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उत्तर खण्ड · अध्याय 171

आदित्य तीर्थ महात्म्य

अध्याय 170अध्याय-सूचीअध्याय 172

श्लोक 1 (padma.6.171.1)

महादेव उवाच। संगमस्य समीपे तु सत्तीर्थं लोकविश्रुतम् । आदित्याख्यं परं तस्मान्न भूतं न भविष्यति

mahādeva uvāca saṃgamasya samīpe tu sattīrthaṃ lokaviśrutam ādityākhyaṃ paraṃ tasmānna bhūtaṃ na bhaviṣyati

महादेव ने कहा — संगम के समीप एक सच्चा तथा लोक-विख्यात तीर्थ है, "आदित्य" नामक — उससे बढ़कर न कोई तीर्थ हुआ है, न होगा।

श्लोक 2 (padma.6.171.2)

यस्य वै दर्शनं कार्यं स्नानं वै पुष्करेण तु । पूजनं चार्कपुष्पेण करवीरैस्तथा पुनः

yasya vai darśanaṃ kāryaṃ snānaṃ vai puṣkareṇa tu pūjanaṃ cārkapuṣpeṇa karavīraistathā punaḥ

वहाँ दर्शन करना चाहिए, उसके पुष्कर (सरोवर) में स्नान करना चाहिए, तथा अर्क-पुष्पों से और पुनः कनेर के फूलों से पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 3 (padma.6.171.3)

तत्र श्राद्धं च दानं च कुर्युर्वै मानवाः सदा । इदमादित्यकं तीर्थं पवित्रं पापनाशनम्

tatra śrāddhaṃ ca dānaṃ ca kuryurvai mānavāḥ sadā idamādityakaṃ tīrthaṃ pavitraṃ pāpanāśanam

वहाँ मनुष्यों को सदा श्राद्ध तथा दान करना चाहिए। यह आदित्य-तीर्थ पवित्र तथा पाप-नाशक है।

श्लोक 4 (padma.6.171.4)

दर्शनात्पुण्यदं तीर्थं महापातकिनामपि

darśanātpuṇyadaṃ tīrthaṃ mahāpātakināmapi

यह तीर्थ महापातकियों को भी दर्शन मात्र से पुण्य प्रदान करता है।

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