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उत्तर खण्ड · अध्याय 188

गीता-चतुर्दशाध्याय-माहात्म्य

अध्याय 187अध्याय-सूचीअध्याय 189

श्लोक 1 (padma.6.188.1)

ईश्वर उवाच- अतः परं प्रवक्ष्यामि भवानि भवमुक्तये । गीताचतुर्दशाध्यायमवधारय सुस्मिते

īśvara uvāca- ataḥ paraṁ pravakṣyāmi bhavāni bhavamuktaye gītācaturdaśādhyāyamavadhāraya susmite

ईश्वर ने कहा — हे भवानि! अब आगे संसार से मुक्ति के लिए मैं कहूँगा; हे सुस्मिते! गीता के चौदहवें अध्याय को ध्यान से सुनो।

श्लोक 2 (padma.6.188.2)

मेदिन्यां यत्किलस्थूलमस्ति काश्मीरमंडलम् । राजधानी सरस्वत्या आस्ते चैव मनोहरा

medinyāṁ yatkilasthūlamasti kāśmīramaṁḍalam rājadhānī sarasvatyā āste caiva manoharā

इस पृथ्वी पर काश्मीर नामक एक विशाल प्रदेश है; वहाँ सरस्वती की मनोहर राजधानी है।

श्लोक 3 (padma.6.188.3)

यामधिष्ठाय वाग्देवी ब्रह्मलोकं प्रयच्छति । हंसमारुह्यमानापि सावित्रीप्रहतैरपि

yāmadhiṣṭhāya vāgdevī brahmalokaṁ prayacchati haṁsamāruhyamānāpi sāvitrīprahatairapi

जिस पर अधिष्ठित होकर वाग्देवी ब्रह्मलोक प्रदान करती हैं — वे जो अपने हंस पर आरूढ़ होकर, सावित्री द्वारा स्पर्शित (उपहारों) से भी—

श्लोक 4 (padma.6.188.4)

सरस्वतीपदांभोज सेवामाश्रित्य कुंकुमैः । यत्र गौरवयंत्याशा हंसपक्षपुटोद्भवैः

sarasvatīpadāṁbhoja sevāmāśritya kuṁkumaiḥ yatra gauravayaṁtyāśā haṁsapakṣapuṭodbhavaiḥ

—सरस्वती के चरण-कमलों की सेवा का आश्रय लेकर, जहाँ दिशाएँ उनके हंस के पंखों से उठे कुंकुम से गौरवान्वित होती हैं—

श्लोक 5 (padma.6.188.5)

निरंतरं तया चैव नृणां संस्कृतभाषिणाम् । सुपर्वाणमयी भाषा निमेषेणोपलभ्यते

niraṁtaraṁ tayā caiva nṛṇāṁ saṁskṛtabhāṣiṇām suparvāṇamayī bhāṣā nimeṣeṇopalabhyate

—और उन्हीं की निरंतर कृपा से संस्कृत बोलने वाले मनुष्यों की भाषा पल भर में देवताओं की भाषा के समान हो जाती है।

श्लोक 6 (padma.6.188.6)

प्रातर्गृहांगणोद्भूतै र्यत्रकुंकुमपांसुलैः । सर्वतोरुणितच्छाय शशांकरविमंडलम्

prātargṛhāṁgaṇodbhūtai ryatrakuṁkumapāṁsulaiḥ sarvatoruṇitacchāya śaśāṁkaravimaṁḍalam

वहाँ प्रातःकाल घरों के आँगन में उड़ते कुंकुम-रज से सूर्य और चंद्र का समस्त मंडल चारों ओर लालिमा से रँग जाता है।

श्लोक 7 (padma.6.188.7)

तत्रासीत्तेजसां राशिः शौर्यवर्मा नरेश्वरः । उद्यदुज्ज्वलबाणौघ खंडितारातिमंडलः

tatrāsīttejasāṁ rāśiḥ śauryavarmā nareśvaraḥ udyadujjvalabāṇaugha khaṁḍitārātimaṁḍalaḥ

वहाँ तेज की राशि शौर्यवर्मा नामक राजा थे, जिन्होंने उदित होते हुए उज्ज्वल बाणों की बाढ़ से शत्रुओं के मंडल को खंडित कर दिया था।

श्लोक 8 (padma.6.188.8)

अभूच्च सिंहलद्वीपे राजा सिंहपराक्रमः । नाम्ना विक्रमवेतालः कलानामपि शेवधिः

abhūcca siṁhaladvīpe rājā siṁhaparākramaḥ nāmnā vikramavetālaḥ kalānāmapi śevadhiḥ

और सिंहलद्वीप में सिंह के समान पराक्रमी विक्रमवेताल नामक एक राजा थे, जो कलाओं के भंडार थे।

श्लोक 9 (padma.6.188.9)

उभौ परस्परं मैत्रीं वर्द्धयांचक्रतुः क्रमात् । तत्तद्देशसमुत्पन्नैरपूर्वैः प्रचुरोत्करैः

ubhau parasparaṁ maitrīṁ varddhayāṁcakratuḥ kramāt tattaddeśasamutpannairapūrvaiḥ pracurotkaraiḥ

वे दोनों अपने-अपने देश में उत्पन्न अपूर्व और प्रचुर उपहारों के आदान-प्रदान से क्रमशः परस्पर मैत्री बढ़ाने लगे।

श्लोक 10 (padma.6.188.10)

एकदा प्रहितं प्रेम्णा प्रभूतं शौर्यवर्मणा । राजा विक्रमवेतालो विलोक्य शुनकीद्वयम्

ekadā prahitaṁ premṇā prabhūtaṁ śauryavarmaṇā rājā vikramavetālo vilokya śunakīdvayam

एक बार शौर्यवर्मा द्वारा प्रेमपूर्वक भेजी गई दो शिकारी कुतियों को देखकर राजा विक्रमवेताल ने—

श्लोक 11 (padma.6.188.11)

मत्तमातंगतुरग मणिभूषणचामरम् । प्रेषयामास मित्राय प्रभूतं शौर्यवर्मणे

mattamātaṁgaturaga maṇibhūṣaṇacāmaram preṣayāmāsa mitrāya prabhūtaṁ śauryavarmaṇe

—मत्त हाथी, घोड़े, मणि-आभूषण और चामर प्रचुर मात्रा में अपने मित्र शौर्यवर्मा को भेज दिए।

श्लोक 12 (padma.6.188.12)

एकदा शिबिकारूढश्चारु चामरवीजितः । सुवर्णशृंखलारूढं वाद्यडिंडिमडंबरम्

ekadā śibikārūḍhaścāru cāmaravījitaḥ suvarṇaśṛṁkhalārūḍhaṁ vādyaḍiṁḍimaḍaṁbaram

एक दिन पालकी पर आरूढ़, सुंदर चामरों से हवा किए जाते हुए, वाद्यों और नगाड़ों की धूमधाम के बीच, स्वर्ण-शृंखला में बँधी—

श्लोक 13 (padma.6.188.13)

शुनीयुगलमादाय मृगया कौतुकोत्सुकः । राजा जगाम बाह्यालीं समं राजकुमारकैः

śunīyugalamādāya mṛgayā kautukotsukaḥ rājā jagāma bāhyālīṁ samaṁ rājakumārakaiḥ

—उस कुतिया-युगल को लेकर, शिकार के कौतुक से उत्सुक राजा, राजकुमारों के साथ नगर के बाहरी क्षेत्र में गए।

श्लोक 14 (padma.6.188.14)

पणबंधविधानेन समुपेतं शशामिषम् । तत्र राजकुमाराणां महान्कोलाहलोऽभवत्

paṇabaṁdhavidhānena samupetaṁ śaśāmiṣam tatra rājakumārāṇāṁ mahānkolāhalo'bhavat

एक शर्त लगाने की व्यवस्था के साथ पकड़े गए एक खरगोश को लेकर वहाँ राजकुमारों के बीच बड़ा कोलाहल मच गया।

श्लोक 15 (padma.6.188.15)

ततः समानवयसा केनचिद्राजसूनुना । बहुमूल्यं पणं कृत्वा राजाचिक्रीडकौतुकी

tataḥ samānavayasā kenacidrājasūnunā bahumūlyaṁ paṇaṁ kṛtvā rājācikrīḍakautukī

फिर समान आयु के किसी राजकुमार के साथ बहुमूल्य शर्त लगाकर, कौतुकी राजा ने खेल आरंभ किया।

श्लोक 16 (padma.6.188.16)

ततोवतार्य दोलाया विरुदावलिगर्विताम् । धावतः शशकस्योच्चैः पृष्ठे मुंचन्नृपं शुनीम्

tatovatārya dolāyā virudāvaligarvitām dhāvataḥ śaśakasyoccaiḥ pṛṣṭhe muṁcannṛpaṁ śunīm

फिर पालकी से उतारकर, प्रशस्ति-वाक्यों से गर्वित उस कुतिया को राजा ने भागते हुए खरगोश की पीठ पर ऊँचे स्वर में छोड़ दिया।

श्लोक 17 (padma.6.188.17)

मुमोच राजपुत्रोऽपि प्रेमपात्रं महाभुजः । विरराम शुनीमुच्चैः संकीर्त्य विरुदावलीम्

mumoca rājaputro'pi premapātraṁ mahābhujaḥ virarāma śunīmuccaiḥ saṁkīrtya virudāvalīm

महाबाहु राजकुमार ने भी अपनी प्रिय कुतिया को छोड़ा, ऊँचे स्वर में उसकी प्रशस्ति का उच्चारण करके फिर मौन हो गया।

श्लोक 18 (padma.6.188.18)

अलक्ष्यमाणवेगेऽस्मिन्शुनीयुगलकेभृशम् । धावत्युत्थितमेवासीत्पश्यतां सर्वभूभृताम्

alakṣyamāṇavege'sminśunīyugalakebhṛśam dhāvatyutthitamevāsītpaśyatāṁ sarvabhūbhṛtām

उन दोनों कुतियों के अगोचर वेग से दौड़ते समय, समस्त उपस्थित राजा लोग उत्सुकता से देखते रहे।

श्लोक 19 (padma.6.188.19)

पपात गर्ते महति शशकोऽतिश्रमादसौ । पतितोऽपि शुनी वश्यो नाभवच्छशशावकः

papāta garte mahati śaśako'tiśramādasau patito'pi śunī vaśyo nābhavacchaśaśāvakaḥ

अत्यधिक थकान से वह खरगोश एक बड़े गड्ढे में जा गिरा; गिरने पर भी वह छोटा खरगोश कुतिया के वश में नहीं आया।

श्लोक 20 (padma.6.188.20)

ततः शनैः समुत्थाय धावन्नाक्रम्यरोषतः । जगृहे राजशुन्याऽसौ शशकः फेनमुद्वमन्

tataḥ śanaiḥ samutthāya dhāvannākramyaroṣataḥ jagṛhe rājaśunyā'sau śaśakaḥ phenamudvaman

फिर धीरे-धीरे उठकर, दौड़ते हुए और क्रोध से झपटते हुए, फेन उगलता हुआ वह खरगोश राजा की कुतिया द्वारा पकड़ लिया गया।

श्लोक 21 (padma.6.188.21)

ततः कथंचिदुप्लुत्य गच्छन्विस्खलयञ्छशः । राजपुत्रशुनक्यासौ गृहीतः कंधरातटे

tataḥ kathaṁciduplutya gacchanviskhalayañchaśaḥ rājaputraśunakyāsau gṛhītaḥ kaṁdharātaṭe

फिर किसी तरह छलांग लगाकर लड़खड़ाते हुए भागता वह खरगोश राजकुमार की कुतिया द्वारा गर्दन के पास से पकड़ लिया गया।

श्लोक 22 (padma.6.188.22)

जितमस्माभिरत्यर्थमिति संजल्पतां नृणाम् । कोलाहले शंकिताया शुन्या निर्गतवान्मुखात्

jitamasmābhiratyarthamiti saṁjalpatāṁ nṛṇām kolāhale śaṁkitāyā śunyā nirgatavānmukhāt

'हम पूरी तरह जीत गए' — ऐसा कहते हुए लोगों के कोलाहल के बीच, वह खरगोश चौंकी हुई कुतिया के मुख से निकल भागा।

श्लोक 23 (padma.6.188.23)

ततो दंष्ट्राव्रणश्रेणी क्षरद्रुधिरधारकः । क्वापि र्ममरभूभागे निलीयस्थितवाञ्छशः

tato daṁṣṭrāvraṇaśreṇī kṣaradrudhiradhārakaḥ kvāpi rmamarabhūbhāge nilīyasthitavāñchaśaḥ

फिर दाँतों के घावों की पंक्तियों से रक्त बहाता हुआ वह खरगोश कहीं एक सुहावने भूभाग में जाकर छिप गया।

श्लोक 24 (padma.6.188.24)

जिघ्रंत्या राजशुन्याऽसौ भूभागं धनरोषया । दृष्टमात्रः परित्रस्तो हस्तमात्रं ततोऽगमत्

jighraṁtyā rājaśunyā'sau bhūbhāgaṁ dhanaroṣayā dṛṣṭamātraḥ paritrasto hastamātraṁ tato'gamat

प्रबल क्रोध से भूमि को सूँघती हुई राजा की कुतिया को देखते ही अत्यंत भयभीत वह खरगोश थोड़ी ही दूर और आगे बढ़ गया—

श्लोक 25 (padma.6.188.25)

यत्र कर्पूरकदली क्रोडव्याघ्रदरीतलः । चोली कपोलफलकान्चुबन्वाति समीरणः

yatra karpūrakadalī kroḍavyāghradarītalaḥ colī kapolaphalakāncubanvāti samīraṇaḥ

—जहाँ कर्पूर-केले थे, गुफाओं में बाघ छिपे रहते थे, और हवा मालती के फूलों के गालों को चूमती थी—

श्लोक 26 (padma.6.188.26)

उद्भिन्न केतकीकोशरजोमुकुलितेक्षणः । विस्रब्धाहरणा यत्रच्छायां तां परितन्वतः

udbhinna ketakīkośarajomukulitekṣaṇaḥ visrabdhāharaṇā yatracchāyāṁ tāṁ paritanvataḥ

—जहाँ खिले केतकी-कोशों के पराग से नेत्र अधमुँदे हो जाते थे, और जहाँ निर्भय प्राणी उस छाया में फैलकर विचरण करते थे—

श्लोक 27 (padma.6.188.27)

नारिकेलफलैर्यत्र स्वयं निपतितैरधः । अपि चूतफलैस्तृप्ताः पक्वैः शाखामृगा अपि

nārikelaphalairyatra svayaṁ nipatitairadhaḥ api cūtaphalaistṛptāḥ pakvaiḥ śākhāmṛgā api

—जहाँ स्वयं गिरे हुए नारियल के फलों से, तथा पके हुए आम के फलों से भी, वानर तृप्त होते थे—

श्लोक 28 (padma.6.188.28)

अपि केसरिणो यत्र खेलंति कलभैः समम् । फणिनः केकिबर्हेषु निर्विशंकं विशंति च

api kesariṇo yatra khelaṁti kalabhaiḥ samam phaṇinaḥ kekibarheṣu nirviśaṁkaṁ viśaṁti ca

—जहाँ सिंह भी हाथी के बच्चों के साथ खेलते थे, और सर्प मोरों के पंखों में निर्भय होकर प्रवेश करते थे—

श्लोक 29 (padma.6.188.29)

यत्राश्रमांतरे विप्रो वत्सनामा जितेंद्रियः । शांतश्चतुर्दशाध्यायं जपन्नास्ते निरंतरम्

yatrāśramāṁtare vipro vatsanāmā jiteṁdriyaḥ śāṁtaścaturdaśādhyāyaṁ japannāste niraṁtaram

—वहाँ एक आश्रम में वत्स नामक जितेंद्रिय ब्राह्मण, शांतचित्त होकर, निरंतर चौदहवें अध्याय का जप करते हुए रहता था।

श्लोक 30 (padma.6.188.30)

तत्र तच्छिष्यपादाब्ज प्रक्षालनजलैः कृते । कर्दमे न्यपतद्गत्वा जीवशेषो मुहुः श्वसन्

tatra tacchiṣyapādābja prakṣālanajalaiḥ kṛte kardame nyapatadgatvā jīvaśeṣo muhuḥ śvasan

वहाँ उसके शिष्य के चरण-कमल धोने के जल से बने कीचड़ में, शेष जीवन वाला वह खरगोश बार-बार साँस लेते हुए गिर पड़ा।

श्लोक 31 (padma.6.188.31)

ततः कर्दमसंस्पर्शमात्रनिस्तीर्ण संसृतिः । दिव्यं विमानमारुह्य निर्ययौ शशको दिवम्

tataḥ kardamasaṁsparśamātranistīrṇa saṁsṛtiḥ divyaṁ vimānamāruhya niryayau śaśako divam

फिर उस कीचड़ के मात्र स्पर्श से संसार-सागर से पार होकर, वह खरगोश दिव्य विमान पर आरूढ़ होकर स्वर्ग को चला गया।

श्लोक 32 (padma.6.188.32)

ततः शुन्यपि लिप्तांगीस्तोकैः कर्दमबिंदुभिः । क्षुत्पिपासार्तिरहिता शुनीरूपं विहाय सा

tataḥ śunyapi liptāṁgīstokaiḥ kardamabiṁdubhiḥ kṣutpipāsārtirahitā śunīrūpaṁ vihāya sā

फिर उस कीचड़ की कुछ बूँदों से अंग लिप्त हो जाने पर, भूख-प्यास की पीड़ा से रहित हुई वह कुतिया भी अपना कुतिया-रूप त्यागकर—

श्लोक 33 (padma.6.188.33)

ततो दिव्यांगनारम्यं गंधर्वैरुपशोभितम् । दिव्यं विमानमारुह्य शुन्यपि त्रिदिवं ययौ

tato divyāṁganāramyaṁ gaṁdharvairupaśobhitam divyaṁ vimānamāruhya śunyapi tridivaṁ yayau

—दिव्य अप्सराओं से रमणीय और गंधर्वों से सुशोभित दिव्य विमान पर आरूढ़ होकर स्वर्गलोक को चली गई।

श्लोक 34 (padma.6.188.34)

ततो जहास मेधावी शिष्यो नाम्ना स्वकंधरः । विचार्य विस्मितः पूर्वजन्मवैरस्य कारणम्

tato jahāsa medhāvī śiṣyo nāmnā svakaṁdharaḥ vicārya vismitaḥ pūrvajanmavairasya kāraṇam

तब स्वकंधर नामक वह मेधावी शिष्य, पूर्वजन्म के वैर का कारण विचारकर, विस्मित होकर हँस पड़ा।

श्लोक 35 (padma.6.188.35)

राजापि पर्यपृच्छत्तं विस्मयस्मेरलोचनः । प्रणम्य परया भक्त्या विनयैकपयोनिधिः

rājāpi paryapṛcchattaṁ vismayasmeralocanaḥ praṇamya parayā bhaktyā vinayaikapayonidhiḥ

विनय के एकमात्र सागर वह राजा भी विस्मय से मुस्कुराती आँखों के साथ, परम भक्ति से प्रणाम करके उससे पूछने लगा —

श्लोक 36 (padma.6.188.36)

कथां कथय मे विप्र हीनयोनि निषेवितौ । अज्ञौयौ जग्मतुः स्वर्गे शुनी शशकशावकौ

kathāṁ kathaya me vipra hīnayoni niṣevitau ajñauyau jagmatuḥ svarge śunī śaśakaśāvakau

'हे विप्र! मुझे कथा कहिए — यह हीन योनियों में रहने वाले, अज्ञानी कुतिया और खरगोश-शावक स्वर्ग को कैसे गए?'

श्लोक 37 (padma.6.188.37)

शिष्य उवाच। वत्सनामा द्विजन्मास्ते वनेऽमुष्मिन्जितेंद्रियः । चतुर्दशं तु ह्यध्यायं गीतानां सर्वदा जपन्

śiṣya uvāca vatsanāmā dvijanmāste vane'muṣminjiteṁdriyaḥ caturdaśaṁ tu hyadhyāyaṁ gītānāṁ sarvadā japan

शिष्य ने कहा — 'इस वन में वत्स नामक जितेंद्रिय ब्राह्मण रहता है, जो सदा गीता के चौदहवें अध्याय का जप करता है।'

श्लोक 38 (padma.6.188.38)

शिष्योऽहं तस्य भूपाल ब्रह्मविद्याविशारदः । चतुर्दश तु अध्यायं जपामि प्रत्यहं नृप

śiṣyo'haṁ tasya bhūpāla brahmavidyāviśāradaḥ caturdaśa tu adhyāyaṁ japāmi pratyahaṁ nṛpa

'हे भूपाल! मैं उसका शिष्य हूँ, ब्रह्मविद्या में निपुण; हे राजन्! मैं भी प्रतिदिन चौदहवें अध्याय का जप करता हूँ।'

श्लोक 39 (padma.6.188.39)

मदीयचरणांभोजप्रक्षालनजले लुठन् । शशस्त्रिदिवमापन्नः शुनक्या सह भूपते

madīyacaraṇāṁbhojaprakṣālanajale luṭhan śaśastridivamāpannaḥ śunakyā saha bhūpate

'हे भूपते! मेरे चरण-कमलों के प्रक्षालन-जल में लोटते हुए वह खरगोश उस कुतिया के साथ स्वर्गलोक को प्राप्त हुआ।'

श्लोक 40 (padma.6.188.40)

राजोवाच। हेतुना केन कथय हसितं च द्विजोत्तम । अतः किमपि साकूतं मन्यमानेन सादरम्

rājovāca hetunā kena kathaya hasitaṁ ca dvijottama ataḥ kimapi sākūtaṁ manyamānena sādaram

राजा ने कहा — 'हे द्विजोत्तम! बताइए, किस कारण आप हँसे? इसमें कुछ गूढ़ अभिप्राय मानकर मैं आदरपूर्वक पूछता हूँ।'

श्लोक 41 (padma.6.188.41)

शिष्य उवाच। महाराष्ट्रेति नगरं नाम्ना प्रत्युदकं महत् । तत्रासीद्ब्राह्मणो नाम्ना केशवः कितवाग्रणीः

śiṣya uvāca mahārāṣṭreti nagaraṁ nāmnā pratyudakaṁ mahat tatrāsīdbrāhmaṇo nāmnā keśavaḥ kitavāgraṇīḥ

शिष्य ने कहा — 'महाराष्ट्र में प्रत्युदक नामक एक बड़ा नगर है; वहाँ केशव नामक एक ब्राह्मण रहता था, जो जुआरियों में अग्रणी था।'

श्लोक 42 (padma.6.188.42)

विलोभनाभवत्तस्य जाया स्वैरविहारिणी । तेन सा हन्यते क्रोधाद्वैरं संचिंत्य जन्मनः

vilobhanābhavattasya jāyā svairavihāriṇī tena sā hanyate krodhādvairaṁ saṁciṁtya janmanaḥ

'उसकी पत्नी विलोभना नामक, स्वच्छंद विचरण करने वाली थी; क्रोधवश उसने उसे मार डाला, और उस जन्म का वैर बना रहा।'

श्लोक 43 (padma.6.188.43)

ततः स्त्रीवधपापेन शशको जायते द्विजः । किल्बिषाच्छुनकी सापि जाता वंचनजन्मनः

tataḥ strīvadhapāpena śaśako jāyate dvijaḥ kilbiṣācchunakī sāpi jātā vaṁcanajanmanaḥ

'फिर स्त्री-वध के पाप से वह ब्राह्मण खरगोश बना; और छल के पाप से वह स्त्री भी कुतिया बनकर जन्मी।'

श्लोक 44 (padma.6.188.44)

पूर्वेण जन्मनाभ्यस्तं वैरं विस्मरतो नहि । आसेदिवद्भ्यां बहुधा योन्यंतरमपि क्वचित्

pūrveṇa janmanābhyastaṁ vairaṁ vismarato nahi āsedivadbhyāṁ bahudhā yonyaṁtaramapi kvacit

'पूर्व जन्म में अभ्यस्त हुआ वैर भुलाया नहीं जाता; वे दोनों एक-दूसरे का पीछा करते हुए कई अन्य योनियों में भी भटकते रहे।'

श्लोक 45 (padma.6.188.45)

इत्याकलय्य सकलं भूपालः श्रद्धयान्वितः । गीतामभ्यस्य सकलामवाप परमां गतिम्

ityākalayya sakalaṁ bhūpālaḥ śraddhayānvitaḥ gītāmabhyasya sakalāmavāpa paramāṁ gatim

यह सब समझकर, श्रद्धा से युक्त वह राजा संपूर्ण गीता का अभ्यास करके परम गति को प्राप्त हुआ।

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