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उत्तर खण्ड · अध्याय 182

गीता माहात्म्य: अष्टम अध्याय की महिमा (भावशर्मा एवं ताड़-वृक्ष)

अध्याय 181अध्याय-सूचीअध्याय 183

श्लोक 1 (padma.6.182.1)

शिव उवाच। अष्टमाध्यायमाहात्म्यं शृणु वक्ष्यामि पार्वति । यस्य श्रवणमात्रेण परां मुदमवाप्स्यसि

śiva uvāca aṣṭamādhyāyamāhātmyaṃ śṛṇu vakṣyāmi pārvati yasya śravaṇamātreṇa parāṃ mudamavāpsyasi

शिव ने कहा — हे पार्वती! सुनो, मैं अष्टम अध्याय की महिमा कहता हूँ, जिसके श्रवण मात्र से तुम परम आनंद प्राप्त करोगी।

श्लोक 2 (padma.6.182.2)

आमर्दकं पुरं नाम्ना विश्रुतं दक्षिणापथि । द्विजन्मा भावशर्मेति तत्रासीद्गणिकापतिः

āmardakaṃ puraṃ nāmnā viśrutaṃ dakṣiṇāpathi dvijanmā bhāvaśarmeti tatrāsīdgaṇikāpatiḥ

दक्षिणापथ में आमर्दक नामक एक विख्यात नगर है। वहाँ भावशर्मा नामक एक द्विज, जो वेश्याओं का स्वामी था, रहता था —

श्लोक 3 (padma.6.182.3)

खादन्मांसं पिबन्मद्यं चोरयन्साधुसंपदः । रममाणः परस्त्रीभिराखेटक कुतूहली

khādanmāṃsaṃ pibanmadyaṃ corayansādhusaṃpadaḥ ramamāṇaḥ parastrībhirākheṭaka kutūhalī

मांस खाता, मद्य पीता, साधुओं की संपत्ति चुराता, परस्त्रियों के साथ रमण करता, शिकार का शौकीन।

श्लोक 4 (padma.6.182.4)

अत्यवाहयदत्युग्रो गरीयांसं मनोरथम् । सुहृदां विटगोष्ठ्यां च तालीफलसुधारसम्

atyavāhayadatyugro garīyāṃsaṃ manoratham suhṛdāṃ viṭagoṣṭhyāṃ ca tālīphalasudhārasam

वह अत्यंत उग्र व्यक्ति अपनी भारी कामनाओं को अत्यधिक बढ़ाता गया, और मित्रों की गोष्ठी में ताड़ी-फल के अमृत-रस को,

श्लोक 5 (padma.6.182.5)

निपीय कंठपर्यंतमजीर्णेनातिपीडितः । मृतः कालेन पापात्मा जातस्तालीतरुर्महान्

nipīya kaṃṭhaparyaṃtamajīrṇenātipīḍitaḥ mṛtaḥ kālena pāpātmā jātastālītarurmahān

गले तक पीकर, अजीर्ण से अत्यंत पीड़ित होकर, समय के साथ वह पापात्मा मर गया, और एक विशाल ताड़-वृक्ष के रूप में जन्मा।

श्लोक 6 (padma.6.182.6)

तस्यच्छायामुपाश्रित्य निबिडामतिशीतलाम् । अभूतां दंपती कौचिद्ब्रह्मराक्षसतां गतौ

tasyacchāyāmupāśritya nibiḍāmatiśītalām abhūtāṃ daṃpatī kaucidbrahmarākṣasatāṃ gatau

उसकी घनी, अत्यंत शीतल छाया का आश्रय लेकर, ब्रह्मराक्षस-योनि को प्राप्त एक दंपती वहाँ पहुँचे।

श्लोक 7 (padma.6.182.7)

देव्युवाच। किं जातीयौ किमात्मानौ किंवृत्तावित्युदीरय । कर्मणा केन वा देव ब्रह्मराक्षसता तयोः

devyuvāca kiṃ jātīyau kimātmānau kiṃvṛttāvityudīraya karmaṇā kena vā deva brahmarākṣasatā tayoḥ

देवी ने कहा — वे दोनों किस जाति के, किस स्वभाव के, किस आचरण के थे, यह बताइए। हे देव! किस कर्म से उन्हें ब्रह्मराक्षसत्व प्राप्त हुआ?

श्लोक 8 (padma.6.182.8)

शिव उवाच। वेदवेदांगतत्वज्ञः सर्वशास्त्रार्थकोविदः । सदाचारोऽभवत्कश्चिद्दिवजो नाम कुशीवलः

śiva uvāca vedavedāṃgatatvajñaḥ sarvaśāstrārthakovidaḥ sadācāro'bhavatkaściddivajo nāma kuśīvalaḥ

शिव ने कहा — वेद-वेदांग के तत्त्वज्ञ, सभी शास्त्रों के अर्थ में निपुण, सदाचारी एक द्विज, जो कृषक था,

श्लोक 9 (padma.6.182.9)

जाया च तस्य कुमति नामधेया दुराशया । स सभार्यो महादानान्याददानोऽतिलोभवान्

jāyā ca tasya kumati nāmadheyā durāśayā sa sabhāryo mahādānānyādadāno'tilobhavān

उसकी पत्नी कुमति नामक, दुराशय वाली थी। वह अपनी पत्नी सहित, बाहर से महादान लेता प्रतीत होते हुए भी, भीतर से अत्यंत लोभी था;

श्लोक 10 (padma.6.182.10)

महिषीं कालपुरुषं हयादीननुवासरम् । अप्रयच्छन्द्विजातिभ्यो दानलब्धां वराटिकाम्

mahiṣīṃ kālapuruṣaṃ hayādīnanuvāsaram aprayacchandvijātibhyo dānalabdhāṃ varāṭikām

भैंस, कालपुरुष (काला बैल), घोड़े आदि — दिन-प्रतिदिन दान में प्राप्त कौड़ी तक द्विजों को नहीं देता था।

श्लोक 11 (padma.6.182.11)

कालेन दंपती प्रेतौ ब्रह्मराक्षसरूपिणौ । पर्यटंतौ महीमेतां क्षुत्तृषाकुलविग्रहौ

kālena daṃpatī pretau brahmarākṣasarūpiṇau paryaṭaṃtau mahīmetāṃ kṣuttṛṣākulavigrahau

समय के साथ वह दंपती मरकर ब्रह्मराक्षस-रूप में हो गए, भूख-प्यास से व्याकुल शरीर लिए इस पृथ्वी पर भटकते रहे।

श्लोक 12 (padma.6.182.12)

विशश्रमतुरागत्य मूलं तालीतरोस्ततः । कथमेतन्महादुःखमावयोरपगच्छति

viśaśramaturāgatya mūlaṃ tālītarostataḥ kathametanmahāduḥkhamāvayorapagacchati

वे आकर उस ताड़-वृक्ष के मूल में विश्राम करने लगे — "हमारा यह महादुःख कैसे दूर होगा?

श्लोक 13 (padma.6.182.13)

कथं वा जायते मुक्तिर्ब्रह्मराक्षसयोनितः । इति पृष्टो गृहिण्याऽसौ ब्राह्मणः समभाषत

kathaṃ vā jāyate muktirbrahmarākṣasayonitaḥ iti pṛṣṭo gṛhiṇyā'sau brāhmaṇaḥ samabhāṣata

और ब्रह्मराक्षस-योनि से मुक्ति कैसे प्राप्त होगी?" पत्नी द्वारा यह पूछे जाने पर वह ब्राह्मण (वृक्ष-रूप) कहने लगा —

श्लोक 14 (padma.6.182.14)

ब्रह्मविद्योपदेशेन विनाध्यात्मविचारणात् । विनाकर्मविधिज्ञानात्कथं मुच्येत संकटात्

brahmavidyopadeśena vinādhyātmavicāraṇāt vinākarmavidhijñānātkathaṃ mucyeta saṃkaṭāt

"ब्रह्मविद्या के उपदेश के बिना, अध्यात्म-विचार के बिना, कर्म-विधि के ज्ञान के बिना, इस संकट से मुक्ति कैसे हो सकती है?"

श्लोक 15 (padma.6.182.15)

भार्योवाच। किं तद् ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम । एतावदुक्ते तत्पत्न्या यदाश्चर्यमभूच्छृणु

bhāryovāca kiṃ tad brahma kimadhyātmaṃ kiṃ karma puruṣottama etāvadukte tatpatnyā yadāścaryamabhūcchṛṇu

पत्नी ने कहा — "वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है, हे पुरुषोत्तम?" उस पत्नी द्वारा इतना ही कहे जाने पर जो आश्चर्य हुआ, वह सुनो —

श्लोक 16 (padma.6.182.16)

अष्टमाध्यायश्लोकार्द्धश्रवणात्स तरुस्तदा । विहाय तालीरूपं तद्बभूव द्विजसत्तमः

aṣṭamādhyāyaślokārddhaśravaṇātsa tarustadā vihāya tālīrūpaṃ tadbabhūva dvijasattamaḥ

अष्टम अध्याय के आधे श्लोक को सुनने मात्र से वह वृक्ष तब ताड़-रूप त्यागकर उस द्विजश्रेष्ठ के रूप में लौट आया,

श्लोक 17 (padma.6.182.17)

सद्योज्ञानविधूतात्मा विमुक्तः पापकंचुकात् । तन्माहात्म्याद्विनिर्मुक्तौ दंपती तौ बभूवतुः

sadyojñānavidhūtātmā vimuktaḥ pāpakaṃcukāt tanmāhātmyādvinirmuktau daṃpatī tau babhūvatuḥ

तत्काल ज्ञान से शुद्ध आत्मा होकर, पाप के आवरण से मुक्त। उसी महिमा से वह दंपती भी पूर्णतः मुक्त हो गया।

श्लोक 18 (padma.6.182.18)

एतावदेव मुक्तं च दैवान्निर्गत्य तन्मुखात् । ततोंतरिक्षादायांतं क्वणत्किंकिणिकं शुभम्

etāvadeva muktaṃ ca daivānnirgatya tanmukhāt tatoṃtarikṣādāyāṃtaṃ kvaṇatkiṃkiṇikaṃ śubham

दैवयोग से उसके मुख से इतना ही निकल पाया था; तब आकाश से एक मधुर घंटिका-ध्वनि सुनाई दी,

श्लोक 19 (padma.6.182.19)

दिवि दिव्यांगनावक्त्रचंद्रमंडलमंडितम् । अप्सरोवदनांभोज भ्राम्यद्भ्रमरसंकुलम्

divi divyāṃganāvaktracaṃdramaṃḍalamaṃḍitam apsarovadanāṃbhoja bhrāmyadbhramarasaṃkulam

आकाश में दिव्य स्त्रियों के मुख-रूपी चंद्र-मंडलों से सुसज्जित, अप्सराओं के मुख-कमलों पर मंडराते भ्रमरों से भरी हुई,

श्लोक 20 (padma.6.182.20)

निर्मथ्यमानदुग्धाब्धि वेलाडिंडिरपांडुरैः । गंगातरंगसुभगैश्चामरैरुपशोभितम्

nirmathyamānadugdhābdhi velāḍiṃḍirapāṃḍuraiḥ gaṃgātaraṃgasubhagaiścāmarairupaśobhitam

मंथित दुग्ध-सागर के तट के फेन के समान श्वेत, गंगा की तरंगों के समान सुंदर चामरों से सुशोभित,

श्लोक 21 (padma.6.182.21)

गायद्गंधर्वसुभगं नृत्यत्सुरवधूशतम् । दिव्यं विमानमारूढौ दंपती जग्मतुर्दिवम्

gāyadgaṃdharvasubhagaṃ nṛtyatsuravadhūśatam divyaṃ vimānamārūḍhau daṃpatī jagmaturdivam

गाते गंधर्वों से मनोहर, नृत्य करती सैकड़ों देव-वधुओं वाले उस दिव्य विमान पर चढ़कर वह दंपती स्वर्ग को गया।

श्लोक 22 (padma.6.182.22)

अत्रत्यं वृत्तमखिलमेतद्विस्मयकारकम् । ततो लिलेख मेधावी श्लोकार्द्धमिदमादरात्

atratyaṃ vṛttamakhilametadvismayakārakam tato lilekha medhāvī ślokārddhamidamādarāt

यह संपूर्ण विस्मयकारी घटना, उस बुद्धिमान ने आदरपूर्वक उसी आधे श्लोक के साथ लिख ली,

श्लोक 23 (padma.6.182.23)

ययौ वाराणसीं नाम नगरीं मुक्तिदायिनीम् । आराधयितुमन्विच्छन्देवदेवं जनार्दनम्

yayau vārāṇasīṃ nāma nagarīṃ muktidāyinīm ārādhayitumanvicchandevadevaṃ janārdanam

और मुक्तिदायिनी वाराणसी नगरी को गया, देवदेव जनार्दन की आराधना करने की इच्छा से।

श्लोक 24 (padma.6.182.24)

स तत्र कर्तुमारेभे तपः परमुदारधीः । अत्रांतरे जगन्नाथो देवदेवो जनार्दनः

sa tatra kartumārebhe tapaḥ paramudāradhīḥ atrāṃtare jagannātho devadevo janārdanaḥ

वहाँ वह अत्यंत उदार बुद्धि वाला तप करने लगा। इसी बीच जगन्नाथ, देवदेव जनार्दन से,

श्लोक 25 (padma.6.182.25)

पृष्टो दुग्धाब्धिसुतया संयोज्य करसंपुटम् । निद्रापथं विहायैव स्थीयते कथ्यतामिति

pṛṣṭo dugdhābdhisutayā saṃyojya karasaṃpuṭam nidrāpathaṃ vihāyaiva sthīyate kathyatāmiti

दुग्ध-सागर की पुत्री (लक्ष्मी) ने हाथ जोड़कर पूछा — "आप निद्रा-मार्ग त्यागकर क्यों स्थित हैं? यह मुझे बताइए।"

श्लोक 26 (padma.6.182.26)

श्रीभगवानुवाच। काश्यां भागीरथी तीरे तपस्यतितरां द्विजः । भावशर्माति मेधावी मद्भक्तिरसपूरितः

śrībhagavānuvāca kāśyāṃ bhāgīrathī tīre tapasyatitarāṃ dvijaḥ bhāvaśarmāti medhāvī madbhaktirasapūritaḥ

श्रीभगवान् ने कहा — "काशी में, भागीरथी के तट पर, अत्यंत बुद्धिमान भावशर्मा नामक एक द्विज, मेरी भक्ति-रस से परिपूर्ण होकर तप कर रहा है,

श्लोक 27 (padma.6.182.27)

जपन्गीताष्टमाध्यायश्लोकार्द्धं नियतेंद्रियः । संतुष्टवानहं देवि तदीयतपसा भृशम्

japangītāṣṭamādhyāyaślokārddhaṃ niyateṃdriyaḥ saṃtuṣṭavānahaṃ devi tadīyatapasā bhṛśam

गीता के अष्टम अध्याय के आधे श्लोक का जप करते हुए, नियतेंद्रिय होकर। हे देवी! मैं उसके तप से अत्यंत संतुष्ट हुआ हूँ।

श्लोक 28 (padma.6.182.28)

चिरं विचारयन्नेव तत्तपः सदृशं फलम् । दातुमुत्कंठितमना वर्तेयं सांप्रतं प्रिये

ciraṃ vicārayanneva tattapaḥ sadṛśaṃ phalam dātumutkaṃṭhitamanā varteyaṃ sāṃprataṃ priye

बहुत देर से मैं उस तप के सदृश फल देने पर विचार कर रहा हूँ; वह देने की उत्कंठा से मन में युक्त, हे प्रिये, मैं अभी इसी स्थिति में हूँ।"

श्लोक 29 (padma.6.182.29)

पार्वत्युवाच। हरिः प्रसन्नभूतोऽपि चिंतां प्राप यदि प्रभो । भावशर्मा हरेर्भक्तः प्राप्तः किं तत्फलं पुनः

pārvatyuvāca hariḥ prasannabhūto'pi ciṃtāṃ prāpa yadi prabho bhāvaśarmā harerbhaktaḥ prāptaḥ kiṃ tatphalaṃ punaḥ

पार्वती ने कहा — "हे प्रभु! यदि प्रसन्न हरि को भी इतनी चिंता हुई, तो हरि के भक्त भावशर्मा को अंततः वह फल क्या प्राप्त हुआ?"

श्लोक 30 (padma.6.182.30)

श्रीमहादेव उवाच। ततः प्रसादमासाद्य प्रसन्नस्य मुरद्विषः । सुखमात्यंतिकं प्राप भावशर्मा द्विजोत्तमः । लेभिरे पदवीं सर्वे तदीया अपि वंशजाः

śrīmahādeva uvāca tataḥ prasādamāsādya prasannasya muradviṣaḥ sukhamātyaṃtikaṃ prāpa bhāvaśarmā dvijottamaḥ lebhire padavīṃ sarve tadīyā api vaṃśajāḥ

श्रीमहादेव ने कहा — तब प्रसन्न मुरारि की कृपा प्राप्त कर द्विजोत्तम भावशर्मा ने अनंत सुख प्राप्त किया; और उसके सभी वंशज भी उसी पद को प्राप्त हुए।

श्लोक 31 (padma.6.182.31)

तत्कर्मवशतो ये वै संप्राप्ता यातनां पुरा । एतदेवाष्टमाध्यायमाहात्म्यं किंचिदेव ते

tatkarmavaśato ye vai saṃprāptā yātanāṃ purā etadevāṣṭamādhyāyamāhātmyaṃ kiṃcideva te

उनके पूर्व-कर्मों के कारण जो पूर्वकाल में यातना को प्राप्त हुए थे — यह अष्टम अध्याय की महिमा, हे मृगशावाक्षि! तुम्हें संक्षेप में ही कही गई है,

श्लोक 32 (padma.6.182.32)

कथितं मृगशावाक्षि द्रष्टव्यं तु सदैव च

kathitaṃ mṛgaśāvākṣi draṣṭavyaṃ tu sadaiva ca

और इसे सदा दर्शनीय (आदरणीय) मानना चाहिए।

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