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उत्तर खण्ड · अध्याय 172

नीलकंठ तीर्थ महात्म्य

अध्याय 171अध्याय-सूचीअध्याय 173

श्लोक 1 (padma.6.172.1)

महादेव उवाच। तस्मात्तीर्थात्परं तीर्थं नीलकंठेति विश्रुतम् । तस्य वै दर्शनं कार्यं मुक्तिं चैवेच्छता सदा

mahādeva uvāca tasmāttīrthātparaṃ tīrthaṃ nīlakaṃṭheti viśrutam tasya vai darśanaṃ kāryaṃ muktiṃ caivecchatā sadā

महादेव ने कहा — उस तीर्थ से आगे "नीलकंठ" नामक विख्यात तीर्थ है; मुक्ति चाहने वाले को सदा उसका दर्शन करना चाहिए।

श्लोक 2 (padma.6.172.2)

बिल्वपत्रैस्तथा धूपैर्दीपैर्वाथ सुरेश्वरि । वांछितं लभते मर्त्यो नीलकंठस्य दर्शनात्

bilvapatraistathā dhūpairdīpairvātha sureśvari vāṃchitaṃ labhate martyo nīlakaṃṭhasya darśanāt

हे सुरेश्वरी! बिल्वपत्रों से, धूप से या दीप से, नीलकंठ के दर्शन से मनुष्य इच्छित वस्तु प्राप्त करता है।

श्लोक 3 (padma.6.172.3)

उपवासपरो देवि निर्जनेसौ स्थितः सदा । यद्यद्वांच्छंति ये लोकास्तेषां तत्तद्ददाति च

upavāsaparo devi nirjanesau sthitaḥ sadā yadyadvāṃcchaṃti ye lokāsteṣāṃ tattaddadāti ca

हे देवी! उपवास में तत्पर, सदा एकांत में स्थित रहकर, लोग जो-जो कामना करते हैं, वे वह-वह प्रदान करते हैं।

श्लोक 4 (padma.6.172.4)

कलौ सा तु महादेवि विख्याता काश्यपीति वै

kalau sā tu mahādevi vikhyātā kāśyapīti vai

हे महादेवी! कलियुग में वह स्थान "काश्यपी" नाम से ही विख्यात है।

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