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उत्तर खण्ड · अध्याय 189

गीता-पंचदशाध्याय-माहात्म्य

अध्याय 188अध्याय-सूचीअध्याय 190

श्लोक 1 (padma.6.189.1)

ईश्वर उवाच। प्रवक्ष्यामि विशालाक्षि तुहिनाचलकन्यके । गीता पंचदशाध्यायमाहात्म्यमवधारय

īśvara uvāca pravakṣyāmi viśālākṣi tuhinācalakanyake gītā paṁcadaśādhyāyamāhātmyamavadhāraya

ईश्वर ने कहा — हे विशालाक्षि! हे हिमाचल-कन्या! अब मैं गीता के पंद्रहवें अध्याय की महिमा कहूँगा, ध्यानपूर्वक सुनो।

श्लोक 2 (padma.6.189.2)

कृपालुर्नरसिंहोऽभून्नाम्ना गौडेषु भूपतिः । यस्यासिधारया संख्ये देवासंघा वधीकृताः

kṛpālurnarasiṁho'bhūnnāmnā gauḍeṣu bhūpatiḥ yasyāsidhārayā saṁkhye devāsaṁghā vadhīkṛtāḥ

गौड़ प्रदेश में नरसिंह नामक एक दयालु राजा थे, जिनकी तलवार की धार से युद्ध में असुरों के समूह मारे गए थे।

श्लोक 3 (padma.6.189.3)

यदीय मत्तमातंग दानधाराजलैरिला । निदाघेपि च सेहेतां रविसंतापवेदनाम्

yadīya mattamātaṁga dānadhārājalairilā nidāghepi ca sehetāṁ ravisaṁtāpavedanām

जिनके मत्त हाथियों के मद-जल की धाराओं से पृथ्वी ग्रीष्म ऋतु में भी सूर्य के ताप की पीड़ा सह लेती थी।

श्लोक 4 (padma.6.189.4)

संक्रंदनपरित्रस्ता यदीय शरणं गताः । रेजिरे करिणो मत्ताश्चलंतः पर्वता इव

saṁkraṁdanaparitrastā yadīya śaraṇaṁ gatāḥ rejire kariṇo mattāścalaṁtaḥ parvatā iva

युद्ध की गर्जना से भयभीत होकर जो उनकी शरण में आए, वे मत्त हाथी चलते हुए पर्वतों के समान सुशोभित होते थे।

श्लोक 5 (padma.6.189.5)

मत्तमातंगचीत्कारप्रतिस्वनमिवादरात् । यस्य गोपायतः शैला व्याहरंति कृपावतः

mattamātaṁgacītkārapratisvanamivādarāt yasya gopāyataḥ śailā vyāharaṁti kṛpāvataḥ

प्रजा की रक्षा करते हुए उन दयालु राजा के मत्त हाथियों की चिंघाड़ को मानो आदरपूर्वक पर्वत प्रतिध्वनि करते थे।

श्लोक 6 (padma.6.189.6)

यदीय धावत्तुरगक्षुरसंघातजर्जरम् । नाभूच्चित्रं कथंकारं गतखंडं धरातलम्

yadīya dhāvatturagakṣurasaṁghātajarjaram nābhūccitraṁ kathaṁkāraṁ gatakhaṁḍaṁ dharātalam

उनके दौड़ते घोड़ों की खुरों की टापों से पृथ्वी का धरातल टूट-फूट जाता, इसमें कोई आश्चर्य नहीं था।

श्लोक 7 (padma.6.189.7)

यस्मिन्वृत्रहणो मित्रे समुद्धरति मेदिनीम् 3। पुनरुज्वलयांचक्रे महाभाष्यं फणीश्वरः

yasminvṛtrahaṇo mitre samuddharati medinīm 3 punarujvalayāṁcakre mahābhāṣyaṁ phaṇīśvaraḥ

जब उनके मित्र वृत्रहन्ता (इंद्र) पृथ्वी का उद्धार करते थे, तब मानो शेषनाग ने पुनः महाभाष्य को उद्भासित कर दिया।

श्लोक 8 (padma.6.189.8)

तस्यासीत्सैनिको धीमाञ्छस्त्रशास्त्रकलानिधिः । नाम्ना सरभभेरुंडः प्रचंडभुजमंडलः

tasyāsītsainiko dhīmāñchastraśāstrakalānidhiḥ nāmnā sarabhabheruṁḍaḥ pracaṁḍabhujamaṁḍalaḥ

उनका एक बुद्धिमान सैनिक था, शस्त्र-शास्त्र और कलाओं का भंडार, नाम से सरभभेरुंड, प्रचंड भुजाओं वाला।

श्लोक 9 (padma.6.189.9)

भांडारेण तुरंगैश्च भटैर्वीररसोद्भवैः । समान एव भूपालदुर्गैरत्यंतदुर्गमैः

bhāṁḍāreṇa turaṁgaiśca bhaṭairvīrarasodbhavaiḥ samāna eva bhūpāladurgairatyaṁtadurgamaiḥ

भंडार, घोड़ों और वीररस से उत्पन्न योद्धाओं में वह राजा के ही समान था, और उसके दुर्ग अत्यंत दुर्गम थे।

श्लोक 10 (padma.6.189.10)

स कदाचित्स्वयं राज्यं कर्तुं पापो दधे मनः । निहत्य वसुधापालं बलात्साकं कुमारकैः

sa kadācitsvayaṁ rājyaṁ kartuṁ pāpo dadhe manaḥ nihatya vasudhāpālaṁ balātsākaṁ kumārakaiḥ

एक बार उस पापी ने राजा को बलपूर्वक उसके पुत्रों सहित मारकर स्वयं राज्य करने का मन बना लिया।

श्लोक 11 (padma.6.189.11)

कर्तुं व्यवस्य दिवसैः स्वल्पैरित्थं चिकीर्षया । विषूचिकामयादाशु परासुः समजायत

kartuṁ vyavasya divasaiḥ svalpairitthaṁ cikīrṣayā viṣūcikāmayādāśu parāsuḥ samajāyata

इस प्रकार कुछ ही दिनों में इसे कर डालने की इच्छा से निश्चय करते ही, वह विषूचिका रोग से शीघ्र मर गया।

श्लोक 12 (padma.6.189.12)

कालेनाल्पीयसा प्रेत्य पापात्मा तेन कर्मणा । तेजस्वी तुरगो जातः सिंधुदेशे कृशोदरिः

kālenālpīyasā pretya pāpātmā tena karmaṇā tejasvī turago jātaḥ siṁdhudeśe kṛśodariḥ

थोड़े ही समय बाद मरकर वह पापात्मा उस कर्म के फलस्वरूप सिंधु प्रदेश में एक तेजस्वी, कृशोदर घोड़ा बना।

श्लोक 13 (padma.6.189.13)

मूलेन बहुना क्रीत्वा हयतत्वविदा ततः । बहुयत्नवता नीतः केनचिद्वैश्यसूनुना

mūlena bahunā krītvā hayatatvavidā tataḥ bahuyatnavatā nītaḥ kenacidvaiśyasūnunā

अश्व-विद्या के जानकार किसी वैश्य-पुत्र ने बहुत मूल्य देकर उसे खरीदा और बड़े परिश्रम से कहीं ले गया।

श्लोक 14 (padma.6.189.14)

राजापि पौत्रनप्त्त्राद्यैस्तस्यैव मरणात्परम् । कालेन वृद्धतां प्राप्तः स्वराज्यं चापि पालयन्

rājāpi pautranapttrādyaistasyaiva maraṇātparam kālena vṛddhatāṁ prāptaḥ svarājyaṁ cāpi pālayan

उधर राजा भी, उसकी मृत्यु के बाद पौत्र-प्रपौत्रादि की पीढ़ियों से गुजरते हुए, समय के साथ वृद्धावस्था को प्राप्त हुआ, फिर भी अपना राज्य पालता रहा।

श्लोक 15 (padma.6.189.15)

स वैश्यसूनुस्तं चाश्वं राज्ञे दातुं समागतः । राज्ञोद्वारिस्थितस्तत्र प्रतीक्षंस्तत्समागमम्

sa vaiśyasūnustaṁ cāśvaṁ rājñe dātuṁ samāgataḥ rājñodvāristhitastatra pratīkṣaṁstatsamāgamam

वह वैश्य-पुत्र उस घोड़े को राजा को देने के लिए आया, और राजा के द्वार पर उनकी भेंट की प्रतीक्षा में खड़ा रहा।

श्लोक 16 (padma.6.189.16)

ज्ञातपूर्वोऽपि वैश्योऽसौ प्रतीहारेण दर्शितः । किमर्थं ब्रूहि राज्ञेति पृष्टः स्पष्टमभाषत

jñātapūrvo'pi vaiśyo'sau pratīhāreṇa darśitaḥ kimarthaṁ brūhi rājñeti pṛṣṭaḥ spaṣṭamabhāṣata

पूर्व-परिचित होते हुए भी उस वैश्य को द्वारपाल ने उपस्थित करके पूछा — 'किस लिए आए हो, राजा को बताओ' — तो उसने स्पष्ट कहा—

श्लोक 17 (padma.6.189.17)

देव त्रिजगतीरत्नमिति मत्वा तुरंगमः । मया नियुतमूल्येन बहुना साधुलक्षणः

deva trijagatīratnamiti matvā turaṁgamaḥ mayā niyutamūlyena bahunā sādhulakṣaṇaḥ

'हे देव! त्रिलोक का रत्न मानकर, मैंने इस उत्तम-लक्षण वाले अश्व को बड़ी धनराशि देकर खरीदा है—'

श्लोक 18 (padma.6.189.18)

ततोऽवलोक्य वक्त्राणि भूपालः पार्श्ववर्तिनाम् । समादिदेश वणिजमश्वोऽत्र नीयतामिति

tato'valokya vaktrāṇi bhūpālaḥ pārśvavartinām samādideśa vaṇijamaśvo'tra nīyatāmiti

फिर पास खड़े लोगों के मुख देखकर राजा ने आदेश दिया — 'वणिक द्वारा अश्व यहाँ लाया जाए।'

श्लोक 19 (padma.6.189.19)

शिरांसि धूनयन्नृणामश्वलक्षणवेदिनाम् । शूराणामपि चेतांसि मुहुरुत्साहयन्महान्

śirāṁsi dhūnayannṛṇāmaśvalakṣaṇavedinām śūrāṇāmapi cetāṁsi muhurutsāhayanmahān

वह महान् घोड़ा अश्व-लक्षण जानने वालों के सिर हिला देता, तथा शूरवीरों के मन को भी बार-बार उत्साहित कर देता था—

श्लोक 20 (padma.6.189.20)

अखंडमेदिनीवेगबहुसंक्रमणार्जितम् । लालाफेनछलेनासौ वमन्शुभ्रतरं यशः

akhaṁḍamedinīvegabahusaṁkramaṇārjitam lālāphenachalenāsau vamanśubhrataraṁ yaśaḥ

—मानो सारी पृथ्वी के अनेक चक्करों से अर्जित अपनी अत्यंत उज्ज्वल कीर्ति को लार के फेन के बहाने उगल रहा हो।

श्लोक 21 (padma.6.189.21)

उच्चैःश्रवस्तुलां भेजे गुणसाम्येन तत्त्वतः । विवृण्वन्नति तेजस्वी ह्रियेव नतकंधरः

uccaiḥśravastulāṁ bheje guṇasāmyena tattvataḥ vivṛṇvannati tejasvī hriyeva natakaṁdharaḥ

गुणों की समानता से वह वास्तव में उच्चैःश्रवा की तुलना पाता था; अत्यंत तेजस्वी होते हुए भी, मानो लज्जा से उसकी गर्दन झुकी रहती थी।

श्लोक 22 (padma.6.189.22)

चामरैरिंदुधवलैर्वीज्यमानो निरंतरम् । दुग्धांभोनिधिलोलैस्तैः श्वासैरुच्चैःश्रवा इव

cāmarairiṁdudhavalairvījyamāno niraṁtaram dugdhāṁbhonidhilolaistaiḥ śvāsairuccaiḥśravā iva

चंद्रमा के समान श्वेत चामरों से निरंतर हवा किया जाता, और दुग्ध-सागर की लहरों जैसी उसकी साँसों से वह मानो साक्षात् उच्चैःश्रवा ही था।

श्लोक 23 (padma.6.189.23)

नीलातपत्रयुगलं घनच्छायतुलश्रिया । बिभ्राणो वारिदालीढ हिमाद्रि शिखरश्रियम्

nīlātapatrayugalaṁ ghanacchāyatulaśriyā bibhrāṇo vāridālīḍha himādri śikharaśriyam

सघन छाया की शोभा वाले नीले कानों की जोड़ी धारण करता हुआ, वह मेघ-चूमे हिमाद्रि-शिखर की शोभा धारण करता था।

श्लोक 24 (padma.6.189.24)

मेदिनीमंडलस्पर्श संक्रांतमिव पावकम् । मुहुरुद्धरयन्धुन्वन्बंधुरं कंधरातटम्

medinīmaṁḍalasparśa saṁkrāṁtamiva pāvakam muhuruddharayandhunvanbaṁdhuraṁ kaṁdharātaṭam

मानो पृथ्वी के धरातल के स्पर्श से अग्नि उसमें संक्रमित हो गई हो, ऐसे बार-बार उठकर वह अपनी सुंदर, मुड़ी हुई गर्दन को हिलाता था।

श्लोक 25 (padma.6.189.25)

दारयन्वैरिणः सर्वान्व्याहरंश्च जयश्रियम् । हेषारवेण गुरुणा दिक्षुप्रख्यापयन्यशः

dārayanvairiṇaḥ sarvānvyāharaṁśca jayaśriyam heṣāraveṇa guruṇā dikṣuprakhyāpayanyaśaḥ

समस्त शत्रुओं को विदीर्ण करता हुआ, विजय-श्री की घोषणा करता हुआ, अपनी गंभीर हिनहिनाहट से दिशाओं में अपनी कीर्ति फैलाता था।

श्लोक 26 (padma.6.189.26)

सत्त्वस्य राशिरत्युच्चैर्गतीनामिव शेवधिः । रूपस्य निलयं साक्षाल्लक्षणानां पयोनिधिः

sattvasya rāśiratyuccairgatīnāmiva śevadhiḥ rūpasya nilayaṁ sākṣāllakṣaṇānāṁ payonidhiḥ

वह बल की राशि, मानो अत्यंत उत्तम गतियों का भंडार, सौंदर्य का साक्षात् निवास, और शुभ लक्षणों का सागर था।

श्लोक 27 (padma.6.189.27)

आनीतो वणिजा वाजी राज्ञा च समदृश्यत । बहुधा वर्णितोऽमात्यैरश्वलक्षणवेदिभिः

ānīto vaṇijā vājī rājñā ca samadṛśyata bahudhā varṇito'mātyairaśvalakṣaṇavedibhiḥ

वणिक द्वारा लाया गया वह अश्व राजा द्वारा देखा गया, और अश्व-लक्षण जानने वाले मंत्रियों द्वारा बहुत प्रकार से उसकी प्रशंसा की गई।

श्लोक 28 (padma.6.189.28)

यथेच्छं वणिजोदीर्णं स्वर्णं दत्त्वा महीपतिः । जग्राह तुरगं वेगादसीमानंदनिर्भरः

yathecchaṁ vaṇijodīrṇaṁ svarṇaṁ dattvā mahīpatiḥ jagrāha turagaṁ vegādasīmānaṁdanirbharaḥ

वणिक को इच्छानुसार सोना देकर राजा ने असीम आनंद से भरकर शीघ्रता से उस अश्व को ग्रहण किया।

श्लोक 29 (padma.6.189.29)

ततोऽश्वपालमाहूय यत्नतस्तं निरूप्य च । विसर्जितसभालोको गृहांतरमगान्नृपः

tato'śvapālamāhūya yatnatastaṁ nirūpya ca visarjitasabhāloko gṛhāṁtaramagānnṛpaḥ

फिर अश्वपालक को बुलाकर, उसे यत्नपूर्वक निर्देश देकर, राजा ने सभा को विसर्जित करके अपने अंतःपुर में प्रवेश किया।

श्लोक 30 (padma.6.189.30)

अनेकधा समापृष्टो महीपालं रंणांगणे । शस्त्रव्रणकिणश्रेणीभूषणं सत्वसन्निभम्

anekadhā samāpṛṣṭo mahīpālaṁ raṁṇāṁgaṇe śastravraṇakiṇaśreṇībhūṣaṇaṁ satvasannibham

युद्ध-क्षेत्र के विषय में बार-बार पूछा गया वह अश्व, शस्त्र-घावों के चिह्नों की पंक्ति से मानो अलंकृत, साक्षात् बल-स्वरूप था।

श्लोक 31 (padma.6.189.31)

एकदा मृगयां खेलन्कुतूहलरसात्मना । तमारुह्य महीपालो वनं प्रति विवेश ह

ekadā mṛgayāṁ khelankutūhalarasātmanā tamāruhya mahīpālo vanaṁ prati viveśa ha

एक बार कौतुक-भाव से शिकार खेलते हुए, राजा उसी पर सवार होकर वन में प्रवेश कर गए।

श्लोक 32 (padma.6.189.32)

विसृज्य सैनिकान्पृष्टे धावतः परितोऽखिलान् । आकृष्यमाणो हरिणैः पिपासाकुलितोऽभवत्

visṛjya sainikānpṛṣṭe dhāvataḥ parito'khilān ākṛṣyamāṇo hariṇaiḥ pipāsākulito'bhavat

अपने पीछे-पीछे दौड़ते सभी सैनिकों को छोड़कर, हिरणों का पीछा करते हुए खिंचते-खिंचते राजा प्यास से व्याकुल हो गए।

श्लोक 33 (padma.6.189.33)

तत उत्तीर्य तुरगाज्जलमन्वेषयन् नृपः । बध्वाश्वं तरुशाखायामारुरोह शिलां नृपः

tata uttīrya turagājjalamanveṣayan nṛpaḥ badhvāśvaṁ taruśākhāyāmāruroha śilāṁ nṛpaḥ

तब राजा घोड़े से उतरकर, जल की खोज में घोड़े को एक वृक्ष की शाखा से बाँधकर, एक शिला पर चढ़ गए।

श्लोक 34 (padma.6.189.34)

गीतापंचदशाध्यायश्लोकार्द्धलिखितं ततः । पातितं मरुता तत्र यत्र खंडे विलोकयत्

gītāpaṁcadaśādhyāyaślokārddhalikhitaṁ tataḥ pātitaṁ marutā tatra yatra khaṁḍe vilokayat

वहाँ हवा से उड़कर गीता के पंद्रहवें अध्याय के आधे श्लोक वाला एक पन्ना गिरा, जिस टुकड़े पर उन्होंने दृष्टि डाली।

श्लोक 35 (padma.6.189.35)

पत्रं वाचयतो राज्ञः श्रुत्वा गीताक्षरावलीम् । ततो मुक्तिपदं लेभे तुरगस्त्वरयाऽपतत्

patraṁ vācayato rājñaḥ śrutvā gītākṣarāvalīm tato muktipadaṁ lebhe turagastvarayā'patat

राजा द्वारा पत्र पढ़े जाने पर गीता के उन अक्षरों को सुनकर, घोड़े को उसी क्षण मुक्ति-पद प्राप्त हो गया और वह शीघ्र गिर पड़ा।

श्लोक 36 (padma.6.189.36)

ततो ग्रंथिं समाच्छिद्य पल्याणवतार्य च । उत्थापमानस्तुरगो राज्ञा नोत्थितवान्मृतः

tato graṁthiṁ samācchidya palyāṇavatārya ca utthāpamānasturago rājñā notthitavānmṛtaḥ

फिर बंधन की गाँठ खोलकर और काठी उतारकर राजा ने घोड़े को उठाने की चेष्टा की, किंतु मरा हुआ वह घोड़ा नहीं उठा।

श्लोक 37 (padma.6.189.37)

ततः सरभभेरुंडो नृपमाभाष्य सुस्वरम् । दिव्यं विमानमारुह्य जगाम त्रिदशालयम्

tataḥ sarabhabheruṁḍo nṛpamābhāṣya susvaram divyaṁ vimānamāruhya jagāma tridaśālayam

तब सरभभेरुंड ने मधुर स्वर में राजा को संबोधित करके, दिव्य विमान पर आरूढ़ होकर देवताओं के लोक को प्रस्थान किया।

श्लोक 38 (padma.6.189.38)

ततो गिरिं समारुह्य ददर्शाश्रममुत्तमम् । पुन्नागकदलीचूतनारिकेलसमन्वितम्

tato giriṁ samāruhya dadarśāśramamuttamam punnāgakadalīcūtanārikelasamanvitam

फिर एक पर्वत पर चढ़कर राजा ने पुन्नाग, केले, आम और नारियल के वृक्षों से युक्त एक उत्तम आश्रम देखा—

श्लोक 39 (padma.6.189.39)

द्राक्षेक्षुवाटिकापूगनागकेसरचंपकम् । खेलत्करभसारंगं नृत्यत्केकिकुलं नृपः

drākṣekṣuvāṭikāpūganāgakesaracaṁpakam khelatkarabhasāraṁgaṁ nṛtyatkekikulaṁ nṛpaḥ

—अंगूर और गन्ने की बगीचियों, सुपारी, नागकेसर और चंपक के वृक्षों वाला, जहाँ ऊँट-हाथी के बच्चे खेलते और मोरों के झुंड नृत्य करते थे—

श्लोक 40 (padma.6.189.40)

प्रणिपत्य द्विजन्मानमुटजाभ्यंतरस्थितम् । पप्रच्छ परया भक्त्या मुक्तसंसारवासनात्

praṇipatya dvijanmānamuṭajābhyaṁtarasthitam papraccha parayā bhaktyā muktasaṁsāravāsanāt

—वहाँ कुटिया के भीतर बैठे, संसार की वासना से मुक्त एक ब्राह्मण को प्रणाम करके राजा ने परम भक्ति से पूछा—

श्लोक 41 (padma.6.189.41)

तुरगो निरगात्स्वर्गं हेतुना केन मे वद । इत्याकर्ण्य वचो राज्ञो द्विजन्मा वाचमूचिवान्

turago niragātsvargaṁ hetunā kena me vada ityākarṇya vaco rājño dvijanmā vācamūcivān

'—मेरा घोड़ा किस कारण स्वर्ग को चला गया? मुझे बताइए।' राजा के ये वचन सुनकर उस ब्राह्मण ने कहा—

श्लोक 42 (padma.6.189.42)

कालेन बहुना प्रेत्य तत्पापात्तुरगोऽभवत् । अथ पंचदशाध्यायश्लोकार्द्धं लिखितं क्वचित्

kālena bahunā pretya tatpāpātturago'bhavat atha paṁcadaśādhyāyaślokārddhaṁ likhitaṁ kvacit

'बहुत समय बाद मरकर वह उस पाप के कारण घोड़ा बना। फिर कहीं पंद्रहवें अध्याय का आधा श्लोक लिखा हुआ था—'

श्लोक 43 (padma.6.189.43)

ततो वाचयतः श्रुत्वा निरगात्तुरगो दिवम् । ततः समागतैस्तत्र परिवारजनैर्वृतः

tato vācayataḥ śrutvā niragātturago divam tataḥ samāgataistatra parivārajanairvṛtaḥ

'—उसे कोई पढ़ रहा था, वह सुनकर वह घोड़ा स्वर्ग को चला गया।' तब वहाँ एकत्रित हुए परिवारजनों से घिरे हुए—

श्लोक 44 (padma.6.189.44)

प्रणिपत्य द्विजन्मानं हृष्टरोमा विनिर्गतः । पत्रं तदेव लिखितं गीतापंचदशाक्षरम्

praṇipatya dvijanmānaṁ hṛṣṭaromā vinirgataḥ patraṁ tadeva likhitaṁ gītāpaṁcadaśākṣaram

—उस ब्राह्मण को प्रणाम करके, रोमांचित होकर राजा वहाँ से निकल पड़े; और गीता के पंद्रहवें अध्याय का वही श्लोक लिखा हुआ पत्र—

श्लोक 45 (padma.6.189.45)

वाचयन्स महीपालो हर्षसंफुल्ललोचनः । अभिषिच्य निजं पुत्रं मंत्रविन्मंत्रिभिः समम्

vācayansa mahīpālo harṣasaṁphullalocanaḥ abhiṣicya nijaṁ putraṁ maṁtravinmaṁtribhiḥ samam

—पढ़ते हुए, हर्ष से खिले नेत्रों वाले राजा ने मंत्रवेत्ता मंत्रियों के साथ अपने पुत्र का राज्याभिषेक किया—

श्लोक 46 (padma.6.189.46)

सिंहासने सिंहबलं मुक्तिमाप विशुद्धधीः

siṁhāsane siṁhabalaṁ muktimāpa viśuddhadhīḥ

—सिंहासन पर सिंह के समान बलवान उस पुत्र को बिठाकर, विशुद्ध बुद्धि वाले राजा ने स्वयं मुक्ति प्राप्त की।

अध्याय 188अध्याय-सूचीअध्याय 190