उत्तर खण्ड · अध्याय 170
संगम तीर्थ महात्म्य
श्लोक 1 (padma.6.170.1)
महादेव उवाच। अत्र तीर्थात्परं तीर्थं सङ्गमाख्यमिति श्रुतम् । अत्र साभ्रमती गंगा मिलिता सागरेण तु
mahādeva uvāca atra tīrthātparaṃ tīrthaṃ saṅgamākhyamiti śrutam atra sābhramatī gaṃgā militā sāgareṇa tu
महादेव ने कहा — इस तीर्थ से आगे "संगम" नाम से प्रसिद्ध एक तीर्थ है; यहाँ साभ्रमती गंगा समुद्र से मिलती है।
श्लोक 2 (padma.6.170.2)
तत्र स्नानं च दानं च कर्तव्यं विधिपूर्वकम् । यत्र स्नात्वा तु मुच्यंते महापातकिनोऽपि ये
tatra snānaṃ ca dānaṃ ca kartavyaṃ vidhipūrvakam yatra snātvā tu mucyaṃte mahāpātakino'pi ye
वहाँ विधिपूर्वक स्नान तथा दान करना चाहिए; वहाँ स्नान करने से महापातकी भी मुक्त हो जाते हैं।
श्लोक 3 (padma.6.170.3)
तत्र श्राद्धं प्रकर्तव्यं स्वानां च हितमिच्छता । यत्र वै तु कृते श्राद्धे पितृलोके वसेद्ध्रुवम्
tatra śrāddhaṃ prakartavyaṃ svānāṃ ca hitamicchatā yatra vai tu kṛte śrāddhe pitṛloke vaseddhruvam
अपने स्वजनों के हित की कामना करने वाले को वहाँ श्राद्ध करना चाहिए; वहाँ श्राद्ध किए जाने पर मनुष्य निश्चय ही पितृलोक में निवास करता है।
श्लोक 4 (padma.6.170.4)
यत्र वै सागरो देवो नित्यं मिलति गंगया । ब्रह्महा तत्र मुच्येत किमन्यैरितरैरघैः
yatra vai sāgaro devo nityaṃ milati gaṃgayā brahmahā tatra mucyeta kimanyairitarairaghaiḥ
जहाँ देव सागर नित्य गंगा से मिलता है, वहाँ ब्रह्महत्यारा भी मुक्त हो जाता है — अन्य छोटे पापों की तो बात ही क्या।
श्लोक 5 (padma.6.170.5)
यत्र तीर्थं न जानंति लोका वै मंदबुद्धयः । तदा वै मम नाम्ना च कर्तव्यं तीर्थमुत्तमम्
yatra tīrthaṃ na jānaṃti lokā vai maṃdabuddhayaḥ tadā vai mama nāmnā ca kartavyaṃ tīrthamuttamam
जिस तीर्थ को मंदबुद्धि लोग नहीं जानते, वहाँ भी मेरे ही नाम से यह उत्तम तीर्थ माना जाना चाहिए।