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उत्तर खण्ड · अध्याय 178

गीता माहात्म्य: चतुर्थ अध्याय की महिमा (दो बेर-कन्याओं की कथा)

अध्याय 177अध्याय-सूचीअध्याय 179

श्लोक 1 (padma.6.178.1)

श्रीभगवानुवाच। चतुर्थस्यापि माहात्म्यमाख्यास्याम्यधुना शृणु । बदरीत्वं समुत्सृज्य येन कन्ये दिवं गते

śrībhagavānuvāca caturthasyāpi māhātmyamākhyāsyāmyadhunā śṛṇu badarītvaṃ samutsṛjya yena kanye divaṃ gate

श्रीभगवान् ने कहा — अब मैं चतुर्थ अध्याय की भी महिमा कहूँगा, सुनो — जिससे दो कन्याएँ बेर-वृक्षत्व त्यागकर स्वर्ग को गईं।

श्लोक 2 (padma.6.178.2)

श्रीरुवाच। कथं कन्ये दिवं याते बदरीत्वं विसृज्य वै । ते कचास्तां पुरा देव कथं प्राप्ते तु मुख्यताम्

śrīruvāca kathaṃ kanye divaṃ yāte badarītvaṃ visṛjya vai te kacāstāṃ purā deva kathaṃ prāpte tu mukhyatām

श्री ने कहा — वे दो कन्याएँ बेर-वृक्षत्व त्यागकर स्वर्ग कैसे गईं? हे देव! वे पूर्वकाल में इस प्रमुखता को कैसे प्राप्त हुई थीं?

श्लोक 3 (padma.6.178.3)

एतद्वेदितुमिच्छामि नाथ वक्तुं त्वमर्हसि । न तु तृप्यामि शृण्वंती परमां च कथामिमाम्

etadveditumicchāmi nātha vaktuṃ tvamarhasi na tu tṛpyāmi śṛṇvaṃtī paramāṃ ca kathāmimām

मैं यह जानना चाहती हूँ, हे नाथ! आप बताने योग्य हैं। इस परम कथा को सुनते हुए मुझे तृप्ति नहीं होती।

श्लोक 4 (padma.6.178.4)

श्रीभगवानुवाच। अस्ति भागीरथी तीरे नाम्ना वाराणसी पुरी । भरतो नाम युक्तात्मा तत्र विश्वेश्वरालये

śrībhagavānuvāca asti bhāgīrathī tīre nāmnā vārāṇasī purī bharato nāma yuktātmā tatra viśveśvarālaye

श्रीभगवान् ने कहा — भागीरथी के तट पर वाराणसी नामक नगरी है। वहाँ विश्वेश्वर के मंदिर में भरत नामक एक संयतात्मा,

श्लोक 5 (padma.6.178.5)

नित्यमात्मरतस्तुर्यं जपत्यध्यायमादरात् । तदभ्यासाददुष्टात्मा न द्वंद्वैरभिभूयते

nityamātmaratasturyaṃ japatyadhyāyamādarāt tadabhyāsādaduṣṭātmā na dvaṃdvairabhibhūyate

नित्य आत्म-रत रहते हुए, आदरपूर्वक चतुर्थ अध्याय का जप करता था। उस अभ्यास से उस निष्पाप आत्मा को द्वंद्व कभी पराजित नहीं कर पाते थे।

श्लोक 6 (padma.6.178.6)

काले कदाचन क्रीडन्ययौ स नगराद्बहिः । उपांत्यवर्तिनो देवान्दिदृक्षुः स तपोधनः

kāle kadācana krīḍanyayau sa nagarādbahiḥ upāṃtyavartino devāndidṛkṣuḥ sa tapodhanaḥ

एक बार, विहार करते हुए, वह तपोधन नगर से बाहर, समीपवर्ती देवताओं के दर्शन की इच्छा से गया।

श्लोक 7 (padma.6.178.7)

विशश्राम तयोर्मूले बदर्योर्न्यपतत्फले । उपधाय तयोरेकामन्यामालंब्य चांघ्रिणा

viśaśrāma tayormūle badaryornyapatatphale upadhāya tayorekāmanyāmālaṃbya cāṃghriṇā

वह दो बेर-वृक्षों के मूल में विश्राम करने लगा, जहाँ फल गिर रहे थे — एक पर सिर टिकाकर, दूसरे पर पैर टिकाकर।

श्लोक 8 (padma.6.178.8)

तपस्विनि ततो याते बदर्योश्च तथार्द्वयम् । शुष्कं निष्पत्रशाखं च दिवसैः पंचषैरभूत्

tapasvini tato yāte badaryośca tathārdvayam śuṣkaṃ niṣpatraśākhaṃ ca divasaiḥ paṃcaṣairabhūt

जब वह तपस्वी चला गया, तब वे दोनों बेर-वृक्ष पाँच-छह दिनों में सूख गए, उनकी शाखाएँ पत्तों से रहित हो गईं।

श्लोक 9 (padma.6.178.9)

गृहे क्वचन विप्राणां जज्ञाते कन्यके ततः । वर्द्धमानं तयोर्युग्मं सप्तभिः परिवत्सरैः

gṛhe kvacana viprāṇāṃ jajñāte kanyake tataḥ varddhamānaṃ tayoryugmaṃ saptabhiḥ parivatsaraiḥ

फिर किसी ब्राह्मण के घर में दो कन्याएँ उत्पन्न हुईं। वे दोनों सात वर्षों में बड़ी हुईं।

श्लोक 10 (padma.6.178.10)

विहृत्य दूरदेशेभ्यो यतिमायांत मैक्ष्यत । गृहीत्वा चरणौ तस्य वचः सूनृतमब्रवीत्

vihṛtya dūradeśebhyo yatimāyāṃta maikṣyata gṛhītvā caraṇau tasya vacaḥ sūnṛtamabravīt

दूर देशों से भ्रमण करते हुए उन्होंने उस यति को आते देखा। उसके चरण पकड़कर उन्होंने यह सत्य वचन कहा —

श्लोक 11 (padma.6.178.11)

त्वत्प्रसादादेव मुने मोचितं द्वंद्वमावयोः । उत्सृज्य बदरीभावं मानुष्यं प्रतिपद्यते

tvatprasādādeva mune mocitaṃ dvaṃdvamāvayoḥ utsṛjya badarībhāvaṃ mānuṣyaṃ pratipadyate

"हे मुनि! आपकी कृपा से ही हम दोनों का द्वंद्व दूर हुआ। बेर-वृक्षत्व त्यागकर हमें मनुष्य-जन्म प्राप्त हुआ है।"

श्लोक 12 (padma.6.178.12)

एवमुक्तो मुनिस्ताभ्यां विस्मृतः प्रत्युवाच सः । कदा वत्से युवां केन हेतुना मोचिते मया

evamukto munistābhyāṃ vismṛtaḥ pratyuvāca saḥ kadā vatse yuvāṃ kena hetunā mocite mayā

इस प्रकार कहे जाने पर, बात भूल चुके मुनि ने उत्तर दिया — "हे वत्से! तुम दोनों कब और किस कारण से मेरे द्वारा मुक्त की गईं?

श्लोक 13 (padma.6.178.13)

युवयोर्बदरीत्वे च हेतुं ब्रूतां न वेद्म्यहम् । ऊचतुः कन्यके तस्मै बादर्ये हेतुमात्मनः

yuvayorbadarītve ca hetuṃ brūtāṃ na vedmyaham ūcatuḥ kanyake tasmai bādarye hetumātmanaḥ

तुम दोनों के बेर-वृक्षत्व का कारण भी मुझे नहीं पता, बताओ।" उन दोनों कन्याओं ने उन्हें अपने बेर-वृक्षत्व का कारण बताया —

श्लोक 14 (padma.6.178.14)

आदौ विमोचने तस्माद्दुस्त्यजादपि कारणम् । अस्ति गोदावरी तीरे तीर्थं पुण्यप्रदं नृणाम्

ādau vimocane tasmāddustyajādapi kāraṇam asti godāvarī tīre tīrthaṃ puṇyapradaṃ nṛṇām

"पहले, हमारी मुक्ति से पहले उस दुस्त्यज कारण के विषय में — गोदावरी के तट पर मनुष्यों को पुण्य देने वाला एक तीर्थ है,

श्लोक 15 (padma.6.178.15)

च्छिन्नपापमिति ख्यातं परां कोटिमवापयत् । तत्र सत्यतपा नाम तपस्तेपे सुदारुणम्

cchinnapāpamiti khyātaṃ parāṃ koṭimavāpayat tatra satyatapā nāma tapastepe sudāruṇam

जो 'छिन्नपाप' नाम से विख्यात है, जो परम श्रेष्ठता प्रदान करता है। वहाँ 'सत्यतपा' नामक एक व्यक्ति ने अत्यंत दुष्कर तप किया।

श्लोक 16 (padma.6.178.16)

ग्रीष्मे महति दीप्तानां मध्यगो जातवेदसाम् । वर्षासु जलधाराभिर्नित्यमासिक्तमूर्द्धजः

grīṣme mahati dīptānāṃ madhyago jātavedasām varṣāsu jaladhārābhirnityamāsiktamūrddhajaḥ

महान ग्रीष्म में प्रज्वलित अग्नियों के मध्य खड़े होकर, वर्षा में जलधाराओं से नित्य भीगते जटा-केश रखते हुए,

श्लोक 17 (padma.6.178.17)

शिशिरे च वसन्नप्सु बिभ्रत्कंटकितां तनुम् । विशुद्धः सततं काले तपस्तप्त्वा स संयमी

śiśire ca vasannapsu bibhratkaṃṭakitāṃ tanum viśuddhaḥ satataṃ kāle tapastaptvā sa saṃyamī

और शिशिर (जाड़े) में जल में रहते हुए, कंटकित शरीर धारण किए, वह संयमी, सदा विशुद्ध, काल-भर तप करता रहा।

श्लोक 18 (padma.6.178.18)

आत्मन्येव मतिं चक्रे परां प्राप्य सुनिर्वृतिम् । सदा फलानि बिभ्रत्सु सांद्रच्छायेषु शाखिषु

ātmanyeva matiṃ cakre parāṃ prāpya sunirvṛtim sadā phalāni bibhratsu sāṃdracchāyeṣu śākhiṣu

उसने अपने मन को आत्मा में ही स्थिर किया, परम सुख प्राप्त कर, सदा फल-भरे, घनी छाया वाले वृक्षों के बीच रहते हुए,

श्लोक 19 (padma.6.178.19)

निर्मत्सरेषु सत्वेषु बध्वा प्रीतिपरामपि । तपःफलानुसंधाने वैदुष्येनोपपादितम्

nirmatsareṣu satveṣu badhvā prītiparāmapi tapaḥphalānusaṃdhāne vaiduṣyenopapāditam

ईर्ष्यारहित प्राणियों में परम प्रीति बाँधते हुए, अपनी विद्वत्ता से तप के फल की खोज में तत्पर।

श्लोक 20 (padma.6.178.20)

ब्रह्माप्येनं स्वयं पृच्छन्नुपतस्थे तमन्वहम् । तेन संकोचहीनत्वाद्ब्रह्यण्यनुगतेन्वहम्

brahmāpyenaṃ svayaṃ pṛcchannupatasthe tamanvaham tena saṃkocahīnatvādbrahyaṇyanugatenvaham

स्वयं ब्रह्मा भी उससे प्रश्न पूछते हुए प्रतिदिन उसके पास आते थे; उसकी संकोच-हीनता के कारण ब्रह्मा द्वारा प्रतिदिन अनुगत,

श्लोक 21 (padma.6.178.21)

तद्ध्यानानुगतव्यक्ति ववृधे तस्य तत्तपः । विमुक्तकल्पं मन्वानः समृद्धादात्मनः पदात्

taddhyānānugatavyakti vavṛdhe tasya tattapaḥ vimuktakalpaṃ manvānaḥ samṛddhādātmanaḥ padāt

उसका वह तप उनके ध्यान में स्पष्ट होते हुए बढ़ता गया, अपनी समृद्ध स्थिति से स्वयं को मुक्त-कल्प मानते हुए।

श्लोक 22 (padma.6.178.22)

अंतरायशतं चक्रे ततो भीतः पुरंदरः । आहूयाप्सरसां मध्यादावां तुल्यं समादिशत्

aṃtarāyaśataṃ cakre tato bhītaḥ puraṃdaraḥ āhūyāpsarasāṃ madhyādāvāṃ tulyaṃ samādiśat

तब भयभीत पुरंदर (इंद्र) ने सैकड़ों विघ्न उत्पन्न किए। हम दोनों को अप्सराओं के बीच से बुलाकर उन्होंने समान रूप से आदेश दिया —

श्लोक 23 (padma.6.178.23)

कुरुतं तत्तपोविघ्नमनेनाचरितं युवाम् । यो मां पदादवष्टभ्य स्वराज्यं भोक्तुमिच्छति

kurutaṃ tattapovighnamanenācaritaṃ yuvām yo māṃ padādavaṣṭabhya svarājyaṃ bhoktumicchati

'तुम दोनों उसके तप में विघ्न डालो, जो मेरे पद से हटाकर स्वयं मेरे राज्य को भोगना चाहता है।'

श्लोक 24 (padma.6.178.24)

इति संदेशमापन्ने पुरस्ताच्च बिडौजसः । गोदावरीमगच्छावः स मुनिर्यत्र वर्तते

iti saṃdeśamāpanne purastācca biḍaujasaḥ godāvarīmagacchāvaḥ sa muniryatra vartate

इस प्रकार बिडौजा (इंद्र) से यह आदेश पाकर हम गोदावरी गईं, जहाँ वह मुनि विद्यमान था।

श्लोक 25 (padma.6.178.25)

मृदंगैर्मंदगंभीरैर्वेणुभिः कलवादिभिः । कलं गीतं समारब्धं तन्वंगीभिः समन्वितम्

mṛdaṃgairmaṃdagaṃbhīrairveṇubhiḥ kalavādibhiḥ kalaṃ gītaṃ samārabdhaṃ tanvaṃgībhiḥ samanvitam

मृदु-गंभीर मृदंगों से, मधुर स्वर वाली बाँसुरियों से, हम दोनों तनु-अंगियों ने मिलकर मधुर गीत आरंभ किया,

श्लोक 26 (padma.6.178.26)

उद्वहंत्यौ पृथुश्रोणीं घनपीनपयोधरे । स्मयस्मेरमुखांभोजे किंचिदाकुंचितालके

udvahaṃtyau pṛthuśroṇīṃ ghanapīnapayodhare smayasmeramukhāṃbhoje kiṃcidākuṃcitālake

विशाल नितंब, घने-पीन स्तन, मुस्कुराते कमल-मुख, कुछ घुँघराले केश धारण किए,

श्लोक 27 (padma.6.178.27)

मणिकुंडलदृष्टांसे पुंडरीकोज्ज्वलेक्षणे । तनुमध्ये सुवृत्तोरु वहंत्यौ च समे पदे

maṇikuṃḍaladṛṣṭāṃse puṃḍarīkojjvalekṣaṇe tanumadhye suvṛttoru vahaṃtyau ca same pade

मणि-कुंडलों से चमकते कंधे, श्वेत-कमल के समान उज्ज्वल नेत्र, पतली कमर, सुगोल जंघाएँ धारण किए, समान पदों से नृत्य करते हुए,

श्लोक 28 (padma.6.178.28)

आनर्तां यो वनस्यार्थे स्वरताललयानुगाम् । दर्शयंत्यौ स्वतः कृत्स्नां गतिं भावानुगामिनीम्

ānartāṃ yo vanasyārthe svaratālalayānugām darśayaṃtyau svataḥ kṛtsnāṃ gatiṃ bhāvānugāminīm

हमने वन के लिए, स्वर-ताल-लय का अनुसरण करते हुए, अपनी संपूर्ण भाव-अनुगामिनी गति दिखाई।

श्लोक 29 (padma.6.178.29)

मृदूपक्रममुत्पन्नं मंदं मंदं विवर्द्धनम् । गर्जयामास दिक्चक्रं तत्तयोर्नृत्यमानयोः

mṛdūpakramamutpannaṃ maṃdaṃ maṃdaṃ vivarddhanam garjayāmāsa dikcakraṃ tattayornṛtyamānayoḥ

कोमल आरंभ से उत्पन्न वह संगीत धीरे-धीरे बढ़ते हुए हमारे नृत्य के साथ दिशाओं के चक्र को गुँजा रहा था।

श्लोक 30 (padma.6.178.30)

ततोंगहारवेगेन वायुर्वासः सुशीतलः । ईषदुच्छ्वसिते चैले दर्शयंत्यौ पयोधरौ

tatoṃgahāravegena vāyurvāsaḥ suśītalaḥ īṣaducchvasite caile darśayaṃtyau payodharau

तब अंग-संचालन के वेग से अत्यंत शीतल वायु से, हमारे वस्त्र थोड़े उड़ने पर हमारे वक्षस्थल दिखने लगे।

श्लोक 31 (padma.6.178.31)

उद्वर्धयंती कंदर्प्पमुल्बणा गतिरावयोः । कोपमुत्पादयामासु मुने रविकृतात्मनः

udvardhayaṃtī kaṃdarppamulbaṇā gatirāvayoḥ kopamutpādayāmāsu mune ravikṛtātmanaḥ

कामोद्दीपक हमारी अत्यधिक गति ने सूर्य के समान शुद्धात्मा उस मुनि में क्रोध उत्पन्न कर दिया।

श्लोक 32 (padma.6.178.32)

ततः शापं ददौ कोपाज्जलमुत्सृज्य पाणिना । बदरीत्वं प्रपद्येथां जाह्नवी रोधसीति नौ

tataḥ śāpaṃ dadau kopājjalamutsṛjya pāṇinā badarītvaṃ prapadyethāṃ jāhnavī rodhasīti nau

तब क्रोधवश उन्होंने हाथ से जल छोड़कर हमें शाप दिया — 'तुम दोनों गंगा के तट पर बेर-वृक्ष बन जाओ।'

श्लोक 33 (padma.6.178.33)

आवाभ्यां पारतंत्र्येण यद्दुश्चरितमास्थितम् । तत्क्षमस्व विनम्राभ्यां मुनिः पश्चात्प्रसादितः

āvābhyāṃ pārataṃtryeṇa yadduścaritamāsthitam tatkṣamasva vinamrābhyāṃ muniḥ paścātprasāditaḥ

'हम दोनों परतंत्रता के कारण जो दुराचरण करने पड़े, उसे क्षमा कीजिए' — विनम्र होकर हमने कहा, और मुनि बाद में प्रसन्न हो गए।

श्लोक 34 (padma.6.178.34)

ततः शापविमोक्षं नौ कल्पयामास पुण्यधीः । भरतागमनांतोयमिति सत्यतया मुनिः

tataḥ śāpavimokṣaṃ nau kalpayāmāsa puṇyadhīḥ bharatāgamanāṃtoyamiti satyatayā muniḥ

तब उस पुण्यबुद्धि मुनि ने हमारे शाप-मोचन की व्यवस्था की — कि यह भरत के आगमन तक रहेगा, ऐसा उन्होंने सत्यतापूर्वक कहा —

श्लोक 35 (padma.6.178.35)

मर्त्येषु जन्मलाभश्च स्मृतिश्चातीतजन्मनाम् । आवयोरंतिकं गत्वा बदरीभूतयोस्ततः

martyeṣu janmalābhaśca smṛtiścātītajanmanām āvayoraṃtikaṃ gatvā badarībhūtayostataḥ

अर्थात् मनुष्यों में जन्म-प्राप्ति तथा पूर्व-जन्मों का स्मरण। फिर हम दोनों के, बेर-वृक्ष बने रहते समय, समीप जाकर,

श्लोक 36 (padma.6.178.36)

स्मरता तुर्यमध्यायं भवता निष्कृतिः कृता । तत्तावत्प्रणमावस्त्वां शापादेव न केवलात

smaratā turyamadhyāyaṃ bhavatā niṣkṛtiḥ kṛtā tattāvatpraṇamāvastvāṃ śāpādeva na kevalāta

आपके द्वारा स्मरण करते हुए चतुर्थ अध्याय का जप किए जाने से हमारा उद्धार हुआ। इसलिए हम आपको केवल शाप से ही नहीं,

श्लोक 37 (padma.6.178.37)

घोरादेव तु संसारात्त्वयैतेन विमोचिते । श्रीभगवानुवाच। एवमुक्तो मुनिस्ताभ्यामतिप्रीतमनास्ततः

ghorādeva tu saṃsārāttvayaitena vimocite śrībhagavānuvāca evamukto munistābhyāmatiprītamanāstataḥ

बल्कि इस घोर संसार से भी आपके द्वारा मुक्त किए जाने के कारण प्रणाम करती हैं।" श्रीभगवान् ने कहा — इस प्रकार उन दोनों द्वारा कहे जाने पर वह मुनि अत्यंत प्रसन्नचित्त होकर,

श्लोक 38 (padma.6.178.38)

पूजितस्ते समामंत्र्य यथागतमसौ ययौ । कन्ये चतुर्थमध्यायं जपेतां नित्यमादरात्

pūjitaste samāmaṃtrya yathāgatamasau yayau kanye caturthamadhyāyaṃ japetāṃ nityamādarāt

उनके द्वारा पूजित होकर, विदा लेकर, जिस मार्ग से आया था उसी से लौट गया। वे दोनों कन्याएँ नित्य आदरपूर्वक चतुर्थ अध्याय का जप करती रहीं।

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