सदा के लिए दूर हो जाता है; जो शूद्र भी इस पृथ्वी पर दान में रत रहते हैं, वे समय के साथ शुद्धि को प्राप्त होते हैं — वे भी देवताओं के पूजनीय बन जाते हैं और पाप से दूर चले जाते हैं; इस कलियुग में वास्तव में विष्णु के भक्त अब अत्यंत दुर्लभ हैं।

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