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उत्तर खण्ड · अध्याय 193

श्रीमद्भागवत-माहात्म्य: भक्ति का विलाप

अध्याय 192अध्याय-सूचीअध्याय 194

श्लोक 1 (padma.6.193.1)

पार्वत्युवाच- देवदेव महादेव सर्वज्ञ सकलार्थद । कृपां मयि परां कृत्वा यत्पृच्छे तद्वदस्व मे

pārvatyuvāca- devadeva mahādeva sarvajña sakalārthada kṛpāṁ mayi parāṁ kṛtvā yatpṛcche tadvadasva me

पार्वती ने कहा — हे देवों के देव महादेव! हे सर्वज्ञ! हे समस्त अर्थ देने वाले! मुझ पर परम कृपा करके जो मैं पूछूँ, वह बताइए।

श्लोक 2 (padma.6.193.2)

श्रुतं च गीतामाहात्म्यं बह्वाश्चर्यकथायुतम् । तेन मे भक्तिरुत्पन्ना श्रोतुं कृष्णकथां पराम्

śrutaṁ ca gītāmāhātmyaṁ bahvāścaryakathāyutam tena me bhaktirutpannā śrotuṁ kṛṣṇakathāṁ parām

मैंने अनेक आश्चर्यजनक कथाओं से युक्त गीता की महिमा सुनी; उससे मुझमें कृष्ण की परम कथा सुनने की भक्ति उत्पन्न हुई है।

श्लोक 3 (padma.6.193.3)

पुराणेषु तु सर्वेषु श्रीमद्भागवतं परम् । यत्र प्रतिपदं कृष्णो गीयते बहुधर्षिभिः । तन्माहात्म्यं यथातत्वं सेतिहासं वदाधुना

purāṇeṣu tu sarveṣu śrīmadbhāgavataṁ param yatra pratipadaṁ kṛṣṇo gīyate bahudharṣibhiḥ tanmāhātmyaṁ yathātatvaṁ setihāsaṁ vadādhunā

सभी पुराणों में श्रीमद्भागवत श्रेष्ठ है, जिसमें कई ऋषियों द्वारा पद-पद पर कृष्ण का गान किया जाता है। अब उसकी महिमा को उसके इतिहास सहित यथार्थ रूप में बताइए।

श्लोक 4 (padma.6.193.4)

ईश्वर उवाच-। नैमिषे सूतमासीनमभिवाद्य महामतिम् । कथामृतरसास्वादकुशलः शौनकोऽब्रवीत्

īśvara uvāca- naimiṣe sūtamāsīnamabhivādya mahāmatim kathāmṛtarasāsvādakuśalaḥ śaunako'bravīt

ईश्वर ने कहा — नैमिष वन में बैठे महामति सूत को प्रणाम करके, कथा के अमृत-रस के आस्वादन में कुशल शौनक ने कहा।

श्लोक 5 (padma.6.193.5)

शौनक उवाच । अज्ञानध्वांतविध्वंसि कोटिजन्माघनाशनम्

śaunaka uvāca ajñānadhvāṁtavidhvaṁsi koṭijanmāghanāśanam

शौनक ने कहा — जो अज्ञान के अंधकार का विध्वंस करने वाला और करोड़ों जन्मों के पापों का नाश करने वाला है—

श्लोक 6 (padma.6.193.6)

श्रीमद्भागवताख्यानं सूताख्याहि रसायनम् । भक्तिज्ञानविरागाढ्यो विवेको वर्द्धते कथम्

śrīmadbhāgavatākhyānaṁ sūtākhyāhi rasāyanam bhaktijñānavirāgāḍhyo viveko varddhate katham

—हे सूत! वह श्रीमद्भागवत नामक रसायन-कथा हमें सुनाइए। भक्ति, ज्ञान और वैराग्य से परिपूर्ण विवेक कैसे बढ़ता है?

श्लोक 7 (padma.6.193.7)

माहामोहनिरासश्च वैष्णवैः क्रियते कथम् । इह घोरे कलौप्रायो जीवश्चासुरतां गतः

māhāmohanirāsaśca vaiṣṇavaiḥ kriyate katham iha ghore kalauprāyo jīvaścāsuratāṁ gataḥ

वैष्णवों द्वारा महामोह का त्याग कैसे किया जाता है? इस घोर कलियुग में जीव प्रायः आसुरी स्वभाव को प्राप्त हो गया है।

श्लोक 8 (padma.6.193.8)

क्लेशाक्रांतस्य तस्याथ शोधने किं रसायनम् । श्रेयसां यद्भवेच्छ्रेयः पावनानां च पावनम्

kleśākrāṁtasya tasyātha śodhane kiṁ rasāyanam śreyasāṁ yadbhavecchreyaḥ pāvanānāṁ ca pāvanam

क्लेशों से आक्रांत उस जीव को शुद्ध करने का क्या रसायन है — जो समस्त कल्याणों का कल्याण और समस्त पवित्रताओं की पवित्रता है—

श्लोक 9 (padma.6.193.9)

कृष्णप्रीतिकरं यच्च साधनं तद्वदाधुना। चिंतामणिं लोकसुखं सुरेंद्रास्पदसंपदम्

kṛṣṇaprītikaraṁ yacca sādhanaṁ tadvadādhunā ciṁtāmaṇiṁ lokasukhaṁ sureṁdrāspadasaṁpadam

—और जो कृष्ण को प्रसन्न करने वाला साधन है, वह अब बताइए। जो चिंतामणि, लोक-सुख, इंद्र-पद की संपदा—

श्लोक 10 (padma.6.193.10)

प्रयच्छति गुरुः प्रीतो वैकुंठं चातिदुर्लभम्

prayacchati guruḥ prīto vaikuṁṭhaṁ cātidurlabham

—और अत्यंत दुर्लभ वैकुंठ को भी, प्रसन्न होने पर गुरु प्रदान कर देते हैं।

श्लोक 11 (padma.6.193.11)

सूत उवाच-। प्रीतोऽहं ते द्विजश्रेष्ठाः कथयिष्ये यथाश्रुतम् । सारात्सारतरं यच्च संसारभयनाशनम्

sūta uvāca- prīto'haṁ te dvijaśreṣṭhāḥ kathayiṣye yathāśrutam sārātsārataraṁ yacca saṁsārabhayanāśanam

सूत ने कहा — हे द्विजश्रेष्ठों! मैं प्रसन्न हूँ, जैसा सुना है वैसा ही कहूँगा — जो सार से भी बढ़कर सार है और संसार के भय का नाश करने वाला है—

श्लोक 12 (padma.6.193.12)

भक्तिप्रवर्द्धकं यच्च कृष्णसंतुष्टिहेतुकम् । तन्मे कथयतः साधो सावधानतया शृणु

bhaktipravarddhakaṁ yacca kṛṣṇasaṁtuṣṭihetukam tanme kathayataḥ sādho sāvadhānatayā śṛṇu

—और जो भक्ति को बढ़ाने वाला तथा कृष्ण की संतुष्टि का कारण है। हे साधुजनो! मैं जो कह रहा हूँ, सावधानीपूर्वक सुनिए।

श्लोक 13 (padma.6.193.13)

कालव्यालमुखालीढ जगत्त्राणविधायकम् । श्रीमद्भागवतं शास्त्रं कलौ कृष्णेन भाषितम्

kālavyālamukhālīḍha jagattrāṇavidhāyakam śrīmadbhāgavataṁ śāstraṁ kalau kṛṣṇena bhāṣitam

काल-रूपी सर्प के मुख से चाटे जा रहे जगत् की रक्षा करने वाला श्रीमद्भागवत शास्त्र कलियुग में स्वयं कृष्ण द्वारा कहा गया।

श्लोक 14 (padma.6.193.14)

एतस्मादपरं किंचिन्मनः शुद्धिकरं नहि । जन्मांतरकृतैः पुण्यैर्लभ्यते साधुभिस्तु तत्

etasmādaparaṁ kiṁcinmanaḥ śuddhikaraṁ nahi janmāṁtarakṛtaiḥ puṇyairlabhyate sādhubhistu tat

इससे बढ़कर मन को शुद्ध करने वाला और कुछ भी नहीं है; इसे साधुजन जन्मांतरों में किए गए पुण्यों से ही प्राप्त करते हैं।

श्लोक 15 (padma.6.193.15)

राज्ञः परीक्षितो मोक्षं ज्ञात्वा कमलसंभवः । तोलयामास शास्त्राणि पुराणानि महांति च

rājñaḥ parīkṣito mokṣaṁ jñātvā kamalasaṁbhavaḥ tolayāmāsa śāstrāṇi purāṇāni mahāṁti ca

राजा परीक्षित की मुक्ति जानकर कमल-जन्मा ब्रह्मा ने सभी शास्त्रों और महापुराणों को तराजू पर तौला—

श्लोक 16 (padma.6.193.16)

श्रीमद्भागवतं तत्र गरीयो भुवि संगतम् । श्रीमद्भागवती वार्ता सुराणामपि दुर्लभा

śrīmadbhāgavataṁ tatra garīyo bhuvi saṁgatam śrīmadbhāgavatī vārtā surāṇāmapi durlabhā

—और उनमें पृथ्वी पर विद्यमान श्रीमद्भागवत को सबसे भारी पाया। श्रीमद्भागवत की कथा देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।

श्लोक 17 (padma.6.193.17)

इति संचित्य बहुशो मुनयः साधवोऽमलाः । मेनिरे भगवद्रूपं श्रीमद्भागवतं क्षितौ

iti saṁcitya bahuśo munayaḥ sādhavo'malāḥ menire bhagavadrūpaṁ śrīmadbhāgavataṁ kṣitau

यह बहुत बार विचार करके, निर्मल साधु मुनियों ने पृथ्वी पर श्रीमद्भागवत को स्वयं भगवान् का रूप माना।

श्लोक 18 (padma.6.193.18)

पठनाच्छ्रवणाद्यस्य नरो याति हरेः पदम् । वर्षेण श्रवणं तस्य बहुसौख्यप्रदायकम्

paṭhanācchravaṇādyasya naro yāti hareḥ padam varṣeṇa śravaṇaṁ tasya bahusaukhyapradāyakam

जिसे पढ़ने और सुनने से मनुष्य हरि के धाम को जाता है — उसे एक वर्ष तक सुनना अत्यधिक सुख प्रदान करने वाला है।

श्लोक 19 (padma.6.193.19)

मासेन भक्तिराभास्यं लभते द्विजसत्तम । सप्ताहेन श्रुतं चैतत्सर्वथा मुक्तिदायकम्

māsena bhaktirābhāsyaṁ labhate dvijasattama saptāhena śrutaṁ caitatsarvathā muktidāyakam

हे द्विजसत्तम! एक मास में भक्ति की झलक प्राप्त होती है; और सात दिनों तक सुनने पर यह सर्वथा मुक्ति देने वाला है।

श्लोक 20 (padma.6.193.20)

किं बहूक्तेन वै साधो श्रीमद्भागवताऽमृतम् । नित्यं सद्भिः प्रपातव्यं कृष्णलीलाप्रकाशकम्

kiṁ bahūktena vai sādho śrīmadbhāgavatā'mṛtam nityaṁ sadbhiḥ prapātavyaṁ kṛṣṇalīlāprakāśakam

हे साधो! अधिक कहने से क्या लाभ — श्रीमद्भागवत का यह अमृत, कृष्ण-लीला को प्रकट करने वाला, सज्जनों को सदा पीना चाहिए।

श्लोक 21 (padma.6.193.21)

सनकाद्यैः पुरा प्रोक्तं नारदाय दयापरैः । ब्रह्मणः श्रुतपूर्वाय सप्ताहश्रवणे विधिः

sanakādyaiḥ purā proktaṁ nāradāya dayāparaiḥ brahmaṇaḥ śrutapūrvāya saptāhaśravaṇe vidhiḥ

सप्ताह-श्रवण की यह विधि पहले दयालु सनकादि ऋषियों द्वारा नारद को, जिन्होंने इसे पहले ब्रह्मा से सुना था, बताई गई थी।

श्लोक 22 (padma.6.193.22)

शौनक उवाच-। पितुर्लब्ध्वा वरं ज्ञानं श्रीमद्भागवताभिधम् । नारदो लोकतत्वज्ञः सर्वदा ह्यटते महीम्

śaunaka uvāca- piturlabdhvā varaṁ jñānaṁ śrīmadbhāgavatābhidham nārado lokatatvajñaḥ sarvadā hyaṭate mahīm

शौनक ने कहा — अपने पिता से श्रीमद्भागवत नामक उत्तम ज्ञान प्राप्त करके, समस्त लोकों के तत्व को जानने वाले नारद सदा पृथ्वी पर विचरण करते हैं।

श्लोक 23 (padma.6.193.23)

कुत्र तैः संगमो जातो नारदस्य महात्मभिः । श्रुतो देवर्षिणा यत्र सप्ताहश्रवणे विधिः

kutra taiḥ saṁgamo jāto nāradasya mahātmabhiḥ śruto devarṣiṇā yatra saptāhaśravaṇe vidhiḥ

उन महात्माओं से नारद की भेंट कहाँ हुई, जहाँ उस देवर्षि ने सप्ताह-श्रवण की विधि सुनी थी?

श्लोक 24 (padma.6.193.24)

सूत उवाच-। अत्र ते वर्णयिष्यामि भक्तियुक्तं कथानकम् । यत्पुरा ब्रह्मरातेन मह्यं प्रोक्तं दयालुना

sūta uvāca- atra te varṇayiṣyāmi bhaktiyuktaṁ kathānakam yatpurā brahmarātena mahyaṁ proktaṁ dayālunā

सूत ने कहा — अब मैं तुम्हें भक्ति से युक्त वह कथा सुनाऊँगा, जो पहले दयालु ब्रह्मरात (शुकदेव) ने मुझे बताई थी।

श्लोक 25 (padma.6.193.25)

एकदा तु विशालायामुपविष्टमधोमुखम् । नारदं सनकाद्यास्ते ददृशुर्दीनमानसम्

ekadā tu viśālāyāmupaviṣṭamadhomukham nāradaṁ sanakādyāste dadṛśurdīnamānasam

एक बार विशाला नगरी में सनकादि ऋषियों ने नारद को नीचे मुख किए, दीन मन से बैठा देखा।

श्लोक 26 (padma.6.193.26)

तं दृष्ट्वा चिंतयानं तु देवर्षिर्भ्रातरं स्वकम् । पप्रच्छुर्विस्मयाविष्टा मुनयस्तत्वचिंतकाः

taṁ dṛṣṭvā ciṁtayānaṁ tu devarṣirbhrātaraṁ svakam papracchurvismayāviṣṭā munayastatvaciṁtakāḥ

अपने भाई देवर्षि को इस प्रकार चिंतामग्न देखकर, तत्व-चिंतक वे मुनि विस्मित होकर उनसे पूछने लगे—

श्लोक 27 (padma.6.193.27)

कुमारा ऊचुः-। किं त्वं चिंतयसे ब्रह्मन्नतिदीन इवातुरः । तवेत्थं मुक्तिसंगस्य नोचितं वद कारणम्

kumārā ūcuḥ- kiṁ tvaṁ ciṁtayase brahmannatidīna ivāturaḥ tavetthaṁ muktisaṁgasya nocitaṁ vada kāraṇam

कुमारों ने कहा — ‘हे ब्रह्मन्! तुम अत्यंत दीन और व्याकुल की भाँति क्या सोच रहे हो? मुक्ति के साथी तुम्हारे लिए यह उचित नहीं है, कारण बताओ।‘

श्लोक 28 (padma.6.193.28)

नारद उवाच-। अहं पृथ्व्यां समायातो ज्ञात्वा सर्वोत्तमोत्तमाम् । तीर्थैर्नानाविधैर्युक्तां पुण्यदैः पुण्यरूपिणीम्

nārada uvāca- ahaṁ pṛthvyāṁ samāyāto jñātvā sarvottamottamām tīrthairnānāvidhairyuktāṁ puṇyadaiḥ puṇyarūpiṇīm

नारद ने कहा — ‘मैं पृथ्वी को सर्वोत्तम जानकर, नाना प्रकार के पुण्यदायक तीर्थों से युक्त, स्वयं पुण्य-रूपिणी जानकर वहाँ आया—‘

श्लोक 29 (padma.6.193.29)

पुष्करे च प्रयागे च काश्यां गोदावरीतटे । हरिक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे श्रीरंगे सेतुबंधने

puṣkare ca prayāge ca kāśyāṁ godāvarītaṭe harikṣetre kurukṣetre śrīraṁge setubaṁdhane

‘—पुष्कर, प्रयाग, काशी, गोदावरी के तट पर, हरिक्षेत्र, कुरुक्षेत्र, श्रीरंग और सेतुबंध में—‘

श्लोक 30 (padma.6.193.30)

एतेष्वन्येषु तीर्थेषु भ्रममाण इतस्ततः । नापश्यं कुत्रचिच्छर्म मनः संतोषकारकम्

eteṣvanyeṣu tīrtheṣu bhramamāṇa itastataḥ nāpaśyaṁ kutraciccharma manaḥ saṁtoṣakārakam

‘—इन और अन्य तीर्थों में इधर-उधर घूमते हुए भी मैंने मन को संतोष देने वाली शांति कहीं नहीं पाई।‘

श्लोक 31 (padma.6.193.31)

कलिना धर्ममित्रेण धरेयं बाधिताऽधुना । सत्यं शौचं दया दानं नास्ति कुत्रापि भूतले

kalinā dharmamitreṇa dhareyaṁ bādhitā'dhunā satyaṁ śaucaṁ dayā dānaṁ nāsti kutrāpi bhūtale

‘धर्म के मित्र कहलाने वाले कलि से यह पृथ्वी अब बाधित है; सत्य, शौच, दया और दान पृथ्वी पर कहीं भी नहीं हैं।‘

श्लोक 32 (padma.6.193.32)

उदरंभरिणो लोका वराकाः कूटसाक्षिणः । मंदाः सुमंदमतयो महापाखंडसंश्रयाः

udaraṁbhariṇo lokā varākāḥ kūṭasākṣiṇaḥ maṁdāḥ sumaṁdamatayo mahāpākhaṁḍasaṁśrayāḥ

‘लोग केवल पेट भरने वाले, दयनीय, झूठी गवाही देने वाले, मंदबुद्धि, अत्यंत क्षुद्र विचारों वाले, बड़े पाखंड के आश्रित हैं।‘

श्लोक 33 (padma.6.193.33)

स्त्रीप्रधानगृहस्थाश्च वर्णिनो व्रतवर्जिताः । वानप्रस्थाः पुरावासा न्यासिनो भोगतत्परा

strīpradhānagṛhasthāśca varṇino vratavarjitāḥ vānaprasthāḥ purāvāsā nyāsino bhogatatparā

‘गृहस्थ स्त्री-प्रधान हो गए हैं, ब्रह्मचारी व्रतरहित हैं, वानप्रस्थी नगरों में बसे हैं, और संन्यासी भोग में तत्पर हैं।‘

श्लोक 34 (padma.6.193.34)

कन्याविक्रयिणो लोभात्कृषिकर्मपरायणाः । भ्रष्टाचारा दंभिनश्च स्वेच्छाचारनिदर्शिनः

kanyāvikrayiṇo lobhātkṛṣikarmaparāyaṇāḥ bhraṣṭācārā daṁbhinaśca svecchācāranidarśinaḥ

‘लोग लोभवश कन्याएँ बेचते हैं, कृषि-कर्म में लगे हैं, आचार से भ्रष्ट हैं, दंभी हैं और मनमानी आचरण का प्रदर्शन करते हैं।‘

श्लोक 35 (padma.6.193.35)

आश्रमा यवनै रुद्धास्तीर्थानि सरितो ह्रदाः । देवतायतनान्यत्र दुष्टैरुच्छेदितानि च

āśramā yavanai ruddhāstīrthāni sarito hradāḥ devatāyatanānyatra duṣṭairuccheditāni ca

‘आश्रम यवनों द्वारा अवरुद्ध हैं, तीर्थ, नदियाँ और सरोवर तथा देवालय दुष्टों द्वारा उजाड़ दिए गए हैं।‘

श्लोक 36 (padma.6.193.36)

योगी सिद्धोऽथवा ज्ञानी सत्क्रियोऽत्र न दृश्यते । कलिदावानलेनाद्य साधनं भस्मतां गतम्

yogī siddho'thavā jñānī satkriyo'tra na dṛśyate kalidāvānalenādya sādhanaṁ bhasmatāṁ gatam

‘यहाँ न कोई योगी, न सिद्ध, न ज्ञानी, न सत्कर्मी दिखाई देता है; आज कलि की दावाग्नि से सारा साधन भस्म हो गया है।‘

श्लोक 37 (padma.6.193.37)

अट्टशूला जनपदाः शिवशूला द्विजातयः । कामिन्यः केशशूलिन्यो दृश्यंते भुवि सर्वतः

aṭṭaśūlā janapadāḥ śivaśūlā dvijātayaḥ kāminyaḥ keśaśūlinyo dṛśyaṁte bhuvi sarvataḥ

‘देश हाट-बाजारों से शूल-सम पीड़ित हैं, ब्राह्मण झूठी धार्मिकता से पीड़ित हैं, और कामुक स्त्रियाँ पृथ्वी पर सर्वत्र दिखाई देती हैं।‘

श्लोक 38 (padma.6.193.38)

एकदाहमनुप्राप्तो यमुनायास्तटं शुभम् । दृष्टं वृंदावनं तत्र यत्र लीला हरेरभूत्

ekadāhamanuprāpto yamunāyāstaṭaṁ śubham dṛṣṭaṁ vṛṁdāvanaṁ tatra yatra līlā harerabhūt

‘एक बार मैं यमुना के शुभ तट पर पहुँचा। वहाँ मैंने वृंदावन देखा, जहाँ हरि की लीला हुई थी।‘

श्लोक 39 (padma.6.193.39)

तत्र यच्चाद्भुतं दृष्टं श्रूयतां तन्मुनीश्वराः । एका तु तरुणी तत्र निषण्णाखिन्नमानसा

tatra yaccādbhutaṁ dṛṣṭaṁ śrūyatāṁ tanmunīśvarāḥ ekā tu taruṇī tatra niṣaṇṇākhinnamānasā

‘हे मुनीश्वरो! वहाँ जो अद्भुत दृश्य मैंने देखा, वह सुनिए। वहाँ एक तरुणी बैठी थी, जिसका मन थका हुआ था—‘

श्लोक 40 (padma.6.193.40)

द्वौ वृद्धौ पतितौ पार्श्वे निःश्वसंतावचेतनौ । शुश्रूषंती प्रबोधंती रुदती च तयोः पुरः

dvau vṛddhau patitau pārśve niḥśvasaṁtāvacetanau śuśrūṣaṁtī prabodhaṁtī rudatī ca tayoḥ puraḥ

‘—उसके पास दो वृद्ध पुरुष निःश्वास लेते, बेसुध पड़े थे। वह उनकी सेवा करती, उन्हें जगाने का प्रयत्न करती और उनके सामने रोती थी—‘

श्लोक 41 (padma.6.193.41)

दृष्टा दिशो निरीक्षंती रक्षितारमिवात्मनः । वीज्यमाना बहुस्त्रीभिर्बोध्यमाना मुहुर्महुः

dṛṣṭā diśo nirīkṣaṁtī rakṣitāramivātmanaḥ vījyamānā bahustrībhirbodhyamānā muhurmahuḥ

‘—अपने रक्षक की तरह चारों दिशाओं में देखती हुई वह दिखाई दी, अनेक स्त्रियों द्वारा हवा की जाती और बार-बार जगाई जाती हुई।‘

श्लोक 42 (padma.6.193.42)

दृष्ट्वा दूराद्गतश्चाऽहं कौतुकेन तदंतिकम् । मां दृष्ट्वोत्थाय सा बाला वचनं चेदमब्रवीत्

dṛṣṭvā dūrādgataścā'haṁ kautukena tadaṁtikam māṁ dṛṣṭvotthāya sā bālā vacanaṁ cedamabravīt

‘उसे देखकर, कौतुकवश मैं दूर से ही उसके पास गया। मुझे देखकर वह बाला उठकर यह वचन बोली —‘

श्लोक 43 (padma.6.193.43)

बालोवाच-। भो साधोऽत्र क्षणं तिष्ठ मम चिंतामपाकुरु । पुंसां च दर्शनं भद्र सर्वाघौघनिवारणम् । पुण्येन प्राक्तनेनैव दर्शनं तव जायते

bālovāca- bho sādho'tra kṣaṇaṁ tiṣṭha mama ciṁtāmapākuru puṁsāṁ ca darśanaṁ bhadra sarvāghaughanivāraṇam puṇyena prāktanenaiva darśanaṁ tava jāyate

बाला ने कहा — ‘हे साधो! यहाँ क्षण भर ठहरिए, मेरी चिंता दूर कीजिए। हे भद्र! साधुओं का दर्शन समस्त पापों के समूह को दूर करने वाला है। पूर्व-पुण्य से ही आपका दर्शन मुझे प्राप्त हुआ है।‘

श्लोक 44 (padma.6.193.44)

अतो मे मानसं दुःखं च्छेत्तुमर्हसि मानद । नारद उवाच । एवमुक्तस्तया चाहं कृपया स्निग्धमानसः । अपृच्छंतां वरारोहां कौतुकेन समाकुलः

ato me mānasaṁ duḥkhaṁ cchettumarhasi mānada nārada uvāca evamuktastayā cāhaṁ kṛpayā snigdhamānasaḥ apṛcchaṁtāṁ varārohāṁ kautukena samākulaḥ

‘इसलिए हे मानद! आप मेरे मन के दुःख को दूर करें।‘ नारद ने कहा — इस प्रकार उसके कहने पर, कृपा से द्रवित मन होकर मैं, कौतुक से व्याकुल होकर उस सुंदरी से पूछने लगा —

श्लोक 45 (padma.6.193.45)

का त्वमेतौ च कौ भद्रे काश्चेमाः पद्मलोचनाः । आख्याहि मत्पुरः सर्वं तव दुःखस्य कारणम्

kā tvametau ca kau bhadre kāścemāḥ padmalocanāḥ ākhyāhi matpuraḥ sarvaṁ tava duḥkhasya kāraṇam

‘हे भद्रे! तुम कौन हो, ये दोनों कौन हैं, और ये कमल-नेत्री स्त्रियाँ कौन हैं? मुझे अपने समस्त दुःख का कारण बताओ।‘

श्लोक 46 (padma.6.193.46)

इति पृष्टा मया सा तु बाला दुःखितमानसा । प्रोवाच निखिलं दुःखमात्मनो दुःखकारणम्

iti pṛṣṭā mayā sā tu bālā duḥkhitamānasā provāca nikhilaṁ duḥkhamātmano duḥkhakāraṇam

इस प्रकार मेरे द्वारा पूछे जाने पर दुःखी मन वाली उस बाला ने अपने संपूर्ण दुःख और उसके कारण को कह सुनाया।

श्लोक 47 (padma.6.193.47)

बालोवाच-। अहं भक्तिरिति ख्याता एतौ मे तनयौ वरौ । ज्ञानवैराग्यनामानौ कालयोगेन जर्जरौ

bālovāca- ahaṁ bhaktiriti khyātā etau me tanayau varau jñānavairāgyanāmānau kālayogena jarjarau

बाला ने कहा — ‘मैं भक्ति नाम से विख्यात हूँ; ये दोनों मेरे श्रेष्ठ पुत्र हैं, ज्ञान और वैराग्य नामक, जो काल के प्रभाव से जर्जर हो गए हैं।‘

श्लोक 48 (padma.6.193.48)

गंगाद्याः सरितश्चेमा मम सेवार्थमागताः । एताभिः सेविता नित्यं सत्कारेणापि नारद

gaṁgādyāḥ saritaścemā mama sevārthamāgatāḥ etābhiḥ sevitā nityaṁ satkāreṇāpi nārada

‘गंगा आदि ये नदियाँ मेरी सेवा के लिए आई हैं; हे नारद! इनके द्वारा सदा सत्कारपूर्वक सेवित होते हुए भी—‘

श्लोक 49 (padma.6.193.49)

न च श्रेयो लभे किंचित्क्षीणाऽहं सर्वतो मुने । ममपूर्वं तु वृत्तातं शृणु ब्राह्मणसत्तम

na ca śreyo labhe kiṁcitkṣīṇā'haṁ sarvato mune mamapūrvaṁ tu vṛttātaṁ śṛṇu brāhmaṇasattama

‘—मुझे कुछ भी कल्याण प्राप्त नहीं होता, हे मुने! मैं सब प्रकार से क्षीण हो गई हूँ। हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! मेरा पूर्व-वृत्तांत सुनो—‘

श्लोक 50 (padma.6.193.50)

येनाऽहं दुःखिता जाता न लभे शर्म कुत्रचित् । उत्पन्ना द्रविडे चाहं कर्णाटे वृद्धिमागता

yenā'haṁ duḥkhitā jātā na labhe śarma kutracit utpannā draviḍe cāhaṁ karṇāṭe vṛddhimāgatā

‘—जिससे मैं दुःखी हो गई और कहीं भी शांति नहीं पाती। मैं द्रविड़ में उत्पन्न हुई, कर्नाटक में वृद्धि को प्राप्त हुई—‘

श्लोक 51 (padma.6.193.51)

स्थिता किंचिन्महाराष्ट्रे गुर्जरे जीर्णतां गता । तत्र घोरकलेर्योगात्पाखंडैः खंडितांगका

sthitā kiṁcinmahārāṣṭre gurjare jīrṇatāṁ gatā tatra ghorakaleryogātpākhaṁḍaiḥ khaṁḍitāṁgakā

‘—महाराष्ट्र में कुछ समय रही, और गुर्जर में जीर्ण हो गई। वहाँ घोर कलि के प्रभाव से पाखंडियों द्वारा मेरे अंग खंडित हो गए—‘

श्लोक 52 (padma.6.193.52)

दुर्बलाहं चिरं जाता पुत्राभ्यां सह मंदताम्

durbalāhaṁ ciraṁ jātā putrābhyāṁ saha maṁdatām

‘—मैं दोनों पुत्रों सहित दीर्घकाल तक दुर्बल और शिथिल होती गई।‘

श्लोक 53 (padma.6.193.53)

वृंदावनमिदं प्राप्ता दैवयोगेन नारद । जाता हं तु पुनर्बाला नवीनेव सुरूपिणी

vṛṁdāvanamidaṁ prāptā daivayogena nārada jātā haṁ tu punarbālā navīneva surūpiṇī

‘हे नारद! दैवयोग से मुझे यह वृंदावन प्राप्त हुआ, और मैं फिर से नई, सुंदर बाला के रूप में उत्पन्न हो गई—‘

श्लोक 54 (padma.6.193.54)

इमौ तु शयितावत्र सुतौ मे क्लिष्टमानसौ । अतिवृद्धौ परित्यज्य गंतुं नाहं क्षमाधुना

imau tu śayitāvatra sutau me kliṣṭamānasau ativṛddhau parityajya gaṁtuṁ nāhaṁ kṣamādhunā

‘—किंतु मेरे ये दोनों पुत्र, जिनका मन क्लिष्ट है, अत्यंत वृद्ध होकर यहीं पड़े हैं; अभी मैं इन्हें त्यागकर जाने में असमर्थ हूँ।‘

श्लोक 55 (padma.6.193.55)

अहं बाला कथं जाता सुतौ मे जरठौ कुतः । त्रयाणामेकभावानां वैपरीत्यं कुतोऽभवत्

ahaṁ bālā kathaṁ jātā sutau me jaraṭhau kutaḥ trayāṇāmekabhāvānāṁ vaiparītyaṁ kuto'bhavat

‘मैं बाला कैसे हो गई, और मेरे पुत्र वृद्ध क्यों हैं? एक ही स्वभाव के हम तीनों में यह विपरीतता कैसे हुई?‘

श्लोक 56 (padma.6.193.56)

घटते जरठा माता बालकौ तनयाविति । अतः शोचामि चात्मानं विस्मयाविष्टमानसा

ghaṭate jaraṭhā mātā bālakau tanayāviti ataḥ śocāmi cātmānaṁ vismayāviṣṭamānasā

‘वृद्धा माता और बालक पुत्र — यह तो शोभा देता है, किंतु यहाँ उलटा है; इसलिए मैं विस्मित मन से अपने ही विषय में शोक करती हूँ।‘

श्लोक 57 (padma.6.193.57)

यदि त्वं वेत्सि धर्मज्ञ कृपालो दीनपालक । वद सर्वं यथातत्वं कारणं चात्र यद्भवेत्

yadi tvaṁ vetsi dharmajña kṛpālo dīnapālaka vada sarvaṁ yathātatvaṁ kāraṇaṁ cātra yadbhavet

‘हे धर्मज्ञ, कृपालु, दीनपालक! यदि तुम जानते हो, तो इसका जो भी यथार्थ कारण हो, वह मुझे सब बताओ।‘

श्लोक 58 (padma.6.193.58)

एवं पृष्टस्तया चाहं क्षणं चैव विमृश्य तु । अवोचं भक्तिमाभाष्य क्लिष्टां कालेन भूयसा

evaṁ pṛṣṭastayā cāhaṁ kṣaṇaṁ caiva vimṛśya tu avocaṁ bhaktimābhāṣya kliṣṭāṁ kālena bhūyasā

इस प्रकार उसके द्वारा पूछे जाने पर, क्षण भर विचार करके मैंने काल के दीर्घ प्रभाव से क्लिष्ट भक्ति को संबोधित करके कहा —

श्लोक 59 (padma.6.193.59)

ज्ञानेनाहं प्रपश्यामि वृत्तं सर्वं तवानघे । मा विषादं कुरु प्राज्ञे हरिः शं ते करिष्यति

jñānenāhaṁ prapaśyāmi vṛttaṁ sarvaṁ tavānaghe mā viṣādaṁ kuru prājñe hariḥ śaṁ te kariṣyati

‘हे निष्पाप! मैं ज्ञान से तुम्हारा संपूर्ण वृत्तांत देख रहा हूँ। हे प्राज्ञे! विषाद मत करो, हरि तुम्हारा कल्याण करेंगे।‘

श्लोक 60 (padma.6.193.60)

सर्वसत्वहरो बाले युगोऽयं दारुणः कलि । लुप्तोऽनेन सदाऽचारो योगमार्गस्तपांसि च

sarvasatvaharo bāle yugo'yaṁ dāruṇaḥ kali lupto'nena sadā'cāro yogamārgastapāṁsi ca

‘हे बाले! यह भयंकर कलियुग समस्त सत्व को हर लेने वाला है। इसके द्वारा सदाचार, योग-मार्ग और तप — सब लुप्त हो गए हैं।‘

श्लोक 61 (padma.6.193.61)

जनाश्चाघा (द्या) सुरायंते शाठ्यदुष्कृतकारिणः । संतो ह्यस्मिन्सुदुःखार्ता असंतो हृष्टमानसाः

janāścāghā (dyā) surāyaṁte śāṭhyaduṣkṛtakāriṇaḥ saṁto hyasminsuduḥkhārtā asaṁto hṛṣṭamānasāḥ

‘लोग पापों में अग्रणी, कपटी और दुष्कर्मी बन गए हैं; इस युग में सज्जन अत्यंत दुःखी रहते हैं, और दुर्जन प्रसन्नचित्त रहते हैं।‘

श्लोक 62 (padma.6.193.62)

दृश्यते धीरचित्तस्तु पंडितोऽपि न कोऽपि च । अस्पृश्य नवलोक्येयं दुष्टभाराकुलाधरा

dṛśyate dhīracittastu paṁḍito'pi na ko'pi ca aspṛśya navalokyeyaṁ duṣṭabhārākulādharā

‘न कोई धीर-चित्त, न कोई विद्वान दिखाई देता है; यह पृथ्वी दुष्टों के भार से आकुल होकर मानो अस्पृश्य हो गई है।‘

श्लोक 63 (padma.6.193.63)

अन्वब्दं क्रमतो जातो मंगलं हीयतेऽन्वहम् । न त्वां तव सुतौ चेमौ कोऽपि पश्यति भामिनि

anvabdaṁ kramato jāto maṁgalaṁ hīyate'nvaham na tvāṁ tava sutau cemau ko'pi paśyati bhāmini

‘वर्ष-दर-वर्ष बीतते हुए मंगल प्रतिदिन क्षीण होता जाता है। हे भामिनी! तुम्हें और तुम्हारे इन दोनों पुत्रों को कोई नहीं देखता।‘

श्लोक 64 (padma.6.193.64)

यूयं तु रागबहुलैस्त्यक्ता जर्जरतां गताः । वृंदावनस्य संयोगाद्बालात्वमभवः पुनः

yūyaṁ tu rāgabahulaistyaktā jarjaratāṁ gatāḥ vṛṁdāvanasya saṁyogādbālātvamabhavaḥ punaḥ

‘आसक्ति से भरे लोगों द्वारा त्यागी गई तुम जर्जर हो गई थीं; वृंदावन के संयोग से तुम फिर से बाला बन गई हो।‘

श्लोक 65 (padma.6.193.65)

धन्यं वृंदावनं चेदं भक्तिर्यत्राभवन्नवा । अत्रेमौ ग्राहकाभावान्नवीनत्वं न चागतौ

dhanyaṁ vṛṁdāvanaṁ cedaṁ bhaktiryatrābhavannavā atremau grāhakābhāvānnavīnatvaṁ na cāgatau

‘धन्य है यह वृंदावन, जहाँ भक्ति नई हो गई; किंतु ग्रहण करने वालों के अभाव में ये दोनों पुत्र यहाँ भी नवीनता को प्राप्त नहीं हुए।‘

श्लोक 66 (padma.6.193.66)

किंचिदात्मसुखेनेह प्रसुप्ताविति लक्ष्यते । भक्तिरुवाच-। कथं परिक्षिता राज्ञा स्थापितोद्य शुचिः कलि । दयापरेण हरिणा ह्यधर्मः किमुपेक्षितः

kiṁcidātmasukheneha prasuptāviti lakṣyate bhaktiruvāca- kathaṁ parikṣitā rājñā sthāpitodya śuciḥ kali dayāpareṇa hariṇā hyadharmaḥ kimupekṣitaḥ

‘ऐसा प्रतीत होता है कि वे यहाँ अपने ही किसी सुख में लीन होकर सोए पड़े हैं।‘ भक्ति ने कहा — ‘राजा परीक्षित द्वारा यह पवित्र कलि आज कैसे स्थापित किया गया? दयालु हरि ने अधर्म की उपेक्षा क्यों की?‘

श्लोक 67 (padma.6.193.67)

एनं मे संशयं छिंधि त्वद्वाचा सुखितास्म्यहम् । तस्या वचः समाकर्ण्य भूयोऽहमवदं द्विजाः

enaṁ me saṁśayaṁ chiṁdhi tvadvācā sukhitāsmyaham tasyā vacaḥ samākarṇya bhūyo'hamavadaṁ dvijāḥ

‘मेरा यह संशय दूर कीजिए, आपके वचन से मुझे सुख मिलेगा।‘ उसके वचन सुनकर, हे द्विजो! मैंने फिर कहा —

श्लोक 68 (padma.6.193.68)

यदि पृष्टस्त्वया बाले प्रेमतः श्रवणं कुरु । यदा मुकुंदो भगवान्क्ष्मां त्यक्त्वा स्वपदं गतः

yadi pṛṣṭastvayā bāle premataḥ śravaṇaṁ kuru yadā mukuṁdo bhagavānkṣmāṁ tyaktvā svapadaṁ gataḥ

‘हे बाले! यदि तुमने पूछा है तो प्रेमपूर्वक सुनो — जब भगवान् मुकुंद पृथ्वी त्यागकर अपने धाम को गए—‘

श्लोक 69 (padma.6.193.69)

कलिस्तद्दिनमारभ्य प्रवृत्तः सत्यबाधकः । दृष्टो दिग्विजये राज्ञा दीनवच्छरणं गतः

kalistaddinamārabhya pravṛttaḥ satyabādhakaḥ dṛṣṭo digvijaye rājñā dīnavaccharaṇaṁ gataḥ

‘—उसी दिन से कलि, जो सत्य का बाधक है, प्रवृत्त हुआ। दिग्विजय में राजा (परीक्षित) द्वारा वह दीन की भाँति शरण में आया देखा गया।‘

श्लोक 70 (padma.6.193.70)

न हतोऽस्य गुणद्रष्टा सर्वसाधारणं त्विदम् । यत्फलं तपसा नैति न योगे न समाधिना

na hato'sya guṇadraṣṭā sarvasādhāraṇaṁ tvidam yatphalaṁ tapasā naiti na yoge na samādhinā

‘राजा ने उसे इस कारण नहीं मारा कि उन्होंने उसमें एक गुण देखा — जो फल तप से नहीं मिलता, न योग से, न समाधि से—‘

श्लोक 71 (padma.6.193.71)

तत्फलं लभते धीमान्कलौ केशवकीर्तनात् । एतादृशं कलिं दृष्ट्वा सारात्सारफलप्रदम्

tatphalaṁ labhate dhīmānkalau keśavakīrtanāt etādṛśaṁ kaliṁ dṛṣṭvā sārātsāraphalapradam

‘—वह फल बुद्धिमान पुरुष कलियुग में केवल केशव के कीर्तन से प्राप्त कर लेता है। ऐसे कलि को देखकर, जो सार से भी सार-फल देने वाला है—‘

श्लोक 72 (padma.6.193.72)

विष्णुरातः स्थापितवान्कलिजानां हिताय च । कुकर्माचरणात्सारः सर्वतो निर्गतोऽधुना

viṣṇurātaḥ sthāpitavānkalijānāṁ hitāya ca kukarmācaraṇātsāraḥ sarvato nirgato'dhunā

‘—विष्णुरात (परीक्षित) ने कलियुग में जन्मे लोगों के हित के लिए उसे स्थापित किया। अब दुष्कर्मों के आचरण से सार सब जगह से निकल चुका है—‘

श्लोक 73 (padma.6.193.73)

पदार्थाः संस्थिता भूमौ बीजहीनास्तुषा यथा । विप्रैर्भागवतीवार्त्ता गेहे गेहे जने जने

padārthāḥ saṁsthitā bhūmau bījahīnāstuṣā yathā viprairbhāgavatīvārttā gehe gehe jane jane

‘—और पदार्थ पृथ्वी पर बिना बीज की भूसी के समान रह गए हैं। भागवत की कथा घर-घर, जन-जन में—‘

श्लोक 74 (padma.6.193.74)

कारिता धनलोभेन कथासारस्ततो गतः । अत्युग्रभूरिकर्माणो नास्तिका दांभिका जनाः

kāritā dhanalobhena kathāsārastato gataḥ atyugrabhūrikarmāṇo nāstikā dāṁbhikā janāḥ

‘—ब्राह्मणों द्वारा धन के लोभ से कराई जाती है, इससे कथा का सार निकल गया है। अत्यंत उग्र कर्म करने वाले, नास्तिक और दंभी लोग—‘

श्लोक 75 (padma.6.193.75)

तिष्ठंति सर्वतीर्थेषु तीर्थसारस्ततो गतः । कामक्रोधमहालोभतृष्णाव्याकुलचेतसः

tiṣṭhaṁti sarvatīrtheṣu tīrthasārastato gataḥ kāmakrodhamahālobhatṛṣṇāvyākulacetasaḥ

‘—सभी तीर्थों में बसे हैं, इससे तीर्थों का सार निकल गया है। काम, क्रोध, महालोभ और तृष्णा से व्याकुल चित्त वाले लोग—‘

श्लोक 76 (padma.6.193.76)

समारभंते कर्माणि कर्मसारस्ततो गतः । मनसश्चाजयाल्लोभाद्दंभात्पाखंडसंश्रयात्

samārabhaṁte karmāṇi karmasārastato gataḥ manasaścājayāllobhāddaṁbhātpākhaṁḍasaṁśrayāt

‘—कर्मकांड आरंभ करते हैं, इससे कर्म का सार निकल गया है। मन को न जीत पाने से, लोभ से, दंभ से, पाखंड के आश्रय से—‘

श्लोक 77 (padma.6.193.77)

शास्त्रानभ्यसनाच्चैव ध्यानयोगफलं गतम् । पंडितास्ते कलत्रेषु रमंते महिषा इव

śāstrānabhyasanāccaiva dhyānayogaphalaṁ gatam paṁḍitāste kalatreṣu ramaṁte mahiṣā iva

‘—और शास्त्रों के अनभ्यास से ध्यान-योग का फल जाता रहा। वे तथाकथित विद्वान अपनी पत्नियों में भैंसों के समान रमण करते हैं—‘

श्लोक 78 (padma.6.193.78)

पुत्रोत्पादनदक्षाश्च न दक्षा मुक्तिसाधने । न हि वैष्णवता कुत्र संप्रदायपुरःसराः

putrotpādanadakṣāśca na dakṣā muktisādhane na hi vaiṣṇavatā kutra saṁpradāyapuraḥsarāḥ

‘—पुत्रोत्पत्ति में तो दक्ष हैं, किंतु मुक्ति के साधन में दक्ष नहीं हैं। सच्ची वैष्णवता कहीं नहीं है, लोग केवल संप्रदाय की औपचारिकता निभाते हैं—‘

श्लोक 79 (padma.6.193.79)

देवनिंदापराः सर्वे साधुनिंदापरायणाः । अयं तु युगधर्मोऽस्ति दीयते कस्य दूषणम्

devaniṁdāparāḥ sarve sādhuniṁdāparāyaṇāḥ ayaṁ tu yugadharmo'sti dīyate kasya dūṣaṇam

‘—सभी देवताओं की निंदा में लगे हैं, साधुओं की निंदा में तत्पर हैं। किंतु यह तो युग का ही स्वभाव है — इसमें किसे दोष दिया जाए?‘

श्लोक 80 (padma.6.193.80)

अतस्त्वं पुंडरीकाक्षं स्मृत्वा सौख्यमवाप्स्यसि

atastvaṁ puṁḍarīkākṣaṁ smṛtvā saukhyamavāpsyasi

‘इसलिए तुम पुंडरीकाक्ष का स्मरण करके सुख प्राप्त करोगी।‘

श्लोक 81 (padma.6.193.81)

एवं मयोक्तं वचनं श्रुत्वा सा विस्मयं गता । उवाच वचनं भूयो मां प्रशस्य द्विजोत्तमाः

evaṁ mayoktaṁ vacanaṁ śrutvā sā vismayaṁ gatā uvāca vacanaṁ bhūyo māṁ praśasya dvijottamāḥ

इस प्रकार मेरे कहे वचन सुनकर वह विस्मित हुई, और हे द्विजोत्तमो! मुझे प्रशंसा करते हुए फिर से कहने लगी —

श्लोक 82 (padma.6.193.82)

भक्तिरुवाच-। देवर्षे त्वं तु धन्योऽसि मद्भाग्येन समागतः । साधूनां दर्शनं लोके सर्वसिद्धिप्रदायकम्

bhaktiruvāca- devarṣe tvaṁ tu dhanyo'si madbhāgyena samāgataḥ sādhūnāṁ darśanaṁ loke sarvasiddhipradāyakam

भक्ति ने कहा — ‘हे देवर्षे! तुम धन्य हो, जो मेरे भाग्य से यहाँ आए हो; संसार में साधुओं का दर्शन सभी सिद्धियाँ देने वाला है।‘

श्लोक 83 (padma.6.193.83)

सुखोपायो यथा मे स्यात्तथादिश मुनेऽधुना । सर्वज्ञस्य तव ब्रह्मन्न साध्यं किमपीह वै

sukhopāyo yathā me syāttathādiśa mune'dhunā sarvajñasya tava brahmanna sādhyaṁ kimapīha vai

‘हे मुने! अब मुझे जिससे सुख का उपाय हो, वह बताओ; हे ब्रह्मन्! सर्वज्ञ तुम्हारे लिए यहाँ कुछ भी असाध्य नहीं है।‘

श्लोक 84 (padma.6.193.84)

अजयदजितमायां यस्य कायाधवस्ते वचनरचनमेकं केवलं चाकलय्य । ध्रुवपदमुपयातो यत्कृपातो ध्रुवो वै तमहमरणभूतं ब्रह्मपुत्रं नतास्मि

ajayadajitamāyāṁ yasya kāyādhavaste vacanaracanamekaṁ kevalaṁ cākalayya dhruvapadamupayāto yatkṛpāto dhruvo vai tamahamaraṇabhūtaṁ brahmaputraṁ natāsmi

जिनके एक ही वचन को हृदयंगम करके कायाधु के स्वामी ने अजेय माया को जीत लिया, और जिनकी कृपा से ध्रुव अटल पद को प्राप्त हुए — उन शरणस्वरूप ब्रह्मपुत्र नारद को मैं प्रणाम करता हूँ।

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