उत्तर खण्ड · अध्याय 2
बदरीनारायण माहात्म्य और रुद्र-प्रसाद
श्लोक 1 (padma.6.2.1)
महेश उवाच ।एकलक्षं पंचविंशत्सहस्रा पर्वतास्तथा । तेषां मध्ये महत्पुण्यं बद्रिकाश्रममुत्तमम्
maheśa uvāca ekalakṣaṁ paṁcaviṁśatsahasrā parvatāstathā teṣāṁ madhye mahatpuṇyaṁ badrikāśramamuttamam
महेश ने कहा — एक लाख पच्चीस हजार पर्वत हैं; उनमें सबसे बड़ा पुण्यमय और उत्तम बद्रिकाश्रम है।
श्लोक 2 (padma.6.2.2)
नरनारायणो देवो यत्र तिष्ठति नारद । तस्य स्वरूपं तेजश्च वक्ष्यामीह च सांप्रतम्
naranārāyaṇo devo yatra tiṣṭhati nārada tasya svarūpaṁ tejaśca vakṣyāmīha ca sāṁpratam
हे नारद! जहाँ नर-नारायण देव विराजते हैं, उनके स्वरूप और तेज का वर्णन अब मैं करूँगा।
श्लोक 3 (padma.6.2.3)
हिमपर्वतशृंगे च कृष्णाकारतया द्विज । द्वौ पुरुषौ तत्र वर्तेते नरनारायणावुभौ
himaparvataśṛṁge ca kṛṣṇākāratayā dvija dvau puruṣau tatra vartete naranārāyaṇāvubhau
हे द्विज! हिमपर्वत के शिखर पर, श्याम-वर्ण में, वहाँ नर और नारायण दोनों पुरुष विराजमान हैं।
श्लोक 4 (padma.6.2.4)
श्वेत एकस्तु पुरुषः कृष्णो ह्येकतमः पुनः । तेन मार्गेण ये यांति हिमाचलकृतोद्यमाः
śveta ekastu puruṣaḥ kṛṣṇo hyekatamaḥ punaḥ tena mārgeṇa ye yāṁti himācalakṛtodyamāḥ
एक पुरुष श्वेत है और दूसरा श्याम है; जो हिमाचल पर उद्यम करके उसी मार्ग से जाते हैं (उन्हें उनके दर्शन होते हैं)।
श्लोक 5 (padma.6.2.5)
पिंगलश्वेतवर्णश्च जटाधारी महाप्रभुः । कृष्णो नारायणो ह्येष जगदादिर्महाप्रभुः
piṁgalaśvetavarṇaśca jaṭādhārī mahāprabhuḥ kṛṣṇo nārāyaṇo hyeṣa jagadādirmahāprabhuḥ
पिंगल-श्वेत वर्ण वाले, जटाधारी महाप्रभु — यह श्याम रूप नारायण ही हैं, जगत के आदि, महाप्रभु।
श्लोक 6 (padma.6.2.6)
चतुर्बाहुर्महान्श्रीमान्व्यक्तोऽव्यक्तः सनातनः । उत्तरायणे महापूजा जायते तत्र सुव्रत
caturbāhurmahānśrīmānvyakto'vyaktaḥ sanātanaḥ uttarāyaṇe mahāpūjā jāyate tatra suvrata
चतुर्भुज, महान, श्रीमान, व्यक्त और अव्यक्त दोनों, सनातन — हे सुव्रत! उत्तरायण में वहाँ महापूजा होती है।
श्लोक 7 (padma.6.2.7)
षण्मासादिकपर्यंतं पूजा नैव च जायते । हिमव्याप्तं तदा जातं यावद्वै दक्षिणं भवेत्
ṣaṇmāsādikaparyaṁtaṁ pūjā naiva ca jāyate himavyāptaṁ tadā jātaṁ yāvadvai dakṣiṇaṁ bhavet
लगभग छह महीने तक वहाँ कोई पूजा नहीं होती; उस समय वह स्थान हिम से ढका रहता है, जब तक दक्षिणायन न आए।
श्लोक 8 (padma.6.2.8)
अत एतादृशो देवो न भूतो न भविष्यति । तत्र देवा वसंतीह ऋषीणां चाश्रमास्तथा
ata etādṛśo devo na bhūto na bhaviṣyati tatra devā vasaṁtīha ṛṣīṇāṁ cāśramāstathā
इसलिए ऐसा देव न कभी हुआ है, न कभी होगा; वहाँ देवगण निवास करते हैं और ऋषियों के आश्रम भी हैं।
श्लोक 9 (padma.6.2.9)
अग्निहोत्राणि वेदाश्च ध्वनिः प्रश्रूयते सदा । तस्य वै दर्शनं कार्यं कोटिहत्याविनाशनम्
agnihotrāṇi vedāśca dhvaniḥ praśrūyate sadā tasya vai darśanaṁ kāryaṁ koṭihatyāvināśanam
वहाँ सदा अग्निहोत्र और वेदों की ध्वनि सुनाई देती है; उनका दर्शन करना चाहिए, क्योंकि वह करोड़ों हत्याओं के पाप को भी नष्ट कर देता है।
श्लोक 10 (padma.6.2.10)
अलकनंदा यत्र गंगा तत्र स्नानं समाचरेत् । कृत्वा स्नानं तु वै तत्र महापापात्प्रमुच्यते
alakanaṁdā yatra gaṁgā tatra snānaṁ samācaret kṛtvā snānaṁ tu vai tatra mahāpāpātpramucyate
जहाँ गंगा 'अलकनंदा' कहलाती है, वहाँ स्नान करना चाहिए; वहाँ स्नान करने से मनुष्य महापाप से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 11 (padma.6.2.11)
यत्र विश्वेश्वरो देवस्तिष्ठत्येव न संशयः । एकस्मिन्नवसरे ब्रह्मन्सुतपस्तप्तवानहम्
yatra viśveśvaro devastiṣṭhatyeva na saṁśayaḥ ekasminnavasare brahmansutapastaptavānaham
जहाँ विश्वेश्वर देव निःसंदेह विराजते हैं — हे ब्रह्मन्! एक अवसर पर मैंने वहाँ महान तप किया था।
श्लोक 12 (padma.6.2.12)
तदा नारायणो देवो भक्तानां हि कृपाकरः । अव्ययः पुरुषः साक्षादीश्वरो गरुडध्वजः । सुप्रसन्नोऽब्रवीन्मां वै वरं वरय सुव्रत
tadā nārāyaṇo devo bhaktānāṁ hi kṛpākaraḥ avyayaḥ puruṣaḥ sākṣādīśvaro garuḍadhvajaḥ suprasanno'bravīnmāṁ vai varaṁ varaya suvrata
तब भक्तों पर कृपा करने वाले देव नारायण — अविनाशी पुरुष, साक्षात् ईश्वर, गरुड़-ध्वज — अत्यंत प्रसन्न होकर मुझसे बोले: 'हे सुव्रत! वर माँगो।'
श्लोक 13 (padma.6.2.13)
श्रीनारायण उवाच । यद्यदीप्ससि देव त्वं तं तं कामं ददाम्यहम् । त्वं कैलासविभुः साक्षाद्रुद्रो वै विश्वपालकः
śrīnārāyaṇa uvāca yadyadīpsasi deva tvaṁ taṁ taṁ kāmaṁ dadāmyaham tvaṁ kailāsavibhuḥ sākṣādrudro vai viśvapālakaḥ
श्री नारायण ने कहा — हे देव! तुम जो भी चाहो, वह इच्छा मैं पूर्ण करूँगा; तुम साक्षात् कैलासपति रुद्र, विश्व के पालक हो।
श्लोक 14 (padma.6.2.14)
रुद्र उवाच । अलं गृह्णामि भो देव सुप्रसन्नो जनार्दन । द्वौ वरौ मम दीयेतां यदि दातुं त्वमिच्छसि
rudra uvāca alaṁ gṛhṇāmi bho deva suprasanno janārdana dvau varau mama dīyetāṁ yadi dātuṁ tvamicchasi
रुद्र ने कहा — हे देव! बस, अब मैं संतुष्ट हूँ, हे जनार्दन! यदि तुम देना ही चाहते हो, तो मुझे दो वर दो।
श्लोक 15 (padma.6.2.15)
तव भक्तिः सदैवास्तु भक्तराजो भवाम्यहम् । सर्वे लोका ब्रुवंत्वेवमयं भक्तः सदैव हि
tava bhaktiḥ sadaivāstu bhaktarājo bhavāmyaham sarve lokā bruvaṁtvevamayaṁ bhaktaḥ sadaiva hi
तुम्हारी भक्ति सदा मुझमें बनी रहे, और मैं भक्तों का राजा बनूँ; सभी लोक सदा यही कहें कि यह सदैव तुम्हारा भक्त है।
श्लोक 16 (padma.6.2.16)
तव प्रसादाद्देवेश मुक्तिदाता भवाम्यहम् । ये लोका मां भजिष्यंति तेषां दाता न संशयः
tava prasādāddeveśa muktidātā bhavāmyaham ye lokā māṁ bhajiṣyaṁti teṣāṁ dātā na saṁśayaḥ
हे देवेश! तुम्हारी कृपा से मैं मुक्ति देने वाला बनूँ; जो लोक मेरी उपासना करेंगे, उन्हें निःसंदेह मैं वही मुक्ति दूँगा।
श्लोक 17 (padma.6.2.17)
विष्णुभक्त इति ख्यातो लोके चैव भवाम्यहम् । यस्याहं वरदाता तु तस्य मुक्तिर्भवेत्प्रभो
viṣṇubhakta iti khyāto loke caiva bhavāmyaham yasyāhaṁ varadātā tu tasya muktirbhavetprabho
मैं संसार में 'विष्णुभक्त' नाम से विख्यात होऊँ; हे प्रभो! जिसे मैं वर दूँ, उसे भी मुक्ति प्राप्त हो।
श्लोक 18 (padma.6.2.18)
जटिलो भस्मलिप्तांगो ह्यहं वै तव संनिधौ । तव चरणप्रसादेन लोके ख्यातो भवाम्यहम्
jaṭilo bhasmaliptāṁgo hyahaṁ vai tava saṁnidhau tava caraṇaprasādena loke khyāto bhavāmyaham
जटाधारी और भस्म से लिप्त शरीर वाला मैं सदा तुम्हारे समीप रहूँ; तुम्हारे चरणों की कृपा से मैं संसार में विख्यात होऊँ।