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उत्तर खण्ड · अध्याय 176

गीता माहात्म्य: द्वितीय अध्याय की महिमा (देवशर्मा एवं मित्रवान् की कथा)

अध्याय 175अध्याय-सूचीअध्याय 177

श्लोक 1 (padma.6.176.1)

श्रीभगवानुवाच । आदिमस्यैवमाख्यानमुदीरितमनुत्तमम् । शृणु माहात्म्यमन्येषामध्यायानामपींदिरे

śrībhagavānuvāca ādimasyaivamākhyānamudīritamanuttamam śṛṇu māhātmyamanyeṣāmadhyāyānāmapīṃdire

श्रीभगवान् ने कहा — इस प्रकार प्रथम अध्याय की अनुपम कथा कही गई। हे इंदिरे! अब अन्य अध्यायों की भी महिमा सुनो।

श्लोक 2 (padma.6.176.2)

दक्षिणस्यां दिशि श्रीमानासीदाम्नायवादिनाम् । पुरे पुरंदराह्वाने देवशर्मेति विश्रुतः

dakṣiṇasyāṃ diśi śrīmānāsīdāmnāyavādinām pure puraṃdarāhvāne devaśarmeti viśrutaḥ

दक्षिण दिशा में, वेद-परंपरा के वक्ताओं में श्रीमान, पुरंदर नामक नगर में "देवशर्मा" नाम से विख्यात एक पुरुष था।

श्लोक 3 (padma.6.176.3)

अर्चितातिथिराम्नातो वेदशास्त्रविशारदः । आहर्ता क्रतुसंघानां तापसानां प्रियः सदा

arcitātithirāmnāto vedaśāstraviśāradaḥ āhartā kratusaṃghānāṃ tāpasānāṃ priyaḥ sadā

वह अतिथि-सत्कार में निपुण, वेद-शास्त्र-विशारद, अनेक यज्ञों का करने वाला, तथा तपस्वियों को सदा प्रिय था।

श्लोक 4 (padma.6.176.4)

देवान्संतर्पयामास हव्यैर्हुतवहं चिरम् । न चोपलेभे धर्मात्मा शांतिमेकांतिकीं ततः

devānsaṃtarpayāmāsa havyairhutavahaṃ ciram na copalebhe dharmātmā śāṃtimekāṃtikīṃ tataḥ

वह देवताओं को हव्य से दीर्घकाल तक तृप्त करता रहा, फिर भी उस धर्मात्मा को एकांतिकी शांति प्राप्त न हुई।

श्लोक 5 (padma.6.176.5)

निःश्रेयसं स जिज्ञासुस्तापसाननुवासरम् । सिषेवे सत्यसंकल्पाननल्पैरेव कल्पकैः

niḥśreyasaṃ sa jijñāsustāpasānanuvāsaram siṣeve satyasaṃkalpānanalpaireva kalpakaiḥ

परम कल्याण जानने की इच्छा से वह सत्यसंकल्प तपस्वियों की प्रतिदिन, अनेक वर्षों तक सेवा करता रहा।

श्लोक 6 (padma.6.176.6)

एवमाचरतस्तस्य काले महति गच्छति । मुक्तकर्मा ततः कश्चित्प्रादुरासीत्पुरा भुवि

evamācaratastasya kāle mahati gacchati muktakarmā tataḥ kaścitprādurāsītpurā bhuvi

इस प्रकार आचरण करते हुए उसका बहुत समय बीत गया, तब पूर्वकाल में एक कर्म-मुक्त पुरुष वहाँ प्रकट हुआ,

श्लोक 7 (padma.6.176.7)

अनुभूतनिराकांक्षी नासाग्रन्यस्तलोचनः । शांतचेताः परं ब्रह्म ध्यायन्नानंदनिर्भरः

anubhūtanirākāṃkṣī nāsāgranyastalocanaḥ śāṃtacetāḥ paraṃ brahma dhyāyannānaṃdanirbharaḥ

जो निराकांक्ष, नासाग्र-दृष्टि, शांतचित्त, आनंद से परिपूर्ण, परब्रह्म का ध्यान करने वाला था।

श्लोक 8 (padma.6.176.8)

पादौ तस्योपसंगृह्य प्रणतेनांतरात्मना । चकार विधिवत्तस्मै विद्वानतिथिसत्क्रियाम्

pādau tasyopasaṃgṛhya praṇatenāṃtarātmanā cakāra vidhivattasmai vidvānatithisatkriyām

उसके चरण पकड़कर, अंतरात्मा से नत होकर, उस विद्वान ने उसके लिए विधिवत् अतिथि-सत्कार किया।

श्लोक 9 (padma.6.176.9)

तं च शुद्धेन भावेन परितुष्टं तपस्विनम् । प्रणतः परिपप्रच्छ निर्वाणस्थितिमात्मनः

taṃ ca śuddhena bhāvena parituṣṭaṃ tapasvinam praṇataḥ paripapraccha nirvāṇasthitimātmanaḥ

शुद्ध भाव से संतुष्ट उस तपस्वी से नत होकर उसने आत्मा की निर्वाण-स्थिति के विषय में पूछा।

श्लोक 10 (padma.6.176.10)

स तस्मै कथयामास पुरेऽसौ पुरनामनि । मित्रवंतमजापालमुपदेष्टारमात्मवित्

sa tasmai kathayāmāsa pure'sau puranāmani mitravaṃtamajāpālamupadeṣṭāramātmavit

उसने उसे उसी नगर में "मित्रवान्" नामक एक अजापाल (बकरी चराने वाला) उपदेष्टा के बारे में बताया।

श्लोक 11 (padma.6.176.11)

स चाभिवंद्य तत्पादावेत्यसौ पुरमूर्जितम् । तस्योत्तरदिशोभागे ददर्श विपुलं वनम्

sa cābhivaṃdya tatpādāvetyasau puramūrjitam tasyottaradiśobhāge dadarśa vipulaṃ vanam

उनके चरणों में प्रणाम करके, उस विशाल नगर में जाकर, उसने उसके उत्तर भाग में एक विशाल वन देखा,

श्लोक 12 (padma.6.176.12)

मारुतांदोलितानेक कुसुमामोदसुंदरम् । उन्मत्तभ्रमरोद्गीत नादापूरितदिङ्मुखम्

mārutāṃdolitāneka kusumāmodasuṃdaram unmattabhramarodgīta nādāpūritadiṅmukham

जो वायु से हिलते अनेक पुष्पों की सुगंध से सुंदर था, तथा उन्मत्त भ्रमरों के गुंजार से दिशाएँ भर उठी थीं।

श्लोक 13 (padma.6.176.13)

तस्मिन्वने सरित्तीरे निषीदंतं शिलातले । मित्रवंतं ददर्शाथ सानंदस्तिमितेक्षणम्

tasminvane sarittīre niṣīdaṃtaṃ śilātale mitravaṃtaṃ dadarśātha sānaṃdastimitekṣaṇam

उस वन में, नदी के तट पर, शिला पर बैठे, आनंद से स्थिर नेत्रों वाले मित्रवान् को उसने देखा —

श्लोक 14 (padma.6.176.14)

अपि स्वाभाविकं वैरं हित्वान्योन्यं विरोधिभिः । सत्वैरावृतमुद्याने मंदस्यंदनभास्वति

api svābhāvikaṃ vairaṃ hitvānyonyaṃ virodhibhiḥ satvairāvṛtamudyāne maṃdasyaṃdanabhāsvati

वहाँ स्वाभाविक रूप से शत्रु प्राणी भी परस्पर वैर त्यागकर, मंद बहती जलधाराओं से उज्ज्वल उस उद्यान में एकत्रित थे,

श्लोक 15 (padma.6.176.15)

शांतेषु मृगयूथेषु दशानंदमनोज्ञया । कृपानुविद्धया भूमिं निषिंचंतमिवामृतम्

śāṃteṣu mṛgayūtheṣu daśānaṃdamanojñayā kṛpānuviddhayā bhūmiṃ niṣiṃcaṃtamivāmṛtam

शांत मृग-समूहों के बीच, अपनी करुणा से भरी दृष्टि से मानो पृथ्वी पर अमृत सींचते हुए, सबको आनंद देने वाला।

श्लोक 16 (padma.6.176.16)

उपेत्य विनयेनामुमुन्मनाः प्रीतमानसः । किंचिदानम्रशिरसा तेनापि स तु सत्कृतः

upetya vinayenāmumunmanāḥ prītamānasaḥ kiṃcidānamraśirasā tenāpi sa tu satkṛtaḥ

विनयपूर्वक निकट जाकर, प्रसन्नचित्त होकर, थोड़ा सिर झुकाकर, उसने भी उसका सत्कार किया।

श्लोक 17 (padma.6.176.17)

उपतस्थे ततो विद्वान्मित्रवंतमनन्यधीः । समाप्तध्यानकालं स पर्यपृच्छत्समाहितः

upatasthe tato vidvānmitravaṃtamananyadhīḥ samāptadhyānakālaṃ sa paryapṛcchatsamāhitaḥ

तब उस विद्वान ने अनन्य-चित्त होकर मित्रवान् की सेवा की, और ध्यान का समय पूर्ण होने पर एकाग्रचित्त होकर पूछा —

श्लोक 18 (padma.6.176.18)

देवशर्मोवाच। आत्मानं वेत्तुमिच्छामि तदमुष्मिन्मनोरथे । लब्धसिद्धिमुपायं मामुपदेष्टुं त्वमर्हसि

devaśarmovāca ātmānaṃ vettumicchāmi tadamuṣminmanorathe labdhasiddhimupāyaṃ māmupadeṣṭuṃ tvamarhasi

देवशर्मा ने कहा — "मैं आत्मा को जानना चाहता हूँ। इस मनोरथ की सिद्धि के उपाय में, आप, जो सिद्धि प्राप्त हैं, मुझे उपदेश देने योग्य हैं।"

श्लोक 19 (padma.6.176.19)

श्रीभगवानुवाच। परामृश्य क्षणं सोऽपि मित्रवानिदमब्रवीत् । मित्रवानुवाच। विद्वन्विद्धि पुरावृत्तमुच्यमानमिदं मया

śrībhagavānuvāca parāmṛśya kṣaṇaṃ so'pi mitravānidamabravīt mitravānuvāca vidvanviddhi purāvṛttamucyamānamidaṃ mayā

श्रीभगवान् ने कहा — क्षण भर विचार करके मित्रवान् ने यह कहा। मित्रवान् ने कहा — "हे विद्वन्! यह पुरातन वृत्तांत मुझसे सुनो, जो मैं कहता हूँ।

श्लोक 20 (padma.6.176.20)

अस्ति गोदावरीतीरे प्रतिष्ठानाभिधं पुरम् । तत्र दुर्दमनामासीदन्वये च मनीषिणाम्

asti godāvarītīre pratiṣṭhānābhidhaṃ puram tatra durdamanāmāsīdanvaye ca manīṣiṇām

गोदावरी के तट पर प्रतिष्ठान नामक नगर है। वहाँ बुद्धिमानों के वंश में दुर्दम नामक व्यक्ति था।

श्लोक 21 (padma.6.176.21)

तत्रास्ति विक्रमो नाम सेव्यमानो महीपतिः । दानानि प्रत्यहं गृह्णन्वर्त्तते उदरंभरः

tatrāsti vikramo nāma sevyamāno mahīpatiḥ dānāni pratyahaṃ gṛhṇanvarttate udaraṃbharaḥ

वहाँ विक्रम नामक एक सेवित राजा था, जो प्रतिदिन दान ग्रहण करते हुए केवल पेट भरने में लगा रहता था।

श्लोक 22 (padma.6.176.22)

कालेन कालपाशेन बद्धानीतो यमालयम् । निरयेषु समग्रेषु यातना अनुभूय च

kālena kālapāśena baddhānīto yamālayam nirayeṣu samagreṣu yātanā anubhūya ca

काल के पाश से बँधकर वह यमलोक ले जाया गया, और सभी नरकों में यातना भोगकर,

श्लोक 23 (padma.6.176.23)

कस्मिंश्चित्स कुले जातो दुर्वृत्तानां द्विजन्मनाम् । भवांतरानुवर्तिन्या विद्यया स पुरस्कृतः

kasmiṃścitsa kule jāto durvṛttānāṃ dvijanmanām bhavāṃtarānuvartinyā vidyayā sa puraskṛtaḥ

वह किसी दुष्ट-आचरण वाले द्विजों के कुल में जन्मा। पूर्वजन्म से अनुगामी विद्या से युक्त होकर,

श्लोक 24 (padma.6.176.24)

उपयेमे दुराधर्षां कन्यकामधमे कुले । कालेन सा वयो हित्वा शैशवं यौवनं ययौ

upayeme durādharṣāṃ kanyakāmadhame kule kālena sā vayo hitvā śaiśavaṃ yauvanaṃ yayau

उसने एक नीच कुल की दुर्दम्य कन्या से विवाह किया। समय के साथ बाल्यावस्था छोड़कर वह यौवन को प्राप्त हुई —

श्लोक 25 (padma.6.176.25)

पीनस्तनी च सुश्रोणी मदविह्वललोचना । पतिं न सेहे दुर्वृत्तं चकमे स्वपतीन्परान्

pīnastanī ca suśroṇī madavihvalalocanā patiṃ na sehe durvṛttaṃ cakame svapatīnparān

उन्नत स्तनों, सुंदर नितंबों तथा मद से विह्वल नेत्रों वाली वह अपने दुराचारी पति को सहन नहीं कर सकी, और अपने पति के अतिरिक्त अन्य पुरुषों की कामना करने लगी।

श्लोक 26 (padma.6.176.26)

वृत्तिमाहर्तुकामस्मिन्निर्गता सा पुराद्बहिः । संगता कामुकेनासौ चिरं चांडालजन्मना

vṛttimāhartukāmasminnirgatā sā purādbahiḥ saṃgatā kāmukenāsau ciraṃ cāṃḍālajanmanā

जीविका कमाने की इच्छा से वह नगर से बाहर निकली, और एक चांडाल-कुल में जन्मे कामुक पुरुष के साथ दीर्घकाल तक संबंध रखा।

श्लोक 27 (padma.6.176.27)

दधे गर्भमसौ तस्मात्सा च कन्योपपद्यते । सैव भार्यापि तस्यासीत्पूर्वपापप्रसंगतः

dadhe garbhamasau tasmātsā ca kanyopapadyate saiva bhāryāpi tasyāsītpūrvapāpaprasaṃgataḥ

उससे उसने गर्भ धारण किया, और एक कन्या उत्पन्न हुई। वही कन्या पूर्वजन्म के पाप के संबंध से आगे चलकर उसी की पत्नी बनी।

श्लोक 28 (padma.6.176.28)

सैव वृद्धा ततः काले डाकिनी समजायत । कुसंगात्कुमतिर्जाता दुष्टनारीप्रसंगतः

saiva vṛddhā tataḥ kāle ḍākinī samajāyata kusaṃgātkumatirjātā duṣṭanārīprasaṃgataḥ

वही वृद्ध होकर समय के साथ डाकिनी बन गई। दुष्ट स्त्रियों की संगति से कुसंग में पड़कर वह कुमति हो गई।

श्लोक 29 (padma.6.176.29)

चखाद व्याधितं व्याधमसृगास्वादलालसा । भ्रमंती विपिने घोरे जनैर्दृष्ट्वा बहिष्कृता

cakhāda vyādhitaṃ vyādhamasṛgāsvādalālasā bhramaṃtī vipine ghore janairdṛṣṭvā bahiṣkṛtā

रक्त-स्वाद की लालसा से उसने एक रोगी व्याध को खा लिया। घोर वन में भटकते हुए लोगों द्वारा देखे जाने पर वह बहिष्कृत हुई।

श्लोक 30 (padma.6.176.30)

परेतलोकमासाद्य व्याधौ व्याघ्रोऽभ्यवर्त्तत । नरकान्दारुणान्भुक्त्वा जीवहिंसा प्रभावतः

paretalokamāsādya vyādhau vyāghro'bhyavarttata narakāndāruṇānbhuktvā jīvahiṃsā prabhāvataḥ

प्रेतलोक को प्राप्त होकर, वह व्याध बाद में एक व्याघ्र (बाघ) बना; जीव-हिंसा के प्रभाव से भयंकर नरकों को भोगकर।

श्लोक 31 (padma.6.176.31)

सापि कालेन दुष्टात्मा मृत्युवेगमुपागता । निरयानेत्य दुर्द्धर्षानजाजायत मद्गृहे

sāpi kālena duṣṭātmā mṛtyuvegamupāgatā nirayānetya durddharṣānajājāyata madgṛhe

वह दुष्टात्मा भी समय के साथ मृत्यु को प्राप्त हुई, और दुर्धर्ष नरकों में जाकर मेरे ही घर में बकरी के रूप में जन्मी।

श्लोक 32 (padma.6.176.32)

तामन्या अप्यहं विद्वन्पालयन्काननांतरे । अपश्यन्द्वीपिनं घोरं जिघांसंतमिवाखिलम्

tāmanyā apyahaṃ vidvanpālayankānanāṃtare apaśyandvīpinaṃ ghoraṃ jighāṃsaṃtamivākhilam

हे विद्वन्! उसे तथा अन्य बकरियों को वन के भीतर चराते हुए मैंने एक भयंकर तेंदुआ देखा, मानो सबको खा जाना चाहता हो।

श्लोक 33 (padma.6.176.33)

समालोक्य तमायांतं भयेन प्रपलायितम् । अजायूथं परित्यज्य मया मरणभीरुणा

samālokya tamāyāṃtaṃ bhayena prapalāyitam ajāyūthaṃ parityajya mayā maraṇabhīruṇā

उसे आते देखकर, भय से भागती हुई, बकरी-समूह को छोड़कर, मृत्यु से भयभीत मैंने भी,

श्लोक 34 (padma.6.176.34)

उपदुद्राव स द्वीपी पूर्ववैरमनुस्मरन् । अजा तु तत्समीपेऽगात्सत्वरं सरिदंतिके

upadudrāva sa dvīpī pūrvavairamanusmaran ajā tu tatsamīpe'gātsatvaraṃ saridaṃtike

वह तेंदुआ पूर्व-वैर का स्मरण करते हुए उस बकरी की ओर दौड़ा; किंतु वह शीघ्र नदी के समीप मेरे पास आ गई।

श्लोक 35 (padma.6.176.35)

तत्र सा भयमुत्सृज्य हित्वा वैरमनर्गला । अवतस्थे स च द्वीपी तूष्णीमासीदमत्सरः

tatra sā bhayamutsṛjya hitvā vairamanargalā avatasthe sa ca dvīpī tūṣṇīmāsīdamatsaraḥ

वहाँ भय त्यागकर, बिना किसी रोक-टोक के वैर छोड़कर वह खड़ी हो गई, और वह तेंदुआ भी वैररहित होकर चुप हो गया।

श्लोक 36 (padma.6.176.36)

तं तथाविधमालोक्य सा वक्तुमुपचक्रमे । द्वीपिन्नभीप्सितं भुंक्ष्व मांसमुद्धृत्य सादरः

taṃ tathāvidhamālokya sā vaktumupacakrame dvīpinnabhīpsitaṃ bhuṃkṣva māṃsamuddhṛtya sādaraḥ

उसे इस प्रकार बदला हुआ देखकर वह बोलने लगी — "हे तेंदुए! आदर से मेरा मांस लेकर जो चाहो खाओ।

श्लोक 37 (padma.6.176.37)

नेयं भवति ते बुद्धिः कथं वैरमतिं त्यजः । इत्याकर्ण्य तदा वाक्यं प्राह द्वीपी विमत्सरः

neyaṃ bhavati te buddhiḥ kathaṃ vairamatiṃ tyajaḥ ityākarṇya tadā vākyaṃ prāha dvīpī vimatsaraḥ

तुम्हारी यह बुद्धि कैसे बदल गई, वैर-भाव कैसे त्याग दिया?" इस वचन को सुनकर वैररहित तेंदुए ने कहा —

श्लोक 38 (padma.6.176.38)

स्थानेऽस्मिन्मे गतो द्वेषः क्षुत्पिपासा च निर्ययौ । न प्रार्थयामि तेन त्वां समीपे समुपस्थिताम्

sthāne'sminme gato dveṣaḥ kṣutpipāsā ca niryayau na prārthayāmi tena tvāṃ samīpe samupasthitām

"इस स्थान पर आते ही मेरा द्वेष चला गया, और भूख-प्यास भी दूर हो गई। इसलिए तुम्हारे समीप होते हुए भी मैं तुम्हारी कामना नहीं करता।"

श्लोक 39 (padma.6.176.39)

सैवमुक्ता पुनः प्राह जाताहं निर्भया कथम् । किमत्र कारणं वेत्सि यदि मे वक्तुमर्हसि

saivamuktā punaḥ prāha jātāhaṃ nirbhayā katham kimatra kāraṇaṃ vetsi yadi me vaktumarhasi

यह सुनकर उसने पुनः कहा — "मैं निर्भय कैसे हो गई? यदि जानते हो तो इसका कारण मुझे बताओ।"

श्लोक 40 (padma.6.176.40)

एवमुक्तः पुनर्द्वीपी तामाहाजां न वेद्म्यहम् । पुरोगतमिमं प्रष्टुं महांतमिति निर्गतौ

evamuktaḥ punardvīpī tāmāhājāṃ na vedmyaham purogatamimaṃ praṣṭuṃ mahāṃtamiti nirgatau

पुनः पूछे जाने पर तेंदुए ने बकरी से कहा — "मैं स्वयं नहीं जानता।" वे दोनों इस महान सामने खड़े ऋषि से पूछने निकल पड़े।

श्लोक 41 (padma.6.176.41)

ताभ्यामुभाभ्यामागत्य पृष्टोऽहं बहुविस्मयः । अहं च सहितस्ताभ्यामपृच्छं वानरेश्वरम्

tābhyāmubhābhyāmāgatya pṛṣṭo'haṃ bahuvismayaḥ ahaṃ ca sahitastābhyāmapṛcchaṃ vānareśvaram

वे दोनों मेरे पास आए और मुझसे पूछा; मैं भी अत्यंत विस्मित होकर उनके साथ एक वानरराज से पूछने गया।

श्लोक 42 (padma.6.176.42)

मया पृष्टः स विप्रेदमब्रवीत्सादरं कपिः । शृणु वक्ष्याम्यजापाल वृत्तमत्र पुरातनम्

mayā pṛṣṭaḥ sa vipredamabravītsādaraṃ kapiḥ śṛṇu vakṣyāmyajāpāla vṛttamatra purātanam

मुझसे पूछे जाने पर, हे विप्र, उस वानर ने आदरपूर्वक यह कहा — "हे अजापाल! सुनो, मैं यहाँ की एक पुरातन कथा कहता हूँ।

श्लोक 43 (padma.6.176.43)

इदमायतनं पश्य पुरोवनगतं महत् । अत्र त्र्यंबकलिंगं हि द्रुहिणेन प्रतिष्ठितम्

idamāyatanaṃ paśya purovanagataṃ mahat atra tryaṃbakaliṃgaṃ hi druhiṇena pratiṣṭhitam

इस विशाल आयतन (मंदिर) को देखो, जो वन के सामने स्थित है। यहाँ ब्रह्मा द्वारा त्र्यंबक का लिंग प्रतिष्ठित किया गया था।

श्लोक 44 (padma.6.176.44)

सुकर्मानाम मेधावी पर्युपास्ते तपश्चरन् । वनपुष्पाण्यपाहृत्य सुरपूज्यं पुरोभवम्

sukarmānāma medhāvī paryupāste tapaścaran vanapuṣpāṇyapāhṛtya surapūjyaṃ purobhavam

सुकर्मा नामक एक बुद्धिमान व्यक्ति यहाँ वन-पुष्प लाकर, तप करते हुए, देवताओं द्वारा भी पूज्य उस वन-स्थित लिंग की उपासना करता था।

श्लोक 45 (padma.6.176.45)

संस्नाप्य सरिदंभोभिः केवलं कर्मणा वसन् । काले महति तस्यागादतिथिः कश्चिदंतिकम्

saṃsnāpya saridaṃbhobhiḥ kevalaṃ karmaṇā vasan kāle mahati tasyāgādatithiḥ kaścidaṃtikam

नदी के जल से स्नान कराकर, केवल कर्म-अनुष्ठान से जीवन बिताते हुए, दीर्घकाल बाद उसके पास एक अतिथि आया।

श्लोक 46 (padma.6.176.46)

उपाहृत्य फलाहारं स तस्मै पर्यकल्पयत् । तेनातिथ्येन संप्रीतः सुकर्माणमभाषत

upāhṛtya phalāhāraṃ sa tasmai paryakalpayat tenātithyena saṃprītaḥ sukarmāṇamabhāṣata

फल लाकर उसने अतिथि को अर्पित किया। उस अतिथि-सत्कार से प्रसन्न होकर वह अतिथि सुकर्मा से बोला —

श्लोक 47 (padma.6.176.47)

किमिदं कर्मणो मूलं फलं भुक्त्वा तु तिष्ठसि । गतानुगतया वृत्त्या किं वा केवलमीहसे

kimidaṃ karmaṇo mūlaṃ phalaṃ bhuktvā tu tiṣṭhasi gatānugatayā vṛttyā kiṃ vā kevalamīhase

'इस कर्म का मूल क्या है? फल भोगकर क्या तुम यहीं रुके रहते हो, या केवल परंपरागत रीति से इसे करते हो?'

श्लोक 48 (padma.6.176.48)

स एवमुक्तः प्रायेण प्रीतेनात्मविदा तदा । प्रत्युवाच वचः स्पष्टमात्मनो हितमुत्तमम्

sa evamuktaḥ prāyeṇa prītenātmavidā tadā pratyuvāca vacaḥ spaṣṭamātmano hitamuttamam

इस प्रकार पूछे जाने पर, प्रायः प्रसन्न उस आत्मज्ञानी ने स्पष्ट, अपने हित का उत्तम वचन कहा —

श्लोक 49 (padma.6.176.49)

विद्वन्न वेद्मि तत्वेन फलमेतस्य कर्मणः । बुभुत्सया परः शंभुः सेव्यते केवलं यया

vidvanna vedmi tatvena phalametasya karmaṇaḥ bubhutsayā paraḥ śaṃbhuḥ sevyate kevalaṃ yayā

'हे विद्वन्! मैं इस कर्म के फल को तत्त्वतः नहीं जानता। मैं केवल जानने की इच्छा से परम शंभु की सेवा करता हूँ।

श्लोक 50 (padma.6.176.50)

फलमेतस्य सेवायाः परिपाकं कपर्दिनः । यन्मांसमनुगृह्णासि संस्पृश्यात्ममनोरथम्

phalametasya sevāyāḥ paripākaṃ kapardinaḥ yanmāṃsamanugṛhṇāsi saṃspṛśyātmamanoratham

इस सेवा का फल जटाधारी शिव की कृपा का परिपाक है — जैसे तुम अभी मेरे अर्पित मांस को अनुगृहीत कर मेरे मन की इच्छा को स्पर्श कर रहे हो।'

श्लोक 51 (padma.6.176.51)

तस्यैवं सूनृतं वाक्यं श्रुत्वा प्रीतस्तपोधनः । द्वितीयमालिलेखाऽसौ गीताध्यायं शिलातले

tasyaivaṃ sūnṛtaṃ vākyaṃ śrutvā prītastapodhanaḥ dvitīyamālilekhā'sau gītādhyāyaṃ śilātale

उसके इस सत्य वचन को सुनकर वह तपोधन अतिथि प्रसन्न हुआ, और उसने शिला पर गीता का दूसरा अध्याय लिख दिया,

श्लोक 52 (padma.6.176.52)

आदिदेशाशु तं विप्रं पठनाभ्यसनाय च । फलिष्यत्यात्मनः स्वैरं परितस्ते मनोरथः

ādideśāśu taṃ vipraṃ paṭhanābhyasanāya ca phaliṣyatyātmanaḥ svairaṃ paritaste manorathaḥ

और उस विप्र को तुरंत उसके पठन-अभ्यास हेतु आदेश दिया — 'तुम्हारा मनोरथ स्वयं ही पूर्ण होगा।'

श्लोक 53 (padma.6.176.53)

इत्युक्त्वांतर्दधे धीमान्पुरतस्तस्य पश्यतः । विस्मितस्तस्य चादेशात्सोऽन्वतिष्ठदनारतम्

ityuktvāṃtardadhe dhīmānpuratastasya paśyataḥ vismitastasya cādeśātso'nvatiṣṭhadanāratam

यह कहकर वह बुद्धिमान उसके सामने ही देखते-देखते अंतर्धान हो गया। विस्मित होकर उसके आदेश का उसने निरंतर पालन किया।

श्लोक 54 (padma.6.176.54)

ततः कालेन महता भावितात्मा प्रसन्नधीः । यत्रयत्र चचारासौ शांतं तत्तत्तपोवनम्

tataḥ kālena mahatā bhāvitātmā prasannadhīḥ yatrayatra cacārāsau śāṃtaṃ tattattapovanam

फिर बहुत लंबे समय बाद, शुद्धात्मा, प्रसन्नचित्त वह जहाँ-जहाँ भी विचरता, वह-वह स्थान शांत तपोवन बन जाता।

श्लोक 55 (padma.6.176.55)

न द्वंद्वबाधा नैव क्षुत्पिपासा न च वा भयम् । तपसा तस्य जानीहि द्वितीयाध्यायजापिनः

na dvaṃdvabādhā naiva kṣutpipāsā na ca vā bhayam tapasā tasya jānīhi dvitīyādhyāyajāpinaḥ

न द्वंद्व की बाधा, न भूख-प्यास, न कोई भय — यह जानो कि यह उसके तप से हुआ, जो द्वितीय अध्याय का जापक था।"

श्लोक 56 (padma.6.176.56)

मित्रवानुवाच। एवमुक्तश्च तेनाऽहं ख्यापयित्वा परां कथाम् । अनुज्ञातप्रसंनेन च्छागीव्याघ्रयुतोगमम्

mitravānuvāca evamuktaśca tenā'haṃ khyāpayitvā parāṃ kathām anujñātaprasaṃnena cchāgīvyāghrayutogamam

मित्रवान् ने कहा — यह सब कहकर उस श्रेष्ठ कथा का वर्णन करके, उस प्रसन्न ऋषि की अनुमति से मैं बकरी और तेंदुए के साथ,

श्लोक 57 (padma.6.176.57)

गत्वा शिलातले पश्यमध्यायं लिखितं पठेत् । तस्यैवावर्त्तनादाप्तं तपसः पारमुत्तमम्

gatvā śilātale paśyamadhyāyaṃ likhitaṃ paṭhet tasyaivāvarttanādāptaṃ tapasaḥ pāramuttamam

वहाँ जाकर शिला पर लिखे उस अध्याय को देखकर पढ़ने लगा। उसी के बार-बार आवर्तन से मैंने तप की उत्तम पराकाष्ठा प्राप्त की।

श्लोक 58 (padma.6.176.58)

तेन त्वमपि कल्याण नित्यमाहर्तुमर्हसि । अध्यायं तेन ते मुक्तिरदूरस्था भविष्यति

tena tvamapi kalyāṇa nityamāhartumarhasi adhyāyaṃ tena te muktiradūrasthā bhaviṣyati

इसलिए तुम्हें भी, हे कल्याण! नित्य इस अध्याय का पाठ करना चाहिए। इससे तुम्हारी मुक्ति दूर नहीं रहेगी।

श्लोक 59 (padma.6.176.59)

देवशर्मा समादिष्टस्तेन मित्रवता स्वयम् । अभ्यर्च्य प्रणतो भूत्वा पुरंदरपुरं ययौ

devaśarmā samādiṣṭastena mitravatā svayam abhyarcya praṇato bhūtvā puraṃdarapuraṃ yayau

मित्रवान् द्वारा इस प्रकार स्वयं आदेश दिए जाने पर देवशर्मा ने उनकी पूजा कर, नत होकर, पुरंदर नगर की ओर प्रस्थान किया।

श्लोक 60 (padma.6.176.60)

तत्रात्मविदमासाद्य देवतायतने क्वचित् । वृत्तमेतन्निवेद्यादावध्यायमपठत्ततः

tatrātmavidamāsādya devatāyatane kvacit vṛttametannivedyādāvadhyāyamapaṭhattataḥ

वहाँ किसी देवालय में एक आत्मज्ञानी को पाकर, यह सारा वृत्तांत बताकर, उसने उस अध्याय को आरंभ से पढ़ा।

श्लोक 61 (padma.6.176.61)

शिक्षितस्तेन पूतात्मा पठन्नध्यायमादरात् । द्वितीयमाससादोच्चैर्निरवद्यं परं पदम्

śikṣitastena pūtātmā paṭhannadhyāyamādarāt dvitīyamāsasādoccairniravadyaṃ paraṃ padam

उससे शिक्षित होकर, पवित्रात्मा होकर, आदरपूर्वक द्वितीय अध्याय को पढ़ते हुए उसने उच्च, निर्दोष परम पद प्राप्त किया।

श्लोक 62 (padma.6.176.62)

द्वितीयस्येदमाख्यानं कथितं शृणु सांप्रतम् । तृतीयस्याथ वक्ष्यामि माहात्म्यमपि चेंदिरे

dvitīyasyedamākhyānaṃ kathitaṃ śṛṇu sāṃpratam tṛtīyasyātha vakṣyāmi māhātmyamapi ceṃdire

यह द्वितीय अध्याय की कथा कही गई, अब सुनो — हे इंदिरे! अब मैं तृतीय अध्याय की भी महिमा कहूँगा।

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