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उत्तर खण्ड · अध्याय 179

गीता माहात्म्य: पंचम अध्याय की महिमा (पिंगल की कथा)

अध्याय 178अध्याय-सूचीअध्याय 180

श्लोक 1 (padma.6.179.1)

श्रीभगवानुवाच। पंचमस्याधुना देवि माहात्म्यं लोकपूजितम् । कथयामि समासेन सावधाना शृणु प्रिये

śrībhagavānuvāca paṃcamasyādhunā devi māhātmyaṃ lokapūjitam kathayāmi samāsena sāvadhānā śṛṇu priye

श्रीभगवान् ने कहा — हे देवी! अब मैं संक्षेप में पाँचवें अध्याय की लोक-पूजित महिमा कहता हूँ, सावधान होकर सुनो, हे प्रिये!

श्लोक 2 (padma.6.179.2)

पिंगलो नाम भद्रेषु पुरुकुत्सपुरे द्विजः । अवदाते कुले जातो विश्रुते वेदवादिनाम्

piṃgalo nāma bhadreṣu purukutsapure dvijaḥ avadāte kule jāto viśrute vedavādinām

पुरुकुत्सपुर में पिंगल नामक एक द्विज था, भद्र पुरुषों में, वेद-वक्ताओं में विख्यात निर्मल कुल में जन्मा।

श्लोक 3 (padma.6.179.3)

कुलोचितानि शास्त्राणि तथा वेदान्विसृज्य सः । तौर्यत्रिके मतिं चक्रे वादयन्मुरजादिकम्

kulocitāni śāstrāṇi tathā vedānvisṛjya saḥ tauryatrike matiṃ cakre vādayanmurajādikam

कुल के उचित शास्त्रों तथा वेदों को त्यागकर उसने गीत-नृत्य-वाद्य में मन लगाया, मृदंग आदि बजाते हुए।

श्लोक 4 (padma.6.179.4)

कृतश्रमस्ततस्तत्र गीते नृत्ये च वादने । परां प्रसिद्धिमासाद्य नृपसद्म विवेश सः

kṛtaśramastatastatra gīte nṛtye ca vādane parāṃ prasiddhimāsādya nṛpasadma viveśa saḥ

गायन, नृत्य तथा वादन में परिश्रम करके परम प्रसिद्धि प्राप्त कर वह राजसभा में प्रविष्ट हुआ।

श्लोक 5 (padma.6.179.5)

समातस्थे स तेनासौ पुरा भूमिभुजा सह । परदारानुपाहृत्य बुभुजे ता अनन्यधीः

samātasthe sa tenāsau purā bhūmibhujā saha paradārānupāhṛtya bubhuje tā ananyadhīḥ

वह उस राजा के साथ पूर्वकाल में वहाँ रहा; अनन्यचित्त होकर परस्त्रियों को अपने पास लाकर उनका उपभोग करने लगा।

श्लोक 6 (padma.6.179.6)

तत उत्सिक्तगर्वोऽयं सूचमानो निरंकुशः । परच्छिद्राणि चामुष्मै विविक्ते स निरंतरम्

tata utsiktagarvo'yaṃ sūcamāno niraṃkuśaḥ paracchidrāṇi cāmuṣmai vivikte sa niraṃtaram

तब गर्व से उन्मत्त, निरंकुश होकर, अपना ही आचरण प्रकट करते हुए, वह राजा के सम्मुख निरंतर दूसरों के छिद्र (दोष) खोजता रहा।

श्लोक 7 (padma.6.179.7)

तस्यासीदरुणा नाम भार्या हीनकुलोद्भवा

tasyāsīdaruṇā nāma bhāryā hīnakulodbhavā

उसकी पत्नी अरुणा नामक थी, हीन कुल में उत्पन्न।

श्लोक 8 (padma.6.179.8)

भ्रमत्यन्वेषयंती सा कामुकेन विहारिणी । तमंतरायं मन्वाना निशीथिन्यां निजालये

bhramatyanveṣayaṃtī sā kāmukena vihāriṇī tamaṃtarāyaṃ manvānā niśīthinyāṃ nijālaye

वह अपने कामुक से भोग की इच्छा से भटकती रहती थी; उसे बाधक मानकर, मध्यरात्रि में अपने ही घर में,

श्लोक 9 (padma.6.179.9)

निजघान शिरश्छित्त्वा निचखान महीतले । वियोजितस्तः प्राणैरुपेत्य यमसादनम्

nijaghāna śiraśchittvā nicakhāna mahītale viyojitastaḥ prāṇairupetya yamasādanam

उसने उसका सिर काटकर उसका वध कर दिया और भूमि में गाड़ दिया। प्राणों से वियुक्त वह यमलोक को गया,

श्लोक 10 (padma.6.179.10)

दुर्जयान्नरकान्भुंक्त्वा गृध्रोऽभूद्विजने वने । भगंदरेण रोगेण सापि हित्वा वरां तनुम्

durjayānnarakānbhuṃktvā gṛdhro'bhūdvijane vane bhagaṃdareṇa rogeṇa sāpi hitvā varāṃ tanum

दुर्जय नरकों को भोगकर वह एकांत वन में गिद्ध बना। वह स्त्री भी भगंदर रोग से अपनी सुंदर देह त्यागकर,

श्लोक 11 (padma.6.179.11)

उपेत्य नरकान्घोरान्जज्ञे तत्र वने शुकी । कणानादातुकामां तां संचरंतीमितस्ततः

upetya narakānghorānjajñe tatra vane śukī kaṇānādātukāmāṃ tāṃ saṃcaraṃtīmitastataḥ

घोर नरकों में जाकर उसी वन में तोतिन (शुकी) बनी। दाने चुगने की इच्छा से इधर-उधर विचरती हुई उसे,

श्लोक 12 (padma.6.179.12)

विददार नखैस्तीक्ष्णैर्गृध्रो वैरमनुस्मरन् । नृकपाले पयः पूर्णे निपतंतीं ततः शुकीम्

vidadāra nakhaistīkṣṇairgṛdhro vairamanusmaran nṛkapāle payaḥ pūrṇe nipataṃtīṃ tataḥ śukīm

पूर्व-वैर स्मरण करते हुए गिद्ध ने अपने तीक्ष्ण नखों से चीर दिया। फिर वह शुकी, जल से भरी एक मानव-खोपड़ी में गिर पड़ी,

श्लोक 13 (padma.6.179.13)

अभिदुद्राव गृध्रोऽपि निजघ्ने स च जालिकैः । पत्नीवियोजिता प्राणैर्नृकपालजले ततः

abhidudrāva gṛdhro'pi nijaghne sa ca jālikaiḥ patnīviyojitā prāṇairnṛkapālajale tataḥ

तो गिद्ध भी उस पर झपटा, किंतु वह भी शिकारियों द्वारा मारा गया। पूर्व-पत्नी भी प्राणों से वियुक्त होकर उसी मानव-खोपड़ी के जल में,

श्लोक 14 (padma.6.179.14)

तत्रैव निममज्जा सा वेत्यक्रूरतरः खगः । पितृलोकं प्रपेदाते नीतौ तौ यमकिंकरैः । प्राक्कृतं दुष्कृतं कर्म स्मरंतौ भयभागिनौ

tatraiva nimamajjā sā vetyakrūrataraḥ khagaḥ pitṛlokaṃ prapedāte nītau tau yamakiṃkaraiḥ prākkṛtaṃ duṣkṛtaṃ karma smaraṃtau bhayabhāginau

डूब गई। वे दोनों, वह क्रूर पक्षी तथा वह स्त्री, यमदूतों द्वारा ले जाए जाकर, पूर्वकृत दुष्कर्म का स्मरण करते हुए, भयभीत होकर पितृलोक को प्राप्त हुए।

श्लोक 15 (padma.6.179.15)

ततो यमः समालोक्य तयोः कर्म जुगुप्सितम् । अकस्मादेवतत्स्नानान्मरणे सुकृतं महत्

tato yamaḥ samālokya tayoḥ karma jugupsitam akasmādevatatsnānānmaraṇe sukṛtaṃ mahat

तब यम ने उन दोनों के घृणित कर्म को देखकर भी, उस मृत्यु के समय अनायास स्नान से उत्पन्न एक महान सुकृत भी देखा।

श्लोक 16 (padma.6.179.16)

अनुजज्ञे ततो लोकमीप्सितं गंतुमेतयोः । महापातकसंघातैरपि दुर्द्धर्षमानसौ

anujajñe tato lokamīpsitaṃ gaṃtumetayoḥ mahāpātakasaṃghātairapi durddharṣamānasau

तब उन्होंने महापातकों के समूह से भी अत्यंत दुर्जय मन वाले उन दोनों को उनके इच्छित लोक में जाने की अनुमति दी।

श्लोक 17 (padma.6.179.17)

ततोविस्मयमापन्नौ स्मृत्वा तौ दुष्कृतं निजम् । उपेत्य प्रणतौ भूत्वा वैवस्वतमपृच्छताम्

tatovismayamāpannau smṛtvā tau duṣkṛtaṃ nijam upetya praṇatau bhūtvā vaivasvatamapṛcchatām

तब विस्मित होकर, अपने दुष्कर्म का स्मरण करते हुए, वे दोनों वैवस्वत (यम) के पास जाकर, नत होकर, पूछने लगे —

श्लोक 18 (padma.6.179.18)

संचितं दुष्कृतं पूर्वमावाभ्यामपि गर्हितम् । लोकानामीप्सितानां तु को हेतुस्तद्वदस्व नौ

saṃcitaṃ duṣkṛtaṃ pūrvamāvābhyāmapi garhitam lokānāmīpsitānāṃ tu ko hetustadvadasva nau

"हमने पूर्व में जो घृणित दुष्कर्म संचित किया था, उसके होते हुए भी हमें इच्छित लोकों की प्राप्ति का क्या कारण है, यह हमें बताइए।"

श्लोक 19 (padma.6.179.19)

एवमुक्तस्ततस्ताभ्यामाह वैवस्वतो वचः । आसीद्गंगातटे नाम्ना बटुर्ब्रह्मविदुत्तमः॥

evamuktastatastābhyāmāha vaivasvato vacaḥ āsīdgaṃgātaṭe nāmnā baṭurbrahmaviduttamaḥ

इस प्रकार पूछे जाने पर वैवस्वत ने उन दोनों से यह वचन कहा — "गंगा के तट पर ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ एक बटु (ब्रह्मचारी) था,

श्लोक 20 (padma.6.179.20)

एकाकी निर्ममः शांतो वीतरागो विमत्सरः । गीतानां पंचमाध्यायमावर्त्तयति सर्वदा

ekākī nirmamaḥ śāṃto vītarāgo vimatsaraḥ gītānāṃ paṃcamādhyāyamāvarttayati sarvadā

अकेला, ममता-रहित, शांत, वीतराग, ईर्ष्यारहित, जो सदा गीता के पाँचवें अध्याय का आवर्तन करता था।

श्लोक 21 (padma.6.179.21)

तेन पुण्येन पूतात्मा बुद्ध्वा ब्रह्म सनातनम् । पापीयानपि यं श्रुत्वा तनुमुत्सृष्टवानसौ

tena puṇyena pūtātmā buddhvā brahma sanātanam pāpīyānapi yaṃ śrutvā tanumutsṛṣṭavānasau

उस पुण्य से पवित्रात्मा होकर, सनातन ब्रह्म को जानकर, उस पापी को भी सुनकर, उसने अपना शरीर त्याग दिया।

श्लोक 22 (padma.6.179.22)

निर्मलीकृतदेहस्य गीताभिर्भावितात्मनः । तत्कपालजलं प्राप्य युवां यातौ पवित्रताम्

nirmalīkṛtadehasya gītābhirbhāvitātmanaḥ tatkapālajalaṃ prāpya yuvāṃ yātau pavitratām

गीता से भावित आत्मा वाले उस निर्मल शरीर वाले व्यक्ति के उसी कपाल का जल प्राप्त करके तुम दोनों पवित्रता को प्राप्त हुए।

श्लोक 23 (padma.6.179.23)

तद्गच्छतं युवां लोकान्मनोरथपथिस्थितान् । गीतानां पंचमाध्यायमाहात्म्येन पवित्रितौ

tadgacchataṃ yuvāṃ lokānmanorathapathisthitān gītānāṃ paṃcamādhyāyamāhātmyena pavitritau

इसलिए तुम दोनों अपने मनोरथ के मार्ग पर स्थित लोकों को जाओ, गीता के पाँचवें अध्याय की महिमा से पवित्र होकर।"

श्लोक 24 (padma.6.179.24)

एवं तौ बोधितौ तेन मुदितौ समवर्तिना । व्योमयानं समारुह्य जग्मतुर्वैष्णवं पदम्

evaṃ tau bodhitau tena muditau samavartinā vyomayānaṃ samāruhya jagmaturvaiṣṇavaṃ padam

इस प्रकार उस समदर्शी यम द्वारा बोध कराए जाने पर वे दोनों प्रसन्न होकर आकाश-विमान पर आरूढ़ होकर वैष्णव पद को प्राप्त हुए।

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