उत्तर खण्ड · अध्याय 164
कश्यप तीर्थ महात्म्य
श्लोक 1 (padma.6.164.1)
महादेव उवाच। अत्र तीर्थं महच्चान्यत्कश्यपाख्यं सुरेश्वरि । यत्र ह्रदो महानासीन्नगदेव विनिर्मितः
mahādeva uvāca atra tīrthaṃ mahaccānyatkaśyapākhyaṃ sureśvari yatra hrado mahānāsīnnagadeva vinirmitaḥ
महादेव ने कहा — हे सुरेश्वरी! यहाँ एक और महान तीर्थ है, "कश्यप" नामक, जहाँ पर्वत-देव द्वारा निर्मित एक महान सरोवर था।
श्लोक 2 (padma.6.164.2)
तत्र कुशेश्वरो नाम देवो यत्र विराजते । यत्र कुंडं तथा रम्यं कश्यपेन विनिर्मितम्
tatra kuśeśvaro nāma devo yatra virājate yatra kuṃḍaṃ tathā ramyaṃ kaśyapena vinirmitam
वहाँ कुशेश्वर नामक देव विराजमान हैं, तथा वहाँ कश्यप द्वारा निर्मित एक रमणीय कुंड भी है।
श्लोक 3 (padma.6.164.3)
तत्र स्नात्वा तु भो देवि न नरो निरयं व्रजेत् । अग्निहोत्रकरा विप्रा नित्यं वेदपरायणाः
tatra snātvā tu bho devi na naro nirayaṃ vrajet agnihotrakarā viprā nityaṃ vedaparāyaṇāḥ
हे देवी! वहाँ स्नान करके मनुष्य नरक को नहीं जाता। अग्निहोत्र करने वाले, सदा वेद-परायण ब्राह्मण,
श्लोक 4 (padma.6.164.4)
निवसंति महदेवि काश्यपायां बहुश्रुताः । यथा काशी तथा चेयं नगरी ऋषिनिर्मिता
nivasaṃti mahadevi kāśyapāyāṃ bahuśrutāḥ yathā kāśī tathā ceyaṃ nagarī ṛṣinirmitā
हे महादेवी! बहुश्रुत होकर काश्यपी में निवास करते हैं। जैसी काशी है, वैसी ही यह ऋषि-निर्मित नगरी है।
श्लोक 5 (padma.6.164.5)
काश्यपेन यतश्चात्र तप्तं बहुतरं तपः । गंगा वै तपसा येन आनीतेशजटोद्भवा
kāśyapena yataścātra taptaṃ bahutaraṃ tapaḥ gaṃgā vai tapasā yena ānīteśajaṭodbhavā
क्योंकि यहाँ कश्यप ने अत्यंत महान तप किया, जिसके तप से भगवान् की जटाओं से उत्पन्न गंगा यहाँ लाई गई,
श्लोक 6 (padma.6.164.6)
सा गंगा काश्यपी देवि महापातकनाशिनी । यस्या दर्शनमात्रेण मुच्यंते दुष्टकिल्बिषात्
sā gaṃgā kāśyapī devi mahāpātakanāśinī yasyā darśanamātreṇa mucyaṃte duṣṭakilbiṣāt
वह गंगा "काश्यपी" कहलाती है, हे देवी, महापातकों का नाश करने वाली। जिसके दर्शन मात्र से मनुष्य दुष्ट पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 7 (padma.6.164.7)
गोदानं च प्रशंसंति रथदानं तथैव च । श्राद्धं कृत्वा तु तत्रैव दानं देयं प्रयत्नतः
godānaṃ ca praśaṃsaṃti rathadānaṃ tathaiva ca śrāddhaṃ kṛtvā tu tatraiva dānaṃ deyaṃ prayatnataḥ
यहाँ गोदान की तथा रथदान की भी प्रशंसा की जाती है। यहीं श्राद्ध करके प्रयत्नपूर्वक दान देना चाहिए।
श्लोक 8 (padma.6.164.8)
कलौ युगे तथा घोरे महापातकनाशनम् । कश्यपाख्यं समं तीर्थं न भूतं न भविष्यति
kalau yuge tathā ghore mahāpātakanāśanam kaśyapākhyaṃ samaṃ tīrthaṃ na bhūtaṃ na bhaviṣyati
इस घोर कलियुग में महापातकों का नाश करने वाला "कश्यप" नामक तीर्थ के समान न कोई तीर्थ हुआ है, न होगा।
श्लोक 9 (padma.6.164.9)
यत्र वै देवताः सर्वा ऋषयो वीतकल्मषाः । नित्यं तिष्ठंति देवेशि तीर्थराजप्रसादतः
yatra vai devatāḥ sarvā ṛṣayo vītakalmaṣāḥ nityaṃ tiṣṭhaṃti deveśi tīrtharājaprasādataḥ
हे देवेशी! जहाँ सभी देवता तथा निष्पाप ऋषि, तीर्थराज की कृपा से सदा निवास करते हैं।