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उत्तर खण्ड · अध्याय 195

श्रीमद्भागवत-माहात्म्य: भक्ति का पुनरुद्धार

अध्याय 194अध्याय-सूचीअध्याय 196

श्लोक 1 (padma.6.195.1)

सूत उवाच- अथ देवऋषिस्तत्र कुमाराननुमान्य च । उवाच प्रणतो वाक्यं ज्ञानयज्ञ कृतादरः

sūta uvāca- atha devaṛṣistatra kumārānanumānya ca uvāca praṇato vākyaṁ jñānayajña kṛtādaraḥ

सूत ने कहा — तब उस देवर्षि ने वहाँ कुमारों से अनुमति लेकर, प्रणाम करके, ज्ञान-यज्ञ के प्रति आदर से युक्त होकर यह वचन कहा।

श्लोक 2 (padma.6.195.2)

नारद उवाच- ज्ञानयज्ञं करिष्यामि शुकशास्त्र कथोज्वलम् । भक्ति ज्ञान विरागाणां स्थापनार्थे प्रयत्नतः

nārada uvāca- jñānayajñaṁ kariṣyāmi śukaśāstra kathojvalam bhakti jñāna virāgāṇāṁ sthāpanārthe prayatnataḥ

नारद ने कहा — मैं शुक-शास्त्र की उज्ज्वल कथा से युक्त ज्ञान-यज्ञ, भक्ति, ज्ञान और वैराग्य की स्थापना के लिए, प्रयत्नपूर्वक करूँगा।

श्लोक 3 (padma.6.195.3)

यत्र कार्यो मया यज्ञः स्थानं तत्कथ्यतां द्विजाः । चत्वारो यज्ञवाहाश्च यूयमेव वृता मया

yatra kāryo mayā yajñaḥ sthānaṁ tatkathyatāṁ dvijāḥ catvāro yajñavāhāśca yūyameva vṛtā mayā

हे द्विजो! जहाँ मुझे यह यज्ञ करना है, वह स्थान बताइए। चारों यज्ञ-वाहक के रूप में मैंने आप ही को चुना है।

श्लोक 4 (padma.6.195.4)

कियद्भिर्दिवसैः श्राव्या श्रीमद्भागवती कथा । को विधिस्तत्र कर्तव्यो ज्ञानयज्ञविशारदाः

kiyadbhirdivasaiḥ śrāvyā śrīmadbhāgavatī kathā ko vidhistatra kartavyo jñānayajñaviśāradāḥ

कितने दिनों में श्रीमद्भागवत की कथा सुनाई जाए? हे ज्ञान-यज्ञ में निपुणो! वहाँ क्या विधि करनी चाहिए?

श्लोक 5 (padma.6.195.5)

कुमारा ऊचुः। शृणु नारद वक्ष्यामस्तुभ्यं यत्र कथा नृणाम् । शृण्वतां पापराशिघ्नो भवेत्पुण्यविबर्द्विनी

kumārā ūcuḥ śṛṇu nārada vakṣyāmastubhyaṁ yatra kathā nṛṇām śṛṇvatāṁ pāparāśighno bhavetpuṇyavibardvinī

कुमारों ने कहा — हे नारद! सुनो, हम तुम्हें बताते हैं वह स्थान, जहाँ यह कथा मनुष्यों के लिए, सुनने मात्र से पाप-राशि का नाश करने वाली और पुण्य को बढ़ाने वाली होगी।

श्लोक 6 (padma.6.195.6)

गंगाद्वार समीपे तु कामदाख्यं पुरं महत्

gaṁgādvāra samīpe tu kāmadākhyaṁ puraṁ mahat

गंगाद्वार के समीप कामदा नामक एक विशाल नगर है—

श्लोक 7 (padma.6.195.7)

स्वर्णद्याश्चोत्तरे पुण्ये तटमानंदनामकम् । नानाऋषिगणैर्जुष्टं देवसिद्धनिषेवितम्

svarṇadyāścottare puṇye taṭamānaṁdanāmakam nānāṛṣigaṇairjuṣṭaṁ devasiddhaniṣevitam

—स्वर्णनदी (गंगा) के उत्तर में आनंद नामक एक पवित्र तट है, जो अनेक ऋषि-समूहों से युक्त और देव-सिद्धों द्वारा सेवित है।

श्लोक 8 (padma.6.195.8)

नाना तरुलताकीर्णं स्वच्छकोमल वालुकम् । रम्यमेकांतदेशस्थं स्वर्णपंकज शोभितम्

nānā tarulatākīrṇaṁ svacchakomala vālukam ramyamekāṁtadeśasthaṁ svarṇapaṁkaja śobhitam

वह नाना वृक्ष-लताओं से भरा, स्वच्छ कोमल बालू वाला, रमणीय और एकांत स्थान में स्थित, स्वर्ण-कमलों से सुशोभित है।

श्लोक 9 (padma.6.195.9)

यत्समीपस्थजीवानां क्षेत्रस्यैव प्रभावतः । मिथः संस्निग्धचित्तानां वैरं चेतसि न स्थितम्

yatsamīpasthajīvānāṁ kṣetrasyaiva prabhāvataḥ mithaḥ saṁsnigdhacittānāṁ vairaṁ cetasi na sthitam

उस क्षेत्र के प्रभाव से ही वहाँ रहने वाले प्राणियों का चित्त परस्पर स्नेहमय हो जाता है, और उनके मन में वैर नहीं टिकता।

श्लोक 10 (padma.6.195.10)

ज्ञानयज्ञस्त्वया तत्र कर्त्तव्यो हि प्रयत्नतः । अपूर्व रसदात्री च कथा तत्र भविष्यति

jñānayajñastvayā tatra karttavyo hi prayatnataḥ apūrva rasadātrī ca kathā tatra bhaviṣyati

वहीं तुम्हें प्रयत्नपूर्वक ज्ञान-यज्ञ करना चाहिए; वहाँ वह कथा अपूर्व रस देने वाली होगी।

श्लोक 11 (padma.6.195.11)

वृंदावनप्रतोलिस्थं जराजीर्ण कलेवरम् । सुतद्वयं पुरस्कृत्य भक्तिस्तत्रागमिष्यति

vṛṁdāvanapratolisthaṁ jarājīrṇa kalevaram sutadvayaṁ puraskṛtya bhaktistatrāgamiṣyati

वृंदावन की गली में जीर्ण-शीर्ण शरीर वाले दोनों पुत्रों को आगे करके भक्ति वहाँ आएगी।

श्लोक 12 (padma.6.195.12)

यत्र भागवती वार्ता भक्तिस्तत्र सहात्मजा । कृष्णकीर्तिसुधां पीत्वा तरुणी वा भविष्यति

yatra bhāgavatī vārtā bhaktistatra sahātmajā kṛṣṇakīrtisudhāṁ pītvā taruṇī vā bhaviṣyati

जहाँ भागवत की कथा होती है, वहाँ भक्ति अपने पुत्रों सहित आती है; कृष्ण-कीर्ति के अमृत का पान करके वह पुनः तरुणी हो जाएगी।

श्लोक 13 (padma.6.195.13)

सूत उवाच- एवमुक्त्वा कुमारास्ते नारदेन समंततः । गंगाद्वारे समाजग्मुर्ज्ञानयज्ञाय सत्वराः

sūta uvāca- evamuktvā kumārāste nāradena samaṁtataḥ gaṁgādvāre samājagmurjñānayajñāya satvarāḥ

सूत ने कहा — इस प्रकार नारद के साथ वे कुमार सब मिलकर, ज्ञान-यज्ञ के लिए शीघ्रतापूर्वक गंगाद्वार में एकत्रित हुए।

श्लोक 14 (padma.6.195.14)

यदा प्राप्तास्तटं ते तु गंगाया भार्गवर्षभ । तदा कोलाहलश्चासीद्भूर्लोकादिक सप्तसु

yadā prāptāstaṭaṁ te tu gaṁgāyā bhārgavarṣabha tadā kolāhalaścāsīdbhūrlokādika saptasu

हे भार्गवश्रेष्ठ! जब वे गंगा के तट पर पहुँचे, तब भूलोक से लेकर सातों लोकों तक कोलाहल मच गया।

श्लोक 15 (padma.6.195.15)

श्रीमद्भागवतास्वादलंपटा साप्तलौकिकाः । धावं धावं समाजग्मुः प्राचीना वैष्णवाश्च ये

śrīmadbhāgavatāsvādalaṁpaṭā sāptalaukikāḥ dhāvaṁ dhāvaṁ samājagmuḥ prācīnā vaiṣṇavāśca ye

श्रीमद्भागवत के रसास्वादन के लोभी सातों लोकों के प्राचीन वैष्णव दौड़ते-दौड़ते वहाँ एकत्रित हुए।

श्लोक 16 (padma.6.195.16)

भृगुर्वसिष्ठश्च्यवनश्च गौतमो मेधातिथिर्देबलदेवरातौ । रामस्तथागाधिज शाकलौ च मृकंडपुत्रात्रिज पिप्पलादाः

bhṛgurvasiṣṭhaścyavanaśca gautamo medhātithirdebaladevarātau rāmastathāgādhija śākalau ca mṛkaṁḍaputrātrija pippalādāḥ

भृगु, वसिष्ठ, च्यवन, गौतम, मेधातिथि, देबल, देवरात, राम, अगाधि, शाकल, मृकंडु-पुत्र, अत्रि-पुत्र और पिप्पलाद—

श्लोक 17 (padma.6.195.17)

योगेश्वरौ व्यासपराशरौ च शुकादयो भागवतप्रधानाः । शिष्यैरुपेता बहुशास्त्रविज्ञाः कृष्णामृतास्वाद कृतौ प्रधानाः

yogeśvarau vyāsaparāśarau ca śukādayo bhāgavatapradhānāḥ śiṣyairupetā bahuśāstravijñāḥ kṛṣṇāmṛtāsvāda kṛtau pradhānāḥ

—योगेश्वर व्यास और पराशर, तथा शुक आदि भागवत-प्रधान मुनि, अपने शिष्यों सहित, अनेक शास्त्रों के ज्ञाता, कृष्णामृत के आस्वादन में सबसे आगे रहने वाले—

श्लोक 18 (padma.6.195.18)

वेदांतानि च वेदाश्च मंत्रास्तंत्राणि संहिताः । दशसप्तपुराणानि षट्शास्त्राणि तथाययुः

vedāṁtāni ca vedāśca maṁtrāstaṁtrāṇi saṁhitāḥ daśasaptapurāṇāni ṣaṭśāstrāṇi tathāyayuḥ

—वेदांत, वेद, मंत्र, तंत्र, संहिताएँ, सत्रह पुराण और छह शास्त्र भी वहाँ पहुँचे।

श्लोक 19 (padma.6.195.19)

गंगाद्याः सरितस्तत्र पुष्करादि सरांसि च । क्षेत्राणि च दिशः सर्वा दंडकादि वनानि च

gaṁgādyāḥ saritastatra puṣkarādi sarāṁsi ca kṣetrāṇi ca diśaḥ sarvā daṁḍakādi vanāni ca

गंगा आदि नदियाँ, पुष्कर आदि सरोवर, समस्त क्षेत्र, सभी दिशाएँ, तथा दंडक आदि वन भी वहाँ आए।

श्लोक 20 (padma.6.195.20)

हिमादयो नगास्तत्र देवगंधर्वकिन्नराः । द्वीपाः समुद्रा दिक्पालाः पातालस्थास्तथाययुः

himādayo nagāstatra devagaṁdharvakinnarāḥ dvīpāḥ samudrā dikpālāḥ pātālasthāstathāyayuḥ

हिमालय आदि पर्वत, देवता, गंधर्व, किन्नर, द्वीप, समुद्र, दिक्पाल और पाताल-निवासी भी वहाँ पहुँचे।

श्लोक 21 (padma.6.195.21)

दीक्षायां नारदेनाथ दत्तमासनमुत्तमम् । कुमारा वंदिता सर्वे निषेदुः कृष्णतत्पराः

dīkṣāyāṁ nāradenātha dattamāsanamuttamam kumārā vaṁditā sarve niṣeduḥ kṛṣṇatatparāḥ

दीक्षा में नारद द्वारा उन्हें उत्तम आसन दिया गया; प्रणाम किए गए वे सभी कुमार कृष्ण-परायण होकर बैठ गए।

श्लोक 22 (padma.6.195.22)

वैष्णवाः सुविरक्ताश्च न्यासिनो ब्रह्मचारिणः । मुख्या ह्यग्रेस्थिता स्तेषां पुरतो नारदः स्थितः

vaiṣṇavāḥ suviraktāśca nyāsino brahmacāriṇaḥ mukhyā hyagresthitā steṣāṁ purato nāradaḥ sthitaḥ

अत्यंत विरक्त वैष्णव, संन्यासी और ब्रह्मचारी अग्रस्थान में बैठे; उनके सामने प्रधान रूप से नारद बैठे।

श्लोक 23 (padma.6.195.23)

वामभागेमुनिगणादक्षिणेचदिवौकसः । वेदोपनिषदोऽन्यत्रतीर्थानिचभृगूद्वह

vāmabhāgemunigaṇādakṣiṇecadivaukasaḥ vedopaniṣado'nyatratīrthānicabhṛgūdvaha

हे भृगुवंशी! बाईं ओर मुनि-समूह और दाईं ओर देवता बैठे; वेद, उपनिषद और तीर्थ अन्यत्र स्थान पर बैठे।

श्लोक 24 (padma.6.195.24)

जयशब्दोनमः शब्दःशंखशब्दस्तथैवच । बभूवाकाशसंस्पर्शीघोषयन्विदिशोदश

jayaśabdonamaḥ śabdaḥśaṁkhaśabdastathaivaca babhūvākāśasaṁsparśīghoṣayanvidiśodaśa

'जय', 'नमः' और शंख की ध्वनि आकाश को स्पर्श करती हुई दसों दिशाओं में गूँजने लगी।

श्लोक 25 (padma.6.195.25)

विमानानिसमारुह्यप्रहृष्टानाकवासिनः । कल्पवृक्षप्रसूनैश्चतांसभांसमवाकिरन्

vimānānisamāruhyaprahṛṣṭānākavāsinaḥ kalpavṛkṣaprasūnaiścatāṁsabhāṁsamavākiran

स्वर्ग-निवासी हर्षित होकर विमानों पर आरूढ़ हो गए, और कल्पवृक्ष के पुष्पों से उस सभा पर वर्षा करने लगे।

श्लोक 26 (padma.6.195.26)

सूतउवाच- एवंतेषुनिविष्टेषुभृग्वादिषुयथार्हतः । श्रीभागवतमाहात्म्यमूचिरेनारदायते

sūtauvāca- evaṁteṣuniviṣṭeṣubhṛgvādiṣuyathārhataḥ śrībhāgavatamāhātmyamūcirenāradāyate

सूत ने कहा — इस प्रकार भृगु आदि के यथोचित स्थान ग्रहण करने पर, उन्होंने नारद के लिए श्रीभागवत की महिमा कहनी आरंभ की।

श्लोक 27 (padma.6.195.27)

कुमारा ऊचुः। शृणु नारद वक्ष्यामो महिमानं महाद्भुतम् । श्रीमद्भागवताख्यस्य शास्त्रस्य विधिपूर्वकम्

kumārā ūcuḥ śṛṇu nārada vakṣyāmo mahimānaṁ mahādbhutam śrīmadbhāgavatākhyasya śāstrasya vidhipūrvakam

कुमारों ने कहा — हे नारद! सुनो, हम श्रीमद्भागवत नामक शास्त्र की अत्यंत अद्भुत महिमा विधिपूर्वक बताते हैं।

श्लोक 28 (padma.6.195.28)

सदा नरैः सुकृतिभिः सेव्या भागवती कथा । यस्याः श्रवणमात्रेण कृतार्थत्वं प्रयांति ते

sadā naraiḥ sukṛtibhiḥ sevyā bhāgavatī kathā yasyāḥ śravaṇamātreṇa kṛtārthatvaṁ prayāṁti te

पुण्यवान मनुष्यों द्वारा भागवत कथा सदा सेवनीय है; जिसके श्रवण मात्र से वे कृतार्थ हो जाते हैं।

श्लोक 29 (padma.6.195.29)

ग्रंथो ऽष्टादशसाहस्रो द्वादशस्कंध संयुतः । परीक्षिच्छुकसंवादः श्रीमद्भागवताभिधः

graṁtho 'ṣṭādaśasāhasro dvādaśaskaṁdha saṁyutaḥ parīkṣicchukasaṁvādaḥ śrīmadbhāgavatābhidhaḥ

यह अठारह हजार श्लोकों वाला, बारह स्कंधों से युक्त, परीक्षित और शुकदेव के संवाद रूप श्रीमद्भागवत नामक ग्रंथ है।

श्लोक 30 (padma.6.195.30)

तावत्संसारचक्रेस्मिन्भ्रमत्यज्ञानमोहितः । यावत्कर्णगतंनोस्याच्छुकशास्त्रं जनस्य च

tāvatsaṁsāracakresminbhramatyajñānamohitaḥ yāvatkarṇagataṁnosyācchukaśāstraṁ janasya ca

जब तक इस शुक-शास्त्र का श्रवण मनुष्य के कानों तक नहीं पहुँचता, तब तक वह अज्ञान से मोहित होकर इस संसार-चक्र में भटकता रहता है।

श्लोक 31 (padma.6.195.31)

किं श्रुतैर्बहुभिः शास्त्रैः पुराणैः संहितागमैः । यदि भागवतं पुंभिर्न श्रुतं भक्तिभावनैः

kiṁ śrutairbahubhiḥ śāstraiḥ purāṇaiḥ saṁhitāgamaiḥ yadi bhāgavataṁ puṁbhirna śrutaṁ bhaktibhāvanaiḥ

अनेक शास्त्रों, पुराणों, संहिताओं और आगमों के सुनने से भी क्या लाभ, यदि भक्तिभाव वाले पुरुषों ने भागवत न सुना हो?

श्लोक 32 (padma.6.195.32)

कथा भागवतस्यापि नित्यं भवति यद्गृहे । तद्गृहं तीर्थरूपं हि नृणां पापविनाशनम्

kathā bhāgavatasyāpi nityaṁ bhavati yadgṛhe tadgṛhaṁ tīrtharūpaṁ hi nṛṇāṁ pāpavināśanam

जिसके घर में सदा भागवत की कथा होती है, वह घर तीर्थ-रूप ही है, और मनुष्यों के पापों का नाश करने वाला है।

श्लोक 33 (padma.6.195.33)

अश्वमेधसहस्राणि राजसूयशतानि च । भागवत्याः कथायाश्च कलां नार्हंति षोडशीम्

aśvamedhasahasrāṇi rājasūyaśatāni ca bhāgavatyāḥ kathāyāśca kalāṁ nārhaṁti ṣoḍaśīm

सहस्र अश्वमेध यज्ञ और सैकड़ों राजसूय यज्ञ भी भागवत की कथा की सोलहवीं कला के बराबर नहीं होते।

श्लोक 34 (padma.6.195.34)

तावत्पापानि तिष्ठंति देहेऽस्मिन्मुनिपुंगव । यावन्न श्रूयते सम्यक्श्रीमद्भागवतं नरैः

tāvatpāpāni tiṣṭhaṁti dehe'sminmunipuṁgava yāvanna śrūyate samyakśrīmadbhāgavataṁ naraiḥ

हे मुनिश्रेष्ठ! जब तक मनुष्य श्रीमद्भागवत को भलीभाँति नहीं सुनते, तब तक इस शरीर में पाप बने रहते हैं।

श्लोक 35 (padma.6.195.35)

न गंगा न गया काशी प्रतिष्ठानं न पुष्करः । कथाया भागवत्याश्च समा पुण्यफलेन च

na gaṁgā na gayā kāśī pratiṣṭhānaṁ na puṣkaraḥ kathāyā bhāgavatyāśca samā puṇyaphalena ca

न गंगा, न गया, न काशी, न प्रतिष्ठान (प्रयाग), न पुष्कर — इनमें से कोई भी पुण्य-फल में भागवत कथा के समान नहीं है।

श्लोक 36 (padma.6.195.36)

श्लोकार्द्धं श्लोकपादं वा नित्यं भागवतोद्भवम् । पठस्व स्वमुखेनापि यदीच्छसि भवक्षयम्

ślokārddhaṁ ślokapādaṁ vā nityaṁ bhāgavatodbhavam paṭhasva svamukhenāpi yadīcchasi bhavakṣayam

यदि तुम संसार-बंधन के नाश की इच्छा रखते हो, तो प्रतिदिन अपने ही मुख से भागवत का आधा श्लोक या एक चरण भी पढ़ो।

श्लोक 37 (padma.6.195.37)

वेदादिर्वेदमाता च पौरुषंसूक्तमेव च । त्रयी भागवतं चैव द्वादशाष्टाक्षरौ मनू

vedādirvedamātā ca pauruṣaṁsūktameva ca trayī bhāgavataṁ caiva dvādaśāṣṭākṣarau manū

वेदों का आदि, वेद-माता, पुरुष-सूक्त, त्रयी (तीनों वेद), भागवत, बारह और आठ अक्षर वाले मंत्र—

श्लोक 38 (padma.6.195.38)

द्वादशात्मा प्रयागश्च कालः संवत्सरात्मकः । ब्राह्मणश्चाग्निहोत्रं च सुरभिर्द्वादशी तिथिः

dvādaśātmā prayāgaśca kālaḥ saṁvatsarātmakaḥ brāhmaṇaścāgnihotraṁ ca surabhirdvādaśī tithiḥ

—बारह रूपों वाला आत्मा, प्रयाग, संवत्सर-रूपी काल, ब्राह्मण, अग्निहोत्र, कामधेनु, द्वादशी तिथि—

श्लोक 39 (padma.6.195.39)

तुलसी च वसंतर्तुः पुरुषोत्तम एव च । एतेषां वस्तुतो नास्ति पृथग्भावो मुनीश्वर

tulasī ca vasaṁtartuḥ puruṣottama eva ca eteṣāṁ vastuto nāsti pṛthagbhāvo munīśvara

—तुलसी, वसंत ऋतु, और स्वयं पुरुषोत्तम — हे मुनीश्वर! इनमें वास्तव में कोई पृथकता नहीं है।

श्लोक 40 (padma.6.195.40)

यश्च भागवतं शास्त्रं व्याकुर्यादन्वहं द्विज । जन्मकोटिकृतं पापं तस्य नश्यति नारद

yaśca bhāgavataṁ śāstraṁ vyākuryādanvahaṁ dvija janmakoṭikṛtaṁ pāpaṁ tasya naśyati nārada

हे द्विज नारद! जो प्रतिदिन भागवत शास्त्र का व्याख्यान करता है, उसके करोड़ों जन्मों के अर्जित पाप नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 41 (padma.6.195.41)

श्रुतं च पठितं ध्यातं श्रीमद्भागवतं नृभिः । ददाति मुक्तिं भक्तिं वा तुलस्यग्न्योश्च सेवनम्

śrutaṁ ca paṭhitaṁ dhyātaṁ śrīmadbhāgavataṁ nṛbhiḥ dadāti muktiṁ bhaktiṁ vā tulasyagnyośca sevanam

मनुष्यों द्वारा सुना, पढ़ा और ध्यान किया गया श्रीमद्भागवत मुक्ति या भक्ति प्रदान करता है, और तुलसी तथा अग्नि की सेवा के समान फल देता है।

श्लोक 42 (padma.6.195.42)

अंतकाले तु संप्राप्ते भयं त्यक्त्वा सुदूरतः । श्रीमद्भागवतं भक्त्या शृणुयाद्यः स मुक्तिभाक्

aṁtakāle tu saṁprāpte bhayaṁ tyaktvā sudūrataḥ śrīmadbhāgavataṁ bhaktyā śṛṇuyādyaḥ sa muktibhāk

अंतकाल के आ पहुँचने पर भी जो भय को दूर त्यागकर भक्तिपूर्वक श्रीमद्भागवत सुनता है, वह मुक्ति का भागी होता है।

श्लोक 43 (padma.6.195.43)

प्रौष्ठपद्यां च राकायां हेमसिंह समन्वितम् । अलंकृत्य द्विजाग्र्याय श्रीमद्भागवतं ददेत्

prauṣṭhapadyāṁ ca rākāyāṁ hemasiṁha samanvitam alaṁkṛtya dvijāgryāya śrīmadbhāgavataṁ dadet

भाद्रपद की पूर्णिमा को, स्वर्ण-सिंहासन सहित सुसज्जित करके, श्रीमद्भागवत को किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण को दान करना चाहिए।

श्लोक 44 (padma.6.195.44)

भक्तियुक्तो विमानश्च मिताशी च जितेंद्रियः । श्रुत्वादितः स कृष्णस्य सायुज्यं लोकमाप्नुयात्

bhaktiyukto vimānaśca mitāśī ca jiteṁdriyaḥ śrutvāditaḥ sa kṛṣṇasya sāyujyaṁ lokamāpnuyāt

भक्तियुक्त, संयमित, मिताहारी और जितेंद्रिय होकर, आरंभ से इसे सुनकर मनुष्य कृष्ण के धाम में सायुज्य प्राप्त करता है।

श्लोक 45 (padma.6.195.45)

आजन्ममात्रमपि येन शठेन चित्तं सम्यङ्नियम्य भुवि कृष्णकथा न पीता । चांडालवच्च पशुवद्बत तेन नीतं मिथ्या स्वजन्म जननी भृशमर्दिता च

ājanmamātramapi yena śaṭhena cittaṁ samyaṅniyamya bhuvi kṛṣṇakathā na pītā cāṁḍālavacca paśuvadbata tena nītaṁ mithyā svajanma jananī bhṛśamarditā ca

जिस मूर्ख ने जन्म भर भी अपने चित्त को भलीभाँति संयमित करके पृथ्वी पर कृष्ण-कथा का पान नहीं किया, हाय, उसने अपना जन्म चांडाल और पशु के समान व्यर्थ कर दिया, और अपनी माता को अत्यंत पीड़ित किया।

श्लोक 46 (padma.6.195.46)

यैर्न श्रुतं भागवतं पुराणमाराधितो नो पुरुषः पुराणः । मुखे हुतं नैव धरामराणां तेषां वृथा जन्म गतं नराणाम्

yairna śrutaṁ bhāgavataṁ purāṇamārādhito no puruṣaḥ purāṇaḥ mukhe hutaṁ naiva dharāmarāṇāṁ teṣāṁ vṛthā janma gataṁ narāṇām

जिन्होंने भागवत पुराण नहीं सुना, जिन्होंने सनातन पुरुष की आराधना नहीं की, जिन्होंने ब्राह्मणों और अग्नि के मुख में हवन नहीं किया — उन मनुष्यों का जन्म व्यर्थ ही बीत गया।

श्लोक 47 (padma.6.195.47)

चित्तं न यस्य तु नरस्य हरेः कथायां संप्रीयते दुरितदुष्टमसत्प्रसंगात् । धिक्तं नरं पशुसमं भुविभारभूतमेवं वदंति मुनयः किल पूर्वसिद्धाः

cittaṁ na yasya tu narasya hareḥ kathāyāṁ saṁprīyate duritaduṣṭamasatprasaṁgāt dhiktaṁ naraṁ paśusamaṁ bhuvibhārabhūtamevaṁ vadaṁti munayaḥ kila pūrvasiddhāḥ

जिस मनुष्य का चित्त, दुष्ट संगति के कारण पाप से मलिन होकर, हरि की कथा में प्रीति नहीं पाता — उस पशु-सम, पृथ्वी पर भार-स्वरूप मनुष्य को धिक्कार है — ऐसा पूर्व-सिद्ध मुनि कहते हैं।

श्लोक 48 (padma.6.195.48)

दुर्ल्लभैव कथा लोके श्रीमद्भागवतोद्भवा । कोटिजन्मसमुत्थेन पुण्येनैव तु लभ्यते

durllabhaiva kathā loke śrīmadbhāgavatodbhavā koṭijanmasamutthena puṇyenaiva tu labhyate

संसार में भागवत से उत्पन्न यह कथा अत्यंत दुर्लभ है; यह करोड़ों जन्मों में अर्जित पुण्य से ही प्राप्त होती है।

श्लोक 49 (padma.6.195.49)

तेन योगनिधे साधो श्रोतव्या सात्वती कथा । प्रत्यहं नियमो नास्ति दिनानां वस्तुतो द्विज

tena yoganidhe sādho śrotavyā sātvatī kathā pratyahaṁ niyamo nāsti dinānāṁ vastuto dvija

हे योगनिधे साधो! इसलिए यह सात्वती कथा सुननी चाहिए; हे द्विज! वास्तव में इसके लिए दिनों का कोई निश्चित नियम नहीं है।

श्लोक 50 (padma.6.195.50)

सत्येन ब्रह्मचर्येण यतोऽस्य श्रवणं मतम् । ततः कलौ विशेषो हि विधिः सप्तदिनात्मकः

satyena brahmacaryeṇa yato'sya śravaṇaṁ matam tataḥ kalau viśeṣo hi vidhiḥ saptadinātmakaḥ

सत्य और ब्रह्मचर्य के साथ इसका श्रवण माना गया है; इसलिए कलियुग में सात दिनों की विशेष विधि बताई गई है।

श्लोक 51 (padma.6.195.51)

मनसश्चाजयाद्रोगात्पुंसां चैवायुषः क्षयात् । कलेर्दोषबहुत्वाच्च सप्ताहश्रवणंमतम्

manasaścājayādrogātpuṁsāṁ caivāyuṣaḥ kṣayāt kalerdoṣabahutvācca saptāhaśravaṇaṁmatam

मन को न जीत पाने, रोगों के कारण, मनुष्यों की आयु के क्षीण होने, और कलियुग के दोषों की बहुलता के कारण, सात दिनों का श्रवण उपयुक्त माना गया है।

श्लोक 52 (padma.6.195.52)

मनसो निग्रहश्चैव नियमाचरणं तथा । कर्तुं सप्तदिनं शक्यं ततो नियमकल्पना

manaso nigrahaścaiva niyamācaraṇaṁ tathā kartuṁ saptadinaṁ śakyaṁ tato niyamakalpanā

मन का निग्रह और नियमों का पालन सात दिनों में ही किया जा सकता है, इसीलिए यह नियम बनाया गया।

श्लोक 53 (padma.6.195.53)

श्रद्धया श्रवणे नित्यमाद्यंतावधि यत्फलम् । तत्फलं शुकदेवेन सप्ताहश्रवणे कृतम्

śraddhayā śravaṇe nityamādyaṁtāvadhi yatphalam tatphalaṁ śukadevena saptāhaśravaṇe kṛtam

श्रद्धापूर्वक आदि से अंत तक नित्य श्रवण करने से जो फल मिलता है, वही फल शुकदेव ने सात दिनों के श्रवण में समाहित कर दिया।

श्लोक 54 (padma.6.195.54)

यत्फलं नास्ति तपसा न योगेन समाधिना । अनायासेन तत्सर्वं सप्ताह श्रवणाल्लभेत्

yatphalaṁ nāsti tapasā na yogena samādhinā anāyāsena tatsarvaṁ saptāha śravaṇāllabhet

जो फल तप से नहीं मिलता, न योग से, न समाधि से, वह सब बिना किसी परिश्रम के सात दिनों के श्रवण से प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 55 (padma.6.195.55)

यज्ञाद्व्रताच्च तपसो ध्यानाज्ज्ञानाच्च तीर्थतः । श्रीभागवतसप्ताह नियमो ह्युत्तमो मतः

yajñādvratācca tapaso dhyānājjñānācca tīrthataḥ śrībhāgavatasaptāha niyamo hyuttamo mataḥ

यज्ञ, व्रत, तप, ध्यान, ज्ञान और तीर्थ से भी बढ़कर श्रीभागवत-सप्ताह का नियम उत्तम माना गया है।

श्लोक 56 (padma.6.195.56)

यदा कृष्णो भुवं त्यक्त्वा स्वपदं गंतुमुद्यतः । तदाज्ञायोद्धवो धीमान्गोविंदं वाक्यमब्रवीत्

yadā kṛṣṇo bhuvaṁ tyaktvā svapadaṁ gaṁtumudyataḥ tadājñāyoddhavo dhīmāngoviṁdaṁ vākyamabravīt

जब कृष्ण पृथ्वी को त्यागकर अपने धाम को जाने के लिए उद्यत हुए, तब यह जानकर बुद्धिमान उद्धव ने गोविंद से यह वचन कहा।

श्लोक 57 (padma.6.195.57)

उद्धव उवाच- भगवन्भवता सर्वं देवकार्यं प्रसाधितम् । अधुना गंतुमिच्छुस्त्वं स्वंपदं तमसः परम्

uddhava uvāca- bhagavanbhavatā sarvaṁ devakāryaṁ prasādhitam adhunā gaṁtumicchustvaṁ svaṁpadaṁ tamasaḥ param

उद्धव ने कहा — हे भगवन्! आपने देवताओं का सारा कार्य संपन्न कर दिया है। अब आप अंधकार से परे अपने धाम को जाना चाहते हैं।

श्लोक 58 (padma.6.195.58)

अतश्चिंता ममोत्पन्ना त्वद्वियोग भिया विभो । तामपाकुरु देवेश त्वामहं शरणं गतः

ataściṁtā mamotpannā tvadviyoga bhiyā vibho tāmapākuru deveśa tvāmahaṁ śaraṇaṁ gataḥ

इसलिए हे प्रभो! आपके वियोग के भय से मुझमें चिंता उत्पन्न हो गई है। हे देवेश! उसे दूर कीजिए, मैं आपकी शरण में आया हूँ।

श्लोक 59 (padma.6.195.59)

आगतोऽयं कलिर्घोरोऽत्र सर्वेऽपि जनाः खलाः । भविष्यंति ततो नाथ किं विधेयं तदादिश

āgato'yaṁ kalirghoro'tra sarve'pi janāḥ khalāḥ bhaviṣyaṁti tato nātha kiṁ vidheyaṁ tadādiśa

यह घोर कलि आ गया है; यहाँ सभी लोग दुष्ट हो जाएँगे। हे नाथ! तब क्या करना चाहिए, वह आदेश दीजिए।

श्लोक 60 (padma.6.195.60)

इयं भारवती भूमिः शरणं किं प्रयास्यति । त्वदन्यो दृश्यते नात्र त्राता स्याद् यदुनंदन

iyaṁ bhāravatī bhūmiḥ śaraṇaṁ kiṁ prayāsyati tvadanyo dṛśyate nātra trātā syād yadunaṁdana

यह भार से पीड़ित पृथ्वी किसकी शरण में जाएगी? हे यदुनंदन! आपके अतिरिक्त यहाँ कोई अन्य रक्षक दिखाई नहीं देता।

श्लोक 61 (padma.6.195.61)

अतोऽस्मासु दयां कृत्वा तिष्ठात्रैव दयानिधे । साधूनां रक्षणायैव त्वमाविरभवः प्रभो

ato'smāsu dayāṁ kṛtvā tiṣṭhātraiva dayānidhe sādhūnāṁ rakṣaṇāyaiva tvamāvirabhavaḥ prabho

इसलिए हे दयानिधे! हम पर कृपा करके यहीं ठहरिए; हे प्रभो! आप साधुओं की रक्षा के लिए ही अवतरित हुए हैं।

श्लोक 62 (padma.6.195.62)

निर्गुणोऽपि निराकारः सच्चिदानंदविग्रहः । त्वद्वियोगेन ते भक्ताः कथं स्थास्यंति भूतले

nirguṇo'pi nirākāraḥ saccidānaṁdavigrahaḥ tvadviyogena te bhaktāḥ kathaṁ sthāsyaṁti bhūtale

निर्गुण, निराकार, सच्चिदानंद-स्वरूप होते हुए भी, आपके वियोग से आपके भक्त इस पृथ्वी पर कैसे टिके रहेंगे?

श्लोक 63 (padma.6.195.63)

निर्गुणोपासने कष्टमतोऽस्मद्धितमाचर । सूत उवाच-। इत्युद्धववचः श्रुत्वा चिंतयित्वा क्षणं हरिः

nirguṇopāsane kaṣṭamato'smaddhitamācara sūta uvāca- ityuddhavavacaḥ śrutvā ciṁtayitvā kṣaṇaṁ hariḥ

निर्गुण की उपासना कठिन है, इसलिए हमारा हित करने वाला कोई मार्ग बताइए। सूत ने कहा — उद्धव के इन वचनों को सुनकर, क्षण भर विचार करके हरि ने—

श्लोक 64 (padma.6.195.64)

ददौ भागवतं तस्मै कृपया परया युतः । निजं तेजः समाधाय श्रीमद्भागवते द्विज

dadau bhāgavataṁ tasmai kṛpayā parayā yutaḥ nijaṁ tejaḥ samādhāya śrīmadbhāgavate dvija

—अत्यंत कृपा से युक्त होकर उसे भागवत प्रदान किया। हे द्विज! अपने ही तेज को श्रीमद्भागवत में स्थापित करके—

श्लोक 65 (padma.6.195.65)

दत्वोद्धवाय भगवान्स्वकीयं पदमाविशत् । तेनेयं वाङ्मयी मूर्तिर्वर्त्तते श्रीहरेरिह

datvoddhavāya bhagavānsvakīyaṁ padamāviśat teneyaṁ vāṅmayī mūrtirvarttate śrīhareriha

—उद्धव को देकर भगवान् अपने ही धाम में प्रविष्ट हो गए। इसीलिए यह श्रीहरि की ही वाक्-मयी मूर्ति यहाँ विद्यमान है।

श्लोक 66 (padma.6.195.66)

सेवनात्सततं चास्याः पापं नश्येन्नृणां क्षणात् । सप्ताहश्रवणं तेन कथितं सर्वतोऽधिकम्

sevanātsatataṁ cāsyāḥ pāpaṁ naśyennṛṇāṁ kṣaṇāt saptāhaśravaṇaṁ tena kathitaṁ sarvato'dhikam

इसकी निरंतर सेवा से मनुष्यों के पाप क्षण भर में नष्ट हो जाते हैं; इसीलिए सात दिनों का श्रवण सबसे अधिक फलदायी बताया गया है।

श्लोक 67 (padma.6.195.67)

श्रोता वक्ता पृच्छकश्च यांति तन्मयतां द्विज । दुःखदारिद्र्य दौर्भाग्य पाप प्रक्षालनाय च

śrotā vaktā pṛcchakaśca yāṁti tanmayatāṁ dvija duḥkhadāridrya daurbhāgya pāpa prakṣālanāya ca

हे द्विज! श्रोता, वक्ता और प्रश्नकर्ता — तीनों उसी परम तत्व में तन्मय हो जाते हैं।

श्लोक 68 (padma.6.195.68)

कामक्रोध जयार्थं च कलौ भागवतं क्षमम् । अन्यथा वैष्णवी माया देवानामपि दुर्जया । कथं निवर्तते पुंसां श्रीमद्भागवतं विना

kāmakrodha jayārthaṁ ca kalau bhāgavataṁ kṣamam anyathā vaiṣṇavī māyā devānāmapi durjayā kathaṁ nivartate puṁsāṁ śrīmadbhāgavataṁ vinā

दुःख, दरिद्रता, दुर्भाग्य और पाप को धोने के लिए, तथा काम-क्रोध पर विजय पाने के लिए, कलियुग में भागवत ही समर्थ है—

श्लोक 69 (padma.6.195.69)

सूत उवाच- इत्येवमुक्त्वा माहात्म्यं श्रीमद्भागवतस्य ते । कथां भागवतीं दिव्यां प्रवक्तुमुपचक्रमुः

sūta uvāca- ityevamuktvā māhātmyaṁ śrīmadbhāgavatasya te kathāṁ bhāgavatīṁ divyāṁ pravaktumupacakramuḥ

—अन्यथा देवताओं के लिए भी दुर्जय वैष्णवी माया, श्रीमद्भागवत के बिना, मनुष्यों से कैसे निवृत्त हो सकती है?

श्लोक 70 (padma.6.195.70)

वेदोपनिषदां सारे श्रीमद्भागवते द्विजैः । आरभ्यमाणे तत्रैव भक्तिराविरभूत्क्षणात्

vedopaniṣadāṁ sāre śrīmadbhāgavate dvijaiḥ ārabhyamāṇe tatraiva bhaktirāvirabhūtkṣaṇāt

सूत ने कहा — इस प्रकार श्रीमद्भागवत की महिमा कहकर, उन्होंने दिव्य भागवत कथा सुनानी आरंभ की।

श्लोक 71 (padma.6.195.71)

प्रेमान्विता चारुतनुर्मुदान्वितौ सुतौ गृहीत्वा तरुणौ स्वदोर्भ्याम् । श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारे नाथेति नामानि मुहुर्वदंती

premānvitā cārutanurmudānvitau sutau gṛhītvā taruṇau svadorbhyām śrīkṛṣṇa goviṁda hare murāre nātheti nāmāni muhurvadaṁtī

वेद-उपनिषदों के सार श्रीमद्भागवत का उन ब्राह्मणों द्वारा आरंभ होते ही, वहीं भक्ति क्षण भर में प्रकट हो गई।

श्लोक 72 (padma.6.195.72)

तामागतां भागवतार्थभूषां सुचारुवेषां ददृशुः सदस्याः । व्यतर्कयंश्चापि कथं कुतासौ कास्तीति सर्वेऽपि सुविस्मिताक्षाः

tāmāgatāṁ bhāgavatārthabhūṣāṁ sucāruveṣāṁ dadṛśuḥ sadasyāḥ vyatarkayaṁścāpi kathaṁ kutāsau kāstīti sarve'pi suvismitākṣāḥ

प्रेम से युक्त, सुंदर देह वाली, अपने दोनों हाथों से हर्षित तरुण पुत्रों को थामकर, 'श्रीकृष्ण, गोविंद, हरे, मुरारे, नाथ' — बार-बार यह नाम कहती हुई—

श्लोक 73 (padma.6.195.73)

ततः कुमारा जगदुः कृतार्था कथार्थतो निष्पतिताधुनेयम् । एवं गिरः सा ससुता निशम्य जगाद नम्राब्जभुवः कुमारात्

tataḥ kumārā jagaduḥ kṛtārthā kathārthato niṣpatitādhuneyam evaṁ giraḥ sā sasutā niśamya jagāda namrābjabhuvaḥ kumārāt

—भागवत के अर्थ से अलंकृत, सुंदर वेश धारण किए हुए उसे आती देखकर सभा के सभी लोग देखने लगे, और सब विस्मित नेत्रों से सोचने लगे — यह कैसे और कहाँ से आई, यह कौन है?

श्लोक 74 (padma.6.195.74)

भक्तिरुवाच-। भवद्भिरद्यैव कृतास्मि पुष्टा कलौ प्रणष्टापि कथारसेन । तिष्ठामि कुत्राहमभीष्टमाभ्यां सहास्पदं मह्यमुपादशध्वम्

bhaktiruvāca- bhavadbhiradyaiva kṛtāsmi puṣṭā kalau praṇaṣṭāpi kathārasena tiṣṭhāmi kutrāhamabhīṣṭamābhyāṁ sahāspadaṁ mahyamupādaśadhvam

तब कुमारों ने कहा — कथा के सार से ही अब यह कृतार्थ होकर प्रकट हुई है। यह वचन सुनकर, पुत्रों सहित वह भक्ति, कमल-जन्मा कुमारों को झुककर बोली—

श्लोक 75 (padma.6.195.75)

सूत उवाच- तद्वाक्यमाकर्ण्य विधेः कुमारा विचार्य सम्यक्प्रणिधाय चित्ते । उचुश्च भक्तिं भवरोगहर्त्रीं प्रेमैकदात्रीं हरिभक्तिभाजाम्

sūta uvāca- tadvākyamākarṇya vidheḥ kumārā vicārya samyakpraṇidhāya citte ucuśca bhaktiṁ bhavarogahartrīṁ premaikadātrīṁ haribhaktibhājām

भक्ति ने कहा — आपने आज ही मुझे पुष्ट कर दिया, जो कलियुग में नष्ट हो गई थी, कथा के रस से। मैं अब इन दोनों के साथ कहाँ रहूँ? मुझे मेरे लिए अभीष्ट स्थान बताइए।

श्लोक 76 (padma.6.195.76)

कुमारा ऊचुः । भक्तेषु गोविंद परायणेषु साधुष्वथो दीनदया परेषु । मनो नियम्योत्पथसंप्रवृत्तं कृत्वैकतानं हरिपादपद्मे

kumārā ūcuḥ bhakteṣu goviṁda parāyaṇeṣu sādhuṣvatho dīnadayā pareṣu mano niyamyotpathasaṁpravṛttaṁ kṛtvaikatānaṁ haripādapadme

सूत ने कहा — भाग्य के इस वचन को सुनकर, भली-भाँति विचार करके और मन में स्थिर करके कुमारों ने संसार-रोग को हरने वाली, हरि-भक्तों को प्रेम देने वाली भक्ति से कहा—

श्लोक 77 (padma.6.195.77)

ततो हि दोषाः कलिजा इमे त्वां द्रष्टुं न शक्ताः प्रभवोपि लोके । कलौ त्वमेकैव जगद्धिताय भविष्यसे नारद संप्रणीता

tato hi doṣāḥ kalijā ime tvāṁ draṣṭuṁ na śaktāḥ prabhavopi loke kalau tvamekaiva jagaddhitāya bhaviṣyase nārada saṁpraṇītā

कुमारों ने कहा — गोविंद-परायण भक्तों में, साधुओं में, तथा दीनों पर दया करने वालों में, कुमार्ग पर गए मन को रोककर, हरि के चरण-कमल में एकाग्र करके निवास करो।

श्लोक 78 (padma.6.195.78)

सकलभुवनमध्ये निर्धनाश्चातिधन्या निवसति हृदि येषां श्रीहरेर्भक्तिरेका । हरिरपि निजलोकं सत्वरं संविहाय प्रविशति हृदि येषां प्रेमसूत्रापिनद्धः

sakalabhuvanamadhye nirdhanāścātidhanyā nivasati hṛdi yeṣāṁ śrīharerbhaktirekā harirapi nijalokaṁ satvaraṁ saṁvihāya praviśati hṛdi yeṣāṁ premasūtrāpinaddhaḥ

तब कलियुग के ये दोष, संसार में प्रबल होते हुए भी, तुम्हें देख नहीं पाएँगे। हे नारद द्वारा प्रतिष्ठापित भक्ति! कलियुग में तुम अकेली ही संसार के हित के लिए रहोगी। समस्त लोकों में जिनके हृदय में केवल श्रीहरि की भक्ति निवास करती है, वे निर्धन होते हुए भी सर्वाधिक धन्य हैं; हरि भी अपने ही धाम को शीघ्र त्यागकर, प्रेम के सूत्र से बँधकर उन्हीं के हृदय में प्रवेश करते हैं।

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