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उत्तर खण्ड · अध्याय 181

गीता माहात्म्य: सप्तम अध्याय की महिमा (शंकुकर्ण की कथा)

अध्याय 180अध्याय-सूचीअध्याय 182

श्लोक 1 (padma.6.181.1)

श्रीभगवानुवाच। अथ ते वर्णयिष्यामि सप्तमाध्यायगौरवम् । यदाकर्ण्य सुधापूर पूर्तिर्भवति कर्णयोः

śrībhagavānuvāca atha te varṇayiṣyāmi saptamādhyāyagauravam yadākarṇya sudhāpūra pūrtirbhavati karṇayoḥ

श्रीभगवान् ने कहा — अब मैं तुम्हें सप्तम अध्याय की महिमा बताऊँगा, जिसे सुनकर कानों में मानो अमृत की धारा भर जाती है।

श्लोक 2 (padma.6.181.2)

अस्ति पाटलिपुत्राख्यं दुर्गमुत्तुङ्गगोपुरम् । तत्राभूद्ब्राह्मणो नाम शंकुकर्णो दयार्णवः

asti pāṭaliputrākhyaṃ durgamuttuṅgagopuram tatrābhūdbrāhmaṇo nāma śaṃkukarṇo dayārṇavaḥ

पाटलिपुत्र नामक एक ऊँचे प्राकार-द्वारों वाला दुर्ग है। वहाँ शंकुकर्ण नामक एक ब्राह्मण था, जो दया का सागर था।

श्लोक 3 (padma.6.181.3)

वैश्यवृत्तिं समासाद्य धनमर्जितवान्बहु । पितॄन्न तर्पयामास पूजयामास नो सुरान्

vaiśyavṛttiṃ samāsādya dhanamarjitavānbahu pitṝnna tarpayāmāsa pūjayāmāsa no surān

वैश्य-वृत्ति अपनाकर उसने बहुत धन कमाया, किंतु न कभी पितरों को तर्पण दिया, न देवताओं की पूजा की।

श्लोक 4 (padma.6.181.4)

पार्थिवान्भोजयांश्चक्रे धनार्जनपरायणः । तुरीयपाणिग्रहणं मंगलार्थं गृहांतरे

pārthivānbhojayāṃścakre dhanārjanaparāyaṇaḥ turīyapāṇigrahaṇaṃ maṃgalārthaṃ gṛhāṃtare

धनार्जन में परायण होकर वह केवल राजाओं को भोजन कराता था। एक बार, घर में मंगल-कार्य हेतु चतुर्थ (पुत्र के) विवाह के लिए,

श्लोक 5 (padma.6.181.5)

तनुजैर्बंधुभिः सार्धं संप्रतस्थे कदाचन । रजन्यां धर्मकल्पायां निद्रालोस्तस्य दोस्तले

tanujairbaṃdhubhiḥ sārdhaṃ saṃpratasthe kadācana rajanyāṃ dharmakalpāyāṃ nidrālostasya dostale

वह अपने पुत्रों तथा बंधुओं सहित प्रस्थान करने वाला था। उस मंगलमय रात्रि में, सोते हुए उसकी बाँह पर,

श्लोक 6 (padma.6.181.6)

दशति स्म समागत्य दंदशूकः कुतश्चन । स दष्टमात्रोऽसाध्यात्मा मणिमंत्रौषधादिभिः

daśati sma samāgatya daṃdaśūkaḥ kutaścana sa daṣṭamātro'sādhyātmā maṇimaṃtrauṣadhādibhiḥ

कहीं से आकर एक विषैले सर्प ने डस लिया। डसते ही, मणि-मंत्र-औषधि आदि से भी असाध्य होकर,

श्लोक 7 (padma.6.181.7)

क्षणैः कतिपयैरेव गतासुरभवत्ततः । पिचुमंददलैर्नालैरवगुंठितविग्रहम्

kṣaṇaiḥ katipayaireva gatāsurabhavattataḥ picumaṃdadalairnālairavaguṃṭhitavigraham

कुछ ही क्षणों में वह प्राणहीन हो गया। नीम के पत्तों तथा डंठलों से लिपटे उसके शरीर को,

श्लोक 8 (padma.6.181.8)

तमारोप्य तरुस्कंधे सूनवो गृहमाययुः । ततः कालेन बहुना ततो जातः सरीसृपः

tamāropya taruskaṃdhe sūnavo gṛhamāyayuḥ tataḥ kālena bahunā tato jātaḥ sarīsṛpaḥ

वृक्ष के तने पर रखकर पुत्र घर लौट आए। फिर बहुत समय बाद वह एक सर्प के रूप में जन्मा,

श्लोक 9 (padma.6.181.9)

तद्वासनानिबद्धात्मा जन्मपूर्वमनुस्मरन् । वंचयित्वा सुतानेतान्पूरयामि गृहाद्बहिः

tadvāsanānibaddhātmā janmapūrvamanusmaran vaṃcayitvā sutānetānpūrayāmi gṛhādbahiḥ

अपने ही वासना से बँधा हुआ, पूर्वजन्म का स्मरण करते हुए — "इन पुत्रों को छलकर, मैं घर से बाहर अपने स्थान को,

श्लोक 10 (padma.6.181.10)

आत्मनः कोटिसंख्याकं यत्रास्ते स्थापितं वसु । ततो नारायणबलिश्रद्धया परयान्विताः

ātmanaḥ koṭisaṃkhyākaṃ yatrāste sthāpitaṃ vasu tato nārāyaṇabaliśraddhayā parayānvitāḥ

जहाँ मैंने करोड़ों की संख्या में धन छिपाया है, वहाँ पूर्ण करूँगा।" फिर उसके श्राद्ध में परम श्रद्धा से युक्त होकर,

श्लोक 11 (padma.6.181.11)

कृतवंतः परे तस्य सूनवो हि द्विजन्मनः । एकदा स्वप्नमागत्य पीडितः सर्पजन्मना

kṛtavaṃtaḥ pare tasya sūnavo hi dvijanmanaḥ ekadā svapnamāgatya pīḍitaḥ sarpajanmanā

उस द्विज के अन्य पुत्रों ने नारायण-बलि आदि विधियाँ कीं। एक बार सर्प-योनि से पीड़ित पिता ने स्वप्न में आकर,

श्लोक 12 (padma.6.181.12)

अभाषयन्मनोवृत्तं पुत्राणामग्रतः पिता । ततस्ते प्रातरुत्थाय परं विस्मयमोहिताः

abhāṣayanmanovṛttaṃ putrāṇāmagrataḥ pitā tataste prātarutthāya paraṃ vismayamohitāḥ

पुत्रों के सामने अपने मन की बात कही। तब वे प्रातःकाल उठकर, परम विस्मय से मोहित होकर,

श्लोक 13 (padma.6.181.13)

इतरेतरमाख्याय पर्यंतस्ते निरंकुशाः । एकस्तत्र पितृस्नेहादुद्धर्तुमपि वांछति

itaretaramākhyāya paryaṃtaste niraṃkuśāḥ ekastatra pitṛsnehāduddhartumapi vāṃchati

एक-दूसरे को बताकर, अंत में निरंकुश होकर विवाद करने लगे। उनमें से एक ने पितृ-स्नेह के कारण उसे उद्धार करने की इच्छा भी की;

श्लोक 14 (padma.6.181.14)

अन्यो द्रविणलोभेन निहंतुं सर्पमीहते । इतरस्तु पितृस्नेहरसमोहितमानसः

anyo draviṇalobhena nihaṃtuṃ sarpamīhate itarastu pitṛsneharasamohitamānasaḥ

दूसरे ने धन-लोभ से सर्प को मार डालने की इच्छा की; तीसरा, पितृ-स्नेह के रस से मोहित मन वाला,

श्लोक 15 (padma.6.181.15)

किंवा अहिमयो न स्याच्छोचन्रोदिति केवलम् । मध्यमस्तु ततः पुत्रो वंचयित्वा सहोदरौ

kiṃvā ahimayo na syācchocanroditi kevalam madhyamastu tataḥ putro vaṃcayitvā sahodarau

यह सोचता हुआ कि "क्या यह सर्प वास्तव में मेरे पिता ही हैं?" केवल शोक करते हुए रोता रहा। तब मध्यम पुत्र, अपने दोनों भाइयों को छलकर,

श्लोक 16 (padma.6.181.16)

केनापि छद्मनोत्थाय जगाम निजमालयम् । ततः शनैः समाहूय गृहिणीं गुणशालिनीम्

kenāpi chadmanotthāya jagāma nijamālayam tataḥ śanaiḥ samāhūya gṛhiṇīṃ guṇaśālinīm

किसी बहाने उठकर अपने घर चला गया। फिर धीरे से अपनी गुणवती पत्नी को बुलाकर,

श्लोक 17 (padma.6.181.17)

कुद्दालहस्तो निरगाद्यत्रास्ते पन्नगः पिता । तेनाविदितवित्तेन चिह्नैर्निश्चित्य तत्वतः

kuddālahasto niragādyatrāste pannagaḥ pitā tenāviditavittena cihnairniścitya tatvataḥ

कुदाल हाथ में लेकर वहाँ निकल पड़ा, जहाँ सर्प-रूप पिता विद्यमान थे। उस अज्ञात धन के चिह्नों को यथार्थ रूप से निश्चित कर,

श्लोक 18 (padma.6.181.18)

स्थानमागत्य तं हंतुं वल्मीकं लोभबुद्धितः । भार्ययोत्सार्य ते मृत्स्ना स्वयं तेन च खन्यते

sthānamāgatya taṃ haṃtuṃ valmīkaṃ lobhabuddhitaḥ bhāryayotsārya te mṛtsnā svayaṃ tena ca khanyate

उस स्थान पर आकर, लोभवश उसे मारने की इच्छा से, अपनी पत्नी से मिट्टी हटवाते हुए, वह स्वयं वल्मीक (बाँबी) खोदने लगा।

श्लोक 19 (padma.6.181.19)

निखन्यमानादत्युग्रो वल्मीकादहिरुत्थितः । ततो गरलगंडूषैर्निर्गतैरतिदुःसहैः

nikhanyamānādatyugro valmīkādahirutthitaḥ tato garalagaṃḍūṣairnirgatairatiduḥsahaiḥ

खोदे जाते हुए उस बाँबी से एक अत्यंत भयंकर सर्प निकला। तब उसके अत्यंत असह्य विष-कणों से भरे फुफकार से,

श्लोक 20 (padma.6.181.20)

गिरः स कथयांचक्रे फणी फूत्कारमारुतैः

giraḥ sa kathayāṃcakre phaṇī phūtkāramārutaiḥ

वह फणधारी बोलने लगा —

श्लोक 21 (padma.6.181.21)

अहिरुवाच। कस्त्वं किमर्थमायातः कथं वा खन्यते बिलम् । केन वा प्रहितो मूढ तदाख्याहि ममाग्रतः

ahiruvāca kastvaṃ kimarthamāyātaḥ kathaṃ vā khanyate bilam kena vā prahito mūḍha tadākhyāhi mamāgrataḥ

सर्प ने कहा — "तुम कौन हो, क्यों आए हो, तथा यह बिल क्यों खोदा जा रहा है? हे मूर्ख! तुम्हें किसने भेजा है, यह मुझे बताओ।"

श्लोक 22 (padma.6.181.22)

पुत्र उवाच। पुत्रस्तेऽहं शिवो नाम हेमग्रहणकौतुकी । आगतो रात्रलब्धस्य स्वप्नस्य तु सुविस्मितः

putra uvāca putraste'haṃ śivo nāma hemagrahaṇakautukī āgato rātralabdhasya svapnasya tu suvismitaḥ

पुत्र ने कहा — "मैं तुम्हारा पुत्र हूँ, शिव नाम का, स्वर्ण प्राप्त करने का कौतूहली। रात्रि में प्राप्त स्वप्न से अत्यंत विस्मित होकर मैं यहाँ आया हूँ।"

श्लोक 23 (padma.6.181.23)

शिव उवाच। इत्थमाकर्ण्य पुत्रस्य गिरं लोकविगर्हिताम् । वक्तुमारभत स्पष्टं हसन्नुच्चैः फणी तदा

śiva uvāca itthamākarṇya putrasya giraṃ lokavigarhitām vaktumārabhata spaṣṭaṃ hasannuccaiḥ phaṇī tadā

शिव ने कहा — इस प्रकार पुत्र की लोक-निंदित बात सुनकर वह फणधारी ऊँचे स्वर में हँसते हुए स्पष्ट कहने लगा —

श्लोक 24 (padma.6.181.24)

सर्प उवाच। यदि पुत्रोऽसि मे तूर्णं मामुन्मोचय बंधनात् । निक्षेपार्थाय संजातं पन्नगं पूर्वजन्मनः

sarpa uvāca yadi putro'si me tūrṇaṃ māmunmocaya baṃdhanāt nikṣepārthāya saṃjātaṃ pannagaṃ pūrvajanmanaḥ

सर्प ने कहा — "यदि तुम मेरे पुत्र हो, तो शीघ्र मुझे इस बंधन से मुक्त करो। पूर्वजन्म से मैं केवल इस निधि की रक्षा हेतु ही सर्प बना हूँ।"

श्लोक 25 (padma.6.181.25)

पुत्र उवाच। पितः कथं ते मुक्तिः स्यादित्याचक्ष्व ममाग्रतः । परित्यक्त्वाखिलं लोकमागतोस्मि यथा निशि

putra uvāca pitaḥ kathaṃ te muktiḥ syādityācakṣva mamāgrataḥ parityaktvākhilaṃ lokamāgatosmi yathā niśi

पुत्र ने कहा — "हे पिता! आपकी मुक्ति कैसे हो, यह मुझे बताइए। मैं संपूर्ण जगत् को त्यागकर, जैसे रात्रि में आया था, वैसे ही यहाँ आया हूँ।"

श्लोक 26 (padma.6.181.26)

पितोवाच। न तीर्थानि न दानानि न तपांसि न चाध्वराः । मामुन्मोचयितुं पुत्र प्रभवंति च सर्वथा

pitovāca na tīrthāni na dānāni na tapāṃsi na cādhvarāḥ māmunmocayituṃ putra prabhavaṃti ca sarvathā

पिता ने कहा — "न तीर्थ, न दान, न तप, न यज्ञ — कोई भी सर्वथा मुझे मुक्त करने में समर्थ नहीं है, हे पुत्र,

श्लोक 27 (padma.6.181.27)

गीतानां सप्तमाध्यायमंतरेण सुधामयम् । जंतोर्जरामृत्युदुःखनिराकरणकारणम्

gītānāṃ saptamādhyāyamaṃtareṇa sudhāmayam jaṃtorjarāmṛtyuduḥkhanirākaraṇakāraṇam

गीता के सप्तम अध्याय के अतिरिक्त, जो अमृत-तुल्य है, जो प्राणी के जरा-मृत्यु के दुःख को दूर करने का कारण है।

श्लोक 28 (padma.6.181.28)

सप्तमाध्यायिनं विप्रं मदीये श्राद्धवासरे । भोजय श्रद्धया पुत्र तेन मुक्तिर्न संशयः

saptamādhyāyinaṃ vipraṃ madīye śrāddhavāsare bhojaya śraddhayā putra tena muktirna saṃśayaḥ

मेरे श्राद्ध-दिवस पर सप्तम अध्याय जानने वाले विप्र को, हे पुत्र, श्रद्धापूर्वक भोजन कराओ — इससे मेरी मुक्ति निश्चित है, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 29 (padma.6.181.29)

अन्यानपि द्विजान्वत्स वेदविद्याविशारदान् । संभोजय यथाशक्ति परमश्रद्धयान्वितः

anyānapi dvijānvatsa vedavidyāviśāradān saṃbhojaya yathāśakti paramaśraddhayānvitaḥ

हे वत्स! अन्य वेद-विद्या-विशारद द्विजों को भी यथाशक्ति परम श्रद्धा से भोजन कराओ।"

श्लोक 30 (padma.6.181.30)

इत्याकर्ण्य पितुर्वाक्यमुरगत्वमुपेयुषः । ते सर्वे सूनवो कुर्वन्यथादिष्टं ततोऽधिकम्

ityākarṇya piturvākyamuragatvamupeyuṣaḥ te sarve sūnavo kurvanyathādiṣṭaṃ tato'dhikam

पिता के इस वचन को सुनकर, सर्प-योनि को प्राप्त उस पिता के सभी पुत्रों ने, जैसा आदेश दिया गया था, उससे भी अधिक किया।

श्लोक 31 (padma.6.181.31)

शंकुकर्णस्ततः श्रीमानुत्सृज्य तनुमौरगीम् । कृत्वा विभागं पुत्राणां दिव्यंदेहमुपाददे

śaṃkukarṇastataḥ śrīmānutsṛjya tanumauragīm kṛtvā vibhāgaṃ putrāṇāṃ divyaṃdehamupādade

तब श्रीमान शंकुकर्ण ने सर्प-देह त्यागकर, पुत्रों को धन-विभाजन कर, दिव्य देह धारण की।

श्लोक 32 (padma.6.181.32)

विभज्य दत्तं पित्राय द्रव्यं तत्कोटिसंख्यया । तेन ते सूनवः सर्वे मुमुदुः साधुवृतयः

vibhajya dattaṃ pitrāya dravyaṃ tatkoṭisaṃkhyayā tena te sūnavaḥ sarve mumuduḥ sādhuvṛtayaḥ

करोड़ों की संख्या वाला वह धन विभाजित कर पिता द्वारा दिया गया; उससे वे सभी सदाचारी पुत्र हर्षित हुए।

श्लोक 33 (padma.6.181.33)

वापीकूपसरोयज्ञदेवप्रासादहेतवे । अन्नशालां ततः कुर्वन्पुत्रास्ते धर्मबुद्धयः

vāpīkūpasaroyajñadevaprāsādahetave annaśālāṃ tataḥ kurvanputrāste dharmabuddhayaḥ

धर्मबुद्धि उन पुत्रों ने बावली, कुआँ, तालाब, यज्ञ-स्थान, देव-मंदिर तथा अन्नशाला बनवाईं,

श्लोक 34 (padma.6.181.34)

सप्तमाध्याय जपतो मुक्तिभाजोभवंस्ततः । षष्ठमिष्टतमं ज्ञात्वा निर्वाणार्पितदृष्टयः

saptamādhyāya japato muktibhājobhavaṃstataḥ ṣaṣṭhamiṣṭatamaṃ jñātvā nirvāṇārpitadṛṣṭayaḥ

और सप्तम अध्याय का जप करते हुए वे मुक्तिभागी हो गए, इसे परम इष्ट जानकर, निर्वाण में समर्पित दृष्टि से।

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