उत्तर खण्ड · अध्याय 173
दुर्गा-संगम पर साभ्रमती महात्म्य
श्लोक 1 (padma.6.173.1)
महादेव उवाच। दुर्गया संगता यत्र देवि साभ्रमती नदी । संगमः सागरेणाथ स्नानं तत्र समाचरेत्
mahādeva uvāca durgayā saṃgatā yatra devi sābhramatī nadī saṃgamaḥ sāgareṇātha snānaṃ tatra samācaret
महादेव ने कहा — हे देवी! जहाँ साभ्रमती नदी दुर्गा से मिलती है, तथा जहाँ समुद्र से उसका संगम होता है, वहाँ स्नान करना चाहिए।
श्लोक 2 (padma.6.173.2)
वीतदोषा भविष्यंति कलौ वै नात्र संशयः । तत्र श्राद्धं प्रकर्त्तव्यं दुर्गया संगमे तथा
vītadoṣā bhaviṣyaṃti kalau vai nātra saṃśayaḥ tatra śrāddhaṃ prakarttavyaṃ durgayā saṃgame tathā
कलियुग में लोग वहाँ निश्चय ही दोषरहित हो जाएँगे, इसमें संदेह नहीं। वहाँ, दुर्गा के संगम पर भी, श्राद्ध करना चाहिए।
श्लोक 3 (padma.6.173.3)
तत्र गत्वा विशेषेण ब्राह्मणानां च भोजनम् । दानं गोमहिषीणां च कर्तव्यं विधिपूर्वकम्
tatra gatvā viśeṣeṇa brāhmaṇānāṃ ca bhojanam dānaṃ gomahiṣīṇāṃ ca kartavyaṃ vidhipūrvakam
वहाँ जाकर विशेष रूप से ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए, तथा विधिपूर्वक गौ और भैंस का दान करना चाहिए।
श्लोक 4 (padma.6.173.4)
इयं धन्या धन्यतमा पवित्रा पापनाशिनी । यां दृष्ट्वा चापि भो देवि मुच्यते पातकैर्नरः
iyaṃ dhanyā dhanyatamā pavitrā pāpanāśinī yāṃ dṛṣṭvā cāpi bho devi mucyate pātakairnaraḥ
यह नदी धन्य, अत्यंत धन्य, पवित्र तथा पाप-नाशिनी है। हे देवी! इसके दर्शन मात्र से भी मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 5 (padma.6.173.5)
यथा गंगा तथा चेयं ज्ञेया साभ्रमती नदी । कलौ देवि विशेषेण बहुकालफलप्रदा
yathā gaṃgā tathā ceyaṃ jñeyā sābhramatī nadī kalau devi viśeṣeṇa bahukālaphalapradā
जैसी गंगा है, वैसी ही यह साभ्रमती नदी जाननी चाहिए — हे देवी! कलियुग में विशेष रूप से यह दीर्घकाल तक फलदायिनी है।
श्लोक 6 (padma.6.173.6)
यदि चेच्छतशो जिह्वा मुखे वै मामके सति । तस्या अपि न शक्नोमि गुणान्वक्तुं कदाचन
yadi cecchataśo jihvā mukhe vai māmake sati tasyā api na śaknomi guṇānvaktuṃ kadācana
यदि मेरे मुख में सैकड़ों जिह्वाएँ भी हों, तब भी मैं उसके गुणों का वर्णन कभी नहीं कर सकता।